कोटिं त्यक्त्वा हरिं स्मरेत्

मनुष्यमात्रके लिये मुख्य बात है—अपने जीवनका एक उद्देश्य बनाना। वास्तवमें मनुष्यजीवनका उद्देश्य पहलेसे ही बना हुआ है। भगवान‍्ने जीवको सदाके लिये जन्म-मरणरूप बन्धनसे मुक्त होकर अपनी प्राप्ति करनेके लिये ही मनुष्यशरीर दिया है और इसी उद्देश्यकी पूर्तिके लिये जीवने मनुष्यशरीर लिया है। इसलिये भगवान‍्को प्राप्त कर लेनेमें ही मनुष्यजन्मकी सार्थकता है। इस कार्यके लिये मनुष्यशरीरके सिवाय दूसरा कोई शरीर है ही नहीं। यद्यपि भगवान‍्की ओरसे किसीके लिये भी कोई मनाही नहीं है, तथापि मनुष्यशरीर खास भगवत्प्राप्तिके लिये ही है। इस मनुष्यशरीरको पाकर यदि अपना उद्देश्य ठीक नहीं बनाया तो क्या किया! इसलिये सब भाई-बहनोंसे प्रार्थना है कि आप स्वयं अपना उद्देश्य बनायें कि हमें भगवान‍्को प्राप्त करना ही है। आप चाहे मेरा कहना मान लो, चाहे गीता, रामायण आदि ग्रन्थोंकी बात मान लो, चाहे अन्य किसीकी बात मान लो, सबकी खास बात यही है कि मनुष्यजन्म भगवत्प्राप्तिके लिये ही मिला है। भगवत्प्राप्तिके सिवाय मनुष्यजन्मका दूसरा कोई प्रयोजन नहीं है। भगवत्प्राप्तिके बिना मनुष्यशरीर भी चौरासी लाख योनियोंकी तरह ही है। इसलिये मनुष्यजन्मके मूल्यको समझें। विचार करें कि मनुष्यजन्म क्यों मिला है? भगवान‍्ने क्यों दिया है? हमने क्यों लिया है? परमात्मप्राप्तिके बिना मनुष्यजन्मका क्या प्रयोजन है?

मनुष्यजन्म ही एक ऐसा है, जिससे मनुष्य सदाके लिये दु:खोंसे मुक्त हो सकता है—

साधन धाम मोच्छ कर द्वारा।

पाइ न जेहिं परलोक सँवारा॥

सो परत्र दुख पावइ सिर धुनि धुनि पछिताइ।

कालहि कर्महि ईस्वरहि मिथ्या दोस लगाइ॥

(मानस, उत्तर० ४३)

ऐसे शरीरको प्राप्त करके भी अगर आध्यात्मिक उन्नति नहीं की तो क्या किया? आध्यात्मिक तत्त्वकी प्राप्तिके लिये ही मनुष्यजन्म मिला है, इसके सिवाय मनुष्यजन्मका और क्या मतलब है? अगर यह भी आपने नहीं किया तो मनुष्य होनेका क्या मतलब हुआ? मनुष्य हो, चाहे कीड़ा-मकोड़ा हो, फर्क क्या हुआ? मनुष्यजन्मकी सार्थकता क्या हुई? परमात्मप्राप्तिके विषयमें आप जोरसे नहीं लगे तो फिर आपने क्या किया? क्या मतलब सिद्ध किया? चाहे भाई हो, चाहे बहन हो, अगर उसने परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य नहीं रखा तो मनुष्यजन्मका क्या मतलब हुआ? नीतिमें एक श्लोक आता है—

शतं विहाय भोक्तव्यं सहस्रं स्नानमाचरेत्।

लक्षं विहाय दातव्यं कोटिं त्यक्त्वा हरिं स्मरेत्॥

‘सौ काम छोड़कर भोजन करो, हजार काम छोड़कर स्नान करो, लाख काम छोड़कर दान दो और करोड़ काम छोड़कर भगवान‍्का स्मरण करो।’

तात्पर्य है कि करोड़ काम भी बिगड़ते हों तो बिगड़ जायँ, उनको छोड़कर भगवान‍्का स्मरण करो। भगवान‍्का स्मरण करना सबसे मुख्य रहा। भोजनसे, स्नानसे, दानसे भी बढ़कर भगवान‍्का स्मरण हुआ! भगवान‍्का स्मरण किये बिना जन्म-मरण नहीं छूट सकता। जन्म-मरण छूटे बिना मनुष्यजन्म किस कामका? लोग सत्संग छोड़कर जाते हैं तो कारण पूछनेपर कहते हैं कि हमें अमुक-अमुक काम करने हैं, जाना ही पड़ेगा। आनेमें देरी हो जाय तो कहते हैं कि अमुक-अमुक काम आ गया, नहीं तो हम पहले ही आ जाते। इससे यह सिद्ध हुआ कि आपने सत्संगकी अपेक्षा दूसरे कामोंको ज्यादा आदर दिया है। शास्त्र कहता है—‘कोटिं त्यक्त्वा हरिं स्मरेत्’ ‘करोड़ों काम छोड़कर भी भगवान‍्का स्मरण करो’। क्या आपने करोड़ों काम छोड़कर कभी भगवान‍्का स्मरण किया है? विचार करें कि पारमार्थिक उन्नतिके लिये हमने कितने काम छोड़े हैं? कितने कामोंकी उपेक्षा की है? अपने हृदयपर हाथ रखकर स्वयं सोचो कि क्या हमने पारमार्थिक बातोंका इतना आदर किया है? आप कहते तो हैं कि हम सत्संग करते हैं, हमें आध्यात्मिक उन्नति चाहिये, पर अपने लक्ष्यको ठीक पूरा करनेके लिये क्या आपने ऐसा किया है? क्या ऐसा करनेका विचार है? विचार करनेसे पता लगेगा कि आप कितने पानीमें हैं? हमें परमात्मप्राप्ति नहीं हो रही है, ऐसा कहते तो हैं, पर उसके लिये आपने कितने काम छोड़े हैं?

पारमार्थिक उन्नति इस मनुष्यजन्ममें ही हो सकती है। कारण कि इसीके लिये यह मनुष्यजन्म मिला है। पर इस कामके लिये आपकी कितनी तत्परता है—इधर ध्यान दो। अपने भीतर विचार करो। शास्त्र कहता है कि करोड़ों काम बिगड़ते हों तो बिगड़ जायँ, पर भगवान‍्का स्मरण मत छोड़ो। इस भगवत्स्मरणको आपने कितना महत्त्व दिया है? इसपर कितना विचार किया है? फिर आपको पता लगेगा कि हमारी आध्यात्मिक उन्नति कितनी हुई है? हरेक साधकको इस तरह विचार करना चाहिये। यदि सब काम छोड़कर भगवत्स्मरणको महत्त्व देते तो फिर ऐसा नहीं कहते कि हम इतने वर्षोंसे लगे हुए हैं, परमात्माकी प्राप्ति नहीं हुई! हम भगवत्स्मरणका जितना आदर करते हैं, उसकी अपेक्षा भी भगवान‍् हमपर विशेष कृपा करते हैं।

प्रश्न—क्या शास्त्रविहित कर्तव्य-कर्म छोड़कर भगवान‍्का भजन करें?

उत्तर—शास्त्रविहित कर्तव्य-कर्म करना, कुटुम्बका पालन करना, न्यायानुकूल काम करना बहुत अच्छा है, पर भगवत्स्मरणके सामने सब काम गौण हो जाते हैं। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि कर्तव्य-कर्म करना छोड़ दें। कर्तव्य-कर्म करें, पर भगवान‍्का स्मरण सबसे मुख्य होना चाहिये। संसारके जितने भी काम हैं, वे सब-के-सब एक दिन बिगड़नेवाले हैं। परन्तु भगवान‍्का स्मरण कभी बिगड़ेगा नहीं। संसारका कितना ही सुधार कर लो, वह तो बिगड़ेगा। वह सुधर जाय तो बिगड़ गया, बिगड़ जाय तो बिगड़ गया। वास्तवमें तो संसारका काम बिगड़ा हुआ ही है। मनुष्यजन्मकी सफलता भगवान‍्को प्राप्त करनेमें ही है। भोजन करनेसे, स्नान करनेसे, दान देनेसे मनुष्यजन्म सफल नहीं होगा। मनुष्यजन्म सफल होगा—भगवान‍्का स्मरण करनेसे। आप स्वयं सोचो कि भगवान‍्के स्मरणसे बढ़कर क्या काम है?

समस्त कर्तव्योंका मूल कर्तव्य है—भगवान‍्का स्मरण करना। अन्य सब कर्तव्य इससे नीचे हैं। कहनेमें तो आप कर्तव्य-कर्मकी बात कहते हो, पर वास्तवमें अपनी आयुका नाश कर रहे हो! पर यह बात पढ़ने-सुननेसे समझमें नहीं आती। आप स्वयं सोचोगे, तब समझमें आयेगी। ‘कोटिं त्यक्त्वा हरिं स्मरेत्’—यह बात यों ही अँधेरेमें नहीं कही गयी है।

असली कर्तव्य वही है, जिससे मनुष्य संसारसे ऊँचा उठ जाय। कर्मयोगके पालनसे मनुष्य संसारसे ऊँचा उठ जाता है। अगर आप संसारसे ऊँचा उठ गये, तब तो आपने कर्तव्यका पालन किया, नहीं तो कर्तव्यको समझा ही नहीं है, केवल समय बरबाद किया है। अगर आपने कर्तव्य-कर्मका ठीक पालन किया होता तो स्त्री-पुत्र, रुपये-पैसेमें मन नहीं जाता। रुपयोंके लिये झूठ, कपट, चालाकी, ठगी नहीं करते। यह नियम है कि कर्तव्य-कर्मका पालन करनेसे मनुष्य संसारसे ऊँचा उठ जाता है और उसे शान्तिकी प्राप्ति हो जाती है—

विहाय कामान्य: सर्वान्पुमांश्चरति नि:स्पृह:।

निर्ममो निरहङ्कार: स शान्तिमधिगच्छति॥

(गीता २। ७१)

‘जो मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग करके स्पृहारहित, ममतारहित और अहंतारहित होकर आचरण करता है, वह शान्तिको प्राप्त होता है।’

प्रश्न—अगर कोई बीमार हो तो क्या उसकी सेवा छोड़कर भगवान‍्का भजन करें?

उत्तर—अगर भगवान‍्की सेवा मानकर बीमारकी सेवा करें तो क्या हर्ज है? क्या बाधा लगती है? बीमार व्यक्तिको साक्षात् भगवान‍् मानकर उसकी सेवा करो। घरके कामको भगवान‍्का काम मानकर करो। गीतामें भगवान‍्ने कहा है—

यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।

यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥

(गीता ९। २७)

‘हे कुन्तीपुत्र! तू जो कुछ करता है, जो कुछ भोजन करता है, जो कुछ यज्ञ करता है, जो कुछ दान देता है और जो कुछ तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर दे।’

भगवान‍्का काम समझकर सब कार्य करो तो वह सब भजन हो जायगा। शौच-स्नान करना भी भगवान‍्की सेवा है। बालक भोजन कर लेता है तो माँ राजी हो जाती है! भगवान‍् क्या माँसे भी कम दयालु हैं? एकनाथजी महाराजने भागवतके एकादश स्कन्धकी टीकामें लिखा है कि घरमें झाड़ू देकर कचरा भगवान‍्के अर्पणकी भावनासे बाहर फेंकें तो वह भी भजन हो जायगा! निरर्थक कर्म भी भगवान‍्के अर्पण करनेसे भजन हो जाता है। अगर भगवत्प्राप्तिका दृढ़ उद्देश्य हो जाय तो फिर आपके सभी कार्य भजन हो जायँगे। फिर आपके द्वारा संसारका काम नहीं होगा, प्रत्युत प्रत्येक काम भगवान‍्का ही हो जायगा। इसीमें मनुष्यजन्मकी सार्थकता है।