अपना किसे मानें?

सच्चे हृदयसे स्वीकार कर लें कि हम भगवान‍्के हैं और भगवान‍् हमारे हैं। भगवान‍्ने जीवको खास अपना अंश बताया है—‘ममैवांशो जीवलोके’ (गीता १५। ७)। अंश होनेके नाते हम खास भगवान‍्के हैं। भगवान‍्के सिवाय दूसरी चीजको अपनी मानना बहुत बड़ी गलती है। भगवान‍्के सिवाय दूसरा सब क्षणभंगुर है, नाशवान् है। यद्यपि वह क्षणभंगुर, नाशवान् भी भगवान‍्की ही अपरा प्रकृति है, पर हम उसको भगवान‍्की वस्तु न मानकर भोग और संग्रहकी दृष्टिसे देखते हैं।

संसार भगवान‍्का है। उसको अपने भोग और संग्रहके लिये मानना बहुत बड़ी गलती है। संसार तो खिलौना है, खेलकी सामग्री है। खिलौना कोई तत्त्व नहीं होता। वह तो खेलके लिये होता है। उसमें कभी हार होती है, कभी जीत होती है। हार और जीत कोई तत्त्व नहीं रखते। तत्त्वकी चीज तो एक परमात्मा ही हैं। उस परमात्माकी विलक्षणताका पूरा वर्णन कोई कर सकता ही नहीं। वह अनन्त है, अपार है, असीम है। आज दिनतक वेद-पुराणादि शास्त्रोंमें परमात्माका जो वर्णन हुआ है, वह सब-का-सब इकट्ठा कर लिया जाय तो उससे परमात्माके किसी छोटे अंशका भी वर्णन नहीं होगा! ऐसे अनन्त, अपार परमात्माका वर्णन तो नहीं कर सकते, पर उनको अपना मान सकते हैं। इसलिये मीराबाईने कहा—‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई’। यह असली तत्त्वकी, समझकी बात है। भगवान‍् हमारे हैं और सदा हमारे ही रहेंगे। हम कहीं भी चले जायँ, वे सदा हमारे साथमें ही रहते हैं। भगवान‍्के सिवाय दूसरा कोई हमारे साथ रहता ही नहीं, रह सकता ही नहीं, फिर भगवान‍्के सिवाय और किसको अपना मानें? अन्तमें भगवान‍्को ही अपना मानना पड़ेगा। ऐसा साथी और कोई मिलेगा नहीं। विचार करें, क्या शरीर हरदम साथमें रहेगा? क्या घर-कुटुम्ब सदा साथमें रहेगा? क्या जमीन-जायदाद सदा साथमें रहेगी? क्या आदर-सत्कार, मान-बड़ाई सदा साथमें रहेगी? जब हमारे साथ रहनेवाली कोई चीज है ही नहीं, तो फिर किससे अपनापन करें? किससे प्रेम करें? किसको अपना समझें? अब चाहे परवश, पराधीन, मजबूर, लाचार होकर ही क्यों न मानना पड़े, हमें परमात्माको ही अपना मानना पड़ेगा! कोई साथमें रहनेवाला है ही नहीं तो क्या करें? साथमें रहनेवाला एक ही है, और वह है—परमात्मा। हम चौरासी लाख योनियोंमें जायँ, स्वर्गमें जायँ, नरकोंमें जायँ, किसी भी लोकमें जायँ, तो भी वह हमारा साथ कभी छोड़ता नहीं। हमारा साथ छोड़ना उसको आता ही नहीं! परमात्मामें अनन्त सामर्थ्य है, पर हमारा साथ छोड़नेकी उसमें सामर्थ्य ही नहीं है! इस विषयमें वह लाचार है! सन्त-महात्माओंने इस बातको ठीक तरहसे जानकर ही भगवान‍्को अपना माना है, उनसे प्रेम किया है!

भगवान‍्के समान साथी कोई नहीं मिलेगा, कभी नहीं मिलेगा, कहीं नहीं मिलेगा। आपको जँचे या न जँचे, यह बात अलग है, पर बात यही सच्ची है। भगवान‍्ने भी साफ कह दिया—

ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:।

(गीता १५। ७)

‘इस संसारमें जीव बना हुआ आत्मा स्वयं मेरा ही सनातन अंश है।’

गोस्वामी तुलसीदासजी महाराजने भी कहा है—

ईस्वर अंस जीव अबिनासी।

चेतन अमल सहज सुख रासी॥

(मानस, उत्तर० ११७। २)

ईश्वरका अंश होनेसे जीव अविनाशी है, चेतन है, मलरहित है और सहज सुखराशि है। परन्तु मिलने और बिछुड़नेवाले पदार्थोंको अपना मानकर यह दु:ख पा रहा है। यह कभी माताका वियोग होनेसे रोता है, कभी पिताका वियोग होनेसे रोता है, कभी स्त्रीका वियोग होनेसे रोता है, कभी पुत्रका वियोग होनेसे रोता है, कभी मित्रका वियोग होनेसे रोता है! यह सोचता ही नहीं कि जिनसे रोना पड़े, ऐसोंको अपना साथी क्यों बनाऊँ? संसारके सभी सम्बन्ध सेवा करनेके लिये हैं, अपना माननेके लिये नहीं। उनको अपना मानोगे तो एक दिन रोना ही पड़ेगा। जिनको हम अपना प्रिय मानते हैं, वे एक दिन हमें रुलायेंगे—‘प्रियं रोत्स्यति’ (बृहदारण्यक०१।४।८)। इसलिये हमें ऐसा साथी बनाना चाहिये, जिसके लिये कभी रोना पड़े ही नहीं। पीछे रोना पड़े, ऐसी भूल करें ही क्यों? कोई बालक या जवान मर जाता है तो बूढ़ी माताएँ कहती हैं कि हमने ऐसा नहीं जाना था कि यह हमारेको छोड़ जायगा! नहीं जाना था तो अब जान जाओ कि ये सभी जानेवाले हैं। अब ऐसा साथी बनाओ कि कभी छोड़कर जाय ही नहीं। ऐसा साथी केवल भगवान‍् ही हैं। भगवान‍् कभी बदलते ही नहीं, कभी बूढ़े होते ही नहीं, कभी उनके सफेद बाल होते ही नहीं, कभी मरते ही नहीं। उनका बनाया हुआ संसार तो सेवा करनेके लिये है। सेवा करनेकी सामग्रीको भोग-सामग्री समझ लेना गलती है। जिस वस्तुका संयोग और वियोग होता है, वह वस्तु अपनी और अपने लिये होती ही नहीं। उसको केवल सेवाके लिये ही मानो। आज मानो तो आज निहाल हो जाओगे। जैसे मनुष्य दान-पुण्यके लिये पैसे निकालता है तो उसके भीतर यह भाव रहता है कि यह पैसा अपने लिये नहीं है, देनेके लिये है। ऐसे ही संसारकी सब वस्तुओंके लिये मान लो कि ये अपने लिये नहीं हैं, सेवाके लिये हैं। उनसे अपना शरीर-निर्वाह करनेमें कोई हर्ज नहीं है। उनसे अपना निर्वाह तो करो, पर उनको अपना साथी मत मानो।

आप प्रत्यक्ष देखते हैं कि किसीका भी शरीर सदा नहीं रहता। आपके सामने वस्तु नष्ट हो जाती है और आप रोते हैं। इसलिये इतना विचार तो होना चाहिये कि जिसके बिछुड़नेपर रोना पड़े, उसको अपना न मानें। आपके पास शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि जो कुछ है, वह सब-का-सब दूसरोंकी सेवाके लिये ही है, अपने लिये है ही नहीं। ऐसी स्पष्ट बात सुगमतासे पढ़ने-सुननेको नहीं मिलती। मेरेको तो व्याख्यान देते हुए भी वर्षोंतक नहीं मिली। स्थूलशरीरसे होनेवाली क्रिया, सूक्ष्मशरीरसे होनेवाला चिन्तन और कारणशरीरसे होनेवाली समाधि दूसरोंके लिये ही है, अपने लिये है ही नहीं। इनके द्वारा कभी अपनी तृप्ति नहीं होती, चाहे लाखों-करोड़ों, अरबों-खरबों वर्ष क्यों न बीत जायँ! ये सब नाशवान् हैं और आप सब साक्षात् परमात्माके अंश हैं। चौरासी लाख योनियाँ भुगतते हुए सब शरीर छूट गये तो क्या यह शरीर नहीं छूटेगा? जिस माटीके वे शरीर थे, उसी माटीका यह शरीर है। यह भी मिला है और बिछुड़ेगा।

इस एक ही बातको ठीक तरहसे मान लो, समझ लो,पक्‍का कर लो कि जो वस्तु मिलती है और बिछुड़ जाती है, वह अपनी नहीं होती। जैसे बालकपना आपके साथ था, पर वह बिछुड़ गया, ऐसे ही जवानी भी बिछुड़ जायगी, वृद्धावस्था भी बिछुड़ जायगी, रोगावस्था भी बिछुड़ जायगी, नीरोगावस्था भी बिछुड़ जायगी, निर्धनता भी बिछुड़ जायगी, धनवत्ता भी बिछुड़ जायगी। ये सब बिछुड़नेवाली चीजें हैं।

विचार करें, क्या यह शरीर बिछुड़नेवाला नहीं है? क्या धन-सम्पत्ति बिछुड़नेवाली नहीं है? क्या घर, जमीन, रुपये, कुटुम्ब आदि बिछुड़नेवाले नहीं हैं? क्या ये आपसे अलग नहीं होंगे? क्या आप इनसे अलग नहीं होंगे? अभी आपके जितने साथी हैं, क्या ये सदा आपके साथ रहेंगे? जो आपसे अलग होनेवाले हैं, उनकी सेवा करो, उनको सुख-आराम पहुँचाओ, उनसे अच्छा बर्ताव करो। सदा साथ रहनेवाले एक भगवान‍् ही हैं। उनको आप चाहे सगुण मानो, चाहे निर्गुण मानो, चाहे द्विभुज मानो, चाहे चतुर्भुज मानो, आपकी जैसी मरजी हो, वैसा मानो। वे ही सदा साथ रहनेवाले हैं। उनके सिवाय और कोई साथ रहनेवाला नहीं है। उनके सिवाय सब बिछुड़नेवाले हैं। अच्छे-अच्छे सन्त-महात्माओंका भी शरीर नहीं रहा, फिर आपका शरीर कैसे रह जायगा? आज दिनतक ऐसी रीत चली आ रही है, अब क्या कोई नयी रीत हो जायगी? जानेवालेमें मोह मत करो। मोह करोगे तो रोना पड़ेगा।

हम भगवान‍्के हैं, भगवान‍् हमारे हैं। हम और किसीके नहीं हैं, और कोई हमारा नहीं है। इस बातको आज मान लो तो आज ही सुखी हो जाओगे। सेवा करनेके लिये सब अपने हैं। सब भगवान‍्के प्यारे हैं, इसलिये सबकी सेवा करो। भगवान‍्ने कहा है—‘सब मम प्रिय सब मम उपजाए’ (मानस, उत्तर० ८६। २)। सबकी सेवा करो, पर किसीको अपना मत मानो। आपका रोना, दु:ख छूट जायगा। अगर आपसे मोह न छूटे तो सच्चे हृदयसे भगवान‍्को पुकारो कि हे नाथ! हे मेरे नाथ! मैं आफतमें फँस गया! मेरी यह आफत छुड़ाओ! भगवान‍् अवश्य छुड़ा देंगे।