अमृत-बिन्दु

शिक्षासाहस्री

अविनाशी सुख

अपने लिये सुख चाहनेसे नाशवान् सुख मिलता है और दूसरोंको सुख पहुँचानेसे अविनाशी सुख मिलता है॥ १॥

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सुख भोगनेके लिये स्वर्ग है तथा दु:ख भोगनेके लिये नरक है और सुख-दु:ख दोनोंसे ऊँचे उठकर महान् आनन्द प्राप्त करनेके लिये यह मनुष्यलोक है॥ २॥

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संसारके सम्बन्ध-विच्छेदसे जो सुख मिलता है, वह संसारके सम्बन्धसे कभी मिल सकता ही नहीं॥ ३॥

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जबतक नाशवान् का सुख लेते रहेंगे, तबतक अविनाशी सुखकी प्राप्ति नहीं होगी॥ ४॥

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भोगोंका नाशवान् सुख तो नीरसतामें बदल जाता है और उसका अन्त हो जाता है, पर परमात्माका अविनाशी सुख सदा सरस रहता है और बढ़ता ही रहता है॥ ५॥

अभिमान

अच्छाईका अभिमान बुराईकी जड़ है॥ ६॥

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स्वार्थ और अभिमानका त्याग करनेसे साधुता आती है॥ ७॥

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अपनी बुद्धिका अभिमान ही शास्त्रोंकी, सन्तोंकी बातोंको अन्त:करणमें टिकने नहीं देता॥ ८॥

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वर्ण, आश्रम आदिकी जो विशेषता है, वह दूसरोंकी सेवा करनेके लिये है, अभिमान करनेके लिये नहीं॥ ९॥

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आप अपनी अच्छाईका जितना अभिमान करोगे, उतनी ही बुराई पैदा होगी। इसलिये अच्छे बनो, पर अच्छाईका अभिमान मत करो॥ १०॥

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ज्ञान मुक्त करता है, पर ज्ञानका अभिमान नरकोंमें ले जाता है॥ ११॥

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सांसारिक वस्तुके मिलनेपर तो अभिमान आ सकता है, पर भगवान‍्के मिलनेपर अभिमान आ सकता ही नहीं, प्रत्युत अभिमानका सर्वथा नाश हो जाता है॥ १२॥

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स्वार्थ और अभिमानका त्याग किये बिना मनुष्य श्रेष्ठ नहीं बन सकता॥ १३॥

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जहाँ जातिका अभिमान होता है, वहाँ भक्ति होनी बड़ी कठिन है; क्योंकि भक्ति स्वयंसे होती है, शरीरसे नहीं। परन्तु जाति शरीरकी होती है, स्वयंकी नहीं॥ १४॥

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जबतक स्वार्थ और अभिमान हैं, तबतक किसीके भी साथ प्रेम नहीं हो सकता॥ १५॥

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अभिमानी आदमीसे सेवा तो कम होती है, पर उसको पता लगता है कि मैंने ज्यादा सेवा की। परन्तु निरभिमानी आदमीको पता तो कम लगता है, पर सेवा ज्यादा होती है॥ १६॥

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बुद्धिमानीका अभिमान मूर्खतासे पैदा होता है॥ १७॥

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जो चीज अपनी है, उसका अभिमान नहीं होता और जो चीज अपनी नहीं है, उसका भी अभिमान नहीं होता। अभिमान उस चीजका होता है, जो अपनी नहीं है, पर उसको अपनी मान लिया॥ १८॥

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जितना जानते हैं, उसीको पूरा मानकर जानकारीका अभिमान करनेसे मनुष्य ‘नास्तिक’ बन जाता है। जितना जानते हैं, उसमें सन्तोष न करनेसे तथा जानकारीका अभाव खटकनेसे मनुष्य ‘जिज्ञासु’ बन जाता है॥ १९॥

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जिन सम्प्रदाय, मत, सिद्धान्त, ग्रन्थ, व्यक्ति आदिमें अपने स्वार्थ और अभिमानके त्यागकी मुख्यता रहती है, वे महान् श्रेष्ठ होते हैं। परन्तु जिनमें अपने स्वार्थ और अभिमानकी मुख्यता रहती है, वे महान् निकृष्ट होते हैं॥ २०॥

अहंता (मैं-पन)

मैं-पन ही मात्र संसारका बीज है॥ २१॥

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शरीरको मैं-मेरा माननेसे तरह-तरहके और अनन्त दु:ख आते हैं॥ २२॥

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एक अहम् के त्यागसे अनन्त सृष्टिका त्याग हो जाता है; क्योंकि अहम् ने ही सम्पूर्ण जगत् को धारण कर रखा है॥ २३॥

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‘मैं बन्धनमें हूँ’—इसमें जो ‘मैं’ है, वही ‘मैं मुक्त हूँ’ अथवा ‘मैं ब्रह्म हूँ’—इसमें भी है! इस ‘मैं’ (अहम्)-का मिटना ही वास्तवमें मुक्ति है॥ २४॥

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जगत् , जीव और परमात्मा—ये तीनों एक ही हैं, पर अहंताके कारण ये तीन दीखते हैं॥ २५॥

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वास्तवमें असंगता शरीरसे ही होनी चाहिये। समाजसे असंगता होनेपर अहंता (व्यक्तित्व) मिटती नहीं, प्रत्युत दृढ़ होती है॥ २६॥

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हमारा स्वरूप चिन्मय सत्तामात्र है और उसमें अहम् नहीं है—यह बात यदि समझमें आ जाय तो इसी क्षण जीवन्मुक्ति है॥ २७॥

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संघर्ष जाति या धर्मको लेकर नहीं होता, प्रत्युत अहंकारसे पैदा होनेवाले स्वार्थ और अभिमानको लेकर होता है॥ २८॥

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अपनेमें विशेषता देखना अहंताको, परिच्छिन्नताको, देहाभिमानको पुष्ट करता है॥ २९॥

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भगवान‍्से उत्पन्न हुई सृष्टि भगवद्‍रूप ही है, पर जीव अहंता, आसक्ति, रागके कारण उसको जगद्‍रूप बना लेता है॥ ३०॥

उद्देश्य

जिसके लिये मनुष्यजन्म मिला है, उस परमात्मप्राप्तिका ही उद्देश्य हो जानेपर मनुष्यको सांसारिक सिद्धि-असिद्धि बाधा नहीं दे सकती॥.३१॥

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जैसे रोगीका उद्देश्य नीरोग होना है, ऐसे ही मनुष्यका उद्देश्य अपना कल्याण करना है। सांसारिक सिद्धि-असिद्धिको महत्त्व न देनेसे अर्थात् उनमें सम रहनेसे ही उद्देश्यकी सिद्धि होती है॥ ३२॥

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जब साधकका एकमात्र उद्देश्य परमात्मप्राप्तिका हो जाता है, तब उसके पास जो भी सामग्री (वस्तु, परिस्थिति आदि) होती है, वह सब साधनरूप (साधन-सामग्री) हो जाती है॥ ३३॥

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एक परमात्मप्राप्तिका दृढ़ उद्देश्य होनेसे अन्त:करणकी जितनी शीघ्र और जैसी शुद्धि होती है, उतनी शीघ्र और वैसी शुद्धि अन्य किसी अनुष्ठानसे नहीं होती॥ ३४॥

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इन्द्रियोंके द्वारा भोग तो पशु भी भोगते हैं, पर उन भोगोंको भोगना मनुष्य-जीवनका उद्देश्य नहीं है। मनुष्य-जीवनका उद्देश्य तो सुख-दु:खसे रहित तत्त्वको प्राप्त करना है॥ ३५॥

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कर्मयोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग, भक्तियोग आदि सभी साधनोंमें एक दृढ़ निश्चय या उद्देश्यकी बड़ी आवश्यकता है। यदि अपने कल्याणका उद्देश्य ही दृढ़ नहीं होगा तो साधनसे सिद्धि कैसे मिलेगी?॥ ३६॥

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एक परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य होनेपर कोई भी साधन छोटा-बड़ा नहीं होता॥ ३७॥

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वास्तवमें परमात्मप्राप्तिके सिवाय मनुष्य-जीवनका अन्य कोई प्रयोजन है ही नहीं। आवश्यकता केवल इस प्रयोजन या उद्देश्यको पहचानकर इसे पूरा करनेकी है॥ ३८॥

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उद्देश्य मनुष्यकी प्रतिष्ठा है। जिसका कोई उद्देश्य नहीं है, वह वास्तवमें मनुष्य कहलाने योग्य नहीं है॥ ३९॥

उन्नति

जो वस्तु, परिस्थिति आदि अभी नहीं है, उसको प्राप्त करनेमें अपनी उन्नति, सफलता या चतुराई मानना महान् भूल है। जो वस्तु अभी नहीं है, वह मिलनेके बाद भी सदा नहीं रहेगी—यह नियम है। जो सदासे है और सदा रहेगी, ऐसी वस्तु (परमात्मतत्त्व)-को प्राप्त करनेमें ही वास्तविक उन्नति, सफलता या चतुराई है॥ ४०॥

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पारमार्थिक उन्नति करनेवालेकी लौकिक उन्नति स्वत: होती है॥ ४१॥

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विचार करो—हम अपनी जानकारीका खुद ही निरादर करेंगे तो फिर हमारी उन्नति कैसे होगी?॥ ४२॥

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वास्तविक उन्नति है—स्वभाव शुद्ध होना॥ ४३॥

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सांसारिक उन्नति वर्तमानकी वस्तु नहीं है और पारमार्थिक उन्नति भविष्यकी वस्तु नहीं है॥ ४४॥

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जो आराम चाहता है, वह अपनी वास्तविक उन्नति नहीं कर सकता॥ ४५॥

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जिस प्रकार आकाशमें वृक्ष कितना ही ऊँचा उठे, उसकी कोई सीमा नहीं है, इसी प्रकार मनुष्यकी उन्नतिकी भी कोई सीमा नहीं है॥ ४६॥

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पारमार्थिक उन्नतिमें संयोगजन्य सुखकी लोलुपता ही खास बाधक है॥ ४७॥

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मनुष्यका उत्थान और पतन भावसे होता है, वस्तु, परिस्थिति आदिसे नहीं॥ ४८॥

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बुद्धिके अनुसार मन और मनके अनुसार इन्द्रियाँ होनेसे उत्थान होता है। परन्तु इन्द्रियोंके अनुसार मन और मनके अनुसार बुद्धि बनानेसे पतन होता है॥ ४९॥

एकान्त

शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिसे अपना सम्बन्ध न रखना ही सच्चा एकान्त है॥ ५०॥

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एकान्त मिले या समुदाय मिले, साधकको अपना साधन किसी परिस्थितिके अधीन नहीं मानना चाहिये, प्रत्युत प्राप्त परिस्थितिके अनुसार अपना साधन बनाना चाहिये॥ ५१॥

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एकान्तकी इच्छा करनेवाला परिस्थितिके अधीन होता है। जो परिस्थितिके अधीन होता है, वह भोगी होता है, योगी नहीं॥ ५२॥

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साधकका न तो जन-समुदायमें राग होना चाहिये, न एकान्तमें। कल्याण परिस्थितिसे नहीं होता, प्रत्युत रागरहित होनेसे होता है॥ ५३॥

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निर्जन-स्थानमें चले जानेको अथवा अकेले पड़े रहनेको एकान्त मान लेना भूल है; क्योंकि सम्पूर्ण संसारका बीज यह शरीर तो साथमें है ही। जबतक शरीरके साथ सम्बन्ध है, तबतक सम्पूर्ण संसारके साथ सम्बन्ध बना हुआ है॥ ५४॥

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शरीर भी संसारका ही एक अंग है। अत: शरीरसे सम्बन्ध-विच्छेद होना अर्थात् उसमें अहंता-ममता न रहना ही वास्तविक एकान्त है॥ ५५॥

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साधकमें एकान्त-सेवनकी रुचि होनी तो बढ़िया है, पर उसका आग्रह (राग) होना बढ़िया नहीं है। आग्रह होनेसे एकान्त न मिलनेपर अन्त:करणमें हलचल होगी, जिससे संसारकी महत्ता दृढ़ होगी॥ ५६॥

कर्तव्य

मनुष्य प्रत्येक परिस्थितिमें अपने कर्तव्यका पालन कर सकता है। कर्तव्यका यथार्थ स्वरूप है—सेवा अर्थात् संसारसे मिले हुए शरीरादि पदार्थोंको संसारके हितमें लगाना॥ ५७॥

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अपने कर्तव्यका पालन करनेवाले मनुष्यके चित्तमें स्वाभाविक प्रसन्नता रहती है। इसके विपरीत अपने कर्तव्यका पालन न करनेवाले मनुष्यके चित्तमें स्वाभाविक खिन्नता रहती है॥ ५८॥

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साधक आसक्तिरहित तभी हो सकता है, जब वह शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिको ‘मेरी’ अथवा ‘मेरे लिये’ न मानकर, केवल संसारकी और संसारके लिये ही मानकर संसारके हितके लिये तत्परतापूर्वक कर्तव्य-कर्मका आचरण करनेमें लग जाय॥ ५९॥

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वर्तमान समयमें घरोंमें, समाजमें जो अशान्ति, कलह, संघर्ष देखनेमें आ रहा है, उसमें मूल कारण यही है कि लोग अपने अधिकारकी माँग तो करते हैं, पर अपने कर्तव्यका पालन नहीं करते॥ ६०॥

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कोई भी कर्तव्य-कर्म छोटा या बड़ा नहीं होता। छोटे-से-छोटा और बड़े-से-बड़ा कर्म कर्तव्यमात्र समझकर (सेवाभावसे) करनेपर समान ही है॥ ६१॥

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जिससे दूसरोंका हित होता है, वही कर्तव्य होता है। जिससे किसीका भी अहित होता है, वह अकर्तव्य होता है॥ ६२॥

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राग-द्वेषके कारण ही मनुष्यको कर्तव्य-पालनमें परिश्रम या कठिनाई प्रतीत होती है॥ ६३॥

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जिसे करना चाहिये और जिसे कर सकते हैं, उसका नाम ‘कर्तव्य’ है। कर्तव्यका पालन न करना प्रमाद है, प्रमाद तमोगुण है और तमोगुण नरक है—‘नरकस्तमउन्नाह:’ (श्रीमद्भा० ११।१९।४३)॥ ६४॥

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अपने सुखके लिये किये गये कर्म ‘असत्’ और दूसरेके हितके लिये किये गये कर्म ‘सत्’ होते हैं। असत्-कर्मका परिणाम जन्म-मरणकी प्राप्ति और सत्-कर्मका परिणाम परमात्माकी प्राप्ति है॥ ६५॥

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अच्छे-से-अच्छा कार्य करो, पर संसारको स्थायी मानकर मत करो॥ ६६॥

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जो निष्काम होता है, वही तत्परतापूर्वक अपने कर्तव्यका पालन कर सकता है॥ ६७॥

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दूसरोंकी तरफ देखनेवाला कभी कर्तव्यनिष्ठ हो ही नहीं सकता, क्योंकि दूसरोंका कर्तव्य देखना ही अकर्तव्य है॥ ६८॥

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गृहस्थ हो अथवा साधु हो, जो अपने कर्तव्यका ठीक पालन करता है, वही श्रेष्ठ है॥ ६९॥

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अपने लिये कर्म करनेसे अकर्तव्यकी उत्पत्ति होती है॥ ७०॥

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अपने कर्तव्य (धर्म)-का ठीक पालन करनेसे वैराग्य हो जाता है—‘धर्म तें बिरति’ (मानस ३। १६। १)। यदि वैराग्य न हो तो समझना चाहिये कि हमने अपने कर्तव्यका ठीक पालन नहीं किया॥ ७१॥

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अपने कर्तव्यका ज्ञान हमारेमें मौजूद है। परन्तु कामना और ममता होनेके कारण हम अपने कर्तव्यका निर्णय नहीं कर पाते॥ ७२॥

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चारों वर्णों और आश्रमोंमें श्रेष्ठ व्यक्ति वही है, जो अपने कर्तव्यका पालन करता है। जो कर्तव्यच्युत होता है, वह छोटा हो जाता है॥ ७३॥

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संसारके सभी सम्बन्ध अपने कर्तव्यका पालन करनेके लिये ही हैं, न कि अधिकार जमानेके लिये। सुख देनेके लिये हैं, न कि सुख लेनेके लिये॥ ७४॥

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एकमात्र अपने कल्याणका उद्देश्य होगा तो शास्त्र पढ़े बिना भी अपने कर्तव्यका ज्ञान हो जायगा। परन्तु अपने कल्याणका उद्देश्य न हो तो शास्त्र पढ़नेपर भी कर्तव्यका ज्ञान नहीं होगा, उलटे अज्ञान बढ़ेगा कि हम जानते हैं!॥ ७५॥

कल्याण

मेरा कुछ नहीं है, मुझे कुछ नहीं चाहिये और मुझे अपने लिये कुछ नहीं करना है—ये तीन बातें शीघ्र उद्धार करनेवाली हैं॥ ७६॥

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भगवान‍्का संकल्प हमारे कल्याणके लिये है। अगर हम अपना कोई संकल्प न रखें तो भगवान‍्के संकल्पके अनुसार अपने-आप हमारा कल्याण हो जायगा॥ ७७॥

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संसारमें ऐसी कोई भी परिस्थिति नहीं है, जिसमें मनुष्यका कल्याण न हो सकता हो। कारण कि परमात्मा प्रत्येक परिस्थितिमें समानरूपसे विद्यमान हैं॥ ७८॥

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कल्याणकी प्राप्ति बहुत सुगम है, पर कल्याणकी इच्छा ही नहीं हो तो वह सुगमता किस कामकी?॥ ७९॥

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संसारका काम तो और कोई भी कर लेगा, पर अपने कल्याणका काम तो खुदको ही करना पड़ेगा; जैसे—भोजन और दवाई खुदको ही लेनी पड़ती है॥ ८०॥

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अपने कल्याणके लिये किसी नयी परिस्थितिकी जरूरत नहीं है। प्राप्त परिस्थितिके सदुपयोगसे ही कल्याण हो सकता है॥ ८१॥

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कल्याण क्रियासे नहीं होता, प्रत्युत भाव और विवेकसे होता है॥ ८२॥

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घरमें रहनेवाले सभी लोग अपनेको सेवक और दूसरोंको सेव्य समझें तो सबकी सेवा हो जायगी और सबका कल्याण हो जायगा॥ ८३॥

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भोगोंकी प्रियता जन्म-मरण देनेवाली और भगवान‍्की प्रियता कल्याण करनेवाली है॥ ८४॥

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अपना कल्याण चाहनेवाला सच्चे हृदयसे प्रार्थना करे तो भगवान‍्के दरबारमें उसकी सुनवायी जल्दी होती है॥ ८५॥

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किसीका भी कल्याण होता है तो उसके मूलमें किसी सन्तकी अथवा भगवान‍्की कृपा होती है॥ ८६॥

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संसारमें सन्त-महात्माओंकी, उपदेश देनेवालोंकी कमी नहीं है। परन्तु अपना कल्याण करनेमें खुदकी लगन, लालसा, मान्यता, श्रद्धा ही काम आती है॥ ८७॥