सर्वोपयोगी

१. अन्त मति सो गति

मनुष्य यदि, प्रत्येक कार्य विचारपूर्वक करे तो उसको पीछे पश्चात्ताप नहीं करना पड़ता। इसलिये हम जो कुछ करें, उसके विषयमें पहले विचार करना चाहिये। सबका अलग-अलग कर्तव्य होता है। कोई कुछ करता है तो कोई कुछ करता है। परन्तु यहाँ हम उस खास कामकी चर्चा करते हैं, जिसे सबको करना ही पड़ेगा अर्थात् सबको एक-न-एक दिन शरीर छोड़कर यहाँसे जाना ही पड़ेगा। बालक जन्मता है तो वह बड़ा होगा कि नहीं होगा, पढ़ेगा कि नहीं पढे़गा, विवाह करेगा कि नहीं करेगा, व्यापार आदि करेगा कि नहीं करेगा, उसकी सन्तान होगी कि नहीं होगी, वह धनी बनेगा कि नहीं बनेगा आदि सब बातोंमें सन्देह रहता है, पर वह मरेगा कि नहीं मरेगा—इस बातमें कोई सन्देह नहीं रहता अर्थात् वह मरेगा ही। अत: मरनेके बाद हमारी क्या गति होगी—इस विषयमें विचार करनेकी बड़ी भारी आवश्यकता है।

श्रीमद्भगवद‍्गीताके आठवें अध्यायके आरम्भमें ही अर्जुनने सात प्रश्न किये थे। उनमें सातवाँ प्रश्न था कि ‘अन्तकालमें आप कैसे जाननेमें आते हैं?’ उसके उत्तरमें भगवान‍्ने कहा—

अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।

य: प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशय:॥

(गीता ८।५)

‘जो मनुष्य अन्तकालमें भी मेरा स्मरण करते हुए शरीर छोड़कर जाता है, वह मेरेको ही प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं है।’

यह नियम केवल आपके लिये ही है क्या? इसपर भगवान् कहते हैं—

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।

तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावित:॥

(गीता ८। ६)

‘हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! मनुष्य अन्तकालमें जिस-जिस भी भावका स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है, वह उस (अन्तकालके) भावसे सदा भावित होता हुआ उस-उसको ही प्राप्त होता है अर्थात् उस-उस योनिमें ही चला जाता है।’

जीवकी गतियाँ

जीवकी गतियोंमें एक मुक्ति है, जिसको कल्याण, तत्त्वप्राप्ति, तत्त्वज्ञान आदि अनेक नामोंसे कहते हैं। इस मुक्तिके अनेक भेद माने गये हैं, उनमें दो मुख्य हैं—(१) जीवन्मुक्ति और (२) विदेहमुक्ति। जीवन्मुक्ति का अर्थ है—जीते हुए मुक्त हो जाना।१ अभी वर्तमान अवस्थामें प्राणोंके रहते हुए मुक्त हो जायँ—इस स्थितिका नाम जीवन्मुक्ति है। विदेहमुक्ति वह कहलाती है, जो मरनेके बाद होती है।२ ये दो भेद निर्गुणतत्त्वको माननेवालोंके लिये बताये गये हैं। सगुण-साकार भगवान‍्को माननेवालोंकी मुक्ति पाँच तरहकी बतायी गयी है—सालोक्य, सार्ष्टि, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य। भगवान‍्के लोक (परमधाम)-में जाकर रहना ‘सालोक्य मुक्ति’ है। भगवद्धाममें भगवान‍्के समान ऐश्वर्य प्राप्त करना ‘सार्ष्टि मुक्ति’ है। भगवान‍्के समीप जाकर रहना ‘सामीप्य मुक्ति’ है। भगवान‍्के समान ही शंख, चक्र, गदा, पद्म आदि धारण करके वैसे ही रूपसे साथमें रहना ‘सारूप्य मुक्ति’ है। भगवान‍्में ही अपनेको मिला देना, उनसे अभिन्न हो जाना ‘सायुज्य मुक्ति’ है। इनमेंसे भक्त जिस मुक्तिको चाहता है, उसको वही मुक्ति मिलती है। यह सब प्रकारकी मुक्तियाँ जीवकी ऊर्ध्वगतिके अन्तर्गत हैं। जीवकी मुख्य तीन गतियाँ होती हैं—ऊर्ध्वगति, मध्यगति और अधोगति। गीतामें आया है—

ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसा:।

जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसा:॥

(१४। १८)

‘सत्त्वगुणमें स्थित मनुष्य ऊर्ध्वलोकोंमें जाते हैं, रजोगुणमें स्थित मनुष्य मृत्युलोकमें जन्म लेते हैं और निन्दनीय तमोगुणकी वृत्तिमें स्थित मनुष्य अधोगतिमें जाते हैं।’

ऊर्ध्वगतिमें जानेवालोंके दो भेद हैं—(१) ऊपरके लोकोंमें जाकर परमात्माको प्राप्त हो जाना, पीछे लौटकर नहीं आना१ और (२) स्वर्गादि भोगभूमियोंमें जाकर अपने पुण्योंके अनुसार सुख भोगना और पुण्य क्षीण होनेपर पीछे लौटकर मृत्युलोकमें आना। मरकर पुन: मनुष्ययोनिमें जन्म लेना मध्यगति है। अधोगतिके दो भेद हैं—(१) चौरासी लाख योनियों (साँप, बिच्छू, सूकर आदि योनियों)-में जाना और (२) रौरव, कुम्भीपाक आदि नरकोंमें जाना। इस प्रकार पाँच गतियाँ हो गयीं—दो ऊर्ध्वगति, एक मध्यगति और दो अधोगति।२

अन्तकालीन चिन्तनके अनुसार गति

अन्तकालीन चिन्तन और उसके अनुसार गतिको समझनेके लिये एक दृष्टान्त दिया जाता है। एक आदमी अपना चित्र खिंचवानेके लिये बैठा। फोटोग्राफरने उससे कहा कि ठीक तरहसे बैठना, फोटो खिंचते समय कोई अंग न हिले। ज्यों ही चित्र खिंचनेका समय आया, त्यों ही उस आदमीकी नाकपर एक मक्खी आकर बैठ गयी। अब यदि हिल जाऊँगा तो चित्र बिगड़ जायगा—ऐसा विचार करके उसने मक्खीको हटानेके लिये नाकको सिकोड़ा। उतनेमें ही उसका चित्र खिंच गया। जब चित्रको धुलाईके बाद उसने देखा तो चित्र बिगड़ा हुआ मिला। चित्र देखकर वह बहुत नाराज हुआ और बोला कि तुमने मेरा चित्र बिगाड़ दिया! फोटोग्राफरने कहा कि इसमें मेरी क्या गलती है, चित्र खिंचते समय तुमने जैसी आकृति बनायी थी, वैसी ही चित्रमें आ गयी। अब इस चित्रमें परिवर्तन नहीं हो सकता। इसी तरह मृत्युके समय मनुष्यके भीतर जैसा चिन्तन होगा, उसीके अनुसार उसको योनिकी प्राप्ति होगी। चित्र तो दूसरा भी खींचा जा सकता है, पर योनि दूसरी बदली नहीं जा सकती। इसलिये मनुष्यको हर समय सावधान रहनेकी आवश्यकता है; क्योंकि मृत्युके समयका कोई पता नहीं, न जाने कब आ जाय। अत: कोई खराब चिन्तन आ जाय तो सावधान हो जायँ कि यदि इस समय मृत्यु हो जाती तो क्या गति होती? भगवान् कहते हैं—‘तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर’ (गीता ८। ७) अर्थात् तुम सब समय मेरा स्मरण करो। फिर कोई जोखिम नहीं रहेगी। जैसे जीवनबीमा हो जाता है तो फिर मनुष्य निश्चिन्त हो जाता है। मोटरका बीमा हो जाय तो उसमें टूट-फूट होनेपर कोई चिन्ता नहीं होती कि पैसे वापस मिल जायँगे। इसी तरह ‘मैं भगवान‍्का हूँ और भगवान् मेरे हैं’—इस तरह भगवान‍्के साथ अपनेपनकी घनिष्ठता हो जाय, भगवत्सम्बन्धकी स्मृति जाग्रत् हो जाय, और इसके बाद हर समय भगवान‍्का चिन्तन स्वत: होता रहे, करना न पड़े, तो समझो कि इस मानव-जीवनका बीमा हो गया। हम भगवान‍्के हो गये तो समझो हमने बीमाके पैसे जमा कर दिये और हरदम भगवान‍्का चिन्तन कर रहे हैं तो समझो दैनिक देय (किस्त) दे रहे हैं!

अन्तकालमें जैसा चिन्तन होता है, वैसी ही गति होती है, पर अन्तकालका पता नहीं कि कब आ जाय! अगर सब समयमें प्रभुका स्मरण होता रहे तो मृत्यु कभी भी आ जाय, कोई चिन्ता नहीं है; क्योंकि अब कोई खतरा नहीं रहा। जैसे भगवान‍्की प्राप्तिमें अन्तकालका स्मरण कारण है, ऐसे ही पशु-पक्षी आदि योनियोंकी प्राप्तिमें भी अन्तकालका स्मरण ही कारण है। जो अन्तसमयमें याद आ जायगा, उसीमें जाना पड़ेगा। बहुत-से लोग पशु-पक्षियोंको पालते हैं। जो कुत्ता पासमें रखता है, उसको मृत्युसमयमें कुत्ता याद आ जायगा तो मरकर कुत्ता बनना ही पड़ेगा। जैसे कैमरेकी फिल्ममें सामनेवाली आकृति पकड़ी जाती है, ऐसे ही अन्तकालमें कुत्तेकी तरफ वृत्ति जानेपर वही आकृति पकड़ी जाती है और प्राणोंके साथ बाहर निकलती है। जब उस आकृतिके समान दूसरी आकृति सामने आती है, तब वह उसके द्वारा पकड़ी जाती है। अत: वह आकृति कुत्तेके द्वारा पकड़ी जाती है और कुत्तेके श्वासोंके द्वारा अथवा खाद्य पदार्थके द्वारा अथवा जलके द्वारा जीवका कुत्तेमें प्रवेश होता है। फिर वह गर्भाधानके द्वारा कुतियामें जाता है और गर्भ बनकर परिपक्व होनेपर जन्म लेता है। यह पहले खींचे गये चित्रका तैयार होकर सामने आना है! अब प्रश्न उठता है कि वह कुत्तेमें ही क्यों पकड़ा गया? जैसे, आकाशवाणी-केन्द्रके द्वारा जो शब्द फेंका जाता है, वह रेडियोके द्वारा पकड़ा जाता है। रेडियोमें अंक लिखे रहते हैं, जिसका तात्पर्य है कि अमुक स्टेशनसे जो शब्द फेंका गया, वह इतनी गतिसे फेंका गया। वह शब्द वहाँसे बड़ी तेजीसे चलता है और पूरे विश्वमें चक्कर लगाता है। जिस गतिसे वह शब्द फेंका गया, उस गतिके अंकोंपर काँटा होनेसे वह शब्द रेडियोके द्वारा पकड़ा जाता है और बोलने लगता है। परन्तु जहाँ उस गतिके अंकोंपर काँटा नहीं होता, वहाँ वह शब्द चक्कर लगाते हुए भी पकड़ा नहीं जाता। तात्पर्य है कि वह शब्द सजातीयता होनेपर पकड़ा जाता है। ऐसे ही अन्तकालमें जिसका स्मरण करता हुआ यह प्राणी शरीर छोड़ता है, उसकी सजातीयता जिस प्राणीमें है, उस प्राणीमें वह पकड़ा जाता है। विजातीयतामें वह नहीं पकड़ा जाता।

प्राणोंका निष्कासन

जिस क्षण पिण्ड-प्राणका वियोग होता है, उस समय सब अंगोंसे प्राण संकुचित होते हैं। प्राण पाँच माने गये हैं—प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान।* इनके साथ पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, मन तथा बुद्धि—ये बारह रहते हैं। इन सत्रह तत्त्वोंका सूक्ष्मशरीर माना जाता है। अभी हमारे सामने हाड़-मांसका जो शरीर दीखता है, यह स्थूलशरीर है। स्थूलशरीरके भीतर सूक्ष्मशरीर है और सूक्ष्मशरीरके भीतर कारणशरीर है। जाग्रत्-अवस्था स्थूलशरीरकी है। स्वप्नावस्था सूक्ष्मशरीरकी है। सुषुप्ति-अवस्था (गाढ़ नींद, जिसमें कुछ याद नहीं रहता) कारणशरीरकी है। हम चलते-फिरते हैं—यह स्थूलशरीरका काम है। हम सोचते हैं, मनन व चिन्तन करते हैं, विचार करते हैं, मनोराज्य कहते हैं—यह सूक्ष्मशरीरका काम है। हमारा जो स्वभाव है, आदत है, प्रकृति है—यह कारणशरीरमें है। स्थूलशरीरमें क्रिया मुख्य है, सूक्ष्मशरीरमें चिन्तन मुख्य है और कारणशरीरमें स्थिरता मुख्य है। मृत्युके समय सूक्ष्मशरीर (जिसके भीतर कारणशरीर भी है) स्थूलशरीरसे विमुक्त होता है। इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि—ये प्राणोंके भीतर रहते हैं। पहले सब अंगोंसे प्राण संकुचित होते हैं। इसलिये चलने-फिरनेकी शक्ति, लेने-देनेकी शक्ति, बोलनेकी शक्ति, सुननेकी शक्ति, देखनेकी शक्ति आदि सब संकुचित होकर हृदयमें आती हैं। फिर वह सूक्ष्मशरीर प्राणवायुके द्वारा बाहर निकलता है। ऊर्ध्वगतिमें जानेवालोंके प्राण ऊपरके छिद्रों (कान, आँख, नाक, मुख)-से निकलते हैं और अधोगतिमें जानेवालोंके प्राण नीचेके छिद्रोंसे निकलते हैं। योगाभ्यास, प्राणायाम करके जो प्राण छोड़ते हैं, उनके प्राण शब्दके साथ ब्रह्मरन्ध्र (दसवें द्वार)-से निकलते हैं।

कर्मफलका भोक्ता

हम यहाँ पाप अथवा पुण्य करते हैं, शुभ अथवा अशुभ करते हैं, किसीका हित अथवा अहित करते हैं तो इस शरीरसे और यहाँके पदार्थोंसे करते हैं। मृत्युके समय शरीर भी छूट जाता है और पदार्थ भी छूट जाते हैं, फिर अगले जन्ममें पाप-पुण्यका फल किसको मिलता है? अगर हाथोंसे किसी मनुष्यकी हत्या की है तो उसका दण्ड भी इन्हीं हाथोंको मिलना चाहिये, पर ये तो मरकर खाक हो गये, अब दण्ड किसको मिलेगा? इसपर विचार करें। जैसे, कोई आदमी मोटर चला रहा है और गलतीसे कोई मनुष्य मोटरके नीचे आकर मर गया। उस मरनेवाले मनुष्यको ड्राइवरने छुआ ही नहीं, पर दण्ड ड्राइवरको ही होगा, मोटरको नहीं। यदि कहा जाय कि दण्ड ड्राइवरको ही होनेका नियम है तो उस दुर्घटनाके समय एक ड्राइवर फुटपाथपर खड़ा था, क्या उसको दण्ड होगा? उसको दण्ड नहीं होगा; क्योंकि वह मोटरमें नहीं था। यदि मोटरमें बैठे हुए ड्राइवरको दण्ड होता है, तो मोटरके ड्राइवरके पास दूसरा भी ड्राइवर बैठा था, क्या उसको दण्ड होगा? उसको भी दण्ड नहीं होगा; क्योंकि वह मोटरमें तो था, पर मोटर चला नहीं रहा था। अत: दण्ड मोटर चलानेवाले ड्राइवरको ही होगा। ऐसे ही इस शरीरके द्वारा किसीकी हत्या की, चोरी की, अण्डे-मांसादि महान् अपवित्र चीजोंका सेवन किया तो इन पापोंका दण्ड उसको होगा, जो इस शरीरका संचालक बना हुआ है। जो इस शरीरको ‘मैं’ और ‘मेरा’ कहता है, इस शरीरका मालिक बना हुआ है, उसको दण्ड होगा।

यह शरीर मोटरकी तरह है, एक रहनेकी जगह है। यह शरीर ‘मैं’ नहीं है। हरेक मनुष्य शरीरको ‘मेरा’ कहता है; जैसे—हाथ मेरा, पाँव मेरा, कान-नाक-जीभ मेरी, सीना मेरा, पीठ मेरी, पेट मेरा, गर्दन मेरी, मस्तक मेरा, रक्त मेरा आदि-आदि। जो ‘मेरा’ कहनेवाला होता है, वह ‘मैं’ से अलग होता है। शरीर मैं नहीं हूँ, प्रत्युत शरीर मेरा है। पर भूलसे कह देते हैं कि शरीर मैं हूँ। विचार करें, जब एक-एक अंग मैं नहीं, फिर पूरा मिला हुआ मैं कैसे! सेरभर चावल हों तो उसका एक-एक दाना तो है चावल और जब मिलकर एक सेर हो जायँ तो हो जाय गेहूँ, क्या ऐसा हो सकता है? नहीं हो सकता। इसलिये शरीर मैं नहीं है, पर भूलसे इसको मैं मान लेते हैं। शरीर तो यहीं पड़ा रहता है और इसको ‘मैं’ और ‘मेरा’ कहनेवाला चल देता है और पाप-पुण्यका फल भोगता है।

तात्पर्य यह हुआ कि जो कर्म करता है, वही कर्मका भोक्ता बनता है। कर्ता और भोक्ता क्या चीज है? इसपर विचार करें। हम मोटरमें बैठकर कहीं गये। वहाँ किसीने हमसे पूछा कि कैसे आये? तो हमने कहा कि हम मोटरसे आये। मोटर हमें वहाँ ले गयी। यदि हम मोटरमें ड्राइवरको न बैठायें तो क्या मोटर हमें वहाँ ले जायगी? नहीं ले जा सकती। ड्राइवर हमें वहाँ ले जाता है। अगर हम कहीं बैठ जायँ और ड्राइवरको भी बैठा दें और कहें कि आप हमें अमुक जगह ले चलिये तो क्या वह हमें वहाँ ले जा सकता है? नहीं ले जा सकता। हमें वहाँ न तो केवल ड्राइवर ले जा सकता है, न केवल मोटर ले जा सकती है। वहाँ ले जानेकी क्रिया न तो केवल ड्राइवरसे होती है, न केवल मोटरसे होती है, प्रत्युत जब दोनों मिलते हैं, तब क्रिया होती है। जब चालक होता है, तब यन्त्र चलता है। अगर चालक न हो तो यन्त्र नहीं चल सकता। ऐसे ही जब जीवात्मा स्थूलशरीरका संचालन करता है, तब इससे कार्य होते हैं। शरीरके बिना जीवात्मा कुछ नहीं कर सकता और जीवात्माके बिना शरीर कुछ नहीं कर सकता। अत: दोनोंके संयोगसे क्रिया होती है। जो करता है, वही भोगता है।

क्रिया करनेमें शरीरकी प्रधानता होती है और फल भोगनेमें जीवात्माकी प्रधानता होती है। जैसे, मोटरके द्वारा किसी मनुष्यकी मृत्यु हुई तो उसको छूकर मारनेमें मोटरकी मुख्यता रहती है और दण्ड भोगनेमें ड्राइवरकी मुख्यता रहती है। ड्राइवरके संयोगसे मोटर मारती है और मोटरके संयोगसे ड्राइवर दण्ड भोगता है। अत: कर्तापन और भोक्तापन दोनोंमें शरीर और जीवात्मा दोनोंका संयोग रहता है। मनुष्य जो पाप करता है, अन्यायपूर्वक, धोखा देकर, झूठ-कपट करके, बेईमानी करके धन कमाता है, वह धन तो मरनेपर यहीं रह जाता है और भीतर जमा किया हुआ पाप, झूठ-कपट, बेईमानी, जालसाजी साथमें चलती है। धन एक कौड़ी भी साथ चलेगा नहीं और जो भाव बिगड़े हैं, वे एक कौड़ी भी पीछे रहेंगे नहीं। आगे (परलोकमें) उनका महान् भयंकर दण्ड भोगना ही पड़ेगा। यहीं रह जानेवाली चीजोंके लिये मनुष्य साथमें चलनेवाले भावोंको बिगाड़ लेता है और कहलाता है कि बड़ा बुद्धिमान् है! कितना काम कर लिया! थोड़े दिनोंमें लखपति बन गया! परन्तु साथ चलनेवाली पूँजीको महान् बिगाड़ लिया! अगर यही बुद्धिमानी है तो मूर्खता किसका नाम धरें? यहीं छूट जानेवाली चीजोंके लिये साथमें चलनेवाली चीजें बिगाड़ लें—ऐसा अन्धेर हमारे भारतवर्षमें नहीं था!

सिबि दधीच हरिचंद नरेसा।

सहे धरम हित कोटि कलेसा॥

(मानस, अयोध्या० ९५। २)

राजा शिबिने शरणागतकी रक्षाके लिये पहले अपने शरीरसे मांस काटकर दिया और फिर पूरा शरीर ही दे दिया। दधीचि ऋषिने अपनी हड्डियाँ दे दीं। राजा हरिश्चन्द्रने अपना राज्य दे दिया। परन्तु उन्होंने अपने भीतरके भावोंका नाश नहीं होने दिया। जो चीजें साथमें नहीं रहतीं, उन नाशवान् चीजोंको दूसरोंके हितमें लगाकर उन्होंने साथमें चलनेवाली बढ़िया पूँजी संगृहीत कर ली। वे बड़े चतुर और समझदार रहे; क्योंकि उन्होंने छूटनेवाली चीजको छोड़ दिया और साथमें रहनेवाली चीजका नाश नहीं होने दिया।

भीतरी भावोंका सुधार

आजकल लोग भीतरकी चीजोंके बिगड़नेकी परवाह नहीं करते। भीतरसे चाहे कितने ही काले हों, पर बाहरकी इज्जत, आबरू, पोजीशन ठीक बनी रहे, समाजमें अच्छे कहलाते रहें! कोई उनके दोषोंकी तरफ दृष्टि करे, उनसे पूछे कि आप कैसे हैं, तो वे कहते हैं कि यह हमारा व्यक्तिगत जीवन है। यदि व्यक्तिगत जीवन बिगड़ेगा तो समाज कैसे अच्छा रहेगा? समाज भी पूरा-का-पूरा बिगड़ जायगा; क्योंकि व्यक्तियोंसे ही समाज बनता है। अत: व्यक्तिगत सुधारसे ही समाजका सुधार हो सकता है। भीतरके भाव न सुधारकर बाहरके सुधारकी बड़ी-बड़ी बातें बनायें, व्याख्यान दें और लोग भी प्रमाणपत्र दे दें कि बहुत अच्छा है, तो इससे क्या लाभ हुआ?

तुलसी सो नर चतुर है, राम भजन लवलीन।

परधन परमन हरणको, वेश्या भी परवीन॥

वास्तवमें चतुर वही है, जो भजन कर ले, अपने भावको शुद्ध बना ले, अपनी आदत अच्छी बना ले। यदि भीतरके भावको गन्दा कर लें, और बाहरसे वाहवाही ले लें, धनका संग्रह कर लें तो ऐसा करनेमें वेश्या भी प्रवीण होती है! हम तो किसीको कोई वस्तु दिये बिना उससे रुपया नहीं ले सकते, पर वेश्या मुफ्तमें रुपया ले लेती है। हम किसीका मन भी अपनी तरफ खींचेंगे तो कोई तमाशा दिखायेंगे, गाना-बजाना आदि करेंगे, तब लोगोंसे वाहवाही लेंगे, पर वेश्याको इतनी मेहनत भी नहीं करनी पड़ती। अत: हम ज्यादा-से-ज्यादा मेहनत करेंगे तो वेश्याके समान बन जायँगे, और क्या होगा? इसमें हमारी इज्जत नहीं है। हमारी वास्तविक इज्जत इसीमें है कि हम भीतरसे शुद्ध बन जायँ। समाजमें लोग चाहे हमें अच्छा न मानें अथवा अच्छा न जानें अथवा अच्छा न कहें, पर हमारे भाव अगर अच्छे हैं तो हमारे चित्तमें हर समय आनन्द रहेगा, प्रसन्नता रहेगी और मरनेपर सद‍्गति होगी। समाज हमें अच्छा ही कहे—यह हमारे हाथकी बात नहीं है। समाज हमें अच्छा भी कहेगा और बुरा भी कहेगा। पर हम अच्छे बन जायँ, बुरे न बनें—यह हमारे हाथकी बात है। वास्तवमें जो चीज सच्ची होती है, वह छिपती नहीं, प्रकट हो ही जाती है। सन्तोंने कहा है—

भजन करे पाताल में, प्रगट होय आकाश।

दाबी-दूबी ना रहे, कस्तूरी की बास॥

कस्तूरीकी सुगन्धको कोई सौगन्ध दिला दे कि बाहर मत आना, तो भी डिबिया खोलते ही वह बाहर फैल जाती है। ऐसे ही हम अपने भावोंको थोड़े दिन दबा सकते हैं, पर वे दुनियामें प्रकट हो ही जाते हैं। थोड़ी सूक्ष्म बुद्धिवाले उनको विशेष पहचान लेते हैं।

भावके अनुसार गति

यदि हमें आगे अच्छी गतिमें जाना है जो हमें अपने भावोंको शुद्ध बनाना होगा। हमारे भाव, आदत, स्वभाव अच्छे बन जायँ तो हम नीची गतिमें नहीं जा सकते। जिस व्यक्तिमें दया व क्षमा है, शान्ति व प्रसन्नता है, उसको यदि बिच्छू अथवा साँप बनाया जाय तो वह बिच्छू अथवा साँपका, क्रूरताका काम कर ही नहीं सकेगा। जो आदमी दूसरेको दु:ख देता है, बिना कारण कष्ट देता है, अपने स्वार्थके लिये दूसरेका नुकसान कर देता है, ऐसे आदमी ही बिच्छू, साँप आदि योनियोंमें, अधोगतिमें जाते हैं। जो समाजमें अपनेको अच्छा दिखाता है, चुपचाप रहता है, पर मौका पड़नेपर आँख बचाकर दूसरेको लूट लेता है, ऐसे स्वभाववाला ही बिल्ली बनता है। जैसे, बिल्ली आँख मीचकर चुपचाप बैठी रहती है और जब देखती है कि मलाई पड़ी है और कोई नहीं है तो फट छापा मारती है; क्योंकि यह उसकी आदत (स्वभाव) है। यह आदत मनुष्यजन्ममें बनायी हुई है। जीव मनुष्यजन्ममें स्वभाव बदलता है और भगवान् उसका चोला (शरीर) बदलते हैं। नाटकमें भी स्वाँग उसीको दिया जाता है जो स्वाँग ठीक भर सके। भेड़-बकरी चरानेवालेको प्रधानाध्यापक नहीं बनाया जाता। जो सबको पढ़ा सकता है, ऐसी योग्यतावालेको प्रधानाध्यापक बनाया जाता है। अत: जो मनुष्य अपना स्वभाव सौम्य, शान्त, शुद्ध बना लेता है, उसकी अधोगति हो ही नहीं सकती। कारण कि उसका भाव हर समय शुद्ध है तो अन्तकालमें भी शुद्ध रहेगा। अन्तकालके भावके अनुसार उसकी गति होगी। वह किसी योनिमें भी जायगा तो वहाँ भी उसका भाव वैसा ही शुद्ध रहेगा।

श्रीमद्भागवतमें एक कथा आती है। महाराज भरत भारतवर्षके बहुत बड़े राजा थे। अपने जीवनके अन्तिम भागमें वे सब कुछ छोड़कर पुलहाश्रममें चले गये और भगवान‍्के भजन-स्मरणमें लग गये। एक दिन जब वे स्नान करनेके लिये गण्डकी नदीमें गये तो उन्होंने देखा कि एक गर्भवती हरिणी जल पीनेके लिये नदीके तटपर आयी। वह ज्यों ही जल पीने लगी, त्यों ही पीछेसे सिंहकी भयंकर गर्जना सुनायी पड़ी। इससे बेचारी हरिणी डर गयी और उसने नदी पार करनेके लिये छलाँग मारी। छलाँग मारते ही उसका गर्भ नदीमें गिर गया। वह हरिणी आगे जाकर मर गयी। भरतजीने देखा कि हरिणीका बच्चा बिना माताका हो गया, अब उसकी रक्षा कौन करे? उनको दया आ गयी और उन्होंने उस बच्चेको उठा लिया तथा अपने आश्रमपर ले आये। उस बच्चेको फलों आदिका रस देते हुए धीरे-धीरे घास खाना सिखा दिया और हरदम उसका पालन-पोषण करने लगे। जैसे माँ-बापका अपने बच्चेमें मोह होता है, ऐसे ही भरतजीका उस बच्चेमें मोह हो गया। हरिणीका वह बच्चा खेलता, फुदकता, सींग मारता, खुजली करता तो बाबाजीको बड़ा आनन्द आता! वे रात-दिन उसके पालन-पोषणकी चिन्तामें ही डूबे रहते। कभी वह दिखायी नहीं देता तो वे उसके लिये बड़े व्याकुल हो जाते। इस प्रकार दिन बीतते गये और एक दिन बाबाजीका अन्त समय आ पहुँचा। अन्तकालमें भी उस हरिणका चिन्तन होनेसे वे मरकर हरिण बन गये।

जिसका स्वभाव शुद्ध बन जाता है, वह नीची गतिमें नहीं जा सकता। भरतजीका स्वभाव तो शुद्ध ही था, भोगोंका त्याग करके वनमें रहते थे और तपश्चर्या करते थे, फिर वे अधोगतिमें कैसे गये? इसका समाधान यह है कि हरिणका शरीर मिलना अधोगति नहीं है। अधोगति है—भीतरके भावोंका गिरना। इसलिये हरिणके जन्ममें भी भरतजीको पूर्वजन्मकी याद रही। वहाँ वे हरी घास न खाकर सूखे पत्ते खाते रहे। वैराग्यके कारण वे अपनी माता हरिणीके भी साथ नहीं रहे कि कहीं मोह हो गया तो पुन: हरिणीके गर्भसे जन्म लेना पड़ेगा। हरिणके जन्ममें भी उनमें इतनी सावधानी रही, जो मनुष्योंमें भी बहुत कम रहती है। उनमें त्यागका शुद्ध भाव रहा। शुद्ध भाव रहनेसे हरिणका शरीर मिलनेपर भी उनकी अधोगति नहीं हुई। वहाँसे मरकर उन्होंने श्रेष्ठ ब्राह्मणके घरमें जन्म लिया। वहाँ उनका नाम ‘जड़ भरत’ हुआ। किसीका संग, मोह न हो जाय, कहीं फँस न जायँ—ऐसी सावधानी रखनेके कारण वे ‘जड़’ कहलाये।

तात्पर्य है कि किया हुआ भजन, स्मरण, तपश्चर्या व्यर्थ नहीं जाती और अन्तकालीन चिन्तनके अनुसार गतिका कानून भी व्यर्थ नहीं जाता। अत: हमें कर्म करते हुए भी सावधान रहना है और चिन्तन भी भगवान‍्का करते रहना है। यह मनुष्यके लिये बड़ी खास बात है। अन्य योनियोंमें हम कर्म और चिन्तनको नहीं बदल सकते। पशु-पक्षियोंके स्वभावको बदलकर उनको अध्यात्म-मार्गमें नहीं ला सकते। उनके स्वभावके अनुसार उनको शिक्षा दे सकते हैं, पर तुम ऐसे कर्म करो, ऐसा चिन्तन करो जिससे मुक्ति हो जाय—यह शिक्षा नहीं दे सकते। यह अधिकार इस मानव-जन्ममें ही है।* अगर हमने अपना स्वभाव अशुद्ध बना लिया, अपनी आदत बिगाड़ ली, तो फिर अधोगति असम्भव नहीं है! इसलिये—

डरते रहो यह जिन्दगी बेकार न हो जाय,

सपनेमें किसी जीवका अपकार न हो जाय।

अधोगतिसे बचनेके लिये दो खास बातें हैं— (१) दूसरोंकी नि:स्वार्थ सेवा करना और (२) भगवान‍्को याद करना। यह काम मनुष्य ही कर सकता है और इसीमें उसकी मनुष्यता सिद्ध होती है। जो दूसरोंका अनिष्ट करता है, वह वास्तवमें अपना ही महान् अनिष्ट करता है और जो दूसरोंको सुख पहुँचाता है, वह वास्तवमें अपनेको ही सुखी बनाता है। अपना बिगाड़ किये बिना कोई दूसरेका बिगाड़ कर ही नहीं सकता। जैसे, मनुष्य पहले चोर बनता है, पीछे चोरी करता है। चोरी करनेपर माल हाथ लगे अथवा न लगे, पर वह खुद चोर बन ही जाता है अर्थात् उसके भीतर चोरपनेका भाव (मैं चोर हूँ) आ ही जाता है।

मृत्यु अवश्यम्भावी है। थोड़ी भी असावधानी परलोकमें हमारी दुर्गतिका कारण बन सकती है। अभी मनुष्यशरीर हमें प्राप्त है। अत: शरीरके रहते-रहते ऐसा काम कर लेना चाहिये, जिससे कोई जोखिम न रहे अर्थात् कभी भी मृत्यु आ जाय तो कम-से-कम अधोगतिमें न जाना पड़े। हरदम सावधान रहनेवाला दुर्गतिमें कैसे जा सकता है? इसलिये हमें बड़ी सावधानीसे अपना जीवन बिताना चाहिये और दूसरोंके हितके लिये कर्तव्यकर्म करते हुए हर समय भगवान‍्का स्मरण-चिन्तन करते रहना चाहिये।