सर्वत्र भगद्दर्शन
परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें देरी होनेका एकमात्र कारण है—उत्कट अभिलाषाकी कमी और इस कमीका कारण है—सांसारिक सुखकी चाहना। हमें परमात्माकी प्राप्ति हो जाय, हमारा कल्याण हो जाय, हमें तत्त्वज्ञान हो जाय, हमारा भगवान्में प्रेम हो जाय, हम जीवन्मुक्त हो जायँ, हम जन्म-मरणसे रहित हो जायँ, हम सब दु:खोंसे छूट जायँ* आदि किसी भी एक बातकी जोरदार इच्छा होनी चाहिये कि उसके बिना रह न सकें।
जैसे, किसीके मनमें यह जोरदार इच्छा हो जाय कि गंगा कैसे मिले? गंगाके पासमें कैसे पहुँचें? गंगाको कैसे जानें? गंगाके दर्शन कैसे हों? और कोई जानकार आदमी सामने बहती हुई नदीकी तरफ संकेत करके बता दे कि यही गंगा है तो गंगाकी प्राप्तिमें कितनी देरी लगी? क्या परिश्रम हुआ? पहले अपनी दृष्टिमें वह नदी थी, अब दृष्टि चली गयी कि यह तो गंगा है—इतनी ही बात है!
एक बार किसी भाईने सेठजी श्रीजयदयालजी गोयन्दकासे कहा कि हमें भगवान्के दर्शन करा दो! सेठजीने कहा कि भाई, हमारी सामर्थ्य नहीं है। उसने फिर कहा तो सेठजी बोले कि मैं दर्शन करा दूँ तो आप मानोगे नहीं। अगर आप मान लोगे तो दर्शन करा देता हूँ। उसने कहा कि आप सत्यवादी हैं—ऐसा प्रसिद्ध है। अत: आप कहोगे तो मैं मान लूँगा। सेठजी उसको बाहर ले गये और सूर्यकी तरफ संकेत करके बोले कि देखो, ये भगवान् हैं! वह भाई बोला कि सूर्यको तो हम नित्य ही देखते हैं! सेठजीने कहा कि शास्त्रोंने सूर्यको भगवान् कहा है। ईश्वरकोटिके पाँच देवताओंमें भी सूर्यका स्थान है। अत: सूर्य भगवान् हैं—इसमें क्या सन्देह है? तात्पर्य है कि भगवान्की प्राप्तिमें देरी नहीं है। परन्तु उसकी प्राप्तिकी उत्कट अभिलाषा नहीं है, इसीलिये देरी हो रही है।
अगर घरमें कोई आदमी भूखा हो तो आप उसको दाल, भात, हलवा, पूरी आदि कुछ भी बनाकर दे सकते हैं, पर भूख नहीं दे सकते। भूख तो उसकी खुदकी चाहिये। इसी तरह उत्कट अभिलाषा खुदकी चाहिये। उत्कट अभिलाषा होनेपर भगवत्प्राप्तिमें देरीका कारण ही नहीं है। आप देखनेको तैयार और भगवान् दीखनेको तैयार, फिर देरीका कारण क्या है?
भगवान्की प्राप्ति बड़ी भारी सुलभ है! ऐसा सुलभ दूसरा कोई काम हो ही नहीं सकता। सुलभता-दुर्लभता, सुगमता-कठिनता तो वहाँ होती है, जहाँ कुछ करना पड़ता है अथवा जहाँ प्रापणीय तत्त्वसे दूरी होती है। जहाँ कुछ करना ही नहीं पड़ता, केवल जानना अथवा मानना ही पड़ता है, उसमें क्या सुलभता और क्या दुर्लभता? क्या सुगमता और क्या कठिनता? भगवान् अत्यन्त सुलभ कैसे हैं? अब इसपर विचार किया जाता है।
साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णके वचन हैं—
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ:॥
(गीता ७। १९)
‘बहुत जन्मोंके अन्तमें अर्थात् मनुष्यजन्ममें ‘सब कुछ वासुदेव ही है’—ऐसा जो ज्ञानवान् मेरे शरण होता है, वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।’
तात्पर्य है कि मनुष्य, पशु, पक्षी, वृक्ष, खम्भा, मकान, जमीन, कपड़ा आदि जो कुछ भी देखने, सुनने, चिन्तन करने आदिमें आ रहा है, वह सब भगवान् ही हैं। भगवान्के सिवाय किंचिन्मात्र भी दूसरी चीज नहीं है—इस बातको अभी, वर्तमानमें ही मान लें। स्वयं भगवान्के वचन हैं—
मत्त: परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥
(गीता ७। ७)
‘हे धनंजय! मेरेसे बढ़कर (इस जगत् का) दूसरा कोई किंचिन्मात्र भी कारण नहीं है। जैसे सूतकी मणियाँ सूतके धागेमें पिरोयी हुई होती हैं, ऐसे ही सम्पूर्ण जगत् मेरेमें ही ओतप्रोत है।’
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्।
(गीता ७। १०)
‘हे पृथानन्दन! सम्पूर्ण प्राणियोंका अनादि बीज मुझे जान।’
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये।
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि॥
(गीता ७। १२)
‘जितने भी सात्त्विक, राजस और तामस भाव हैं, वे सब मेरेसे ही होते हैं—ऐसा समझो। परन्तु मैं उनमें और वे मेरेमें नहीं हैं।’
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन।
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्॥
(गीता १०। ३९)
‘हे अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणियोंका जो बीज है, वह बीज मैं ही हूँ; क्योंकि मेरे बिना कोई भी चर-अचर प्राणी नहीं है अर्थात् चर-अचर सब कुछ मैं ही हूँ।’
जैसे बीज ही वृक्ष बना है, ऐसे भगवान् ही संसार बने हैं। भगवान् ही सम्पूर्ण स्थावर-जंगम प्राणियोंके बीज हैं। इतना ही नहीं, इससे भी आगे भगवान् कहते हैं—‘सदसच्चाहमर्जुन’ (गीता ९। १९) ‘सत् और असत् भी मैं ही हूँ।’ संसारमें सत् और असत् के सिवाय और कुछ नहीं है। संसार असत् है, उसमें रहनेवाला परमात्मतत्त्व सत् है। शरीर असत् है, उसमें रहनेवाला जीवात्मा सत् है। शरीर-संसार परिवर्तनशील हैं, जीवात्मा और परमात्मा अपरिवर्तनशील हैं। शरीर-संसार नाशवान् हैं, जीवात्मा और परमात्मा अविनाशी हैं। भगवान् कहते हैं कि परिवर्तनशील भी मैं हूँ और अपरिवर्तनशील भी मैं हूँ; नाशवान् भी मैं हूँ और अविनाशी भी मैं हूँ। अर्जुन भी कहते हैं—‘त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्’ (गीता ११। ३७) ‘आप सत् भी हैं, असत् भी हैं और सत्-असत् से परे जो कुछ भी है, वह सब भी आप ही हैं।’
अब भगवान्की प्राप्तिमें देरी किस बातकी है? परिश्रम किस बातका है? ये गंगाजी हैं—इसमें क्या देरी लगी? क्या परिश्रम पड़ा? भगवान् तो गंगाजीसे भी विलक्षण हैं। गंगाजी तो एक जगह हैं, पर भगवान् सब जगह हैं। भगवान् स्वयं कह रहे हैं कि सब कुछ मैं-ही-मैं हूँ, मेरे सिवाय और कुछ भी नहीं है—‘मत्त: परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय’ (गीता ७। ७)। यदि कोई कहे कि इस बातपर हमारा विश्वास नहीं है तो यह उसकी कमी है, तत्त्वकी कमी नहीं है। भगवान् पर विश्वास नहीं करेंगे तो क्या उस शरीर या संसारपर विश्वास करेंगे, जो क्षणभंगुर है, नाशवान् है? भगवान्की वाणीपर तो विश्वास करते नहीं और चाहते हैं अपना कल्याण! यह कैसे सम्भव है? भगवान्के वचनोंपर विश्वास न करना भगवान्का तिरस्कार है, अपराध है। अगर उनके वचन हमारी समझमें नहीं आयें तो यह बात दृढ़तासे मान लें कि हमारी समझमें कमी है, तत्त्वमें कमी नहीं है। फिर अनुभव हो जायगा। कारण कि सच्ची बात सच्ची ही रहेगी, झूठी कैसे हो जायगी? भले ही हमारी समझमें नहीं आये, हमारी दृष्टिमें नहीं आये, पर सब कुछ भगवान् ही हैं—इसमें कोई सन्देह नहीं है।
ज्ञानमार्गमें यह बात आती है कि देखने, सुनने, चिन्तन करने आदिमें जो कुछ आता है, वह सब असत् माया है—
किं भद्रं किमभद्रं वा द्वैतस्यावस्तुन: कियत्।
वाचोदितं तदनृतं मनसा ध्यातमेव च॥
(श्रीमद्भा० ११। २८। ४)
‘संसारकी सब वस्तुएँ वाणीसे कही जा सकती हैं और मनसे सोची जा सकती हैं; अत: वे सब असत्य हैं। जब द्वैत नामकी कोई वस्तु है ही नहीं, तो फिर उसमें क्या अच्छा और क्या बुरा?’
देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं।
मोह मूल परमारथु नाहीं॥
(मानस, अयोध्या० ९२। ४)
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुन:।
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभि: स्यात्त्रिभिर्गुणै:॥
(गीता १८। ४०)
‘पृथ्वीमें या स्वर्गमें अथवा देवताओंमें तथा इनके सिवाय और कहीं भी ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो प्रकृतिसे उत्पन्न इन तीनों गुणोंसे रहित हो।’
परन्तु भक्तिमार्गमें यह बात आती है कि देखने, सुनने, चिन्तन करने आदिमें जो कुछ आता है, वह सब भगवान् ही हैं—
मनसा वचसा दृष्टॺा गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रियै:।
अहमेव न मत्तोऽन्यदिति बुध्यध्वमञ्जसा॥
(श्रीमद्भा० ११। १३। २४)
‘मनसे, वाणीसे, दृष्टिसे तथा अन्य इन्द्रियोंसे जो कुछ (शब्दादि विषय) ग्रहण किया जाता है, वह सब मैं ही हूँ। अत: मेरे सिवाय और कुछ भी नहीं है—यह सिद्धान्त आप विचारपूर्वक शीघ्र समझ लें अर्थात् स्वीकार कर लें।’
जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि।
(मानस, बाल० ७)
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्॥
(गीता १०। ३९)
‘मेरे बिना कोई भी चर-अचर प्राणी नहीं है।’
तात्पर्य है कि ज्ञानमार्गमें सब कुछ प्रकृतिरूप है और भक्तिमार्गमें सब कुछ भगवद्रूप है।
ज्ञानमार्ग जड़ताके त्यागमें काम आता है और भक्तिमार्ग भगवान्के प्रेममें काम आता है। ज्ञानमार्गमें परमात्मा संसारमें व्याप्त हैं—‘येन सर्वमिदं ततम्’ (गीता २। १७),‘ईशावास्यमिदं सर्वम्’ (ईश०१) और भक्तिमार्गमें संसाररूपसे परमात्मा ही हैं—‘वासुदेव: सर्वम्’ (गीता ७। १९)। ज्ञानमार्गमें गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं—‘गुणा गुणेषु वर्तन्ते’(गीता ३। २८) और भक्तिमार्गमें भगवान् ही भगवान्में बरत रहे हैं अर्थात् लीला कर रहे हैं—‘यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति’ (गीता ६। ३०)। ज्ञानमार्गमें साधक अपने स्वरूपमें स्थित होता है और भक्तिमार्गमें साधक भगवान्के अर्पित होता है, भगवान्का प्रेमी होता है। भगवान् प्रेमके भूखे हैं, ज्ञानके नहीं। भक्त भगवान्से प्रेम करता है और भगवान् भक्तसे प्रेम करते हैं; अत: उनमें प्रतिक्षण वर्धमान प्रेम होता है।
सब कुछ भगवान् ही हैं—इस बातको कोई जानना चाहे तो वह एकान्तमें बैठ जाय और यह प्रार्थना शुरू कर दे कि हे नाथ! मैं आपको कैसे जानूँ—‘कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्’(गीता १०। १७) सब कुछ आप ही हैं— इसको मैं कैसे जानूँ! कैसे जानूँ! कैसे जानूँ! इस तरह भीतरसे लगन लगा दे। एक कहानी है। एक बहुत दरिद्र आदमी था। वह एक महात्माके पास गया और बोला कि ‘महाराज! मेरेपर बहुत कर्जा है। खाने-पीनेकी, रहनेकी, कपड़ेकी बहुत तंगी है। ऐसी कृपा करो कि कर्जा उतर जाय।’ महात्माने पूछा कि ‘तेरे घरमें बड़ी चीज क्या है?’ वह बोला कि ‘एक स्नान करनेकी बड़ी शिला है, जिसपर बैठकर मैं स्नान किया करता हूँ। उससे बड़ी और कोई चीज नहीं है।’ महात्मा बोले कि ‘तू अभी जाकर बैठ जा और कहना शुरू कर दे कि यह शिला सोनेकी हो जाय........शिला सोनेकी हो जाय......शिला सोनेकी हो जाय........शिला सोनेकी हो जाय! इतना सोना तो काफी है न?’ वह बोला कि ‘महाराज! कर्जा तो उसके एक टुकड़ेसे ही उतर जायगा!’ महात्मा बोले कि ‘अब तू जा और चौबीस घण्टेतक इस बातकी धुन लगा दे।’ वह आदमी घर गया और ‘शिला सोनेकी हो जाय’—ऐसा कहना शुरू कर दिया। ऐसा कहते-कहते तेईस घण्टे बीत गये तो उसने देखा कि अभी शिलाका एक टुकड़ा भी सोनेका नहीं हुआ। फिर भी वह कहता गया। चौबीस घण्टे पूरा होनेमें पाँच-दस मिनट रह गये, तब भी शिला नहीं बदली। पर वह कहता गया। जब एक मिनट बाकी रहा, तब वह कहते-कहते उकता गया और बोला कि सोनेकी नहीं होती तो लोहेकी ही हो जाय! उसके ऐसा कहते ही चट वह शिला लोहेकी हो गयी! उसने महात्माके पास जाकर कहा कि ‘महाराज! वह शिला तो लोहेकी हो गयी! वह या तो पत्थरकी ही रहती या सोनेकी हो जाती, लोहेकी कैसे हो गयी?’ महात्माने कहा कि तूने कहा होगा, तभी वह लोहेकी हो गयी। ‘तू उकता गया, इसलिये तेरे कहनेसे वह लोहेकी हो गयी। अगर तू उकताता नहीं और ‘शिला सोनेकी हो जाय’—यह कहता रहता तो वह सोनेकी ही हो जाती; क्योंकि वही समय कहनेका था।’
इस तरह साधकको चाहिये कि वह उकताए नहीं और आठों पहर भगवान्के पीछे पड़ जाय कि ‘मैं आपको कैसे जानूँ!’, ‘हे नाथ! मैं आपको जान जाऊँ!’ ऐसी प्रार्थना सभी कर सकते हैं; क्योंकि भगवान्के अंश होनेसे सबका भगवान् पर अधिकार है। भूख तंग करे तो रोटी खा ले, प्यास तंग करे तो जल पी ले, नींद तंग करे तो सो जाय, पर अपनी लगन नहीं छोड़े। मन लगे चाहे न लगे, ध्यान लगे चाहे न लगे, पर प्रार्थना नहीं छोड़े। भगवान् बड़े दयालु हैं, प्राणिमात्रके सुहृद् हैं—‘सुहृदं सर्वभूतानाम्’ (गीता ५। २९)। दया करके वे अपने-आपको जना देंगे। शिला तो सोनेकी बनती है, है नहीं; पर संसार भगवत्स्वरूप बनता नहीं, वह तो भगवत्स्वरूप ही है। केवल अपनी धारणा बदलती है। इसलिये गोपियाँ भगवान्से प्रार्थना करती हैं—‘दयित दृश्यताम्’(श्रीमद्भा० १०। ३१। १) ‘प्यारे! आप दीख जाओ!’ तो भगवान् दीख गये, उनके बीचमें ही प्रकट हो गये—‘तासामाविरभूच्छौरि:’ (श्रीमद्भा० १० । ३२ । २)। इससे सुगम साधन और क्या होगा?
प्रश्न—कोई आदमी हमें गाली देता है तो वहाँ भगवान्को कैसे देखें?
उत्तर—उपनिषद्में आया है कि शब्द (वाणी) ही ब्रह्म है—‘वाग् वै ब्रह्मेति’ (बृहदा० ४। १। २)। सन्तोंकी वाणीमें भी यही बात आयी है—
जो तू चेला देह को, देह खेह की खान।
जो तू चेला सबद को, सबद ब्रह्म कर मान॥
अत: शब्द भगवान्का ही स्वरूप है। कोई अच्छा कहे या मन्दा कहे, वह भगवान् ही है। वराहावतारमें भगवान् सूअर भी बनते हैं और वामनावतारमें ब्रह्मचारी ब्राह्मण भी बनते हैं। सूअर और ब्राह्मण—दोनों ही भगवान् हैं। जब सूअर भी भगवान् हैं तो क्या गाली भगवान् नहीं हैं?
कोई कैसा ही बर्ताव करे, पर आप ‘वासुदेव: सर्वम्’ को मत छोड़ो। एक सन्त नदीमें स्नान कर रहे थे। उन्होंने एक बिच्छूको जलके प्रवाहमें बहते हुए देखा। वे अपने हाथसे उसको जलसे बाहर फेंकने लगे तो बिच्छूने उनके हाथमें डंक मार दिया। डंक मारते ही बिच्छू छूट गया और पुन: बहने लगा। सन्तने फिर बिच्छूको स्पर्श किया तो उसने फिर डंक मार दिया। सन्त बिच्छूको बार-बार हाथसे बाहर फेंकनेकी चेष्टा करते थे और वह बार-बार डंक मारता था। एक आदमी यह सब देख रहा था। वह बोला कि कैसे मूर्ख हो! बिच्छू बार-बार डंक मारता है, फिर भी आप उसका स्पर्श करते हो! सन्त बोले कि बिच्छूका स्वभाव है कि जो छुए, उसको डंक मार देना और मेरा स्वभाव है कि कोई मरता हो तो उसको बचा देना। जब बिच्छू अपना बुरा स्वभाव भी नहीं छोड़ता, तो फिर मैं अपना अच्छा स्वभाव कैसे छोड़ दूँ? तात्पर्य है कि अगर दुष्ट व्यक्ति अपनी बुरी बात नहीं छोड़ता तो आप अपनी अच्छी, सर्वश्रेष्ठ बात क्यों छोड़ो?
प्रश्न—शास्त्रोंमें संसार असत्य है—ऐसा क्यों कहा गया है? सब कुछ भगवान् ही हैं—यही बात सब जगह क्यों नहीं कही गयी ?
उत्तर—संसारको असत्य इसलिये कहा गया है कि आप उससे सुख लेना चाहते हो। जैसे, मन्द अन्धकारमें रस्सी साँपकी तरह दीखती है। जो उसको देखकर डर जाता है, उसको कहते हैं कि ‘डरो मत, यह साँप नहीं है, यह तो रस्सी है।’ परन्तु जो उसको देखकर नहीं डरता, उसको कहते हैं कि ‘यह रस्सी है’। ऐसे ही जो संसारसे सुख चाहता है और जिसके भीतर ‘संसार सत्य है, सुखरूप है’—ऐसा प्रभाव पड़ा हुआ है, उसके लिये भगवान् कहते हैं कि यह संसार दु:खालय और नाशवान् है—‘दु:खालयमशाश्वतम्’ (गीता ८। १५)। परन्तु जो संसारसे सुख नहीं चाहता, जिसपर संसारका प्रभाव नहीं है, उसके लिये कहते हैं कि सब कुछ भगवान् ही हैं—‘वासुदेव: सर्वम्’ (गीता ७। १९)।
संसार प्रकृतिका कार्य है और प्रकृति भगवान्की शक्ति है—
भूमिरापोऽनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च।
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥
(गीता ७। ४)
‘पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश—ये पंचमहाभूत और मन, बुद्धि तथा अहंकार—यह आठ प्रकारके भेदोंवाली मेरी प्रकृति है।’
‘मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्।’
(श्वेताश्वतर० ४। १०)
‘माया तो प्रकृतिको समझना चाहिये और मायापति महेश्वरको समझना चाहिये।’
भगवान्की शक्ति होनेसे प्रकृति और उसका कार्य भगवत्स्वरूप ही हैं; क्योंकि शक्ति शक्तिमान्से अलग नहीं हो सकती। जैसे शरीरके गोरे या काले रंगको शरीरसे अलग नहीं कर सकते, जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्ति अवस्थाओंको शरीरसे अलग नहीं कर सकते, ऐसे ही प्रकृतिको भगवान्से अलग नहीं कर सकते। जैसे मनुष्य अपनी शक्ति (बल, ताकत, विद्वत्ता, योग्यता, चातुर्य, सामर्थ्य आदि)-के बिना तो रह सकता है, पर शक्ति मनुष्यके बिना नहीं रह सकती, ऐसे ही भगवान् शक्तिके बिना रह सकते हैं, पर शक्ति भगवान्के बिना नहीं रह सकती। तात्पर्य है कि शक्ति भगवान्के अधीन (आश्रित) है, भगवान् शक्तिके अधीन नहीं हैं। शक्तिमान्के बिना शक्तिकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव होता है। अत: भगवान्की शक्ति होनेसे प्रकृतिकी भी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव है।
वास्तवमें परमात्माका स्वरूप समग्र ही है। परमात्मामें कोई शक्ति न हो—ऐसा नहीं हो सकता। अगर परमात्माको सर्वथा शक्तिरहित मानें तो परमात्मा एकदेशीय ही सिद्ध होंगे। उनमें शक्तिका परिवर्तन अथवा अदर्शन तो हो सकता है, पर शक्तिका अभाव नहीं हो सकता। शक्ति कारणरूपसे उनमें रहती ही है, अन्यथा शक्ति (प्रकृति)-के रहनेका स्थान कहाँ होगा? इसलिये गीतामें प्रकृति और पुरुष दोनोंको ‘अनादि’ कहा गया है—
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्धॺनादी उभावपि।
(१३। १९)
विश्वरूपको भी गीतामें ‘अव्यय’ कहा गया है—
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम्॥
(११। ४)
‘त्वमव्यय: शाश्वतधर्मगोप्ता’
(११। १८)
संसाररूप अश्वत्थ-वृक्षको भी ‘अव्यय’ कहा गया है—
ऊर्ध्वमूलमध:शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
(गीता १५। १)
इससे सिद्ध हुआ कि जड़-चेतन, स्थावर-जंगमरूपसे जो कुछ दीख रहा है, वह सब अविनाशी भगवान् ही हैं। भगवान्के बिना कुछ भी नहीं है। परन्तु भोग और संग्रहकी आसक्तिके कारण मनुष्यको सब कुछ जड़-ही-जड़ दीखता है! तात्पर्य है कि जड़ संसार केवल जीवकी दृष्टि है। वास्तवमें सब-की-सब वस्तुएँ तत्त्वसे चिन्मय भगवत्स्वरूप हैं। भगवान्के सिवाय मैं-तू-यह-वह कुछ भी नहीं है अर्थात् ‘मैं’ भी भगवान्का स्वरूप है, ‘तू’ भी भगवान्का स्वरूप है, ‘यह’ भी भगवान्का स्वरूप है और ‘वह’ भी भगवान्का स्वरूप है। भगवान् कण-कणमें पूरे-के-पूरे हैं। प्रह्लादजीके कहनेपर भगवान् नृसिंहरूपसे खम्भेमेंसे प्रकट हो गये; क्योंकि वे वहाँ पहलेसे ही थे! इसलिये साधकको वृक्ष, नदी, पहाड़, पत्थर, दीवार आदि कुछ भी दीखे, वह उसमें अपने इष्ट भगवान्को देखकर प्रार्थना कर सकता है कि हे नाथ! मुझे अपना प्रेम प्रदान करो; हे प्रभो! आपको मेरा नमस्कार हो, जैसा कि अर्जुनने कहा है—
वायुर्यमोऽग्निर्वरुण: शशाङ्क:
प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्व:
पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते॥
‘आप ही वायु, यमराज, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, दक्ष आदि प्रजापति और प्रपितामह (ब्रह्माजीके भी पिता) हैं। आपको हजारों बार नमस्कार हो! नमस्कार हो!! और फिर भी आपको बार-बार नमस्कार हो! नमस्कार हो!!’
नम: पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते
नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं
सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्व:॥
(गीता ११। ३९-४०)
‘हे सर्व! आपको आगेसे नमस्कार हो! पीछेसे नमस्कार हो! सब ओरसे ही नमस्कार हो! हे अनन्तवीर्य! अमित विक्रमवाले आपने सबको समावृत कर रखा है; अत: सब कुछ आप ही हैं।’