प्रार्थना
(१)
हे नाथ! अब तो आपको हमारेपर कृपा करनी ही पड़ेगी। हम भले-बुरे कैसे ही हों, आपके ही बालक हैं। आपको छोड़कर हम कहाँ जायँ? किससे बोलें? हमारी कौन सुने? संसार तो सफा जंगल है। उससे कहना अरण्यरोदन (जंगलमें रोना) है। आपके सिवाय कोई सुननेवाला नहीं है। महाराज! हम किससे कहें? हमारेपर किसको दया आती है? अच्छे-अच्छे लक्षण हों तो दूसरा भी कोई सुन ले। हमारे-जैसे दोषी, अवगुणीकी बात कौन सुने? कौन अपने पास रखे? हे गोविन्द-गोपाल! यह तो आप ही हैं, जो गायों और बैलोंको भी अपने पास रखते हैं, चारा देते हैं। हम तो बस, बैलकी तरह ही हैं! बिलकुल जंगली आदमी हैं! आप ही हमें निभाओगे। और कौन है, किसकी हिम्मत है कि हमें अपना ले? ऐसी शक्ति भी किसमें है? हम किसीको क्या निहाल करेंगे? हमें अपनाकर भी कोई क्या करेगा? हमें रोटी दे, कपड़ा दे, मकान दे, खर्चा करे, और हमारेसे क्या मतलब सिद्ध होगा? ऐसे निकम्मे आदमीको कौन सँभाले? कोई गुण-लक्षण हों तो सँभाले। यह तो आप दया करते हैं, तभी काम चलता है, नहीं तो कौन परवाह करता है?
हे प्रभो! थोड़ी-सी योग्यता आते ही हमें अभिमान हो जाता है! योग्यता तो थोड़ी होती है, पर मान लेते हैं कि हम तो बहुत बड़े हो गये, बड़े योग्य बन गये, बड़े भक्त बन गये, बड़े वक्ता बन गये, बड़े चतुर बन गये, बड़े होशियार बन गये, बड़े विद्वान् बन गये, बड़े त्यागी, विरक्त बन गये! भीतरमें यह अभिमान भरा है नाथ! आपकी ऐसी बात सुनी है कि आप अभिमानसे द्वेष करते हो और दैन्यसे प्रेम करते हो*।
अगर आपको अभिमान सुहाता नहीं है तो फिर उसको मिटा दो, दूर कर दो। बालक कीचड़से सना हुआ हो और गोदीमें जाना चाहता हो तो माँ ही उसको धोयेगी, और कौन धोयेगा? क्या बालक खुद स्नान करके आयेगा, तब माँ उसको गोदीमें लेगी? आपको हमारी अशुद्धि नहीं सुहाती तो फिर कौन साफ करेगा? आपको ही साफ करना पड़ेगा महाराज!
हे नाथ! हमारे सब कुछ आप ही हो। आपके सिवाय और कौन है, जो हमारे-जैसेको गले लगाये? इसलिये हे प्रभो! अपना जानकर हमारेपर कृपा करो। एक मारवाड़ी कहावत है—‘गैलो गूँगो बाव़ल़ो, तो भी चाकर राव़ल़ो।’ हम कैसे ही हैं, आपके ही हैं। आप अपनी दयासे ही हमें सँभालो, हमारे लक्षणोंसे नहीं। जिन भरतजीकी रामजीसे भी ज्यादा महिमा कही गयी है, वे भी कहते हैं—
जौं करनी समुझै प्रभु मोरी।
नहिं निस्तार कलप सत कोरी॥
जन अवगुन प्रभु मान न काऊ।
दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ॥
(मानस, उत्तर० १। ३)
आपके ऐसे मृदुल स्वभावको सुनकर ही आपके सामने आनेकी हिम्मत होती है। अगर अपनी तरफ देखें तो आपके सामने आनेकी हिम्मत ही नहीं होती। आपने वृत्रासुर, प्रह्लाद, विभीषण, सुग्रीव, हनुमान्, गजेन्द्र, जटायु, तुलाधार वैश्य, धर्मव्याध, कुब्जा, व्रजकी गोपियाँ आदिका भी उद्धार कर दिया, यह देखकर हमारी हिम्मत होती है कि आप हमारा भी उद्धार करेंगे*।
जैसे अत्यन्त लोभी आदमी कूड़े-कचरेमें पड़े पैसेको भी उठा लेता है, ऐसे ही आप भी कूड़े-कचरेमें पड़े हम-जैसोंको उठा लेते हो। थोड़ी बातसे ही आप रीझ जाते हो—‘तुम्ह रीझहु सनेह सुठि थोरें’ (मानस, बाल० ३४२। २)। कारण कि आपका स्वभाव है—
रहति न प्रभु चित चूक किए की।
करत सुरति सय बार हिए की॥
(मानस, बाल० २९। ३)
अगर आपका ऐसा स्वभाव न हो तो हम आपके नजदीक भी न आ सकें; नजदीक आनेकी हिम्मत भी न हो सके! आप हमारे अवगुणोंकी तरफ देखते ही नहीं। थोड़ा भी गुण हो तो आप उस तरफ देखते हो। वह थोड़ा भी आपकी दृष्टिसे है। हे नाथ! हम विचार करें तो हमारेमें राग-द्वेष, काम-क्रोध, लोभ-मोह, अभिमान आदि कितने ही दोष भरे पड़े हैं! हमारेसे आप ज्यादा जानते हो, पर जानते हुए भी आप उनको मानते नहीं—‘जन अवगुन प्रभु मान न काऊ’, इसीसे हमारा काम चलता है प्रभो! कहीं आप देखने लग जाओ कि यह कैसा है, तो महाराज! पोल-ही-पोल निकलेगी!
हे नाथ! बिना आपके कौन सुननेवाला है? कोई जाननेवाला भी नहीं है! हनुमान्जी विभीषणसे कहते हैं कि मैं तो चंचल वानरकुलमें पैदा हुआ हूँ। प्रात:काल जो हमलोगोंका नाम भी ले ले तो उस दिन उसको भोजन न मिले! ऐसा अधम होनेपर भी भगवान्ने मेरेपर कृपा की*, फिर तुम तो पवित्र ब्राह्मणकुलमें पैदा हुए हो!
कानोंसे ऐसी महिमा सुनकर ही विभीषण आपकी शरणमें आये और बोले—
श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर॥
(मानस, सुन्दर० ४५)
जो आपकी शरणमें आ जाता है, उसकी आप रक्षा करते हो, उसको सुख देते हो, यह आपका स्वभाव है—
हरेक दरबारमें दीनका आदर नहीं होता। जबतक हमारे पास कुछ धन-सम्पत्ति है, कुछ गुण है, कुछ योग्यता है, तभीतक दुनिया हमारा आदर करती है। दुनिया तो हमारे गुणोंका आदर करती है, हमारा खुदका (स्वरूपका) नहीं। परन्तु आप हमारा खुदका आदर करते हो, हमें अपना अंश मानते हो—‘ममैवांशो जीवलोके’(गीता १५। ७),‘सब मम प्रिय सब मम उपजाए’ (मानस, उत्तर० ८६। २)। हमें अपना अंश मानते ही नहीं, स्पष्टतया जानते हो और अपना जानकर कृपा करते हो। हमारे अवगुणोंकी तरफ आप देखते ही नहीं। बच्चा कैसा ही हो, कुछ भी करे, पर ‘अपना है’—यह जानकर माँ कृपा करती है, नहीं तो मुफ्तमें कौन आफत मोल ले महाराज?
हे नाथ! जो कुछ भी हमें मिलता है, आपकी कृपासे ही मिलता है। परन्तु उसको हम अपना मान लेते हैं कि यह तो हमारा ही है। यह आपकी खास उदारता और हमारी खास भूल है! महाराज! आपकी देनेकी रीति बड़ी विलक्षण है! सब कुछ देकर भी आपको याद नहीं रहता कि मैंने कितना दिया है? आपके अन्त:करणमें हमारे अवगुणोंकी छाप ही नहीं पड़ती। आपका अन्त:करणरूपी कैमरा कैसा है, इसको आप ही जानते हो! उसमें अवगुण तो छपते ही नहीं, गुण-ही-गुण छपते हैं। ऐसा आपका स्वभाव है! सिवाय आपमें अपनेपनके और हमारे पास क्या है महाराज! आप हमें अपना जानते हैं, मानते हैं, स्वीकार करते हैं, तभी काम चलता है नाथ! नहीं तो बड़ी मुश्किल हो जाती! हम जी भी नहीं सकते थे! केवल आपकी कृपाका ही आसरा है, तभी जीते हैं—
आप कृपा को आसरो, आप कृपा को जोर।
आप बिना दीखे नहीं, तीन लोक में और॥
कृपा करके भी आपकी कृपा कभी तृप्त नहीं होती—‘जासु कृपा नहिं कृपाँ अघाती’(मानस, बाल० २८। २)! ऐसी कृपाके कारण ही आप कृपा कर रहे हो! आप हमारे भीतरकी सब बातें पूर्णतया जानते हो, पर जानते हुए भी उधर दृष्टि नहीं डालते और ऐसा बर्ताव करते हो कि मानो आपको पता ही नहीं, आप जानते ही नहीं! आपकी कृपा ही आपको मोहित कर देती है। आप अपने ही गुणोंसे मोहित हो जाते हो। आप अपना किया हुआ उपकार ही भूल जाते हो। अपनी दी हुई वस्तुको भी भूल जाते हो। देते तो आप हो, पर हम मान लेते हैं कि यह तो हमारी ही है! ऐसे कृतघ्न, गुणचोर हैं हम तो महाराज! पूत कपूत हो चाहे सपूत हो, पूत तो है ही। पूत कभी अपूत नहीं हो सकता। आपने गीतामें कहा है कि जीव सदासे मेरा ही अंश है—‘ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:’। अत: अपना पूत जानकर कृपा करो।
हे प्रभो! हम आपके क्या काम आ सकते हैं? क्या आपका कोई काम अड़ा हुआ है, जो हमारेसे निकलता हो? क्या हमारी योग्यता आपके कोई काम आ सकती है? यह तो केवल हमारा अभिमान बढ़ानेमें काम आती है। आपकी दी हुई चीजको हम अपनी मान लेते हैं और अपनी मान करके अभिमान कर लेते हैं—ऐसे कृतघ्न हैं हम! फिर भी आप आँखें मीच लेते हो। आप उधर खयाल ही नहीं करते। आपके ऐसे स्वभावसे ही तो हम जी रहे हैं!
हे नाथ! हम आपसे क्या कहें? हमारे पास कहनेलायक कोई शब्द नहीं है, कोई योग्यता नहीं है। आप जंगलमें रहनेवाले किरातोंके वचन भी ऐसे सुनते हो, जैसे पिता अपने बालककी तोतली वाणी सुनता है—
बेद बचन मुनि मन अगम ते प्रभु करुना ऐन।
बचन किरातन्ह के सुनत जिमि पितु बालक बैन॥
(मानस, अयोध्या० १३६)
इसी तरह हे नाथ! हमें कुछ कहना आता नहीं। हम तो बस, इतना ही जानते हैं कि जिसका कोई नहीं होता, उसके आप होते हो—
बोल न जाणूं कोय अल्प बुद्धि मन वेग तें।
नहिं जाके हरि होय या तो मैं जाणूं सदा॥
(करुणासागर ७४)
(२)
हे नाथ! हमें आपके चरित्र अच्छे लगें, आपकी लीला अच्छी लगे, आपका रूप अच्छा लगे, आपका धाम अच्छा लगे, आपके गुण अच्छे लगें, आपकी महिमा अच्छी लगे, तो यह आपकी कृपा ही है, हमारा कोई बल नहीं है। आज जो हम आपका नाम ले रहे हैं, आपकी चर्चा सुन रहे हैं, आपमें लगे हुए हैं, यह केवल आपकी ही कृपा है। यह न तो हमारा उद्योग है और न हमारे कर्मोंका फल ही है। किसीकी ऐसी योग्यता, सामर्थ्य नहीं है कि आपकी कृपाके बिना आपकी तरफ आ सके। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर—जैसे कितने-कितने अवगुण भरे हुए हैं और कैसा वायुमण्डल है! कैसा कलियुगका समय है! ऐसे समयमें आपकी तरफ वृत्ति होती है तो यह केवल आपकी कृपा है। आपकी कृपाके बिना जीव अपने बलसे आपकी तरफ आ सकता ही नहीं! सन्तोंका संग भी आप ही देते हो। प्रेरणा भी आपकी होती है। आप ही ऐसा वायुमण्डल बना देते हो, जिससे आपकी तरफ आनेके लिये हम बाध्य, विवश हो जाते है! मानमें, बड़ाईमें, आदरमें, प्रशंसामें, रुपयोंमें, भोगोंमें, संग्रहमें, सुखमें, आराममें हमारा मन स्वत: जाता है—यह तो है हमारी दशा! और इसपर भी जो सत्संग मिलता है, आपकी चर्चा मिलती है, आपकी कथा मिलती है तो यह आपकी ही कृपा है महाराज! संसारका चिन्तन तो अपने-आप होता है; क्योंकि ऐसा स्वभाव पड़ा हुआ है, पर आपकी चर्चा, आपका चिन्तन आपकी कृपासे ही होता है। आपने ही सद्बुद्धि दी है। हमारी दशा तो बेदशा है, पर आप हमारी दशाकी तरफ देखते ही नहीं हो, हमारे अवगुणोंकी तरफ देखते ही नहीं हो। आपका ऐसा स्वभाव ही है*।
आपकी अपनी कृपासे ही आप मोहित हो जाते हो! अपनी ही कृपाके वशीभूत होकर आप हम-जैसोंको भी अपनी तरफ खींचते हो! उस कृपासे ही हम आपकी ओर आते हैं, अपनी शक्तिसे, भक्तिसे नहीं!
हे नाथ! भक्ति भी आप देते हो, तब होती है। अपनी जबर्दस्तीसे भक्ति लेनेकी ताकत किसीमें नहीं है। इतना ही नहीं, संसारके पदार्थ लेनेकी और भोगनेकी इच्छा होनेपर भी हम ले नहीं सकते, भोग नहीं सकते। जब नाशवान् संसारमें भी हमारा वश नहीं चलता, तो फिर आपकी अविनाशी भक्ति, अविनाशी गुण हमारे बलसे कैसे मिल सकते हैं? हम जिस धन, मान, बड़ाई, आराम आदिके लिये उद्योग करते हैं और झूठ, कपट, बेईमानी आदिको दोष जानते हुए भी स्वीकार करते हैं, उस धन आदिको भी प्राप्त नहीं कर सकते! फिर हम आपकी तरफ चलें—यह क्या हमारी शक्ति है? हम विनाशीको भी नहीं पकड़ सकते, फिर अविनाशीको कैसे पकड़ सकते हैं? उसको पकड़ सकते ही नहीं। हमारी क्या ताकत है प्रभो! यह तो आपने ही कृपा की है, जिससे हम आपकी चर्चा सुनते हैं, आपके चरित्र सुनते हैं, आपके गुणोंका वर्णन सुनते हैं, आपका नाम सुनते हैं, आपके विग्रहका दर्शन करते हैं। आप ही कृपा करके ऐसा संयोग बैठाते हो। आप ही ऐसी परिस्थिति पैदा कर देते हो, जिससे हम और कहीं जा नहीं सकते! यह सब आप ही करते हो और आपको करना ही पड़ेगा; क्योंकि हम आपके हैं। अच्छे हैं तो आपके हैं, बुरे हैं तो आपके हैं—‘जो हम भले बुरे तौ तेरे’! हम आपके पाले पड़ गये! आप भी क्या कर सकते हो? आपमें खींचनेकी ताकत तो है, पर दूर करनेकी ताकत है ही नहीं! आपका स्वभाव ही ऐसा है!
हे नाथ! आप कितनी-कितनी विलक्षण कृपा करते हो कि हम पहचान ही नहीं सकते। आपका दिया हुआ ही आपको मोहित कर रहा है! आपके दिये हुए गुणोंसे ही आप मोहित हो जाते हो! हमारे अवगुणोंकी तरफ, हमारी स्थितिकी तरफ, हमारे विकारोंकी तरफ, हमारे विचारोंकी तरफ आपकी दृष्टि जाती ही नहीं। यह आपका स्वभाव है, हमारा गुण नहीं, इस स्वभावके परवश होकर ही आप हमारेको अपनी तरफ खींचते हो। हम आपकी इस कृपाको कंचित् भी कह नहीं सकते, जान नहीं सकते, पहचान नहीं सकते! हमारी क्या ताकत है? हमारा तो कहना ही क्या है, जो मुक्त हो गये हैं, उन तत्त्वज्ञ महापुरुषोंको भी आप अपनी तरफ खींचते रहते हो*, उनको भी निजानन्दमें टिकने नहीं देते हो!
उनको अपना परमप्रेम प्रदान करनेके लिये आप लालायित हो जाते हो और इसके लिये उनके जीवन्मुक्तिके आनन्दको भी फीका, किरकिरा कर देते हो। जब जीवन्मुक्त महापुरुषोंकी भी ऐसी बात है, फिर हम अपनी कहाँतक कहें? हमारी बुद्धि, विचारशक्ति वहाँतक पहुँचती ही नहीं!
हे प्रभो! हम सांसारिक मायामोहमें फँसे हुए हैं। उसमें ही बने रहना चाहते हैं। उसमें ही सुख मानते हैं, आराम मानते हैं। हम उसमें ही अपना हित मानते हैं, जो कि हमारे अहितका खास कारण है। बुराईको हम भलाईसे भी विशेष आदर देते हैं। हम जानकर उद्योगपूर्वक छिप-छिपकर पाप करते हैं। पाप, अन्यायजनित सुख मिलनेमें अपना सौभाग्य, लाभ, बुद्धिमत्ता, चतुराई मानते हैं। पापजन्य रुपये-पैसे, सुख-आराम मिलनेपर खुशी मनाते हैं कि हम निहाल हो गये! मौज हो गयी! इनके दोषोंकी तरफ हमारी दोषदृष्टि जाती ही नहीं, जिससे हम फँस जाते हैं, चौरासी लाख योनियोंमें जाते हैं, नरकोंमें जाते हैं, दु:ख भोगते हैं, कराहते हैं, चिल्लाते हैं, पुकारते हैं। फिर भी उधर ही जानेका मन करता है! क्या करें नाथ! आप ही हमें अपनी तरफ खींच लें।
हे नाथ! आपकी कृपाकी तरफ हमारी दृष्टि जाती है तो वह भी आपकी कृपासे ही जाती है। पर हम इसको भी नहीं पहचानते! आसक्ति, कामना, मोह, मूढ़ता, घमण्ड, ईर्ष्या आदि बड़े-बड़े दोषोंके जालमें हम फँसे हुए हैं, जो कि पतन करनेवाली, दु:ख देनेवाली आसुरी-सम्पत्ति है। हमारी तो यह दशा है! परन्तु आप हमारे स्वभाव, कृति आदिको न देखकर हमें अपनी तरफ खींचते हो, यह आपकी कृपा है, आपका स्वभाव है। हम तो इसको भी नहीं पहचानते। हाँ, कभी-कभी मनमें लहर आ जाती है, आपकी कृपाकी तरफ हमारी दृष्टि चली जाती है तो यह भी आपकी कृपासे होता है। आप कृपादृष्टिसे थोड़ा-सा देखते हो, उसीसे यह बात पैदा होती है। नहीं तो हमारेमें वैसी कोई योग्यता नहीं, कोई सामर्थ्य नहीं, इस तरफ हमारी कोई रुचि नहींं। हमारी रुचि तो संसारके भोगोंकी है। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि—सब प्रकृतिके हैं, पर इनके वशमें होकर हम विषयोंका सेवन करते हैं, इनकी हाँ-में-हाँ मिलाते हैं। हमारी दशा तो यह है! आप ही कृपा करते हो तो हमारी दृष्टि आपकी कृपाकी तरफ जाती है। ऐसे युगमें, ऐसे वायुमण्डलमें, ऐसे समुदायमें, ऐसी प्रवृत्तिमें हम रहते हैं, फिर भी आपकी तरफ खिंचाव होता है तो यह केवल आपकी कृपासे ही होता है। आपकी तरफ हमारी जो रुचि होती है, वह भी आपकी दी हुई है प्रभो! हमारे पास क्या है? केवल आपकी कृपा है। उस कृपाके ही भरोसे हम आपकी तरफ चलते हैं। हमारेमें कोई योग्यता नहीं, कोई सामर्थ्य नहीं, कोई विवेक-विचार नहीं! आपके ही दिये हुए विवेकको हम अपना मान लेते हैं और अभिमान कर लेते हैं कि हम ऐसे समझदार हैं! हमारी बेसमझीकी, मूर्खताकी हद हो गयी महाराज! परन्तु आपका इस तरफ खयाल ही नहीं है—‘जन अवगुन प्रभु मान न काऊ’!
दूसरे आदमी तो बेचारे भ्रममें रह जायँ; क्योंकि वे हमारेको जानते नहीं हैं। परन्तु आप तो हमारे रग-रगकी बात जानते हो। आप हमारे मनकी स्फुरणाको भी जानते हो, पहले किये हुए हमारे कर्मोंको भी जानते हो, हमारी वर्तमान दशाको भी जानते हो, हमारे बुरे स्वभावको, पुरानी आदतको भी जानते हो; परन्तु आप उस तरफ देखते ही नहीं! उलटे आप हमें अपनी तरफ खींचते हो; क्योंकि यह आपका स्वभाव है। इस स्वभावसे ही आप जीवको अपनी विशेष कृपासे चौरासी लाख योनियाँ, नरक, दु:ख, हानि, रोग, शोक, भय, उद्वेग, सन्ताप आदि देते हो, जिससे इसको चेत हो जाय। जैसे सोते हुए आदमीको उठाना हो तो सूई चुभानेसे उसको चेत हो जाता है, ऐसे ही हमें चेतानेके लिये, अपनी ओर खींचनेके लिये आप प्रतिकूल परिस्थिति भेजते हो। आप किसी भी अवस्था, परिस्थितिमें हमें टिकने नहीं देते—यह आपका निरन्तर आह्वान है, अपनी तरफ बुलाना है। आपने अपनी कृपासे संसारकी रचना ही ऐसी की है कि कोई भी अवस्था, परिस्थिति आदि निरन्तर हमारे साथ नहीं रहती। संसारका निरन्तर हमारेसे वियोग होता रहता है।
हे प्रभो! आप हमें चेत करानेमें कमी नहीं करते, हमें बार-बार चेताते हो, फिर भी हम चेत नहीं करते, उलटे अपने बल और बुद्धिमानीसे पुन: उन्हीं दोषोंकी तरफ जाते हैं! उन दोषोंके फलस्वरूप मिली प्रतिकूल परिस्थितिसे बचनेके लिये हम पुन: वही दोष करते हैं—यह तो हमारी दशा है! फिर भी हमें चेत करानेमें आप उकताते नहीं—यह आपकी कृपा है! हमारी तो कभी कोई इच्छा हो जाती है, कभी कोई चाहना हो जाती है, कभी कोई मार्ग पकड़ लेते हैं, कभी किसीका संग कर लेते हैं, कभी किसीकी बात ठीक मान लेते हैं—ऐसे हम भ्रममें पड़ जाते हैं, फिर भी आप हमें निकाल लेते हो। आपकी कृपा बड़ी विलक्षण है!
हे नाथ! आपके भीतर जीवोंका कल्याण करनेकी जो चाह है, उसको हम समझ ही नहीं पाते। माँकी कृपाको बालक क्या समझे? बालक तो बेसमझ होता है। माँ तो उसको नहलाकर साफ करती है, पर वह रोता है। यही दशा हमारी है महाराज! इसलिये हे नाथ! कृपा करो। कृपा कर ही रहे हो। क्या हमारे कहनेसे कृपा करोगे? आपका तो स्वभाव ही कृपा करनेका है। फिर भी हम आपसे बार-बार कहते हैं कि कृपा करो, तो इस बातको भी आप सह लेते हो! यह आपकी कितनी सहिष्णुता है, धैर्य है! आप अपनी तरफसे स्वत:-स्वाभाविक कृपा करते हो और उसीसे जीवोंका उद्धार होता है। जीवोंको कुछ चेत होता है, होश आता है तो आपकी कृपासे ही आता है। वे निषिद्ध आचरण करते हैं तो आप ही उनको नरकोंमें भेजकर शुद्ध करते हो। आपने गीतामें कहा है—
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि।
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्॥
(गीता १६। २०)
‘हे कुन्तीनन्दन! वे मूढ़ मनुष्य मेरेको प्राप्त न करके ही जन्म-जन्मान्तरमें आसुरी योनिको प्राप्त होते हैं, फिर उससे भी अधिक अधम गतिमें अर्थात् भयंकर नरकोंमें चले जाते हैं।’
आपने कितनी विलक्षण बात कही है कि मूढ़ मनुष्य मेरेको प्राप्त न करके आसुरी योनियोंमें चले जाते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि आप सब मनुष्योंको अपनी प्राप्ति कराना चाहते हो! इसीलिये आप उनको ऐसा विवेक, अवसर, संग देते हो, जिससे वे आपकी प्राप्ति कर सकें। परन्तु हम आपके दिये हुए विवेकका दुरुपयोग करके पतनकी तरफ जा रहे हैं और उसमें अपनी बुद्धिमानी मान रहे हैं! हे नाथ! पतितोंका उद्धार करना आपका सहज स्वभाव है। आपके इस स्वभावको देखकर हमारे मनमें विशेष उत्साह होता है कि हम पतित हैं और आप पतितपावन हैं, फिर हमारा उद्धार होनेमें क्या सन्देह है?
मैं हरि पतित-पावन सुने।
मैं पतित तुम पतित-पावन दोउ बानक बने॥
(विनयपत्रिका १६०)