क्या गुरु बिना मुक्ति नहीं?
नम्र निवेदन
सत्संग-कार्यक्रमके निमित्त मैं जहाँ-जहाँ जाता हूँ, वहाँ-वहाँ अधिकतर लोग मेरेसे गुरुके विषयमें तरह-तरहके प्रश्न किया करते हैं। उन प्रश्नोंका उत्तर पाकर उनको सन्तोष भी होता है। इसलिये अनेक सत्संगी भाई-बहनोंका विशेष आग्रह रहा कि एक ऐसी पुस्तक बन जाय, जिससे लोगोंकी गुरु-विषयक शंकाओंका समाधान हो जाय। इसी उद्देश्यसे प्रस्तुत पुस्तक लिखी गयी है।
गुरु-विषयक मेरे विचारोंको गहराईसे न समझनेके कारण कुछ लोग कह देते हैं कि मैं गुरुकी निन्दा या खण्डन करता हूँ। यह बिलकुल झूठी बात है। मैं गुरुकी निन्दा नहीं करता हूँ, प्रत्युत पाखण्डकी निन्दा करता हूँ। गुरुका खण्डन तो कोई कर सकता ही नहीं। गुरुजनोंकी मेरेपर बड़ी कृपा रही है और गुरुजनोंके प्रति मेरे मनमें बड़ा आदरभाव है। गुरुजनोंसे मेरेको लाभ भी हुआ है। परन्तु जो लोग गुरु बनकर लोगोंको ठगते हैं, उनकी प्रशंसा कैसे होगी? उनकी तो निन्दा ही होगी।
वर्तमान समयमें सच्चा गुरु मिलना बड़ा दुर्लभ होता जा रहा है। दम्भ-पाखण्ड दिनोदिन बढ़ता चला जा रहा है। इसलिये शास्त्रोंने पहलेसे ही इस कलियुगमें दम्भी-पाखण्डी गुरुओंके होनेकी बात कह दी है, जिससे लोग सावधान हो जायँ। अत: अपना कल्याण चाहनेवाले साधकोंके सही मार्गदर्शनके लिये यह पुस्तक लिखी गयी है। इससे पहले भी ‘सच्चा गुरु कौन?’ नामक एक छोटी पुस्तिका प्रकाशित हो चुकी है।
इस पुस्तकमें हमने ‘गुरुगीता’ के कुछ श्लोक भी प्रमाणस्वरूप लिये हैं। परन्तु बहुत खोज करनेपर भी हमें यह पता नहीं चल सका कि ‘गुरुगीता’ का आधार क्या है? इसकी रचना किसने की है? गुरुगीताके अन्तमें इसको स्कन्दपुराणसे लिया गया बताया गया है, पर स्कन्दपुराणकी किसी प्रतिमें हमें गुरुगीता मिली नहीं। अनेक स्थानोंसे प्रकाशित गुरुगीतामें भी परस्पर अन्तर पाया जाता है। अगर कोई विद्वान् इस विषयमें जानते हों तो हमें सूचित करनेकी कृपा करें।
पाठकोंसे प्रार्थना है कि वे इस पुस्तकको ध्यानपूर्वक पढ़ें और सच्ची लगनके साथ भगवान्में लग जायँ। वे किसी व्यक्तिके अनुयायी न बनकर तत्त्वके अनुयायी बनें।
विनीत—
स्वामी रामसुखदास
गुरु कौन होता है?
किसी विषयमें हमें जिससे ज्ञानरूपी प्रकाश मिले, हमारा अज्ञानान्धकार दूर हो, उस विषयमें वह हमारा गुरु है। जैसे, हम किसीसे मार्ग पूछते हैं और वह हमें मार्ग बताता है तो मार्ग बतानेवाला हमारा गुरु हो गया, हम चाहे गुरु मानें या न मानें। उससे सम्बन्ध जोड़नेकी जरूरत नहीं है। विवाहके समय ब्राह्मण कन्याका सम्बन्ध वरके साथ करा देता है तो उनका उम्रभरके लिये पति-पत्नीका सम्बन्ध जुड़ जाता है। वही स्त्री पतिव्रता हो जाती है। फिर उनको कभी उस ब्राह्मणकी याद ही नहीं आती; और उसको याद करनेका विधान भी शास्त्रोंमें कहीं नहीं आता। ऐसे ही गुरु हमारा सम्बन्ध भगवान्के साथ जोड़ देता है तो गुरुका काम हो गया। तात्पर्य है कि गुरुका काम मनुष्यको भगवान्के सम्मुख करना है। मनुष्यको अपने सम्मुख करना, अपने साथ सम्बन्ध जोड़ना गुरुका काम नहीं है। इसी तरह हमारा काम भी भगवान्के साथ सम्बन्ध जोड़ना है, गुरुके साथ नहीं। जैसे संसारमें कोई माँ है, कोई बाप है, कोई भतीजा है, कोई भौजाई है, कोई स्त्री है, कोई पुत्र है, ऐसे ही अगर एक गुरुके साथ और सम्बन्ध जुड़ गया तो इससे क्या लाभ? पहले अनेक बन्धन थे ही, अब एक बन्धन और हो गया! भगवान्के साथ तो हमारा सम्बन्ध सदासे और स्वत:स्वाभाविक है; क्योंकि हम भगवान्के सनातन अंश हैं—‘ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:’ (गीता १५। ७), ‘ईस्वर अंस जीव अबिनासी’ (मानस, उत्तर० ११७। १)। गुरु उस भूले हुए सम्बन्धकी याद कराता है, कोई नया सम्बन्ध नहीं जोड़ता।
मैं प्राय: यह पूछा करता हूँ कि पहले बेटा होता है कि बाप? इसका उत्तर प्राय: यही मिलता है कि बाप पहले होता है। परन्तु वास्तवमें देखा जाय तो पहले बेटा होता है, फिर बाप होता है। कारण कि बेटा पैदा हुए बिना उसका बाप नाम होगा ही नहीं। पहले वह मनुष्य (पति) है और जब बेटा जन्मता है, तब उसका नाम बाप होता है। इसी तरह शिष्यको जब तत्त्वज्ञान हो जाता है, तब उसके मार्गदर्शकका नाम ‘गुरु’ होता है। शिष्यको ज्ञान होनेसे पहले वह गुरु होता ही नहीं। इसीलिये कहा है—
गुकारश्चान्धकारो हि रुकारस्तेज उच्यते।
अज्ञानग्रासकं ब्रह्म गुरुरेव न संशय:॥
(गुरुगीता)
अर्थात् ‘गु’ नाम अन्धकारका है और ‘रु’ नाम प्रकाशका है, इसलिये जो अज्ञानरूपी अन्धकारको मिटा दे, उसका नाम ‘गुरु’ है।
गुरुके विषयमें एक दोहा बहुत प्रसिद्ध है—
गुरु गोविन्द दोउ खड़े, किनके लागूँ पाय।
बलिहारी गुरुदेव की, गोविन्द दियो बताय॥
गोविन्दको बता दिया, सामने लाकर खड़ा कर दिया, तब गुरुकी बलिहारी होती है। गोविन्दको तो बताया नहीं और गुरु बन गये—यह कोरी ठगाई है! केवल गुरु बन जानेसे गुरुपना सिद्ध नहीं होता। इसलिये अकेले खड़े गुरुकी महिमा नहीं है। महिमा उस गुरुकी है, जिसके साथ गोविन्द भी खड़े हैं—‘गुरु गोविन्द दोउ खड़े’ अर्थात् जिसने भगवान्की प्राप्ति करा दी है।
असली गुरु वह होता है, जिसके मनमें चेलेके कल्याणकी इच्छा हो और चेला वह होता है, जिसमें गुरुकी भक्ति हो—
को वा गुरुर्यो हि हितोपदेष्टा
शिष्यस्तु को यो गुरुभक्त एव।
(प्रश्नोत्तरी ७)
अगर गुरु पहुँचा हुआ हो और शिष्य सच्चे हृदयसे आज्ञापालन करनेवाला हो तो शिष्यका उद्धार होनेमें सन्देह नहीं है।
पारस केरा गुण किसा, पलटा नहीं लोहा।
कै तो निज पारस नहीं, कै बीच रहा बिछोहा॥
अगर पारसके स्पर्शसे लोहा सोना नहीं बना तो वह पारस असली पारस नहीं है अथवा लोहा असली लोहा नहीं है अथवा बीचमें कोई आड़ है। इसी तरह अगर शिष्यको तत्त्वज्ञान नहीं हुआ तो गुरु तत्त्वप्राप्त नहीं है अथवा शिष्य आज्ञापालन करनेवाला नहीं है अथवा बीचमें कोई आड़ (कपटभाव) है।
वास्तविक गुरु
वास्तविक गुरु वह होता है, जिसमें केवल चेलेके कल्याणकी चिन्ता होती है। जिसके हृदयमें हमारे कल्याणकी चिन्ता ही नहीं है, वह हमारा गुरु कैसे हुआ? जो हृदयसे हमारा कल्याण चाहता है, वही हमारा वास्तविक गुरु है, चाहे हम उसको गुरु मानें या न मानें और वह गुरु बने या न बने। उसमें यह इच्छा नहीं होती कि मैं गुरु बन जाऊँ, दूसरे मेरेको गुरु मान लें, मेरे चेले बन जायँ। जिसके मनमें धनकी इच्छा होती है, वह धनदास होता है। ऐसे ही जिसके मनमें चेलेकी इच्छा होती है, वह चेलादास होता है। जिसके मनमें गुरु बननेकी इच्छा है, वह दूसरेका कल्याण नहीं कर सकता। जो चेलेसे रुपये चाहता है, वह गुरु नहीं होता, प्रत्युत पोता-चेला होता है। कारण कि चेलेके पास रुपये हैं तो उसका चेला हुआ रुपया और रुपयेका चेला हुआ गुरु तो वह गुरु वास्तवमें पोता-चेला ही हुआ! विचार करें, जो आपसे कुछ भी चाहता है, वह क्या आपका गुरु हो सकता है? नहीं हो सकता। जो आपसे कुछ भी धन चाहता है, मान-बड़ाई चाहता है, आदर चाहता है, वह आपका चेला होता है, गुरु नहीं होता। सच्चे महात्माको दुनियाकी गरज नहीं होती, प्रत्युत दुनियाको ही उसकी गरज होती है। जिसको किसीकी भी गरज नहीं होती, वही वास्तविक गुरु होता है।
कबीर जोगी जगत गुरु, तजै जगत की आस।
जो जग की आसा करै तो जगत गुरु वह दास॥
जो सच्चे सन्त-महात्मा होते हैं, उनको गुरु बननेका शौक नहीं होता, प्रत्युत दुनियाके उद्धारका शौक होता है। उनमें दुनियाके उद्धारकी स्वाभाविक सच्ची लगन होती है। मैं भी अच्छे सन्त-महात्माओंकी खोजमें रहा हूँ और मेरेको अच्छे सन्त-महात्मा मिले भी हैं। परन्तु उन्होंने कभी ऐसा नहीं कहा कि तुम चेला बन जाओ तो कल्याण हो जायगा। जिनको गुरु बननेका शौक है, वही ऐसा प्रचार करते हैं कि गुरु बनाना बहुत जरूरी है, बिना गुरुके मुक्ति नहीं होती, आदि-आदि।
कोई वर्तमान मनुष्य ही गुरु होना चाहिये—ऐसा कोई विधान नहीं है। श्रीशुकदेवजी महाराज हजारों वर्ष पहले हुए थे, पर उन्होंने चरणदासजी महाराजको दीक्षा दी! सच्चे शिष्यको गुरु अपने-आप दीक्षा देता है। कारण कि चेला सच्चा होता है तो उसके लिये गुरुको ढूँढ़नेकी आवश्यकता नहीं होती, प्रत्युत गुरु अपने-आप मिलता है। सच्ची लगनवालेको सच्चा महात्मा मिल जाता है—
जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू।
सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू॥
(मानस, बाल० २५९।३)
लोग तो गुरुको ढूँढ़ते हैं, पर जो असली गुरु होते हैं, वे शिष्यको ढूँढ़ते हैं। उनके भीतर विशेष दया होती है। जैसे, संसारमें माँका दर्जा सबसे ऊँचा है। माँ सबसे पहला गुरु है। बच्चा माँसे ही जन्म लेता है, माँका ही दूध पीता है, माँकी ही गोदीमें खेलता है, माँसे ही पलता है, माँके बिना बच्चा पैदा हो ही नहीं सकता, रह ही नहीं सकता, पल भी नहीं सकता। माँ तो वर्षोंतक बच्चेके बिना रही है। बच्चेके बिना माँको कोई बाधा नहीं लगी। इतना होते हुए भी माँका स्वभाव है कि वह आप तो भूखी रह जायगी, पर बच्चेको भूखा नहीं रहने देगी। वह खुद कष्ट उठाकर भी बच्चेका पालन करती है। ऐसे ही सच्चे गुरु होते हैं। वे जिसको शिष्यरूपसे स्वीकार कर लेते हैं, उसका उद्धार कर देते हैं। उनमें शिष्यका उद्धार करनेकी सामर्थ्य होती है। ऐसी बातें मेरी देखी हुई हैं।
एक सन्त थे। वे दूसरेको शिष्य न मानकर मित्र ही मानते थे। उनके एक मित्रको कोई भयंकर बीमारी हो गयी तो वह घबरा गया। दवाइयोंसे वह ठीक नहीं हुआ। उन सन्तने उससे कहा कि तू अपनी बीमारी मेरेको दे दे। वह बोला कि अपनी बीमारी आपको कैसे दे दूँ? सन्तने फिर कहा कि अब मैं कहूँ तो मना मत करना, आड़ मत लगाना; तू आधी बीमारी मेरेको दे दे। उनके मित्रने स्वीकार कर लिया तो उन सन्तने उसकी आधी बीमारी अपनेपर ले ली। फिर बिना दवा किये उसकी पूरी बीमारी मिट गयी। इस प्रकार जो समर्थ होते हैं, वे गुरु बन सकते हैं। परन्तु इतने समर्थ होनेपर भी उन्होंने उम्रभर किसीको चेला नहीं बनाया।
गुरु बनानेपर उसकी महिमा बताते हैं कि गुरु गोविन्दसे बढ़कर है। इसका नतीजा यह होता है कि चेला भगवान्के भजनमें न लगकर गुरुके ही भजनमें लग जाता है! यह बड़े अनर्थकी, नरकोंमें ले जानेवाली बात है! यह अच्छे सन्तकी बात है। उनको चेलोंने भगवान्से बढ़कर मानना शुरू कर दिया तो उन्होंने चेला बनाना छोड़ दिया और फिर उम्रभरमें कभी चेला बनाया ही नहीं। कारण कि चेले भगवान्को तो पकड़ते नहीं, गुरुको ही पकड़ लेते हैं! गुरुकी बात सुनकर मनुष्य भगवान्में लग जाय तो ठीक है, पर वह गुरुमें ही लग जाय तो बड़ी हानिकी बात है! चेलेको अपनेमें लगानेवाले कालनेमि अथवा कपटमुनि होते हैं, गुरु नहीं होते। गुरु वे होते हैं, जो चेलेको भगवान्में लगाते हैं। भगवान्के समान हमारा हित चाहनेवाला गुरु, पिता, माता, बन्धु, समर्थ आदि कोई नहीं है—
उमा राम सम हित जग माहीं।
गुरु पितु मातु बंधु प्रभु नाहीं॥
(मानस, किष्किंधा० १२। १)
भगवान्की जगह अपनी पूजा करवाना पाखण्डियोंका काम है। जिसके भीतर शिष्य बनानेकी इच्छा है, रुपयोंकी इच्छा है, मकान (आश्रम आदि) बनानेकी इच्छा है, मान-बड़ाईकी इच्छा है, अपनी प्रसिद्धिकी इच्छा है, उसके द्वारा दूसरेका कल्याण होना तो दूर रहा, उसका अपना कल्याण भी नहीं हो सकता—
शिष शाखा सुत वितको तरसे,
परम तत्त्वको कैसे परसे?
उसके द्वारा लोगोंकी वही दुर्दशा होती है, जो कपटी मुनिके द्वारा राजा प्रतापभानुकी हुई थी (देखें—मानस, बाल० १५३-१७५)। कल्याण तो उनके संगसे होता है, जिनके भीतर सबका कल्याण करनेकी भावना है। दूसरेके कल्याणके सिवाय जिनके भीतर कोई इच्छा नहीं है। जो स्वयं इच्छारहित होता है, वही दूसरेको इच्छारहित कर सकता है। इच्छावालेके द्वारा ठगाई होती है, कल्याण नहीं होता।
यह सिद्धान्त है कि जो दूसरेको कमजोर बनाता है, वह खुद कमजोर होता है। जो दूसरेको समर्थ बनाता है, वह खुद समर्थ होता है। जो दूसरेको चेला बनाता है, वह समर्थ नहीं होता। जो गुरु होता है, वह दूसरेको भी गुरु ही बनाता है। भगवान् सबसे बड़े हैं, इसलिये वे कभी किसीको छोटा नहीं बनाते। जो भगवान्के चरणोंकी शरण हो जाता है, वह संसारमें बड़ा हो जाता है। भगवान् सबको अपना मित्र बनाते हैं, अपने समान बनाते हैं, किसीको अपना चेला नहीं बनाते। जैसे, निषादराज सिद्ध भक्त था, विभीषण साधक था और सुग्रीव भोगी था, पर भगवान् रामने तीनोंको ही अपना मित्र बनाया। अर्जुन तो अपनेको भगवान्का शिष्य मानते हैं—‘शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्’ (गीता २। ७), पर भगवान् अपनेको गुरु न मानकर मित्र ही मानते हैं—‘भक्तोऽसि मे सखा चेति’ (गीता ४। ३), ‘इष्टोऽसि’ (गीता १८। ६४)। वेदोंमें भी भगवान्को जीवका सखा बताया गया है—
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।*
(मुण्डक० ३।१।१, श्वेताश्वतर० ४।६)
‘सदा साथ रहनेवाले तथा परस्पर सखाभाव रखनेवाले दो पक्षी—जीवात्मा और परमात्मा एक ही वृक्ष—शरीरका आश्रय लेकर रहते हैं।’
जो खुद बड़ा होता है, वह दूसरेको भी बड़ा ही बनाता है। जो दूसरेको छोटा बनाता है, वह खुद छोटा होता है। जो वास्तवमें बड़ा होता है, उसको छोटा बननेमें लज्जा भी नहीं आती। क्षत्रियोंके समुदायमें, अठारह अक्षौहिणी सेनामें भगवान् घोड़े हाँकनेवाले बने। अर्जुनने कहा कि दोनों सेनाओंके बीचमें मेरा रथ खड़ा करो तो भगवान् शिष्यकी तरह अर्जुनकी आज्ञाका पालन करते हैं। ऐसे ही पाण्डवोंने यज्ञ किया तो उसमें सबसे पहले भगवान् श्रीकृष्णका पूजन किया गया। परन्तु उस यज्ञमें ब्राह्मणोंकी जूठी पत्तलें उठानेका काम भी भगवान्ने किया। छोटा काम करनेमें भगवान्को लज्जा नहीं आती। जो खुद छोटा होता है, उसीको लज्जा आती है और भय लगता है कि कोई मेरेको छोटा न समझ ले, कोई मेरा अपमान न कर दे।
गुरुकी महिमा
वास्तवमें गुरुकी महिमाका पूरा वर्णन कोई कर सकता ही नहीं। गुरुकी महिमा भगवान्से भी अधिक है। इसलिये शास्त्रोंमें गुरुकी बहुत महिमा आयी है। परन्तु वह महिमा सच्चाईकी है, दम्भ-पाखण्डकी नहीं। आजकल दम्भ-पाखण्ड बहुत हो गया है और बढ़ता ही जा रहा है। कौन अच्छा है और कौन बुरा—इसका जल्दी पता लगता नहीं। जो बुराई बुराईके रूपमें आती है, उसको मिटाना सुगम होता है। परन्तु जो बुराई अच्छाईके रूपमें आती है, उसको मिटाना बड़ा कठिन होता है। सीताजीके सामने रावण, राजा प्रतापभानुके सामने कपटमुनि और हनुमान् जी के सामने कालनेमि आये तो वे उनको पहचान नहीं सके, उनके फेरेमें आ गये; क्योंकि उनका स्वाँग साधुओंका था। आजकल भी शिष्योंकी अपने गुरुके प्रति जैसी श्रद्धा देखनेमें आती है, वैसा गुरु स्वयं होता नहीं। इसलिये सेठजी श्रीजयदयालजी गोयन्दका कहते थे कि आजकलके गुरुओंमें हमारी श्रद्धा नहीं होती, प्रत्युत उनके चेलोंमें श्रद्धा होती है! कारण कि चेलोंमें अपने गुरुके प्रति जो श्रद्धा है, वह आदरणीय है।
शास्त्रोंमें आयी गुरु-महिमा ठीक होते हुए भी वर्तमानमें प्रचारके योग्य नहीं है। कारण कि आजकल दम्भी-पाखण्डी लोग गुरु-महिमाके सहारे अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं। इसमें कलियुग भी सहायक है; क्योंकि कलियुग अधर्मका मित्र है—‘कलिनाधर्ममित्रेण’ (पद्मपुराण, उत्तर० १९३।३१)। वास्तवमें गुरु-महिमा प्रचार करनेके लिये नहीं है, प्रत्युत धारण करनेके लिये है। कोई गुरु खुद ही गुरु-महिमाकी बातें कहता है, गुरु-महिमाकी पुस्तकोंका प्रचार करता है तो इससे सिद्ध होता है कि उसके मनमें गुरु बननेकी इच्छा है। जिसके भीतर गुरु बननेकी इच्छा होती है, उससे दूसरोंका भला नहीं हो सकता। इसलिये मैं गुरुका निषेध नहीं करता हूँ, प्रत्युत पाखण्डका निषेध करता हूँ। गुरुका निषेध तो कोई कर सकता ही नहीं।
गुरुकी महिमा वास्तवमें शिष्यकी दृष्टिसे है, गुरुकी दृष्टिसे नहीं। एक गुरुकी दृष्टि होती है, एक शिष्यकी दृष्टि होती है और एक तीसरे आदमीकी दृष्टि होती है। गुरुकी दृष्टि यह होती है कि मैंने कुछ नहीं किया, प्रत्युत जो स्वत:स्वाभाविक वास्तविक तत्त्व है, उसकी तरफ शिष्यकी दृष्टि करा दी। तात्पर्य हुआ कि मैंने उसीके स्वरूपका उसीको बोध कराया है, अपने पाससे उसको कुछ दिया ही नहीं। चेलेकी दृष्टि यह होती है कि गुरुने मेरेको सब कुछ दे दिया। जो कुछ हुआ है, सब गुरुकी कृपासे ही हुआ है। तीसरे आदमीकी दृष्टि यह होती है कि शिष्यकी श्रद्धासे ही उसको तत्त्वबोध हुआ है।
असली महिमा उस गुरुकी है, जिसने गोविन्दसे मिला दिया है। जो गोविन्दसे तो मिलाता नहीं, कोरी बातें ही करता है, वह गुरु नहीं होता। ऐसे गुरुकी महिमा नकली और केवल दूसरोंको ठगनेके लिये होती है!
गुरुकी कृपा
गुरु-कृपा अथवा सन्त-कृपाका बहुत विशेष माहात्म्य है। भगवान्की कृपासे जीवको मानवशरीर मिलता है और गुरु-कृपासे भगवान् मिलते हैं। लोग समझते हैं कि हम गुरु बनायेंगे, तब वे कृपा करेंगे। परन्तु यह कोई महत्त्वकी बात नहीं है। अपने-अपने बालकोंका सब पालन करते हैं। कुतिया भी अपने बच्चोंका पालन करती है। परन्तु सन्तकृपा बहुत विलक्षण होती है! दूसरा शिष्य बने या न बने, उनसे प्रेम करे या वैर करे—इसको सन्त नहीं देखते। दीन-दु:खीको देखकर सन्तका हृदय द्रवित हो जाता है तो इससे उसका काम हो जाता है।* जगाई-मधाई प्रसिद्ध पापी थे और साधुओंसे वैर रखते थे, पर चैतन्य महाप्रभुने उनपर भी दया करके उनका उद्धार कर दिया।
सन्त सबपर कृपा करते हैं, पर परमात्मतत्त्वका जिज्ञासु ही उस कृपाको ग्रहण करता है; जैसे-प्यासा आदमी ही जलको ग्रहण करता है। वास्तवमें अपने उद्धारकी लगन जितनी तेज होती है, सत्य तत्त्वकी जिज्ञासा जितनी अधिक होती है, उतना ही वह उस कृपाको अधिक ग्रहण करता है। सच्चे जिज्ञासुपर सन्तकृपा अथवा गुरुकृपा अपने-आप होती है। गुरुकृपा होनेपर फिर कुछ बाकी नहीं रहता। परन्तु ऐसे गुरु बहुत दुर्लभ होते हैं!
पारससे लोहा सोना बन जाता है, पर उस सोनेमें यह ताकत नहीं होती कि दूसरे लोहेको भी सोना बना दे। परन्तु असली गुरु मिल जाय तो उसकी कृपासे चेला भी गुरु बन जाता है, महात्मा बन जाता है—
पारस में अरु संत में, बहुत अंतरौ जान।
वह लोहा कंचन करे, वह करै आपु समान॥
यह गुरुकृपाकी ही विलक्षणता है! यह गुरुकृपा चार प्रकारसे होती है—स्मरणसे, दृष्टिसे, शब्दसे और स्पर्शसे। जैसे कछवी रेतके भीतर अण्डा देती है, पर खुद पानीके भीतर रहती हुई उस अण्डेको याद करती रहती है तो उसके स्मरणसे अण्डा पक जाता है, ऐसे ही गुरुके याद करनेमात्रसे शिष्यको ज्ञान हो जाता है—यह ‘स्मरण-दीक्षा’ है। जैसे मछली जलमें अपने अण्डेको थोड़ी-थोड़ी देरमें देखती रहती है तो देखनेमात्रसे अण्डा पक जाता है, ऐसे ही गुरुकी कृपादृष्टिसे शिष्यको ज्ञान हो जाता है—यह ‘दृष्टि-दीक्षा’ है। जैसे कुररी पृथ्वीपर अण्डा देती है और आकाशमें शब्द करती हुई घूमती रहती है तो उसके शब्दसे अण्डा पक जाता है, ऐसे ही गुरु अपने शब्दोंसे शिष्यको ज्ञान करा देता है—यह ‘शब्द-दीक्षा’ है। जैसे मयूरी अपने अण्डेपर बैठी रहती है तो उसके स्पर्शसे अण्डा पक जाता है, ऐसे ही गुरुके हाथके स्पर्शसे शिष्यको ज्ञान हो जाता है—यह ‘स्पर्श-दीक्षा’ है।
ईश्वरकी कृपासे मानवशरीर मिलता है, जिसको पाकर जीव स्वर्ग अथवा नरकमें भी जा सकता है तथा मुक्त भी हो सकता है। परन्तु गुरुकृपा या सन्तकृपासे मनुष्यको स्वर्ग अथवा नरक नहीं मिलते, केवल मुक्ति ही मिलती है। गुरु बनानेसे ही गुरुकृपा होती है—ऐसा नहीं है। बनावटी गुरुसे कल्याण नहीं होता। जो अच्छे सन्त-महात्मा होते हैं, वे चेला बनानेसे ही कृपा करते हों—ऐसी बात नहीं है। वे स्वत: और स्वाभाविक कृपा करते हैं। सूर्यको कोई इष्ट मानेगा, तभी वह प्रकाश करेगा—यह बात नहीं है। सूर्य तो स्वत: और स्वाभाविक प्रकाश करता है, उस प्रकाशको चाहे कोई काममें ले ले। ऐसे ही गुरुकी, सन्त-महात्माकी कृपा स्वत:स्वाभाविक होती है। जो उनके सम्मुख हो जाता है, वह लाभ ले लेता है। जो सम्मुख नहीं होता, वह लाभ नहीं लेता। जैसे, वर्षा बरसती है तो उसके सामने पात्र रखनेसे वह जलसे भर जाता है। परन्तु पात्र उलटा रख दें तो वह जलसे नहीं भरता और सूखा रह जाता है। सन्तकृपाको ग्रहण करनेवाला पात्र जैसा होता है, वैसा ही उसको लाभ होता है।
सतगुरु भूठा इन्द्र सम, कमी न राखी कोय।
वैसा ही फल नीपजै, जैसी भूमिका होय॥
वर्षा सबपर समान रूपसे होती है, पर बीज जैसा होता है, वैसा ही फल पैदा होता है। इसी तरह भगवान्की और सन्त-महात्माओंकी कृपा सबपर सदा समान रूपसे रहती है। जो जैसा चाहे, लाभ उठा सकता है।
गुरुके वचनका महत्त्व
गुरु बनानेसे कल्याण नहीं होता, प्रत्युत गुरुकी बात माननेसे कल्याण होता है; क्योंकि गुरु शब्द होता है, शरीर नहीं—
जो तू चेला देह को, देह खेह की खान।
जो तू चेला सबद को, सबद ब्रह्म कर मान॥
गुरु शरीर नहीं होता और शरीर गुरु नहीं होता—‘न मर्त्यबुद्ध्यासूयेत’ (श्रीमद्भा० ११। १७। २७)। इसलिये गुरु कभी मरता नहीं। अगर गुरु मर जाय तो चेलेका कल्याण कैसे होगा? शरीरको तो अधम कहा गया है—
छिति जल पावक गगन समीरा।
पंच रचित अति अधम सरीरा॥
(मानस, किष्किंधा० ११।२)
अगर किसीका हाड़-मांसमय शरीर गुरु होता है, तो वह अधम होता है, कालनेमि होता है। इसलिये गुरुमें शरीर-बुद्धि करना और शरीरमें गुरु-बुद्धि करना अपराध है। सन्त एकनाथजीके चरित्रमें यह बात बहुत विशेषतासे मिलती है। शास्त्रकी प्रक्रियाके अनुसार पहले तीर्थयात्रा की जाती है, फिर उपासना की जाती है और फिर ज्ञान होता है। परन्तु एकनाथजीके जीवनमें उलटा क्रम मिलता है। उनको पहले ज्ञान हुआ, फिर उन्होंने उपासना की और फिर गुरुजीने तीर्थयात्राकी आज्ञा दी। जब वे तीर्थयात्रामें थे, तब उनके गाँव पैठणका एक ब्राह्मण उनके गुरुजीके पास देवगढ़ पहुँचा और बोला कि ‘महाराज! आपके यहाँ जो एकनाथ था, उनके दादा-दादी बहुत बूढ़े हो गये हैं और एकनाथको याद कर-करके रोते रहते हैं। गुरुजीको सुनकर आश्चर्य हुआ कि एकनाथ मेरे पास इतने वर्ष रहा, पर उसने अपने दादा-दादीके विषयमें कभी कहा ही नहीं! उन्होंने एक पत्र लिखकर उस ब्राह्मणको दिया और कहा वह तीर्थयात्रा करते हुए जब पैठण आयेगा, तब उसको मेरा यह पत्र दे देना। मैंने कहा है, इसलिये वह पैठण जरूर आयेगा। ब्राह्मण पत्र लेकर चला गया। घूमते-घूमते जब एकनाथजी वहाँ पहुँचे तो वे दादा-दादीसे मिलने गाँवमें नहीं गये, प्रत्युत गाँवके बाहर ही ठहर गये। उस ब्राह्मणने जब एकनाथजीको देखा तो उनको पहचान लिया और उनके दादाजीका हाथ पकड़कर उनको एकनाथजीके पास ले चला। संयोगसे एकनाथजी रास्तेमें ही मिल गये। दादाजीने स्नेहपूर्वक एकनाथजीको गलेसे लगाया और गुरुजीका पत्र निकालकर कहा कि ‘यह तुम्हारे गुरुजीका पत्र है’। यह सुनते ही एकनाथजी गद्गद हो गये। उन्होंने कपड़ा बिछाकर उसके ऊपर पत्र रखा, उसकी परिक्रमा करके दण्डवत् प्रणाम किया, फिर उसको पढ़ा। उसमें लिखा था कि ‘एकनाथ, तुम वहीं रहना’। एकनाथजी वहीं बैठ गये। फिर उम्रभर वहाँसे कहीं गये नहीं। वहीं मकान बन गया। सत्संग शुरू हो गया। दादा-दादी उनके पास आकर रहे। फिर कभी गुरुजीसे मिलने भी नहीं गये। विचार करें, गुरु शरीर हुआ कि वचन हुआ? जब गुरुजीका शरीर शान्त हो गया तो वे बोले कि ‘गुरु मरे और चेला रोये तो दोनोंको क्या ज्ञान मिला?’ तात्पर्य है कि गुरु मरता नहीं और चेला रोता नहीं।
एकनाथजीके चरित्रमें जैसी गुरुभक्ति देखनेमें आती है, वैसी और किसी सन्तके चरित्रमें देखनेमें नहीं आती। श्रीमद्भागवतके एकादश स्कन्धपर उन्होंने मराठीमें जो टीका लिखी है, उसके प्रत्येक अध्यायके आरम्भमें उन्होंने विस्तारसे गुरुकी स्तुति की है। ऐसे परम गुरुभक्त एकनाथजीने भी गुरुसे बढ़कर उनके वचन (आज्ञा) को महत्त्व दिया।
भगवान्से लाभ उठानेकी पाँच बातें हैं—नामजप, ध्यान, सेवा, आज्ञापालन और संग। परन्तु सन्त-महात्माओंसे लाभ उठानेमें तीन ही बातें उपयुक्त हैं—सेवा, आज्ञापालन और संग। इसलिये गुरुका नाम-जप और ध्यान न करके उनकी आज्ञाका, उनके सिद्धान्तका पालन करना चाहिये। गुरुके सिद्धान्तके अनुसार अपना जीवन बनाना ही वास्तविक गुरु-पूजन और गुरु-सेवा है। कारण कि सन्त-महात्माओंको शरीरसे भी बढ़कर सिद्धान्त प्यारा होता है। सिद्धान्तकी रक्षाके लिये वे प्राण भी दे देते हैं, पर सिद्धान्त नहीं छोड़ते।
गुरु शरीर नहीं होता, प्रत्युत तत्त्व होता है। अत: सच्चे गुरु अपना पूजन-ध्यान नहीं करवाते, प्रत्युत भगवान्का ही पूजन-ध्यान करवाते हैं। सच्चे सन्त अपनी आज्ञाका पालन भी नहीं करवाते, प्रत्युत यही कहते हैं कि गीता, रामायण आदि ग्रन्थोंकी आज्ञाका पालन करो। जो गुरु अपनी फोटो देते हैं, उसको गलेमें धारण करवाते हैं, उसकी पूजा और ध्यान करवाते हैं, वे धोखा देनेवाले होते हैं। कहाँ तो भगवान्का चिन्मय पवित्र शरीर और कहाँ हाड़-मांसका जड़ अपवित्र शरीर! जहाँ भगवान्की पूजा होनी चाहिये, वहाँ हाड़-मांसके पुतलेकी पूजा होना बड़ा भारी दोष है। जैसे राजासे वैर करनेवाला, उससे विरुद्ध चलनेवाला राजद्रोही होता है, ऐसे ही अपनी पूजा करवानेवाला भगवद्द्रोही होता है। गीताप्रेसके संस्थापक, संचालक और संरक्षक सेठजी श्रीजयदयालजी गोयन्दकासे एक सज्जनने कहा कि हम आपकी फोटो लेना चाहते हैं तो उन्होंने कहा कि पहले अपनी जूती लाकर मेरे सिरपर बाँध दो, पीछे फोटो ले लो! अपनी पूजा कराना मैं जूता मारनेकी तरह समझता हूँ। एक बार सेठजीने एक सन्तसे पूछा कि आप पुस्तकोंमें अपना चित्र दिया करते हैं, अपने नाम, चित्र आदिका प्रचार किया करते हैं तो इससे आपका भला होता है या शिष्योंका भला होता है अथवा संसारका भला होता है? किसका भला होता है? इस प्रश्नका उत्तर उनसे देते नहीं बना।
गुरु बननेका अधिकार किसको?
गुरुकी महिमा गोविन्दसे भी अधिक बतायी गयी है, पर यह महिमा उस गुरुकी है, जो शिष्यका उद्धार कर सके। श्रीमद्भागवतमें आया है—
गुरुर्न स स्यात्स्वजनो न स स्यात्
पिता न स स्याज्जननी न सा स्यात्।
दैवं न तत्स्यान्न पतिश्च स स्या-
न्न मोचयेद्य: समुपेतमृत्युम्॥
(श्रीमद्भा० ५। ५। १८)
‘जो समीप आयी हुई मृत्युसे नहीं छुड़ाता, वह गुरु गुरु नहीं है, स्वजन स्वजन नहीं है, पिता पिता नहीं है, माता माता नहीं है, इष्टदेव इष्टदेव नहीं है और पति पति नहीं है।’
इसलिये सन्तोंकी वाणीमें आया है—
चौथे पद चीन्हे बिना शिष्य करो मत कोय।
तात्पर्य है कि जबतक अपनेमें शिष्यका उद्धार करनेकी ताकत न आये, तबतक कोई गुरु मत बनो। कारण कि गुरु बन जाय और उद्धार न कर सके तो बड़ा दोष लगता है—
हरइ सिष्य धन सोक न हरई।
सो गुर घोर नरक महुँ परई॥
(मानस, उत्तर० ९९।४)
वह घोर नरकमें इसलिये पड़ता है कि मनुष्य दूसरी जगह जाकर अपना कल्याण कर लेता, पर उसको अपना शिष्य बनाकर एक जगह अटका दिया! उसको अपना कल्याण करनेके लिये मनुष्यशरीर मिला था, उसमें बड़ी बाधा लगा दी! जैसे एक घरके भीतर कुत्ता आ गया तो घरके मालिकने दरवाजा बन्द कर दिया। घरमें खानेको कुछ था नहीं। अब उस कुत्तेको वहाँ तो कुछ खानेको मिलेगा नहीं और दूसरी जगह जा सकेगा नहीं। यही दशा आजकल चेलेकी होती है। गुरुजी खुद तो चेलेका कल्याण कर सकते नहीं और दूसरी जगह जाने देते नहीं। वह कहीं और चला जाय तो उसको धमकाते हैं कि मेरा चेला होकर दूसरेके पास जाता है! श्रीकरपात्रीजी महाराज कहते थे कि जो गुरु अपना शिष्य तो बना लेता है, पर उसका उद्धार नहीं करता, वह अगले जन्ममें कुत्ता बनता है और शिष्य चींचड़ बनकर उसका खून चूसते हैं!
मन्त्रिदोषश्च राजानं जायादोष: पतिं यथा।
तथा प्राप्नोत्यसन्देहं शिष्यपापं गुरुं प्रिये॥
(कुलार्णवतन्त्र)
‘जिस प्रकार मन्त्रीका दोष राजाको और स्त्रीका दोष पतिको प्राप्त होता है, उसी प्रकार निश्चय ही शिष्यका पाप गुरुको प्राप्त होता है।’
दापयेत् स्वकृतं दोषं पत्नी पापं स्वभर्तरि।
तथा शिष्यार्जितं पापं गुरुमाप्नोति निश्चितम्॥
(गन्धर्वतन्त्र)
‘जैसे स्त्रीका दोष और पाप उसके स्वामीको प्राप्त होता है, वैसे ही शिष्यका अर्जित पाप गुरुको अवश्य ही प्राप्त होता है।’
एक सन्तके पूर्वजन्मकी सच्ची घटना है। पूर्वजन्ममें वे एक राजाके मन्त्री थे। उनको वैराग्य हो गया तो वे सब छोड़कर अच्छे विरक्त सन्त बन गये। उनके पास कई साधु आकर रहने लगे। राजाके मनमें भी विचार आया कि मैं इन मन्त्री महाराजको ही गुरु बना लूँ और भजन करूँ। वे जाकर उनके शिष्य बन गये। आगे चलकर जब गुरुजी (पूर्व मन्त्री) का शरीर शान्त हो गया तो उनकी जगह उस राजाको महन्त बना दिया गया। महन्त बननेके बाद राजा भोग भोगनेमें लग गया; क्योंकि भोग भोगनेकी पुरानी आदत थी ही। परिणामस्वरूप वह राजा मरनेके बाद नरकोंमें गया। गुरुजी (पूर्व मन्त्री) ऊँचे लोकोंमें गये थे। नरकोंको भोगनेके बाद जब उस राजाने पुनर्जन्म लिया, तब उसके साथ गुरुजीको भी जन्म लेना पड़ा। फिर गुरुजीने उनको पुन: भगवान्में लगाया, पर उनको शिष्य नहीं बनाया, प्रत्युत मित्र ही बनाया। उम्रभरमें उन्होंने किसीको भी शिष्य नहीं बनाया। इस घटनासे सिद्ध होता है कि अगर गुरु अपने शिष्यका उद्धार न कर सके तो उसको शिष्यके उद्धारके लिये पुन: संसारमें आना पड़ता है। इसलिये गुरु उन्हींको बनना चाहिये, जो शिष्यका उद्धार कर सकें।
आजकलके गुरु चेलेको भगवान्की तरफ न लगाकर अपनी तरफ लगाते हैं, उनको भगवान्का न बनाकर अपना बनाते हैं। यह बड़ा भारी अपराध है*। एक जीव परमात्माकी तरफ जाना चाहता है, उसको अपना चेला बना लिया तो अब वह गुरुमें अटक गया। अब वह भगवान्की तरफ कैसे जायगा? गुरु भगवान्की तरफ जानेमें रुकावट डालनेवाला हो गया! गुरु तो वह है, जो भगवान्के सम्मुख कर दे, भगवान्में श्रद्धा-विश्वास करा दे; जैसे—हनुमान् जी ने विभीषणका विश्वास अपनेमें न कराकर भगवान्में कराया—
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती।
करहिं सदा सेवक पर प्रीती॥
कहहु कवन मैं परम कुलीना।
कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥
प्रात लेइ जो नाम हमारा।
तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा॥
अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर॥
(मानस, सुन्दर० ७)
श्रीशरणानन्दजी महाराजने लिखा है—
‘जो उपदेष्टा भगवद्विश्वासकी जगहपर अपने व्यक्तित्वका विश्वास दिलाते हैं और भगवत्सम्बन्धके बदले अपने व्यक्तित्वसे सम्बन्ध जोड़ने देते हैं, वे घोर अनर्थ करते हैं।’ (प्रबोधनी)
व्यक्तिमें श्रद्धा-विश्वास करनेकी अपेक्षा भगवान्में श्रद्धा-विश्वास करनेसे ज्यादा लाभ होगा, जल्दी लाभ होगा और विशेष लाभ होगा। इसलिये जो गुरु अपनेमें विश्वास कराता है, अपनी सेवा कराता है, अपने नामका जप करवाता है, अपने रूपका ध्यान करवाता है, अपनी पूजा करवाता है, अपनी जूठन देता है, अपने चरण धुलवाता है, वह पतनकी तरफ ले जानेवाला है। उससे सावधान रहना चाहिये।
भगवान्का ही अंश होनेके कारण मनुष्यमात्रका सदासे ही भगवान्के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है। यह सम्बन्ध स्वत:-स्वाभाविक है, बनावटी नहीं है। परन्तु गुरुके साथ जोड़ा गया सम्बन्ध बनावटी होता है। बनावटी सम्बन्धसे कल्याण नहीं होता, प्रत्युत बन्धन होता है; क्योंकि संसारके बनावटी सम्बन्धसे ही हम बँधे हैं। आप विचार करें, जिन लोगोंने गुरु बनाया है, क्या उन सबका कल्याण हो गया? उनको तत्त्वज्ञान हो गया? भगवान्की प्राप्ति हो गयी? जीवन्मुक्ति हो गयी? किसीको हो गयी हो तो बड़े आनन्दकी बात है, पर हमें विश्वास नहीं होता। एक तो वे लोग हैं, जिन्होंने गुरु बनाया है और दूसरे वे लोग हैं, जिन्होंने गुरु नहीं बनाया है, पर सत्संग करते हैं—उन दोनोंमें आपको क्या फर्क दीखता है? विचार करें कि गुरु बनानेसे ज्यादा लाभ होता है अथवा सत्संग करनेसे ज्यादा लाभ होता है? गुरुजी हमारा कल्याण कर देंगे—ऐसा भाव होनेसे अपने साधनमें ढिलाई आ जाती है। इसलिये गुरु बनानेवालोंमें जितने राग-द्वेष पाये जाते हैं, उतना सत्संग करनेवालोंमें नहीं पाये जाते। किसीको अच्छा संग भी मिल जाय तो वह किसीके साथ लड़ाई-झगड़ा, मार-पीट नहीं करता, पर अपनेको किसी गुरुका चेला माननेवाले दूसरे गुरुके चेलोंके साथ मार-पीट भी कर देते हैं। गुरु बनानेवालोंमें कोई विशेष परिवर्तन नहीं दीखता। केवल एक वहम पड़ जाता है कि हमने गुरु बना लिया, इसके सिवाय और कुछ नहीं होता। इसलिये गुरु बनानेसे मुक्ति हो जाती है—यह नियम है ही नहीं।
गुरु बनना और बनाना बड़े जोखिमकी बात है, कोई तमाशा नहीं है। कोई आदमी कपड़ेकी दूकानपर जाय और दूकानदारसे कहे कि मेरेको अमुक कपड़ा चाहिये। दूकानदार उससे कपड़ेका मूल्य तो ले ले, पर कपड़ा नहीं दे तो क्या यह उचित है? अगर कपड़ा नहीं दे सकते थे तो मूल्य क्यों लिया? और मूल्य लिया तो कपड़ा क्यों नहीं दिया? ऐसे ही शिष्य तो बना ले, भेंट-पूजा ले ले और उद्धार करे नहीं तो क्या यह उचित है? पहले चेला बन जाओ, उद्धार पीछे करेंगे—यह ठगाई है। अपना पूजन करवा लिया, भेंट ले ली, चेला बना लिया और भगवत्प्राप्ति नहीं करायी तो फिर आप गुरु क्यों बने? गुरु बने हो तो भगवत्प्राप्ति कराओ और नहीं कराओ तो आपको गुरु बननेका कोई अधिकार नहीं है। अगर चेलेका कल्याण नहीं कर सकते तो उसको दूसरी जगह जाने दो। खुद कल्याण नहीं कर सकते तो फिर उसको रोकनेका क्या अधिकार है? खुद कल्याण करते नहीं और दूसरी जगह जाने देते नहीं तो बेचारे शिष्यका तो नाश कर दिया! उसका मनुष्यजन्म निरर्थक कर दिया! अब वह अपना कल्याण कैसे करेगा? इसलिये जहाँतक बने, गुरु-शिष्यका सम्बन्ध नहीं जोड़ना चाहिये। गुरु-शिष्यका सम्बन्ध बिना जोड़े सन्तकी बात मानोगे तो लाभ होगा और नहीं मानोगे तो नुकसान नहीं होगा। तात्पर्य है कि गुरु-शिष्यका सम्बन्ध न जोड़नेमें लाभ-ही-लाभ है, नुकसान नहीं है। परन्तु गुरु-शिष्यका सम्बन्ध जोड़ोगे तो बात नहीं माननेपर नुकसान होगा। कारण कि अगर गुरु असली हो और उसकी एक बात भी टाल दे, उनकी आज्ञा न माने तो वह गुरुका अपराध होता है, जिसको भगवान् भी माफ नहीं कर सकते!
शिवक्रोधाद् गुरुस्त्राता गुरुक्रोधाच्छिवो न हि।
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन गुरोराज्ञां न लङ्घयेत्॥
(गुरुगीता)
‘भगवान् शंकरके क्रोधसे तो गुरु रक्षा कर सकता है, पर गुरुके क्रोधसे भगवान् शंकर भी रक्षा नहीं कर सकते। इसलिये सब प्रकारसे प्रयत्नपूर्वक गुरुकी आज्ञाका उल्लंघन न करे।’
राखइ गुर जौं कोप बिधाता।
गुर बिरोध नहिं कोउ जग त्राता॥
(मानस, बाल० १६६।३)
सच्चे गुरुकी दुर्लभता
गुरवो बहव: सन्ति शिष्यवित्तापहारका:।
तमेकं दुर्लभं मन्ये शिष्यहृत्तापहारकम्॥
(गुरुगीता)
‘शिष्यके धनका हरण करनेवाले गुरु तो बहुत हैं, पर शिष्यके हृदयका ताप हरण करनेवाले गुरु दुर्लभ हैं।’
गीताने प्राणिमात्रके हितमें प्रीतिकी बात कही है—‘सर्वभूतहिते रता:’ (५।२५, १२।४)। सच्चे सन्तोंकी दृष्टि प्राणियोंके हितकी तरफ रहती है, उनको अपनी तरफ खींचनेकी नहीं। वे न तो किसीको अपना चेला बनाते हैं, न अपनी टोली बनाते हैं और न किसीसे कुछ लेते हैं, प्रत्युत दूसरेका कल्याण कैसे हो—इस तरफ दृष्टि रखते हैं और केवल शिष्योंके लिये ही नहीं, प्रत्युत प्राणिमात्रके कल्याणके लिये भगवान्से प्रार्थना करते हैं—
सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:खभाग्भवेत्॥
कारण कि वे भुक्तभोगी होते हैं। अत: वे जानते हैं कि संसारमें कितना दु:ख है और संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेमें कितना सुख है। इसलिये वे चाहते हैं कि दूसरे लोग भी संसारके दु:खोंसे छूट जायँ और सदाके लिये परम सुखका अनुभव कर लें।
इस जमानेमें सच्चे सन्त-महात्मा देखनेको नहीं मिलते। सच्चे महात्मा पहले जमानेमें भी बहुत कम थे, वर्तमानमें तो विशेष कम हो गये हैं। वर्तमानमें तो गुरु बननेका एक पेशा (व्यवसाय) ही बन गया है। चेला इसलिये बनाते हैं कि अपनी जीविका चलती रहे, अपनी मनमानी होती रहे, अपनी मान-बड़ाई (शरीरका मान और नामकी बड़ाई)होती रहे, अपना स्वार्थ सिद्ध होता रहे। यही भाव चेलोंका भी रहता है!
गुरु लोभी सिष लालची, दोनों खेले दाँव।
दोनों डूबा ‘परसराम’, बैठ पथरकी नाँव॥
आजकल नकली चीजोंका जमाना है। ब्राह्मण भी नकली, क्षत्रिय भी नकली, वैश्य भी नकली, शूद्र भी नकली, ब्रह्मचारी भी नकली, गृहस्थ भी नकली, वानप्रस्थ भी नकली, साधु भी नकली, यहाँतक कि साग-सब्जी, फूल-पत्ती, मिर्च-मसाले, दूध आदि भी नकली मिलते हैं। हर चीज नकली है तो गुरु भी नकली हैं—
मिथ्यारंभ दंभ रत जोई।
ता कहुँ संत कहइ सब कोई॥
निराचार जो श्रुति पथ त्यागी।
कलिजुग सोइ ग्यानी सो बिरागी॥
(मानस, उत्तर० ९८। २, ४)
साधु होनेमात्रसे कल्याण नहीं होता। मैंने खुद साधु होकर देखा है। इसलिये अपना कल्याण चाहनेवालोंको किसी मनुष्यके फेरमें नहीं आना चाहिये, किसीको गुरु नहीं बनाना चाहिये।
वास्तवमें कल्याण, मुक्ति, तत्त्वज्ञान, परमात्मप्राप्ति गुरुके अधीन नहीं है। अगर बिना गुरु बनाये तत्त्वज्ञान नहीं होता तो सृष्टिमें जो सबसे पहला गुरु रहा होगा, उसको तत्त्वज्ञान कैसे हुआ होगा? अगर बिना किसी मनुष्यको गुरु बनाये उसको तत्त्वज्ञान हो गया तो इससे सिद्ध हुआ कि बिना किसी मनुष्यको गुरु बनाये भी जगद्गुरु भगवान्की कृपासे तत्त्वज्ञान हो सकता है। परन्तु आजकल तो ऐसी प्रथा चल रही है कि पहले चेला बनो, गुरुमन्त्र लो, पीछे उपदेश देंगे। ऐसी दशामें गुरु बनानेपर चेलेकी बड़ी दुर्दशा होती है। भाव बैठता नहीं, लाभ भी दीखता नहीं, भीतरका भ्रम भी मिटता नहीं और छोड़कर दूसरी जगह जा सकते नहीं। मेरेसे कोई सम्मति ले तो मैं कहूँगा कि सत्संग करो और जितना ले सको, उतना लाभ लो, पर किसीको गुरु मत बनाओ। जहाँ-जहाँसे अच्छी बातें मिलें, वहाँ-वहाँसे उनको लेते रहो और जहाँ अच्छी बात न मिले, वहाँसे चल दो। गुरु बनाकर बँधो मत।
मधुलुब्धो यथा भृङ्ग: पुष्पात् पुष्पान्तरं व्रजेत्।
ज्ञानलुब्धस्तथा शिष्यो गुरोर्गुर्वन्तरं व्रजेत्॥
(गुरुगीता)
‘मधुका लोभी भ्रमर जैसे एक पुष्पसे दूसरे पुष्पकी ओर जाता है, ऐसे ही ज्ञानका लोभी शिष्य एक गुरुसे दूसरे गुरुकी ओर जाय।’
गुरु बनानेके बाद आगे जाकर न जाने क्या दशा होगी! मेरेसे ऐसे कई आदमी मिले हैं, जिन्होंने अपनी दृष्टिसे अच्छे-अच्छे गुरु बनाये, पर पीछे उनपर अश्रद्धा हो गयी। अत: जो अपना कल्याण चाहता है, उसको किसीसे भी सम्बन्ध नहीं जोड़ना चाहिये। संसारसे सम्बन्ध जोड़नेवाला अपना ही कल्याण नहीं कर सकता, फिर दूसरेका कल्याण कैसे करेगा?
आजकल असली गुरु मिलना बहुत कठिन है। जो ठीक तत्त्वको जाननेवाला हो, ऐसा देखनेमें नहीं आता। जो स्वयं तत्त्वको नहीं जानता, वह शिष्यको क्या बतायेगा? ठीक तत्त्वको जाननेवाले गुरु पहले भी बहुत कम हुए हैं। पहले हो चुके सन्तोंकी पुस्तकें पढ़ते हैं तो उनसे भी हमें पूरा सन्तोष नहीं होता। सबसे बढ़कर सन्त वे होते हैं, जिनमें मतभेद नहीं होता अर्थात् द्वैत, अद्वैत, द्वैताद्वैत, विशिष्टाद्वैत आदि किसी एक मतका आग्रह नहीं होता। इसलिये साधकके लिये सबसे बढ़िया बात यही है कि वह सच्चे हृदयसे भगवान्में लग जाय। किसी व्यक्तिको न पकड़कर परमात्माको पकड़े। व्यक्तिमें पूर्णता नहीं होती। पूर्णता परमात्मामें होती है। हम सच्चे हृदयसे परमात्माके सम्मुख हो जायँ तो वे योग, ज्ञान, भक्ति—सब कुछ दे देते हैं*।
मनुष्यका जन्मजात गुरु—विवेक
एक मार्मिक बात है कि जगद्गुरु भगवान् अपनी प्राप्तिके लिये मनुष्यशरीर देते हैं तो साथमें विवेकरूपी गुरु भी देते हैं। भगवान् अधूरा काम नहीं करते। जैसे बड़े अफसरोंको मकान, नौकर, मोटर आदि सब सुविधाएँ मिलती हैं, ऐसे ही भगवान् मनुष्यशरीरके साथ-साथ कल्याणकी सब सामग्री भी देते हैं। वे मनुष्यको ‘विवेक’-रूपी गुरु देते हैं, जिससे वह सत् और असत्, कर्तव्य और अकर्तव्य, ठीक और बेठीक आदिको जान सकता है। इस विवेकसे बढ़कर कोई गुरु नहीं है। जो अपने विवेकका आदर करता है, उसको अपने कल्याणके लिये बाहरी गुरुकी जरूरत नहीं पड़ती। जो अपने विवेकका आदर नहीं करता, वह बाहरी गुरु बनाकर भी अपना कल्याण नहीं कर सकता। इसलिये बाहरी गुरु बनानेपर भी कल्याण नहीं होता।
मनुष्य जितना-जितना विवेकको महत्त्व देता है, उसको काममें लाता है, उतना-उतना उसका विवेक बढ़ता जाता है और बढ़ते-बढ़ते वही विवेक तत्त्वज्ञानमें परिणत हो जाता है। विवेकका आदर गुरु बनानेसे नहीं होता, प्रत्युत सत्संगसे होता है—‘बिनु सतसंग बिबेक न होई’ (मानस, बाल० ३।४)। अच्छे सन्त-महात्मा शिष्य नहीं बनाते तो भी उनका सत्संग करनेसे उद्धार हो जाता है। उनके आचरणोंसे शिक्षा मिलती है, उनकी वाणीसे शास्त्र बनते हैं। अत: जहाँ अच्छा सत्संग मिले, अपने उद्धारकी बात मिले, वहाँ सत्संग करना चाहिये, पर जहाँतक बने, गुरु-शिष्यका सम्बन्ध नहीं जोड़ना चाहिये।
मेवाड़के राजाके चाचा थे—महाराज चतुरसिंहजी। वे सत्संग सुनते और उसमें कोई बढ़िया बात मिलती तो सुनते ही वहाँसे चल देते कि अब इस बातको काममें लाना है। वे ऐसा निर्णय कर लेते कि अब यह बात हमारी उम्रसे नहीं निकलेगी। ऐसा करनेसे वे अच्छे सन्त हो गये। उन्होंने अनेक अच्छे ग्रन्थोंकी रचना की और वे मेवाड़ी भाषाके वाल्मीकि कहलाये। इस तरह आपको जो भी अच्छी बात मिले, उसको ग्रहण करते जाओ तो आप भी सन्त हो जाओगे।
कल्याणमें शिष्यकी मुख्यता
गुरुजी किसी गद्दीके महन्त हों, उनके पास लाखों-करोड़ों रुपये हों तो उनसे रुपये प्राप्त करनेमें गुरुकी मुख्यता है। गुरु चेलेको स्वीकार करेगा, तभी चेलेको धन मिलेगा। गुरुकी मरजीके बिना चेला उनसे धन नहीं ले सकेगा। इस प्रकार धनकी प्राप्तिमें तो गुरुकी मुख्यता है, पर कल्याण और विद्याकी प्राप्तिमें चेलेकी ही मुख्यता है। अगर चेलेमें अपने कल्याणकी भूख न हो तो गुरु उसका कल्याण नहीं कर सकता। परन्तु चेलेमें अपने कल्याणकी भूख हो तो गुरुके द्वारा उसको स्वीकार न करनेपर भी वह अपना कल्याण कर लेगा।
स्वामी रामानन्दजी महाराजने कबीरको शिष्य बनानेसे मना कर दिया तो वे एक दिन पंचगंगा घाटकी सीढ़ियोंपर लेट गये। रामानन्दजी महाराज स्नानके लिये वहाँसे गुजरे तो अनजानमें उनका पैर कबीरपर पड़ गया और वे ‘राम-राम’ बोल उठे। कबीरने ‘राम’-नामको ही गुरुमन्त्र मान लिया और साधनामें लग गये। परिणाममें कबीर सन्तोंमें चक्रवर्ती सन्त हुए! द्रोणाचार्यजीने एकलव्यको शिष्यरूपसे स्वीकार नहीं किया तो उसने द्रोणाचार्यकी प्रतिमा बनाकर और उनको गुरु मानकर धनुर्विद्याका अभ्यास शुरू कर दिया। परिणाममें वह अर्जुनसे भी तेज हो गया! अत: गुरु बनानेसे ही कल्याण होगा—यह बात है ही नहीं। अगर ऐसी बात होती तो जिन्होंने गुरु बना लिया, क्या उन सबका कल्याण हो गया? क्या उन सबको भगवान् मिल गये? जिसके उपदेशसे, मार्गदर्शनसे हमारा कल्याण हो जाय, वही वास्तवमें हमारा गुरु है, चाहे हम उसको गुरु मानें या न मानें, चाहे वह हमें चेला माने या न माने और चाहे गुरुको हमारा पता हो या न हो। दत्तात्रेयजीने अपने चौबीस गुरुओंकी बात बतायी तो क्या किसीने आकर उनसे कहा कि तू मेरा चेला है और मैं तेरा गुरु हूँ? गुरु ऐसा बनाना चाहिये कि गुरुको पता ही न चले कि कोई मेरा चेला है!
भगवत्प्राप्ति गुरुके अधीन नहीं
जिसको हम प्राप्त करना चाहते हैं, वह परमात्मतत्त्व एक जगह सीमित नहीं है, किसीके कब्जेमें नहीं है, अगर है तो वह हमें क्या निहाल करेगा? परमात्मतत्त्व तो प्राणिमात्रको नित्य प्राप्त है। जो उस परमात्मतत्त्वको जाननेवाले महात्मा हैं, वे न गुरु बनते हैं, न कोई फीस (भेंट) लेते हैं, प्रत्युत सबको चौड़े बताते हैं। जो गुरु नहीं बनते, वे जैसी तत्त्वकी बात बता सकते हैं, वैसी तत्त्वकी बात गुरु बननेवाले नहीं बता सकते।
सौदा करनेवाले व्यक्ति गुरु नहीं होते। जो कहते हैं कि पहले हमारा शिष्य बनो, फिर हम भगवत्प्राप्तिका रास्ता बतायेंगे, वे मानो भगवान्की बिक्री करते हैं। यह सिद्धान्त है कि कोई वस्तु जितने मूल्यमें मिलती है, वह वास्तवमें उससे कम मूल्यकी होती है। जैसे कोई घड़ी सौ रुपयोंमें मिलती है तो उसको लेनेमें दूकानदारके सौ रुपये नहीं लगे हैं। अगर गुरु बनानेसे ही कोई चीज मिलेगी तो वह गुरुसे कम दामवाली अर्थात् गुरुसे कमजोर ही होगी। फिर उससे हमें भगवान् कैसे मिल जायँगे? भगवान् अमूल्य हैं। अमूल्य वस्तु बिना मूल्यके मिलती है और जो वस्तु मूल्यसे मिलती है, वह मूल्यसे कमजोर होती है। इसलिये कोई कहे कि मेरा चेला बनो तो मैं बात बताऊँगा, वहाँ हाथ जोड़ देना चाहिये! समझ लेना चाहिये कि कोई कालनेमि है! नकली गुरु बने हुए कालनेमि राक्षसने हनुमान् जी से कहा था—
सर मज्जन करि आतुर आवहु।
दिच्छा देउँ ग्यान जेहिं पावहु॥
(मानस, लंका० ५७।४)
उसकी पोल खुलनेपर हनुमान् जी ने कहा कि पहले गुरुदक्षिणा ले लो, पीछे मन्त्र देना और पूँछमें सिर लपेटकर उसको पछाड़ दिया!
कल्याणकी प्राप्तिमें अपनी लगन कारण
भगवान्ने गीतामें स्पष्ट कहा है—
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन:॥
(६।५)
‘अपने द्वारा अपना उद्धार करे, अपना पतन न करे; क्योंकि आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है।’
तात्पर्य है कि अपने उद्धार और पतनमें मनुष्य स्वयं ही कारण है, दूसरा कोई नहीं। भगवान्ने मनुष्यशरीर दिया है तो अपने कल्याणकी सामग्री भी पूरी दी है। इसलिये अपने कल्याणके लिये दूसरेकी जरूरत नहीं है।
गुरु, सन्त और भगवान् भी तभी उद्धार करते हैं, जब मनुष्य स्वयं उनपर श्रद्धा-विश्वास करता है, उनको स्वीकार करता है, उनके सम्मुख होता है, उनकी आज्ञाका पालन करता है। अगर मनुष्य उनको स्वीकार न करे तो वे कैसे उद्धार करेंगे? नहीं कर सकते। खुद शिष्य न बने तो गुरु क्या करेगा? जैसे, दूसरा व्यक्ति भोजन तो दे देगा, पर भूख खुदकी चाहिये। खुदकी भूख न हो तो दूसरेके द्वारा दिया गया बढ़िया भोजन भी किस कामका? ऐसे ही खुदकी लगन न हो तो गुरुका, सन्त-महात्माओंका उपदेश किस कामका?
गुरु, सन्त और भगवान्का कभी अभाव नहीं होता। अनेक बड़े-बड़े सन्त हो गये, आचार्य हो गये, गुरु हो गये, भगवान्के अवतार हो गये, पर अभीतक हमारा उद्धार नहीं हुआ है! इससे सिद्ध होता है कि हमने ही उनको स्वीकार नहीं किया। अत:अपने उद्धार और पतनमें हम ही हेतु हैं। जो अपने उद्धार और पतनमें दूसरेको हेतु मानता है, उसका उद्धार कभी हो ही नहीं सकता।
वास्तवमें मनुष्य आप ही अपना गुरु है—‘आत्मनो गुरुरात्मैव पुरुषस्य विशेषत:’ (श्रीमद्भा० ११।७।२०)। इसलिये उपदेश अपनेको ही दे। दूसरेमें कमी न देखकर अपनेमें ही कमी देखे और उसको दूर करनेकी चेष्टा करे। वह आप ही अपना गुरु बने, आप ही अपना नेता बने और आप ही अपना शासक बने। तात्पर्य हुआ कि वास्तवमें कल्याण न गुरुसे होता है और न ईश्वरसे ही होता है, प्रत्युत हमारी सच्ची लगनसे होता है। खुदकी लगनके बिना भगवान् भी कल्याण नहीं कर सकते। अगर कर देते तो हम आजतक कल्याणसे वंचित क्यों रहते? न तो गुरुका अभाव है, न सन्त-महात्माओंका अभाव है और न भगवान्का ही अभाव है। अभाव हमारी लगनका है। कल्याणकी प्राप्ति न गुरुके अधीन है, न सन्त-महात्माओंके अधीन है और न भगवान्के अधीन है। यह तो स्वयंके ही अधीन है। जब हमारी लगनके बिना सर्वशक्तिमान् भगवान् भी हमारा कल्याण नहीं कर सकते, तो फिर मनुष्यमें कितनी शक्ति है कि हमारा कल्याण कर दे? हमारी लगन नहीं होगी तो लाखों-करोड़ों गुरु बना लें तो भी कल्याण नहीं होगा। अगर हमारे हृदयकी सच्ची लगन होगी तो गुरु भी मिल जायगा, सन्त भी मिल जायँगे, भगवान् भी मिल जायँगे, अच्छी पुस्तकें भी मिल जायँगी, ज्ञान भी मिल जायगा। कैसे मिलेगा, किस तरहसे मिलेगा—यह भगवान् जानें! फल पककर तैयार होता है तो तोता आकर स्वयं उसको चोंच मारता है। ऐसे ही हम सच्चे शिष्य बन जायँ तो सच्चा गुरु खुद हमारे पास आयेगा। शिष्यको गुरुकी जितनी आवश्यकता रहती है, उससे अधिक आवश्यकता गुरुको चेलेकी रहती है! हमारी लगन सच्ची होगी तो कोई कपटी गुरु भी मिल जायगा तो भगवान् छुड़ा देंगे। हमें कोई अटका सकेगा ही नहीं। जिसके भीतर अपने उद्धारकी लगन होती है, वह किसी जगह अटकता (फँसता) नहीं—यह नियम है। सच्चे जिज्ञासुको सच्चा सत्संग मिल जाय तो वह उसको चट पकड़ लेता है।
अगर आप अपना उद्धार चाहते हैं तो उसमें बाधा कौन दे सकता है? और अगर आप अपना उद्धार नहीं चाहते तो आपका उद्धार कौन कर सकता है? कितने ही अच्छे गुरु हों, सन्त हों, पर आपकी इच्छाके बिना कोई आपका उद्धार नहीं कर सकता। अगर आप अपने उद्धारके लिये तैयार हो जाओ तो सन्त-महात्मा ही नहीं, चोर-डाकू भी आपकी सहायता करेंगे, दुष्ट भी आपकी सेवा करेंगे, सिंह, सर्प आदि भी आपकी सेवा करेंगे! इतना ही नहीं, दुनियामात्र आपकी सेवा करनेवाली हो जायगी। मैंने ऐसा कई बार देखा है कि अगर सच्चे हृदयसे भगवान्में लगे हुए व्यक्तिको कोई दु:ख देता है तो वह दु:ख भी उसकी उन्नतिमें सहायक हो जाता है! दूसरा तो उसको दु:ख देनेकी नीयतसे काम करता है, पर उसका भला हो जाता है! इतना ही नहीं, जो भगवान्को नहीं मानता, उसमें भी अगर अपने कल्याणकी लगन पैदा हो जाय तो उसका भी कल्याण हो जाता है।
धनी आदमी काम करनेके लिये नौकर रख लेते हैं, पूजन करनेके लिये ब्राह्मण रख लेते हैं, पर भोजन करने और दवा लेनेके लिये कोई नौकर या ब्राह्मण नहीं रखता। भूख लगनेपर भोजन खुदको ही करना पड़ता है। रोगी होनेपर दवा खुदको ही लेनी पड़ती है। जब रोटी भी खुद खानेसे भूख मिटती है, दवा भी खुद लेनेसे रोग मिटता है, तो फिर कल्याण अपनी लगनके बिना कैसे हो जायगा? आप तत्परतासे भगवान्में लग जाओ तो गुरु, सन्त, भगवान्—सब आपकी सहायता करनेके लिये तैयार हैं, पर कल्याण तो खुदको ही करना पड़ेगा। इसलिये गुरु हमारा कल्याण कर देगा—यह पूरी ठगाई है!
माँ कितनी ही दयालु क्यों न हो, पर आपकी भूख नहीं हो तो वह भोजन कैसे करायेगी? ऐसे ही आपमें अपने कल्याणकी उत्कण्ठा न हो तो भगवान् परम दयालु होते हुए भी क्या करेंगे? चीर-हरणके समय द्रौपदीने भगवान्को पुकारा तो वे वस्त्ररूपसे प्रकट हो गये, पर जुएमें हारते समय युधिष्ठिरने भगवान्को पुकारा ही नहीं तो वे कैसे आयें? युधिष्ठिरने तेरह वर्षोंतक वनमें दु:ख पाया। कुन्ती माताने भगवान् श्रीकृष्णसे कहा कि ‘कन्हैया! क्या तेरेको पाण्डवोंपर दया नहीं आती?’ भगवान्ने कहा कि ‘मैं क्या करूँ, युधिष्ठिरने जुएमें राज्य, धन-सम्पत्ति आदि सब कुछ लगा दिया, पर मेरेको याद ही नहीं किया!’
भगवान् सबके गुरु हैं
भगवान् जगत् के गुरु हैं—
‘कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्’
‘जगद्गुरुं च शाश्वतम्’
(मानस, अरण्य० ४। ९)
वे केवल गुरु ही नहीं, प्रत्युत गुरुओंके भी परम गुरु हैं—
‘स ईश: परमो गुरोर्गुरु:’
(श्रीमद्भा० ८। २४। ४८)
‘त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्’
(गीता ११। ४३)
राजा सत्यव्रत भगवान्से कहते हैं—
अचक्षुरन्धस्य यथाग्रणी: कृत-
स्तथा जनस्याविदुषोऽबुधो गुरु:।
त्वमर्कदृक् सर्वदृशां समीक्षणो
वृतो गुरुर्न: स्वगतिं बुभुत्सताम्॥
(श्रीमद्भा० ८। २४। ५०)
‘जैसे कोई अन्धा अन्धेको ही अपना पथ-प्रदर्शक बना ले, वैसे ही अज्ञानी जीव अज्ञानीको ही अपना गुरु बनाते हैं। आप सूर्यके समान स्वयं प्रकाश और समस्त इन्द्रियोंके प्रेरक हैं। हम आत्मतत्त्वके जिज्ञासु आपको ही गुरुके रूपमें वरण करते हैं।’
भक्तराज प्रह्लादजी कहते हैं—
शास्ता विष्णुरशेषस्य जगतो यो हृदि स्थित:।
तमृते परमात्मानं तात क: केन शास्यते॥
(विष्णुपुराण १। १७। २०)
‘हृदयमें स्थित भगवान् विष्णु ही तो सम्पूर्ण जगत् के उपदेशक हैं। हे तात! उन परमात्माको छोड़कर और कौन किसको कुछ सिखा सकता है? नहीं सिखा सकता।’
भगवान् जगत् के गुरु हैं और हम भी जगत् के भीतर ही हैं। इसलिये वास्तवमें हम गुरुसे रहित नहीं हैं। हम असली महान् गुरुके शिष्य हैं। कलियुगी गुरुओंसे तो बड़ा खतरा है, पर जगद्गुरु भगवान्से कोई खतरा नहीं है! कोरा लाभ-ही-लाभ है, नुकसान कोई है ही नहीं। इसलिये भगवान्को गुरु मानें और उनकी गीताको पढ़ें, उसके अनुसार अपना जीवन बनायें तो हमारा निश्चितरूपसे कल्याण हो जायगा। कृष्ण, राम, शंकर, हनुमान्, गणेश, सूर्य आदि किसीको भी अपना गुरु मान सकते हैं। गजेन्द्रने कहा था—
य: कश्चनेशो बलिनोऽन्तकोरगात्
प्रचण्डवेगादभिधावतो भृशम्।
भीतं प्रपन्नं परिपाति यद्भया-
न्मृत्यु: प्रधावत्यरणं तमीमहि॥
(श्रीमद्भा० ८। २। ३३)
‘जो कोई ईश्वर प्रचण्ड वेगसे दौड़ते हुए अत्यन्त बलवान् कालरूपी साँपसे भयभीत होकर शरणमें आये हुएकी रक्षा करता है और जिससे भयभीत होकर मृत्यु भी दौड़ रही है, उसीकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ।’
गजेन्द्रके कथनका तात्पर्य है कि ईश्वर कैसा है, उसका क्या नाम है—यह सब मैं नहीं जानता, पर जो कोई ईश्वर है, उसकी मैं शरण लेता हूँ। इस प्रकार हम भी ईश्वरकी शरण हो जायँ तो वह गुरु भेज देगा अथवा स्वयं ही गुरु हो जायगा।
हम भगवान्के अंश हैं—‘ममैवांशो जीवलोके’ (गीता १५।७); अत: हमारे गुरु, माता, पिता आदि सब वे ही हैं। वास्तवमें हमें गुरुसे सम्बन्ध नहीं जोड़ना है, प्रत्युत भगवान्से ही सम्बन्ध जोड़ना है। सच्चा गुरु वही होता है, जो भगवान्के साथ सम्बन्ध जोड़ दे। भगवान्के साथ सम्बन्ध जोड़नेके लिये किसीसे सलाह लेनेकी जरूरत नहीं है। भगवान्के साथ जीवमात्रका स्वतन्त्र सम्बन्ध है। उसमें किसी दलालकी जरूरत नहीं है। हम पहले गुरु बनायेंगे, फिर गुरु हमारा सम्बन्ध भगवान्के साथ जोड़े तो भगवान् हमारेसे एक पीढ़ी दूर हो गये! हम पहलेसे ही सीधे भगवान्के साथ सम्बन्ध जोड़ लें तो बीचमें दलालकी जरूरत ही नहीं। मुक्ति हमारे न चाहनेपर भी जबर्दस्ती आयेगी—
अति दुर्लभ कैवल्य परम पद।
संत पुरान निगम आगम बद॥
राम भजत सोइ मुकुति गोसाईं।
अनइच्छित आवइ बरिआईं॥
(मानस, उत्तर० ११९। २)
इसलिये भगवान् गीतामें कहते हैं—
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
(गीता ९। ३४, १८। ६५)
‘तू मेरा भक्त हो जा, मुझमें मनवाला हो जा, मेरा पूजन करनेवाला हो जा और मुझे नमस्कार कर।’
सर्व धर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
(गीता १८। ६६)
‘सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय छोड़कर तू केवल मेरी शरणमें आजा।’
भगवान् गुरु न बनकर अपनी शरणमें आनेके लिये कहते हैं।