भगवत्प्रेमका स्वरूप और महत्त्व
जीवमात्र भगवान्का अंश है। गीतामें भगवान् कहते हैं—‘ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:’ (१५। ७)। भगवान्का अंश होनेके कारण जीवमें भगवान्के प्रति एक स्वत:सिद्ध आकर्षण है। वह आकर्षण भगवान्की तरफ होनेसे ‘प्रेम’ और नाशवान् पदार्थों तथा व्यक्तियोंके प्रति होनेसे ‘राग’ (काम, आसक्ति अथवा मोह) हो जाता है। राग तो जन्म-मरणके चक्करमें पड़े हुए सम्पूर्ण जीवोंमें रहता है, पर प्रेम केवल भगवान् तथा उनके अनन्यभक्तोंमें ही रहता है*।
रागमें सुख लेनेका भाव रहता है, प्रेममें सुख देनेका भाव रहता है। रागमें लेना-ही-लेना होता है, प्रेममें देना-ही-देना होता है। रागमें जड़ताकी मुख्यता होती है, प्रेममें चिन्मयताकी मुख्यता होती है। रागमें पराधीनता होती है, प्रेममें स्वाधीनता होती है। राग परिणाममें दु:ख देता है, प्रेम अनन्त आनन्द देता है। राग नरकोंकी तरफ ले जाता है, प्रेम भगवान्की तरफ ले जाता है। रागका भोक्ता जीव है, प्रेमके भोक्ता स्वयं भगवान् हैं।
भगवान्में भी प्रेमकी भूख रहती है। इसलिये उपनिषद् में आता है कि भगवान्का अकेलेमें मन नहीं लगा तो उन्होंने संकल्प किया कि ‘मैं एक ही अनेक रूपोंमे हो जाऊँ’। इस संकल्पसे सृष्टिकी रचना हुई—
‘एकाकी न रमते’ (बृहदारण्यक० १। ४। ३)
सोऽकामयत। बहु स्यां प्रजायेयेति।
(तैत्तिरीय० २। ६)
सदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति।
(छान्दोग्य० ६। २। ३)
इससे सिद्ध होता है कि भगवान्ने मनुष्यको अपने लिये अर्थात् प्रेमके लिये ही बनाया है। भगवान्ने मनुष्यकी रचना न तो अपने सुखभोगके लिये की है और न उसपर शासन करनेके लिये की है, प्रत्युत इसलिये की है कि वह मेरेसे प्रेम करे और मैं उससे प्रेम करूँ। तात्पर्य है कि भगवान्ने मनुष्यको अपना दास (पराधीन) नहीं बनाया है, प्रत्युत अपने समान (सखा) बनाया है। उपनिषद् में आया है—
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
(मुण्डक० ३। १। १; श्वेताश्वतर० ४। ६)
इसलिये सम्पूर्ण योनियोंमें एक मनुष्य ही ऐसा है, जो भगवान्से प्रेम कर सकता है, उनको अपना मान सकता है। जैसे, पुत्र मूढ़तावश अलग हो जाय तो माता-पिता चाहते हैं कि वह हमारे पास लौट आये, ऐसे ही भगवान् चाहते हैं कि संसारमें फँसा हुआ जीव मेरी तरफ आ जाय। भगवान्के इस प्रेमकी भूखकी पूर्ति मनुष्यके सिवाय और कोई नहीं कर सकता। देवतालोग भोगोंमें लगे हुए हैं, नारकीय जीव दु:ख पा रहे हैं और चौरासी लाख योनियोंके जीव मूढ़ता (अज्ञान, मोह)-में पड़े हुए हैं। एक मनुष्य ही ऐसा है जो अपनी मूढ़ता मिटाकर यह मान सकता है कि ‘मैं संसारका नहीं हूँ, संसार मेरा नहीं है’ और ‘मैं भगवान्का हूँ, भगवान् मेरे हैं।’
मनुष्य तो संसारमें राग करके भगवान्से विमुख हो जाता है, पर भगवान् कभी मनुष्यसे विमुख नहीं होते। भगवान्का मनुष्यके प्रति प्रेम ज्यों-का-त्यों बना रहता है—‘सब मम प्रिय सब मम उपजाए’ (मानस, उत्तर० ८६।२)। इस प्रेमके कारण ही भगवान् मनुष्यको निरन्तर अपनी ओर खींचते रहते हैं। इसकी पहचान यह है कि कोई भी अवस्था, परिस्थिति नित्य-निरन्तर नहीं रहती, बदलती रहती है। मनुष्य भगवान्के सिवाय जिस वस्तु या व्यक्तिको पकड़ता है, उसको भगवान् छुड़ा देते हैं। परन्तु अन्त:करणमें संसारका महत्त्व अधिक होनेके कारण मनुष्य भगवान्के इस प्रेमको पहचानता नहीं। अगर वह भगवान्के प्रेमको पहचान ले तो फिर उसका संसारमें आकर्षण हो ही नहीं!
मुक्ति तो उनकी भी हो सकती है, जो ईश्वरको नहीं मानते। परन्तु प्रेमकी प्राप्ति सबको नहीं होती। प्रेमकी प्राप्ति भगवान्में आत्मीयता (अपनापन) होनेसे होती है। भगवान् मुक्त अथवा ज्ञानी महापुरुषके वशमें नहीं होते, प्रत्युत प्रेमीके वशमें होते हैं—
अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज।
साधुभिर्ग्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रिय:॥
(श्रीमद्भा० ९। ४। ६३)
‘हे द्विज! मैं सर्वथा भक्तोंके अधीन हूँ, स्वतन्त्र नहीं। मुझे भक्तजन बहुत प्रिय हैं। उनका मेरे हृदयपर पूर्ण अधिकार है।’
ज्ञानीको प्रेम प्राप्त हो जाय—यह नियम नहीं है, पर प्रेमीको ज्ञान भी प्राप्त हो जाता है—यह नियम है। यद्यपि प्रेमी भक्तको ज्ञानकी आवश्यकता नहीं है, तथापि उसमें किसी प्रकारकी कमी न रहे, इसलिये भगवान् उसको अपनी तरफसे ज्ञान प्रदान करते हैं—
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तम:।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥
(गीता १०। ११)
‘उन भक्तोंपर कृपा करनेके लिये ही उनके स्वरूप (होनेपन)-में रहनेवाला मैं उनके अज्ञानजन्य अन्धकारको देदीप्यमान ज्ञानरूप दीपकके द्वारा नष्ट कर देता हूँ।’
प्रेम ज्ञानसे भी विलक्षण है। ज्ञानमें उदासीनता है, प्रेममें मिठास है। जैसे, किसी वस्तुका ज्ञान होनेपर केवल अज्ञान मिटता है, मिलता कुछ नहीं। परन्तु ‘वस्तु मेरी है’—इस तरह वस्तुमें ममता होनेसे एक रस मिलता है। तात्पर्य यह हुआ कि वस्तुके आकर्षणमें जो आनन्द है, वह वस्तुके ज्ञानमें नहीं है। इसलिये ज्ञानमें तो ‘अखण्ड आनन्द’ है, पर प्रेममें ‘अनन्त आनन्द’ है। मोक्षकी प्राप्ति होनेपर मुमुक्षा अथवा जिज्ञासा तो नहीं रहती है, पर प्रेम-पिपासा रह जाती है। भोगेच्छाका अन्त होता है, मुमुक्षा अथवा जिज्ञासाकी पूर्ति होती है, पर प्रेम-पिपासाका न अन्त होता है और न पूर्ति होती है, प्रत्युत वह प्रतिक्षण बढ़ती रहती है—‘प्रतिक्षणवर्धमानम्’ (नारदभक्ति० ५४)।
जैसे धनी आदमीको सदा धनकी कमी ही दीखती है—‘जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई’, ऐसे ही प्रेमी भक्तको सदा प्रेमकी कमी ही दीखती है। यदि अपनेमें प्रेमकी कमी न दीखे तो प्रेम प्रतिक्षण वर्धमान कैसे होगा? अपनेमें प्रेमकी कमी मानना ही ‘नित्यविरह’ है। नित्यविरह और नित्यमिलन—दोनों ही नित्य हैं। इसलिये न तो प्रियतमसे मिलनकी लालसा पूरी होती है और न प्रियतमसे वियोग ही होता है—
अरबरात मिलिबे को निसिदिन,
मिलेइ रहत मनु कबहुँ मिलै ना।
‘भगवतरसिक’ रसिक की बातें,
रसिक बिना कोउ समुझि सकै ना॥
ज्ञानमें तो तृप्ति हो जाती है—‘आत्मतृप्तश्च मानव:’ (गीता ३। १७), पर प्रेममें तृप्ति होती ही नहीं—
राम चरित जे सुनत अघाहीं।
रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं॥
(मानस, उत्तर० ५३। १)
जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना।
कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना॥
भरहिं निरंतर होहिं न पूरे।
तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह रूरे॥
(मानस, अयोध्या० १२८।२-३)
इसलिये मुक्त होनेपर भी स्वयंमें अनन्त-रसकी भूख रहती है। भगवान् श्रीरामको देखकर जीवन्मुक्त एवं तत्त्वज्ञानी राजा जनक कहते हैं—
इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा।
बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा॥
(मानस, बाल० २१६।३)
‘ब्रह्मसुख’ में ज्ञानका अखण्डरस है और ‘अति अनुराग’ में प्रेमका अनन्तरस है। प्रेमकी जागृतिके बिना स्वयंकी भूखका अत्यन्त अभाव नहीं होता।
मुक्त होनेसे पहले जीव और परमात्मामें भेद होता है, मुक्त होनेपर अभेद होता है और मुुक्त होनेके बाद जब प्रेमकी जागृति होती है, तब जीव (प्रेमी) और परमात्मा (प्रेमास्पद)-में अभिन्नता होती है। मुक्त होनेसे पहलेका भेद अहम् के कारण बाँधनेवाला होता है, पर मुक्त होनेके बाद अहम् का नाश होनेपर जो प्रेमी और प्रेमास्पदका भेद होता है, वह अनन्त आनन्द देनेवाला होता है—
द्वैतं मोहाय बोधात्प्राग्जाते बोधे मनीषया।
भक्त्यर्थं कल्पितं द्वैतमद्वैतादपि सुन्दरम्॥
(बोधसार, भक्ति० ४२)
‘बोधसे पहलेका द्वैत तो मोहमें डाल सकता है, पर बोध होनेके बाद भक्तिके लिये कल्पित अर्थात् स्वीकृत द्वैत अद्वैतसे भी अधिक सुन्दर होता है।’
भक्तियोगमें तो सीधे ही प्रेमकी प्राप्ति हो जाती है, पर ज्ञानयोगमें मुक्तिके बाद प्रेमकी प्राप्ति होती है—‘मद्भक्तिं लभते पराम्’ (गीता १८।५४)। ज्ञानयोगके जिस साधकमें भक्तिके संस्कार होते हैं, जो मुक्तिको ही सर्वोपरि नहीं मानता, ऐसे साधकको मुक्ति प्राप्त होनेके बाद भी सन्तोष नहीं होता। अत: भगवान् अपनी अहैतुकी कृपासे उसके मुक्तिके अखण्डरसको फीका कर देते हैं और अपने प्रेमके अनन्तरसकी प्राप्ति करा देते हैं। परन्तु जिस साधकमें भक्तिके संस्कार नहीं होते और जो मुक्तिको ही सर्वोपरि मानकर भक्तिका अनादर, तिरस्कार, खण्डन करता है, वह सदा मुक्त ही रहता है। उसको प्रेमकी प्राप्ति नहीं होती।
जिस साधनमें अपने उद्योगकी मुख्यता होती है, वह ‘लौकिक’ होता है और जिस साधनमें भगवान्के आश्रयकी मुख्यता होती है, वह ‘अलौकिक’ होता है। भगवान्ने कर्मयोग और ज्ञानयोग—दोनोंको ‘लौकिक निष्ठा’ बताया है—
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।
ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्॥
(गीता ३।३)
परन्तु भक्तियोग ‘अलौकिक निष्ठा’ है। कारण कि जो भगवान्के आश्रित हो जाता है, वह भगवन्निष्ठ होता है। उसका साधन और साध्य—दोनों भगवान् ही होते हैं। क्षर और अक्षर—दोनों लौकिक हैं—‘द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च’ (गीता १५।१६)। परन्तु भगवान् अलौकिक हैं—‘उत्तम: पुरुषस्त्वन्य: परमात्मेत्युदाहृत:’ (गीता १५।१७)। कर्मयोग ‘क्षर’ (जगत् )-को लेकर और ज्ञानयोग ‘अक्षर’ (जीव)-को लेकर चलता है, पर भक्तियोग भगवान्को लेकर चलता है। अत: कर्मयोग और ज्ञानयोग—ये दोनों साधन हैं और भक्तियोग साध्य है। प्रेमलक्षणा भक्ति ही सर्वोपरि प्रापणीय तत्त्व है।
लौकिक साधनावाले जो साधक मोक्षको ही सर्वोपरि मानकर भक्तिका अनादर, उपेक्षा करते हैं, वे प्रेमके तत्त्वको समझ ही नहीं सकते। परन्तु अलौकिक साधनावाला भक्त आरम्भसे ही भगवान्में अपनापन करके उनके आश्रित हो जाता है तो भगवान् उसको मोक्ष और प्रेम—दोनों प्रदान कर देते हैं।
शरीर तथा संसार ‘पर’ हैं ओर स्वयं तथा परमात्मा ‘स्व’ हैं। ‘स्व’ के दो अर्थ होते हैं—स्वयं और स्वकीय। परमात्माका अंश होनेसे हम परमात्माके हैं और परमात्मा हमारे हैं; अत: परमात्मा ‘स्वकीय’ हैं। स्वकीयकी अधीनतामें पराधीनता नहीं है, प्रत्युत असली स्वाधीनता है। जैसे, बालकके लिये माँकी अधीनता पराधीनता नहीं होती; क्योंकि माँ ‘पर’ नहीं है,प्रत्युत अपनी होनेसे ‘स्वकीय’ है। इसलिये माँकी अधीनतामें बालकका विशेष हित होता है और अपनेपर कोई जिम्मेवारी न होनेसे बालक निर्भय और निश्चिन्त रहता है।
मुक्ति प्राप्त होनेपर मुक्त महापुरुषमें अहम्की एक सूक्ष्म गंध रहती है। अहम्की यह गंध मुक्तिमें बाधक नहीं होती, प्रत्युत मुक्त महापुरुषोंमें मतभेद पैदा करनेवाली होती है। परन्तु प्रेमकी प्राप्ति होनेपर अहम् का सर्वथा नाश हो जाता है, अहम्की सूक्ष्म गंध भी नहीं रहती—
प्रेम भगति जल बिनु रघुराई।
अभिअंतर मल कबहुँ न जाई॥
(मानस, उत्तर० ४९।३)
कर्मयोग और ज्ञानयोग—दोनोंका परिणाम एक ही होता है*। दोनोंके परिणाममें मनुष्य मुक्त हो जाता है; अर्थात् जन्म-मरणसे, सम्पूर्ण दु:खोंसे छूट जाता है और स्वाधीन हो जाता है। मुक्त होनेपर संसारकी निवृत्ति तो हो जाती है, पर प्राप्ति कुछ नहीं होती। परन्तु भक्तियोगसे संसारकी निवृत्तिके साथ-साथ परमात्माकी तथा उनके प्रेमकी प्राप्ति भी हो जाती है। मुक्तिमें तो जीव स्वयं जीवन्मुक्तिके रसका आस्वादन करनेवाला होता है, पर प्रेम (पराभक्ति)-की प्राप्ति होनेपर वह रसका दाता हो जाता है! भगवान्को भी रस देनेवाला हो जाता है! जैसे कोई मनुष्य गंगाजलसे गंगाकी पूजा करे तो इसमें गंगाकी ही विशेषता हुई, मनुष्यकी नहीं। ऐसे ही भक्त भगवान्के दिये हुए प्रेमसे ही उनको रस देता है तो इसमें भगवान्की ही विशेषता हुई।
प्रेमकी प्राप्ति अपने बल, योग्यता, विद्या, यज्ञ, तप आदि साधनोंसे नहीं होती, प्रत्युत भगवान्को अपना माननेसे होती है। बल, योग्यता आदिके बदले जो वस्तु मिलेगी, वह बल, योग्यता आदिसे कम मूल्यकी ही होगी। अगर किसी साधनके बदले साध्य मिलेगा तो वह साधनसे तुच्छ ही होगा और ऐसा साध्य मिलकर भी हमें क्या निहाल करेगा? इसलिये भगवान्को अपना माने बिना प्रेम-प्राप्तिका दूसरा कोई साधन हो ही नही सकता; क्योंकि भगवान् वास्तवमें अपने हैं। अपना वही होता है जो कभी हमारेसे बिछुड़ता नहीं। एक भगवान् ही ऐसे हैं, जो हमारेसे कभी बिछुड़ते नहीं, सदा हमारे साथ रहते हैं—‘सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्ट:’ (गीता १५।१५)।
भगवान् भक्तके अपनेपन (आत्मीयता)-को देखते हैं, यह नहीं देखते कि यह कैसा है, बद्ध है या मुक्त? जैसे बालक माँको पुकारता है तो वह बालकके बल, योग्यता, विद्या आदिको न देखकर उसके अपनेपनको देखती है और उसको गोदमें ले लेती है। ऐसे ही जब भक्त अपनी स्थितिसे असन्तुष्ट होकर भगवान्को पुकारता है, तब भगवान् उसको अपना प्रेम प्रदान कर देते हैं।
जब जीव अपनेसे भी अधिक शरीर-संसारको महत्त्व देता है, तब वह बँध जाता है। जब वह शरीर-संसारसे भी अधिक अपनेको महत्त्व देता है, तब वह मुक्त हो जाता है। जब वह अपनेसे भी अधिक भगवान्को महत्त्व देता है, तब वह भक्त (प्रेमी) हो जाता है। प्रेमकी प्राप्ति होनेपर भक्त और भगवान् कभी दो हो जाते हैं, कभी एक हो जाते हैं। जब भक्त अपनी तरफ देखता है, तब ‘मैं भगवान्का हूँ, भगवान् मेरे हैं’—ऐसा अनुभव होनेसे भक्त और भगवान् दो हो जाते हैं। जब भक्त भगवान्की तरफ देखता है, तब ‘एक भगवान्के सिवाय कुछ नहीं है’—ऐसा अनुभव होनेसे भक्त और भगवान् एक हो जाते हैं। इस प्रकार द्वैत और अद्वैत दोनों होनेसे ही प्रेम प्रतिक्षण वर्धमान होता है अर्थात् उसमें उत्तरोत्तर वृद्धि होती रहती है, कभी पूर्णता नहीं आती।