सब जग ईश्वररूप है (वासुदेव: सर्वम्)
गीताका सर्वोपरि सिद्धान्त है—‘वासुदेव: सर्वम्’ अर्थात् सब कुछ भगवान् ही हैं। संसारके विषयमें दार्शनिकोंके अनेक मतभेद हैं। कोई अजातवाद मानता है, कोई दृष्टिसृष्टिवाद मानता है, कोई विवर्तवाद मानता है, कोई परिणामवाद मानता है, कोई आरम्भवाद मानता है, पर गीता कोई वाद न मानकर ‘वासुदेव: सर्वम्’को ही मुख्य मानती है। ‘वासुदेव: सर्वम्’में सभी वाद, मत समाप्त हो जाते हैं। कारण कि जबतक अहम्की सूक्ष्म गंध रहती है, तभीतक दार्शनिकोंमें और दर्शनोंमें मतभेद रहता है, जबकि ‘वासुदेव: सर्वम्’में अहम्की सूक्ष्म गंध भी नहीं रहती। इसलिये महात्मा तो सभी दार्शनिक हो सकते हैं, पर ‘वासुदेव: सर्वम्’का अनुभव करनेवाला महात्मा अत्यन्त दुर्लभ होता है। भगवान् कहते हैं—
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ:॥
(गीता ७। ११)
‘बहुत जन्मोंके अन्तमें अर्थात् मनुष्यजन्ममें ‘सब कुछ वासुदेव ही है’—ऐसा जो ज्ञानवान् मेरे शरण होता है, वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।’
कर्मयोगी, ज्ञानयोगी, ध्यानयोगी, लययोगी, हठयोगी, राजयोगी, मन्त्रयोगी, अनासक्तयोगी आदि कई तरहके योगी हैं, जो अपने योगमें सिद्ध हो गये हैं, मुक्त हो गये हैं, पर उनको भगवान्ने दुर्लभ नहीं बताया है, प्रत्युत ‘सब कुछ वासुदेव ही हैं’—इसका अनुभव करनेवाले महात्माको ही दुर्लभ बताया है। परन्तु अपने लिये भगवान् कहते हैं—
अनन्यचेता: सततं यो मां स्मरति नित्यश:।
तस्याहं सुलभ: पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिन:॥
(गीता ८। १४)
‘हे पार्थ! अनन्य चित्तवाला जो मनुष्य मेरा नित्य-निरन्तर स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगीके लिये मैं सुलभ हूँ।
तात्पर्य है कि भगवान् ‘वासुदेव: सर्वम्’का अनुभव करनेवाले महात्माको तो दुर्लभ बताते हैं, पर अपनेको सुलभ बताते हैं। इसलिये एक सन्तने कहा है—
हरि दुरलभ नहिं जगत में,
हरिजन दुरलभ होय।
हरि हेरॺाँ सब जग मिलै,
हरिजन कहिं एक होय॥
संसारमें भगवान् दुर्लभ नहीं हैं, प्रत्युत महात्मा दुर्लभ है। ऐसा कोई देश, काल, वस्तु, क्रिया, व्यक्ति, अस्था, परिस्थिति घटना नहीं है, जिसमें भगवान् परिपूर्ण न हों। भगवान् तो सब जगह हैं, पर भगवान्का प्यारा भक्त सब जगह नहीं होता। इसलिये कहा है—
हरि से तू जनि हेत कर, कर हरिजन से हेत।
हरि रीझै जग देत हैं, हरिजन हरि ही देत॥
भगवान् प्रसन्न होते हैं तो जीवको मानवशरीर देते हैं। उस मानवशरीरसे वह नरक, स्वर्ग और मोक्षको भी प्राप्त कर सकता है; ज्ञान, वैराग्य और भक्तिको भी प्राप्त कर सकता है*; और चौरासी लाख योनियोंको भी प्राप्त कर सकता है।
परन्तु भगवान्के भक्त नरक, स्वर्ग आदि नहीं देते, प्रत्युत भगवान्को ही देते हैं! ऐसे भक्तका स्वरूप गीता बताती है कि वह ‘वासुदेव: सर्वम्’—इस ज्ञानवाला होता है।
जैसे, आमका बगीचा होता है। उसमें बिना ऋतुके आमका एक फल भी नहीं होता, तो भी वह बगीचा आमका ही कहलाता है। अमरूदके बगीचेमें एक भी अमरूद देखनेमें नहीं आता, तो भी वह बगीचा अमरूदका ही कहलाता है। गेहूँकी खेतीमें एक दाना भी गेहूँका नहीं मिलता, तो भी वह खेती गेहूँकी ही कहलाती है। कारण यह है कि पहले आमके बीज बोये गये, फिर उनसे वृक्ष हुए और अन्तमें उनमें आमके फल (बीज) आयेंगे, इसलिये बीचमें भी वह आम कहलाता है। आरम्भमें अमरूदके बीज बोये गये और अन्तमें भी वृक्षोंपर अमरूदके फल (बीज) आयेंगे, इसलिये बीचमें भी वह अमरूद कहलाता है। पहले गेहूँ बोया गया, अन्तमें गेहूँ ही आयेंगे, इसलिये बीचमें भी वह खेती गेहूँकी ही कहलाती है। भगवान्ने गीतामें अपनेको संसारका सनातन और अव्यय बीज बताया है—
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्।
(७। १०)
प्रभव: प्रलय: स्थानं निधानं बीजमव्ययम्॥
(९। १८)
भगवान् कहते हैं—
सर्वयोनिषु कौन्तेये मूर्तय: सम्भवन्ति या:।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रद: पिता॥
(गीता १४। ४)
‘हे कौन्तेय! सम्पूर्ण योनियोंमें प्राणियोंके जितने शरीर पैदा होते हैं, उन सब (व्यष्टि शरीरोंकी) मूल प्रकृति तो माता है और मैं बीज-स्थापन करनेवाला पिता हूँ।’
सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्तिके चार खानि अर्थात् स्थान हैं—(१) जरायुज—जेरके साथ पैदा होनेवाले मनुष्य, गाय, भैंस, भेड़, बकरी, कुत्ता आदि, (२) अण्डज—अण्डेसे पैदा होनेवाले पक्षी, साँप, गिलहरी, छिपकली आदि, (३) उद्भिज्ज—पृथ्वीका भेदन करके ऊपरकी तरफ निकलनेवाले वृक्ष, लता, दूब, घास, अनाज आदि, और (४) स्वेदज—पसीनेसे पैदा होनेवाले जूँ, लीख आदि। इन चार स्थानोंसे चौरासी लाख योनियाँ पैदा होती हैं। इन योनियोंमें दो तरहके जीव होते हैं—स्थावर और जंगम। वृक्ष, लता, दूब, घास आदि एक ही जगह रहनेवाले जीव ‘स्थावर’ हैं और मनुष्य, पशु, पक्षी आदि चलने-फिरनेवाले जीव ‘जंगम’ हैं। इन जीवोंमें भी कोई जलमें रहनेवाले हैं, कोई आकाशमें रहनेवाले हैं और कोई भूमिपर रहनेवाले हैं—
जलचर थलचर नभचर नाना।
जे जड़ चेतन जीव जहाना॥
(मानस, बाल० ३। २)
इन चौरासी लाख योनियोंके सिवाय देवता, पितर, गन्धर्व, भूत, प्रेत, पिशाच, ब्रह्मराक्षस, बालग्रह आदि भी कई योनियाँ हैं। इन सम्पूर्ण योनियोंके बीज भगवान् हैं—
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन।
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्॥
(गीता १०। ३९)
‘हे अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणियोंका जो बीज है, वह बीज मैं ही हूँ। कारण कि मेरे बिना कोई भी चर-अचर प्राणी नहीं है अर्थात् चर-अचर सब कुछ मैं ही हूँ।’
एतन्नानावताराणां निधानं बीजमव्ययम्।
यस्यांशांशेन सृज्यन्ते देवतिर्यड्.नरादय:॥
(श्रीमद्भा० १। ३। ५)
‘यही भगवान् नारायण अनेक अवतारोंके अव्यय बीज हैं। इनके छोटे-से-छोटे अंशसे देवता, पशु-पक्षी और मनुष्यादि योनियोंकी सृष्टि होती है।’
अनन्त ब्रह्माण्डोंमें अनन्त जीव हैं, पर सभीका एक ही बीज है! तात्पर्य यह हुआ कि देखने, सुनने, चिन्तन करने आदिमें जो आता है, वह सब भगवान् ही हैं—‘वासुदेव: सर्वम्’। संसारके आदिमें भी भगवान् थे और अन्तमें भी भगवान् रहेंगे, फिर बीचमें दूसरी चीज आ ही कैसे सकती है? भगवान् कहते हैं—
अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सदसत्परम्।
पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम्॥
(श्रीमद्भा० २। ९। ३२)
‘सृष्टिके पूर्व भी मैं ही था, मुझसे भिन्न कुछ भी नहीं था और सृष्टिके उत्पन्न होनेके बाद जो कुछ भी यह दृश्यवर्ग है, वह मैं ही हूँ। जो सत्, असत्, और उससे परे है, वह सब मैं ही हूँ तथा सृष्टिके बाद भी मैं ही हूँ एवं इन सबका नाश हो जानेपर जो कुछ बाकी रहता है, वह भी मैं ही हूँ।’
अत: भगवान् ही संसाररूपसे दीखते हैं। जैसे गेहूँकी खेती बीचमें घासरूपसे दीखती है। यदि किसी अनजान आदमीको वह खेती दिखायी जाय और कहा जाय कि यह गेहूँ है तो वह कहेगा कि ‘तुम ठगाई करते हो, मैंने गेहूँके सैकड़ों बोरे खरीदे और बेचे हैं। यह गेहूँ कैसे हो सकता है? यह तो घास है।’ परन्तु जानकार आदमीको वह घास न दीखकर गेहूँ ही दीखता है। ऐसे ही अनजान आदमी कहते हैं कि ‘ये तो मनुष्य, पशु, पक्षी, वृक्ष, लता, पहाड़ आदि हैं, ये भगवान् कैसे हो सकते हैं? यह तो संसार है, भगवान् है ही कहाँ! किसीने देखा हो तो बताओ, कहाँ है ईश्वर?’ परन्तु जानकार आदमीको वह संसार न दीखकर भगवान् ही दीखते हैं। उसकी दृष्टिमें सब भगवान्-ही-भगवान् हैं—‘वासुदेव: सर्वम्’।
आमके बगीचेमें आमकी गुठली ही वृक्ष बनती है और अन्तमें आमका फल शेष रहता है। फल तो खानेके काम आ जाता है; और अन्तमें आमकी गुठली ही शेष रहती है। बीचमें वृक्ष दीखता है तो यह गुठलीकी विकृति है। यदि विकृतिको देखें तो वृक्ष है और मूलको देखें तो गुठली है। ऐसे ही विकृतिको देखें तो संसार है* और मूलको देखें तो भगवान् हैं।
विकृतिको देखना गलती है; क्योंकि अन्तमें विकृति तो रहेगी नहीं, मूल ही रहेगा। अत: विकृतिको न देखकर मूलको देखना परमात्मदृष्टि है। परमात्मदृष्टिसे परमात्मा-ही-परमात्मा दीखते हैं—‘वासुदेव: सर्वम्’।
एक ही जल बर्फ, कोहरा, बादल, ओला, वर्षा, नदी, तालाब, समुद्र आदि अनेक रूपोंमें हो जाता है। कड़ाहीमें बर्फ डालकर उसको अग्निपर रखा जाय तो बर्फ पिघलकर पानी हो जायगी। फिर पानी भी भाप हो जायगा और भाप परमाणु होकर निराकार हो जायगा। जल ही कोहरारूपसे होता है, वही बादलरूपसे होता है, वही ओलारूपसे होता है, वही बर्षारूप होकर पृथ्वीपर बरसता है, वही नदीरूपसे होता है, वही समुद्ररूपसे होता है। अनेक रूपसे होनेपर भी तत्त्वसे जल एक ही रहता है। ऐसे ही भगवान् अनेक रूपसे बन जाते हैं। जैसे जल ठण्डकसे जमकर बर्फ हो जाता है और गरमीसे पिघलकर और भाप बनकर परमाणुरूप हो जाता है, ऐसे ही अज्ञानरूपी ठण्डक (जाडे़ ) से भगवान् स्थूल संसाररूपसे हो जाते हैं और ज्ञानरूपी अग्निसे सूक्ष्म होकर ‘वासुदेव: सर्वम्’ रूपसे हो जाते हैं। जल चाहे बर्फरूपसे दीखे या भाप, बादल आदि रूपोंसे दीखे, है वह जल ही। जलके सिवाय कुछ नहीं है। ऐसे ही भगवान् चाहे संसाररूपसे दीखें या अन्य रूपोंसे दीखें, हैं वे भगवान् ही। हमारे और सूर्यके बीचमें कुछ नहीं दीखता, पर वहाँ भी परमाणुरूपसे जल भरा है। जल चाहे बर्फ-रूपमें होनेसे दीखे अथवा परमाणु-रूपमें होनेसे न दीखे, तो भी होता वह जल ही है। इसी तरह जो दीखता है, वे भी भगवान् हैं और जो नहीं दीखता, वे भी भगवान् हैं—‘त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्’ (गीता ११। ३७)। सब जगह भगवान्-ही-भगवान् हैं—‘वासुदेव: सर्वम्’।
जैसे, हमें हरिद्वार याद आता है तो मनमें हरिकी पैड़ी दीखती है, उसमें लोग स्नान करते हुए दीखते हैं, गंगाजी बहती हुई दीखती हैं, गंगाजीमें मछलियाँ दीखती हैं, आदि-आदि। यह सब-का-सब मन ही बना हुआ है। मनसे हरिद्वारका चिन्तन छूटते ही कुछ नहीं रहता, केवल मन रहता है। ऐसे ही भगवान्ने संकल्प किया—‘बहु स्यां प्रजायेय’ तो भगवान् ही संसाररूपसे प्रकट हो गये और संकल्प छोड़नेपर संसार नहीं रहेगा, केवल भगवान् ही रहेंगे। अत: एक ही भगवान् अनेक रूपोंमें बने हुए हैं—‘वासुदेव: सर्वम्’।
खाँड़के कई तरहके खिलौने होते हैं, पर उन सबमें खाँड़के सिवाय और कुछ नहीं होता। खाँड़की कोई छतरी बनी हुई है, कोई चिड़िया बनी हुई है, कोई मकान बना हुआ है, पर गलनेपर वे सब एक हो जाते हैं। सोनेके अनेक गहने बनते हैं। उनमें कोई पैरमें पहननेका होता है, कोई कमरमें पहननेका होता है, कोई नाकमें पहननेका होता है, कोई कानमें पहननेका होता है, कोई गलेमें पहननेका होता है, कोई हाथोंमें पहननेका होता है आदि-आदि। उन गहनोंके अलग-अलग नाम, रंग, आकृति, उपयोग, तौल, मूल्य होते हैं। परन्तु उन सबमें एक सोनेके सिवाय अन्य कुछ नहीं होता। इसी तरह अनेक तरहकी सृष्टि दीखते हुए भी एक भगवान्के सिवाय कुछ नहीं है। तात्पर्य है कि जैसे जलसे बनी हुई चीज जल ही है, खाँड़से बनी हुई चीज खाँड़ ही है, सोनेसे बने हुए गहने सोना ही हैं, ऐसे ही भगवान्से बना हुआ सब संसार भगवान् ही हैं—‘वासुदेव: सर्वम्’।
सब जग ईश्वर रूप है, भलो बुरो नहिं कोय।
जैसी जाकी भावना, तैसो ही फल होय॥
एक वैरागी बाबा थे। वे गणेशजीका पूजन किया करते थे। एक बार उनको रामेश्वरम् जाना था, पर पासमें पैसे नहीं थे। वे सुनारके पास गये और उससे बोले कि भैया! ये मेरे गणेशजी और उनका चूहा है, इनको लेकर तुम मुझे पैसे दे दो। सुनारने तौलकर बताया कि इतना मूल्य तो गणेशजीकी मूर्तिका है और इतना मूल्य चूहेकी मूर्तिका है। वैरागी बाबा बोले कि ‘क्या बात करते हो मूर्ख कहींके! चूहा तो वाहन है और गणेशजी उसके मालिक हैं, दोनोंका एक मूल्य कैसे हुआ?’ सुनार बोला कि ‘बाबाजी! मैं गणेशजी और चूहेकी बात नहीं कहता हूँ, मैं तो सोनेकी बात कहता हूँ।’
एकनाथजी महाराजने भागवत, एकादश स्कन्धकी टीकामें लिखा है कि एक सोनेसे बनी हुई विष्णुभगवान्की मूर्ति है और एक सोनेसे बनी हुई कुत्तेकी मूर्ति है। विष्णुभगवान् श्रेष्ठ एवं पूज्य हैं, कुत्ता नीच (अस्पृश्य) एवं अपूज्य है। परन्तु तौलमें बराबर होनेके कारण दोनोंका बराबर मूल्य है*।
बाहरी रूपको देखें तो दोनोंमें बड़ा भारी फर्क है, पर सोनेको देखें तो दोनोंमें कोई फर्क नहीं! इसी तरह संसारमें कोई महात्मा है, कोई दुरात्मा है; कोई सज्जन है, कोई दुष्ट है; कोई सदाचारी है, कोई दुराचारी है; कोई धर्मात्मा है, कोई पापी है; कोई विद्वान् है, कोई मूर्ख है—यह सब तो बाहरी दृष्टिसे है, पर तत्त्वसे देखें तो सब-के-सब एक भगवान! ही हैं। एक भगवान् ही अनेक रूपसे बने हुए हैं। जानकार आदमी उनको पहचान लेता है, दूसरा नहीं पहचान सकता। जैसे, आमके बगीचेमें वृक्ष खडे़ हैं। उनमें एक भी आम नहीं है। परन्तु जानकार आदमीकी दृष्टिमें वे सब आम हैं। वे उसको आमका ही बगीचा कहते हैं। ऐसे ही महात्माकी दृष्टिमें सब कुछ भगवान् ही हैं। तत्त्वज्ञ महात्माकी दृष्टि सम होती है—
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिता: समदर्शिन:॥
(गीता ५। १८)
‘महात्मालोग विद्या-विनययुक्त ब्राह्मणमें और चाण्डालमें तथा गाय, हाथी एवं कुत्तेमें भी समरूप परमात्माको देखनेवाले होते हैं।’
ब्राह्मणे पुल्कसे स्तेने ब्रह्मण्येऽर्के स्फुलिङ्गके।
अक्रूरे क्रूरके चैव समदृक् पण्डितो मत:॥
(श्रीमद्भा० ११। २९। १४)
‘जो ब्राह्मण और चाण्डालमें, ब्राह्मणभक्त और चोरमें, सूर्य और चिनगारीमें तथा कृपालु और क्रूरमें समान दृष्टि रखता है, वह भक्त ज्ञानी माना गया है।’
ऐसे समरूप परमात्माको देखनेवाले महात्मा संसारको जीत लेते हैं—
इहैव तैर्जित: सर्गो येषां साम्ये स्थितं मन:।
(गीता ५। १९)
‘जिनका अन्त:करण समतामें स्थित (राग-द्वेषसे रहित) है, उन्होंने इस जीवित-अवस्थामें ही सम्पूर्ण संसारको जीत लिया है।’ अर्थात् उनमें राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि नहीं रहते। उनकी समबुद्धि स्वत: अटल बनी रहती है। जब एक भगवान्के सिवाय दूसरा कुछ है ही नहीं, तो फिर कौन द्वेष करे और किससे करे?
उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध।
निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध॥
(मानस, उत्तर० ११२ ख)
प्रश्न—जब सब कुछ भगवान् ही हैं तो फिर जड़-चेतन, विनाशी-अविनाशीका भेद कहाँसे आ गया?
उत्तर—यह भेद मनुष्यसे आया है अर्थात् मनुष्यने ही इस भेदको पैदा किया है और वही इसको मिटा सकता है तथा इसको मिटानेकी जिम्मेवारी भी उसीपर है। भगवान्ने गीतामें कहा है कि इस जगत्को जीवने ही धारण किया है—‘जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्’ (७। ५)। राग-द्वेषके कारण ही संसार नाशवान्, जड़ दीखता है। भीतरमें राग-द्वेष न हों, समता हो, तो संसार भगवत्स्वरूप ही दीखेगा।
वास्तवमें सब कुछ चिन्मय ही है, पर राग-द्वेषके कारण वह जड़, लौकिक दीखता है। राग-द्वेष न हों तो एक चिन्मय तत्त्व (भगवान्)-के सिवाय कुछ है ही नहीं। जड़-चेतन, स्थावर-जंगम, विनाशी-अविनाशी सब एक भगवान् ही हैं, भेद केवल राग-द्वेषके कारण हैं। राग-द्वेषका भी कारण मोह अथवा अज्ञान है—
‘मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला’
(मानस, उत्तर० १२१। १५)
मोह मिटनेसे ‘सब कुछ भगवान् ही हैं’—यह स्मृति प्राप्त हो जाती है—‘नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा’(गीता १८। ७३)। अत: ‘वासुदेव: सर्वम्’ तो सदासे ही है और सदा ही रहेगा, पर मोहके कारण उसका अनुभव नहीं होता। तात्पर्य है कि बुद्धिमें जड़ता (मोह) होनेसे जड़ दीखता है। बुद्धिमें जड़ता न हो तो सब कुछ चिन्मय ही है। जैसे आँखोंपर जिस रंगका चश्मा चढ़ायें, वैसा ही रंग सब जगह दीखता है, ऐसे ही राग-द्वेषादि जैसी वृत्तियाँ होती हैं, वैसा ही संसार दीखता है।
साधकसे गलती यह होती है कि वह अपनेको अलग रखकर संसारको भगवत्स्वरूप देखनेकी चेष्टा करता है अर्थात् ‘वासुदेव: सर्वम्’ को अपनी बुद्धिका विषय बनाता है। वास्तवमें केवल दीखनेवाला संसार ही भगवत्स्वरूप नहीं है, प्रत्युत देखनेवाला भी भगवत्स्वरूप है। अत: साधकको ऐसा मानना चाहिये कि अपनी देहसहित सब कुछ भगवान् ही हैं अर्थात् शरीर भी भगवत्स्वरूप है, इन्द्रियाँ भी भगवत्स्वरूप हैं, मन भी भगवत्स्वरूप है, बुद्धि भी भगवत्स्वरूप है, प्राण भी भगवत्स्वरूप हैं और अहम् (मैंपन) भी भगवत्स्वरूप है।
सब कुछ भगवान् ही हैं—इसको माननेके लिये साधकको बुद्धिसे जोर नहीं लगाना चाहिये, प्रत्युत सहजरूपसे जैसा है, वैसा स्वीकार कर लेना चाहिये। इसलिये श्रीमद्भागवतमें आया है—
सर्वं ब्रह्मात्मकं तस्य विद्ययाऽऽत्ममनीषया।
परिपश्यन्नुपरमेत् सर्वतो मुक्तसंशय:॥
(११। २९। १८)
‘जब सबमें भगवद्बुद्धि की जाती है, तब ‘सब कुछ भगवान् ही हैं’—ऐसा दीखने लगता है। फिर इस परमात्मदृष्टिसे भी उपराम होनेपर सम्पूर्ण संशय स्वत: निवृत्त हो जाते हैं।’
तात्पर्य है कि ‘सब कुछ भगवान् ही हैं’—इस भावसे भी उपराम हो जाय, इसका भी चिन्तन न करे अर्थात् न द्रष्टा (देखनेवाला) रहे, न दृश्य (दीखनेवाला) रहे और न दर्शन (देखनेकी वृत्ति) ही रहे, केवल भगवान् ही रहें। इसलिये भगवान्ने कहा है—
मनसा वचसा दृष्टॺा गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रियै:।
अहमेव न मत्तोऽन्यदिति बुध्यध्वमञ्जसा॥
(श्रीमद्भा० ११। १३। २४)
‘मनसे, वाणीसे, दृष्टिसे तथा अन्य इन्द्रियोंसे जो कुछ (शब्दादि विषय) ग्रहण किया जाता है, वह सब मैं ही हूँ। अत: मेरे सिवाय और कुछ भी नहीं है—यह सिद्धान्त आप विचारपूर्वक शीघ्र समझ लें अर्थात् स्वीकार करके अनुभव कर लें।’