सच्ची बात
एक साधकका प्रश्न आया है कि सब कुछ भगवान् ही है—यह बात बुद्धिसे तो समझमें आती है, पर इसका स्वयंसे अनुभव कैसे हो? स्वयंसे अभी अनुभव न हो तो कोई बात नहीं, चिन्ता मत करो। बुद्धिसे भी समझमें आये या न आये, आप इतना मान लो कि बात यही सच्ची है। हमारे अनुभवमें नहीं आयी, समझमें नहीं आयी तो भी बात तो यही है। हमारी समझमें कमी है, तत्त्वमें कमी नहीं है। इसलिये सच्ची बात अवश्य बैठेगी, हटेगी नहीं। और किसीके कहनेसे माननेमें न आये तो मेरे कहनेसे मान लो। इसमें अभ्यास नहीं है। अभ्याससे अनुभव नहीं होता; क्योंकि अभ्यास जड़से होता है। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धिके बिना अभ्यास नहीं होता। जड़से चेतनकी प्राप्ति नहीं होती। चेतनकी प्राप्ति चेतनसे ही होती है। जड़से सांसारिक काम होता है। परमात्माको तो केवल मानना है, स्वीकार करना है; क्योंकि वह तो है ही ऐसा! यह गंगाजी है—इसमें अभ्यास क्या है? पहले हम इसको एक नदी मानते थे। अब किसीने बता दिया कि यह गंगाजी है तो माननेमें क्या जोर आया? ऐसे ही मान लो कि यह सब परमात्मा है। हमें अनुभव हो या न हो, बुद्धिमें आये या न आये, पर सच्ची बात तो सच्ची ही रहेगी। उसको कोई झूठी कर सकता ही नहीं। कम-से-कम सत्संग करनेवाले भाई-बहन तो इस बातको मान ही सकते हैं।
सब कुछ भगवान् ही हैं—इसको स्वीकार कर लो, बस, और कुछ नहीं करना है। स्वीकार करनेमात्रसे काम हो जायगा; क्योंकि बात है ही ऐसी। यह किसीकी बनायी हुई नहीं है। यह सब परमात्मा है—यह कच्ची बात नहीं है, पक्की बात है। इसलिये इसमें सन्देह, संशय करनेकी जरूरत नहीं है। इसको एक बार मान लिया तो बस, मान ही लिया! मनुष्य अग्निकी साक्षीमें विवाह करता है। ब्राह्मण कन्यासे कह देता है कि बेटी! तेरे पति ये हैं तो बस, वह उसको सदाके लिये अपना पति मान लेती है। अपना पति मानते ही उसका गोत्र बदल जाता है। फिर वह माँ बन जाती है, दादी बन जाती है, परदादी बन जाती है। पोते-परपोतेकी बहू आती है तो दादीजी कहती हैं—‘घर खोयो पराई जायी’ इस परायी जायी (पराये घरमें जन्मी) छोकरीने मेरा घर खो दिया, घर बिगाड़ दिया! अब उस दादीजीसे पूछो कि माँजी! आप तो घरजायी हो? दादीजीको याद ही नहीं है कि मैं भी परायी जायी हूँ! वह तो यही देखती है कि मैं दादी-परदादी हूँ और यह मेरा पोता-परपोता है, यह मेरा कुटुम्ब है! इसी तरह आप सच्ची बातको स्वीकार कर लो, फिर सब कुछ हो जायगा। भीतरसे स्वीकार कर लो कि यह सब कुछ भगवान् ही हैं। स्वीकृति करनेमें शरीरकी कोई जरूरत नहीं है। शरीर बीमार हो या स्वस्थ, स्वीकृति करनेमें कोई बाधा नहीं लगती। सब कुछ परमात्मा ही हैं—यह स्वीकार कर लो तो ‘संसार है’—यह भावना मिट जायगी और परमात्मा ही रह जायँगे, जो कि वास्तवमें हैं।
एक कहानी है। एक लड़का मुंबईमें रहता था। उसके पिताजी दूर गाँवमें रहते थे। एक बार वह लड़का बीमार हो गया। पिताको बीमारीका समाचार मिला तो विचार किया कि चलो, जाकर मिल आयें। दैवयोगसे वे जिस धर्मशालामें ठहरे थे, उनका लड़का भी उसी धर्मशालामें पासवाले कमरेमें ठहर गया। लड़केको बड़ी खाँसी आ रही थी। पिताने व्यवस्थापकको बुलाया और उससे कहा कि पासवाले कमरेमें कोई व्यक्ति खाँस रहा है, जिससे मेरेको नींद नहीं आती, इसको यहाँसे निकालो। व्यवस्थापकने उस लड़केको निकाल दिया। दूसरा कोई कमरा खाली था नहीं। अत: वह लड़का बेचारा बाहर जाकर बैठ गया। सुबह होनेपर पिता बाहर निकला। बाहर लड़केको बैठा हुआ देखा तो बोला! अरे! यह तो मेरा बेटा है! वह उसको अपने कमरेमें ले गया। जो लड़का पड़ोसमें नहीं सुहाता था, उसको अब वह अपने कमरेमें ले गया! पहले पता नहीं था कि यह मेरा ही बेटा है, अब पता लग गया तो इसमें क्या देरी लगी? क्या अभ्यास करना पड़ा? ऐसे ही आप मेरे कहनेसे मान लो कि यह सब परमात्मा ही है।
गेहूँके खेतमें अनजान आदमीको घास दीखती है, पर जानकार आदमीको गेहूँ दीखता है। कारण कि मूलमें वह गेहूँ ही था और अन्तमें उसमेंसे गेहूँ ही आयेगा। ऐसे ही इस सृष्टिके आरम्भमें भी परमात्मा ही थे और अन्तमें भी परमात्मा ही रहेंगे, फिर बीचमें दूसरी चीज कहाँसे आयी? एक परमात्मा ही अनेक रूपोंसे प्रकट हुए हैं। इसलिये मन भी वही है, बुद्धि भी वही है, प्राण भी वही है, इन्द्रियाँ भी वही है, शरीर भी वही है। स्थूलशरीर भी वही है, सूक्ष्मशरीर भी वही है और कारणशरीर भी वही है। सब कुछ वह परमात्मा ही है। दूसरा कोई है ही नहीं। आपको दीखे या न दीखे, केवल यह मान लें कि परमात्मा ही हैं। फिर दीखने लग जायगा; क्योंकि वास्तवमें है ही वही। इसमें कोई असत्य नहीं है, ठगाई नहीं है, धोखा नहीं है। बिलकुल सच्ची बात है। साक्षात् परमात्मा-ही-परमात्मा हैं। भगवान्ने सृष्टि बनायी तो कहींसे बिल्टी नहीं मँगाई, कहींसे वस्तुएँ नहीं मँगायीं। आप ही आपमेंसे बन गये। एक ही अनेकरूपसे प्रकट हो गये—‘सोऽकामयत। बहु स्यां प्रजायेयेति।’ (तैत्तिरीय० २। ६)। वे एक भगवान् इतने रूपोंमें हो गये कि उनकी गणना नहीं कर सकते—
रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मंड॥
(मानस, बाल० २०१)
हरि की लीला बड़ी अपार।
बन गये आप अकेले सब कुछ,
नाम धरा संसार॥
मात पिता गुरु स्वामी बनकर,
करे डाँट फटकार।
सुत दारा अरु सेवक बनकर,
खूब करे सतकार॥ १॥
कभी रोगका रूप बनाकर,
बनते आप बुखार।
कभी वैद्य बन दवा खिलाते,
आप करे उपचार॥ २॥
कभी भोग सुख मान बड़ाई,
हाजिर में नर नार।
कभी दुखोंका पहाड़ पटकते,
मचती हाहाकार॥ ३॥
कभी संत बनकर जीवों पर,
कृपा दृष्टि विस्तार।
अगनित जनमों का दुख संकट,
छन महँ देवे टार॥ ४॥
कभी धरनि पर संतन के हित,
धर मानुष अवतार।
अजब अनोखी लीला करते,
सुमिरत हो भव पार॥ ५॥
अगनित स्वाँग रचाते हरदम,
धन्य बड़े सरकार।
ऐसे परम कृपालू प्रभूको,
बिनवउँ बारम्बार॥ ६॥
भगवान् ही अनेक रूपोंमें लीला कर रहे हैं। न मैं है, न तू है, न यह है, न वह है। एक भगवान् ही हैं। मैं भी वही है, तू भी वही है, यह भी वही है, वह भी वही है। उनके सिवाय दूसरा कहाँसे आये? कैसे आये? दूसरा कोई है ही नहीं।
एक साधु थे। वे कहीं जा रहे थे। रास्तेमें लघुशंका करनेके लिये वे एक खेतमें बैठ गये। खेतके मालिकने देखा कि जो हमारे खेतसे मतीरा चुराता है, वह यही है। उसने आकर पीछेसे लाठी मार दी। जब देखा कि ये तो बाबाजी हैं तो माफी माँगने लगा। बाबाजी बोले कि तुमने मेरेको मारा ही नहीं, तुमने तो चोरको मारा है। वह बोला—अब क्या करूँ महाराज! बाबाजी बोले—अब तेरी जैसी मरजी! वह बाबाजीको गाड़ीमें बिठाकर शहरमें ले गया। उनकी मलहम-पट्टी करायी। बादमें एक दूसरा आदमी दूध लेकर आया और बोला कि महाराज! दूध पी लो। बाबाजी बोले—तू बड़ा अजीब है! कभी लाठी मारता है, कभी दूध लाता है! तेरी लीला विचित्र है! वह आदमी बोला कि नहीं महाराज! मैंने लाठी नहीं मारी! बाबाजी बोले कि तू बता, दूसरा आया कहाँसे? तू ही था, मैं जानता हूँ! वह आदमी घबड़ा गया कि बाबाजी मेरेको पकड़ा देंगे, फँसा देंगे! वह बार-बार कहे कि महाराज! मैंने नहीं मारा, पर बाबाजी उसकी बात माननेको राजी नहीं थे। बाबाजी यही कहते कि मैं जानता हूँ, तू ही था! यह सब तेरा ही काम है। बाबाजीकी दृष्टि भगवान्पर थी। भगवान्के सिवाय दूसरा कोई कहाँसे आये?
पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार—यह ‘अपरा प्रकृति’ है और जीव ‘परा प्रकृति’ है। ये दोनों प्रकृतियाँ भगवान्का स्वभाव होनेसे भगवत्स्वरूप ही हैं। इसलिये सब रूपोंमें भगवान्को देखकर मस्त हो जाओ! हरदम मौजमें रहो, आनन्दमें रहो! वाह, प्रभु वाह! आनन्द हो गया, कृपा हो गयी कि सब जगह, सब समय आपके ही दर्शन हो रहे हैं! पहले हम इस बातको जानते नहीं थे, अब आपकी कृपासे यह बात मिल गयी! अब पता लग गया कि प्रभो! आप ही हो, आप ही हो, आप ही हो! जड़ भी आप ही हो, चेतन भी आप ही हो। स्त्री भी आप ही हो, पुरुष भी आप ही हो। माँ भी आप ही हो, बाप भी आप ही हो। दादी भी आप ही हो, दादा भी आप ही हो। हमारे सब कुटुम्बी आप ही हो। पशु भी आप ही हो, पक्षी भी आप ही हो। जलचर-नभचर-थलचर भी आप ही हो। उद्भिज्ज-स्वेदज-अण्डज-जरायुज भी आप ही हो। आप ही नदी हो, आप ही पहाड़ हो, आप ही समुद्र हो। आप ही सूर्य हो, आप ही चन्द्रमा हो, आप ही तारा हो। आप ही मनुष्य हो, आप ही असुर हो। आप ही भूत-प्रेत हो, आप ही राक्षस हो, आप ही देवता हो। मैं भी आप ही हूँ, तू भी आप ही हो, यह भी आप ही हो, वह भी आप ही हो। ऊपर भी आप ही हो, नीचे भी आप ही हो। पूर्वमें भी आप ही हो, पश्चिममें भी आप ही हो, उत्तरमें भी आप ही हो, दक्षिणमें भी आप ही हो। ईशानमें भी आप ही हो, नैर्ऋत्यमें भी आप ही हो, आग्नेयमें भी आप ही हो, वायव्यमें भी आप ही हो। भूतकाल भी आप ही हो, वर्तमानकाल भी आप ही हो, भविष्यकाल भी आप ही हो। कालसे अतीत भी आप ही हो। जंगल भी आप ही हो, मैदान भी आप ही हो। इस मण्डप (पण्डाल)-के रूपमें भी आप ही हो। बत्ती भी आप ही हो, पंखा भी आप ही हो। खम्भा भी आप ही हो, वृक्ष भी आप ही हो। मकानरूपमें भी आप ही हो। जो दीखता है, वह भी आप ही हो और जो नहीं दीखता है, वह भी आप ही हो। सिंहरूपमें भी आप ही हो, रीछरूपमें भी आप ही हो, बन्दररूपमें भी आप ही हो। साधुरूपमें भी आप ही हो, गृहस्थरूपमें भी आप ही हो। अन्नरूपमें भी आप ही हो। तरह-तरहके फलोंके रूपमें भी आप ही हो। भूखमें भी आप ही हो, प्यासमें भी आप ही हो। सोते हुए भी आप ही हो, बैठे हुए भी आप ही हो।
तरह-तरहके रूपोंमें आप ही हो। आपके सिवाय कोई है ही नहीं, हुआ ही नहीं, होगा ही नहीं, हो सकता ही नहीं। सब रूपोंमें केवल आप-ही-आप हो। राग-रागिनी भी आप ही हो। ताल-स्वर भी आप ही हो। बाजा भी आप ही हो। गानेवाले भी आप ही हो, सुननेवाले भी आप ही हो। वक्ता भी आप ही हो, श्रोता भी आप ही हो। गाँव भी आप ही हो, घर भी आप ही हो। मिट्टी भी आप ही हो, बर्तन भी आप ही हो। अस्त्र-शस्त्र भी आप ही हो। खेल भी आप ही हो, खेलनेवाले भी आप ही हो, खिलौने भी आप ही हो। हे प्रभो! आपने कैसे-कैसे रूप धारण किये हैं। कितने-कितने रूप धारण किये हैं! अनन्त-अनन्त रूपोंमें केवल आप ही हो! आप ही हो!