साधकोंके लिये

एक बार सरल हृदयसे दृढ़तापूर्वक स्वीकार कर लें कि—

सर्वकालमें मैं स्वयं—केवल भगवान‍्का ही अंश हूँ, और किसीका भी अंश नहीं हूँ। तथा

सर्वकालमें—केवल भगवान् ही मेरे अपने हैं, और कोई भी मेरा अपना नहीं है।

कारण यह है कि—

शरीर-संसार कभी किसीके साथ रहते ही नहीं; क्योंकि इनकी सत्ता विद्यमान नहीं है—

‘नासतो विद्यते भाव:’

(गीता २। १६)

और

परमात्मा कभी किसीका साथ छोड़ते ही नहीं; क्योंकि उनकी सत्ता नित्य विद्यमान है—

‘नाभावो विद्यते सत:’

(गीता २। १६)

स्पष्टीकरण

एक बार—‘मैं भगवान‍्का हूँ तथा भगवान् मेरे हैं’—ऐसा माननेके लिये कोई अभ्यास नहीं करना है, माला नहीं फेरनी है, प्रत्युत एक बार स्वीकारमात्र करना है। स्वीकारमात्र करनेमें कोई अभ्यास या क्रिया नहीं है। स्वीकृति एक ही बार होती है और सदाके लिये होती है। कारण कि पहलेसे ही हम भगवान‍्के हैं तथा भगवान् हमारे हैं। उदाहरणार्थ, विवाह होनेपर कन्या एक बार पतिको अपना मान लेती है। फिर उसे इसको दृढ़ करनेके लिये अभ्यास नहीं करना पड़ता।

सरल हृदयसे—सच्ची स्वीकृति सरल हृदयसे ही होती है। भगवान् भावग्राही हैं। भगवान‍्का स्वभाव सरल है और सरल स्वभाववाले भक्त ही भगवान‍्को प्रिय हैं—

निष्किञ्चना वयं शश्वन्निष्किञ्चनजनप्रिया:।

(श्रीमद्भा० १०। ६०। १४)

‘सरल सुभाउ छुअत छल नाहीं’

(मानस, बाल० २३७। १)

‘मोहि कपट छल छिद्र न भावा’

(मानस, सुन्दर० ४४। ३)

उदाहरणार्थ, छोटा बच्चा सरल हृदयसे माँको अपना मानता है। माँको अपना माननेके लिये उसे किसी प्रमाणकी जरूरत नहीं पड़ती। उससे कोई पूछे कि यह तेरी माँ क्यों है तो वह यही कहता है कि बस, मेरी माँ है।

हृदयप्रधान (भावप्रधान) भक्त ही भगवान‍्के साथ अपना सम्बन्ध स्वीकार करते हैं। मस्तिष्कप्रधान (विवेकप्रधान) साधक ऐसा नहीं कर सकते। कारण कि विवेकमें स्वीकार करनेयोग्य ‘सत्’ और अस्वीकार करनेयोग्य ‘असत्’—दोनों रहते हैं। अत: असत् की सत्ता बहुत दूरतक साथ रहती है।

दृढ़तापूर्वक—शिथिल स्वभाववाला मनुष्य एक ही बार भगवान‍्के साथ अपना सम्बन्ध स्वीकार नहीं कर सकता। वह बार-बार भगवान‍्के साथ सम्बन्ध स्वीकार करता है और बार-बार उसे छोड़कर संसारको अपना मानता है। इस प्रकार बार-बार विचार करने और उसे छोड़नेकी आदतके कारण संसारसे माना हुआ सम्बन्ध नहीं छूटता। अत: साधकको चाहिये कि वह एक बार जो स्वीकार कर ले, उसपर सदा दृढ़ रहे। उदाहरणार्थ, स्त्री पतिको इतनी दृढ़तासे अपना मान लेती है कि पतिके मरनेके बाद भी उसका यह सम्बन्ध छूटता नहीं।

हरदोई जिलेके इकनोरा गाँवमें एक लड़की अपने ननिहालमें रहती थी। पति दूसरे गाँवमें बीमार था, वह मर गया। उस लड़कीको पतिके मरनेका समाचार मिला तो उसने अपने मामासे कहा कि मैं सती होऊँगी। मामाने ऐसा करनेके लिये मना किया तो उसने दीपक जलाया औरउसपर अपनी अँगुली रखी। उसकी अँगुली मोमबत्तीकी तरह जलने लगी! उसने मामासे कहा कि आप सती होनेकी आज्ञा नहीं देंगे तो यह सारा घर भस्म हो जायगा। मामाने कहा कि ठीक है, तेरी जैसी मरजी! उसने जलती हुई अँगुलीको एक दीवारपर रगड़कर बुझाया और घरसे बाहर जाकर एक पीपलवृक्षके नीचे खड़ी हो गयी। उसने मामासे आग देनेको कहा तो मामाने मना कर दिया। तब उसने हाथ जोड़कर सूर्य भगवान‍्से आग देनेकी प्रार्थना की और वहाँ खड़ी-खड़ी अपने-आप जल गयी। साधकका भाव भी इसी तरह दृढ़ होना चाहिये।

स्वीकार कर लें—हमें भगवान‍्के साथ कोई नया सम्बन्ध नहीं जोड़ना है। भगवान‍्के साथ हमारा सम्बन्ध अनादिकालसे है। हम सदासे ही भगवान‍्के हैं और सदासे ही भगवान् हमारे हैं। संसारके साथ अपना सम्बन्ध माननेके कारण हमें इस (भगवान‍्के) सम्बन्धकी विस्मृति हो गयी है। अत: हमें केवल भगवान‍्के साथ अपना सम्बन्ध स्वीकार करना है। यह स्वीकृति स्वयंसे होती है, बुद्धिसे नहीं। स्वयंसे जोड़े गये सम्बन्धकी विस्मृति नहीं होती। उदाहरणार्थ, विवाह होनेपर स्त्री पतिको अपना मान लेती है तो फिर स्वप्नमें भी उसे इस सम्बन्धकी विस्मृति नहीं होती। शिष्य गुरुको स्वीकार कर लेता है तो फिर स्वप्नमें भी नहीं भूलता कि मैं अमुक गुरुका शिष्य हूँ।

सर्वकालमें मैं स्वयं केवल भगवान‍्का ही अंश हूँ—भगवान‍्ने गीतामें कहा है—‘ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:’ (१५। ७) ‘इस संसारमें जीव बना हुआ आत्मा मेरा ही सनातन अंश है।’ अत: जीवमात्र भगवान‍्का ही अंश रहेगा। कोई भी जीव किसी भी कालमें भगवान‍्से अलग नहीं हो सकता। सर्वसमर्थ भगवान‍्में भी यह सामर्थ्य नहीं है कि वे जीवको अपनेसे अलग कर सकें।

और किसीका भी अंश नहीं हूँ—शरीरमें तो माता और पिता—दोनोंके अंश रहते हैं; परन्तु स्वयं केवल भगवान‍्का ही अंश है (मम एव अंश:), इसमें प्रकृतिके अंशका मिश्रण नहीं है। जीव ही प्रकृतिके अंश (शरीर-संसार)-को पकड़कर जन्म-मरणरूप बन्धनमें पड़ जाता है।

सर्वकालमें केवल भगवान् ही मेरे अपने हैं—सम्पूर्ण ब्रह्माण्डोंमें लेशमात्र भी ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो सदा हमारे साथ रह सके और हम उसके साथ रह सकें। सभी वस्तुएँ और व्यक्ति मिलने तथा बिछुड़नेवाले हैं। परन्तु भगवान‍्से जीवमात्रका स्वाभाविक सम्बन्ध है। भगवान‍्से अलग कोई हुआ ही नहीं, अलग है ही नहीं, अलग होगा ही नहीं, अलग हो सकता ही नहीं। इसलिये मीराबाईने दृढ़तासे स्वीकार कर लिया कि ‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।’

और कोई भी मेरा अपना नहीं है—माता, पिता, स्त्री, पुत्र भाई आदि कोई भी मेरा अपना नहीं है। वे केवल सेवा करनेके लिये ही अपने हैं। यदि वास्तवमें वे अपने होते तो कभी अपनेसे बिछड़ते नहीं। भगवान‍्के सिवाय जो कुछ भी है, वह सब मिला हुआ है और बिछुड़ जायगा; अतः वह अपना नहीं है।

गीतामें भगवान‍्ने कहा—‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः’ (२। १६) ‘असत‍्का तो भाव (सत्ता) विद्यमान नहीं है और सत‍्का अभाव विद्यमान नहीं है।’ तात्पर्य है कि संसारको कितना ही स्वीकार करें, उसकी सत्ता है ही नहीं। वह सदा अप्राप्त है, प्राप्त हो सकता ही नहीं। परन्तु भगवान‍्को कितना ही अस्वीकार करें, उनकी सत्ता सदा विद्यमान है। वे सबको सदा प्राप्त हैं, अप्राप्त हो सकते ही नहीं। अतः साधकको उसीसे सम्बन्ध-विच्छेद करना है, जिससे कभी सम्बन्ध हुआ ही नहीं और उसीसे सम्बन्ध जोड़ना है, जिससे कभी सम्बन्ध छूटा ही नहीं। जिसे छोड़ना है, वह छूटा हुआ ही है और जिसे पाना है, वह पाया हुआ ही है।