परमात्मप्राप्तिमें देरी क्यों?

परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य लेकर चलनेवाले जितने भी मनुष्य हैं, उन सबको परमात्मप्राप्ति होगी, पर कब होगी? कितने जन्मोंके बाद होगी? इसका पता नहीं है। शरीरको अपना और अपने लिये मानते हुए कोई साधन करेगा तो उसको कितने जन्म लेने पड़ेंगे, कितनी योनियाँ भोगनी पड़ेंगी, इसका कुछ पता नहीं है। इसलिये मेरी शुरूसे यही लगन रही है कि मनुष्यको जल्दी परमात्मप्राप्ति कैसे हो? यद्यपि किया हुआ साधन निरर्थक नहीं जाता, तथापि परमात्माकी प्राप्ति जल्दी कैसे हो, यह लगन होनी चाहिये। लगन नहीं होगी तो कई जन्म लग जायँगे। जो वस्तु कल मिलेगी, वह आज मिलनी चाहिये, आज भी अभी मिलनी चाहिये। परमात्मा भी मौजूद हैं, आप भी मौजूद हैं, फिर देरी किस बातकी? परमात्मप्राप्तिमें देरीकी बात मेरेको सुहाती नहीं। जो काम जल्दी हो सके, उसके लिये देरी क्यों? जो काम अभी हो सके, उसके लिये कल क्यों?

श्रीशरणानन्दजी महाराजने लिखा है कि जीव-ब्रह्मकी एकता कभी हुई नहीं, कभी हो सकती नहीं। इसका तात्पर्य है कि जीवपना छूटनेपर ब्रह्मकी प्राप्ति होती है। यह सूक्ष्म विवेचन है। इसी तरह कहा जाता है कि साधुको परमात्माकी प्राप्ति नहीं होती, गृहस्थको परमात्माकी प्राप्ति नहीं होती, ब्राह्मणको परमात्माकी प्राप्ति नहीं होती तो इसका तात्पर्य है कि साधुपनेका अभिमान रहते हुए परमात्मप्राप्ति नहीं होती। ब्राह्मणपनेका अभिमान रखते हुए परमात्मप्राप्ति नहीं होती। अभिमान छूटेगा, तब प्राप्ति होगी। इन सब बातोंको कहनेका तात्पर्य यही है कि परमात्मप्राप्तिमें देरी मत करो। आपके कैसे ही पाप-ताप हों, आप कितने ही दुर्गुणी-दुराचारी हों, पर आपकी लगन लग जाय तो आज परमात्मप्राप्ति हो सकती है।

साध्यकी प्राप्ति साधकको ही हो सकती है, ब्राह्मण, साधु आदिको कैसे होगी? ब्राह्मणको ब्राह्मण-कन्या विवाहके लिये मिल सकती है, पर परमात्मा कैसे मिलेंगे? साधुको भिक्षा मिल सकती है, पर परमात्मा कैसे मिलेंगे? शरीरधारीको परमात्माकी प्राप्ति नहीं होती। साधक शरीरधारी नहीं होता और शरीरधारी साधक नहीं होता। अपनेको पुरुष या स्त्री मानेंगे तो परमात्मप्राप्ति कैसे होगी? मैं स्त्री या पुरुष हूँ ही नहीं, मैं तो भगवान‍्का हूँ—ऐसा भाव होगा तो बहुत जल्दी कल्याण हो जायगा। अपनेको स्त्री या पुरुष मानना तो सांसारिक व्यवहार (मर्यादा)-के लिये है। परन्तु पारमार्थिक मार्गमें अपनेको स्त्री या पुरुष मानेंगे तो बहुत देरी लगेगी। चिन्मयकी प्राप्ति चिन्मयको ही होगी, जड़को कैसे हो जायगी?

समताकी प्राप्तिको बहुत ऊँचा बताया गया है। सेठजी श्रीजयदयालजी गोयन्दकाने लिखा है कि गीताके अनुसार अगर समता आ गयी तो दूसरे लक्षण भले ही न आयें, परमात्मप्राप्ति हो जायगी और समता नहीं आयी तो भले ही दूसरे बड़े-बड़े लक्षण आ जायँ, परमात्मप्राप्ति नहीं होगी। वह समता ममताका त्याग करते ही आ जाती है!

तुलसी ममता राम सों, समता सब संसार।

(दोहावली ९४)

श्रीशरणानन्दजी महाराजने साफ लिखा है कि ममताको छोड़ते ही समता आ जायगी। दूसरी बात उन्होंने लिखी है कि अपने लिये तप करना भी भोग है और परमात्माके लिये झाड़ू लगाना भी पूजा है! हिरण्यकशिपुने कितनी कठोर तपस्या की! ब्रह्माजीने भी कह दिया कि ऐसी तपस्या आजतक किसीने नहीं की। परन्तु उसको तपस्यासे क्या परमात्मप्राप्ति हो गयी? उसका परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य ही नहीं था। इन बातोंका तात्पर्य परमात्मप्राप्ति जल्दी करनेमें है।

अगर परमात्माकी प्राप्ति करना चाहते हो तो अपनेको स्त्री या पुरुष न मानकर अपना सम्बन्ध परमात्माके साथ जोड़ो। शरीर तो मिला है और बिछुड़ जायगा। इस शरीरमें ही आप अटक जाओगे तो फिर परमात्मप्राप्ति कैसे होगी? परमात्माकी प्राप्ति तब होगी, जब परमात्माके साथ सम्बन्ध जोड़ोगे। कोई कपूत हो या सपूत हो, पूत तो वह है ही। कपूत भी बेटा है, सपूत भी बेटा है। अत: हम कैसे ही हों, अच्छे हों या मन्दे हों, परमात्माके ही हैं। परमात्माकी प्राप्ति न स्त्रीको होती है, न पुरुषको होती है। विवाह करना हो तो अपनेको स्त्री-पुरुष मानो। स्त्रीको पुरुष मिलेगा, परमात्मा कैसे मिलेंगे? पुरुषको स्त्री मिलेगी, परमात्मा कैसे मिलेंगे? परमात्मा तो साधकको मिलेंगे। साधक स्वयं होता है, शरीर नहीं होता। मुक्ति भी स्वयंकी होती है, शरीरकी नहीं होती। अत: हम न स्त्री हैं, न पुरुष हैं, प्रत्युत हम परमात्माके हैं। परमात्मा हमारे हैं। हम और किसीके नहीं हैं। और कोई हमारा नहीं है। जिसको प्राप्त करना हो, उसके साथ घनिष्ठ सम्बन्ध होना चाहिये। इसलिये परमात्माके साथ अपना घनिष्ठ सम्बन्ध जोड़ो। परमात्माकी प्राप्तिमें स्त्रीपना और पुरुषपना—दोनों ही बाधक हैं। अपनेको स्त्री या पुरुष माननेवाला तो शरीरमें ही बैठा है, फिर उसको परमात्मा कैसे मिलेंगे? मैं भगवान‍्का हूँ, भगवान‍् मेरे हैं—यह मान लो तो बड़ा भारी काम हो गया! यह मामूली साधन नहीं हुआ है। भगवान‍्की और आपकी जाति एक हो गयी, जो कि वास्तवमें है।

जाति, कुल, विद्या, सम्प्रदाय आदिका अभिमान परमात्माकी प्राप्तिमें बहुत बाधक है। भगवान‍् जिस जातिके हैं, उसी जातिके हम हैं। भगवान‍्के साथ हमारा सम्बन्ध असली है, बाकी सब सम्बन्ध नकली हैं। हम भगवान‍्के अंश हैं—‘ममैवांशो जीवलोके’ (गीता १५। ७)। हम संसारके अंश नहीं हैं। हम साक्षात् भगवान‍्के बेटा-बेटी हैं। सांसारिक स्त्री-पुरुष तो हम बादमें बने हैं—‘सो मायाबस भयउ गोसाईं’ (मानस, उत्तर० ११७। २)।

यहाँ शंका हो सकती है कि ‘मैं भगवान‍्की बेटी हॅूँ’—ऐसा माननेसे अपनेमें स्त्रीभाव रह जायगा! वास्तवमें ऐसी बात नहीं है। अगर भगवान‍्के साथ सम्बन्ध माननेसे स्त्रीभाव रह भी जाय तो वह मिट जायगा। भगवान‍्का सम्बन्ध ऐसा विलक्षण है कि सभी सम्बन्धोंको काट देता है। कारण कि सब सम्बन्ध झूठे हैं, पर भगवान‍्का सम्बन्ध सच्चा है। भगवान‍्ने कहा है कि जीव केवल मेरा ही अंश है—‘ममैवांशो जीवलोके’। सच्ची बातके आगे झूठी बात कैसे टिकेगी? परन्तु आप ‘मैं स्त्री हूँ या मैं पुरुष हूँ’—इस बातको ही महत्त्व देते रहोगे तो यह कैसे मिटेगा? ‘जदपि मृषा छूटत कठिनई’। इसलिये एक भगवान‍्के सिवाय दूसरेका सर्वथा निषेध कर दो—‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई’। भगवान‍् मिलें चाहे उम्रभर न मिलें, दर्शन दें चाहे न दें, पर हम तो भगवान‍्के ही हैं। भरतजी कहते हैं—

जानहुँ रामु कुटिल करि मोही।

लोग कहउ गुर साहिब द्रोही॥

सीता राम चरन रति मोरें।

अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें॥

(मानस, अयोध्या० २०५। १)

हम जैसे हैं, भगवान‍्के हैं। अच्छे हैं तो भगवान‍्के हैं, बुरे हैं तो भगवान‍्के हैं। जैसे विवाहित स्त्री भीतरसे अपनेको कुँआरी नहीं मान सकती, इसी तरह भक्त भगवान‍्के सिवाय दूसरेको अपना मान सकता ही नहीं। झूठी बात कैसे माने? भगवान‍्को हरेक आदमी अपना मान सकता है। पापी-से-पापी, दुष्ट-से-दुष्ट आदमी भी भगवान‍्को अपना मान सकता है। कारण कि यह मान्यता सच्ची है, दूसरी सब मान्यताएँ झूठी हैं। आपको हजारों आदमी कह दें कि तुम भगवान‍्के नहीं हो तो उनसे यही कहें कि आपको पता नहीं है। भगवान‍् भी कह दें कि तुम हमारे नहीं हो तो उनसे कहें कि आपको भूल हो सकती है, पर मेरेको भूल नहीं हो सकती! इतना पक्‍का विचार होना चाहिये!

अस अभिमान जाइ जनि भोरे।

मैं सेवक रघुपति पति मोरे॥

(मानस, अरण्य० ११। ११)

इस तरह दृढ़तासे भगवान‍्में अपनापन हो जाय तो फिर परमात्मप्राप्तिमें देरी नहीं लगेगी।