नित्यप्राप्तकी प्राप्ति

साधक परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति, तत्त्वज्ञान, मुक्ति आदि चाहता है तो उससे एक मूल भूल यह होती है कि वह संसारके सम्बन्धको, जन्म-मरणको तो स्वाभाविक मान लेता है और परमात्मप्राप्तिको अस्वाभाविक (कृतिसाध्य) मान लेता है। उसके भीतर ये बातें जँची हुई रहती हैं कि जन्म-मरण तो सदासे चले आ रहे हैं और मुक्ति हमारे करनेसे होगी; संसारकी प्राप्ति तो पहलेसे है, पर परमात्माकी प्राप्ति नया काम है; संसार तो नजदीक है, पर परमात्मा दूर हैं; संसार तो प्राप्त ही है, पर परमात्मा प्राप्त होते हैं कि नहीं होते—इसका पता नहीं, संसार तो है पर परमात्मा हैं कि नहीं, पता नहीं; संसार तो हमारे सामने है, पर परमात्मा सामने नहीं दीखते; आदि-आदि। परन्तु वास्तवमें संसारकी प्राप्ति अस्वाभाविक है और परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति स्वाभाविक है। दूसरे शब्दोंमें, संसारका सम्बन्ध कृत्रिम (बनावटी) है और परमात्माका सम्बन्ध वास्तविक है। बनावटी बात टिक नहीं सकती और वास्तविक बात मिट नहीं सकती।

यह सबके अनुभवकी बात है कि बालकपना चला गया, जवानी चली गयी, रोग चला गया, नीरोगता चली गयी, निर्धनता चली गयी, धनवत्ता चली गयी, पर हम चले गये क्या? ऐसे ही सब संसार बदल गया, पर परमात्मा बदल गये क्या? तात्पर्य है कि शरीर तथा संसार बदलनेवाले हैं और हम तथा परमात्मा नहीं बदलनेवाले हैं। इसलिये शरीर और संसार एक हैं, हम और परमात्मा एक हैं। शरीर और संसार एक होनेके कारण ही संसार शरीरको प्राप्त दीखता है। परन्तु शरीरमें अहंता-ममता करनेसे अर्थात् उसको मैं-मेरा माननेसे शरीर हमें प्राप्त दीखता है। वास्तवमें शरीर-संसार कभी किसीको प्राप्त हुए ही नहीं, हो सकते ही नहीं। अप्राप्तको प्राप्त माननेके कारण ही नित्यप्राप्त परमात्मा अप्राप्त दीख रहे हैं।

हमारा स्वरूप नित्य ज्यों-का-त्यों रहनेवाला है। अगर यह नित्य ज्यों-का-त्यों न रहे तो स्वर्ग कौन भोगेगा? नरकोंमें कौन जायगा? जन्म-मरणमें कौन जायगा? मुक्त कौन होगा? परमात्मा भी नित्य ज्यों-के-त्यों रहनेवाले हैं। हमने संसारको सत्ता और महत्ता देकर उसके साथ सम्बन्ध जोड़ रखा है। अगर इस बनावटी सम्बन्धका त्याग कर दें तो परमात्माकी प्राप्ति और संसारकी अप्राप्ति स्वत:सिद्ध है। भूल यही होती है कि हम संसारकी सत्ताको नित्य मान लेते हैं और मुक्तिकी सत्ताको अनित्य मान लेते हैं। इसलिये हमारी ऐसी धारणा रहती है कि संसारके साथ हमारा सम्बन्ध स्वत: है और इस सम्बन्धको हम छोड़ेंगे तो मुक्ति हो जायगी अथवा संसारका सम्बन्ध छूटना बड़ा मुश्किल है, मोक्षकी प्राप्ति बड़ी कठिन है, परमात्माको प्राप्त करनेमें समय भी बहुत लगेगा और परिश्रम भी होगा, आदि।

वास्तवमें संसारका सम्बन्ध कभी टिकता नहीं, कभी टिका नहीं, कभी टिकेगा नहीं, टिक सकता ही नहीं। ऐसे ही परमात्माका सम्बन्ध कभी मिटता नहीं, कभी मिटा नहीं, कभी मिटेगा नहीं, मिट सकता ही नहीं। संसारसे संयोग और परमात्मासे वियोग केवल हमारा माना हुआ है, वास्तवमें है नहीं। इसलिये जो साधनमें लगे हुए हैं, उनके मनमें कभी संसारकी आसक्ति आ जाय, सत्ता आ जाय तो समझना चाहिये कि भीतर जो कूड़ा-कचरा पड़ा हुआ है, वह निकल रहा है। मनुष्य दरवाजेसे आता हुआ भी दीखता है और जाते हुए भी दीखता है। अत: भीतरका कूड़ा-कचरा जाते हुए दीख रहा है। उसको मिटानेकी चेष्टा करेंगे तो वह उलटे दृढ़ होगा। किसी भी विपरीत बातको मिटानेकी चेष्टा करेंगे तो मिटानेकी चेष्टा तो दो नम्बरकी होगी, पर उसको जमाने (दृढ़ करने)-की चेष्टा एक नम्बरकी होगी। कारण कि हम उसीको मिटानेकी चेष्टा करते हैं, जिसकी हम सत्ता स्वीकार करते हैं। जिसकी सत्ता ही नहीं है, उसको क्या मिटायें? इसलिये उसको मिटानेकी जरूरत नहीं है। उसकी उपेक्षा कर दें तो वह स्वत: मिट जायगी; क्योंकि वह निरन्तर मिट ही रही है। तात्पर्य है कि अज्ञान अपने-आप मिट रहा है, बन्धन अपने-आप छूट रहा है, साधक उसको मिटानेका उद्योग नहीं करे, प्रत्युत उसकी उपेक्षा कर दे, उसकी बेपरवाह कर दे, उससे उदासीन हो जाय। जैसे एक छोटी-सी दियासलाईसे प्रकट हुई अग्निमें इतनी ताकत है कि वह घासके ढेरको जला देती है, ऐसे ही असत‍्की उपेक्षामें इतनी ताकत है कि वह असत् को मिटाकर सत् का साक्षात्कार करा देगी। गीतामें भगवान‍्ने कहा है—

स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥

(२।४०)

‘इस (समतारूपी) धर्मका थोड़ा-सा भी अनुष्ठान (जन्म-मरणरूप) महान् भयसे रक्षा कर लेता है।’

—इसका कारण यह है कि निष्कामभाव थोड़ा होते हुए भी सत्य है और भय महान् होते हुए भी असत्य है। जैसे मनभर रूई हो तो उसको जलानेके लिये मनभर अग्निकी जरूरत नहीं है। रूई एक मन हो या सौ मन, उसको जलानेके लिये एक दियासलाई पर्याप्त है। एक दियासलाई लगाते ही वह रूई खुद दियासलाई अर्थात् अग्नि बन जायगी। रूई खुद दियासलाईकी मदद करेगी। अग्नि रूईके साथ नहीं होगी, प्रत्युत रूई खुद ज्वलनशील होनेके कारण अग्निके साथ हो जायगी। इसी तरह असंगता आग है और संसार रूई है। संसारसे असंग होते ही संसार अपने-आप नष्ट हो जायगा; क्योंकि मूलमें संसारकी सत्ता न होनेसे उससे कभी संग हुआ ही नहीं।

थोड़े-से-थोड़ा त्याग भी सत् है और महान्-से-महान् क्रिया भी असत् है। क्रियाका तो अन्त होता है, पर त्याग अनन्त होता है। इसलिये यज्ञ, दान, तप आदि क्रियाएँ तो फल देकर नष्ट हो जाती हैं*, पर त्याग कभी नष्ट नहीं होता—‘त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्’ (गीता १२। १२)। एक अहम् के त्यागसे अनन्त सृष्टिका त्याग हो जाता है; क्योंकि अहम‍्ने ही सम्पूर्ण जगत् को धारण कर रखा है।

जैसे, कितनी ही घास हो, क्या अग्निके सामने टिक सकती है? कितना ही अँधेरा हो, क्या प्रकाशके सामने टिक सकता है? अँधेरे और प्रकाशमें लड़ाई हो जाय तो क्या अँधेरा जीत जायगा? ऐसे ही अज्ञान और ज्ञानकी लड़ाई हो जाय तो क्या अज्ञान जीत जायगा? महान्-से-महान् भय क्या अभयके सामने टिक सकता है? पहलेके कितने ही संस्कार पड़े हुए हों, क्या सत्संगसे वे जीत जायँगे? समता थोड़ी हो तो भी पूरी है और भय महान् हो तो भी अधूरा है। स्वल्प भी महान् है; क्योंकि वह सच्चा है और महान् भी स्वल्प (सत्ताहीन) है; क्योंकि वह कच्चा है।

प्रश्न—समता, निष्कामभावको ‘स्वल्प’ (थोड़ा) कहनेका क्या तात्पर्य है?

उत्तर—निष्कामभाव तो महान् है, पर हमारी समझमें, हमारे अनुभवमें थोड़ा आनेसे उसको स्वल्प कह दिया है। वास्तवमें समझ थोड़ी हुई, समता थोड़ी नहीं हुई। उधर हमारा खयाल कम गया है, दृष्टि कम गयी है तो हमारी दृष्टिमें कमी है, तत्त्वमें कमी नहीं है। इसी तरह हमने असत् को ज्यादा आदर दे दिया तो असत् महान् नहीं हुआ, प्रत्युत हमारा आदर महान् हुआ। इसलिये अगर हम सत् का अधिक आदर करें तो सत् महान् हो जायगा अर्थात् उसकी महत्ताका अनुभव हो जायगा, और असत् का आदर न करें तो असत् स्वल्प हो जायगा। वास्तवमें असत् महान् हो या स्वल्प, उसकी सत्ता ही नहीं है—‘नासतो विद्यते भाव:’ और सत् महान् हो या स्वल्प, उसकी सत्ता नित्य-निरन्तर है—‘नाभावो विद्यते सत:’। इसलिये उपनिषद्ने परमात्मतत्त्वको अणुसे भी अणु और महान् से भी महान् कहा है—‘अणोरणीयान् महतो महीयान्’ (कठ० १। २। २०; श्वेताश्वतर० ३।२०)।

जिसकी सत्ता ही नहीं है, उस असत् का आदर करना, उसको महत्त्व देना बहुत बड़ी भूल है। कभी साधकके मनमें उसकी सत्ता आ जाय तो उसकी उपेक्षा कर देनी चाहिये; क्योंकि जो कभी है और कभी नहीं है, उसकी सत्ता कभी नहीं है। जो किसी देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदिमें है और किसी देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदिमें नहीं है, वह वास्तवमें किसी भी देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदिमें नहीं है अर्थात् उसका स्वत:सिद्ध नित्य अभाव है। परन्तु असत् को सत्य मान लिया और सम्पूर्ण देश-कालादिमें नित्य-निरन्तर विद्यमान परमात्माको उद्योगसाध्य मान लिया—यह भूल है। जैसे, हम कहते हैं कि सूर्य बादलसे ढक गया, तो जो सूर्य पृथ्वीमण्डलसे भी बड़ा है, वह छोटे-से बादलसे कैसे ढक जायगा? अत: वास्तवमें सूर्य नहीं ढका जाता, प्रत्युत हमारी आँख ढक जाती है। ऐसे ही परमात्मतत्त्व नहीं ढका जाता, प्रत्युत हमारी बुद्धि ढकी जाती है। बुद्धिमें असत् की सत्ता बैठी हुई है, इसलिये परमात्मा दीखते नहीं। तात्पर्य है कि असत् की सत्तारूपसे जो धारणा है, यही परमात्मप्राप्तिमें बाधक है।

अगर हम सच्चे हृदयसे साधनमें लगे हुए हैं, सत्संग कर रहे हैं, तो असत् की निवृत्ति करनी नहीं पड़ेगी, प्रत्युत उसकी निवृत्ति स्वत: हो जायगी। जैसे, छोटा बच्चा माँकी गोदमें प्रतिदिन वैसा-का-वैसा ही दीखता है; परन्तु एक महीनेके बाद देखें तो उसमें फर्क दीखेगा, एक वर्षके बाद देखें तो और अधिक फर्क दीखेगा। ऐसे ही सत्संग करते हुए हम वैसे-के-वैसे ही दीखते हैं, पर वास्तवमें वैसे नहीं रहते। पहलेवाली दशाको याद करें और अभीकी दशा देखें, दोनोंका मिलान करें, तब पता लगेगा। जो व्यक्ति सत्संग नहीं करते हैं, उनसे मिलें, तब पता लगेगा। हम तो सत्संगमें लग गये, पर हमारे जो मित्र सत्संगमें नहीं लगे, उनसे मिलें, तब पता लगेगा। फिर भी तत्काल सिद्धि न होनेमें मूल कारण हमारी यह मान्यता है कि बन्धनमें तो हम हैं, मुक्ति हमें करनी है! व्याख्यान देनेवालोंसे, कथा करनेवालोंसे और पुस्तकोंसे भी यही बात मिलेगी कि अज्ञान सदासे है, हम सदासे जन्म-मरणमें पड़े हुए हैं, इसको मिटाना है और तत्त्वज्ञानको, मुक्तिको, परमात्माको प्राप्त करना है! परन्तु यह तत्त्वकी बात नहीं है। तत्त्वकी बात तो यह है कि जो नित्यनिवृत्त है, उसीकी निवृत्ति करनी है और जो नित्यप्राप्त है, उसीकी प्राप्ति करनी है। जो नित्यनिवृत्त है, नित्य अप्राप्त है, उसको हमने सत्ता और महत्ता दे दी, इसीलिये नित्यप्राप्तकी प्राप्तिमें समय लग रहा है।

गीता कहती है—‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:’ (२। १६) ‘जो असत् है, उसका भाव (सत्ता) विद्यमान नहीं है अर्थात् उसका अभाव ही है और जो सत् है, उसका अभाव विद्यमान नहीं है अर्थात् उसका भाव ही है।’ जो ‘नहीं’ है, वह असत् है और जो ‘है’, वह सत् है। ‘नहीं’ में ‘है’-बुद्धि और ‘है’ में ‘नहीं’-बुद्धि—यह विपरीत धारणा ही परमात्मप्राप्तिमें बाधक हो रही है। हमारे देखनेमें, सुननेमें, समझनेमें जो भी संसार आ रहा है, वह सब-का-सब एक क्षण भी टिकता नहीं, प्रतिक्षण बह रहा है; परन्तु उसकी हमने सत्ता मान ली और जो सबमें ज्यों-का-त्यों पूर्ण है, जिसमें कभी किंचिन्मात्र भी परिवर्तन नहीं होता, उस परमात्माका अभाव मान लिया। इस विपरीत धारणाको हमने इतना दृढ़ कर लिया है कि विचारके द्वारा इसको हटानेपर भी यह धारणा पुन: सामने आ जाती है। इसका संस्कार हमारे भीतर दृढ़तासे पड़ा हुआ है। परमात्मा पहले युगोंमें और थे, अब बदलकर और हो गये हैं—ऐसा किसी शास्त्र, कथा आदिमें पढ़ने-सुननेमें नहीं आता। परन्तु शरीर बालकपनमें जैसा था, वैसा आज नहीं है—यह सबके प्रत्यक्ष अनुभवमें आता है। फिर भी हम शरीरको जितना महत्त्व देते हैं, उतना परमात्माको नहीं देते, इसीलिये परमात्मप्राप्ति कठिन हो रही है। गीताप्रेसके संस्थापक, संचालक तथा संरक्षक श्रीजयदयालजी गोयन्दकाने कहा था कि ‘परमात्माकी प्राप्ति भी कठिन हो सकती है—यह बात मेरी समझमें नहीं आती थी; परन्तु जब लोगोंपर आजमाइश की, उनको समझानेका प्रयास किया, तब हमें कठिनता मालूम दी।’ हमारे भीतर असत् की सत्ता बैठी हुई है, इसीलिये परमात्मप्राप्तिमें कठिनता दीख रही है, अन्यथा इसमें कठिनताका प्रश्न ही पैदा नहीं होता। अभी कोई कहे कि रोटी बनाओ तो रोटी बनानेमें समय लगेगा। रोटी बनेगी, तब मिलेगी; क्योंकि वह मौजूद नहीं है। परन्तु जो चीज मौजूद है, उसकी प्राप्तिमें देरी क्यों? परमात्मा सबके लिये सदा ज्यों-के-त्यों मौजूद हैं।

प्रश्न—यह तो हम जानते ही हैं कि परमात्माकी सत्ता है और संसारकी सत्ता नहीं है, फिर भी अनुभव क्यों नहीं हो रहा है?

उत्तर—वास्तवमें इसको जाना नहीं है, प्रत्युत सीखकर मान लिया है। अगर यह जान लें कि साँप काटनेसे आदमी मर जाता है तो क्या साँपको हाथसे पकड़ेंगे? ऐसे ही अगर यह जान लें कि यह असत् है, नाशवान् है तो क्या रुपये इकट्ठे करनेकी मनमें आयेगी? सुख भोगनेकी मनमें आयेगी? झूठ, कपट, बेईमानी करनेकी मनमें आयेगी?

किसी आदमीसे पूछो तो वह यही कहेगा कि हम अभी थोड़े ही मरते हैं! पर वास्तवमें जो भी मरता है, अभी मरता है। मरनेवाला अभी नहीं मरेगा तो क्या कल मरेगा अथवा परसों मरेगा? मरनेवाला जब मरेगा, अभी मरेगा। परन्तु भीतर उलटी बात जँची हुई है कि हम अभी थोड़े ही मरते हैं! कारण यही है कि भीतरमें असत् की सत्ता बैठी हुई है।

हम धन कमा लेंगे, पढ़-लिखकर विद्वान् बन जायँगे, बातें सीख जायँगे, कला-कौशल सीख जायँगे आदि कृतिसाध्य बातोंकी तो हमें उम्मीद रहती है, पर जो स्वत: नित्य-निरन्तर विद्यमान है, उस परमात्मतत्त्वकी उम्मीद ही नहीं होती! उसकी तो तत्काल प्राप्तिकी उम्मीद होनी चाहिये। उसकी तत्काल प्राप्ति इसलिये होनी चाहिये कि वह भी मौजूद है और हम भी मौजूद हैं तथा वे भी हमसे मिलना चाहते हैं और हम भी उससे मिलना चाहते हैं। फिर देरीका कारण क्या है? हमारे मनमें असत् की सत्ता और महत्ता बैठी हुई है, इसीलिये देरी हो रही है।