गीताकी विलक्षण बात

भगवान‍्की कही हुई गीता बहुत ही विचित्र है! गीतापर ज्यों-ज्यों विचार करें, त्यों-ही-त्यों इसकी विलक्षणता मिलती ही चली जाती है। अगर मनुष्यको सम्पूर्ण संसारका आधिपत्य मिल जाय, इन्द्रका राज्य मिल जाय, कुबेरका धन मिल जाय, ब्रह्माजीका पद मिल जाय, तो भी उसका दु:ख नहीं मिट सकता। परन्तु वह गीतामें कही हुई बात मान ले तो उसका दु:ख टिक नहीं सकेगा; सदाके लिये मिट जायगा। उसका सन्ताप, जलन, उद्वेग, हलचल, चिन्ता, शोक, भय आदि सभी आफतें मिट जायँगी और वह सदाके लिये कृतकृत्य, ज्ञातज्ञातव्य और प्राप्तप्राप्तव्य हो जायगा अर्थात् उसके लिये कुछ भी करना, जानना और पाना बाकी नहीं रहेगा; क्योंकि यह वास्तविकता है। गीताकी ऐसी विलक्षण महिमा है कि जिसका कोई वर्णन नहीं कर सकता। कारण कि वर्णन करनेमें वाणी सीमित है, चिन्तन करनेमें मन सीमित है, निश्चय करनेमें बुद्धि सीमित है। परन्तु भगवान‍्की वाणी असीम है। प्रकृतिजन्य सम्पूर्ण पदार्थ सीमित हैं। प्रकृतिसे अतीत तत्त्वका वर्णन प्रकृतिका कार्य बुद्धि भी नहीं कर सकती, फिर मनुष्य क्या वर्णन करेगा! बुद्धि प्रकृतिको भी पूरा नहीं जान सकती, फिर प्रकृतिसे अतीत तत्त्वको कैसे जानेगी? जैसे, मिट्टीसे बना घड़ा मिट्टीको भी पूरा नहीं भर सकता, फिर आकाशको कैसे भरेगा?

गीता स्पष्टरूपसे कहती है—‘वासुदेव: सर्वम्’ (७। १९) ‘सब कुछ वासुदेव ही है’। इस बातको केवल स्वीकार कर लें। ऐसा देखनेमें, समझनेमें, अनुभवमें नहीं आये, तो भी गीतामें आये भगवान‍्के वचनको श्रद्धा-विश्वासपूर्वक दृढ़तासे स्वीकार कर लें। फिर भगवत्कृपासे यह बात स्वत: समझमें आ जायगी; क्योंकि तत्त्वसे वास्तवमें यही है। जैसी बात वास्तवमें है, वैसी बात मान लेनेसे वह धीरे-धीरे भीतर बैठ जाती है और फिर भगवत्कृपासे साफ दीखने लग जाती है। सब कुछ भगवान् ही हैं—यह ऊँची-से-ऊँची बात है और बड़ी सुगमतासे प्राप्त की जा सकती है। अब इसकी प्राप्तिका साधन बताया जाता है।

(१)

भगवान् कहते हैं—

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:।

(गीता २। १६)

‘असत् की सत्ता विद्यमान नहीं है और सत् का अभाव विद्यमान नहीं है।’

—इन सोलह अक्षरोंमें सम्पूर्ण वेद, पुराण, शास्त्रका तात्पर्य भरा हुआ है! असत् और सत्—इन दोको ही प्रकृति और पुरुष, क्षर और अक्षर, शरीर और शरीरी, अनित्य और नित्य, नाशवान् और अविनाशी आदि नामोंसे कहा गया है। देखनेमें, सुननेमें, समझनेमें, चिन्तन करनेमें, निश्चय करनेमें जो कुछ भी आता है, वह सब ‘असत्’ है। जिसके द्वारा देखते, सुनते, चिन्तन करते हैं, वह भी ‘असत्’ है और दीखनेवाला भी असत् है। असत् की सत्ता विद्यमान नहीं है और सत् का अभाव विद्यमान नहीं है—इसका तात्पर्य है कि एक सत्-तत्त्व (परमात्मा)-के सिवाय कुछ भी नहीं है।

यह सबके प्रत्यक्ष अनुभवकी बात है कि शरीर और संसार एक क्षण भी स्थिर नहीं रहते, प्रत्युत हरदम मिट रहे हैं। जैसे, पहले हम बालक थे। हमने बालकपनको कभी छोड़ा नहीं, फिर भी वह छूट गया। ऐसे ही जवानी भी छूट रही है, वृद्धावस्था भी छूट रही है और शरीर भी छूट रहा है। सब-का-सब संसार, तीनों लोक, चौदह भुवन, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड निरन्तर अभावमें जा रहे हैं—‘नासतो विद्यते भाव:’। परन्तु परमात्मा और उसके अंश जीवात्माका कभी अभाव नहीं होता—‘नाभावो विद्यते सत:’। हमने अपने जीवनमें कई कथाएँ सुनी हैं, व्याख्यान सुने हैं, शास्त्र पढ़े हैं, पर ऐसा कहीं सुनने, पढ़नेमें नहीं आया कि परमात्मा बदल गये, पहलेवाले नहीं रहे! परमात्मा तो ‘है’ और संसार ‘नहीं’ है—इन दोनोंके एक ही अन्त (तत्त्व)-का तत्त्वदर्शी, अनुभवी महापुरुषोंने अनुभव किया है अर्थात् इन दोनोंका निष्कर्ष एक परमात्मतत्त्व ही है—‘उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभि:’(गीता २। १६)। तात्पर्य है कि सत् (अपरिवर्तनशील) और असत् (परिवर्तनशील)— दोनों अलग-अलग हैं। सत् असत् नहीं हो सकता और असत् सत् नहीं हो सकता; परन्तु तत्त्वसे दोनों एक ही हैं। गीतामें आया है—

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।

शुनि चैव श्वपाके च पण्डिता: समदर्शिन:॥

(५। १८)

तात्पर्य है कि ब्राह्मण और चाण्डाल, गाय और कुत्ता, हाथी और चींटी—दोनों अलग-अलग होनेपर भी ज्ञानी उनमें एक समरूप परमात्माको देखता है। इसी तरह सत् और असत् अलग-अलग होनेपर भी भक्त उनमें एक भगवान‍्को ही देखता है—‘त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्’ (गीता ११। ३७)। जैसे दिन और रात—दोनों सापेक्ष हैं, दिनकी अपेक्षा रात है और रातकी अपेक्षा दिन है, पर सूर्यमें न दिन है, न रात है अर्थात् वह निरपेक्ष है। ऐसे ही सत् और असत् दोनों सापेक्ष हैं, पर परमात्मतत्त्व निरपेक्ष है। इसलिये तत्त्वदर्शी महापुरुष सत् और असत् —दोनोंके एक ही अन्त अर्थात् सत्-तत्त्व (परमात्मतत्त्व)-का अनुभव करते हैं।

जो ‘है’, वह तो है ही और जो ‘नहीं’ है, वह है ही नहीं—

है सो सुन्दर है सदा, नहिं सो सुन्दर नाहिं।

नहिं सो परगट देखिये, है सो दीखे नाहिं॥

जो मिट रहा है, वह संसार है और जो टिक रहा है, वह परमात्मा है। जैसे गंगाजीका प्रवाह निरन्तर बहता हुआ समुद्रमें जा रहा है। रात्रिमें हम छिपकर परीक्षा करें तो भी उसका प्रवाह ज्यों-का-त्यों बह रहा है। गंगाजीको कोई देखे या न देखे, कोई जाने या न जाने, कोई माने या न माने, कोई परवाह नहीं। उसका प्रवाह तो निरन्तर अपने-आप, स्वाभाविक बह रहा है। ऐसे ही यह सब-का-सब संसार निरन्तर बह रहा है और बहते हुए अभाव (नाश)-की तरफ जा रहा है। इस बहते हुए संसारमें वह परमात्मा ही ‘है’-रूपसे दीख रहा है। ‘संसार है’—इसमें ‘संसार’ तो मिट रहा है और ‘है’ टिक रहा है।

जासु सत्यता तें जड़ माया।

भास सत्य इव मोह सहाया॥

(मानस, बाल० ११७। ४)

यह जो संसार दीख रहा है, इसकी खुदकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है, प्रत्युत यह परमात्माकी ही एक आभा है, झलक है, प्रकाश है। अत: आभा (संसार)-पर दृष्टि न रखकर परमात्माकी तरफ ही दृष्टि रखना है, ‘नहीं’ को न देखकर ‘है’को ही देखना है। इसीको गीताने ‘वासुदेव: सर्वम्’ कहा है। तात्पर्य है कि वह सत् ही असत्-रूपसे दीख रहा है—‘सदसच्चाहमर्जुन’ (गीता ९। १९)। परमात्मतत्त्व ही संसाररूपसे दीख रहा है। जैसे चनेका आटा (बेसन) गेहूँ, बाजरी आदिके आटेसे भी फीका होता है, उसमें मिठास नहीं होती। उस आटेकी बूँदी बनाते हैं। फिर उस बूँदीको चीनीकी चाशनीमें डाल देते हैं। इससे वह मीठी बूँदी बन जाती है। वह बूँदी खानेमें बड़ी मीठी लगती है। उस बूँदीके आठ-दस दाने मुखमें लेकर कुछ देर चूसते रहें तो वह बिलकुल फीकी हो जाती है। कारण कि वह तो फीकी ही थी। उसमें जो मिठास थी, वह उसकी न होकर चीनीकी थी। इसी तरह संसार भी फीका है अर्थात् संसारका जो ‘है’-पना है, वह संसारका न होकर परमात्माका ही है। केवल रागके कारण ही संसार ‘है’-पना दीखता है। परन्तु यह दृष्टान्त एकदेशीय है। कारण कि बूँदीको चूसनेसे उसकी मिठास तो निकल जाती है, पर फीका बेसन शेष रह जाता है। परन्तु परमात्माका अनुभव होनेपर संसारका संसाररूपसे अत्यन्त अभाव हो जाता है, कुछ भी नहीं बचता, प्रत्युत परमात्मा ही बचते हैं—‘शिष्यते शेषसंज्ञ:’।*

(२)

संसारमें दो चीजें हैं—पदार्थ और क्रिया। मात्र पदार्थ और क्रियाएँ भगवान‍्की हैं और भगवान‍्के ही स्वरूप हैं। इसलिये भगवान् कहते हैं कि जितने भी पदार्थ हैं और जितनी भी क्रियाएँ हैं, उन सबको अपना न मानकर मेरे अर्पण कर दो—

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।

तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मन:॥

(गीता ९। २६)

‘जो भक्त पत्र, पुष्प, फल, जल आदि (यथासाध्य प्राप्त पदार्थ)- को भक्तिपूर्वक मेरे अर्पण करता है, उस मेरेमें तल्लीन हुए अन्त:करणवाले भक्तके द्वारा भक्तिपूर्वक दिये हुए उपहार (भेंट)-को मैं खा लेता हूँ अर्थात् अपनेमें मिला लेता हूँ—एक कर देता हूँ।’

यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।

यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥

(गीता ९। २७)

‘हे कुन्तीपुत्र! तू जो कुछ करता है, जो कुछ खाता है, जो कुछ यज्ञ करता है, जो कुछ दान देता है और जो कुछ तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर दे।’

धन, जमीन, मकान, कपड़े, गहने, अपना शरीर, माँ-बाप, स्त्री, बच्चे, भाई-बहन आदि जो कुछ है, सब-के-सब भगवान‍्के अर्पण कर दें। अर्पण करनेका अर्थ है—उनमें मेरापन छोड़ दें। अर्पण करनेसे वस्तुएँ तो तोलाभर भी घटेंगी नहीं, पर अर्पक (अर्पण करनेवाला) निहाल हो जायगा। कारण कि अर्पित वस्तु भगवान‍्की और भगवत्स्वरूप ही थी। उसको अपना मानना अर्पककी गलती थी। अत: अर्पित करनेसे अर्पककी गलती, बेसमझी, आफत मिट जाती है। जैसे आहुति अग्निमें मिलकर अग्निरूप हो जाती है, ऐसे ही अर्पित वस्तु भगवान‍्में मिलकर भगवत्स्वरूप हो जाती है। अर्पण करनेसे भगवान‍्की पुष्टि हो जायगी, उनका खजाना बढ़ जायगा, यह बात भी नहीं है। भगवान‍्ने आत्मने पद ‘कुरुष्व’ पदका प्रयोग किया है—‘तत्कुरुष्व मदर्पणम्’। तात्पर्य है कि हम अर्पण करके भगवान‍्का घाटा नहीं मिटाते हैं, प्रत्युत अपना ही घाटा, अपनी ही आफत मिटाते हैं अर्थात् अर्पण करनेका हमें ही फल मिलेगा, हमारा ही कल्याण होगा। अगर ठीक अर्पण किया जाय तो अर्पक, अर्पण, अर्पित वस्तु और अर्प्य—चारों एक अर्थात् भगवत्स्वरूप हो जायँगे। कारण कि अर्पक (अर्पण करनेवाला), अर्पणरूपी क्रिया, अर्पित वस्तु और अर्प्य (भगवान्)—चारों तत्त्वसे एक परमात्मा ही हैं—‘वासुदेव: सर्वम्’।

ठाकुरजीको भोग लगाकर फिर प्रसाद देते हैं तो करोड़पति-अरबपति सेठ भी प्रसाद लेनेके लिये हाथ फैलाते हैं और एक कणका भी मिल जाय तो खुश हो जाते हैं। क्या वे मिठाईके भूखे हैं? अगर हम कहें कि ये मिठाई माँगते हैं, इनको दस रुपयेकी मिठाई लाकर दे दो, तो वे नाराज हो जायँगे। कारण कि वे मिठाईके नहीं, प्रसादके भूखे हैं। ठाकुरजीके अर्पण करनेसे वह वस्तु प्रसाद हो गयी, महान् पवित्र अर्थात् भगवत्स्वरूप हो गयी! इसी तरह हम सब कुछ भगवान‍्के अर्पण कर दें तो वह सब-का-सब प्रसाद हो जायगा। हम भोजन करें तो ठाकुरजीका प्रसाद, कपड़ा पहनें तो ठाकुरजीका प्रसाद, माताएँ-बहनें गहने पहनें तो ठाकुरजीका प्रसाद—सब कुछ ठाकुरजीका प्रसाद अर्थात् भगवत्स्वरूप हो जायगा!

तुम्हहि निबेदित भोजन करहीं।

प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं॥

(मानस, अयोध्या० १२९। १)

भगवान‍्के अर्पण करनेका तात्पर्य है—मेरापन छोड़ना। मेरापन करनेसे वस्तुएँ अपवित्र हो जाती हैं और मेरापन सर्वथा छोड़नेसे महान् पवित्र अर्थात् भगवत्स्वरूप हो जाती हैं। आस्तिक गृहस्थोंके घरमें ठाकुरजीका मन्दिर होता है और माताएँ-बहनें घरवालोंसे पूछती हैं कि आज ठाकुरजीके लिये क्या बनेगा? यह हमारी हिन्दू-संस्कृतिकी सभ्यता है। रसोई भी अपने लिये नहीं बनती, प्रत्युत ठाकुरजीके लिये बनती है। गीता कहती है—

भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥

(३। १३)

‘जो केवल अपने लिये ही पकाते हैं, वे पापीलोग पापका ही भक्षण करते हैं।’

अगर यह कहें कि आज ठण्डी ज्यादा है, इसलिये ठाकुरजीको गरमागरम हलवेका भोग लगाओ, और अपने मुँहमें पानी आता हो तो यह ठाकुरजीके भोग नहीं लगेगा; क्योंकि यह जूठन हो गया। परन्तु ठाकुरजीके लिये बनी हुई रसोईमें नमककी परीक्षा करनेके लिये थोड़ी चीज लेकर (रसोईके बाहर जाकर) चख भी लें तो वह रसोई जूठी नहीं होगी। इस प्रकार मनमें खानेकी हो तो न चखनेपर भी वह जूठन हो जाता है और मनमें खानेकी न हो तो नमककी परीक्षाके लिये चखनेपर भी वह जूठन नहीं होता; क्योंकि भावकी प्रधानता है। इसलिये अपने मनमें खानेकी न हो और ठाकुरजीको भोग लगाया जाय। फिर उसको ठाकुरजीका प्रसाद समझकर आनन्दपूर्वक पाया जाय। अन्नकूटका प्रसाद होता है, उसमें रसगुल्ला भी होता है और करेलेका साग भी होता है। एक मीठा है, एक कड़वा है, पर दोनों ही प्रसाद हैं। प्रसादमें स्वाद-दृष्टि नहीं रखी जाती, प्रत्युत स्वादमें प्रसाद-दृष्टि रखी जाती है*; क्योंकि प्रसाद इन्द्रियोंका विषय नहीं है, प्रत्युत भगवद्भावका विषय है।

इसी तरह सम्पूर्ण पदार्थों और क्रियाओंको भगवान‍्के अर्पण कर दें तो वह सब ठाकुरजीका प्रसाद अर्थात् भगवत्स्वरूप हो जायगा। कारण कि सब वस्तुएँ (क्रिया और पदार्थ) भगवान‍्की हैं तो वस्तुओंमें और भगवान‍्में कोई फर्क नहीं हुआ। जैसे धन धनवान‍्का है तो धनमें और धनवान‍्में कोई फर्क नहीं है; क्योंकि धनके बिना धनवान् नहीं है और धनवान‍्के बिना धन नहीं है (धन मिट्टीकी तरह है) क्रिया और पदार्थ प्रकृतिका कार्य (संसार) है और प्रकृति भगवान‍्की शक्ति है। शक्ति और शक्तिमान‍्में एकता होती है। शक्तिके बिना शक्तिमान् नहीं है और शक्तिमान‍्के बिना शक्ति नहीं है*।

अत: भगवान‍्की होनेसे सब वस्तुएँ भगवत्स्वरूप ही हैं—‘वासुदेव: सर्वम्’।

ऐसा मान लें कि हम भगवान‍्के ही हैं, भगवान‍्के घरमें रहते हैं, भगवान‍्के ही घरका काम करते हैं, भगवान‍्का ही दिया हुआ प्रसाद पाते हैं और भगवान‍्के दिये हुए प्रसादसे भगवान‍्के ही जनोंकी सेवा करते हैं। इस बातको सब-के-सब मान सकते हैं। भाई हो या बहन हो, छोटा हो या बड़ा हो, समझदार हो या बेसमझ हो, पढ़ा-लिखा हो या अपढ़ हो, बीमार हो या स्वस्थ हो, किसी वर्णका हो, किसी आश्रमका हो, किसी वेशका हो, किसी देशका हो, किसी सम्प्रदायका हो सब-के-सब इस बातको मान सकते हैं अर्थात् सम्पूर्ण क्रियाओं और पदार्थोंको तथा अपने-आपको भगवान‍्के समर्पित कर सकते हैं। इस प्रकार समर्पण करनेसे क्या होगा? इसको भगवान् बताते हैं—

शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनै:।

सन्न्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि॥

(गीता ९। २८)

‘इस प्रकार मेरे अर्पण करनेसे जिनसे कर्मबन्धन होता है, ऐसे शुभ (विहित) और अशुभ (निषिद्ध) सम्पूर्ण कर्मोंके फलोंसे तू मुक्त हो जायगा। ऐसे अपनेसहित सब कुछ मेरे अर्पण करनेवाला और सबसे मुक्त हुआ तू मेरेको प्राप्त हो जायगा अर्थात् मेरा ही स्वरूप हो जायगा।’

जैसे अग्निमें ठीकरी, पत्थर तथा काले-से-काला कोयला भी डाल दें तो वह अग्निस्वरूप होकर चमकने लग जायगा, ऐसे ही भगवान‍्के अर्पण करनेसे अर्पित वस्तु (क्रिया और पदार्थ) तथा अर्पक—दोनों भगवत्स्वरूप होकर चमकने लग जायँगे।

एक अच्छे गृहस्थ सेठ थे। वे भगवान‍्के बड़े भक्त थे। उनका दर्शन करनेके लिये एक साधु उनके घर आये। साधु उनसे मिलकर बड़े प्रसन्न हुए। साधुने उनका परिचय पूछा तो सेठने बताया कि मैं भी ठाकुरजीका हूँ और यह घर भी ठाकुरजीका है। सेठ साधुको अपना सब घर दिखाने लगे। साधुने पूछा—यह मोटर किसकी है? सेठ बोला—ठाकुरजीकी! ये चीजें किसकी हैं? ठाकुरजीकी! ये किसके बच्चे खेल रहे हैं? ठाकुरजीके! यह स्त्री किसकी है? ठाकुरजीकी! ये लोग कौन हैं? ठाकुरजीके! पूरा मकान देखते-देखते ऊपर गये तो वहाँ मन्दिर था। यह मन्दिर किसका है? ठाकुरजीका! यह सामान किसका है? ठाकुरजीका! ये सोने-चाँदीके बर्तन किसके हैं? ठाकुरजीके! ये वस्त्र किसके हैं? ठाकुरजीके! ये गहने किसके हैं? ठाकुरजीके! साधुने ठाकुरजीकी तरफ संकेत करके पूछा—ये किसके हैं? सेठ बोला—ये तो मेरे हैं*! तात्पर्य है कि सब चीजें ठाकुरजीकी और ठाकुरजीके स्वरूप हैं, और ठाकुरजी हमारे हैं तो ठाकुरजीकी चीजें हमारी ही हुईं, पर ठाकुरजीके द्वारा हमारी होनेसे वे महान् शुद्ध हो गयीं,! और स्वतन्त्र हमारी होनेसे महान् अशुद्ध हो गयीं!

रतनगढ़के सन्त बखतनाथजी महाराजकी बात सुनी है। वे बड़े ऊँचे महात्मा थे। असमसे एक आदमी उनके लिये एक बढ़िया एरण्डी लाया और उनके पास रखकर बोला कि महाराज! सरदीके समय इसको आप काममें लें। कुछ देरके बाद एक पण्डितजी आये। उन्होंने वह एरण्डी अपने हाथमें लेकर देखी और उसकी प्रशंसा करते हुए कहा कि महाराज! यह कपड़ा तो बड़ा अच्छा है! देखकर उसको रख दिया। जब पण्डितजी जाने लगे, तब महात्माने कहा कि इस एरण्डीको आप ले जाओ। पण्डितजी बोले कि महाराज! यह तो आपके लिये आयी है। वह आदमी बड़े प्रेमसे आपके लिये लाया है; अत: आप रखें। महात्मा बोले कि नहीं पण्डितजी! इसको आप ले जायँ। पण्डितजी बोले कि मैं कैसे ले जाऊँ? यह तो आपकी ही है। महात्मा बोले कि यह हमारे कामकी नहीं है। आप बुरा मत मानना, आपको यह पसन्द आ गयी तो अब यह आपकी हो गयी! पण्डितजीको लेनेमें बड़ा संकोच हुआ, पर महात्माने वह एरण्डी उनको जबर्दस्ती दे ही दी। कारण यह था कि पण्डितजीका उस एरण्डीमें मन चलनेसे वह उच्छिष्ट, अशुद्ध हो गयी, महात्माके कामकी नहीं रही। इसी तरह जिस वस्तुमें हमारा मन चल जाता है, हमारा राग हो जाता है, वह वस्तु अशुद्ध हो जाती है।

अपनी मानते ही वस्तु अशुद्ध हो जाती है और भगवान‍्की मानते ही वह शुद्ध और भगवत्स्वरूप हो जाती है। इसी तरह अपने-आपको भगवान‍्से अलग मानते ही हम अशुद्ध हो जाते हैं और भगवान‍्का मानते ही शुद्ध और भगवत्स्वरूप हो जाते हैं। वास्तवमें सब वस्तुएँ भगवान‍्की और भगवत्स्वरूप ही हैं। उनको हमने भगवान‍्से अलग और अपना मान लिया, यह हमारी भूल है। इस भूलको मिटाना है। इस भूलको मिटा दें तो शुभ-अशुभ कर्मोंका बन्धन मिट जायगा और ‘वासुदेव: सर्वम्’ का अनुभव हो जायगा।

प्रश्न—हमारे किये हुए कर्मोंके फलस्वरूप जो वस्तु हमें मिलती है, वह हमारी ही तो हुई! फिर उसको हम अपना क्यों न मानें?

उत्तर—जिससे हमने कर्म किये, वह क्रियाशक्ति भी हमारी नहीं है और उसके फलस्वरूप मिलनेवाली वस्तु भी हमारी नहीं है। कारण कि क्रियाशक्ति और वस्तु—दोनों ही भगवान‍्से मिली हुई हैं और बिछुड़नेवाली हैं। शरीर कमजोर हो जाय, लकवा मार जाय तो हम क्या कर सकते हैं? कर्मफल भी अपना नहीं है; अत: उसका भोग बाँधनेवाला है—‘फले सक्तो निबध्यते’(गीता ५। १२)। कर्म, कर्म-सामग्री, करनेकी योग्यता, बल आदि कुछ भी अपना नहीं है। इतना ही नहीं, कर्म करनेका विवेक भी अपना नहीं है, प्रत्युत भगवान‍्से मिला हुआ है।

जो वस्तु सदा हमारे साथ नहीं रह सकती और जिसके साथ हम सदा नहीं रह सकते, जिसपर हमारा आधिपत्य नहीं चलता, जो मिली है तथा बिछुड़नेवाली है, वह वस्तु अपनी कैसे हो सकती है? कदापि नहीं हो सकती। जो वस्तु अपनी है ही नहीं, उसकी कामना कैसे होगी? उसके त्यागका अभिमान भी कैसे आयेगा? उसको अपना मान लिया—यह बेईमानी थी। उसका त्याग कर दिया तो केवल अपनी बेईमानीका ही त्याग किया। इसमें अभिमान किस बातका? बेईमानीके त्यागका नाम ही मुक्ति है।

जो वस्तु हमारी नहीं है, प्रत्युत दूसरेकी (भगवान् की) है और जो निरन्तर हमारा त्याग कर रही है, उसका भी त्याग अगर कठिन है तो फिर सुगम क्या है? उसको अपना मानकर अपने पास रखनेमें ही कठिनता पड़ती है, उसका त्याग करनेमें क्या कठिनता है? अगर ऐसा मानें कि त्याग करना कठिन है, तो उसको अपने पास रखना असम्भव है। असम्भवकी अपेक्षा तो कठिन भी सुगम ही है। एक जवान लड़केने मुझे बताया कि ‘हमारे मकानमें रहनेवाली एक युवा लड़की बार-बार कुचेष्टा करती थी, पर मैं कभी विचलित नहीं हुआ! मैंने कहा कि ‘तुम बड़े जितेन्द्रिय हो’ तो वह बोला कि ‘मैं बड़ा जितेन्द्रिय हूँ—यह बात नहीं है, प्रत्युत केवल इस बातसे मैं विचलित नहीं हुआ कि उस लड़कीपर मेरा हक नहीं लगता!’ अत: जिस वस्तुपर हमारा हक नहीं लगता, जो हमारी नहीं है, उसको हम अपना कैसे स्वीकार करें? उसको अपना और अपने लिये स्वीकार करना बेईमानी है। सब दु:ख, सन्ताप, नरक, जन्म-मरण आदि इस बेईमानीके ही फल हैं। इस बेईमानीके कारण ही संसार दु:खदायी होता है, जो कि वास्तवमें भगवत्स्वरूप ही है। अगर इस बेईमानीका त्याग कर दें अर्थात् एक भगवान‍्के सिवाय अन्य किसीको भी अपना न मानें तो ‘वासुदेव: सर्वम्’का अनुभव हो जायगा।