रुपयोंके सहारेसे हानि

हमें सबसे पहले अपने जीवनका एक उद्देश्य बनाना चाहिये कि इस जीवनमें हमें परमात्माकी प्राप्ति करनी है। चाहे सारी दुनिया हमारा विरोध करे, पर हमें अपनी आध्यात्मिक उन्नति करनी है—ऐसा पक्‍का विचार किये बिना संसार-बन्धन छूटेगा नहीं। अपना उद्देश्य, ध्येय एक बना लो, फिर सब ठीक हो जायगा। जो विधवा हो गयीं अथवा जो साधु हो गये, उनको तो सर्वथा परमात्माकी तरफ लग जाना चाहिये। इसके सिवाय उनका संसारमें क्या काम है? उनका शरीर-निर्वाह हो जायगा। कैसे होगा? यह तो भगवान‍् जानें!

प्राय: आपने समझ रखा है कि पहले अपने निर्वाहका प्रबन्ध कर लें, रुपये जमा कर लें, पीछे भजन-स्मरण करेंगे। ऐसा भाव आपकी आध्यात्मिक उन्नति नहीं होने देगा। जिन्होंने अपने पास रुपये जमा किये हुए हैं, उनकी जल्दी आध्यात्मिक उन्नति नहीं होगी। रुपयोंका सम्बन्ध आपकी आध्यात्मिक उन्नतिमें बाधा डालेगा। जिसके पास कुछ नहीं है, रोटी कहाँ मिलेगी—इसका भी पता न हो, उसकी जितनी जल्दी उन्नति होगी, उतनी जल्दी रुपये रखकर साधन करनेवालेकी नहीं होगी। कारण कि उसके भीतर रुपयोंका सहारा रहेगा। रुपयोंके सहारेसे कल्याण नहीं होगा, यह निश्चित बात है। जिसके पास रुपयों आदिका कोई सहारा न हो, रोटीका भी ठिकाना न हो कि क्या खायेंगे? कल क्या मिलेगा? उसकी उन्नति बहुत जल्दी होगी। यह बात आपको शायद न जँचे, पर मेरेको यह जँचती है। जिसका रुपयोंका सहारा रहेगा कि रुपये जमा रखकर उसके ब्याजसे काम चलायेंगे, उसकी जल्दी उन्नति नहीं होगी। रुपयोंका आश्रय रहनेसे भगवान‍्का अनन्य आश्रय नहीं होगा। कुछ भी सहारा रहेगा तो वह परमात्माकी प्राप्ति नहीं होने देगा। दीखता ऐसा है कि रुपयोंका प्रबन्ध हो जाय तो फिर निश्चिन्त होकर भजन करेंगे, पर वास्तवमें निश्चिन्त नहीं हो सकोगे।

भगवान‍्ने कहा है—

अनन्यचेता: सततं यो मां स्मरति नित्यश:।

तस्याहं सुलभ: पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिन:॥

(गीता ८।१४)

‘हे पृथानन्दन! अनन्य चित्तवाला जो मनुष्य मेरा नित्य-निरन्तर स्मरण करता है, उस नित्य-निरन्तर मुझमें लगे हुए योगीके लिये मैं सुलभ हूँ।’

यहाँ भगवान‍्ने तीन बातें कही हैं—‘अनन्यचेता:’, ‘सततम्’ और ‘नित्यश:’। इन तीनों बातोंका तात्पर्य है—१. ‘अनन्यचेता:’ अर्थात् एक भगवान‍्के सिवाय अन्य किसीका सहारा न हो, २. ‘सततम्’ अर्थात् जिस दिन परमात्मामें लगे, उस दिनसे लेकर मृत्युतक और ३.‘नित्यश:’ अर्थात् सुबहसे लेकर शामतक—नींद खुलनेसे लेकर नींद आनेतक परमात्मासे जुड़े रहें। इन तीन बातोंसे भगवान‍् सुलभ हो जाते हैं। जिसका एक भगवान‍्के सिवाय और कोई सहारा नहीं है, ऐसे अनन्यचेता मनुष्यके लिये भगवान‍्ने अपनेको सुलभ बताया है। जिसको रोटी, कपड़ा, मकान आदि किसीका कोई सहारा नहीं है, वह अगर भगवान‍्में लगे तो बहुत जल्दी उन्नति करेगा। कई आदमी कहते हैं कि हमारे पास पैसा नहीं है, पैसा होता तो भजन करते! यह बिलकुल झूठी बात है। रुपयोंका सहारा दीखता अच्छा है, पर अच्छा है नहीं। जिसके पास कुछ नहीं है, किसीका भी सहारा नहीं है, उसके ऊपर भगवान‍्की बहुत कृपा समझनी चाहिये। वह बड़ा भाग्यशाली है! उसकी बहुत जल्दी उन्नति होगी।

असत् पदार्थोंके सहारेसे ही सबका नुकसान हो रहा है। असत् के सहारेसे ही आध्यात्मिक उन्नति नहीं हो रही है। जो असत्, अनित्य वस्तुका सहारा नहीं लेता, उसकी उन्नति जरूर होगी। सहारा लेना हो तो नित्यका लो। अनित्यका सहारा दीखता तो ठीक है, पर उससे लाभ नहीं होता। रुपये जमा हो जायँगे तो उनका ब्याज आ जायगा, उस ब्याजसे काम चलेगा और निश्चिन्त होकर भजन-स्मरण करेंगे—यह असत् का सहारा है। अगर आप आध्यात्मिक उन्नति चाहते हो तो असत् का सहारा छोड़ना ही पड़ेगा। असत् का सहारा छोड़नेपर उन्नति जरूर होगी, इसमें सन्देह नहीं है। इसलिये किसीका भी सहारा मत लो, न वस्तुका, न व्यक्तिका। सत्संगसे भी लाभ लो, पर उसका सहारा मत लो। गुरुका भी सहारा मत लो। श्रीदयालुदासजी महाराजने कहा है—

बोल न जाणूं कोय अल्प बुद्धि मन वेग तें।

नहिं जाके हरि होय या तो मैं जाणूं सदा॥

(करुणासागर ७४)

तात्पर्य है कि जिसका कोई नहीं होता, उसके भगवान‍् होते हैं। परन्तु जिनको दीखता है कि हमारे पास रुपये हों तो हम भी भजन करें, वह भजन नहीं कर सकता। संसारमें देखो कि जिनके पास रुपये हैं, वे कितना भजन करते हैं? ज्यादा रुपयोंवाले सत्संग नहीं कर सकते, सत्संगमें ज्यादा ठहर नहीं सकते। मैंने ऐसे आदमियोंको देखा है, जो सत्संग करते थे। परन्तु जब उनके पास रुपये ज्यादा हो गये, तब उनका सत्संगमें आना छूट गया। संसारका सहारा बिलकुल कामका नहीं है। जिसके पास कुछ नहीं है, कोई सहारा नहीं है, वह व्यक्ति भगवान‍्को बहुत प्रिय होता है। स्वयं भगवान‍् कहते हैं—

निष्किञ्चना वयं शश्वन्निष्किञ्चनजनप्रिया:।

(श्रीमद्भा० १०।६०।१४)

‘हम सदासे अकिंचन हैं और अकिंचन लोगोंसे ही हम प्रेम करते हैं तथा अकिंचन लोग ही हमारेसे प्रेम करते हैं।’

कुन्तीदेवी भगवान‍्से कहती हैं कि आप उन लोगोंको दर्शन देते हैं, जो अकिंचन हैं—‘त्वामकिञ्चनगोचरम्’ (श्रीमद्भा०१।८।२६)। इसलिये जिसके पास अपना करके कुछ नहीं है, वह बड़ा भाग्यशाली है। उसपर भगवान‍्की बड़ी भारी कृपा है। संसारको अपना माननेसे धोखा ही होगा। संसारका सहारा टिकनेवाला नहीं है, एक दिन छूट जायगा—इसमें किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं है। अगर मनमें रुपयोंका सहारा पकड़ा हुआ रहेगा कि ब्याज आता रहेगा, हम मौजसे भजन-साधन करेंगे तो रुपयोंका भजन होगा, भगवान‍्का नहीं। असली चिन्तन रुपयोंका ही होगा। अगर संसारका सहारा छोड़ दोगे तो फिर भगवान‍्का ही सहारा रहेगा। कारण कि असत् का त्याग करनेपर सत् ही शेष रहेगा।

जिनके पास कुछ नहीं है और भीतरमें कोई इच्छा भी नहीं है, वे बड़े बड़भागी हैं। मेरा कुछ नहीं है और मेरेको कुछ नहीं चाहिये—ऐसा भाव रखनेवालेके जीवन-निर्वाहमें कमी नहीं आयेगी। कुत्तों आदिको देखो। वे बिना झोलीके फकीर हैं! उनके पास न रुपया है, न जमीन-जायदाद है, न कोई जीविका है, फिर भी उनका वंश लाखों वर्षोंसे चलता आया है। भगवान‍् श्रीरामके राज्यमें भी कुत्तेकी कथा आती है! जिनके पास ज्यादा रुपये हैं, वे खर्च नहीं कर सकते। साधुओंको रोटी भी गरीबोंके घरसे मिलती है, धनियोंके घरसे नहीं। इसका मैं भुक्तभोगी हूँ। गरीबोंके घरमें रसोईतक जा सकते हैं, पर धनियोंके घरमें प्रवेश नहीं कर सकते; क्योंकि वहाँ लाठी लिये हुए आदमी खड़ा रहता है! जिनके पास खानेको रोटी नहीं, पहननेको पूरा कपड़ा नहीं, रहनेको मकान नहीं, अण्टीमें दाम नहीं, पैरोंमें जूती नहीं, सिरपर छाता नहीं, पर एक भगवान‍्का ही सहारा है, वे सन्त-महात्मा बन जाते हैं! पैसा होनेपर भजन करेंगे—यह कोरा वहम है। मैंने धनी आदमियोंसे बात करके देखा है। उनके पास इतना रुपया है कि कई पीढ़ियाँ बिना कुछ किये उन रुपयोंसे अपना जीवन-निर्वाह कर सकती हैं, फिर भी वे रात-दिन रुपये कमानेमें ही लगे हुए हैं। अब वे भजन कैसे कर सकते हैं? रुपयोंका सहारा भजनमें बड़ा भारी विघ्न है।

मेरी सभी भाई-बहनोंसे प्रार्थना है कि आप अपना एक उद्देश्य बना लें कि हमें तो आध्यात्मिक उन्नति करनी है और ‘हे नाथ! हे मेरे नाथ!’ कहते हुए भगवान‍्को पुकारें। यह बहुत ही उत्तम एवं लाभकी बात है।