सत्संगके फूल

पराकृतनमद‍्बन्धं परं ब्रह्म नराकृति।

सौन्दर्यसारसर्वस्वं वन्दे नन्दामजं मह:॥

प्रपन्नपारिजाताय तोत्त्रवेत्रैकपाणये।

ज्ञानमुद्राय कृष्णाय गीतामृतदुहे नम:॥

वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्।

देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद‍्गुरुम्॥

वंशीविभूषितकरान्नवनीरदाभात्

पीताम्बरादरुणविम्बफलाधरोष्ठात्।

पूर्णेन्दुसुन्दरमुखादरविन्दनेत्रात्

कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने॥

हरि: ॐ नमोऽस्तु परमात्मने नम:।

श्रीगोविन्दाय नमो नम:।

श्रीगुरुचरणकमलेभ्यो नम:।

महात्मभ्यो नम:।

सर्वेभ्यो नमो नम:।

सत्तामात्रका ध्यान बड़ा सुगम है—‘सन्मात्रं सुगमं नृणाम्’। परमात्मा है—यह जरूरी है, परमात्मा कैसा है—यह जरूरी नहीं है। यह कह सकते हैं कि वह सम्पूर्ण देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदिमें परिपूर्ण है। जैसे हम मानते हैं कि हम श्रीरामधाम (सींथल)-में हैं, ऐसे ही मान लें कि हम हर समय परमात्मामें हैं। अपने अभावका अनुभव कभी किसीको नहीं होता। जैसे मैं हूँ, ऐसे परमात्मा हैं। इस प्रकार सत्तामात्रका ध्यान बड़ा ऊँचा ध्यान है। यह वृत्तिका ध्यान नहीं है, प्रत्युत स्वीकृतिका ध्यान है। चिन्तन मिट जाता है, पर स्वीकृति नहीं मिटती। भूलनेपर भी स्वीकृति नहीं मिटती।

यह विश्वास हो कि भगवान् मेरे हैं। जैसे, माँ मेरी है—यह विश्वास है। भगवान् सबसे बड़ी माँ हैं। वे माँ भी हैं, पिता भी हैं, पितामह भी हैं! वे हमारे हैं—ऐसा माननेमें बहुत आनन्द है।

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शरीर निरन्तर जा रहा है। मौत नजदीक आ रही है। अत: अपना समय उसी काममें लगाना चाहिये, जिसे हम ही कर सकते हैं, दूसरे नहीं कर सकते। अपना कल्याण हम ही कर सकते हैं। संसारके काम तो दूसरे भी कर लेंगे।

संसारकी सेवा करनी है और भगवान‍्से प्रेम करना है। भगवान् मेरे हैं—यह बहुत मार्मिक बात है! प्रेम अपनेपनसे होता है। अत: केवल भगवान‍्को ही अपना मान लें। शरीर अपना और अपने लिये है ही नहीं।

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परमात्मप्राप्ति बहुत सुगम है। द्वन्द्व ही बन्धन करनेवाला है। द्वन्द्वरहित कैसे हों? सुख-दु:ख, अनुकूलता-प्रतिकूलता, राग-द्वेष, ठीक-बेठीक कोई भी रहनेवाला नहीं है। सबका अभाव हो रहा है। सृष्टिमात्र अभावमें जा रही है। उसमें क्या ठीक, क्या बेठीक? मिटनेवालेमें लगाव कैसे होगा? जो रहनेवाला नहीं है, उससे क्या राग करें, क्या द्वेष करें? क्या राजी हों, क्या नाराज हों?

संसारका वियोग ही नित्य है, संयोग नित्य नहीं है। संयोगको कोई रख सकता ही नहीं। जिसका वियोग होता है, उसके संयोगकी इच्छा छोड़ दो। कोई भी ऐसा क्षण नहीं है, जिसमें संयोग टिकता हो, वियोग न होता हो। केवल मौत-ही-मौत है, जीना है ही नहीं! जीना चाहते हैं तो मरनेपर रोना पड़ेगा। जीना चाहते ही नहीं तो फिर रोना क्यों पड़ेगा? केवल संयोगकी इच्छाका त्याग करना है। रखना चाहते हैं, पर रहता नहीं, तभी दु:ख होता है। मुक्ति कठिन नहीं है, बन्धन कठिन है।

हम यहाँ रहनेवाले नहीं हैं। हम यहाँ आये हैं और यहाँसे जाना है। हम यहाँ पशु-पक्षियोंकी तरह अपने कर्मोंका फल भोगनेके लिये ही नहीं हैं, प्रत्युत अपना उद्धार करनेके लिये आये हैं।

परमात्मा ‘है’, संसार ‘नहीं’ है। जो पहले नहीं था, पीछे नहीं रहेगा, वह वर्तमानमें भी नहीं है। सब वस्तुएँ ‘नहीं’ में जा रही हैं। संसारका ‘नहीं’-पना ही सिद्ध होता है। साधकका काम है—‘नहीं’ का त्याग कर देना और ‘है’ में स्थित होना। त्याग तो स्वत: हो रहा है, ‘यह बना रहे’—इस इच्छाका त्याग करना है। ‘नहीं’ स्वाभाविक नहीं है, ‘है’ स्वाभाविक है। सत् तो अनुभवरूप ही है। अनुभव तो असत् का ही होता है, सत् का नहीं। आप ‘नहीं’ के द्वारा ‘है’ को देखना चाहते हैं—यह गलती है।

मन लगनेका सबसे बढ़िया उपाय है—उपेक्षा, उदासीनता। न विरोध करें, न समर्थन करें। एकाग्रता करना चाहोगे तो मन एकाग्र नहीं होगा। पहले परमात्माका लक्ष्य करके फिर लक्ष्यको भी छोड़ दो, नहीं तो त्रिपुटी आ जायगी।

परमात्मा कैसा ही हो, वह अपना है। संसार कैसा ही हो, उसको छोड़ना है। जिसको छोड़ना हो, उसपर विचार क्या करें? जिसको ग्रहण करना हो, उसपर भी विचार क्या करें? माँ कैसी ही हो, हमारी है।

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भगवान‍्ने बड़ी कृपा करके मनुष्यशरीर दिया है कि यह जीव सदाके लिये सुखी हो जाय। भोग और संग्रहके लिये मनुष्यशरीर नहीं दिया है। मनुष्यशरीरमें ही दूसरोंकी सेवा हो सकती है। मनुष्य भगवान‍्की भी सेवा कर सकता है। ‘भावके भूखे हैं भगवान्’—यह भाव मनुष्यसे ही मिल सकता है। मनुष्य भगवान‍्की भी भूख मिटा सकता है!

उद्धारके लिये खास बात है—मैंपन बदलना। मैं साधक हूँ तो साधनसे विरुद्ध काम कैसे कर सकता हूँ? दूसरोंकी तरफ देखनेवाला कभी कर्तव्यनिष्ठ हो ही नहीं सकता। दूसरेका कर्तव्य देखना अकर्तव्य है, अनधिकार चेष्टा है।

साधन करना कोई काम-धंधा नहीं है, जिसमें छुट्टी होती है। यह तो जीवन है, श्वासकी तरह! इसलिये गीतामें आया है—‘तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर’ (८।७)।

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परमात्मा हैं और वे अपने हैं। उनको छोड़कर शरीरको मुख्य मानना गलती है। भगवान‍्के अंशको तो भगवान‍्में ही स्थित होना चाहिये, पर इसने प्रकृतिके अंशको पकड़ लिया—

ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:।

मन:षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥

(गीता१५।७)

‘इस संसारमें जीव बना हुआ आत्मा स्वयं मेरा ही सनातन अंश है। परन्तु वह प्रकृतिमें स्थित मन और पाँचों इन्द्रियोंको आकर्षित करता है (अपना मान लेता है)।’

प्रकृतिका अंश तो प्रकृतिमें ही स्थित है—‘प्रकृतिस्थानि’।

भगवान् आपको निरन्तर बुला रहे हैं, इसीलिये आप कहीं भी टिक नहीं सकते। आप जिस वस्तु, परिस्थिति, अवस्था आदिको पकड़ते हैं, वह छूट जाती है।

आप आज हृदयसे साथी और सामानको छोड़ दो तो आज ही भगवान‍्की प्राप्ति हो जायगी। वास्तवमें प्राप्ति तो है ही। भगवान‍्में भी यह ताकत नहीं है कि आपको अपनेसे अलग कर दें। वह ‘है’ (परमात्मा) ही ‘मैं’ के कारण ‘हूँ’ हुआ है।

‘अहं ब्रह्मास्मि’ वृत्ति है, उपासना है, तत्त्व नहीं है—‘सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा’(मानस, उत्तर० ११८।१)। वृत्तिको विषयरूपी वायु बुझा सकती है—‘अंचल बात बुझावहिं दीपा’ (मानस, उत्तर० ११८।४), ‘तबहिं दीप बिग्यान बुझाई’(उत्तर० ११८।७)। तत्त्व (स्वयं)-को विषयरूपी वायु नहीं बुझा सकती।

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गीतामें शरणागतिकी बात मुख्य है। शरणागतिको ‘सर्वगुह्यतम’ कहा गया है। जीव परमात्माका अंश है, इसलिये उसके लिये परमात्माकी शरणमें जाना बहुत सीधी-सरल बात है, जैसे बालकका अपनी माँकी गोदमें जाना! शरणमें जानेका काम जीवका है और सब पापोंसे मुक्त करनेका काम भगवान‍्का है—

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:॥

(गीता १८।६६)

भगवान‍्ने तो हमें शरणमें ले रखा है। केवल हमें संसारकी शरण नहीं रखनी है। शरणागत आरम्भमें ही मुक्त हो जाता है! शरणागत सिद्ध होकर साधक होता है, ज्ञानमार्गी साधक होकर सिद्ध होता है।

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साधन शरीरनिरपेक्ष होता है। कारण कि साधनमें स्वयंकी जरूरत है, शरीरकी नहीं। ध्येय परमात्माका होनेपर भी जड़ शरीरका सहारा लेना गलती है। समाधितक जड़ शरीरका सहारा है! सबसे ऊँचा सहारा परमात्माका है। उद्योग तो करो, पर उद्योगका सहारा मत लो—‘मामाश्रित्य यतन्ति ये’ (गीता ७।२९)। और का सहारा न ले, केवल भगवान‍्का सहारा ले, तब काम होगा।

एक बानि करुनानिधान की।

सो प्रिय जाकें गति न आन की॥

(मानस, अरण्य० १०।४)

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पारमार्थिक मार्गपर चलनेके लिये विवेककी बड़ी आवश्यकता है। गीताका आरम्भ भी विवेकसे हुआ है। जीनेकी इच्छा और मरनेका भय अविवेकीमें ही होता है, विवेकीमें नहीं। जो चिन्ता करते हैं, वे भी अविवेकी हैं।

ऐसा होना चाहिये, ऐसा नहीं होना चाहिये—यह इच्छा कहलाती है। प्राणशक्ति नष्ट होनेपर भी इच्छाशक्ति रहती है, तभी आगे जन्म होता है। इच्छाशक्ति न रहे तो दुबारा जन्म नहीं होता।

मरनेवाला तो मरेगा ही और न मरनेवाला नहीं मरेगा। गंगाजीके प्रवाहको रोकना भी मूर्खता है और प्रवाहको धक्का देना भी मूर्खता है!

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अपने-अपने कर्तव्य-कर्मोंके द्वारा भगवान‍्का पूजन करना चाहिये—

स्वे स्वे कर्मण्यभिरत: संसिद्धिं लभते नर:।

(गीता१८।४५)

स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव:॥

(गीता१८।४६)

परमात्माका पूजन करनेसे संसारमें सबका पूजन हो जाता है—

यथा तरोर्मूलनिषेचनेन

तृप्यन्ति तत्स्कन्धभुजोपशाखा:।

प्राणोपहाराच्च यथेन्द्रियाणां

तथैव सर्वार्हणमच्युतेज्या॥

(श्रीमद्भा०४।३१।१४)

‘जिस प्रकार वृक्षकी जड़ सींचनेसे उसके तने, शाखाएँ, उपशाखाएँ आदि सभीका पोषण हो जाता है, और जैसे भोजनद्वारा प्राणोंको तृप्त करनेसे सभी इन्द्रियाँ पुष्ट हो जाती हैं, उसी प्रकार भगवान‍्की पूजा ही सबकी पूजा है।’

कारण यह है कि परमात्मा सम्पूर्ण प्राणियोंके सनातन तथा अव्यय बीज हैं—‘बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्’ (गीता ७।१०), ‘बीजमव्ययम्’ (गीता ९।१८)।

आत्मज्ञान न हो तो पढ़े-लिखे और अनपढ़—दोनों मनुष्य समान हैं—

पढ़े अपढ्ढे सारखे, जो आतम नहिं लक्ख।

शिल सादी चित्रित ‘अखा’, दो डूबण पक्ख॥

सभी आश्रमोंका लक्ष्य परमात्मप्राप्ति ही है। ब्रह्मचर्याश्रम सभी आश्रमोंकी नींव है। मकान दीखता है, पर नींव नहीं दीखती। अच्छे-अच्छे महात्माओंकी नींव (बालकपना) दीखती नहीं, छिपी रहती है।

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हम यहाँ आये हैं और जानेवाले हैं—यह जागृति हर समय रहनी चाहिये। ऐसा भाव रहनेसे दुर्गुण-दुराचार नहीं होंगे, अन्याय नहीं होगा। स्थायी रहनेका भाव ही अनर्थ करता है।

जानेके समयका कोई पता नहीं है। रहनेका तो भरोसा नहीं और जानेकी तैयारी नहीं—यह बड़ी गलतीकी, आश्चर्यकी बात है!

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वर्तमान समय बहुत बढ़िया भी है और बहुत घटिया भी! बढ़िया इसलिये है कि हमें गीताप्रेसकी पुस्तकें, गीता, रामायण आदि ग्रंथ पढ़ने-सुननेको मिल गये, सत्संग मिल गया। घटिया इसलिये है कि हमारी सरकार धर्मको अधर्म तथा अधर्मको धर्म मान रही है! सन्तति-निरोधको ‘परिवार-कल्याण’ और पशुओंके नाशको ‘मांसका उत्पादन’ कहा जाता है! सबसे दुर्लभ मनुष्यशरीरको उत्पन्न होनेसे ही रोक रहे हैं! ऐसा दीख रहा है कि कोई भयंकर युद्ध होगा, महान् संहार होगा। उसीकी तैयारी (गर्भपात-जैसे महापाप) हो रही है। इतना पाप, अन्याय ज्यादा चलेगा नहीं।

सभी भाई-बहन भगवान‍्के भजनमें लग जाओ। उनकी शक्तिसे ही काम होगा। और कोई उपाय नहीं है। रात-दिन भगवान‍्को पुकारो, नामजप करो, गीता-रामायणका पाठ करो, दूसरोंकी सेवा करो।

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जो भी दीखे, उसमें परमात्मा है—यह सबसे सुगम ध्यान है। मेरेको सुख मिल जाय—यह पापकी जड़ है।

विदेशी गाय तो नाश करनेवाली है।

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भोगों और रुपयोंमें लगे हुए मनुष्य परमात्मप्राप्तिका विचार भी नहीं कर सकते। रुपयोंके लोभसे आज बड़ा अनर्थ हो रहा है! सरकारका इष्टदेव मुसलमान हैं और लोगोंका इष्टदेव रुपये हैं। अभी हिन्दू समाज और गायोंपर जितनी आफत है, उतनी अन्य किसीपर नहीं।

ब्रह्मचर्याश्रम अपनी संस्कृतिकी रक्षा करनेवाली चीज है।

कामसे अधिक समय हो और खर्चेसे अधिक पैसे हों तो ऐसे मनुष्यका उद्धार होना कठिन है।

विद्या प्राप्त करनेका बढ़िया उपाय है—गुरुकी आज्ञाका पालन करना।

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मनुष्यशरीर मल-मूत्र पैदा करनेकी फैक्ट्री है। परन्तु इसमें एक गुण है कि जीव अपना उद्धार कर सकता है। यह गुण देवताओंमें भी नहीं है, जबकि देवताओंका शरीर दिव्य होता है। उनको मनुष्यशरीरसे दुर्गन्धि आती है। गायका शरीर बहुत पवित्र है, उसका गोबर-गोमूत्र भी पवित्र है, पर उसमें भी कल्याण नहीं होता।

जो जिस वस्तुका दुरुपयोग करता है, उसे वह वस्तु पुन: नहीं मिलेगी। सदुपयोग करनेसे पुन: वह वस्तु मिलती है। यदि कोई मनुष्यशरीरका दुरुपयोग करेगा तो उसे मनुष्यशरीर नहीं मिलेगा। मनुष्यशरीर दुरुपयोग करनेके लिये नहीं मिला है। परिवार-नियोजन मानवजीवनका महान् दुरुपयोग है! आप कहते हैं कि अन्न नहीं मिलेगा, मैं छाती ठोककर कहता हूँ कि इस पापके कारण अन्न तो दूर रहा, पानी भी नहीं मिलेगा!

वास्तवमें अच्छाई सब भगवान‍्की है, बुराई हमलोगोंकी है। जैसे पानी नलमें दीखता है, पर वह वहाँसे नहीं आता, टंकीसे आता है, ऐसे ही अच्छी बात भगवान‍्की कृपासे आती है।

बीजको उबाल दिया जाय या भून दिया जाय तो फिर बीजसे कुछ पैदा नहीं होता। ऐसे ही मदिरा धर्मके अंकुरको जला देती है। मदिरा पीनेवाला तत्त्वचिन्तन नहीं कर सकता।

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