तात्त्विक प्रश्नोत्तर
एक महात्माके प्रश्न और उनके उत्तर
प्रश्न—भीतर यह बात बैठी हुई है कि पुरुषार्थसे कुछ नहीं होता। जो होता है, प्रारब्धसे ही होता है। क्या यह ठीक है?
स्वामीजी—अपने पुरुषार्थसे कुछ नहीं होता। पुरुषार्थ छोड़ते ही प्रभु-कृपासे काम होता है। उसको प्रभु-कृपा न मानकर पुरुषार्थ मानना भूल है! अपना पुरुषार्थ सर्वथा छोड़ना ‘शरणागति’ है।
ज्ञानकी दृष्टिसे ‘कुछ न करना’ ही सबसे बड़ा पुरुषार्थ है। ‘करने’ से प्रकृतिमें स्थिति होती है और ‘न करने’ से परमात्मतत्त्वमें स्थिति होती है। ‘करने’ से परमात्मतत्त्व मिलेगा—यह भाव देहाभिमान पुष्ट करनेवाला है। आदि-अन्तवाले कर्मोंका फल अनन्त कैसे हो सकता है?
प्रारब्धका फल भोग है, कर्म नहीं। यदि कर्मका फल भी कर्म होगा तो कर्मोंका अन्त कभी आयेगा ही नहीं, कर्म-बन्धनसे मुक्ति होगी ही नहीं—यह ‘अनवस्था दोष’ आयेगा। पुरुषार्थसे प्रारब्ध बनता है, पर प्रारब्धसे पुरुषार्थ नहीं बनता। हमारा प्रश्न है कि यदि सब कर्म प्रारब्धसे होते हैं तो प्रारब्ध कहाँसे होता है? प्रारब्ध तो क्रियमाण-कर्मका अंश है, फिर वह क्रियमाण-कर्म कैसे करेगा?
प्रश्न—भोजन किया तो भूख मिटना फल हुआ। फिर शौच गये तो यह ‘कर्मका फल भी कर्म’ हुआ?
स्वामीजी—शौच जाना कर्म नहीं है; क्योंकि इसमें कर्तृत्व नहीं है। भोजनके पचनेकी तरह शौच जाना एक चेष्टा है, कर्म नहीं। कर्मका फल कभी कर्म होता ही नहीं, प्रत्युत भोग होता है।
क्रियमाण-कर्मके फल-अंशके दो भेद हैं—दृष्ट और अदृष्ट। इनमेंसे दृष्टके भी दो भेद होते हैं—तात्कालिक और कालान्तरिक। भोजन करते समय तृप्ति होना ‘तात्कालिक’ फल है और परिणाममें शौच होना, बल बढ़ना आदि ‘कालान्तरिक’ फल हैं।
प्रश्न—प्रतिबन्धक* के रहते हुए कोई जीवन्मुक्त हो सकता है क्या?
स्वामीजी—तीव्र जिज्ञासा होनेपर प्रतिबन्धक मिट जाते हैं।
प्रश्न—क्या पुण्यकर्मों (प्रारब्ध)-के बिना भी सन्त मिल सकते हैं?
स्वामीजी—मिल सकते हैं। सन्त प्रारब्धसे भी मिलते हैं—‘पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता’, भगवत्कृपासे भी मिलते हैं—‘जब द्रवै दीनदयालु राघव साधु संगति पाइये’ और उत्कट अभिलाषासे भी मिलते हैं—‘जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू॥’ इनमें उत्कट अभिलाषा मुख्य है।
प्रश्न—चुप साधनमें उपेक्षा कौन करेगा?
स्वामीजी—उपेक्षा स्वयं करेगा, जो कर्ता है अर्थात् जिसमें कर्तृत्व है। सिद्ध होनेपर वह स्वभाव बन जायगा, उसका आग्रह नहीं रहेगा।
प्रश्न—उपेक्षा अथवा साक्षीका भाव रहेगा तो बुद्धिमें ही?
स्वामीजी—भाव तो बुद्धिमें रहेगा, पर उसका परिणाम स्वयं (स्वरूप)-में होगा; जैसे—युद्ध सेना करती है, पर विजय राजाकी होती है। उपेक्षा एवं उदासीनतासे जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद होता है।
प्रश्न—उपयुक्त वस्त्र रहते हुए भी ठण्ड सहनेका अभ्यास करनेसे अहंकार आयेगा कि नहीं?
स्वामीजी—‘मैं ठण्ड सह सकता हूँ’—इस तरह अपनी सामर्थ्यका अभिमान आ सकता है। तपस्यासे अभिमान आता है, कल्याण नहीं होता। तपस्या शक्ति पैदा करती है, कल्याण नहीं करती। अभ्यास भी अवस्था पैदा करता है, कल्याण नहीं करता।
प्रश्न—कभी सर्वात्मभाव, कभी साक्षीभाव, कभी सृष्टिके मिथ्या होनेका भाव स्वत: आता है, प्रयास नहीं करते। गलती कहाँ है?
स्वामीजी—पहलेके अभ्याससे ये संस्कार आते हैं। जब इनसे राग या द्वेष करते हैं, तब इनसे सम्बन्ध जुड़ जाता है—यही गलती होती है।
प्रश्न—आश्रम होनेसे विचार करना पड़ता है, पर चिन्ता या वासना नहीं व्यापती। गलती कहाँ है?
स्वामीजी—आश्रमकी व्यवस्थाका विचार करना तो स्वाँग है। अपना स्वाँग ठीक रीतिसे करना चाहिये।
प्रश्न—पूर्णरूपेण प्रभुको सर्वस्व अर्पण करनेके बाद संस्कारवश निषिद्ध कर्म हो सकता है क्या?
स्वामीजी—नहीं हो सकता।
प्रश्न—क्या भूलवश ऐसा अहंकार हो सकता है कि हमने प्रभुको सर्वस्व अर्पण कर दिया है?
स्वामीजी—नहीं हो सकता। यदि अहंकार होता है तो वास्तवमें पूर्ण समर्पण हुआ ही नहीं। वस्तुओंको भूलसे अपना माना था, वह भूल मिट गयी (अर्पण कर दिया) तो अभिमान कैसा?
प्रश्न—शास्त्रमें विधि-निषेधरूप धर्म बताया है। पूर्ण समर्पण करनेवालेको धर्म त्यागना पड़ेगा और धर्म त्यागते हैं तो शास्त्र छूट जायगा?
स्वामीजी—छूटेगा ही नहीं, प्रत्युत पूर्ण समर्पण करनेके बाद उससे नया शास्त्र बनेगा। शास्त्र छोड़नेमें दोष है, छूटनेमें कोई दोष नहीं। शास्त्र (शासन) साधकके लिये है, महापुरुषके लिये नहीं—‘आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते’ (गीता ३। १७)। ऐसे महापुरुषके लिये शास्त्र निवृत्त हो जाते हैं।
प्रश्न—जैसे किसीको मकान बेचनेपर उस घरमें रहनेवाले साँप, बिच्छू, छिपकली आदि भी उसके पास जायँगे, ऐसे ही सर्वस्व अर्पण करनेवालेके गुण-दोष भी अर्पित हो जायँगे?
स्वामीजी—अग्निमें जो भी डाला जाय, सब अग्निरूप हो जाता है। तभी गीतामें आया है—‘शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनै:’ (९। २८)। भगवान्ने भी कहा है—‘सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि’ (गीता १८। ६६)। पापोंसे मुक्त कर दूँगा, न कि पुण्योंसे?
प्रश्न—बिना अहंकारके निषिद्ध कर्म हो जाय और अहंकारसे शुभ कर्म हो जाय तो दोनोंमें क्या ठीक है?
स्वामीजी—अहंकाररहित होनेपर कोई कर्म लागू नहीं होता—‘यस्य नाहङ्कृतो भावो०’ (गीता १८। १७)। अहंकारके रहते हुए शुभ कर्म भी बन्धनकारक होता है।
प्रश्न—करनेमें पूरी सावधानी रखनेसे अहंकार नहीं आयेगा क्या?
स्वामीजी—अहंकार गया ही कहाँ, जो आ जायगा? करनेमें सावधान रहनेसे अहंकार मिटेगा। कर्मयोगमें अहंकार शुद्ध होता है, ज्ञानयोगमें अहंकार मिटता है और भक्तियोगमें अहंकार बदलता है—तीनोंका परिणाम एक ही होगा कि अहंकार नहीं रहेगा।
अहंकार आये तो ‘मैं सावधानी रखता हूँ’—इसका भी आ जायगा! ‘मैं त्यागी हूँ’—इसका भी अहंकार आ जायगा!
प्रश्न—गीतामें आया है—‘सदसच्चाहम्’ (९। १९), ‘न सत्तन्नासदुच्यते’ (१३। १२) आदि। पूर्ण सत्य क्या है?
स्वामीजी—भक्तिकी दृष्टिसे कहा है—‘सदसच्चाहम्’ (सत् भी मैं हूँ और असत् भी मैं हूँ)। ज्ञानकी दृष्टिसे कहा है—‘न सत्तन्नासदुच्यते’ (उसे न सत् कहा जा सकता है, न असत् )। सभी बातें ठीक हैं। सबका तात्पर्य यही है कि एक परमात्मा ही हैं, असत् है ही नहीं।
प्रश्न—नामकी शक्ति तो सभी युगोंमें है, फिर चैतन्य महाप्रभुके इस कथनका क्या तात्पर्य है कि भगवान्ने कलियुगमें अपने नाममें सब शक्ति भर दी?
स्वामीजी—उनके कथनका तात्पर्य है कि कलियुगमें केवल नाम-जपसे ही सब हो जायगा।
प्रश्न—रामायणके काकभुशुण्डिजी भक्तिको सर्वोपरि कहते हैं और योगवासिष्ठके काकभुशुण्डिजी ज्ञानको सर्वोपरि कहते हैं, हम किसको मानें?
स्वामीजी—गहरा विचार करें तो तत्त्व एक ही है। दोनोंमें कोई फर्क नहीं है, केवल दृष्टिकोण(साधन-दृष्टि)-का भेद है—‘भगतिहि ग्यानहि नहिं कछु भेदा। उभय हरहिं भव संभव खेदा॥’ (मानस, उत्तर० ११५। ७)
‘प्रेम भगति जल बिनु रघुराई०’—प्रेमके बिना ज्ञान रूखा, कठोर होता है। प्रेमके बिना ज्ञान शून्यतामें चला जाता है और ज्ञानके बिना प्रेम आसक्तिमें चला जाता है।
प्रश्न—जीवन्मुक्त यदि व्यवहारमें उतरे तो क्या अहंकार अनिवार्य है?
स्वामीजी—नहीं। उसके द्वारा अहंकाररहित ‘क्रिया’ होती है, अहंकारयुक्त ‘कर्म’ नहीं होता—‘क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे’ (मुण्डक० २। २। ८)।
प्रश्न—भगवान्के अवतारी शरीरको ‘मायाकृत’ कहा गया है; अत: अवतारी शरीर प्राकृत हुआ?
स्वामीजी—वह माया है—भगवान्की इच्छा—‘निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार’ (मानस, बाल० १९२), ‘अवतीर्णोऽसि भगवन् स्वेच्छोपात्तपृथग्वपु:’ (श्रीमद्भा० ११। ११। २८)।
अवतारी शरीर प्राकृत (पांचभौतिक) नहीं है—‘प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया’ (गीता ४। ६), ‘जन्म कर्म च मे दिव्यम्’ (गीता ४। ९), ‘चिदानंदमय देह तुम्हारी। बिगत बिकार जान अधिकारी॥’ (मानस, अयोध्या० १२७। ३)
प्रश्न—सगुण तो गुणोंमें है। त्रिगुणातीत केवल निर्गुण-निराकार है?
स्वामीजी—ऐसा नहीं है। श्रीमद्भागवतमें सगुणको भी ‘निर्गुण’ कहा गया है (११। २५। २५,२७)। सगुण उसे नहीं कहते, जिसमें सत्त्व-रज-तम गुण हैं, प्रत्युत उसे कहते हैं, जिसमें ऐश्वर्य, माधुर्य, सौन्दर्य, औदार्य आदि दिव्य गुण हैं। गुणोंके अनुसार क्रिया होती है, पर भगवान् गुणोंसे निर्लिप्त रहते हैं। इसलिये गीतामें गुणातीत महापुरुषके लिये भी यही बात कही है—
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव।
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति॥
‘हे पाण्डव! प्रकाश और प्रवृत्ति तथा मोह—ये सभी अच्छी तरहसे प्रवृत्त हो जायँ तो भी गुणातीत मनुष्य इनसे द्वेष नहीं करता और ये सभी निवृत्त हो जायँ तो इनकी इच्छा नहीं करता।’
सगुणमें अपरा नहीं है; किन्तु क्रिया अपराकी होती है।
प्रश्न—सगुण-साकार और सगुण-निराकार मायासे पार जानेमें ही सहायक हैं?
स्वामीजी—ठीक है, पर हम सगुण-साकार, सगुण-निराकार और निर्गुण-निराकार—तीनोंमें भेद नहीं मानते। एक ही तत्त्व इन तीन रूपोंमें है।
प्रश्न—शाण्डिल्यका भक्तिसूत्र वेदोंसे विशेष है या विरुद्ध?
स्वामीजी—भक्तिसूत्र वेदोंसे विरुद्ध नहीं है, प्रत्युत वेदोंसे विशेषता प्रकट करनेवाला है।
प्रश्न—लोकसंग्रह करें कि नहीं?
स्वामीजी—यदि आपको ज्यादा लोग जानते हैं, श्रेष्ठ मानते हैं तो लोकसंग्रह आपके लिये आवश्यक हो जाता है—‘लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि’ (गीता ३। २०)। हाँ, यदि ज्यादा लोग आपको न जानते हों तो अवधूत होकर रह सकते हैं।
वास्तवमें बोधवान् के लिये कोई विधि है ही नहीं। विधि साधकोंके लिये है। कई महात्मा लोगोंमें प्रसिद्ध होनेपर भी अवधूत होकर रहते हैं तो यह स्वभाव-भेदसे है।
प्रश्न—क्या ‘वासुदेव’ निर्गुण ब्रह्म है?
स्वामीजी—‘वासुदेव’ का अर्थ है—वसुदेवपुत्र श्रीकृष्ण, जो सगुण-साकार हैं और जो गीतामें कहते हैं—‘मया ततमिदं सर्वम्’ (९। ४) आदि।
प्रश्न—तैत्तिरीयमें तपसे ब्रह्मको जाननेकी बात आयी है, फिर तपसे शक्ति पैदा होती है, कल्याण नहीं होता—इसका तात्पर्य?
स्वामीजी—तपसे तत्त्वज्ञान परम्परासे हो सकता है, साक्षात् नहीं। वेदान्तमें ज्ञानप्राप्तिके आठ अंतरंग साधन बताये हैं—विवेक, वैराग्य, शमादि षट्सम्पत्ति, मुमुक्षुता, श्रवण, मनन, निदिध्यासन और तत्त्वपदार्थसंशोधन। तप अंतरंग साधन नहीं है, प्रत्युत बहिरंग साधन है।
‘ज्ञान’ को भी तप माना गया है, जिससे तत्त्वप्राप्ति होती है—‘बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागता:’ (गीता ४। १०)। शरीरकी तपस्यासे तत्त्वप्राप्ति नहीं होती।
प्रश्न—वेदोंमें, शास्त्रोंमें जगह-जगह विविधता, विपरीतता दीखती है, जिससे गलत धारणा बन सकती है?
स्वामीजी—गइराईसे विचार करना चाहिये कि कहाँ क्या कहा गया है और क्यों कहा गया है। शास्त्रोंका सिद्धान्त समझना मामूली बात नहीं है। गहराईसे विचार करें तो अनेकतामें एकता और एकतामें अनेकता दीखती है। गीतामें इस शास्त्रीय जालको साधकके लिये बाधक बताया गया है—‘श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला’ (२। ५३)।
प्रश्न—आपने कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोगको स्वतन्त्र साधन भी कहा है और यह भी कहा है कि कर्मयोग और ज्ञानयोग तो साधन हैं, पर भक्तियोग साध्य है—यह भेद किस दृष्टिसे है?
स्वामीजी—दोनों ही बातें ठीक हैं। यह साधककी इच्छापर है कि वह किसको माने। गहरा विचार करनेपर कर्मयोग और ज्ञानयोग (लौकिक निष्ठा) साधन सिद्ध होते हैं। गीता और भागवतमें भी ऐसा ही आया है।
प्रश्न—ज्ञानीको शाप-वरदान लगते हैं क्या?
स्वामीजी—शाप-वरदान अज्ञान होनेपर लगते हैं। बोध होनेपर जीवन्मुक्तको शाप-वरदान नहीं लगते। जैसे, नारदजीने भगवान्को शाप दिया तो भगवान्ने कहा—‘मम इच्छा कह दीनदयाला’ (मानस, बाल० १३८। २)। भगवान् श्रीकृष्णने उत्तंक ऋषिसे कहा कि तुम मुझे शाप दोगे तो मुझे तो शाप लगेगा नहीं, पर तुम्हारी तपस्या क्षीण हो जायगी (महा०, आश्व० ५३। २४—२६)।
प्रश्न—तत्-त्वम् का शोध करते हुए आचार्योंने ईश्वरकी उपाधि मानी है। जीवकी अविद्या उपाधि है। दोनों उपाधियाँ मिथ्या हैं। उपाधि मिटते ही न ईश्वर रहता है, न जीव, केवल ब्रह्म रह जाता है। फिर ब्रह्म समग्रके अन्तर्गत कैसे?
स्वामीजी—यह एक मतकी बात है। गीता इसे नहीं मानती। गीता जीवको ईश्वरका अंश मानती है—‘ममैवांशो जीवलोके’ (१५। ७)। अपने अद्वैत सिद्धान्तको पुष्ट करनेके लिये ही दूसरे सिद्धान्तको, ईश्वरको कल्पित कहा गया है। वास्तवमें ईश्वर कल्पित नहीं है।
प्रश्न—समग्र क्या है? समग्र तो मिथ्या है, फिर उसके अन्तर्गत ब्रह्म कैसे?
स्वामीजी—अपनी बात लोगोंको समझानेके लिये शब्दोंका सहारा लेना ही पड़ता है! हमें गीतासे ‘समग्र’ शब्द मिला। गीतामें भगवान्ने कहा है—‘असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु’ (७। १) अर्थात् तू मेरे समग्ररूपको नि:सन्देह जिस प्रकारसे जानेगा, उसको सुन। ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ (गीता ७। २९-३०)। इसी समग्ररूपके अन्तर्गत ब्रह्म है।
सगुण-साकार, सगुण-निराकार और निर्गुण-निराकारमें भेद नहीं है—यही समग्ररूप है। ‘ब्रह्म’ केवल निर्गुण-निराकार होता है, इसलिये उसके अन्तर्गत सगुण-साकार नहीं आ सकता। परन्तु समग्रके अन्तर्गत तीनों आ जाते हैं। श्रीमद्भागवतमें भी ब्रह्म (निर्गुण-निराकार), परमात्मा (सगुण-निराकार) और भगवान् (सगुण-साकार)—तीनोंको एक बताया है—
वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्।
ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते॥
(१। २। ११)
समग्र मिथ्या है—यह बात साधकके लिये है; क्योंकि जगत् को जीव ही धारण करता है—‘ययेदं धार्यते जगत्’ (गीता ७। ५)। जगत् जीव अथवा साधककी दृष्टिमें है, महात्मा या भगवान्की दृष्टिमें नहीं। मिथ्या इसलिये कहा है कि साधककी दृष्टि उधर न जाय। वास्तवमें एक चिन्मय तत्त्व ही है।
लोगोंको उसी भाषामें समझाया जाता है, जहाँ वे स्थित हैं। लोगोंकी दृष्टिमें ‘सर्वम्’ की सत्ता है, तभी कहना पड़ता है—‘वासुदेव: सर्वम्’, अन्यथा केवल ‘वासुदेव’ ही है, ‘सर्वम्’ है ही नहीं। ‘वासुदेव’ सच्चा है, ‘सर्वम्’ मिथ्या है। इसी तरह लोगोंकी बुद्धिमें ‘समग्र’ बैठा हुआ है, तभी हम कहते हैं कि परमात्मा समग्र हैं। असली तत्त्वमें शब्द नहीं है, प्रश्न और उत्तर भी नहीं है, प्रत्युत मौन है!
समग्र मिथ्या है—यह भी साधन है और समग्र परमात्मा है—यह भी साधन है। परन्तु समग्र (सब कुछ) परमात्मा है—यह साधन सब साधनोंसे तेज है।
द्वैतवाद, अद्वैतवाद, अजातवाद आदि सब साधन हैं, सिद्धान्त नहीं हैं। सिद्धान्त है—‘वासुदेव: सर्वम्।’ सिद्धान्तको न माननेसे ही आपसमें मतभेद होते हैं, खटपट होती है।
एक साधन-तत्त्व होता है, एक साध्य होता है। सब साधन मिलकर साधन-तत्त्व होता है। साध्य ‘समग्र’ है, जिसमें मतभेद नहीं है।
वेदान्तके ग्रन्थ ज्ञानयोगको मुख्य मानते हैं और कर्मयोग एवं भक्तियोगको सहायक साधन (मल-विक्षेप दोष दूर करनेवाले) मानते हैं। परन्तु गीता कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनोंको स्वतन्त्र साधन मानती है।
प्रश्न—जीव (अध्यात्म) मिथ्या है?
स्वामीजी—अद्वैत वेदान्त भी जीवको मिथ्या नहीं मानता, प्रत्युत जीवकी उपाधि (जीवपना)-को मिथ्या मानता है। यदि जीव मिथ्या है तो ब्रह्मानन्दका सुख कौन भोगेगा? मुक्ति किसकी होगी? मुक्ति होनेपर यदि जीव मिट जाय तो मुक्ति अर्थात् अपना विनाश कौन चाहेगा? अत: जीवपना मिथ्या है, जीव नहीं। जीव तो भगवान्का अंश है—‘ममैवांशो जीवलोके’ (गीता १५। ७)।
प्रश्न—आपने पुस्तकमें लिखा है कि परमात्माके सिवाय सृष्टिकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है?
स्वामीजी—ठीक बात है। इसमें शंका क्या है? पुन: उसे पढ़कर समझनेकी चेष्टा करनी चाहिये। बात मूलमें एक ही है, पर समझानेके अलग-अलग ढंग हैं।
उदाहरणके लिये—रस्सीमें साँप दीखनेसे जो लोग भयभीत हो जाते हैं, उनके लिये कहते हैं कि ‘साँप नहीं है, रस्सी है।’ परन्तु जो लोग भयभीत नहीं होते, उनके लिये केवल इतना ही कहते हैं कि ‘रस्सी है’। दोनों बातोंमें कोई फर्क नहीं है। इसी तरह जिनकी दृष्टिमें संसारकी सत्ता है, उन रागयुक्त साधकोंके लिये कहते हैं कि ‘संसारकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है, परमात्माकी ही सत्ता है’। परन्तु जिनकी दृष्टिमें संसारकी सत्ता नहीं है, उन वीतराग साधकोंके लिये ‘केवल परमात्मा हैं’ इतना ही कहना पड़ता है।
पहले भी कहा था, पुन: कहते हैं कि संसार मिथ्या है—यह साधककी धारणासे है; क्योंकि जड़ता (मिथ्यापना) हमारी ही बुद्धिमें है, वास्तवमें है नहीं। जगत् जीवकी दृष्टिमें है। साधककी दृष्टिमें ‘ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या’ है, पर सिद्धकी दृष्टिमें ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ है।
प्रश्न—अध्यारोप-अपवादको नहीं मानें, शुद्ध अजातवाद मानें?
स्वामीजी—संसार पहलेसे ही अध्यारोपित है, केवल अपवाद ही करना है। अत: अध्यारोप करना ही गलत है। अजातवादको मैं साधन मानता हूँ। यह केवल संसारकी आसक्ति मिटानेके काम आता है, यह सिद्धान्त नहीं है।