गीताकी विलक्षणता

धर्मभूमि कुरुक्षेत्रमें कौरवों और पाण्डवोंकी सेनाएँ आमने-सामने खड़ी हैं। दोनों सेनाओंके मध्यमें एक विशाल रथ खड़ा है, जिसमें भगवान् श्रीकृष्ण सारथि-रूपसे और अर्जुन रथी-रूपसे विराजमान हैं। कौरवसेनामें अपने स्वजनोंको देखकर अर्जुन भयभीत हो जाते हैं। वे युद्धसे नहीं, प्रत्युत अधर्मसे भयभीत होते हैं। कारण कि अर्जुन कल्याणके इच्छुक थे (२।७, ३।२, ५।१) और यह कदापि नहीं चाहते थे कि उनके कल्याणमें कोई बाधा लगे। कल्याण युद्ध करनेमें है अथवा न करनेमें—इस विषयमें अर्जुन किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते हैं। वे भगवान् श्रीकृष्णको अपना प्रिय सखा मानते थे, पर आज पहली बार शरणागत होकर, अपनेको शिष्य मानकर भगवान‍्से अपने कल्याणका उपाय पूछते हैं—‘यच्छ्रेय: स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्’ (२।७)। युद्ध करने अथवा न करनेका कल्याणसे कोई सम्बन्ध नहीं है—यह बतानेके लिये भगवान् बड़े विलक्षण ढंगसे अपने उपदेशका आरम्भ करते हैं।

कल्याणके सभी साधनोंमें विवेककी अत्यधिक आवश्यकता है। मनुष्यशरीरकी जो महिमा गायी गयी है, वह महिमा विवेककी है, मनुष्यशरीरकी नहीं। इसलिये भगवान् सर्वप्रथम सत्-असत् के विवेकका विवेचन करते हैं। इस विवेचनकी खास बात है—‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:’ (२।१६) अर्थात् असत् (नाशवान्)-की सत्ता विद्यमान है ही नहीं और सत् (अविनाशी)-की सत्ता सदा ही विद्यमान है, उसका अभाव कभी होता ही नहीं, हो सकता ही नहीं। इस विषयको समझानेके लिये गीताने ‘असत्’ को शरीर, देह, क्षेत्र आदि नामोंसे और ‘सत्’ को शरीरी, देही, क्षेत्रज्ञ आदि नामोंसे कहा है। यदि वास्तविक दृष्टिसे देखें तो एक चिन्मय सत्तामात्रमें न असत् है, न सत् ; न शरीर है, न शरीरी; न देह है, न देही। ये शब्द केवल अज्ञानी मनुष्योंको समझानेके लिये ही कहे जाते हैं। उस परमतत्त्वको अनिर्वचनीय बतानेके उद्देश्यसे गीताने इसे अनेक प्रकारसे कहा है; जैसे—

(१) परमात्मतत्त्व सत् भी है और असत् भी—‘सदसच्चाहम्’ (९।१९)।

(२) परमात्मतत्त्व सत् भी है, असत् भी है और सत्-असत् से पर भी है—‘सदसत्तत्परं यत्’ (११।३७)।

(३) परमात्मतत्त्व न सत् है और न असत् है—‘न सत्तन्नासदुच्यते’ (१३।१२)।

तात्पर्य है कि सत्-तत्त्वका अनुभव तो किया जा सकता है, पर वर्णन नहीं किया जा सकता। एक चिन्मय सत्तामात्रके सिवाय कुछ नहीं है। इस सत्ताका कभी किंचिन्मात्र भी परिवर्तन अथवा अभाव नहीं होता। परन्तु शरीर और संसारका प्रतिक्षण परिवर्तन और अभाव हो रहा है। शरीर मिला है और बिछुड़नेवाला है। उस शरीरको मैं, मेरा तथा मेरे लिये मानना जीवकी मूल भूल है, जिससे वह बन्धनमें पड़ा है। इस भूलको मिटानेके लिये ही भगवत्कृपासे जीवको विवेकप्रधान मनुष्यशरीर मिला है। उत्पन्न होना, सत्तावाला दीखना, बदलना, घटना और नष्ट होना—ये छहों विकार शरीरमें ही होते हैं। शरीरी (आत्मा अर्थात् चिन्मय सत्ता)-तक ये विकार पहुँचते ही नहीं, पहुँच सकते ही नहीं। अंधकार सूर्यतक पहुँच ही कैसे सकता है!

जिस कल्याणकी प्राप्ति विवेकप्रधान ज्ञानयोगसे होती है, उसी कल्याणकी प्राप्ति कर्मयोगसे भी हो सकती है। यह अन्य शास्त्रोंकी अपेक्षा गीताकी विलक्षणता है। कल्याणकी प्राप्तिमें ज्ञानयोग और कर्मयोग—दोनों ही साधनोंको भगवान् समकक्ष बताते हैं—

सन्न्यास: कर्मयोगश्च नि:श्रेयसकरावुभौ।

(५।२)

एकमप्यास्थित: सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्॥

(५।४)

यत्सांख्यै: प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते।

(५।५)

इन दोनों ही साधनोंको भगवान् लौकिक बताते हैं (३।३)। इन साधनोंसे साधककी बुद्धि समतामें स्थिर हो जाती है। ज्ञानयोगमें अपने विवेकको महत्त्व देनेसे समता आती है और कर्मयोगमें निष्कामभावसे अपने कर्तव्यका पालन करनेसे समता आती है।

अन्य शास्त्रोंमें यह बात प्रसिद्ध है कि मुमुक्षा जाग्रत् होनेपर कर्मोंका स्वरूपसे त्याग कर देना चाहिये; जैसे—

परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो

निर्वेदमायान्नास्त्यकृत: कृतेन।

तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्

समित्पाणि: श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्॥

(मुण्डक० १।२।१२)

‘कर्मसे प्राप्त किये जानेवाले लोकोंकी परीक्षा करके ब्राह्मण वैराग्यको प्राप्त हो जाय, यह समझ ले कि किये जानेवाले कर्मोंसे परमात्मतत्त्व नहीं मिल सकता। वह उस ब्रह्मज्ञानको प्राप्त करनेके लिये हाथमें समिधा लेकर श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरुके पास जाय।’

तावत् कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता।

(श्रीमद्भा० ११।२०।९)

‘तभीतक कर्म करना चाहिये, जबतक वैराग्य न हो जाय।’

परन्तु गीताके अनुसार कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करना असम्भव है—

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।

कार्यते ह्यवश: कर्म सर्व: प्रकृतिजैर्गुणै:॥

(३।५)

‘कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्थामें क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता; क्योंकि प्रकृतिके परवश हुए सब प्राणियोंसे प्रकृतिजन्य गुण कर्म करवा लेते हैं।’

इसलिये भगवान् कर्मोंके त्यागका उपदेश न देकर फलेच्छाके त्यागका उपदेश देते हैं—

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

(२।४ ७)

‘कर्तव्य-कर्म करनेमें ही तेरा अधिकार है, फलोंमें कभी नहीं। अत: तू कर्मफलका हेतु भी मत बन और तेरी कर्म न करनेमें भी आसक्ति न हो।’

एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च।

कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्॥

(१८।६)

‘हे पार्थ! इन (यज्ञ, दान और तपरूप) कर्मोंको तथा दूसरे भी कर्मोंको आसक्ति और फलोंकी इच्छाका त्याग करके करना चाहिये—यह मेरा निश्चित किया हुआ उत्तम मत है।’

कर्म स्वभावसे ही मनुष्यको बाँधनेवाले हैं—‘कर्मणा बध्यते जन्तु:’। परन्तु भगवान‍्ने कर्मोंकी बन्धनकारक शक्तिको नष्ट करके उन्हें भी कल्याणके योग्य बना दिया है—‘योग: कर्मसु कौशलम्’ (२। ५०) ‘कर्मोंमें योग ही कुशलता है’। तात्पर्य है कि जो कर्म स्वभावसे ही मनुष्यको बाँधनेवाले हैं, वे ही योग (समता अथवा निष्कामभाव)-पूर्वक करनेसे मुक्ति देनेवाले हो जाते हैं। इसलिये भगवान् स्पष्टरूपसे आज्ञा देते हैं—

तस्मादसक्त: सततं कार्यं कर्म समाचर।

असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुष:॥

(३।१९)

‘इसलिये तू निरन्तर आसक्तिरहित होकर कर्तव्य-कर्मका भलीभाँति आचरण कर; क्योंकि आसक्तिरहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्माको प्राप्त हो जाता है।’

केवल साधकके लिये ही नहीं, सिद्ध महापुरुषके लिये भी भगवान् आज्ञा देते हैं—

सक्ता: कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत।

कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसङ्ग्रहम्॥

(३। २५)

‘हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! कर्ममें आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार कर्म करते हैं, आसक्तिरहित तत्त्वज्ञ महापुरुष भी लोकसंग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार कर्म करे।’

इतना ही नहीं, सबसे बढ़कर प्रमाण भगवान् अपना देते हैं—

न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन।

नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥

(३। २२)

‘हे पार्थ! मुझे तीनों लोकोंमें न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई प्राप्त करनेयोग्य वस्तु अप्राप्त है, फिर भी मैं कर्तव्य-कर्ममें ही लगा रहता हूँ।’

गीताके अनुसार मनुष्य युद्ध-जैसे घोर कर्म करते हुए भी अपना कल्याण कर सकता है, इससे बढ़कर और क्या बात होगी—

सुखदु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।

ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥

(२। ३८)

‘जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दु:खको समान करके फिर युद्धमें लग जा। इस प्रकार युद्ध करनेसे तू पापको प्राप्त नहीं होगा।’

यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।

हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥

(१८।१७)

‘जिसका अहंकृतभाव (‘मैं कर्ता हूँ’—ऐसा भाव) नहीं है और जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती, वह युद्धमें इन सम्पूर्ण प्राणियोंको मारकर भी न मारता है और न बँधता है।’

ज्ञानयोग और कर्मयोग—दोनों ही साधनोंमें निश्चयात्मिका बुद्धिका होना अनिवार्य है—

‘व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन’

(२। ४१)

‘व्यवसायात्मिका बुद्धि: समाधौ न विधीयते’

(२। ४४)

‘नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य’

(२। ६६)

इसलिये साधन सिद्ध होनेपर मनुष्य स्थितप्रज्ञ हो जाता है अर्थात् उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है—

‘समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि’

(२। ५३)

‘आत्मन्येवात्मना तुष्ट: स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते’

(२। ५५)

‘स्थितधीर्मुनिरुच्यते’

(२। ५६)

‘तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता’

(२। ५७-५८। ६१, ६८)

‘बुद्धि: पर्यवतिष्ठते’

(२। ६५)

बुद्धि स्थिर होनेसे मनुष्य मुक्त हो जाता है, जन्म-मरणके चक्रसे छूट जाता है। परन्तु मुक्त होनेपर भी उसमें सूक्ष्म अहम् रह जाता है। कारण कि अहम् बुद्धिसे परे है—

‘मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धे: परतस्तु स:’

(३। ४२)*

भूमिरापोऽनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च।

अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥

(७।४)

इस अहम् का सर्वथा नाश भक्तियोगमें ही होता है। कारण कि भक्तियोगमें भक्तकी बुद्धि व्यवसित नहीं होती, प्रत्युत भक्त स्वयं (जो कि भगवान‍्का अंश है) व्यवसित होता है—‘सम्यग्व्यवसितो हि स:’ (९।३०)। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहम्—यह अपरा प्रकृति है और स्वयं परा प्रकृति है (७।४-५)। इसलिये गीता भक्तियोग (पराभक्ति)-की प्राप्तिमें ही साधनकी पूर्णता मानती है। यही विशेषता गीताको अन्य दर्शनशास्त्रोंसे भिन्न करती है।

सभी दर्शनशास्त्र दु:खोंके नाशको अर्थात् मोक्षको ही मानवजीवनका चरम लक्ष्य मानते हैं, इसलिये उनमें ईश्वरका स्थान गौण है। परन्तु गीतामें ईश्वरकी मुख्यता है। गीता मोक्षके बाद पराभक्ति-(परम प्रेम) प्राप्त होनेकी बात कहती है—‘सम: सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्’ (१८।५४)।* तात्पर्य है कि कर्मयोग तथा ज्ञानयोग तो साधन हैं, पर भक्तियोग साध्य है। इसलिये क्षरकी प्रधानतावाला कर्मयोग तथा अक्षरकी प्रधानतावाला ज्ञानयोग तो लौकिक एवं करणसापेक्ष है—‘द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च’ (१५।१६); परन्तु परमात्माकी प्रधानतावाला भक्तियोग अलौकिक एवं करणनिरपेक्ष है—‘उत्तम: पुरुषस्त्वन्य: परमात्मेत्युदाहृत:’ (१५।१७)।

गीताका कर्मयोग और ज्ञानयोग भी ईश्वर-भक्तिसे रहित नहीं है; जैसे, कर्मयोगमें—

‘युक्त आसीत मत्पर:’

(२।६१)

‘कर्मयोगी साधक मेरे परायण होकर बैठे।’

और ज्ञानयोगमें—

‘मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी’

(१३।१०)

‘मुझमें अनन्ययोगके द्वारा अव्यभिचारिणी भक्तिका होना (ज्ञानप्राप्तिका उपाय है)।’

‘मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते’

(१४।२६)

‘जो मनुष्य अव्यभिचारी भक्तियोगके द्वारा मेरा सेवन करता है (वह गुणातीत हो जाता है)।’

ध्यानयोगमें भी गीता कहती है—

‘मन: संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्पर:’

(६।१४)

‘सावधान ध्यानयोगी मनका संयम करके मुझमें चित्त लगाता हुआ मेरे परायण होकर बैठे।’

इस प्रकार अन्य दर्शनशास्त्रोंमें ईश्वरवादका जो अभाव दीखता है, वह अभाव गीताने मिटा दिया है। साधक कितनी ही ऊँची अवस्थाको प्राप्त हो जाय, जबतक वह ईश्वरको प्राप्त नहीं होता, तबतक उसका आवागमन नहीं मिटता, इस बातको गीताने स्पष्ट कर दिया है—

आब्रह्मभुवनाल्लोका: पुनरावर्तिनोऽर्जुन।

मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते॥

(८।१६)

‘हे अर्जुन! ब्रह्मलोकतक सभी लोक पुनरावर्ती हैं अर्थात् वहाँ जानेपर पुन: लौटकर संसारमें आना पड़ता है; परन्तु हे कौन्तेय! मुझे प्राप्त होनेपर पुनर्जन्म नहीं होता।’

‘यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम’

(८।२१)

‘जिसे प्राप्त होनेपर जीव फिर लौटकर संसारमें नहीं आते, वह मेरा परम धाम है।’

‘यद‍्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम’

(१५।६)

‘जिसको प्राप्त होकर जीव लौटकर संसारमें नहीं आते, वही मेरा परम धाम है।’

फलासक्ति तथा कर्तृत्वाभिमानके त्यागका उपदेश तो अन्य शास्त्रोंमें भी मिलता है, पर सम्पूर्ण कर्मोंको भगवदर्पण करनेका उपदेश विशेषरूपसे गीतामें ही मिलता है—

‘मयि सर्वाणि कर्माणि सन्न्यस्याध्यात्मचेतसा’

(३।३०)

‘तू विवेकवती बुद्धिके द्वारा सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्मोंको मेरे अर्पण कर।’

यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।

यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥

(९।२७)

‘हे कुन्तीपुत्र! तू जो कुछ करता है, जो कुछ भोजन करता है, जो कुछ यज्ञ करता है, जो कुछ दान देता है और जो कुछ तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर दे।’

‘मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि’

(१२।१०)

‘मेरे लिये कर्मोंको करता हुआ भी तू सिद्धिको प्राप्त हो जायगा।’

गीतामें भगवान् सम्पूर्ण योगियोंमें भी अपने (सगुणोपासक) भक्तको सर्वश्रेष्ठ योगी मानते हैं—

योगिनामपि सर्वेषां मद‍्गतेनान्तरात्मना।

श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मत:॥

(६।४७)

‘सम्पूर्ण योगियोंमें भी जो श्रद्धावान् भक्त मुझमें तल्लीन हुए मनसे मेरा भजन करता है, वह मेरे मतमें सर्वश्रेष्ठ योगी है।’

कारण कि भक्त भगवान‍्के समग्ररूपको जान लेता है—

‘असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु’

(७।१)

‘भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वत:’

(१८।५५)१

ब्रह्म (निर्गुण-निराकार), अध्यात्म (अनन्त योनियोंके अनन्त जीव), कर्म (उत्पत्ति-स्थिति-प्रलय आदिकी सम्पूर्ण क्रियाएँ), अधिभूत (अपने शरीरसहित सम्पूर्ण पांचभौतिक शरीर), अधिदैव (मन-इन्द्रियोंके अधिष्ठातृ देवतासहित ब्रह्माजी आदि सभी देवता) और अधियज्ञ (अन्तर्यामी विष्णु और उनके सभी रूप)—यह भगवान‍्का समग्र रूप है२। तात्पर्य है कि भक्तको ‘सब कुछ परमात्मा ही हैं’—इस तत्त्वका अनुभव हो जाता है, जो अत्यन्त दुर्लभ है—‘वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ:’ (७।१९)। गीतामें ‘महात्मा’, ‘युक्ततम’, ‘सर्ववित्’ आदि विशेषण भी भक्तके लिये ही आये हैं।३ इससे सिद्ध होता है कि गीतामें भगवद्भक्तका सर्वाधिक आदर किया गया है। भगवान‍्ने भी स्पष्टरूपसे अपने भक्तका ही पक्ष लिया है—

समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रिय:।

ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥

(९।२९)

‘मैं सम्पूर्ण प्राणियोंमें समान हूँ। उन प्राणियोंमें न तो कोई मेरा द्वेषी है और न कोई प्रिय है। परन्तु जो प्रेमपूर्वक मेरा भजन करते हैं, वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें हूँ।’

सम्पूर्ण वेदोंका सार उपनिषद् हैं और उपनिषदोंका सार गीता है। जैसे आमके वृक्षमें जड़से लेकर पत्तोंतक रस विद्यमान रहता है, पर जो रस उसके फलमें है, वह जड़, टहनी, पत्तों आदिमें नहीं है। ऐसे ही सम्पूर्ण वेदों, उपनिषदों, शास्त्रोंका सार होनेपर भी जो विलक्षणता गीतामें है, वह वेदों, उपनिषदों, शास्त्रों आदिमें नहीं है। वेद भगवान‍्के नि:श्वास हैं—‘यस्य नि:श्वसितं वेदा:’ और गीता भगवान‍्की वाणी है। नि:श्वास तो स्वाभाविक होते हैं, पर गीता भगवान‍्ने विशेषरूपसे कही है। बड़े-बड़े ऋषि-मुनियोंकी वाणीसे भी भगवान‍्की वाणी विलक्षण है; क्योंकि भगवान् ऋषि-मुनियोंके भी आदि हैं—‘अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वश:’ (१०।२)। इसलिये सभी दर्शनशास्त्र गीताके अन्तर्गत आ जाते हैं, पर गीता किसी दर्शनशास्त्रके अन्तर्गत नहीं आती। गीता एक स्वतन्त्र ग्रन्थ है। यदि गीताके भावोंको समझना हो उसमें केवल कल्याणकी इच्छा काम आयेगी। कोई गीताको समझना चाहे तो उसे किसी शास्त्र, सम्प्रदाय, योग्यता, बुद्धिमत्ता आदिका आग्रह छोड़कर और केवल भगवान‍्का आश्रय लेकर गीताका अध्ययन करना चाहिये।

भगवान‍्के द्वारा गीता अर्जुनको निमित्त बनाकर मानवमात्रके कल्याणके लिये कही गयी है। अत: गीताके अनुसार मानवमात्र अपना कल्याण करनेमें सर्वथा स्वतन्त्र, योग्य, समर्थ और अधिकारी है। इसलिये गीता सम्पूर्ण शास्त्रोंसे विलक्षण है—इसमें सन्देहका अवकाश नहीं है।