भगवान् हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं
हमारे और भगवान्के बीचमें जो परदा दीखता है, दूरी दीखती है, अलगाव दीखता है, वह वास्तवमें हमारा ही बनाया हुआ है, भगवान्का नहीं। कारण कि भगवान् सब जगह और सब समय विद्यमान हैं। वे हमारे भीतर भी विद्यमान हैं। इतना ही नहीं, वे हमारे माने हुए मैं-पनसे भी नजदीक विद्यमान हैं। पतित-से-पतित प्राणीके भीतर भी वे ज्यों-के-त्यों विद्यमान हैं। इसलिये साधकको चाहिये कि वह अपने ही भीतर अपने प्रेमास्पदको स्वीकार करके निश्चिन्त हो जाय। जब एक भगवान्के सिवाय अन्य किसी भी सत्ताकी मान्यता नहीं रहेगी, तब साधक अपनेमें ही अपने प्रेमास्पदको पा लेगा। परन्तु जबतक उसके भीतर ‘मैं शरीर हूँ’—ऐसी मान्यता रहेगी, तबतक वह संसारके सिवाय कुछ नहीं पायेगा।
जो अपने प्रेमास्पदको अन्य व्यक्तियों, सन्त-महात्माओं, ग्रन्थों आदिमें देखते हैं, उनको अपने प्रेमास्पदसे वियोगका अनुभव करना ही पड़ता है। परन्तु जो अपनेमें ही अपने प्रेमास्पदको देखते हैं, उनको अपने प्रेमास्पदसे वियोगका दु:ख नहीं पाना पड़ता। अपनेसे अलग प्रेमास्पदको कितना ही अपने नजदीक दीखें, उससे वियोग अवश्य ही होगा। परन्तु अपनेसे अभिन्न (अपनेमें ही) अपने प्रेमास्पदको देखनेसे प्रेमास्पदसे नित्य-सम्बन्ध हो जाता है। जबतक साधकके अन्त:करणमें अन्यकी सत्ता रहती है, तबतक वह अपने प्रेमास्पदसे नित्य-सम्बन्धका अनुभव नहीं करता, प्रत्युत अपने प्रेमास्पदको पानेके लिये संसारमें भटकता रहता है।
साधकको कभी वास्तविक तत्त्वसे निराश नहीं होना चाहिये। कारण कि साधकमें तत्त्वप्राप्तिकी पूर्ण योग्यता, अधिकार एवं सामर्थ्य है। यह नियम है कि जो सांसारिक सुख भोग सकता है, वह संसारसे विमुख होकर आनन्दका भी अनुभव कर सकता है। जो संसारमें राग-द्वेष कर सकता है, वह राग-द्वेषका त्याग करके प्रेम भी कर सकता है। जो भोगोंमें लग सकता है, वह भोगोंका त्याग करके योग भी कर सकता है। जिसको ग्रहण करना आता है, वह त्याग भी कर सकता है।
कामनायुक्त प्राणी किसीसे प्रेम नहीं कर सकता। इसलिये कामनावाला व्यक्ति सच्चा आस्तिक नहीं बन सकता। मनुष्य सच्चा आस्तिक तभी बनता है, जब उसकी दृष्टिमें एक प्रेमास्पद (भगवान्)-के सिवाय अन्य कुछ भी नहीं रहता। ऐसे सच्चे आस्तिकको भगवान्की कृपासे प्रेमकी प्राप्ति होती है। यद्यपि भगवान्की कृपा सभी प्राणियोंपर समानरूपसे है, तथापि उस कृपाका अनुभव तभी होता है, जब मनुष्य सर्वथा भगवान्का ही हो जाता है। भगवान्के सिवाय किसी अन्यकी सत्ता स्वीकार न करना ही भगवान्का हो जाना है।
एक भगवान्के सिवाय अन्य कोई भी हमारा प्रेमास्पद नहीं है। जब हम परमात्माके सिवाय अन्य किसीसे प्यार करते हैं, तब वह प्यार अपना तथा दूसरेका भी संहार करने लगता है। यह प्रेम नहीं, प्रेमोन्माद (मोह) है। अपने देशका प्रेमोन्माद ही अन्य देशका संहार कराता है। अपने सम्प्रदायका प्रेमोन्माद ही अन्य सम्प्रदायका संहार कराता है। अपनी जातिका प्रेमोन्माद ही अन्य जातिका संहार कराता है।
अगर एक भगवान्के सिवाय अन्य सभी इच्छाएँ मिट जायँ तो भगवान् बिना बुलाये आ जायँगे और संसार बिना मिटाये मिट जायगा। उनकी प्राप्तिके लिये भविष्यकी आशा रखना भूल है। अगर साधककी दृष्टिमें संसार सत्य प्रतीत होता है तो उसको दूसरोंकी सेवा करनी चाहिये। अगर उसका भगवान्में पूर्ण अपनापन नहीं है तो उसको भगवान्का भजन (नाम-जप, स्मरण, कीर्तन) करना चाहिये। अपने शरीर तथा संसारसे लेशमात्र भी सम्बन्ध न रहे—यही ‘त्याग’ है और भगवान्के सिवाय लेशमात्र भी किसी सत्ताको स्वीकार न करे—यही ‘प्रेम’ है।
जिसके भीतर कामनाएँ हैं, वह प्राणी प्रेम नहीं कर सकता। कारण कि कामनाएँ संसारकी और प्रेम परमात्माका होता है। कामनायुक्त व्यक्ति सांसारिक विषयोंका उपासक होता है और प्रेमयुक्त व्यक्ति भगवान्का उपासक होता है। संसारका उपासक परतन्त्र हो जाता है और भगवान्का उपासक स्वतन्त्र हो जाता है।
सत्-तत्त्वकी प्राप्ति किसी क्रियासे नहीं होती। कारण कि प्रत्येक क्रिया असत् में ही होती है, जबकि सत् -तत्त्वकी प्राप्ति असत् के त्यागसे होती है। कामनाओंका अन्त होनेपर असत् का भी त्याग हो जाता है और सत्-तत्त्वकी अभिलाषा जाग्रत् हो जाती है। सत्-तत्त्वकी अभिलाषा जाग्रत् होनेपर भूतकालकी स्मृति नहीं होती, वर्तमानमें सत्-तत्त्वको पानेकी व्याकुलता जाग्रत् होती है और भविष्यकी आशा मिट जाती है। सत्-तत्त्वकी अभिलाषा सम्पूर्ण कामनाओंको मिटाकर सत्-तत्त्वकी अनुभूति करा देती है।
जिनको हम सांसारिक सुख कहते हैं, वे सब वास्तवमें मनकी थकावट हैं। मनकी थकावटसे होनेवाला सुख तो मिट जाता है, पर पारमार्थिक आनन्द मिटता नहीं। वह आनन्द ही हमारा स्वरूप है। मनकी थकावट हमारा स्वरूप नहीं है।
जब संसारके सभी सुख (सुखासक्ति) मिट जाते हैं, तब उस परमसुखका अनुभव होता है, जिसका वर्णन नहीं हो सकता—‘यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं तत:’ (गीता ६। २२)। उस परमसुखका अनुभव होनेपर सभी कामनाओंका नाश हो जाता है तथा किसी प्रकारकी कोई कमी शेष नहीं रहती—‘रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते’ (गीता २। ५९)।
यदि मनुष्य दु:खसे बचना चाहे तो वह सुखकी इच्छाको मिटा दे। यदि रोगसे बचना चाहे तो भोगकी इच्छाको मिटा दे। यदि अपमानसे बचना चाहे तो सम्मानकी इच्छाको मिटा दे। यदि शोकसे बचना चाहे तो हर्षकी इच्छाको मिटा दे। तात्पर्य है कि दु:खका निर्माण स्वयं हमने किया है। हमारी इच्छाके बिना कोई हमें दु:खी, पराधीन नहीं कर सकता।
एक मार्मिक बात है कि मनुष्यको जिस वस्तुकी आवश्यकता है, उसको प्राप्त करनेकी सामर्थ्य उसमें विद्यमान है। तात्पर्य है कि मनुष्य जो कुछ कर सकता है, उसीसे उसकी आवश्यकताकी पूर्ति हो सकती है। संसार भी मनुष्यसे वही आशा करता है, जो वह कर सकता है। भगवान् भी वही आज्ञा देते हैं, जो वह कर सकता है। मनुष्य जो कर सकता है, उसको न करना ही अकर्तव्य है। जबतक मनुष्यकी वास्तविक आवश्यकताकी पूर्ति नहीं होती, तबतक उसका करना समाप्त नहीं होगा, वह कुछ-न-कुछ करता ही रहेगा। कारण कि करना साधन है, साध्य नहीं। साध्यकी प्राप्ति होनेपर साधन शेष नहीं रहता अर्थात् आवश्यकता शेष न रहनेपर करना भी शेष नहीं रहता, मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है।
परमात्माकी अनन्त शक्ति प्राणिमात्रको निरन्तर अपनी ओर खींचती रहती है। इसीलिये कोई भी परिस्थिति निरन्तर नहीं रहती। मनुष्यकी ममता कहीं भी स्थायी नहीं रहती। उसका प्रत्येक वस्तु तथा व्यक्तिसे निरन्तर सम्बन्ध-विच्छेद होता रहता है। परमात्माकी वह अनन्त शक्ति न तो मनुष्योंपर शासन करती है, न उनकी स्वतन्त्रता छीनकर उनको पराधीन बनाती है। यह नियम है कि जो वस्तु जिससे उत्पन्न होती है, अन्तमें उसीमें विलीन होती है, तभी पूर्णता होती है। जीव परमात्मासे अलग हुआ है; अतः जबतक वह परमात्मामें विलीन नहीं होगा, तबतक पूर्णता नहीं होगी, वह भटकता ही रहेगा। इसलिये परमात्माको छोड़कर अन्य वस्तु, व्यक्ति, क्रिया, अवस्था, परिस्थिति आदिकी ममता-कामनामें फँसना व्यर्थ है। उनकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करना व्यर्थ चेष्टा है। जीवकी स्वाभाविक गति परमात्मामें विलीन होनेकी ही है। जब हम अपनी स्वाभाविक गतिसे विमुख होकर अन्य वस्तु, व्यक्ति आदिके सम्मुख हो जाते हैं, तब भगवान्की कृपा उस वस्तु, व्यक्ति आदिसे वियोग करा देती है। जबतक हमारा परमात्मासे योग नहीं होगा, तबतक प्रत्येक संयोगका वियोग होता रहेगा—यह नियम है। संसारमें होनेवाला परिवर्तन निरन्तर यह शिक्षा दे रहा है कि तुम मेरेमें मत फँसो। मैं तुम्हारा लक्ष्य नहीं हूँ। तुम्हारा लक्ष्य परमात्मा है, जो निरन्तर तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है।