कहानियाँ

१. भगवान‍्की कृपा

एक राजा था। उसका मन्त्री भगवान‍्का भक्त था। कोई भी बात होती तो वह यही कहता कि भगवान‍्की बड़ी कृपा हो गयी! एक दिन राजाके बेटेकी मृत्यु हो गयी। मृत्युका समाचार सुनते ही मन्त्री बोल उठा—भगवान‍्की बड़ी कृपा हो गयी! यह बात राजाको बुरी तो लगी, पर वह चुप रहा। कुछ दिनोंके बाद राजाकी पत्नीकी भी मृत्यु हो गयी। मन्त्रीने कहा—भगवान‍्की बड़ी कृपा हो गयी! राजाको गुस्सा आया, पर उसने गुस्सा पी लिया, कुछ बोला नहीं। एक दिन राजाके पास एक नयी तलवार बनकर आयी। राजा अपनी अँगुलीसे तलवारकी धार देखने लगा तो धार बहुत तेज होनेके कारण चट उसकी अँगुली कट गयी! मन्त्री पासमें ही खड़ा था। वह बोला—भगवान‍्की बड़ी कृपा हो गयी! अब राजाके भीतर जमा गुस्सा बाहर निकला और उसने तुरन्त मन्त्रीको राज्यसे बाहर निकल जानेका आदेश दे दिया और कहा कि मेरे राज्यमें अन्न-जल ग्रहण मत करना। मन्त्री बोला—भगवान‍्की बड़ी कृपा हो गयी! मन्त्री अपने घरपर भी नहीं गया, साथमें कोई वस्तु भी नहीं ली और राज्यके बाहर निकल गया।

कुछ दिन बीत गये। एक बार राजा अपने साथियोंके साथ शिकार खेलनेके लिये जंगल गया। जंगलमें एक सूअरका पीछा करते-करते राजा बहुत दूर घने जंगलमें निकल गया। उसके सभी साथी बहुत पीछे छूट गये। वहाँ जंगलमें डाकुओंका एक दल रहता था। उस दिन डाकुओंने काली देवीको एक मनुष्यकी बलि देनेका विचार किया हुआ था।

संयोगसे डाकुओंने राजाको देख लिया। उन्होंने राजाको पकड़कर बाँध दिया। अब उन्होंने बलि देनेकी तैयारी शुरू कर दी। जब पूरी तैयारी हो गयी, तब डाकुओंके पुरोहितने राजासे पूछा—तुम्हारा बेटा जीवित है? राजा बोला—नहीं, वह मर गया। पुरोहितने कहा कि इसका तो हृदय जला हुआ है। पुरोहितने फिर पूछा—तुम्हारी पत्नी जीवित है? राजा बोला—वह भी मर चुकी है। पुरोहितने कहा कि यह तो आधे अंगका है। अत: यह बलिके योग्य नहीं है। परन्तु हो सकता है कि यह मरनेके भयसे झूठ बोल रहा हो! पुरोहितने राजाके शरीरकी जाँच की तो देखा कि उसकी अँगुली कटी हुई है। पुरोहित बोला—अरे! यह तो अंग-भंग है, बलिके योग्य नहीं है! छोड़ दो इसको! डाकुओंने राजाको छोड़ दिया।

राजा अपने घर लौट आया। लौटते ही उसने अपने आदमियोंको आज्ञा दी कि हमारा मन्त्री जहाँ भी हो, उसको तुरन्त ढूँढ़कर हमारे पास लाओ। जबतक मन्त्री वापस नहीं आयेगा, तबतक मैं अन्न ग्रहण नहीं करूँगा। राजाके आदमियोंने मन्त्रीको ढूँढ़ लिया और उससे तुरन्त राजाके पास वापस चलनेकी प्रार्थना की। मन्त्रीने कहा—भगवान‍्की बड़ी कृपा हो गयी! मन्त्री राजाके सामने उपस्थित हो गया। राजाने बड़े आदरपूर्वक मन्त्रीको बैठाया और अपनी भूलपर पश्चात्ताप करते हुए जंगलवाली घटना सुनाकर कहा कि ‘पहले मैं तुम्हारी बातको समझा नहीं। अब समझमें आया कि भगवान‍्की मेरेपर कितनी कृपा थी! भगवान‍्की कृपासे अगर मेरी अँगुली न कटती तो उस दिन मेरा गला कट जाता! परन्तु जब मैंने तुम्हें राज्यसे निकाल दिया, तब तुमने कहा कि भगवान‍्की बड़ी कृपा हो गयी तो वह कृपा क्या थी, यह अभी मेरी समझमें नहीं आया! मन्त्री बोला—महाराज, जब आप शिकार करने गये, तब मैं भी आपके साथ जंगलमें जाता। आपके साथ मैं भी जंगलमें बहुत दूर निकल जाता; क्योंकि मेरा घोड़ा आपके घोड़ेसे कम तेज नहीं है। डाकूलोग आपके साथ मेरेको भी पकड़ लेते। आप तो अँगुली कटी होनेके कारण बच गये, पर मेरा तो उस दिन गला कट ही जाता! इसलिये भगवान‍्की कृपासे मैं आपके साथ नहीं था, राज्यसे बाहर था; अत: मरनेसे बच गया। अब मैं पुन: अपनी जगह वापस आ गया हूँ। यह भगवान‍्की कृपा ही तो है!