सच्ची आस्तिकता
गीता भगवान्के समग्ररूपको मानती है, उसीको महत्त्व देती है और उसकी प्राप्तिमें ही मानव-जीवनकी पूर्णता मानती है। सब कुछ भगवान् ही हैं—‘वासुदेव: सर्वम्’ (गीता ७। १९)—यह भगवान्का समग्ररूप है। सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार, द्विभुज, चतुर्भुज, सहस्रभुज आदि रूप तथा पदार्थ और क्रियारूप सम्पूर्ण जगत् , सम्पूर्ण जीव, सम्पूर्ण देवता—ये सब-के-सब भगवान्के समग्ररूपके अन्तर्गत आ जाते हैं। इसलिये जो समग्रको जान लेता है, उसके लिये कुछ भी जानना शेष नहीं रहता—‘यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते’ (गीता ७। २)। समग्रको जाननेका मुख्य साधन है—शरणागति। इसलिये भगवान्ने गीतोपदेशका पर्यवसान शरणागतिमें ही किया है—‘सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज’ (गीता १८। ६६)। भगवान्ने गीताभरमें केवल शरणागतिको ही ‘सर्वगुह्यतम’ (सबसे अत्यन्त गोपनीय) कहा है—‘सर्वगुह्यतमं भूय: शृणु’ (गीता १८। ६४)।
वास्तवमें सत्ता एक ही है। उस एक परमात्माकी सत्ताके अधीन जीवकी सत्ता है और जीवके अधीन जगत् की सत्ता है। जीव और जगत् —दोनों परमात्मामें ही भासित होते हैं। गीताके सातवें अध्यायमें भगवान्ने जीवको अपनी ‘परा प्रकृति’ और जगत् को अपनी ‘अपरा प्रकृति’ बताया है। परा और अपरा—दोनों भगवान्की शक्तियाँ हैं। अत: इनको अपनी प्रकृति बतानेमें भगवान्का तात्पर्य है कि ये दोनों मेरेसे अलग नहीं हैं। शक्तिमान् से अलग शक्तिकी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं होती। शक्तिमान् शक्तिके बिना रह सकता है, पर शक्ति शक्तिमान् के बिना नहीं रह सकती।
अब शंका होती है कि जब जीव (परा) और जगत् (अपरा)—दोनों ही भगवान्से अभिन्न हैं तो फिर जगत् की सत्ता अलग क्यों दीखती है? इसके उत्तरमें भगवान्ने कहा है—‘जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्’ (गीता ७। ५) अर्थात् जीवने ही जगत् को धारण किया है अर्थात् जगत् को सत्ता और महत्ता दी है। जीव केवल मेरा (भगवान्का) ही अंश है—‘ममैवांशो जीवलोके’ (गीता १५। ७)। परन्तु यह मिलने और बिछुड़नेवाले शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिको अपना मान लेता है—‘मन:षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति’ (गीता १५। ७)। जगत् के साथ अपना सम्बन्ध माननेके कारण ही यह जन्म-मरणके चक्करमें पड़कर दु:ख पा रहा है। जीवके द्वारा जगत् से माना हुआ यह सम्बन्ध ही सम्पूर्ण योनियोंका कारण है—‘एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय’ (गीता ७।६) अर्थात् इन दोनोंके माने हुए संयोगके कारण ही सम्पूर्ण स्थावर-जंगम प्राणी पैदा होते हैं। तात्पर्य हुआ कि जीवके द्वारा अपरासे जोड़ा गया सम्बन्ध ही मूल दोष है, जिससे सम्पूर्ण दोषोंकी उत्पत्ति होती है।
‘वासुदेव: सर्वम्’ अर्थात् सब कुछ भगवान् ही हैं—यह गीताका सर्वोपरि सिद्धान्त है। इसका अनुभव करनेका मनुष्यमात्र अधिकारी है। प्रत्येक देश, वेश, वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिका मनुष्य भगवान्का भक्त होकर ‘वासुदेव: सर्वम्’ का अनुभव कर सकता है। कारण कि भगवान्की प्राप्ति शरीरके द्वारा नहीं होती, प्रत्युत शरीरके सम्बन्ध-विच्छेदसे होती है। शरीरसे सम्बन्ध-विच्छेदके लिये तीन बातोंको जानना आवश्यक है—शरीर ‘मैं’ नहीं हूँ, शरीर ‘मेरा’ नहीं है और शरीर ‘मेरे लिये’ नहीं है। यह सिद्धान्त है कि जो वस्तु मिलने और बिछुड़नेवाली होती है, वह अपनी और अपने लिये नहीं होती। एक भगवान् ही हमारे ऐसे साथी हैं, जो सदा हमारे साथ रहते हैं, कभी हमसे बिछुड़ते नहीं। परन्तु जो मनुष्य मिलने और बिछुड़नेवाली वस्तुओंमें ही उलझे रहते हैं, नाशवान् भोगोंमें और संग्रहमें ही लगे रहते हैं, वे सदा साथ रहते हुए भी भगवान्को न प्राप्त होकर बार-बार संसारमें जन्मते-मरते रहते हैं—‘अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि’ (गीता ९। ३)।
संसारकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। उसको जीवने ही अहंता-ममता-कामनाके कारण स्वतन्त्र सत्ता दी है। जबतक साधकमें अहंता-ममता-कामना रहती है, तबतक उसको यह मानना चाहिये कि परमात्मामें संसार है और संसारमें परमात्मा है। परन्तु जब उसकी अहंता-ममता-कामना मिट जायगी, तब उसकी दृष्टिमें न संसारमें परमात्मा रहेंगे, न परमात्मामें संसार रहेगा, प्रत्युत परमात्मा-ही-परमात्मा रहेंगे। परमात्मामें संसारको देखना अथवा संसारमें परमात्माको देखना अधूरी आस्तिकता है। परन्तु केवल परमात्माको ही देखना पूरी आस्तिकता है।
भगवान्ने कहा है—‘ममैवांशो जीवलोके’ (गीता १५। ७)। भगवान्का अंश होनेके कारण जीवका सम्बन्ध केवल भगवान्के साथ है, प्रकृतिके साथ बिलकुल नहीं है। इसलिये जड़-चेतनका ठीक-ठीक विवेक करना साधकके लिये बहुत आवश्यक है। साधकको यह जानना चाहिये कि हमारा विभाग ही अलग है। हम चेतन-विभागमें हैं। जड़-विभागसे हमारा किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है। सम्पूर्ण पदार्थ और क्रियाएँ जड़-विभागमें हैं। चेतन-विभागमें न पदार्थ है, न क्रिया है। वास्तवमें पदार्थ और क्रियाकी सत्ता ही नहीं है। इसलिये साधकको पदार्थ और क्रियासे रहित होना नहीं है, प्रत्युत वह स्वत: इनसे रहित है। साधक अव्यक्त (निराकार) और अक्रियरूप है। मात्र ‘करना’ प्रकृतिका और ‘न करना’ स्वयंका होता है। परमात्मतत्त्व ज्यों-का-त्यों विद्यमान है, उसके लिये कुछ करनेकी जरूरत नहीं है। करनेका आश्रय प्रकृतिका आश्रय है। वह छोड़ दिया तो तत्त्व ज्यों-का-त्यों रहा। तत्त्वमें न पदार्थ है, न क्रिया है, प्रत्युत केवल विश्राम है।
भगवान्ने जीवात्माके लिये कहा है—‘नित्य: सर्वगत:’ (गीता २। २४), ‘येन सर्वमिदं ततम्’ (गीता २। १७) अर्थात् इस जीवात्मासे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, यह नित्य रहनेवाला और सबमें परिपूर्ण है। इसलिये साधकको चाहिये कि वह शरीर-अन्त:करणको न देखकर अपनी सर्वव्यापी सामान्य सत्तामें स्थित हो जाय। जो सब जगह व्याप्त है, वही साधकका स्वरूप है। उसका स्वरूप शरीर-अन्त:करणमें नहीं है। साधकमें ‘मैं हूँ’ की मुख्यता न होकर ‘है’ की मुख्यता रहे। जो ‘है’, वही वास्तवमें अपना है।
गीतामें भगवान्ने कहा है—‘मत्त: परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति’ (७। ७) और सन्त-महात्माओंका भी अनुभव है—‘वासुदेव: सर्वम्’ (७। १९)। भगवान् और उनके भक्त—ये दो ही संसारका अकारण हित करनेवाले हैं१। इसलिये इन दोनोंकी बात मान लेनी चाहिये। उनकी बातके आगे हमारी बातका कोई मूल्य नहीं है। हमें भले ही वैसा न दीखे, पर बात उनकी ही सच्ची है। इसलिये हमें जगत् को जगत्-रूपसे न देखकर भगवत्-रूपसे ही देखना चाहिये। संसारमें जो सात्त्विक, राजस और तामस भाव (गुण, पदार्थ और क्रिया) देखनेमें आते हैं, वे भी भगवान्के ही स्वरूप हैं। भगवान्के स्वरूप होते हुए भी वे गुण हमारे उपास्य नहीं हैं। हमारा उपास्य गुणातीत है। इसलिये भगवान्ने कहा है—‘न त्वहं तेषु ते मयि’ (गीता ७। १२) ‘मैं उनमें और वे मुझमें नहीं हैं’। गुण उपास्य इसलिये नहीं हैं कि हमें तीनों गुणोंसे ऊँचा उठना है। कारण कि जो मनुष्य तीनों गुणोंसे मोहित होता है, वह गुणातीत भगवान्को नहीं जानता।२ जो गुणोंसे मोहित नहीं होते, उनको सब जगह भगवान् ही दीखते हैं, पर गुणोंसे मोहित मनुष्यको संसार ही दीखता है, भगवान् नहीं दीखते।
यहाँ शंका हो सकती है कि भगवान्में राजस-तामस भाव कैसे होते हैं? इसका समाधान है कि जैसे घर एक ही होता है, पर उसमें रसोई भी होती है और शौचालय भी अथवा एक ही शरीरमें उत्तमांग भी होते हैं और अधमांग भी, ऐसे ही एक भगवान्में सात्त्विक भाव भी हैं और राजस-तामस भाव भी।
संसारको मिथ्या मानकर केवल भगवान्को सत्य मानना भी एक पद्धति (साधन-मार्ग) है। पर इस पद्धतिमें संसार बहुत दूरतक साथ रहता है। कारण कि त्याग करनेसे त्याज्य वस्तुकी सूक्ष्म सत्ता बनी रहती है। इसलिये इस पद्धतिमें भगवान्से अभेद तो होता है, पर अभिन्नता (आत्मीयता) नहीं होती। परन्तु जो संसाररूपसे भगवान्को देखते हैं, वे भगवान्के साथ अभिन्न हो जाते हैं।