साधकोपयोगी प्रश्नोत्तर

अहंता-ममताका त्याग

प्रश्न—क्या अहंता-ममता सर्वथा मिट सकती हैं?

स्वामीजी—हाँ मिट सकती हैं। अगर अहंता-ममता नहीं मिटतीं अथवा मिटनेवाली नहीं होतीं तो भगवान् गीतामें अहंता-ममतासे रहित होनेकी बात क्यों कहते? भगवान् कहते हैं—‘निर्ममो निरहङ्कार: स शान्तिमधिगच्छति’ (गीता २।७१), ‘निर्ममो निरहङ्कार: समदु:खसुख: क्षमी’ (गीता १२। १३), ‘अहङ्कारं.........विमुच्य निर्मम:’ (गीता १८। ५३)। इससे सिद्ध होता है कि मनुष्य अहंता-ममतासे रहित हो सकता है।

वास्तवमें देखा जाय तो त्याग उसी वस्तुका होता है, जो पहलेसे ही अपनी नहीं होती, प्रत्युत केवल अपनी मानी हुई होती है। अत: झूठी मान्यताका ही त्याग होता है। जो वस्तु वास्तवमें अपनी होती है, उसका त्याग नहीं होता।

स्वरूपमें अहंता-ममता नहीं हैं। प्रकृतिके कार्य शरीरादिके साथ अपना सम्बन्ध माननेसे ही अहंता-ममता पैदा होती हैं।

प्रश्न—अहंता-ममता तो अन्त:करणके धर्म हैं; अत: इनको कैसे मिटाया जा सकता है?

स्वामीजी—अहंता-ममता अन्त:करणके धर्म नहीं हैं, प्रत्युत अन्त:करणके (अज्ञानजनित) विकार हैं। जो धर्म होता है, वह धर्मीके रहते हुए कभी मिटाया नहीं जा सकता। वह धर्मीमें एकरूप रहता है। यह बात प्रत्यक्ष देखनेमें आती है कि किसीमें कम अभिमान होता है और किसीमें अधिक अभिमान होता है अर्थात् अहंता-ममता कम-ज्यादा होते हैं; परन्तु अन्त:करण कम-ज्यादा नहीं होता। अत: अहंता-ममता अन्त:करणके धर्म कैसे? अहंता-ममता आगन्तुक हैं; अत: ये कभी बढ़ जाते हैं, कभी घट जाते हैं। आसुरी सम्पत्तिवाले मनुष्योंके अभिमान आदि बहुत बढ़ जाते हैं और दैवी सम्पत्तिवाले मनुष्योंके अभिमान आदि बहुत कम हो जाते हैं। तात्पर्य है कि अहंता-ममता अन्त:करणके विकार हैं और इनको मिटाया जा सकता है।

प्रश्न—अहंता-ममताके बिना व्यवहार कैसे होगा?

स्वामीजी—व्यवहारमें अहंता-ममता कारण नहीं हैं, प्रत्युत नीति, धर्म, मर्यादा आदि कारण हैं। अहंता-ममता ज्यादा होनेसे व्यवहार बिगड़ जाता है। अहंता-ममताके बिना व्यवहार शुद्ध होता है। अहंता-ममतारहित व्यक्तिके द्वारा आदर्श व्यवहार होता है। जो अहंता-ममताके वशीभूत होते हैं, उनके आचरण मर्यादायुक्त, धर्मयुक्त नहीं होते।

प्रश्न—यदि माता-पिता बालकोंमें ममता नहीं रखेंगे तो फिर उनका सुधार कैसे कर पायेंगे?

स्वामीजी—यह बात बिलकुल गलत है। बालकमें ममता होनेसे उसमें मोह हो जाता है और मोहपूर्वक पालन करनेसे न बालकका हित (सुधार) होता है, न अपना, प्रत्युत मोह ही बढ़ता है। मोहसे आसुरी सम्पत्ति बढ़ती है।

एक बालक माँके पास रहता है, एक बालक पिताके पास रहता है, एक बालक अध्यापकके पास रहता है और एक बालक महात्माके पास रहता है। विचारपूर्वक देखें तो महात्माके पास रहनेवाला बालक जितना सुधरेगा, उतना अध्यापकके पास रहनेवाला नहीं। अध्यापकके पास रहनेवाला बालक जितना सुधरेगा, उतना पिताके पास रहनेवाला नहीं। पिताके पास रहनेवाला बालक जितना सुधरेगा, उतना माँके पास रहनेवाला नहीं। कारण यह है कि माँमें मोह ज्यादा होता है, माँकी अपेक्षा पितामें मोह कम होता है, पिताकी अपेक्षा अध्यापकमें मोह कम होता है और महात्मामें मोह होता ही नहीं। अत: ममता रखकर पालन करनेसे बालकका सुधार होता है—यह बात बिलकुल झूठी है।

जो वैद्य या डॉक्टर सब लोगोंका इलाज करते हैं, वे अपने स्त्री-बच्चोंका इलाज करनेके लिये दूसरे वैद्य या डॉक्टरको बुलाते हैं। कारण कि अपने स्त्री-बच्चोंमें मोह-ममता ज्यादा होनेसे वे खुद उनका इलाज नहीं कर सकते। जहाँ मोह-ममता ज्यादा होती है, वहाँ बुद्धिका विकास कम होता है। अत: दूसरे वैद्य औषधि, पथ्य आदिका जितना विचार कर सकते हैं, उतना विचार ममतावाले नहीं कर सकते। तात्पर्य है कि ममतारहित वैद्य-डॉक्टर ही अपने स्त्री-बच्चोंका इलाज कर सकते हैं।

धृतराष्ट्रकी दुर्योधनमें बहुत ममता थी। महात्मा विदुरजीने धृतराष्ट्रको बहुत समझाया, पर ममताके कारण वे दुर्योधनका सुधार नहीं कर सके, जिससे कुलका ही विनाश हो गया। तात्पर्य है कि ममतासे पतन ही होता है, सुधार नहीं।

प्रश्न—गृहस्थमें रहते हुए अहंता-ममताका त्याग कैसे होगा?

स्वामीजी—अहंता-ममता न छूटनेमें गृहस्थ या साधु अथवा घर या सन्न्यास कारण नहीं है। बन्धन भीतरके भावसे, नीयतसे होता है। कुटुम्बके साथ सम्बन्ध होनेसे गृहस्थका व्यवहार ज्यादा होता है और निवृत्तिपूर्वक साधु बननेसे व्यवहार कम होता है—इस प्रकार व्यवहारमें तो फर्क पड़ता है, पर मुक्तिमें कोई फर्क नहीं पड़ता।

अपने सुखकी इच्छा छोड़नेसे ममता छूट जाती है। जैसे, माँ बालकका पालन करनेके लिये ही बालकको अपना माने, परिवारमें एक-दूसरेकी सेवा करनेके लिये ही परिवारको अपना माने तो ममता छूट जायगी। अगर माँ बालकसे सुखकी आशा रखे कि यह बड़ा होगा तो इसका विवाह करूँगी, बहू आयेगी, फिर दोनों मेरी सेवा करेंगे आदि, तो उसकी ममता नहीं छूटेगी। ऐसे ही परिवारसे अपनी सुख-सुविधाकी इच्छा रखें तो ममता नहीं छूटेगी।

सत्कार्य (शुभ कार्य) वही है, जिसमें अपनी सुख-सुविधाकी, लोक-परलोक सुधरनेकी कुछ भी इच्छा न हो। जिसमें अपनी सुख-सुविधा, आराम आदिकी इच्छा होती है, वह कर्म असत् , अशुभ हो जाता है और बन्धनका कारण बन जाता है। जैसे, सेवा-समितिवाले मेलेमें केवल दूसरोंकी सुख-सुविधाके लिये ही जाते हैं तो वे किसीसे बँधते नहीं। परन्तु उनमें भी अगर मान-बड़ाई आदिकी इच्छा होगी तो वे बँध जायँगे।

जैसे, कोई सज्जन पथिक रात्रिमें किसीके घरपर ठहरता है तो वह घरवालोंको बिना कोई बाधा दिये ही भोजन, शयन इत्यादि करके अपना निर्वाह करता है। परन्तु रात्रिमें चोर-डाकू आ जायँ, घरमें आग लग जाय तो रक्षा करनेके लिये वह सबसे पहले तैयार होता है, दौड़-धूप करता है। कारण कि वह समझता है कि मैंने इनके घरका अन्न-जल लिया है; अत: किसी भी प्रकारसे इनकी सेवा बन जाय तो मैं इनके ऋणसे मुक्त हो जाऊँ। ऐसे ही परिवारमें रहते हुए प्रत्येक सदस्य यही सोचे कि इस परिवारमें मेरा जन्म हुआ है, पालन-पोषण हुआ है, मैं शिक्षित हुआ हूँ; अत: मेरे तन-मन-धनसे इनकी सेवा बन जाय, जिससे मैं इनका ऋणी न रहूँ। ऐसे भावसे घर-परिवारमें रहे तो पथिककी तरह घरमें ममता नहीं रहेगी। जैसे पथिक सुबह होते ही वहाँसे चल देता है, फिर उसको वह घर याद नहीं आता; क्योंकि उसकी उस घरमें ममता नहीं होती। ऐसे ही घरमें पथिककी तरह ईमानदारीसे रहते हुए तत्परता एवं उत्साहपूर्वक सबकी सेवा करनेसे ममता टूट जाती है—‘य: सर्वत्रानभिस्नेह:’ (गीता२।५७), ‘असक्तिरनभिष्वङ्ग: पुत्रदारगृहादिषु’ (गीता १३। ९)। तात्पर्य है कि परिवारमें रहते हुए सबकी सेवा करें, पर बदलेमें सेवाकी इच्छा न रखें। शरीरसे परिश्रम करके सेवा करनेसे ‘अहंता’ नहीं रहेगी और उदारतापूर्वक वस्तुएँ सेवामें खर्च करनेसे ‘ममता’ नहीं रहेगी।

घरमें रहते हुए सेवा न लें—इसमें कठिनता जरूर है; क्योंकि सेवा लेनेकी आदत पड़ी हुई है। अत: कभी सेवा लेनी भी पड़े तो केवल दूसरेकी प्रसन्नताके लिये ही सेवा लें। दूसरेकी प्रसन्नताके लिये सेवा लेना भी वास्तवमें देना ही है! जैसे, पत्नी भोजन बनाये तो उसकी प्रसन्नताके लिये भोजन करे, अपने आराम, बलवृद्धि आदिके लिये नहीं। वास्तवमें देखा जाय तो संसार केवल ममता रखनेसे राजी नहीं होता, प्रत्युत सेवा करनेसे अथवा वस्तु देनेसे राजी होता है।

अपने स्त्री-पुत्र, परिवारमें ममता रखकर सेवा करेंगे तो उस सेवाकी मिट्टी हो जायगी; क्योंकि ममता व स्वार्थबुद्धि होनेसे वह सेवा खत्म हो जाती है। अपने बच्चोंका ममतापूर्वक पालन तो कुतिया भी करती है, पर उसका महत्त्व थोड़े ही है! अत: चाहे ममतारहित होकर घरवालोंकी सेवा करें, चाहे जिनमें ममता नहीं है, उनकी सेवा करें, दोनोंका नतीजा एक ही होगा। तात्पर्य है कि बन्धनका कारण ममता ही है। घरमें रहना बन्धनका कारण नहीं है।

जैसे, सद्वैद्य केवल सेवा करनेके लिये ही रोगीको अपना मानता है तो यह अपनापन (ममता) केवल उसको नीरोग करनेके लिये ही है। इसकी परीक्षा तब होती है, जब रोगी नीरोग होकर वैद्यकी विरोधी पार्टीमें शामिल हो जाय और वैद्यके विरुद्ध कार्य करे, फिर भी वैद्य ऐसा समझे कि मेरा उद्योग तो केवल उसको ठीक करनेका ही था, अब उसका उद्योग मेरेको दु:ख देनेका है तो अच्छी बात है। मैंने तो अपने कर्तव्यका पालन कर दिया। मैंने उसकी जो सेवा की है, वह उसको अपने अधीन बनानेके लिये थोड़े ही की है। वह सब कुछ करनेमें स्वतन्त्र है।

प्रश्न—अहंता-ममताके बिना तो मनुष्य जड़ हो जायगा?

स्वामीजी—यह बात नहीं है। अहंता-ममताके बिना मनुष्य पत्थरकी तरह जड़ नहीं हो जायगा, प्रत्युत सावधान, सजग हो जायगा कि ये वस्तु-व्यक्ति पहले भी मेरे नहीं थे, बादमें भी मेरे नहीं रहेंगे और वर्तमानमें भी मेरे नहीं हैं; क्योंकि ये प्रतिक्षण मेरेसे अलग हो रहे हैं। हाँ, इनकी सेवा, सदुपयोग करके मैं अपना कल्याण कर सकता हूँ। वास्तवमें अपना कल्याण होनेमें धनादि पदार्थ कारण नहीं हैं, प्रत्युत उन पदार्थोंमें अपनी ममताका त्याग ही कारण है।

प्रश्न—अहम् का अर्थात् अपनी सत्ताका नाश हो जाय—ऐसी मुक्ति कौन चाहेगा?

स्वामीजी—अहंता-ममता मिटनेसे अपनी सत्ताका नाश नहीं होता, प्रत्युत तुच्छताका नाश होता है और अपनी महत्ता प्रकट हो जाती है, जो वास्तवमें है—‘नित्य: सर्वगत: स्थाणुरचलोऽयं सनातन:’ (गीता २। २४)।

प्रश्न—‘मैं साधक हूँ’—ऐसी अहंताके बिना साधन कैसे होगा?

स्वामीजी—‘मैं साधक हूँ’—इसमें दो भाव होते हैं—१. मैं साधक हूँ, दूसरे साधक नहीं हैं और २. मैं साधक हूँ; अत: मुझे साधनसे विरुद्ध काम नहीं करना है।

मैं साधक हूँ, दूसरे साधक नहीं हैं—ऐसा भाव होनेसे अभिमान आता है। यह अभिमान आसुरी सम्पत्ति है (गीता १६। १४-१५), जो बन्धनका कारण है—‘निबन्धायासुरी मता’ (गीता १६। ५)। परन्तु मैं साधक हूँ; अत: मैं साधनसे विरुद्ध काम कैसे कर सकता हूँ?—ऐसा भाव होनेसे अभिमान नहीं आता, प्रत्युत साधनमें तत्परता आती है, जिससे साधनकी सिद्धि होती है।

प्रश्न—अपनापन (ममता)-के बिना दान कैसे दिया जायगा? कारण कि अपनी वस्तुका ही दान होता है।

स्वामीजी—वस्तुमें अपनापन वास्तवमें नहीं है, प्रत्युत माना हुआ है। वह माना हुआ अपनापन भी केवल कर्तव्य-पालनके लिये ही है। अत: मनुष्य दान-पुण्य कर सकता है, धन आदिसे निर्लिप्त रह सकता है। परन्तु ममता करनेवाला दान-पुण्य कर ही नहीं सकता; क्योंकि वह कृपण हो जाता है। वह अन्यायपूर्वक कमाता है, पर न्यायपूर्वक जहाँ खर्च करना चाहिये, वहाँ खर्च नहीं करता। वह दूसरोंका धन हड़पनेके लिये उद्योग करता है और मौका लगनेपर हड़प भी लेता है। अत: ऐसा व्यक्ति क्या दान-पुण्य करेगा? वह दान-पुण्य कर ही नहीं सकता। एक कहावत है कि ‘दाताका धन अपना नहीं और शूरवीरका सिर अपना नहीं’। अपना माननेवाला न तो दाता हो सकता है और न शूरवीर ही हो सकता है।

प्रश्न—‘मैं भगवान‍्का हूँ’—ऐसा माननेसे ‘मैं’-पना रह जायगा न? और श्रुति भी कहती है—‘द्वितीयाद्वै भयं भवति’ (बृहदारण्यक० १। ४। २) अर्थात् दूसरेसे भय होता है। अत: इससे साधन कैसे होगा? इससे तो द्वैतपना ही दृढ़ होगा।

स्वामीजी—ऐसी बात नहीं है। भगवान् द्वितीय (दूसरे) नहीं हैं, प्रत्युत आत्मीय हैं। आत्मीयसे भय नहीं होता, प्रत्युत निर्भयता होती है। भय तो दूसरेसे होता है; जैसे—बालकको कुत्ते, कौए आदिसे भय होता है, पर माँसे भय नहीं होता। बालक माँकी गोदमें निर्भय रहता है। माँ तो एक जन्मकी होती है, पर भगवान् सदाकी माँ हैं। भगवान् सदासे अपने हैं, दूसरे हैं ही नहीं। उनमें दूसरेपनकी सम्भावना ही नहीं है। फिर अपने प्रभुसे भय कैसे होगा? वास्तवमें भगवान‍्से अलग होनेपर, अपनेको भगवान‍्से अलग माननेपर ही भय होता है अर्थात् भगवान‍्से अलग होकर संसारको अपना माननेसे ही भय होता है।

भक्तिमें ऐसा आया है—‘अस अभिमान जाइ जनि भोरे। मैं सेवक रघुपति पति मोरे॥’ (मानस, अरण्य० ११। ११) अर्थात् वास्तवमें यह अभिमान निरभिमानता है; क्योंकि ‘मैं भगवान‍्का हूँ और भगवान् मेरे हैं’—इसमें अहंता-ममता नहीं है। यह तो वास्तविकता है। भगवान‍्ने भी कहा है—‘ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:’ (गीता १५। ७) ‘यह जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है।’

वस्तुओंको अपना माननेसे जड़ता और भगवान‍्को अपना माननेसे चिन्मयता आती है। ममतासे वस्तुओंकी गुलामी आती है।

प्रश्न—अभिमान और स्वाभिमानमें क्या अन्तर है?

स्वामीजी—अपनेमें बड़प्पनका भाव होनेसे ‘अभिमान’ होता है और अपने कर्तव्यका ‘स्वाभिमान’ होता है कि मैं ऐसा काम कैसे कर सकता हूँ? जैसे, यक्षने युधिष्ठिरसे कहा कि मैं तुम्हारे एक भाईको जीवित कर सकता हूँ, तुम बताओ, किसको जीवित करूँ? युधिष्ठिरने कहा कि हे यक्ष! नकुल जी उठे। इसपर यक्षने कहा कि यदि भीम या अर्जुन जी जाते तो तेरा गया हुआ राज्य दिला देते, नकुल जीकर क्या करेगा? युधिष्ठिर बोले—माता कुन्तीका पुत्र तो मैं हूँ ही, पर मेरी छोटी माता माद्रीका भी एक पुत्र रहना चाहिये। मैं अपने सहोदर भाईको कैसे जिला सकता हूँ; क्योंकि लोग मुझे धर्मात्मा कहते हैं—

धर्मशील: सदा राजा इति मां मानवा विदु:।

स्वधर्मान्न चलिष्यामि नकुलो यक्ष जीवतु॥

(महा०, वन० ३१३। १३०)

‘यक्ष! लोग मेरे विषयमें ऐसा समझते हैं कि राजा युधिष्ठिर धर्मात्मा हैं; अत: मैं अपने धर्मसे विचलित नहीं होऊँगा। मेरा भाई नकुल जीवित हो जाय।’—यह युधिष्ठिरका स्वाभिमान है।

तात्पर्य है कि अपने कर्तव्यपर डटे रहना, अपनी भलाईका कभी त्याग न करना स्वाभिमान कहलाता है।

प्रश्न—जीवन्मुक्त महापुरुषमें अहंता-ममता नहीं रहती तो फिर उसके द्वारा व्यवहार कैसे होता है?

स्वामीजी—अहंता-ममता मिटनेसे शरीर नहीं मिटता, प्रत्युत शरीरके साथ तादात्म्य मिटता है। अत: जीवन्मुक्त महापुरुषका व्यवहार पूर्वके प्रवाहसे ज्यों-का-त्यों चलता रहता है, पर उसके व्यवहारमें राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि विकार नहीं रहते। उसका व्यवहार निर्लिप्ततासे होता है अर्थात् शरीरके साथ सम्बन्ध होनेसे जो विकार होते थे, वे विकार नहीं होते। उसमें चिज्जड़ग्रन्थि-रूप अहंकार नहीं रहता, प्रत्युत वृत्तिरूप (कारणरूप) अहंकार रहता है, जिससे व्यवहार होता है। जैसे मूँजकी रस्सी जलनेपर भी उसकी ऐंठन (बट) दीखती है, पर हाथ लगाते ही वह बिखर जाती है, बीजोंको भूनने अथवा उबालनेपर वे बीज खानेके काम तो आते हैं, पर उनसे अंकुर पैदा नहीं होता, ऐसे ही अहंता-ममता न रहनेपर व्यवहार तो ज्यों-का-त्यों चलता रहता है, पर उससे जन्म-मरणरूप अंकुर पैदा नहीं होता।

जबतक प्रारब्धका वेग रहता है, तबतक जीवन्मुक्त महापुरुषके द्वारा सुचारुरूपसे व्यवहार होता रहता है। वह व्यवहार दूसरोंके लिये आदर्श होता है। उसके व्यवहारसे शास्त्र बनते हैं। उस महापुरुषके व्यवहारका, आचरणोंका, अवस्थाका वर्णन करनेमें लेखन-प्रमादके कारण शास्त्रोंमें भूल हो सकती है, पर उसके आचरणोंमें भूल नहीं हो सकती।

भूलके दो रूप हैं—तादात्म्यरूप भूल और विस्मृतिरूप भूल। जीवन्मुक्त महापुरुषमें तादात्म्यरूप भूल तो रहती ही नहीं, पर व्यवहारमें विस्मृतिरूप भूल हो सकती है। जैसे, उसे रस्सीमें साँप दीख सकता है, पर मोह नहीं हो सकता। जिस धातुकी इन्द्रियाँ, अन्त:करण आदि हैं, उसी धातुका संसार है। अत: उसे इन्द्रियोंसे संसार दीख सकता है, पर मोह नहीं हो सकता।

प्रश्न—लोमशजी अहंता-ममतारहित महात्मा थे, फिर उनको क्रोध कैसे आ गया?

स्वामीजी—महात्माके द्वारा चार प्रकारसे व्यवहार होता है—१.खुदके प्रारब्धसे २.सामनेवाले व्यक्तिके प्रारब्धसे ३. अपनी साधनाके अनुसार और ४.सामनेवाले व्यक्तिके भावके अनुसार।

१.जिस प्रारब्धसे महात्माका शरीर बना है, उसके अनुसार महात्माके द्वारा व्यवहार होता रहता है।

२.सामनेवाले व्यक्तिके प्रारब्धसे कभी-कभी महापुरुषोंमें शाप अथवा अनुग्रहकी वृत्ति हो जाती है। शापकी वृत्ति होनेपर भी उससे बन्धन नहीं होता। अनुग्रहमें सामनेवाले व्यक्तिका अधिक पूज्यभाव, श्रद्धाभाव, आदरभाव, सेवाभाव कारण होता है। शापमें सामनेवाले व्यक्तिका पाप और महात्माका अपमान, तिरस्कार, खण्डन आदि कारण होते हैं। परन्तु महापुरुषोंके शापसे किसीका अहित नहीं होता—‘साधु ते होइ न कारज हानी’ (मानस, सुन्दर० ६। २)। इसलिये अहल्याने ऋषि-शापको भी परम अनुग्रह माना—‘मुनि श्राप जो दीन्हा अति भल कीन्हा परम अनुग्रह मैं माना’ (मानस, बाल० २११। ३)। नारदजीने नल-कूबरको वृक्ष होनेका शाप दिया, पर अन्तमें नलकूबरको भगवान‍्के दर्शन हो गये, जो कि अनन्यभक्तिसे होते हैं*। लोमशजीने काकभुशुण्डिजीको शाप दिया तो उससे उनमें विशेषता ही आयी। स्वयं काकभुशुण्डिजीने कहा है—

भगति पच्छ हठ करि रहेउँ दीन्हि महारिषि साप।

मुनि दुर्लभ बर पायउँ देखहु भजन प्रताप॥

(मानस, उत्तर० ११४ ख)

३.महापुरुष जिस साधनासे तत्त्वको प्राप्त हो जाते हैं, उसके अनुसार (सिद्धावस्थामें भी) उनका व्यवहार होता है। जो महापुरुष ज्ञानयोगसे सिद्धिको प्राप्त हुआ है, उसमें उदासीनता, तटस्थता, निरपेक्षता मुख्य रहती है। कर्मयोगसे सिद्धिको प्राप्त हुए महापुरुषमें कर्मप्रवणता (कर्म करनेका प्रवाह) मुख्य रहती है। भक्तियोगसे भगवान‍्को प्राप्त हुए महापुरुषमें करुणा, दया, भगवच्चर्चा आदि मुख्य रहते हैं। तात्पर्य है कि साधनावस्थामें उनका जैसा स्वभाव रहा है, वही स्वभाव सिद्धावस्थामें भी रहता है।

४. सामनेवाले व्यक्तिका महात्मामें पूज्य, आदरका भाव होता है तो महात्माके द्वारा स्वत: ही ज्ञानकी चर्चा विशेषतासे होती है। परन्तु सामनेवाले व्यक्तिका विशेष आदरभाव न होनेसे महात्माके द्वारा उसके साथ सामान्य बर्ताव होता है। कोई तर्कबुद्धिसे सामने आता है तो उसके साथ उसीके भावके अनुसार उत्तर-प्रत्युत्तर होता है। परन्तु खुद महापुरुषमें कोई विकार नहीं होता।

प्रश्न—दुर्वासा तत्त्वज्ञ महापुरुष थे, फिर वे इतना क्रोध क्यों करते थे?

स्वामीजी—दुर्वासा तपस्वी माने जाते हैं। शाप देना, अनुग्रह करना आदि बातें ऊँचे तपस्वियोंमें ज्यादा होती हैं। उनमें तपोबलका एक अभिमान होता है, जबकि बोधका अभिमान नहीं होता।

तपस्या एक बल है, पूँजी है। उस बलसे शाप और अनुग्रह—दोनों हो सकते हैं। उसका सदुपयोग भी हो सकता है और दुरुपयोग भी, परन्तु अहंता-ममतारहित, गुणातीत महापुरुषोंके द्वारा प्राय: ऐसा व्यवहार नहीं होता। कभी साधनावस्थाकी वृत्तिका उदय होनेसे अथवा सामनेवालेके प्रारब्धसे उनके द्वारा शाप अथवा अनुग्रहका व्यवहार हो सकता है। परन्तु यह व्यवहार राग-द्वेषपूर्वक हुआ है अथवा निर्विकारतापूर्वक—इस भेदको स्वयं ही जाना जा सकता है। दूसरे व्यक्ति इसे नहीं समझ सकते; क्योंकि उनकी बुद्धि शुद्ध नहीं है।