प्रवचन-सार
ज्ञानके दीप जले
पराकृतनमद्बन्धं परं ब्रह्म नराकृति।
सौन्दर्यसारसर्वस्वं वन्दे नन्दात्मजं मह:॥
प्रपन्नपारिजाताय तोत्त्रवेत्रैकपाणये।
ज्ञानमुद्राय कृष्णाय गीतामृतदुहे नम:॥
वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्।
देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥
वंशीविभूषितकरान्नवनीरदाभात्
पीताम्बरादरुणविम्बफलाधरोष्ठात्।
पूर्णेन्दुसुन्दरमुखादरविन्दनेत्रात्
कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने॥
हरि: ॐ नमोऽस्तु परमात्मने नम:।
श्रीगोविन्दाय नमो नम:।
श्रीगुरुचरणकमलेभ्यो नम:।
महात्मभ्यो नम:।
सर्वेभ्यो नमो नम:।
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हमारा सम्बन्ध ईश्वरके साथ है, संसारके साथ नहीं। जिसका सम्बन्ध हमारे साथ नहीं है, उसका त्याग करना है—‘त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्’ (गीता १२।१२)। जिसके साथ हमारा सम्बन्ध ही नहीं, उसका त्याग क्या करें? त्याग करना है—भूलका। सम्बन्ध भूलसे माना है। मैं शरीर हूँ और शरीर मेरा तथा मेरे लिये है—यह सम्बन्ध माना हुआ है, वास्तवमें है नहीं। शरीर निरन्तर हमसे अलग हो रहा है। बचपनमें जो शरीर था, वह अब नहीं है, पर मैं वही हूँ। शरीर बदल गया, पर स्वयं नहीं बदला। यह हमारा, सबका अनुभव है। इस अनुभवका आदर करो तो जीवन्मुक्त हो जाओगे।
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जो अपना नहीं है, उसको अपना माननेसे विश्वासघात होगा, धोखा होगा! पहले बालकपनको अपना मानते थे, वह अब रहा क्या? शरीरका निरन्तर वियोग हो रहा है।
जीव भगवान्से विमुख हुआ है, अलग नहीं और संसारके सम्मुख हुआ है, साथ नहीं। संसारसे केवल सेवाके लिये ही सम्बन्ध माने। संसारको अपना और अपने लिये न माने। कोई भी काम अपने लिये न करके दूसरोंकी सेवा (हित)-के लिये करे। भजन-ध्यान आदि भी अपने लिये न करे।
आजकल बेटोंसे भी आशा मत रखो तो सुख पाओगे। उनकी सेवा करो, पर आशा मत रखो।
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मैंपन हमारा स्वरूप नहीं है। ‘मैं’ (अहम्) अलग है, स्वरूप अलग है। ‘मैं’ के कारण ‘हूँ’ है। ‘मैं’ न रहे तो ‘हूँ’ नहीं रहेगा, प्रत्युत ‘है’ रहेगा। ‘मैं’ जड़ है, ‘हूँ’ चेतन है। ‘मैं हूँ’—यह चिज्जड़ग्रन्थि है। ‘मैं’ को छोड़नेसे ग्रन्थिभेद हो जाता है।
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परमात्मा आनन्दरूप है। संसार सुख-दु:खरूप है। दु:खके साथ जो सुख है, वह दु:खका कारण है। सुखके भोगीको दु:ख भोगना ही पड़ेगा। सुखमात्र दु:खमें परिणत हो जाता है। भोगी मनुष्य सुख-दु:ख दोनोंको भोगता है। परन्तु योगी सुख-दु:खको नहीं भोगता। यह शरीर सुख-दु:ख भोगनेके लिये नहीं है, प्रत्युत दोनोंसे ऊँचा उठकर आनन्द पानेके लिये है।
सुखदायी परिस्थिति सेवा करनेके लिये है। आपमें जो बड़प्पन है, वह दूसरोंका दिया हुआ है। सुखको भोगना दु:खको निमन्त्रण देना है। दु:खदायी परिस्थिति सुखकी चाहना मिटानेके लिये है।
दूसरेके दु:खसे दु:खी होनेपर हमारा दु:ख मिट जाता है। दूसरेके सुखसे सुखी होनेपर हम सुखी हो जाते हैं। काम खुद करो, आराम दूसरोंको दो।
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मैं-तू, यह-वह चारों एक ज्ञानके अन्तर्गत हैं। सत्ता, होनापन ज्यों-का-त्यों है। उससे यह सब प्रकाशित होता है। वह सत्ता बाहर-भीतर सब जगह परिपूर्ण है। उसमें संसारकी सृष्टि-प्रलय आदि अनेक क्रियाएँ होती हैं, पर उस सत्तामें, ज्ञानमें कोई फर्क नहीं पड़ता। वह सत्ता ही हमारा स्वरूप है। उसीको सच्चिदानन्द कहते हैं। वह स्वयं प्रकाश और सबका प्रकाशक है। वह तत्त्व सब समयमें सबको प्राप्त है। उस तत्त्वको जानने या न जाननेसे, मानने या न माननेसे उसमें कुछ फर्क नहीं पड़ता। उस तत्त्वमें कोई हलचल, आना-जाना नहीं है। जाग्रत् , स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीया भी उसमें नहीं है। उसीके अन्तर्गत यह सब सृष्टि है। शाखाचन्द्रन्यायसे उसका लक्ष्य कराया जाता है। उसका अनुभव करें या न करें, वह तो वैसा ही है; पर अनुभव करनेसे हम हलचलसे (आवागमनसे) रहित हो जाते हैं। उसका अनुभव करनेमें ही मनुष्य-जीवनकी सफलता है।
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दो बातका सबको अनुभव होता है कि शरीर बदलता है, स्वयं नहीं बदलता। बदलनेवालेमें मोह करना, उसके साथ मिलकर अपनेको भी बदलनेवाला मानना गलती है। जैसे नदी निरन्तर बहती है, पर शिला निरन्तर रहती है, ऐसे ही शरीर बदलता है, आप वही रहते हो। संसार बदलता है, परमात्मा वही रहते हैं। बदलनेवाली वस्तुएँ सेवा करनेके लिये हैं, अपने लिये नहीं। जो मिला है और बिछुड़नेवाला है, उससे सेवा करो। बदलनेवाले शरीर-संसार एक हैं, न बदलनेवाले आप (स्वयं) तथा भगवान् एक हैं। बदलनेवालेको बदलनेवालेकी सेवामें लगा दो।
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हम जो कुछ भी व्यवहार करते हैं, उसमें ‘सत्ता’ और ‘ज्ञान’—ये दो रहते हैं। व्यवहार (चलना, बोलना आदि) तो प्रत्यक्ष बदलता है, पर सत्ता और ज्ञानमें परिवर्तन नहीं होता। सुख, दु:ख आदिमें सत्ता और ज्ञान वैसे-के-वैसे ही रहते हैं। जन्म-मृत्युकी सत्तामें और ज्ञानमें क्या फर्क पड़ता है? सत्ता और ज्ञान एकरूप रहते हैं। सत्ता और ज्ञान ही परमात्मतत्त्व है। सत्ता और ज्ञान ही आपका स्वरूप है।
जो जा रहा है, उसको मत देखो। जो है, उसको देखो। नित्यप्राप्तकी प्राप्तिको देखो। नित्यनिवृत्तकी निवृत्तिको देखो। समको देखो, विषमको मत देखो—‘विनश्यत्स्वविनश्यन्तं य: पश्यति स पश्यति’ (गीता १३।२७)।
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भक्तिमार्ग श्रेष्ठ भी है और सुगम भी। परन्तु यह कठिन इसलिये हो गया कि किसीका कहना मानते नहीं! जो माता-पिताकी आज्ञा नहीं मानता, वह भगवान्की आज्ञा माननेकी बात कैसे समझेगा? अब मुश्किल यह हो गयी कि समझायें कैसे? सब उच्छृंखल हो रहे हैं, अब किसका उदाहरण देकर समझायें? उदाहरण समझमें आना कठिन हो गया! कोई पतिव्रता दीखती ही नहीं, फिर पतिव्रताका उदाहरण कौन समझे?
माता-पिता, पति, गुरुकी परतन्त्रतामें महान् स्वतन्त्रता है। आजकल उच्छृंखलताका नाम स्वतन्त्रता मान लिया है। गधेको यहाँ (सत्संगमें) लायें तो यहीं पेशाब कर देगा; क्योंकि वह स्वतन्त्र है कि चाहे जहाँ पेशाब करे!
जो भगवान्का हो गया, वह भगवत्-रूप ही हो जाता है।
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भगवान्की ओरसे मनुष्यको बहुत विशेष अधिकार मिला है। इसमें भगवान्का पक्षपात प्रतीत होता है। भगवान्ने मनुष्यको दुनियामात्रके उद्धारका अधिकार दिया है। इस विषयमें दो बातें हैं—परमात्मामें तल्लीन होना और बुराईका सर्वथा त्याग करना। सबका सार परमात्मा हैं। जैसे वृक्षके मूलमें जल देनेसे पूरे वृक्षको तृप्ति पहुँचती है, ऐसे ही परमात्मामें तल्लीन होनेसे दुनियामात्रका जितना हित होगा, उतना करनेसे नहीं।
हमारे भीतरमें सबके हितका भाव रहे। अगर हमें हिन्दुओंका मरना बुरा लगता है और मुसलमानोंका मरना अच्छा लगता है तो यह पहचान है कि अभी भीतरमें राग-द्वेष हैं। समता प्राप्त नहीं हुई। तत्त्वप्राप्तिकी परीक्षा है कि अन्त:करणमें समता आ जाय।
अगर बुराईसे सर्वथा छूट जायँ तो संसारमात्रकी सेवा हो जायगी। लोगोंकी दृष्टि विधिपर रहती है, त्यागपर नहीं। त्यागका जो माहात्म्य है, वह विधिका नहीं है। बुराईका त्याग करनेसे दुनियामात्रका हित होता है। जो किसीको भी बुरा नहीं मानता, किसीका भी बुरा नहीं चाहता और बुरा नहीं करता, वह सबकी सेवा करता है। किसीका बुरा होनेसे अथवा किसीकी मृत्युसे राजी नहीं होना चाहिये।
बलिवैश्वदेव करनेसे त्रिलोकीको भोजन देनेका माहात्म्य होता है। सूर्यको जल देनेसे त्रिलोकीको जल देनेका माहात्म्य होता है। प्रात:स्नानके बाद ताँबेके लोटेमें जल डालकर उसमें लाल पुष्प या कुंकुम डाल दे और ‘श्रीसूर्याय नम:’ अथवा ‘एहि सूर्य सहस्रांशो तेजोराशे जगत्पते। अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर॥’ कहते हुए सूर्यको (तीन अंजलि) जल दे।
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मानवजीवन बहुत कीमती है। यह मोतियाबिन्दके आपरेशनके औजारकी तरह है, जिससे काठ नहीं चीरा जाता। मनुष्यका कर्तव्य है—सबकी सेवा करना। जो दूसरोंको कष्ट देते हैं, हिंसा करते हैं, मांस-सेवन करते हैं, वे राक्षस हैं, मनुष्य नहीं। किसीकी बुराई न करे, किसीको बुरा न समझे और किसीका बुरा न सोचे। जो बुराई करता है, देखता है, सोचता है, वह खुद बुरा हो ही जायगा।
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शरीर बदलता है, पर मैं (स्वयं) नहीं बदलता—यह सबका अनुभव है। बदलनेको जाननेवाला बदलनेवाला नहीं होता। हम जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्तिको, बाल्यावस्था आदि अवस्थाओंको, प्रलयको तथा सृष्टिको जानते हैं। ब्रह्माजीकी आयुको जानते हैं। जाननेवाला अलग होता है और जाननेमें आनेवाला अलग होता है। जाननेवाला सत् है, जाननेमें आनेवाला असत् है। सत् है, असत् नहीं है—यह तत्त्व है।
है सो सुन्दर है सदा, नहिं सो सुन्दर नाहिं।
नहिं सो परगट देखिये, है सो दीखे नाहिं॥
जो आता है और चला जाता है, उसमें चिन्ता किस बातकी? रात-दिनकी तरह सुख-दु:ख आते-जाते हैं। बालक जन्मता है तो सब बातोंमें सन्देह रहता है, पर मरनेमें कोई सन्देह नहीं। जो नि:सन्देह बात है, उसे जान लो तो दु:ख नहीं होगा। सच्ची बातको जान ले तो किस बातका दु:ख है? संयोगका वियोग जरूर होगा। वियोग मुख्य है, संयोग मुख्य नहीं है।
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मनुष्यशरीर सत्संगके लिये मिला है। यहाँ जैसे सत्संग करनेके लिये आये हैं, ऐसे ही मनुष्यजन्ममें सत् का संग करनेके लिये आये हैं, रहनेके लिये नहीं। शरीर प्रतिक्षण मर रहा है। हम जी रहे हैं—यह वहम है।
जैसे विवाह हुआ तो हो ही गया, उसमें सोचना नहीं पड़ता, ऐसे ही भगवान्के हो गये तो हो ही गये। आप जहाँ हैं, वहाँ रहते हुए ही यह निश्चय कर लो कि हम भगवान्के हो गये। भगवान्ने किसी भी जीवका त्याग नहीं किया। गलती हमसे ही हुई है। हम ही भगवान्से विमुख हुए हैं।
सेवा करनेके लिये हम सबके हैं, पर लेनेके लिये हम किसीके भी नहीं हैं। लेनेके लिये कोई हमारा नहीं है। सेवा करना और लेना कुछ नहीं—यही संसारके साथ सम्बन्ध रखो।
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ज्ञानके बिना प्रेम आसक्ति है। प्रेमके बिना ज्ञान शून्य है। प्रेमके बिना ज्ञान बिना मल्लाहकी नौका है।
दूसरेके सुखके लिये प्रेम होता है, अपने सुखके लिये ‘काम’ होता है। माँका प्रेम भी मोहपूर्वक, स्वार्थपूर्वक होता है। बिना स्वार्थके दूसरेका हित करना है।
स्त्री परपुरुषका और पुरुष परस्त्रीका स्पर्श न करे तो उनके तेज, शक्तिकी वृद्धि होगी। घरमें माँके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम करे तथा अन्य स्त्रियोंको दूरसे प्रणाम करे। स्त्री पतिके चरण-स्पर्श करे, पर अन्य पुरुषोंको दूरसे प्रणाम करे।
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एक निश्चयवाली बुद्धि होनी चाहिये। हरेक बातमें दृढ़ रहनेका स्वभाव बना लें। जैसा करनेका विचार कर लें, वैसा ही करनेकी आदत बना लें। विचार बदलते रहनेसे स्वभाव वैसा ही बन जाता है। सांसारिक व्यवहारमें जैसी आदत होगी, वही आदत पारमार्थिक मार्गमें भी काम करेगी।
खाना-पीना आदि सब क्रियाएँ निर्वाहबुद्धिसे करें, स्वाद-शौकीनीसे नहीं।
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अपने बलसे निराश हो जाय, पर भगवत्प्राप्तिसे कभी निराश नहीं होना चाहिये। भगवत्प्राप्ति भावके अधीन है, बलके अधीन नहीं। ‘हौं हारॺौ करि जतन बिबिध बिधि’—अपने यत्नसे हार गये, पर तत्त्वप्राप्तिसे नहीं—‘जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी॥’ (मानस, बाल० ८१।३)। हमें तत्त्वको प्राप्त करना ही है, चाहे प्राण चले जायँ। इस प्रकार अपने लक्ष्यपर अटल रहना साधकके लिये बहुत लाभदायक है। भोग और संग्रहमें आसक्ति होनेके कारण अटल निश्चय नहीं होता। साधकके मनमें न भोगोंकी गरज (कामना, आसक्ति, राग) हो, न संग्रहकी गरज हो।
मनके लगनेकी अपेक्षा बुद्धिका लगना श्रेष्ठ है। एक निश्चय होना ही बुद्धिका लगना है। मन लगनेसे सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। मनको लगाना कठिन है, पर बुद्धिको लगाना सुगम भी है और श्रेष्ठ भी। मैं अमुकका शिष्य हो गया, मैं अमुक पतिकी हो गयी—यह बुद्धिका लगना है। दृढ़ विचार खुदको ही करना पड़ेगा।
कल्याण तब होगा, जब आपकी खुदकी लगन हो। परमात्मा सब जगह मौजूद है, ग्राहक चाहिये। खम्भे कई हैं, पर प्रह्लाद चाहिये। भोजन तो दूसरा दे देगा, पर भूख खुदकी चाहिये। सत्संग करते-करते भूख भी लग जायगी।
चाहना हमारी होनी चाहिये। बच्चेकी चाहना हो तो माँके स्तनोंमें दूध आ जाता है। हमारा विचार दृढ़ होगा तो सभी हमारे सहायक हो जायँगे।
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हमारा विवेक हरदम जाग्रत् रहना चाहिये। नाशवान् तथा अविनाशीके विभागको भी जानना है, और कर्तव्य-अकर्तव्यके विभागको भी जानना है। अनुकूलता-प्रतिकूलता कल्याणके लिये आती है, सुख-दु:ख भोगनेके लिये नहीं।
जैसे आप अपना दु:ख दूर करनेके लिये पैसे खर्च करते हैं, ऐसे ही दूसरेका दु:ख दूर करनेके लिये भी खर्च करें, तभी आपको पैसे रखनेका हक है।
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अपनेको शुद्ध (अच्छा) बनाना चाहिये। अपनेको शुद्ध बनायें तो लोक-परलोक सब ठीक हो जायँगे। ‘मामका:’ और ‘पाण्डवा:’—यह भेद ही नाश करनेवाला है। अन्तमें विजय उसकी होती है, जो धर्मका ठीक पालन करता है। धर्मका बल ही बल है। न्याययुक्त मनुष्यके भीतर जो बल रहता है, वह अन्यायीके भीतर नहीं रहता।
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जीवन्मुक्ति अभी हो सकती है; क्योंकि वह है। आदर और निरादर—दोनोंके समय आप वही रहते हो, तो फिर आपमें क्या फर्क पड़ा? हरा और पीला दोनों अलग-अलग हैं, पर उनको देखनेवाली आँखमें क्या फर्क पड़ा? राजी और नाराजीके समय आप एक हुए कि दो हुए? जब जाननेमें फर्क नहीं पड़ा तो फिर जाननेवालेमें क्या फर्क पड़ा? मेरी बातकी तरफ ध्यान दो तो आप सब-के-सब अभी तत्काल जीवन्मुक्त हो सकते हो।
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आजकल गुरु और शिष्य दोनोंका ही मिलना दुर्लभ है। आजकल गुरुभक्ति तो है नहीं, गुरु बनाना केवल तमाशा है।
संसारसे लाभ लेना चाहो तो यह नाशवान् है और सेवा करना चाहो तो यह ‘वासुदेव: सर्वम्’ है। संसारसे सुख लेना चाहो तो यह दु:खालय है।
मैं यहाँ (गीताभवन, स्वर्गाश्रममें) संवत् १९८९ से आता हूँ, पर अभीतक मैंने नीलकण्ठ नहीं देखा; क्योंकि मैं वहाँ गया ही नहीं! ऐसे ही आप कहते हो कि इतने वर्ष सत्संग करते हो गये, लाभ नहीं दीखता तो आपने माना ही नहीं, फिर दीखे कैसे? जिससे पतन हो जाय, वह न भी दीखे, फिर भी आप उसे मान लेते हो, पर जिससे उद्धार हो जाय, उसे मानते ही नहीं! समझमें न आये तो भी मान लो कि सब कुछ परमात्मा ही हैं—‘वासुदेव: सर्वम्’। आपकी समझ ठीक है कि गीताकी? मनसे सबको परमात्माका स्वरूप देखो। शरीरसे सबका आदर करो। कम-से-कम किसीका अहित मत करो, किसीको दु:ख मत दो। किसीका बुरा नहीं करोगे तो दुनियामात्रकी सेवा हो जायगी। किसीकी मौतपर राजी होना उसको मारनेमें सहमत होना है। किसीको दु:ख न दें और किसीके दु:खमें राजी न हों।
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संसारका वियोग ही सत्य है। संयोगका वियोग तो अवश्यम्भावी है, पर वियोगका संयोग अवश्यम्भावी नहीं है। परमात्माके साथ एकता ‘योग’ है। यह योग नित्य है। संसारका वियोग नित्य है। संसारका ज्ञान संसारके वियोगसे होगा और परमात्माका ज्ञान परमात्माके योगसे होगा। कारण कि संसार अलग है, परमात्मा अलग नहीं हैं।
जीना अनित्य है, मरना नित्य है। जिसका वियोग अवश्यम्भावी है, उसकी सेवा करो। जिसका संयोग अवश्यम्भावी है, उससे प्रेम करो। जो अवश्यम्भावी है, उसे पहलेसे ही स्वीकार कर लेना चाहिये।
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हमारा जीवन ऐसा होना चाहिये कि किसीको भी हमारे द्वारा तकलीफ न हो। ऐसा हो जाय तो दुनियाका भला हो गया! किसीका बुरा न करना सबसे बड़ी सेवा है।
संसारका संयोग अनित्य और असत् है, पर संसारका वियोग नित्य और सत् है। परमात्माके साथ सबका नित्ययोग है। संसारके साथ सबका नित्यवियोग है। यह स्वीकार कर लो। जो आपको छोड़ रहा है, उसको छोड़ दो और जो कभी नहीं छोड़ता, उसको पकड़ लो, जो हमारा नहीं है, उसकी सेवा कर दो। जो हमारा है, उसको अपना मान लो।
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निषेधात्मक साधन बहुत ऊँचा है। करनेकी अपेक्षा न करना श्रेष्ठ है। कारण कि संसारका नित्यवियोग है। श्रवण, मनन, निदिध्यासन आदि ऊँचे साधन नहीं हैं; ये विध्यात्मक साधन हैं। विध्यात्मक साधनमें प्रकृतिका सम्बन्ध रहेगा ही। संसारसे नित्यवियोग स्वीकार करते ही योगकी प्राप्ति हो जायगी। निषेधात्मक साधनमें स्वत: सिद्धि होती है। परमात्मामें विधि नहीं है, प्रत्युत सब चीजोंका निषेध है। विहित कार्य सब नहीं कर सकते, पर निषिद्धका त्याग सब कर सकते हैं। विहितको देखें तो सातों वारोंके व्रत कौन रख सकेगा?
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आने-जानेवाली चीजोंसे समताका नाश नहीं होता। समता ज्यों-की-त्यों रहती है।
सुखी-दु:खी होनेमें मूर्खता कारण है, प्रारब्ध कारण नहीं है। बालकको कितनी ही अनुकूलता दे दो, फिर भी वह रो देगा; क्योंकि मूर्खता है। ऐसे ही जो रोते हैं, वे बालक हैं।
जो कर्म कामनाको लेकर किये जायँ, वे सब अशुभकर्म हैं। उनसे जन्म-मरण नहीं मिटेगा; ब्रह्मलोकतक जाकर भी पीछे लौटना पड़ेगा। कामनासे बन्धन है, निष्कामतासे मुक्ति है।
किसी भी योगसे चलो, निर्मम और निरहंकार होना ही पड़ेगा। शरीर आदिका त्याग ‘त्याग’ नहीं है, प्रत्युत मैं-मेरेका त्याग ही ‘त्याग’ है।
कर्तृत्वाभिमान और कामना न हो तो सब कर्म ‘अकर्म’ हो जाते हैं अर्थात् कर्म जली हुई मूँजकी रस्सीकी तरह हो जाते हैं, बन्धनकारक नहीं होते। कर्तृत्वाभिमान और फलेच्छा—इन दोसे कर्म बन्धनकारक होते हैं। फलेच्छा नहीं रहे तो कर्तृत्वाभिमान भी नहीं रहेगा। कर्मयोगमें फलेच्छाका और ज्ञानयोगमें कर्तृत्वाभिमानका त्याग मुख्य है। दोनोंमें एकका त्याग होनेपर दोनोंका त्याग हो जायगा। मेरा और दूसरोंका, अभी और परिणाममें सबका हित हो, वही कार्य करना चाहिये।
कामनाको मिटानेके लिये ऐसा विचार करना चाहिये कि कामनाकी पूर्ति होनेपर मिला क्या? जहाँ थे, वहीं लौटकर आ गये, फायदा क्या हुआ? सौ रुपयेकी कामना पूरी हो गयी तो हजार रुपयोंकी कामना हो गयी, फायदा क्या हुआ?
साधु, गृहस्थ, राजा, निर्धन आदि सभीके लिये वैराग्य बड़े कामकी चीज है। राग मूर्खताकी पहचान है—‘रागो लिङ्गमबोधस्य’।
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नाशवान् की सत्ता विद्यमान नहीं है और जो इसको जाननेवाला है, उसका अभाव विद्यमान नहीं है। दोनोंका तत्त्व है—भावरूपसे रहनेवाला चेतन। जो है ही नहीं, उसको क्या जानना? शरीरके नाशसे अपना नाश मानना गलती है। शरीरका वियोग ही सत्य है और नित्य है। अपनेको जानेवालेके साथ मानना बन्धन है और नित्य रहनेवालेके साथ मानना मुक्ति है। शरीर और संसार अनित्य-विभागमें हैं। आत्मा और परमात्मा नित्य-विभागमें हैं।
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संसारकी चीजोंपर तो हमारा थोड़ा-थोड़ा अधिकार है, पर भगवान् पर जीवमात्रका पूरा अधिकार है। माँकी गोदीमें जानेका सब बालकोंका पूरा अधिकार है।
संसारके साथ सम्बन्ध रखना है केवल सेवाके लिये। सेवा करो और पिण्ड छुड़ाओ! सेवा सबकी कर दो, पर लेनेकी आशा किसीसे भी मत रखो। भगवान्से भी लेनेकी आशा मत रखो। संसारकी आशा रखनेवाला कभी सुखी नहीं होता। एक सन्त बीमार हुए तो जिनसे सेवाकी आशा थी, उनमेंसे किसीने भी उनकी सेवा नहीं की। एक अपरिचित व्यक्तिने उनकी सेवा की और जब सन्त स्वस्थ हो गये तो उसने ब्राह्मणभोजन भी किया!
ठाकुरजीके प्रसादमें मीठा भी होता है और करेला भी होता है। दोनों ही प्रसाद हैं। ऐसे ही कड़वा-मीठा (सुख-दु:ख) जो आये, सब भगवान्का प्रसाद है। जो हम बुद्धिमें नहीं ला सकते, वह काम भी भगवान् कर देते हैं, फिर हम चिन्ता क्यों करें?
जो जिस परिस्थितिका तिरस्कार करता है, उसको वह परिस्थिति पुन: मिलती नहीं। अत: जो मिले, उसका सदुपयोग करो।
ठीक-बेठीक हमारी दृष्टिमें होता है। भगवान्की दृष्टिमें सब ठीक-ही-ठीक होता है।
भगवान्ने कृपा करके हमें दुनियाभरमें सबसे बढ़िया जगह (इस सत्संगमें) पहुँचा दिया! नहीं तो ऐसी जगहकी हम खुद खोज नहीं कर सकते। विचार करें, हम कहाँ जन्मे, कहाँ पढ़े, कहाँ रहे और कहाँ पहुँच गये!
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सुखी-दु:खी स्वयं ही होता है। स्वयं सुखी-दु:खी नहीं होता—यह बात तो सुनी हुई और सीखी हुई है, पर हम स्वयं सुखी-दु:खी होते हैं—यह हमारा अनुभव है।
दु:ख मैं-मेरेपनसे होता है। जबतक मैं-मेरेकी मान्यता है, तबतक कितना ही सीख लो, दु:ख नहीं मिटेगा। जिस मकानको हम अपना मानते हैं, उसमें कोई कोयलेकी लकीर भी खींच दे तो दु:ख होता है। उसी मकानको जब हम बेच देते हैं, तब उसके टूटनेका भी हमें दु:ख नहीं होता। अत: जिनमें हमारा अपनापन नहीं है, उनसे हम मुक्त ही हैं। इस दृष्टिसे अधिक मुक्ति तो हो गयी है, थोड़ी-सी बाकी है! संसारमें कई मकान नष्ट होते हैं, कई मनुष्य मरते हैं, पर उनका हमारेपर असर नहीं पड़ता। जिसमें हमारा मैं-मेरापन होता है, उसीका असर पड़ता है।
जहाँ ममता नहीं होती, वहाँ व्यवहार बढ़िया होता है। जहाँ ममता होती है, वहाँ इलाज भी बढ़िया नहीं होता! डॉक्टरके घरमें कोई बीमार होता है तो वह दूसरे डॉक्टरको बुलाता है। घरवालोंकी सेवा करनेका पुण्य नहीं होता; क्योंकि पुण्यको ममता खा जाती है। अगर आप शरीरको मैं-मेरा नहीं मानो तो शरीरको अन्न देनेका भी पुण्य होगा। मेरापन ही आपके पुण्यका, धर्मका नाश करनेवाला है।
संसारसे सम्बन्ध जोड़ो तो दु:खोंका पार ही नहीं है, और भगवान्से सम्बन्ध जोड़ो तो सुखोंका पार ही नहीं है।
सेवा करनेके लिये दुनिया हमारी है और लेनेके लिये कोई हमारा नहीं है।
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शरीर-संसार निरन्तर बदलते हैं, परमात्मा कभी नहीं बदलते। परमात्माकी प्राप्ति चाहनामात्रसे होती है। उसकी प्राप्तिमें संसारकी चाहना ही बाधक है। मनुष्य भोगोंमें कितना ही रच-पच जाय तो भी परमात्माकी चाहना मिटती नहीं, प्रत्युत दब जाती है; क्योंकि वह सत्य है।
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जैसे आप हरेक बातमें यह सोचते हैं कि अधिक लाभ कैसे लें, ऐसे ही मानवशरीर, सत्संग, गीता, संत-महात्मा आदि जो मिले, उससे अधिक लाभ कैसे लें—ऐसा विचार करें। सत्संगमें जो-जो सुगम बातें दीखें, उन्हें चुन लो और अपने जीवनमें उतारो। फिर कठिन बातें भी सुगम हो जायँगी और परिणाममें परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जायगी। जो सन्त मिले हैं, उनसे पूरा लाभ ले लो तो आगे और मिल जायँगे। जो मिला है, उससे अधिक-से-अधिक लाभ उठा लो। मोटरके प्रकाशसे जितना मार्ग दीखता है, उतना तय कर लो तो आगे बढ़ जाओगे और ठीक लक्ष्यतक पहुँच जाओगे।
परमात्मप्राप्तिके लिये सामग्रीकी कमी नहीं है, केवल उसकी चाहना होनी चाहिये। पारमार्थिक मार्गमें भगवान् कमी रखते ही नहीं। बछड़ा तो एक थनसे दूध पीता है, पर भगवान् चारों थनोंसे दूध देते हैं! बालककी चिन्ता माँ करती है, बालक नहीं। भगवान् सदासे हमारी माँ हैं। ‘रहति न प्रभु चित चूक किए की। करत सुरति सय बार हिए की॥’ (मानस, बाल० २९।३)—ऐसा आदर करनेवाला संसारमें कोई नहीं है! ‘उमा राम सम हित जग माहीं। गुरु पितु मातु बंधु प्रभु नाहीं॥’ (मानस, किष्किन्धा० १२।१)।
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परमात्माकी दो प्रकृतियाँ हैं—क्षर (जड़) और अक्षर (चेतन)। क्षरकी साधना कर्मयोग है, अक्षरकी साधना ज्ञानयोग है और पुरुषोत्तम (परमात्मा)-की साधना भक्तियोग है। कर्मयोग तथा ज्ञानयोग संसारसे असंग करते हैं और भक्तियोग भगवान्से अभिन्न करता है।
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दोषदृष्टिसे रहित होना साधकके लिये बहुत आवश्यक है। श्रद्धा भी हो और दोषदृष्टि भी न हो—‘श्रद्धावन्तोऽनसूयन्त:’ (गीता ३।३१), ‘श्रद्धावाननसूयश्च’ (गीता १८।७१)। दोषदृष्टि होनेसे श्रद्धा कमजोर होती है। प्रेम भी नहीं होता। अगर कहीं दोष दीखे तो वहाँ अपनी कमी समझनी चाहिये। हमें अपनी कमी देखनेका अधिकार है।
अगर किसीमें ज्यादा दोष दीख ही जायँ तो उसका संग मत करो। जैसा संग, वैसा रंग! ईश्वर, धर्म और परलोकको न माननेवाले नास्तिकका संग सबसे अधिक पतनकारक है। ऐसे ही मदिरा सबसे अधिक पतन करनेवाली है। वह मनुष्यके अन्त:करणमें स्थित धार्मिक भावोंके परमाणुओंको, अंकुरोंको नष्ट कर देती है। परस्त्रीगमन भी आस्तिकभावको नष्ट कर देता है।
दूसरा आदमी खराब हो अथवा नहीं, पर ‘वह खराब है’—यह वृत्ति तो खराब हो ही गयी! दोषदृष्टि करनेसे मुफ्तमें पाप हो जाता है। निन्दा करनेसे मुफ्तमें पाप लगता है। सत्संगसे मुफ्तमें उद्धार होता है और कुसंगसे मुफ्तमें पतन होता है। जैसे, पत्थर गंगाजीके प्रवाहमें पड़े-पड़े स्वत: गोल एवं सुन्दर हो जाते हैं।
सब भगवान्के हैं। जो ठीक नहीं हैं, वे भगवान्के लाड़ले बेटे हैं, जो लाड़से बिगड़ गये! सत्संग करनेवाले भी ऐसी गलती करते हैं, कितनी बुरी बात है—यह न देखकर ऐसा देखो कि गलती करनेवाले भी सत्संग करते हैं, कितनी अच्छी बात है!
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