प्रश्नोत्तर

प्रश्नोत्तरमणिमाला

अर्पण

प्रश्न—अर्पण करनेका क्या तात्पर्य है?

उत्तर—अपनापन छोड़ देना॥ १॥

प्रश्न—भगवान‍्को सर्वस्व अर्पण करनेके बाद क्या पूर्व संस्कारवश निषिद्ध कर्म हो सकता है?

उत्तर—नहीं हो सकता॥ २॥

प्रश्न—क्या भूलवश ऐसा अहंकार हो सकता है कि हमने प्रभुको सर्वस्व अर्पण कर दिया?

उत्तर—नहीं हो सकता। यदि अभिमान होता है तो वास्तवमें पूर्ण समर्पण हुआ ही नहीं। पदार्थोंको भूलसे अपना माना था, वह भूल मिट गयी तो अभिमान कैसा?॥ ३॥

प्रश्न—सर्वस्व अर्पण करनेसे गुणोंके साथ-साथ दोष भी समर्पित हो जायँगे, जैसे मकान बेचनेपर उसमें रहनेवाले साँप-बिच्छू भी उसके साथ चले जाते हैं?

उत्तर—अग्निमें जो भी डाला जाय, वह जलकर अग्निरूप ही हो जाता है। इसीलिये गीतामें आया है—‘शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनै:’ (९। २८) ‘इस प्रकार मेरे अर्पण करनेसे तू कर्मबन्धनसे और शुभ (विहित) और अशुभ (निषिद्ध) सम्पूर्ण कर्मोंके फलोंसे मुक्त हो जायगा।’ ‘अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि’ (१८। ६६) ‘मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा’॥ ४॥

अवतार

प्रश्न—अंशावतार क्या होता है?

उत्तर—भगवान‍्की शक्ति अनन्त है। उस अनन्त शक्तिका एक अंश आनेसे अंशावतार होता है॥ ५॥

प्रश्न—भिन्न-भिन्न कल्पोंमें भगवान‍्की अवतार-लीलामें वही प्राणी रहते हैं या बदल जाते हैं?

उत्तर—भगवान् आवश्यकता पड़नेपर ही पुन: अवतार लेते हैं, पर उनकी लीलाके प्राणी (पात्र) बदलते रहते हैं। जैसे, रामलीलामें सदा एक ही पात्र काम नहीं करते, बदलते रहते हैं॥ ६॥

प्रश्न—कृष्णावतार सब अवतारोंसे विलक्षण क्यों है?

उत्तर—कृष्णावतारमें प्रेमकी मुख्यता है। अन्य अवतारोंमें भी प्रेमका अभाव नहीं है, पर उनमें प्रेम प्रकट नहीं है॥ ७॥

प्रश्न—एक तो भगवान् अवतार लेकर लीला करते हैं और दूसरा, संसारमें जो हो रहा है, वह सब भगवान‍्की लीला है—दोनोंमें क्या फर्क है?

उत्तर—अवतारकी लीला एकदेशीय होती है और उसमें भगवान‍्के भावकी मुख्यता है। होनेवाली लीला सर्वदेशीय होती है और उसमें भक्तके भावकी मुख्यता है॥ ८॥

प्रश्न—भगवान‍्तो युक्तयोगी हैं, फिर अवतारकालमें यह बात क्यों नहीं दीखती? अवतारकालमें वे युंजान योगी क्यों दीखते हैं?*

उत्तर—इसका कारण यह है कि अवतारकालमें भगवान् मनुष्यों-जैसी लीला करते हैं। वे कभी माधुर्यकी लीला करते हैं, कभी ऐश्वर्यकी॥ ९॥

अहम्

प्रश्न—अहम् को करण भी कहा है और कर्ता भी कहा है। करण कर्ता कैसे हो सकता है?

उत्तर—वास्तवमें अहम् करण है, कर्ता तो हम मान लेते हैं—‘कर्ताहमिति मन्यते’

(गीता ३।२७)॥ १०॥

प्रश्न—मैंपन भूलसे माना हुआ है तो यह भूल किसमें है?

उत्तर—माननेवालेमें है। जिसने एकदेशीयताको स्वीकार किया है, उसमें है। यह भूल अनादि है, पर इसका अन्त होता है॥ ११॥

प्रश्न—मन, बुद्धि और अहम् के संस्कार कैसे दूर हों?

उत्तर—मन-बुद्धि-अहम् को छेड़ो मत। उनको मत देखो, एक ‘है’ को देखो। एकदेशीयपना मिट जाय—यह भी मत देखो। कुछ भी मत देखो, चुप हो जाओ, फिर सब स्वत: ठीक हो जायगा। समुद्रमें बर्फके ढेले तैरते हों तो उनको न गलाना है, न रखना है। इसीको सहजावस्था कहते हैं॥ १२॥

प्रश्न—अहम् रूपी अणु टूटना कठिन क्यों दीखता है?

उत्तर—संयोगजन्य सुखकी इच्छाके कारण ही अहंता मिटनी कठिन दीखती है। जीते रहें और सुख-सुविधासे रहें—इसपर अहंता टिकी हुई है॥ १३॥

प्रश्न—‘मैं ज्ञानी हूँ’ और ‘मैं भक्त हूँ’—दोनोंमें अहंभाव समान है, फिर फर्क क्या हुआ?

उत्तर—फर्क यह है कि भक्तिमें तो भगवान‍्का सहारा है, पर ज्ञानमें किसका सहारा है? भगवान‍्का सहारा रहनेके कारण भक्तमें कुछ कमी भी रह जाय, तो भी उसका पतन नहीं होता*॥ १४॥

प्रश्न—बिना अहंकारके निषिद्ध कर्म हो जाय और अहंकारपूर्वक शुभ कर्म हो जाय तो दोनोंमें क्या ठीक है?

उत्तर—अहंकाररहित होनेपर तो कोई भी कर्म लागू नहीं होता*, पर अहंकारके रहते हुए शुभकर्म भी बन्धनकारक हो जाता है॥ १५॥

आनन्द

प्रश्न—सात्त्विक सुख, शान्ति और आनन्दमें क्या फर्क है?

उत्तर—चिन्मयताके सम्बन्धसे (कीर्तन आदिमें) ‘सात्त्विक सुख’ मिलता है। सात्त्विक सुखका भोग न करनेसे ‘शान्ति’ मिलती है। शान्तिका भी उपभोग न करनेसे ‘आनन्द’ मिलता है।

सात्त्विक सुखमें गुण है, शान्ति और आनन्द गुणातीत हैं।

संसारके त्यागसे शान्ति और परमात्माकी प्राप्तिसे आनन्द मिलता है॥ १६॥

प्रश्न—सांसारिक सुख और पारमार्थिक आनन्दमें क्या अन्तर है?

उत्तर—सांसारिक सुख दु:खकी अपेक्षासे है अर्थात् सांसारिक सुखके साथ दु:ख भी है। परन्तु आनन्द निरपेक्ष है, उसके साथ दु:खका मिश्रण नहीं है। सांसारिक सुखमें विकार है, पर आनन्द निर्विकार है। सांसारिक सुख विषयेन्द्रिय-संयोगजन्य है, पर आनन्द संयोगजन्य नहीं है। अत: सांसारिक सुखमें तो भभका है, पर आनन्दमें भभका नहीं है, प्रत्युत वह सम, एकरस, शान्त, निर्विकार है। तात्पर्य है कि विकार, दु:ख, परिवर्तन, कमी, हलचल, विक्षेप, विषमता, पक्षपात आदिका न होना ही ‘आनन्द’ है।

आनन्द दो प्रकारका होता है, अखण्ड आनन्द (निजानन्द) और अनन्त आनन्द (परमानन्द)। मुक्तिका आनन्द ‘अखण्ड आनन्द’ और प्रेमका आनन्द ‘अनन्त आनन्द’ है। अखण्ड आनन्द सम, शान्त, एकरस रहता है और अनन्त आनन्द प्रतिक्षण वर्धमान होता है। अत: प्रेमका आनन्द मुक्तिके आनन्दसे बहुत विलक्षण है। मुक्तिमें तो केवल सांसारिक दु:ख मिटता है और स्वयं वैसा-का-वैसा रहता है, पर प्रेममें स्वयंका अपने अंशी परमात्माकी ओर खिंचाव होता है।

यदि साधक अपना आग्रह न रखे तो शान्तरस अखण्डरसमें और अखण्डरस अनन्तरसमें स्वत: लीन होता है॥ १७॥

प्रश्न—‘सत्’ (अपनी सत्ता)- का अनुभव तो सबको होता है, पर ‘चित्’ और ‘आनन्द’ का अनुभव सबको नहीं होता, इसमें क्या कारण है?

उत्तर—सत् से चित् स्थूल है और चित् से आनन्द स्थूल है। सत् जितना व्यापक है, उतना चित् नहीं और चित् जितना व्यापक है, उतना आनन्द नहीं। इसलिये जैसा सत् का अनुभव होता है, वैसा चित् का नहीं होता और जैसा चित् का अनुभव होता है, वैसा आनन्दका नहीं होता। चित् और आनन्दमें लौकिक चित् और आनन्द भी आ जाता है, इसलिये साधारण लोग क्रियाशील वस्तुको चेतन तथा लौकिक सुखको आनन्द मान लेते हैं।

सत् सब जगह प्रकट है, चित् जीवोंमें प्रकट है और आनन्द तत्त्वज्ञानीमें प्रकट है॥ १८॥

कर्तव्य-कर्म

प्रश्न—कर्मका उपयोग कहाँ है?

उत्तर—संसारसे ऊँचा उठनेके लिये निष्कामभावसे दूसरोंके हितके लिये कर्म करनेकी आवश्यकता है; क्योंकि सकामभावसे अपने लिये कर्म करनेसे ही मनुष्य संसारमें फँसा है। अत: करनेका वेग और वर्तमान रागकी निवृत्तिके लिये कर्म करनेका उपयोग है—‘आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते’ (गीता ६।३)॥ १९॥

प्रश्न—कर्तव्यका पालन कठिन क्यों दीखता है?

उत्तर—कर्तव्य कहते ही उसे हैं, जिसे किया जा सके और जिसे करना चाहिये। जिसे नहीं कर सकते, वह कर्तव्य नहीं होता। अत: कर्तव्यका पालन सबसे सुगम है। अकर्तव्यकी आसक्तिके कारण ही कर्तव्य-पालन कठिन दीखता है॥ २०॥

प्रश्न—कर्तव्य-अकर्तव्यका ज्ञान न होनेमें क्या कारण है?

उत्तर—पक्षपात, विषमता, ममता, आसक्ति, अभिमान—इनके रहनेसे ही कर्तव्य-अकर्तव्यका स्पष्ट ज्ञान नहीं होता॥ २१॥

प्रश्न—निष्कामभावसे भोजन करें तो तृप्तिरूप फल होगा ही, फिर निष्कामभावसे किये कर्मका फल नहीं होता—यह बात कैसे?

उत्तर—निष्कामभावसे किये कर्म भुने हुए बीजके समान हो जाते हैं। भुने हुए बीज खेतीके काम तो नहीं आते, पर खानेके काम तो आते ही हैं। अत: निष्कामभावसे किये कर्मका फल तो होता है, पर वह बन्धनकारक नहीं होता। सकामभावसे किये कर्मका फल ही बन्धनकारक होता है—‘फले सक्तो निबध्यते’ (गीता ५।१२)॥ २२॥

प्रश्न—भक्तिमार्गमें कर्म दिव्य कैसे होते हैं?

उत्तर—भगवान‍्में ज्यादा तल्लीन होनेसे भक्तके कर्म दिव्य हो जाते हैं। मीराबाईका तो शरीर भी दिव्य होकर भगवान‍्के श्रीविग्रहमें लीन हो गया था॥ २३॥

प्रश्न—गीतामें भगवान‍्ने कहा है कि मेरा स्मरण कर और युद्ध अर्थात् कर्तव्य-कर्म भी कर—‘मामनुस्मर युध्य च’ (८।७)। यदि भगवान‍्का स्मरण करेंगे तो कर्तव्य-कर्म ठीक नहीं होगा और कर्तव्य-कर्ममें मन लगायेंगे तो भगवान‍्का स्मरण नहीं होगा; अत: दोनों एक साथ कैसे करें?

उत्तर—प्रत्येक कार्य मन लगाकर करना चाहिये, पर उद्देश्य भगवान‍्का होना चाहिये। प्रत्येक कार्यको भगवान‍्का ही कार्य मानकर करना चाहिये। गहने बनाते समय सुनारके भीतर ‘यह सोना है’—यह बात बैठी रहती है। इसी तरह सब कार्य करते समय साधकके भीतर ‘सब कुछ परमात्मा ही हैं’—यह बात बैठी रहनी चाहिये॥ २४॥

प्रश्न—क्रिया, कर्म, उपासना और विवेक—इन चारोंमें क्या फर्क है?

उत्तर—‘क्रिया’ फलजनक नहीं होती अर्थात् किसी परिस्थितिके साथ सम्बन्ध नहीं जोड़ती। ‘कर्म’ फलजनक होता है अर्थात् सुखदायी-दु:खदायी परिस्थितिके साथ सम्बन्ध जोड़ता है। ‘उपासना’ भगवान‍्के साथ सम्बन्ध जोड़ती है। ‘विवेक’ जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद करता है।

कर्म और उपासनामें जो क्रिया है, वह कल्याण नहीं करती। कर्ममें निष्कामभाव कल्याण करता है और उपासनामें भगवान‍्का सम्बन्ध कल्याण करता है॥ २५॥

कलियुग

प्रश्न—भगवान‍्ने कलियुग क्यों बनाया?

उत्तर—भगवान‍्ने कलियुग इस उद्देश्यसे बनाया कि जीवका जल्दी कल्याण हो जाय! उसके द्वारा किये गये थोडे़ पुण्यकर्मका भी महान् फल हो जाय*! मनुष्यको भगवान‍्के इस उद्देश्यका सदुपयोग करना है, दुरुपयोग नहीं॥ २६॥

प्रश्न—कलियुग कहाँतक अपना प्रभाव डालता है?

उत्तर—कलियुगका प्रभाव इतना ही है कि सत्ययुग आदिमें धर्मका पालन सुगमतासे होता है और कलियुगमें कठिनतासे होता है। कलियुगमें धर्मका पालन कठिनतासे होनेपर भी थोडे़ अनुष्ठानका अधिक पुण्य होता है॥ २७॥

प्रश्न—युगोंका ह्रास जिस क्रमसे होता है, उस क्रमसे उत्थान क्यों नहीं होता? कलियुगके बाद द्वापर न आकर सीधे सत्ययुग क्यों आता है?

उत्तर—प्रकृतिका कार्य स्वत: पतनकी ओर जाता है, पर उत्थान भगवत्कृपासे होता है; जैसे—किसी बातको स्वत: भूल जाते हैं, पर याद करना पड़ता है। अत: भगवान् ही कृपा करके कलियुगके बाद सत्ययुग लाते हैं॥ २८॥

प्रश्न—‘कलि कर एक पुनीत प्रतापा। मानस पुन्य होहिं नहिं पापा॥’ (मानस, उत्तर० १०३।४)—इसका तात्पर्य क्या है?

उत्तर—यह भगवान‍्ने कलियुगमें छूट दी है। मनमें पुण्य-कर्म करनेकी इच्छा हुई, पर किसी कारणसे कर नहीं सके तो भी उसका पुण्य लगेगा। किसी कारणसे मनमें पाप-कर्म करनेकी इच्छा हुई, पर कर सके नहीं और उसका पश्चात्ताप हुआ तो उसका पाप नहीं लगेगा। तात्पर्य है कि मनमें आनेसे पाप नहीं होता, प्रत्युत करनेसे पाप होता है।

जिसकी इच्छा (नीयत) पाप करनेकी है, उसको तो पाप लगेगा ही; क्योंकि इच्छा पापका मूल है, जिससे पाप पैदा होता है*। हाँ, पाप करनेकी नीयत न होनेपर भी किसी कारणसे, पुराने संस्कारोंसे, कलियुगके प्रभावसे मनमें पापकी वासना आ जाय तो उसका दोष नहीं लगेगा॥ २९॥

प्रश्न—आजकल पाखण्डी साधुओंका अधिक प्रचार क्यों होता है?

उत्तर—इसमें कलियुग सहायता करता है। यदि पाखण्डी साधुओंका प्रचार नहीं होगा तो कलियुग कैसे कहलायेगा? वास्तवमें पाखण्डी साधुओंका प्रचार केवल भभका होता है, जो स्थायी नहीं होता। असली, त्यागी साधुका प्रचार स्थायी होता है। उसके द्वारा लोगोंका स्थायी और असली हित होता है। जिसके भीतर थोड़ी भी भोगवासना होती है, उसके द्वारा लोगोंका असली हित नहीं होता॥ ३०॥

प्रश्न—स्वर्णमें कलियुगका निवास बताया गया है; अत: स्त्रियोंको सोनेके गहने पहनने चाहिये या नहीं?

उत्तर—गहना पहननेमें दोष नहीं दीखता। स्वर्णको पवित्र माना गया है। स्वर्णके अभिमानमें कलियुगका निवास है॥ ३१॥

कामना

प्रश्न—सुखभोगकी इच्छा क्यों होती है?

उत्तर—शरीरके साथ अपना सम्बन्ध माननेसे अर्थात् शरीरको मैं, मेरा और मेरे लिये माननेसे ही सुखभोगकी इच्छा होती है॥ ३२॥

प्रश्न—कामना और ममता मुझमें हैं या नहीं—इसका पता कैसे चले?

उत्तर—अगर हृदयमें कभी अशान्ति या हलचल होती है तो समझना चाहिये कि भीतरमें कामना है। अपने और परायेका भेद ममताके कारण होता है। जिसमें ममता होती है, उसीका अपनेपर असर पड़ता है॥ ३३॥

प्रश्न—सुखकी कामना और आशामें क्या अन्तर है?

उत्तर—सुख मिलनेकी तथा दु:ख न मिलनेकी ‘कामना’ होती है और सुख मिलनेकी सम्भावना होनेसे ‘आशा’ होती है॥ ३४॥

प्रश्न—हमारा दु:ख मिट जाय—यह कामना करनी चाहिये या नहीं?

उत्तर—कोई भी कामना नहीं करनी चाहिये। दु:ख मिट जाय—यह कामना करेंगे तो सुखका भोग होगा। बन्धन मिट जाय—यह कामना करेंगे तो मुक्तिका भोग होगा। जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद भी अपने लिये नहीं हो, नहीं तो सूक्ष्म अहम् रह जायगा। तात्पर्य है कि हमें कुछ लेना है ही नहीं।

साधक जितना ही भगवान् पर निर्भर होता है, उतना ही वह आगे बढ़ता चला जाता है। वह अपनी कोई इच्छा न रखे, सब भगवान् पर छोड़ दे तो बड़ी विलक्षणता आ जाती है और समग्रकी प्राप्ति हो जाती है। अत: अपनी मुक्तिकी भी इच्छा न रखे—यह बढ़िया है। जैसे, नरसीजीको भगवान् शंकरके दर्शन हुए तो उन्होंने कुछ भी माँगा नहीं, प्रत्युत यही कहा कि जो आपको अच्छा लगे, वही दो। मनुष्य उतनी ही इच्छा करता है, जितना उसको अपनी दृष्टिसे दीखता है। परन्तु आगे तत्त्व अनन्त है। आगे बहुत विलक्षण ऐश्वर्य है। साधक अपना आग्रह न रखे, सन्तोष न करे तो वह स्वत: आगे बढे़गा॥ ३५॥

प्रश्न—भगवान् कल्पवृक्ष हैं और मनुष्यमात्र उसकी छायामें रहता है, फिर मनुष्यकी सब इच्छाएँ पूरी क्यों नहीं होतीं?

उत्तर—कल्पवृक्षसे तो जो माँगो, वही देता है, भले ही उसमें हमारा हित न हो, पर भगवान् वही देते हैं, जिसमें हमारा हित हो। लोग तो वह इच्छा करते हैं, जिससे परिणाममें दु:ख पाना पडे़! इसलिये भगवान् उनकी इच्छा पूरी नहीं करते कि बस, इतना ही दु:ख काफी है, और दु:ख क्यों चाहते हो! कल्पवृक्ष और देवता तो दुकानदारके समान हैं, पर भगवान् पिताके समान हैं॥ ३६॥

प्रश्न—परन्तु भगवान् सत्-विषयक इच्छा भी कहाँ पूरी करते हैं! साधक उनको चाहते हैं तो क्या वे सबको मिल जाते हैं?

उत्तर—सत्-विषयक इच्छा इसलिये पूरी नहीं होती कि साथमें असत् की इच्छा भी मिली हुई रहती है॥ ३७॥

प्रश्न—एक पुस्तकमें आया है कि मनुष्य जो भी कामना करता है, उसकी पूर्ति होना आवश्यक है; क्या यह ठीक है?

उत्तर—ऐसा होना असम्भव है। कामनाएँ अनन्त हैं; अत: सभी कामनाएँ कभी पूरी नहीं होंगी और मुक्ति भी नहीं होगी! जिस कामनाको लेकर जप-तप आदि किया जाय, उसी कामनाकी पूर्ति होती है। जैसे, ध्रुवजीने राज्य-प्राप्तिकी कामनाको लेकर तपस्या की तो वह कामना पीछे न रहनेपर भी भगवान‍्ने पूरी की। इसी तरह भगवान‍्के पास जाते समय विभीषणके मनमें राज्यकी कामना रही, जिसको भगवान‍्ने पूरा किया। तात्पर्य है कि भगवान‍्के सामने जाते समय जो कामना रहती है, वही कामना बाधक होती है, जिसको भगवान् पूरी करते हैं॥ ३८॥

प्रश्न—जो किसी कामनाको लेकर भगवान‍्का भजन करता है, उसको भगवान‍्की प्राप्ति हो सकती है क्या?

उत्तर—भगवत्प्राप्ति तो दूर रही, उसका कल्याण भी नहीं हो सकता!॥ ३९॥

प्रश्न—परन्तु भगवान‍्ने धनकी कामनावाले अर्थार्थी भक्तको भी उदार कहा है—‘उदारा: सर्व एवैते’ (गीता ७।१८)?

उत्तर—अर्थार्थी भक्तके हृदयमें भगवान् मुख्य हैं, धन गौण है। इसलिये भगवान‍्ने कहा है—‘चतुर्विधा भजन्ते माम्’ (गीता ७।१६)। वह भगवान‍्के सिवाय और किसीसे धन नहीं चाहता। परन्तु जो भक्त नहीं है, वह केवल कामनाकी पूर्तिके लिये भगवान‍्का भजन करता है, उसका कल्याण नहीं हो सकता। कारण कि उसने भगवान‍्को भगवान् (साध्य) नहीं माना है, प्रत्युत कामनापूर्तिका एक साधन माना है। उसका साध्य तो रुपये हैं और भगवान् रुपये छापनेकी मशीनकी तरह साधन हैं। ऐसा व्यक्ति कामना पूरी न होनेपर भगवान‍्को छोड़ देता है। एक स्त्रीका पति बीमार हुआ। किसीने सलाह दी कि ठाकुरजीकी पूजा करो तो पति ठीक हो जायगा। उसने वैसा ही किया। पति ठीक हो गया। दुबारा फिर पति बीमार हुआ तो उस स्त्रीने फिर ठाकुरजीकी पूजा की। पति मर गया। उसने ठाकुरजीको उठाकर बाहर पटक दिया। इस प्रकार भगवान‍्की पूजा करनेवालेका कल्याण नहीं होता॥ ४०॥

प्रश्न—भगवान् हमारे हैं और हमारे लिये हैं, फिर उनसे कुछ माँगनेमें क्या दोष है?

उत्तर—प्रभु मेरे हैं और मेरे लिये हैं—ऐसा कहनेका तात्पर्य यह नहीं है कि हमें प्रभुसे कुछ लेना है। वे मेरे लिये हैं, इसलिये अपनेको उन्हें देना है, उनके समर्पित होना है। कुछ चाहनेसे हम उनसे अलग हो जायँगे और अपनेको देनेसे उनसे अभिन्न हो जायँगे। उनसे जिस वस्तुको माँगेंगे, उस वस्तुका महत्त्व हो जायगा। जो वस्तु अपनी और अपने लिये नहीं है, उसकी कामना करनेका हमें अधिकार ही नहीं है॥ ४१॥

गीता

प्रश्न—भगवान‍्ने गीता युद्धके समय ही क्यों सुनायी?

उत्तर—यह बतानेके लिये कि युद्ध-जैसा घोर कर्म करते हुए भी मनुष्य कल्याणको प्राप्त हो सकता है! तात्पर्य है कि साधन किसी परिस्थिति-विशेषकी अपेक्षा नहीं रखता। वह प्रत्येक परिस्थिति, अवस्थामें हो सकता है। कारण कि परमात्मा प्रत्येक परिस्थितिमें ज्यों-का-त्यों विद्यमान है। अत: वह प्रत्येक परिस्थितिमें प्राप्त किया जा सकता है॥ ४२॥

प्रश्न—गीताका सिद्धान्त सर्वश्रेष्ठ क्यों माना गया है?

उत्तर—कारण कि वह सिद्धान्त स्वयं भगवान‍्का है, ऋषि-मुनियोंका नहीं! भगवान् ऋषि-मुनियोंके भी आदि हैं—‘अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वश:’ (गीता १०। २)। वास्तवमें भगवान‍्का सिद्धान्त ही ‘सिद्धान्त’ कहनेलायक है। अन्य दार्शनिकोंका सिद्धान्त वास्तवमें ‘सिद्धान्त’ नहीं है, प्रत्युत ‘मत’ है॥ ४३॥

प्रश्न—भगवान‍्ने रामायणमें कहा है—‘मम दरसन फल परम अनूपा। जीव पाव निज सहज सरूपा॥’ (अरण्य० ३६।५) अर्जुनने तो भगवान‍्के विश्वरूप, चतुर्भुजरूप और द्विभुजरूप—तीनोंके दर्शन कर लिये थे, फिर उनका मोह दूर क्यों नहीं हुआ?

उत्तर—दर्शन देनेके बाद मोह दूर करनेकी जिम्मेवारी भगवान‍्की होती है। अर्जुनका मोह आगे चलकर नष्ट हो ही गया था—‘नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा’ (गीता १८।७३)। इससे सिद्ध हुआ कि दर्शनके बाद मोह नष्ट होता ही है। परन्तु अर्जुनने मोह नष्ट होनेमें न तो गीताश्रवणको और न दर्शनको ही कारण माना है, प्रत्युत भगवान‍्की कृपाको ही कारण माना है—‘त्वत्प्रसादान्मयाच्युत’॥ ४४॥

प्रश्न—गीतामें श्रेष्ठ पुरुषोंके आचरणकी मुख्यता बतायी है—‘यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:’ (३। २१) और भागवतमें वचनकी मुख्यता बतायी है—‘ईश्वराणां वच: सत्यं तथैवाचरितं क्वचित्’ (१०।३३।३२)। दोनोंमें कौन-सी बात मानें?

उत्तर—गीतामें तो संसारकी स्वाभाविक प्रवृत्ति बतायी है कि श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करते हैं, वैसा ही अन्य लोग भी करते हैं। परन्तु वास्तवमें कर्तव्य-अकर्तव्यके विषयमें वचनको प्रमाण मानना श्रेष्ठ है। इसलिये इतिहासकी अपेक्षा विधिको और विधिकी अपेक्षा निषेधको प्रबल माना गया है।

श्रेष्ठ पुरुषोंके आचरणका स्वाभाविक ही दूसरेपर असर पड़ता है, चाहे हम देखें या न देखें। परन्तु जहाँ उनके आचरण और वचनोंमें विरोध दीखे, वहाँ उनके आचरण न देखकर उनके वचनोंका ही पालन करना चाहिये। कारण कि उन्होंने किस परिस्थितिमें क्या किया—इसका पता लगता नहीं॥ ४५॥

प्रश्न—असत् की सत्ता ही नहीं है—‘नासतो विद्यते भाव:’ (गीता २।१६), फिर प्रकृतिको अनादि क्यों कहा है—‘प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्धॺनादी उभावपि’ (गीता १३।१९)? अनादि कहनेसे यह भाव निकलता है कि प्रकृतिकी सत्ता है?

उत्तर—अज्ञानीको समझानेके लिये अज्ञानीकी ही भाषा बोलनी पड़ती है। हम प्रकृतिकी सत्ता मानते हैं, इसलिये शास्त्र हमारी भाषामें ही कहते हैं। वास्तवमें प्रकृतिकी सत्ता है ही नहीं। परन्तु जिनकी दृष्टिमें प्रकृतिकी सत्ता है, उनके लिये प्रकृतिको अनादि कहा गया है। प्रकृति अनादि होते हुए भी अनन्त नहीं है, प्रत्युत सान्त (अन्तवाली) है।

दृष्टिभेदसे दर्शन अनेक हैं, तत्त्व एक है। जहाँ द्रष्टा, दृष्टि और दृश्य नहीं है, वहाँ भेद नहीं है। द्रष्टा, ज्ञाता, दार्शनिक, दर्शन जबतक हैं, तबतक भेद है। इनसे आगे तत्त्वमें भेद नहीं है॥ ४६॥

प्रश्न—गीताने प्रकृतिको अनादि तो कहा है, अनन्त या सान्त नहीं कहा है, ऐसा क्यों?

उत्तर—अगर प्रकृतिको अनन्त (नित्य) कहें तो ज्ञानका खण्डन होता है; क्योंकि ज्ञानकी दृष्टिसे प्रकृतिकी सत्ता ही नहीं है—‘नासतो विद्यते भाव:’ (गीता २। १६)। अगर प्रकृतिको सान्त (अनित्य) कहें तो भक्तिका खण्डन होता है; क्योंकि भक्तिकी दृष्टिसे प्रकृति भगवान‍्की शक्ति होनेसे भगवान‍्से अभिन्न है—‘सदसच्चाहम्’ (गीता ९। १९)। अत: भगवान‍्ने ज्ञान और भक्ति —दोनोंकी बात रखनेके लिये ही प्रकृतिको न अनन्त कहा है और न सान्त कहा है, प्रत्युत अनादि कहा है॥ ४७॥

प्रश्न—भगवान‍्ने गीतामें कहा है कि अगर मैं कर्तव्यका पालन नहीं करूँगा तो लोग भी कर्तव्यसे विमुख हो जायँगे, इसलिये मैं भी कर्तव्यका पालन करता हूँ (३। २२—२४)। फिर आजकल लोग अपने कर्तव्यका पालन क्यों नहीं करते?

उत्तर—भगवान‍्की बात उन लोगोंके लिये है, जो भगवान‍्को माननेवाले (आस्तिक) हैं। कारण कि भगवान‍्के कर्तव्य-पालनका असर उन्हीं लोगोंपर पड़ेगा, जो भगवान् पर श्रद्धा-विश्वास रखते हैं। जो भगवान‍्को नहीं मानते, उनपर भगवान‍्के कर्तव्य-पालनका असर नहीं पड़ेगा। जिनकी विपरीत बुद्धि हो रही है, वे भगवान‍्की कृपाको क्या समझें॥ ४८॥

प्रश्न—गीतामें भगवान‍्ने कहा है—‘सुखं दु:खं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च’ (१०। ४)। ‘अभय’ दैवी सम्पत्ति है और ‘भय’ आसुरी सम्पत्ति, फिर दोनों भगवान‍्के स्वरूप कैसे हुए?

उत्तर—दैवी सम्पत्ति भी भगवान‍्का स्वरूप है और आसुरी सम्पत्ति भी भगवान‍्का स्वरूप हैै। अभय भी भगवान‍्का स्वरूप है और भय भी भगवान‍्का स्वरूप है। वास्तवमें तत्त्व एक ही है, पर हमारी कामना (भोगेच्छा)-के कारण दो विभाग हो जाते हैं।

भगवान‍्के विराट्‍रूप पमें भयभीत भी दीखते हैं—‘रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति’ (गीता ११। ३६), ‘केचिद्भीता: प्राञ्जलयो गृणन्ति’ (गीता ११ । २१)। भयभीत भी विराट् रूपका ही अंग है। तात्पर्य है कि भयभीत होनेवाले भी भगवान् हैं और जिनसे भयभीत हो रहे हैं, वे भी भगवान् हैं।

मनुष्य सुख चाहता है, दु:ख नहीं चाहता, तभी दो विभाग हुए हैं और शास्त्रोंने भी दो विभागों (दैवी-आसुरी, शुभ-अशुभ, विहित-निषिद्ध आदि)-का वर्णन किया है। भेदके मूलमें भोगेच्छा ही है। सम्पूर्ण दु:ख, सन्ताप, अनिष्ट आदि भोगेच्छाके कारण ही हैं। भोगेच्छा सर्वथा मिटनेपर मोक्ष ही है॥ ४९॥

प्रश्न—भगवान‍्में मन लगाना करणसापेक्ष साधन है, जिसमें योगभ्रष्ट होनेकी सम्भावना रहती है। फिर गीतामें भक्तके द्वारा मन लगानेकी बात क्यों आयी है—‘मन्मना भव’ (९। ३४,१८। ६५)?

उत्तर—वास्तवमें भक्त स्वयं लगता है, मन नहीं लगाता। मन लगाकर स्वयं लगना करणसापेक्ष है, पर स्वयं लगकर मन स्वत: लग जाना करणनिरपेक्ष है। भक्त मन लगाकर स्वयं नहीं लगता। वह स्वयं लगता है (मद्भक्त:), फिर उसके मन-बुद्धि-इन्द्रियाँ भी अपने-आप लग जाते हैं॥ ५०॥

प्रश्न—गीताने संसारको असत् तो कहा है, पर रज्जुमें सर्पकी तरह अध्यस्त नहीं कहा है, इसका क्या कारण है?

उत्तर—रस्सीमें सर्प तो बोध होनेके बाद नहीं दीखता, पर संसार बोध होनेके बाद भी दीखता है। आसक्ति (दोष) कर्तामें है, पर दीखती है संसारमें। अपने रागके कारण ही रुपयोंमें आकर्षण (लोभ) होता है। राग न रहनेपर रुपये तो वैसे ही दीखते हैं, पर आकर्षण नहीं रहता। इसी तरह भोगोंकी आसक्ति न रहनेपर संसार तो दीखता है, पर उसमें आकर्षण नहीं होता।

वास्तवमें संसार अध्यस्त नहीं है, प्रत्युत उसका सम्बन्ध अध्यस्त है। संसार आसक्तको भी दीखता है और विरक्त को भी, पर आसक्तको ठोस दीखता है, विरक्तको पोला। जो है नहीं, पर दीखता है, वह अध्यस्त होता है। परन्तु संसार जैसा है, वैसा ही दीखता है, पर उसका सम्बन्ध (राग) नहीं रहता। ज्ञानी महापुरुषको सोनेकी मुहर मुहररूपसे ही दीखती है, पत्थररूपसे नहीं दीखती, पर उसमें उसका राग नहीं होता। तात्पर्य है कि संसारकी सत्ता बाधक नहीं है, प्रत्युत रागपूर्वक जोड़ा गया सम्बन्ध बाधक है। वैराग्य वस्तुकी सत्ताका नाश नहीं करता, प्रत्युत रागका नाश करता है। रागपूर्वक सम्बन्ध बॉँधनेवाला है। संसार दु:खदायी नहीं है, उसका सम्बन्ध दु:खदायी है॥ ५१॥

प्रश्न—रज्जुमें सर्प दीखना ‘निरुपाधिक भ्रम’ है और दर्पणमें मुख दीखना ‘सोपाधिक भ्रम’ है। क्या संसारके दीखनेको ‘सोपाधिक भ्रम’ मान सकते हैं; क्योंकि भ्रम मिटनेपर भी दर्पणमें मुख तो दीखता ही है?

उत्तर—सोपाधिक भ्रम भी नहीं मान सकते; क्योंकि दर्पणमें मुख दीखता तो है, पर वह काम नहीं आता अर्थात् उससे व्यवहार नहीं होता। परन्तु संसारमें राग मिटनेपर भी व्यवहार तो होता ही है॥ ५२॥

प्रश्न—गीतामें आया है कि योगभ्रष्ट पुरुष शुद्ध श्रीमानोंके घरमें जन्म लेता है अथवा योगियोंके कुलमें जन्म लेता है (गीता ६। ४१-४२)। परन्तु जड़भरतने हरिणयोनिमें जन्म लिया। अत: वे कौन-से योगभ्रष्ट थे?

उत्तर—उनको योगभ्रष्ट नहीं कह सकते। कारण कि योगभ्रष्ट अपना साधन पूरा करनेके लिये शुद्ध श्रीमान् के घरमें अथवा योगीके घरमें जन्म लेता है और वहाँ पहले किये हुए साधनमें पुन: लगता हैै। परन्तु जड़भरतने न तो श्रीमान् के घरमें जन्म लिया और न योगीके कुलमें ही जन्म लिया, प्रत्युत हरिणयोनिमें जन्म लिया। उन्होंने हरिणयोनिमें कोई साधन भी नहीं किया। अत: वे योगभ्रष्ट नहीं थे, पर अन्तसमयमें हरिणकी तरफ वृत्ति जानेसे उनको पुन: जन्म लेना पड़ा॥ ५३॥

प्रश्न—भगवान‍्ने गीतामें कर्मयोग (साधन)-को अव्यय कहा है—‘इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्’ (४। १)। अव्यय अर्थात् नित्य तो साध्य है, साधन नित्य कैसे?

उत्तर—साधक ही साधन होकर साध्यमें लीन होता है। अत: साधक, साधन और साध्य—तीनों ही तत्त्वसे नित्य हैं। साधक, साधन और साध्य—तीनों एक ही हैं, पर मोहके कारण अलग-अलग दीखते हैं। तीनों नित्य हैं, पर मोह अनित्य है—‘नष्टो मोह:’ (गीता १८। ७३)॥ ५४॥

प्रश्न—भगवान‍्ने गीतामें स्वयं (आत्मा)-को ‘शरीरी’ (शरीरवाला) और ‘देही’ (देहवाला) कहा है, इससे सिद्ध हुआ कि स्वयंका शरीरके साथ सम्बन्ध है?

उत्तर—स्वयंका शरीरके साथ किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध न कभी था, न है, न होगा और न होना सम्भव ही है। परन्तु भगवान‍्ने साधकोंको समझानेकी दृष्टिसे स्वयंको ‘शरीरी’ अथवा ‘देही’ नामसे कहा है। ‘शरीरी’ कहनेका तात्पर्य यही बताना है कि तुम शरीर नहीं हो। स्वयं परमात्माका अंश है—‘ममैवांशो जीवलोके’(गीता १५। ७)और शरीर प्रकृतिका अंश है—‘मन:षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि’(गीता १५। ७)। शरीर प्रतिक्षण नष्ट होनेवाला और असत् है। ऐसे असत् शरीरको लेकर स्वयं शरीरी (शरीरवाला) कैसे हो सकता है? अत: साधक स्वयं शरीर भी नहीं है और शरीरी भी नहीं है॥ ५५॥