मामेकं शरणं व्रज
वेदोंका सार उपनिषद् हैं और उपनिषदोंका सार श्रीमद्भगवद्गीता है—
सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दन:।
पार्थो वत्स: सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत् ॥
‘सम्पूर्ण उपनिषद गायें हैं, गोपालनन्दन श्रीकृष्ण उन्हें दुहनेवाले हैं, अर्जुन बछड़ा हैं, गीतारूप महान् अमृत ही दूध है और श्रेष्ठ बुद्धिवाले पुरुष ही उसका पान करनेवाले हैं।’
श्रीमद्भगवद्गीताका सार है—शरणागति। शरणागतिको भगवान्ने ‘सर्वगुह्यतम’ अर्थात् सबसे अत्यन्त गोपनीय कहा है—‘सर्वगुह्यतमं भूय: शृणु’ (गीता १८। ६४)। यह ‘सर्वगुह्यतम’ शब्द गीतामें एक ही बार आया है। ऐसी सर्वगुह्यतम शरणागतिकी बात भगवान्ने इस प्रकार कही है—
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:॥
(गीता १८।६६)
‘सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय छोड़कर तू केवल मेरी शरणमें आ जा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा, चिन्ता मत कर।’
भगवान्ने सम्पूर्ण धर्मोंका स्वरूपसे त्याग नहीं बताया। अगर स्वरूपसे त्याग बताते तो कम-से-कम अर्जुन तो युद्ध न करते; क्योंकि युद्ध करना क्षत्रियका धर्म है—‘युद्धे चाप्यपलायनम्’ (गीता १८। ४३)। परन्तु अर्जुनने युद्ध किया है। अत: भगवान्के कथनका तात्पर्य है कि धर्मकी भी शरण नहीं होनी चाहिये, प्रत्युत केवल मेरी शरण होनी चाहिये।
जब मनुष्यको अपनी कमजोरीका और भगवान्की सर्वसमर्थताका अनुभव हो जाता है, तब वह शरणागत हो जाता है। शरण होनेमात्रसे शरणागत भक्तमें बड़ी विलक्षणता आ जाती है। उसके भीतर बहुत विलक्षण भाव पैदा होने लगते हैं। भगवान्की शरण होनेपर उनकी कृपासे सब सद्गुण प्राप्त हो जाते हैं। भगवान्में अनन्त, अपार, असीम शक्ति है, जिसका कोई पारावार नहीं है। अत: मनुष्यको भगवान्के चरणोंका आश्रय लेना चाहिये। गीतामें भगवान्ने कहा है—
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये।
ते ब्रह्म तद्विदु: कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्॥
साधि भूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदु:।
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतस:॥
(७। २९-३०)
‘वृद्धावस्था और मृत्युसे मुक्ति पानेके लिये जो मनुष्य मेरा आश्रय लेकर प्रयत्न करते हैं, वे उस ब्रह्मको, सम्पूर्ण अध्यात्मको और सम्पूर्ण कर्मको जान जाते हैं।’
‘जो मनुष्य अधिभूत तथा अधिदैवके सहित और अधियज्ञके सहित मुझे जानते हैं, वे मुझमें लगे हुए चित्तवाले मनुष्य अन्तकालमें भी मुझे ही जानते हैं अर्थात् प्राप्त होते हैं।’
तात्पर्य है कि जो प्रभुके चरणोंका आश्रय लेकर साधन करते हैं, वे ब्रह्म, जीव, जगत् आदि सबको जान जाते हैं अर्थात् पूर्ण जानकार हो जाते हैं। इसलिये मनुष्यको तत्परतासे, उत्साहपूर्वक सब कार्य करना चाहिये; परन्तु भरोसा भगवान्का ही रखना चाहिये कि भगवान्की कृपासे ही मेरा कल्याण होगा। साधनका भी भरोसा नहीं रखना चाहिये। साधनका भरोसा रखनेसे अभिमान पैदा होगा और अभिमानसे पतन होगा।
गीतामें भगवान् अर्जुनको आज्ञा देते हैं—‘निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्’ (११। ३३) ‘हे सव्यसाचिन् अर्थात् दोनों हाथोंसे बाण चलानेवाले अर्जुन! तुम (शत्रुओंको मारनेमें) निमित्तमात्र बन जाओ।’ गीताके अन्तमें अर्जुनने भगवान्से कहा कि आपकी कृपासे मेरा मोह नष्ट हो गया है, अब आप जैसा कहोगे, वैसा करूँगा—‘करिष्ये वचनं तव’ (गीता १८। ७३)। फिर भगवान्ने जैसा कहा, वैसा ही अर्जुनने किया। जब कर्णके रथका चक्का जमीनमें धँस गया और वह रथसे नीचे उतरकर उसको बाहर निकालनेका प्रयत्न करने लगा, तब भगवान्ने अर्जुनसे कहा कि बाण चलाओ। अर्जुनकी समझमें बात नहीं आयी, पर समझमें न आनेपर भी उसने बाण चलाना शुरू कर दिया; क्योंकि भगवान्ने आज्ञा दे दी तो अब समझनेकी जरूरत नहीं। कर्णने कहा कि तू शास्त्र और शस्त्रविद्या—दोनोंको जानता है, फिर तू अन्याय कैसे कर रहा है? मैं नीचे खड़ा हूँ तथा अन्य काममें लगा हूँ और तू बाण चलाता है! इसका उत्तर भगवान्ने दिया कि आततायीको मारनेके लिये विचार नहीं करना चाहिये। आततायीको मारनेवालेको कोई दोष नहीं लगता—यह शास्त्रकी आज्ञा है*।
यह सुनकर अर्जुन भी समझ गये कि भगवान्ने बाण चलानेकी आज्ञा क्यों दी। इसी तरह भगवान्के चरणोंका आश्रय लो और उनकी आज्ञा समझकर कर्तव्य-कर्म करो। अपना अभिमान छोड़कर भगवान्की आज्ञाके अनुसार चलो, फिर मौज-ही-मौज है! सच्चे हृदयसे भगवान्का आश्रय लेकर निश्चिन्त रहो, निर्भय रहो, नि:शंक रहो, नि:शोक रहो। हरदम भगवान्का स्मरण करो, जप करो, कीर्तन करो और दूसरोंकी सेवा करो, उनको सुख पहुँचाओ। फिर यह चिन्ता करनेकी जरूरत नहीं कि क्या होगा, कैसे होगा, उद्धार होगा कि नहीं होगा! हाँ, एक बातका खयाल रखो कि कहीं हम भगवान्की आज्ञासे विरुद्ध तो नहीं चल रहे?
हम भगवान्के शरण कैसे हों—इसको समझनेके लिये एक दृष्टान्त है। आपके घरकी एक कन्या है, पर आप उसका विवाह (कन्यादान) कर देते हैं तो वह आपके घरकी नहीं रहती। जिस घरमें उसको दे देते हैं, वह उसी घरकी हो जाती है। उसका गोत्र भी बदल जाता है। जब पीहरमें कोई सूतक होता है तो वह उसको नहीं लगता, पर ससुरालका सूतक उसको लग जाता है! वह पीहरमें ही पैदा हुई, वहीं उसका पालन-पोषण हुआ, वहीं वह पढ़-लिखकर योग्य बनी, पर कन्यादान करनेपर वह ससुरालकी हो गयी, पीहरकी नहीं रही। इसी तरहसे आप भगवान्के हो जायँ! आप दृढ़तासे यह मान लें कि अब मैं संसारका नहीं रहा, मैं तो भगवान्का हो गया। यह गीताकी गोपनीय-से-गोपनीय सार बात है! लड़की तो विवाहके बाद ही ससुरालकी होती है, पर जीव सदासे ही भगवान्का है; क्योंकि यह भगवान्का ही अंश है—‘ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:’ (गीता१५।७)। परन्तु भगवान्को भूलकर यह दूसरोंका हो जाता है और भटकते-फिरते दु:ख पाता है। अत: शरण होनेका तात्पर्य केवल अपनी भूल मिटाना है, कोई नया काम नहीं करना है।
आप सच्चे हृदयसे यह विचार कर लें कि मैं भगवान्का हूँ तो आपका जीवन बदल जायगा। आपका जीवन महान् शुद्ध, पवित्र हो जायगा। गोस्वामीजी महाराज कहते हैं—
बिगरी जनम अनेक की सुधरै अबहीं आजु।
होहि राम को नाम जपु तुलसी तजि कुसमाजु॥
(दोहावली २२)
भगवान्के शरण होकर भगवान्का भजन, ध्यान, नामजप, कीर्तन आदि करें तो अनेक जन्मोंकी बिगड़ी हुई बात आज ही नहीं, अभी इसी क्षण सुधर जाय! आज तो बड़ा होता है। रात्रिके बारह बजेतक आज कहलाता है। परन्तु भगवान्की शरण लेनेपर तो अभी, इसी क्षण उद्धार हो जाय! इसलिये भगवान् कहते हैं—‘मा शुच:’, सब चिन्ताएँ छोड़ दो। हम भगवान्के शरण हो गये तो अब भगवान् जाने, भगवान्का काम जाने!
‘होहि राम को नाम जपु’—भगवान्का होकर नामजप किया जाय तो वह नामजप श्रेष्ठ होता है। जैसे बालक माँ-माँ करके रोता है तो वह जिस माँके लिये रोता है, वही माँ उसके पास आती है। जिनके बालक हैं, उन सब स्त्रियोंका नाम माँ है, पर बालकके पुकारनेपर सब माताएँ नहीं दौड़तीं, प्रत्युत एक वही माता दौड़ती है। कारण कि बालक केवल उसीको ‘माँ’ कहता है, सबको ‘माँ’ नहीं कहता। उस स्त्रीके कपड़े भी बढ़िया नहीं हैं, गहने भी नहीं हैं, सुन्दर शरीर भी नहीं है, पर बालक तो उसीको ‘माँ’ कहकर पुकारता है और उसीकी गोदमें जाना चाहता है। इसी तरह भक्त जिनका होकर नामजप करता है, वही (राम, कृष्ण, शंकर, दुर्गा आदि) आ जाते हैं। माँ तो अनेक स्त्रियाँ हो सकती हैं, पर भगवान् अनेक नहीं हैं। भगवान् तत्त्वसे एक ही हैं।
जैसे बालकको स्नान कराकर शुद्ध करना माँकी जिम्मेवारी है, बालककी नहीं, ऐसे ही शरणागत भक्तको शुद्ध करना भगवान्की जिम्मेवारी है, भक्तकी नहीं। शरण होनेके बाद भक्तको कोई चिन्ता करनेकी जरूरत ही नहीं है। मीराबाईने सार बात पकड़ ली थी—‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई’। इसलिये मीराबाई निश्चिन्त, निर्भय, नि:शोक और नि:शंक हो गयी थीं अर्थात् उनके मनमें न चिन्ता थी, न भय था, न शोक था, न शंका थी, प्रत्युत केवल प्रभु-चरणोंका आश्रय था। मीराबाई परदेमें रहनेवाली थीं। वे परदेमें जन्मीं, परदेमें ब्याही गयीं और परदेमें ही रहीं। एक तो स्त्री-जाति और दूसरे परदेमें रहनेवाली होते हुए भी वे अकेली वृन्दावन चली गयीं, द्वारका चली गयीं! उनके भीतर कोई भय था ही नहीं! प्रत्यक्षमें कोई सहायता करनेवाला न होनेपर भी उनके भीतर कितनी दृढ़ता थी! इसलिये ‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई’—इसके सिवाय और किसी बातको माननेकी आवश्यकता नहीं है। हम चाहे घरमें रहें, चाहे बाहर रहें, कैसी ही अवस्थामें रहें, एक भगवान्का ही आश्रय हो तो फिर किसी बातका भय नहीं।
भगवान् कहते हैं—‘मामेकं शरणं व्रज’ ‘एक मेरी शरणमें आ जा।’ ऐसा कहनेका तात्पर्य है कि अनन्यभावसे शरण लेनी चाहिये अर्थात् मैं केवल भगवान्का हूँ, और किसीका नहीं हूँ। अब जो भी कमी होगी, वह स्वत: पूरी हो जायगी। शरण होनेमें कोई कमी होगी तो वह भी पूरी हो जायगी। लड़कीका पहले पीहरमें मोह रहता है, पर वह स्वत: मिट जाता है। ससुरालमें वह माँ बन जाती है, फिर दादी-परदादी बन जाती है। फिर उसको याद ही नहीं रहता कि मैं दूसरे घरकी हूँ। पोते-परपोतेकी बहू आती है तो वह कहती है कि ‘परायी जायी’ (पराये घरमें जन्मी) छोकरीने मेरा घर बिगाड़ दिया! अब उस दादीसे कोई पूछे कि आप तो ‘घर जायी’ (इस घरमें जन्मी) हो न? पर वह अपनेको ‘परायी जायी’ मानती ही नहीं! मेरा बेटा है, मेरा पोता है, मेरा परिवार है, मैं परायी जायी कैसे हूँ? मैं तो इस घरकी मालकिन हूँ! वह उसमें इतनी तल्लीन हो जाती है कि उसी घरकी हो जाती है। ऐसे ही आप भगवान्के शरण हो जायँ। फिर उसकी पूर्णता स्वत: हो जायगी। आप सर्वथा निर्भय, नि:शोक, निश्चिन्त और नि:शंक हो जायँगे। जैसे वह बूढ़ी दादी घरकी मालकिन बन जाती है, ऐसे ही आप भी भगवान्की सम्पत्तिके मालिक बन जायँगे! ब्रह्माजी भगवान्से कहते हैं—
तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणो
भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम्।
हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते
जीवेत यो मुक्तिपदे स दायभाक्॥
(श्रीमद्भा० १०। १४। ८)
‘जो पुरुष क्षण-क्षणपर बड़ी उत्सुकतासे आपकी कृपाका ही भलीभाँति अनुभव करता रहता है और प्रारब्धानुसार जो कुछ सुख या दु:ख प्राप्त होता है, उसे निर्विकार मनसे भोग लेता है,एवं जो प्रेमपूर्ण हृदय, गद्गद वाणी और पुलकित शरीरसे अपनेको आपके चरणोंमें समर्पित करता रहता है—इस प्रकार जीवन व्यतीत करनेवाला पुरुष ठीक वैसे ही आपके परमपदका अधिकारी हो जाता है, जैसे अपने पिताकी सम्पत्तिका पुत्र!’
भगवान् कहते हैं—‘मैं तो हूँ भगतनका दास, भगत मेरे मुकुटमणि’। शरणागत भक्त अपने-आपको भगवान्को दे देता है तो भगवान् भी अपने-आपको भक्तको दे देते हैं; क्योंकि भगवान्ने कहा है—‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्’ (गीता ४। ११)।
राजा अम्बरीष भगवान्के बड़े भक्त थे। उनको तंग करनेके लिये दुर्वासा ऋषि आये। अम्बरीषने द्वादशीप्रधान एकादशी-व्रत करनेका नियम ले रखा था। जब उन्होंने व्रतका पारण करनेकी तैयारी की, तभी दुर्वासा ऋषि आ गये। अम्बरीषने उनसे भोजन करनेकी प्रार्थना की तो वे बोले कि हम स्नान-सन्ध्या करके आते हैं, फिर भोजन करेंगे। वहाँ दुर्वासाने जान-बूझकर देरी लगा दी। इधर द्वादशी घड़ीभर शेष रह गयी तो अम्बरीषने ब्राह्मणोंसे पूछा कि ‘अब मैं क्या करूँ? द्वादशी समाप्त होनेवाली है। द्वादशीके रहते-रहते पारण होना चाहिये। परन्तु ऋषिके आनेसे पहले भोजन कैसे करूँ?’ ब्राह्मणोंने आज्ञा दी कि ‘निर्जला उपवास रखनेवाला यदि तुलसीदल और चरणामृत ले लेता है तो उसका भोजन करना भी हो गया और न करना भी हो गया।’ अम्बरीषने चरणामृत ले लिया। जब दुर्वासाको पता लगा कि इसने मेरे भोजन करनेसे पहले पारण कर लिया तो उनको बड़ा क्रोध आया। उन्होंने अपनी एक जटा उखाड़ी और अम्बरीषको मारनेके लिये एक कृत्या पैदा की। अम्बरीष हाथ जोड़कर खड़े रहे। भगवान्के सुदर्शन चक्रने उस कृत्याको नष्ट कर दिया और दुर्वासाके पीछे लग गया! दुर्वासा भागते-भागते अनेक लोकोंमें गये, ब्रह्माजी और शंकरजीके पास गये, पर कोई भी उनकी चक्रसे रक्षा नहीं कर सका। फिर वे विष्णुभगवान्के पास गये और उनसे रक्षा करनेके लिये प्रार्थना की तो भगवान् बोले कि यह मेरे हाथकी बात नहीं है! मैंने तो अपना चक्र अम्बरीषको उनकी रक्षाके लिये दिया हुआ है, अब वह चक्र मेरा नहीं है!
अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज।
साधुभिर्ग्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रिय:॥
(श्रीमद्भा० ९।४।६३)
‘दुर्वासाजी! मैं सर्वथा भक्तोंके अधीन हूँ, स्वतन्त्र नहीं हूँ। मुझे भक्तजन बहुत प्रिय हैं। उनका मेरे हृदयपर पूर्ण अधिकार है।’
दुर्वासाजी वापस अम्बरीषके पास आकर उनके चरणोंमें पड़े और उनसे प्रार्थना की कि मेरेको बचाओ! तब उनको चक्रसे छुटकारा मिला। तात्पर्य है कि भगवान्की शरण होनेसे भक्त भगवान्से भी बढ़कर हो गया। इस कारण भगवान् भी सुदर्शन चक्रसे दुर्वासाकी रक्षा नहीं कर सके! सुदर्शन चक्र भी भगवान्का नहीं रहा! भगवान्ने साफ कह दिया कि भाई! मेरे हाथकी बात नहीं है। इसलिये आप सच्चे हृदयसे भगवान्के हो जायँ कि ‘हे मेरे नाथ! मैं तो आपका हूँ’ और निर्भय, नि:शोक, निश्चिन्त और नि:शंक हो जायँ।
सुग्रीव भगवान्से कहता है कि जिस तरहसे जानकीजी मिल जायँ, वैसा मैं उद्योग करूँगा*,
तो भगवान् भी कहते हैं कि तुम लोक-परलोकका सब काम मेरे भरोसे छोड़ दो—
सखा सोच त्यागहु बल मोरें।
सब बिधि घटब काज मैं तोरें॥
(मानस, किष्किन्धा० ७।५)
वही सुग्रीव जब भगवान्का काम करना भूल गया, तब भगवान्ने कहा कि जिस बाणसे मैंने बालिको मारा, उसी बाणसे सुग्रीवको मारूँगा! लक्ष्मणजीने कहा कि ‘महाराज! आपको तकलीफ करनेकी जरूरत नहीं है, यह काम तो मैं ही कर दूँगा’। तब भगवान् बोले कि ‘नहीं-नहीं, सुग्रीवको मारना मत, वह तो मेरा मित्र है। उसको केवल डरा-धमकाकर ले आओ—‘भय देखाइ लै आवहु तात सखा सुग्रीव॥ ’(किष्किन्धा० १८)। ऐसे दयालु भगवान्के रहते हमें चिन्ता करनेकी क्या जरूरत? उनके भरोसे निश्चिन्त हो जाओ। दयालुदासजी महाराजने कहा है—
बोल न जाणूं कोय अल्प बुद्धि मन वेग तें।
नहिं जाके हरि होय या तो मैं जाणूं सदा॥
(करुणासागर ७४)
यह मैं सदा जानता हूँ कि जिसका कोई नहीं होता, उसके भगवान् होते हैं। संसारका बल, आश्रय ही बाधक है। लोक-परलोक सबके लिये एक भगवच्चरणोंका आश्रय ले लो और निधड़क रहो—
जब जानकीनाथ सहाय करे
तब कौन बिगाड़ करे नर तेरो।
जब भगवान् हमारे सहायक हैं तो फिर हमारा बिगाड़ करनेवाला कोई हो ही नहीं सकता। भाई हो या बहन हो, छोटा हो या बड़ा हो, पढ़ा-लिखा हो या अपढ़ हो, धनी हो या निर्धन हो, कैसा ही क्यों न हो, जो भगवान्का भरोसा रखे, उसकी सहायताके लिये भगवान् सब समयमें तैयार हैं, सब तरहसे तैयार हैं!
उमा राम सम हित जग माहीं।
गुरु पितु मातु बंधु प्रभु नाहीं॥
(मानस,किष्किन्धा० १२।१)
भगवान्के समान हमारा हित करनेवाला दूसरा कोई नहीं है। इसलिये हृदय खोलकर भगवान्को पुकारो। मीराबाईने हमें रास्ता दिखा दिया है—‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई’। भगवान् यह नहीं देखते कि आप कैसे हो। वर्षा जब बरसती है, तब यह नहीं देखती कि जगह कैसी है, अच्छी है या मन्दी? काँटेवाले वृक्ष हैं या फलवाले? समुद्रमें जलकी कोई कमी नहीं है, पर वहाँ भी वर्षा बरस जाती है! ऐसे ही भगवान्की कृपा सबपर बरस रही है। सभी उनकी कृपाके पात्र हैं। इसलिये किसीको भी निराश होनेकी जरूरत नहीं है।
एक भरोसो एक बल एक आस बिस्वास।
एक राम घनस्याम हित चातक तुलसीदास॥
(दोहावली २७७)
चातक केवल वर्षाजलके आश्रित रहता है। एक बार चातक ऊपर उड़ रहा था। एक बहेलियेने उसको मार दिया तो वह नीचे गिर गया। नीचे गंगाजी बह रही थी। चातकने अपनी चोंच ऊपर उठा ली कि कहीं गंगाजीका जल मुखमें न चला जाय!
बध्यो बधिक परॺो पुन्य जल उलटि उठाई चोंच।
तुलसी चातक प्रेम पट मरतहुँ लगी न खोंच॥
(दोहावली ३०२)
जैसे चातकको केवल वर्षाकी बूँदका ही सहारा है, ऐसे ही केवल भगवान्का सहारा होना चाहिये। जगह-जगह भटकनेसे, दूसरोंकी गरज करनेसे क्या लाभ? एक भगवान्का आश्रय ले लें तो फिर दूसरेके आश्रयकी जरूरत ही नहीं।
बालक माँकी गोदमें बैठा होता है तो राजाको भी धमका देता है, जबकि माँ सर्वशक्तिमान् नहीं होती। फिर भगवान् तो सर्वशक्तिमान् हैं। उनमें किसी भी चीजकी, किसी भी तरहकी कोई कमी नहीं है। वे सुन्दर-से-सुन्दर, बलवान्-से-बलवान्, धनवान्-से-धनवान्, विद्वान्-से-विद्वान् हैं। वे सब तरहसे पूर्ण हैं। अर्जुन भगवान्से कहते हैं—‘न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिक: कुतोऽन्य:’ (गीता ११। ४३) ‘आपके समान भी दूसरा कोई नहीं है, फिर आपसे अधिक तो हो ही कैसे सकता है?’ ऐसे सर्वसमर्थ और अद्वितीय भगवान् हमारे हैं, फिर किस बातकी चिन्ता? हमें किंचिन्मात्र भी चिन्ता, भय, शोक करनेकी जरूरत नहीं है।
शरणागति बहुत सस्ता, सुगम और श्रेष्ठ साधन है! भगवान्ने कहा है—
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम॥
(वाल्मीकि ०६।१८।३३)
‘जो एक बार भी शरणमें आकर ‘मैं आपका हूँ’ ऐसा कहकर मुझसे रक्षाकी याचना करता है, उसे मैं समस्त प्राणियोंसे अभय कर देता हूँ—यह मेरा व्रत (नियम) है।’
एक बार कह दिया कि ‘मैं आपका हूँ’ तो फिर दूसरी बार क्या कहें? एक बार अपने-आपको दे दिया तो फिर दूसरी बार क्या दें? एक बार शरण होनेमात्रसे सब काम ठीक हो जाता है! कितने ही जन्मोंके पाप क्यों न हों, सब मिट जाते हैं। इस विषयमें दूसरे किसीकी सम्मति लेनेकी जरूरत ही नहीं है। कइयोंका आश्रय लेनेकी जरूरत नहीं, कइयोंकी गरज करनेकी जरूरत नहीं, कइयोंका भरोसा रखनेकी जरूरत नहीं, केवल एक भगवान्के हो जायँ। फिर किसीसे डरनेकी जरूरत नहीं। भगवान् पूर्ण अभय कर देंगे। हमें कोई नया काम नहीं करना है। भगवान्के तो हम सदासे हैं ही। केवल अपनी भूल मिटानी है।