प्रेमकी जागृतिमें ही मानव-जीवनकी पूर्णता
गीतामें आया है—‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:’ (२। १६) अर्थात् असत् (वस्तु, व्यक्ति, क्रिया)-की तो सत्ता विद्यमान नहीं है और सत् (परमात्मतत्त्व)-का अभाव विद्यमान नहीं है। तात्पर्य है कि असत् का अभाव-ही-अभाव है, सिवाय अभावके कुछ नहीं और सत् का भाव-ही-भाव है, सिवाय भावके कुछ नहीं। इस विवेकको महत्त्व न देकर जब मनुष्य शरीर (असत्)-को ही अपना स्वरूप मान लेता है अर्थात् शरीरमें ‘मैं’ और ‘मेरा’ कर लेता है, तब उसमें अभावकी उत्पत्ति हो जाती है। कारण कि अभावरूप असत् के सम्बन्धसे अभाव ही पैदा होता है। अभाव उत्पन्न होनेपर मनुष्य अभावके दु:खसे दु:खी हो जाता है। अभावके दु:खसे दु:खी होनेपर उसमें उस दु:खकी निवृत्तिके लिये कामना पैदा होती है। कामना पैदा होनेपर फिर अभाव बढ़ता ही जाता है, जिससे वह स्वाधीन नहीं रहता, प्रत्युत पराधीन हो जाता है। कारण कि एक कामना पूरी होनेपर दूसरी कामना पैदा हो जाती है और यह क्रम चलता ही रहता है। सम्पूर्ण कामनाएँ कभी किसीकी भी पूरी नहीं होतीं।
परमात्मतत्त्व सत्-चित्-आनन्दमय है। परन्तु प्रेमके आदान-प्रदानके लिये मिली हुई स्वाधीनताका दुरुपयोग करके जब मनुष्य असत् के साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है, तब उसमें सत्, चित् और आनन्दकी आवश्यकता (जिज्ञासा) उत्पन्न हो जाती है, जिसकी पूर्तिके लिये वह असत् की कामना करता है। मैं सदा जीता रहूँ, कभी मरूँ नहीं—यह ‘सत् ’ की आवश्यकता है। मैं सब कुछ जान लूँ, कभी अज्ञानी न रहूँ—यह ‘चित् ’ की आवश्यकता है। मैं सदा सुखी रहूँ, कभी दु:खी न रहूँ—यह ‘आनन्द’ की आवश्यकता है। परन्तु असत् के साथ सम्बन्ध माननेके कारण मनुष्यसे भूल यह होती है कि वह सत्-चित्-आनन्दकी आवश्यकताको असत् के द्वारा ही पूरी करना चाहता है; जैसे—वह शरीरके द्वारा जीना चाहता है, बुद्धिके द्वारा ज्ञानी बनना चाहता है और इन्द्रियाँ—अन्त:करणके द्वारा सुखी होना चाहता है। इस प्रकार उसमें आवश्यकता तो सत्-तत्त्वकी रहती है, पर उसकी पूर्तिके लिये कामना असत् की करता है—यही उसकी मूल भूल है। असत् की कामना करनेसे न तो आवश्यकताकी पूर्ति होती है और न कामनाका नाश होता है।* अत: मनुष्य सत्-तत्त्वसे विमुख हो जाता है और असत् को ही सत्य मानकर, उसको ही महत्ता देकर उसमें आसक्त हो जाता है। वह असत् को ही अपने जीवनका लक्ष्य मान लेता है। परिणाम यह होता है कि वह पराधीन, दु:खी, क्लान्त, पराजित, अभावग्रस्त और अनाथ हो जाता है। इतना ही नहीं, असत् की आसक्ति दृढ़ होनेपर वह पराधीनतामें ही स्वाधीनता, दु:खमें ही सुख, क्लान्ति (थकावट)-में ही विश्राम, पराजयमें ही विजय, अभावमें ही भाव और अनाथपनेमें ही सनाथपना मान बैठता है और मनुष्यतासे पशुताकी ओर चला जाता है!
मनुष्य कितना ही पतित क्यों न हो जाय, उसमें सत्-चित्-आनन्दकी जिज्ञासा दब तो सकती है, पर मिट नहीं सकती। उसकी वास्तविक आवश्यकता कभी नष्ट नहीं होती। जैसे मनुष्य थोड़ी भी दरिद्रताको नहीं चाहता, ऐसे ही वह अपने नाशको, अपने अनजानपनेको और अपने दु:खको थोड़ा भी नहीं चाहता। कभी सद्ग्रन्थ, सद्विचार, सत्संगके द्वारा अथवा कोई आफत आनेपर भगवत्कृपासे मनुष्यकी दृष्टि असत् से हटकर उसके प्रकाशक सत् की ओर चली जाती है, वह असत् से विमुख होकर उसके आधार सत् के सम्मुख हो जाता है, तब उसकी रुचि असत् से हटकर सत्-तत्त्वमें हो जाती है, असत् की कामना न रहकर सत् की जिज्ञासा हो जाती है अर्थात् आवश्यकता और कामनाका भेद स्पष्ट हो जाता है। भेद स्पष्ट होनेपर आवश्यकताकी पूर्ति और कामनाकी निवृत्ति हो जाती है अर्थात् असत् से माना हुआ सम्बन्ध नहीं रहता। असत् का सम्बन्ध मिटनेपर मनुष्यको शान्तरसका अनुभव हो जाता है। शान्तिको सत् मानकर उसका भोग न करनेसे उसको अखण्डरसका अनुभव होता है और अखण्डरसमें भी सन्तोष न करनेपर उसको अनन्तरसका अनुभव हो जाता है।
असत् (जड़ता)-से सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर शान्तरसका अनुभव होता है और सत् (चिन्मयता)-में स्थिति होनेपर अखण्डरसका अनुभव होता है। कर्मयोगमें शान्तरसका और ज्ञानयोगमें अखण्डरसका अनुभव होता है। कर्मयोग और ज्ञानयोग—दोनोंका परिणाम एक ही है* अर्थात् दोनोंके परिणाममें अपने चिन्मय स्वरूपमें स्थिति (मोक्ष)- का अनुभव होता है। मोक्षकी प्राप्ति होनेपर मुमुक्षा अथवा जिज्ञासा तो नहीं रहती, पर प्रेम-पिपासा रह जाती है। इसलिये जब मुक्त पुरुषको अखण्डरसमें भी सन्तोष नहीं होता, तब उसको भगवान् अपनी अहैतुकी कृपासे अनन्तरस प्रदान करते हैं। अनन्तरसको ही ‘प्रेम’ कहते हैं। मुमुक्षा अथवा जिज्ञासाकी तो पूर्ति होती है, पर इस प्रेमकी कभी पूर्ति नहीं होती। जैसे धनकी प्राप्ति होनेपर भी उसका लोभ बढ़ता रहता है; ऐसे ही प्रेमकी प्राप्ति अर्थात् जागृति होनेपर भी यह प्रेम प्रतिक्षण बढ़ता ही रहता है। इसलिये इस प्रेमको प्रतिक्षण वर्धमान कहा गया है—‘प्रतिक्षणवर्धमानम्’ (नारदभक्ति०५४)।
मोक्ष (अखण्डरस) प्राप्त होनेपर ‘मैं मुक्त हूँ अथवा मैं योगी हूँ या मैं ज्ञानी हूँ’—इस प्रकार अहम्की एक सूक्ष्म गन्ध रहती है। अहम्की यह सूक्ष्म गन्ध मुक्तिमें तो बाधक नहीं होती, पर प्रेम (अनन्तरस)-की जागृतिमें बाधक होती है। इस सूक्ष्म अहम् के कारण ही दार्शनिकोंमें परस्पर मतभेद रहता है। प्रेम जाग्रत् होनेपर फिर मतभेद नहीं रहता। अत: प्रेमकी जागृतिमें ही पूर्णता है।
परमात्माका स्वरूप सत्-चित्-आनन्दमय है। ‘सत्’ में असीम, अनन्त, अपार सौन्दर्य है, ‘चित् ’ में असीम, अनन्त, अपार ऐश्वर्य है और ‘आनन्द’ में असीम, अनन्त, अपार माधुर्य है। सत् में सौन्दर्य इसलिये है कि अपनी सत्ताकी तरफ सबका आकर्षण होता है कि मैं सदा बना रहूँ। अपनी सत्तामें कभी अरुचि नहीं होती। चितमें ऐश्वर्य इसलिये है कि मैं इतनी बातोंका जानकार हूँ—इस तरह अपनेमें विशेष जानकारी (विद्वत्ता)-का, एक संग्रहका, एक प्रभावका अनुभव होता है।* आनन्दमें माधुर्य इसलिये है कि आनन्द सबको मधुर, मीठा लगता है। सत् , चित् और आनन्द तीनों एक होते हुए भी केवल दृष्टिभेदसे अलग-अलग प्रतीत होते हैं। वास्तवमें जहाँ सत् है, वहाँ चित् और आनन्द भी हैं। जहाँ चित् है, वहाँ सत् और आनन्द भी हैं। जहाँ आनन्द है, वहाँ सत् और चित् भी हैं। परमात्मतत्त्व (अंशी)-में तो सत्-चित्-आनन्द पूर्णरूपसे विद्यमान हैं, पर उनके अंश जीवमें ये आंशिक रूपसे विद्यमान हैं।
संसारमें जो सौन्दर्य, ऐश्वर्य और माधुर्य दीखता है, वह प्रतिक्षण मिटनेवाला है। परन्तु संसारके साथ अपना सम्बन्ध माननेके कारण मनुष्यकी दृष्टि संसारमें ही अटक जाती है, उससे आगे परमात्मतत्त्वकी तरफ जाती ही नहीं। रागके कारण वह संसारके क्षणिक सौन्दर्य, ऐश्वर्य और माधुर्यको ही स्थायी तथा सत्य मान बैठता है। यद्यपि संसारमें दीखनेवाला सौन्दर्य-ऐश्वर्य-माधुर्य भी उस परमात्माके ही सौन्दर्य-ऐश्वर्य-माधुर्यकी एक आभा, झलक है*, तथापि मनुष्य उसको परमात्माका न मानकर उसकी स्वतन्त्र सत्ता मान लेता है और उसको ही महत्ता दे देता है। सांसारिक सौन्दर्यको महत्ता देनेसे ममता, ऐश्वर्यको महत्ता देनेसे कामना और माधुर्यको महत्ता देनेसे आसक्ति पैदा हो जाती है। परिणामस्वरूप उसका जीवन विकारी, अशान्त और परतन्त्र हो जाता है। परन्तु जब संसारसे माना हुआ सम्बन्ध नहीं रहता, तब ममता, कामना और आसक्तिका नाश हो जाता है और मनुष्य निर्विकार, शान्त और स्वतन्त्र हो जाता है अर्थात् संसार-बन्धनसे सर्वथा मुक्त हो जाता है। जब भगवान्की अहैतुकी कृपा उस मुक्तिको भी फीका कर देती है, तब प्रेमकी जागृति होती है। जैसे सूर्यका उदय होनेपर हजार वाटके लट्टूका प्रकाश मिट तो नहीं जाता, पर सूर्यके सामने उस प्रकाशका उतना महत्त्व नहीं रहता, ऐसे ही प्रेमका उदय होनेपर निर्विकारता, शान्ति और स्वतन्त्रता मिट तो नहीं जाती, पर उनका उतना महत्त्व नहीं रहता। महत्त्व न रहनेसे ‘मैं निर्विकार हूँ; मैं शान्त हूँ; मैं स्वतन्त्र हूँ’—यह सूक्ष्म अहंभाव तथा इससे पैदा होनेवाले सभी दार्शनिक मतभेद सर्वथा मिट जाते हैं अर्थात् अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैत, द्वैताद्वैत आदि जितने भी मतभेद हैं, सब वासुदेवरूप हो जाते हैं, जो कि वास्तवमें है। इसलिये ‘वासुदेव: सर्वम्’ का अनुभव करनेवाले प्रेमी भक्तके हृदयमें किसी एक मतका आग्रह नहीं रहता, प्रत्युत सबका समान आदर रहता है। किसी एक मतका आग्रह न होनेसे उसके द्वारा किसीका भी कभी अनादर नहीं होता।