सागरके मोती
पराकृतनमद्बन्धं परं ब्रह्म नराकृति।
सौन्दर्यसारसर्वस्वं वन्दे नन्दात्मजं मह:॥
प्रपन्नपारिजाताय तोत्त्रवेत्रैकपाणये।
ज्ञानमुद्राय कृष्णाय गीतामृतदुहे नम:॥
वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्।
देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥
वंशीविभूषितकरान्नवनीरदाभात्
पीताम्बरादरुणविम्बफलाधरोष्ठात्।
पूर्णेन्दुसुन्दरमुखादरविन्दनेत्रात्
कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने॥
हरि: ॐ नमोऽस्तु परमात्मने नम:।
श्रीगोविन्दाय नमो नम:।
श्रीगुरुचरणकमलेभ्यो नम:।
महात्मभ्यो नम:।
सर्वेभ्यो नमो नम:।
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किसीको भी बुरा समझे नहीं, बुरा चाहे नहीं और बुरा करे नहीं। किसीको बुरा समझनेसे वह भी बुरा बन जायगा और हमारेमें भी बुराई आ जायगी। किसीको बुरा समझना अपनेमें बुराईको निमन्त्रण देना है।
स्वरूपमें बुराई नहीं है। बुराई आगन्तुक है। बुराई स्थायी नहीं है, असत् है। बन्धन कृत्रिम है, मुक्ति स्वत:सिद्ध है। मनुष्य केवल (सर्वथा) भला तो हो सकता है, पर केवल बुरा कोई हो सकता ही नहीं।
बुराई देखनेसे बुराईके साथ सम्बन्ध जुड़ता है। किसीको भी बुरा नहीं मानें तो संसारकी सेवा हो जायगी। बुरा देखोगे तो ‘वासुदेव: सर्वम्’ कैसे मानोगे?
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परमात्मप्राप्ति कठिन नहीं है, उसकी इच्छा कठिन है। हम परमात्माकी आवश्यकता नहीं मानते, तभी उनकी प्राप्ति कठिन दीखती है। सुखभोग तथा संग्रहकी इच्छाके कारण ही परमात्मप्राप्ति कठिन हो रही है। शरीरके आरामकी जितनी इच्छा है, उतनी परमात्माकी नहीं है। परमात्मप्राप्तिमें विश्वास और विवेककी जरूरत है, शरीरकी जरूरत नहीं है।
‘कर्मयोग’ कामना-त्यागसे आरम्भ होता है और कामना-त्यागमें ही समाप्त होता है। ‘भक्तियोग’ भगवत्प्रेमसे आरम्भ होता है और भगवत्प्रेममें ही समाप्त होता है। ‘ज्ञानयोग’ विवेकसे आरम्भ होता है और विवेकमें ही समाप्त होता है।
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निषिद्ध कर्मोंका त्याग बहुत जरूरी है। संसारको भी चाहते हो और भगवान्को भी चाहते हो तो किया हुआ साधन व्यर्थ नहीं जायगा, पर वर्तमानमें लाभ नहीं होगा।
कोई भी कर्तव्य-कर्म दूसरोंके हितके लिये किया जाय तो वह भजन है, और अपने लिये किया जाय तो पाप है। समाधि भी अपने लिये नहीं करनी है। संसार या भगवान्के लिये करना है। अपने सुखके लिये कर्म करनेवाला राक्षसकी श्रेणीमें आता है। कर्म शरीरसे करना और फल स्वयं चाहना क्या उचित है? शरीर तो संसारका और संसारके लिये है। शरीरके द्वारा संसारकी सेवा होनी चाहिये।
जो अपने शरीरका पोषण नहीं करता, उसके शरीरका पोषण संसार करता है; जैसे माँ बालकका पोषण करती है। आप शरीरको अपना मत मानो तो शरीरको भोजन देनेका माहात्म्य हो जायगा! शरीरको संसारका मानो तो संसारकी सेवा हो जायगी, और भगवान्का मानो तो भगवान्की सेवा हो जायगी।
जिसकी सेवा करते हो, उससे अपनापन हटा लो अथवा जिसको अपना नहीं मानते, उसकी सेवा करो—दोनोंका फल बराबर है।
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सत्संग मिलनेके समान कोई लाभ नहीं है। परन्तु असली सत्संग मिलना कठिन है। एकान्तमें भजन करनेकी अपेक्षा सत्संगसे, वास्तविक तत्त्वका विवेचन करनेवाली पुस्तकोंसे बहुत लाभ होता है। असली सत्संग है—भगवत्प्राप्त महापुरुषोंका संग अथवा एक भगवान्में प्रियता। सत्संगसे तत्काल लाभ होता है। सत्संगकी महिमा मैं कह नहीं सकता। जैसे बालक कब बड़ा हो गया—इसका पता नहीं लगता, ऐसे ही सत्संगमें बैठे-बैठे कितना लाभ होता है—इसका पता नहीं लगता।
संसार प्रतीतिमात्र है, है नहीं। इसको ‘है’ मानना अनर्थकारक है, जिससे भोग तथा संग्रहकी रुचि पैदा होती है। ‘नहीं’ को स्थायी माननेसे ‘है’ दीखता नहीं। जो ‘है’, वही परमात्मा है। संसार है ही नहीं, केवल मृगतृष्णाकी तरह प्रतीति है।
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संसार बाधक नहीं है, प्रत्युत उससे सुख लेनेकी इच्छा बाधक है। सुख चाहनेवाला दु:खसे कभी बच सकता ही नहीं। शरीर, रुपये, घर, कुटुम्बी आदि कुछ भी बाधक नहीं है। बाधक है ‘मैं सुख ले लूँ’—यह भाव। यह राक्षसपना है। इच्छामात्र बाधक है, चाहे वह अच्छी हो या बुरी। सब कुछ परमात्मा ही हैं, पर वे भोग्य नहीं हैं। आप उन्हें भोग्य बनाकर सुख भोगना चाहोगे तो दु:ख पाते रहोगे।
अप्राप्तकी इच्छा करनेसे बन्धन होता है और प्राप्तकी इच्छा करनेसे दूरी होती है।
कर्म करनेसे और चिन्तन करनेसे प्रकृतिके साथ सम्बन्ध होता है। कुछ करे नहीं, चिन्तन करे नहीं तो स्वरूपमें स्थिति हो जायगी। न कुछ करो, न कुछ सोचो, न कुछ चाहो। कुछ भी चिन्तन करोगे, समाधि भी करोगे तो प्रकृतिके साथ सम्बन्ध हो जायगा।
यदि शरीर मैं हूँ तो संसार हमारा इष्ट, पूजनीय है। अंशके लिये अंशी पूज्य होता है। पूज्यमें द्वेषबुद्धि नहीं होती। अत: किसीका बुरा न करो, न चाहो तो कल्याण हो जायगा। इष्टको कोई बुरा मानता है? कोई उसका बुरा करता है? रामायण पूजनीय है तो उसमें अयोध्याकाण्ड भी है, लंकाकाण्ड भी है। उसे रामचरित कहते हैं, रावणचरित नहीं कहते। इसी तरह सब संसार पूजनीय है। इस प्रकार संसारको सत्य मानो, इष्ट मानो तो कल्याण हो जायगा।
परमात्मामें (सगुण-निर्गुण आदिका) भेद करना गलती है, और संसारमें एकता करना गलती है।
आरम्भसे ही भक्ति करना सर्वश्रेष्ठ है। गीता ज्ञानयोगसे कर्मयोगको और कर्मयोगसे भक्तियोगको श्रेष्ठ मानती है। भगवान्में प्रेम होनेका नाम ‘भक्ति’ है। प्रेमके समान कोई चीज है ही नहीं। प्रेमके बिना ज्ञान सूखा है। यदि प्रेम शरीरमें है तो भले ही ब्रह्मकी बातें कर लो, कुछ लाभ नहीं। जैसे रुपये लोभीकी दृष्टिमें कीमती हैं; अत: धन बड़ा नहीं, लोभ बड़ा है। ऐसे ही भगवान्का प्रेम बड़ा है, भगवान् नहीं।
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बालकको माँके समान प्रिय कोई चीज नहीं लगती। हम सब भगवान्के बेटे हैं। जबतक हम भगवान्से विमुख रहते हैं, तबतक शान्ति नहीं मिलती। संसारसे विमुख होनेपर एक शान्ति मिलती है। परन्तु भगवान्के सम्मुख होनेपर प्रेमकी जो मस्ती आती है, वह ज्ञानसे नहीं आती। भगवत्प्रेममें जो विलक्षण रस है, वह ज्ञानमें नहीं है। यह मेरेपर बीती बात है! गोस्वामीजी कहते हैं—
प्रेम भगति जल बिनु रघुराई।
अभिअंतर मल कबहुँ न जाई॥
(मानस, उत्तर० ४९।३)
ज्ञानमें मतभेद रहता है, भक्तिमें नहीं। भक्तिमें जो अद्वैत है, वह ज्ञानमें नहीं है। ज्ञानमें जड़ताका त्याग करते हैं तो जड़ताका सूक्ष्म संस्कार रहता है। भक्तिमें ‘वासुदेव: सर्वम्’ होनेसे त्याज्य वस्तु कोई होती ही नहीं।
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जो आदि-अन्तमें होता है, वही मध्यमें होता है। स्वप्नसे पहले और बादमें हम रहते हैं तो स्वप्नके समय भी हम रहते हैं। हम जाननेवाले हैं। जाननेवाला जाननेमें आनेवाली वस्तुसे अलग होता है। जाग्रत् , स्वप्न, सुषुप्ति, मूर्च्छा और समाधि—इन पाँचों अवस्थाओंको हम जानते हैं; अत: हमारा स्वरूप इन पाँचों अवस्थाओंसे रहित है। अवस्थाओंका भाव और अभाव होता है, पर हमारा भाव और अभाव नहीं होता। अपने अभावका अनुभव कभी किसीको नहीं होता। इस अवस्थाओंके अधीन नहीं हैं। अवस्थाएँ छूटती हैं, पर हम रहते हैं। विकार आते-जाते हैं, पर हम भोक्ता बनते हैं। जबतक आने-जानेवाली चीजोंका हमपर असर पड़ता है, तबतक हम स्वरूपमें स्थित नहीं हैं।
‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:’ (गीता २।१६) ‘असत् का तो भाव (सत्ता) विद्यमान नहीं है और सत् का अभाव विद्यमान नहीं है।’ असत् की निरन्तर निवृत्ति हो रही है। सत् की प्राप्ति निरन्तर हो रही है। ‘रहते’ में रहो, ‘बहते’ के साथ मत बहो। बहनेवालेमें भी दो विभाग हैं—दीखनेवाला और देखनेवाला (इन्द्रियाँ, अन्त:करण)। ‘नहीं’ से ‘है’ कैसे दीखेगा? ‘है’ से ‘नहीं’ कैसे दीखेगा? ‘नहीं’ से ‘नहीं’ ही दीखेगा।
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मनुष्य अपनेमें कमीका अनुभव करता है तो दूसरोंका सहारा लेता है। जबतक यह परमात्माका आश्रय नहीं लेगा, तबतक उसकी कमी दूर नहीं होगी और वह दु:ख पाता ही रहेगा। जीव परमात्माका ही अंश है, इसलिये परमात्माका सहारा लेनेसे ही उसकी कमी दूर होगी। द्वैत, अद्वैत आदि सभी उसका सहारा लेनेके लिये ही हैं। अद्वैत केवल द्वैतका निषेध करनेके लिये है। सभी मार्गोंमें त्याग मुख्य है; क्योंकि संसारसे माना हुआ सम्बन्ध ही बाँधनेवाला है।
साधन दो हैं—संसारसे सम्बन्ध तोड़ना और परमात्मासे सम्बन्ध जोड़ना। भगवान्के शरण होनेपर संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद भगवान् करा देते हैं और जल्दी करा देते हैं—
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्॥
(गीता १२।७)
‘हे पार्थ! मुझमें आविष्ट चित्तवाले उन भक्तोंका मैं मृत्युरूप संसार-समुद्रसे शीघ्र ही उद्धार करनेवाला बन जाता हूँ।’
गुरु तो छोटा (चेला) बनाता है, पर भगवान् ऊँचा बनाते हैं। ऊँचे गुरु ऊँचा ही बनाते हैं। इसलिये दास्यरति सख्यरतिमें बदल जाती है। शरणमें जानेसे भगवान् अपने-आपको देते हैं। बालक माँका आश्रय लेता है तो माँ उसके वशमें हो जाती है। ‘हे नाथ! मैं आपका हूँ, और किसीका नहीं’—इसके आगे भगवान् निर्बल हो जाते हैं*! परन्तु जीवकी निर्बलता है—अन्यका सहारा लेना। अनन्यभक्तके लिये भगवान् सुलभ हैं—‘तस्याहं सुलभ: पार्थ’ (गीता ८।१४)। भजनका भी आश्रय न मानकर केवल भगवान्के आश्रित हो जाय। यह शरणागतिका मार्ग सबसे श्रेष्ठ और सुगम है। भगवान् भी शरणागत भक्तके शरण हो जाते हैं—‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्’ (गीता ४।११)।
दास्य, सख्य आदि भाव तत्त्वज्ञान होनेके बाद केवल चिन्मय तत्त्वमें ही होते हैं।
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जीव स्वयं अविनाशी होकर नाशवान् को अपना मानता है—यह कितनी बड़ी भूल है! जाने हुए असत् का त्याग करना है। आप स्वयं बालक, जवान, रोगी, निर्धन आदि नहीं होते। आप तो इनको जाननेवाले हैं। जैसे मृत्युके समय एक आघात लगता है, जिससे आप पूर्वजन्मको भूल जाते हैं। ऐसा आघात बालकपन जानेपर नहीं लगा, इसीलिये आप उसे भूले नहीं।
नया उद्योग कुछ नहीं करना है। जो निवृत्त है, उसीकी निवृत्ति करनी है और जो प्राप्त है, उसीकी प्राप्ति करनी है। भगवान्को अपना माननेमें अभ्यास नहीं है। विवाहके बाद नये घरको अपना माननेमें लड़कीको अभ्यास नहीं करना पड़ता। अभ्याससे नयी स्थिति बनती है, बोध नहीं होता।
हम भगवान्के हैं—इतनी बात मान लो तो बेड़ा पार है! अभी ऐसा मान लो कि हम भगवान्के हैं, फिर अपने-आप दीखने लग जायगा; क्योंकि यह सही बात है।
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शरणागति सम्पूर्ण साधनोंमें श्रेष्ठ है। गीताके अन्तमें भी भगवान्ने शरणागतिकी बात कही है और इसे ‘सर्वगुह्यतम’ बताया है। भक्तका उद्धार करके भगवान्को बड़ी प्रसन्नता होती है। शरणमें जाना भक्तका काम है, उद्धार करना भगवान्का काम है, और प्रेम करना भक्त व भगवान्—दोनोंका काम है।
शरण लेनेका काम भगवान्का नहीं है। भगवान्ने अपने कल्याणके लिये जीवको स्वतन्त्रता दी है। शरण होकर जीव निश्चिन्त, नि:शोक, निर्भय और नि:शंक हो जाता है। शरण होना गीताका अन्तिम सिद्धान्त है। शरणागति गीताभरकी सार बात है।
जबतक अपने बल, बुद्धि, विद्या, धन आदिका आश्रय रहता है, तबतक असली शरणागति नहीं होती।
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गुरुकी प्रसन्नतासे विद्या सफल होती है, और प्रसन्नता न होनेसे विद्या विफल होती है—ऐसे कई उदाहरण मैंने देखे-सुने हैं। अत: विद्यार्थीको चाहिये कि वह गुरुकी सेवा करे, उनकी आज्ञा माने और उनकी प्रसन्नता ले। गुरुकी आज्ञाका पालन करना एक नंबरकी सेवा है। आज्ञापालनसे गुरुकी विशेष कृपा प्राप्त होती है।
विद्यार्थियोंकी बुद्धि कमजोर हो—यह मैं नहीं मानता। वास्तविक बात यह है कि वे परिश्रम नहीं करते। वे परिश्रम करें तो गुरु भी प्रसन्न होंगे और माता-पिता भी।
विद्यार्थीको केवल बुद्धिबल ही नहीं, प्रत्युत मनोबल, शरीरबल आदि सभी बल बढ़ाने चाहिये। उसे व्रत-उपवाससे शरीरको कृश नहीं करना चाहिये।
विद्यार्थीको अपनी विद्याका अभिमान नहीं करना चाहिये। मैं जानकार हूँ—ऐसा अभिमान होनेसे जानना बन्द हो जायगा, और नहीं बढ़ेगा।
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