साधन के दो प्रधान सूत्र
चौरासी लाख योनियोंमें भटकते हुए जीवको परमपिता परमात्मा अपनी अहैतुकी कृपासे बीचमें ही मानवशरीर प्रदान करते हैं। इस मानवशरीरको प्राप्त करके जीव सुगमतासे अपना कल्याण कर सकता है। इसलिये गोस्वामीजी महाराजने कहा है—
बड़े भाग मानुष तनु पावा।
सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा॥
साधन धाम मोच्छ कर द्वारा।
पाइ न जेहिं परलोक सँवारा॥
(मानस, उत्तर० ४३। ४)
भगवान्ने तो इसलिये मानवशरीर प्रदान किया कि जीव संसार-बन्धनसे छूटकर सदाके लिये कृतकृत्य, ज्ञात-ज्ञातव्य और प्राप्त-प्राप्तव्य हो जाय। परन्तु दु:खकी बात है कि मनुष्य अपने उद्देश्यसे विमुख होकर भोग तथा संग्रहमें लग गया! कभी कोई मनुष्य संतकृपा अथवा भगवत्कृपासे साधनमें लग भी जाता है तो उसमें दृढ़ निश्चयकी कमी रहती है। दृढ़ निश्चयके बिना उसका जीवन साधनमय नहीं बन पाता। जीवन साधनमय न बननेके कारण वह कोरी बातें सीखकर वक्ता अथवा लेखक तो बन सकता है, पर परमशान्ति नहीं प्राप्त कर सकता। जीवनको साधनमय बनानेके लिये यह आवश्यक है कि साधक इन दो बातोंको दृढ़तापूर्वक स्वीकार कर ले—
(१) मेरा कुछ भी नहीं है, मेरेको कुछ भी नहीं चाहिये और मेरा किसीसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं है।
(२) केवल भगवान् ही मेरे अपने हैं।
पहली बात संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करानेवाली है और दूसरी बात भगवान्की प्राप्ति करानेवाली है। पहली बातको दृढ़तासे स्वीकार करनेसे ‘मुक्ति’ और दूसरी बातको दृढ़तासे स्वीकार करनेसे ‘भक्ति’ की सिद्धि हो जाती है। अत: विवेकप्रधान साधक पहली बातको स्वीकार करे। परिणाममें दोनों ही प्रकारके साधक कृतकृत्य, ज्ञात-ज्ञातव्य और प्राप्त-प्राप्तव्य हो जायँगे। उनका मनुष्यजन्म सफल हो जायगा। इन बातोंको सीखना नहीं है, प्रत्युत स्वयंसे स्वीकार करना है। सीखी हुई बातकी विस्मृति हो सकती है, परंन्तु स्वीकारकी गयी बातकी विस्मृति नहीं होती।
अब यह शंका पैदा होती है कि जब मेरा कुछ भी नहीं है तो फिर माता-पिताकी सेवा क्यों करें? वस्तुओंकी रक्षा क्यों करें? जब मेरेको कुछ नहीं चाहिये तो फिर अन्न-जलकी क्या जरूरत है? जब मेरा किसीसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं है तो फिर दूसरेकी सहायता क्यों करें? सेवा क्यों करें? जब केवल भगवान् ही मेरे अपने हैं तो फिर पतिकी सेवा क्यों करें? इन सब शंकाओंका मूल कारण यह है कि साधक उपर्युक्त दोनों बातोंको शरीरके साथ एक होकर स्वीकार करता है। शरीरके साथ मैं-मेरेका सम्बन्ध (तादात्म्य) ही बन्धनका मूल कारण है। इसलिये हमारे स्वरूपके विषयमें गोस्वामीजीने कहा है—
ईस्वर अंस जीव अबिनासी।
चेतन अमल सहज सुख रासी॥
(मानस, उत्तर० ११७। १)
अब इसपर विचार करते हैं—
‘ईस्वर अंस जीव’—जीव स्वयं अंश है और परमात्मा अंशी हैं। भगवान्ने भी कहा है—‘ममैवांशो जीवलोके’ (गीता १५। ७)। जैसे भगवान् सत्-चित्-आनन्दस्वरूप हैं, ऐसे ही जीव भी सत्-चित्-आनन्दस्वरूप हैं। जैसे सभी बेटोंका माँपर समान अधिकार होता है, ऐसे ही परमपिता परमात्मापर मानवमात्रका समान अधिकार है। जैसे कोई राजकुमार ‘मैं राजाका बेटा हूँ’—इस बातको भूलकर भीख माँगता है तो राजाको आश्चर्यके साथ-साथ बड़ा दु:ख होता है, ऐसे ही सांसारिक भोग और संग्रहमें लगे हुए मनुष्यको देखकर भगवान्को बड़ा दु:ख होता है कि यह मेरेको प्राप्त न करके अपना पतन कर रहा है—‘मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्’ (गीता १६। २०)।
साधकमें इस बातका गर्व (स्वाभिमान) होना चाहिये कि भगवान् मेरे अपने हैं, मैं भगवान्का हूँ—
अस अभिमान जाइ जनि भारे।
मैं सेवक रघुपति पति मोरे॥
(मानस, अरण्य० ११। ११)
हम त्रिलोकीके स्वामी परमपिता परमात्माकी सन्तान हैं, फिर हम तुच्छ नाशवान् संसारकी ओर हाथ क्यों फैलायें? जो संसारके सम्मुख होता है, उसको संसार अपना दास बना लेता है। परन्तु जो भगवान्के सम्मुख होता है, स्वयं भगवान् उसके दास बन जाते हैं—‘अहं भक्तपराधीन:’ (श्रीमद्भा० ९। ४। ६३); मैं तो हूँ भगतनका दास, भगत मेरे मुकुटमणि’! ऐसे परमसुहृद् प्रभुको छोड़कर संसारको चाहना कितनी मूर्खताकी बात है।
‘अबिनासी’—परमात्मा अविनाशी हैं; अत: उनका अंश जीव भी अविनाशी है—‘अविनाशि तु तद्विद्धि’ (गीता २। १७)। परन्तु स्वयं अविनाशी होकर भी नाशवान् शरीर-संसारके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है—
ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:।
मन:षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥
(गीता १५। ७)
‘इस संसारमें जीव बना हुआ आत्मा स्वयं मेरा ही सनातन अंश है; परन्तु वह प्रकृतिमें स्थित मन और पाँचों इन्द्रियोंको आकर्षित करता है अर्थात् अपना मान लेता है।’
प्रकृतिका अंश इतना ईमानदार है कि सदा प्रकृतिमें ही स्थित रहता है—‘प्रकृतिस्थानि’। परन्तु जीव परमात्माका अंश होते हुए भी प्रकृतिके अंश (शरीर)-के साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है! इस माने हुए सम्बन्धके कारण वह जन्म-मरणके चक्रमें पड़ा रहता है।
‘चेतन’—परमात्माका अंश होनेके कारण जीव चित्स्वरूप है। मात्र जड़ वस्तु मिलने और बिछुड़नेवाली है। जैसे अमावास्याकी रातका सूर्यके साथ मिलन असम्भव है, ऐसे ही जड़ वस्तुका चेतनके साथ सम्बन्ध असम्भव है। अत: चेतनका जड़से सम्बन्ध कृत्रिम और माना हुआ है, वास्तविक नहीं है।
‘अमल’—परमात्माका अंश होनेसे स्वयं निर्मल, निर्दोष है। इसलिये गीतामें भगवान् कहते हैं—
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्यय:।
शरीररस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते॥
(१३। ३१)
‘हे कुन्तीनन्दन! यह पुरुष स्वयं अनादि होनेसे और गुणोंसे रहित होनेसे अविनाशी परमात्मस्वरूप ही है। यह शरीरमें रहता हुआ भी न करता (कर्त्ता बनता) है और न लिप्त होता (भोक्ता बनता) है।’
काम-क्रोधादि जितने भी दोष हैं, वे सब-के-सब आगन्तुक हैं; परन्तु शरीरसे तादात्म्य होनेके कारण अज्ञानी मनुष्य मान लेता है कि मैं कामी हूँ, मैं क्रोधी हूँ आदि। कोई भी दोष नित्य-निरन्तर नहीं रहता, आता-जाता है—‘आगमापायिनोऽनित्या:’ (गीता २। १४); परन्तु स्वरूप सदा ज्यों-का-त्यों रहता है। समस्त दोष जड़-विभागमें ही हैं, चेतन-विभागमें नहीं। इसलिये स्वयंतक कोई दोष पहुँच सकता ही नहीं। स्वयं नित्य-निरन्तर निर्दोष रहता है।
‘सहज सुख रासी’—संसार दु:खरूप है—‘ये हि संस्पर्शजा भोगा दु:खयोनय एव ते’ (गीता ५। २२); ‘दु:खालयमशाश्वतम्’ (गीता ८। १५)। इस दु:खरूप संसारके साथ मैं—मेरेपनका सम्बन्ध मानकर ही जीव दु:खी होता है। वास्तवमें जीव परमात्माका अंश होनेसे सुखकी खान है। इसलिये शरीर-संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होते ही साधकको अपने सहज, अक्षय, आत्यन्तिक सुखका अनुभव हो जाता है—‘स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते’ (गीता ५। २१); ‘सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्’ (गीता ६। २१)। जैसे घरमें पारस होते हुए भी अज्ञानी मनुष्य द्वार-द्वार जाकर भीख माँगता है, ऐसे ही स्वयं सुखकी खान होते हुए भी मनुष्य सुख पानेकी लालसामें सांसारिक भोग तथा संग्रहमें लगा रहता है और परिणाममें महान् दु:ख पाता है—‘परिणामे विषमिव’ (गीता १८। ३८)।
सम्पूर्ण दु:खोंका मूल कारण है—नाशवान् सुखकी कामना। कामनाको छोड़े बिना कोई भी सुख नहीं पा सकता—‘स शान्तिमाप्नोति न कामकामी’ (गीता २। ७०)। सांसारिक सुखकी कामना अभ्याससे नहीं मिटती, प्रत्युत पारमार्थिक सुख मिलनेसे मिटती है। इसलिये साधकको चाहिये कि वह नामजप, भजन-कीर्तन, भक्त-चरित्रके पठन आदिमें लग जाय। जब उसको नामजप आदिमें रस आने लगेगा, तब संसारका रस स्वत: छूटने लगेगा। जैसे, बचपनमें कंकड़-पत्थरोंमें रस मिलता था, पर जब रुपयोंमें रस आने लगता है, तब कंकड़-पत्थरोंका रस स्वत: छूट जाता है।
दूसरोंकी सेवा करना और भगवान्को अपना मानना—इन दो कार्योंके लिये ही यह मानवशरीर मिला है। मनुष्यके सिवाय अन्य किसी भी योनिमें इन दो कार्योंको करनेकी योग्यता और सामर्थ्य नहीं है। भगवान् भी मनुष्यसे यह आशा रखते हैं कि यह दूसरोंकी सेवा करे और मेरेको अपना माने—मेरेसे प्रेम करे! जैसे, माँ अपने बेटेसे पूछती है कि बता, तू किसका बेटा है? तो बालक कहता है कि ‘तेरा हूँ’। यह सुनते ही माँ राजी हो जाती है। इसी तरह भगवान् भी अपने बनाये हुए मनुष्यके द्वारा यह सुनना चाहते हैं कि वह मेरेको अपना कहे, मेरेसे प्रेम करे।
भगवान्में अपनेपनके सिवाय प्रेम-प्राप्तिका अन्य कोई उपाय नहीं है। ‘केवल भगवान् ही मेरे अपने हैं और मैं केवल भगवान्का ही हूँ’—ऐसा स्वीकार करनेसे भगवान् कृपा करके अपना साध्यप्रेम प्रदान करते हैं, जो प्रतिक्षण वर्धमान है। इस साध्यप्रेमकी जागृतिमें ही मानव-जीवनकी पूर्णता है।
साधक दो प्रकारके होते हैं—मस्तिष्क (विवेक)-प्रधान और हृदय (भाव)-प्रधान। विवेकप्रधान साधक विवेकपूर्वक संसारका त्याग करता है और भावप्रधान साधक संसारको भगवत्स्वरूप देखता है। कारण कि सब कुछ भगवान् ही हैं—यह विवेकका विषय न होकर भावका विषय है। जबतक विवेक रहता है, तबतक सत् और असत् दोनोंकी सत्ता रहती है। इसलिये विवेकमार्गी साधक सत्तत्त्व (परमात्मा)-को असत् (संसार)-से अलग करके देखता है। जबतक साधककी दृष्टिमें भगवान् और संसार—दोनों अलग-अलग रहते हैं, तबतक उसके जीवनमें अखण्ड आनन्द नहीं आता, प्रत्युत कभी तो आनन्द आता है, कभी नीरसता आती है। कभी तो अपने साधनमें बड़ी उन्नति दीखती है, कभी साधनमें कोई लाभ नहीं दीखता। कारण यह है कि विवेकमार्गमें त्याज्य वस्तु (असत्)-की सूक्ष्म सत्ता बहुत दूरतक साथ रहती है। परन्तु भावप्रधान साधककी दृष्टिमें सत्-असत् , परा-अपराके सहित सब कुछ एक भगवान् ही होते हैं—‘सदसच्चाहम्’ (गीता ९। १९); ‘अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्’ (गीता ७। ५)। अत: उसकी दृष्टिमें त्याज्य वस्तु कोई होती ही नहीं। अत: भावप्रधान साधनमें संसार नहीं रहता, केवल भगवान् ही रहते हैं—‘वासुदेव: सर्वम्’ (गीता ७। १९)। ऐसे साधकको अखण्ड आनन्दके साथ-साथ भगवत्कृपासे अनन्त आनन्द (साध्य-प्रेम)-का अनुभव हो जाता है।