अच्छे बनो

अगर मनुष्य अपनी चीज (परमात्मा)-को अपनी मान ले, परायी चीज (शरीर-संसार)-को अपनी न माने तो बस, एकदम मुक्त हो जाय—इसमें किञ्चिन्मात्र भी सन्देह नहीं है। गीतामें जहाँ गुणातीत महापुरुषके लक्षण लिखे हैं, वहाँ ‘समदु:खसुख: स्वस्थ:’ (१४। २४) लिखा है, जो अपने-आपमें, अपनी जगह स्थित हो जाता है, वह सुख-दु:खमें सम हो जाता है, मुक्त हो जाता है, यह जो दूसरेसे आशा रखना है, यह महान् कायरता है, बड़ी भारी निर्बलता है। यह कायरता, निर्बलता अपनी बनायी हुई है, मूलमें है नहीं। आप अपनी जगह बैठें, अपनी चीजको अपनी मानें, परायी चीजको अपनी न मानें—इसमें निर्बलता, कठिनता क्या है?

दूसरे लोग मेरेको क्या कहेंगे, क्या समझेंगे—यह भय महान् अनर्थ करनेवाला है। इस भयको छोड़कर निधड़क हो जाना चाहिये। दूसरे खराब कहते हैं तो हम डरते हैं, तो क्या दूसरे खराब नहीं कहेंगे? वे तो जैसी मरजी होगी, वैसा कहेंगे। हम भयभीत हों तो भी वे वैसा ही कहेंगे और भयभीत न हों तो भी वे वैसा ही कहेंगे। उनके मनमें जैसी बात आयेगी, वैसा कहेंगे वे। क्या हमारे भयभीत होनेसे वे हमारेको अच्छा कहने लग जायँगे? यह सम्भव ही नहीं है। दूसरे क्या कहते हैं—इसको न देखकर अपनी बातपर डटे रहो, अपने कामपर ठीक रहो, यह बहुत बड़े लाभकी बात है।

अभी कल-परसोंकी बात होगी। एक प्रसंग चला तो मैंने कहा—आपके नि:शंक, निर्भय होनेमें एक ही बात है कि अगर आपको कोई खराब कहे तो आप अपनी दृष्टिसे अपनेको देखो कि मैंने तो कोई गलती नहीं की, न्यायविरुद्ध कोई काम नहीं किया। इस तरह अपनेपर जितना विश्वास कर सकें, दृढ़तासे जितना रह सकें उतना रह जाओ तो आपके सब भय मिट जायँगे। हमने जब कोई गलती नहीं की तो डर किस बातका? अपने आचरणपर, अपने भावपर आप दृढ़ रहो। इससे बड़ा भारी बल मिलता है। उनके सामने तो मैंने यह भी कहा कि इसको मैंने करके देखा है। आप भी करके देख लो। हम जब ठीक हैं, सच्चे हैं, तो फिर भय किस बातका? अपनेपर अपना विश्वास न होनेसे ही अनर्थ होते हैं। हम जब अपनी जगह बहुत ठीक हैं, हमारी नीयत ठीक है, कार्य ठीक है, विचार ठीक है, भाव ठीक है, तो फिर दूसरेसे कभी किञ्चिन्मात्र भी आशा मत रखो, इच्छा मत करो कि दूसरा हमें अच्छा समझे। दूसरेके बुरा समझनेसे भय मत करो। दूसरा कितना ही बुरा समझे, हम तो जैसे हैं, वैसा ही रहेंगे। अगर हम अच्छे नहीं हैं और सब लोग हमें अच्छा समझते हैं, तो क्या हमारा अच्छापन सिद्ध हो जायगा?

श्रोता—यदि अपनी गलती अपनेको नजर नहीं आये तो?

स्वामीजी—अपनी गलती अपनेको नजर नहीं आनेका कारण है—स्वार्थ और अभिमान। स्वार्थ और अभिमानसे ऐसा ढक्कन लग जाता है कि अपनी गलती अपनेको नहीं दीखती। अत: स्वार्थ और अभिमान न करें। स्वार्थ और अभिमानका त्याग करनेसे बहुत प्रकाश मिलेगा और अपनी गलती दीखने लग जायगी।

एक उपाय यह है कि अपनेमें जो अवगुण दीखे, उसको दूर करते जाओ। ऐसा करनेसे आपको न दीखनेवाले अवगुण भी दीखने लग जायँगे। अत: जिन अवगुणोंका आप सुगमतासे त्याग कर सकते हैं, उनका आप त्याग कर दें तो जिन अवगुणोंके त्यागमें आपको कठिनता दीखती है, उनका त्याग सुगमतासे होने लगेगा और न दीखनेवाले अवगुण दीखने लग जायँगे। यह बड़ा भारी रामबाण उपाय है, आप करके देखो।

सत्संगके द्वारा जिन-जिन कमजोरियोंका ज्ञान हो, उनमें जिन कमियोंको सुगमतासे दूर कर सकते हैं, उनको दूर कर दो। जैसे कल्पना करो कि हमारी झूठ बोलनेकी आदत है, तो जिस झूठसे हमारा कोई संसारका, रुपये-पैसोंका मतलब नहीं है, ऐसा झूठ नहीं बोलें। हम बिना मतलब झूठ बोलते हैं कि ‘अरे भाई! उठ जा, दोपहर हो गया, उठता ही नहीं।’ अगर हम सच्ची बात बोलें कि ‘सूर्योदय हो रहा है, उठ जा’ तो इसमें क्या हर्ज है? बिना मतलब झूठ बोलोगे तो आदत बिगड़ जायगी।

जो अवगुण साफ दीखता है, जिसको दूर करनेमें कोई परिश्रम नहीं, कोई हानि नहीं, उसको आप दूर कर दो तो अवगुण साफ-साफ दीखने लग जायँगे। अगर अपना अवगुण न दीखे तो उसकी चिन्ता मत करो और अवगुणको अपनेमें कायम भी मत करो, क्योंकि स्वरूपमें कोई अवगुण नहीं है। नीयत यह होनी चाहिये कि अपना अवगुण, अपनी कमी हमें रखनी नहीं है।

अगर आप अपनेको ही नहीं सुधार सकते, तो दूसरेको सुधार सकते हैं क्या? सच्ची बात तो यह है कि अपना सुधार कर लेनेपर भी दूसरेका सुधार कोई नहीं कर सकता। बड़े-बड़े महात्मा हुए हैं, आचार्य हुए हैं, वे भी दूसरेका सुधार नहीं कर सके, दूसरेको अपने समान नहीं बना सके। मैं आक्षेपसे नाम नहीं लेता हूँ, बहुत विशेष आदरसे नाम लेता हूँ कि शंकराचार्य महाराजने दूसरा शंकराचार्य बना दिया क्या? रामानुजाचार्य महाराजने दूसरा रामानुजाचार्य बना दिया क्या? वल्लभाचार्य महाराजने दूसरा वल्लभाचार्य बना दिया क्या? अगर शिष्य चाहे तो गुरुसे तेज हो सकता है, पर गुरु उसको वैसा नहीं बना सकता। इस बातपर आप विचार करें। अपनेको श्रेष्ठ बनाना तो हाथकी बात है, पर दूसरेको श्रेष्ठ बनाना हाथकी बात नहीं है।

जितने भी श्रेष्ठ गुरु हुए हैं, उनका उद्योग यही रहा है कि शिष्य हमारेसे भी अच्छा बने। वे शिष्यको अपनेसे नीचा नहीं रखना चाहते। जो शिष्यको अपना मातहत, अपने अधीन रखना चाहते हैं, वे वास्तवमें गुरु कहलाने लायक नहीं हैं। गुरु तो गुरु ही बनाता है, चेला नहीं बनाता। शास्त्रमें लिखा है—

सर्वतो जयमिच्छेत् पुत्रादिच्छेत् पराभवम्।

अर्थात् मनुष्य सब जगह अपनी विजय चाहे, पर पुत्रसे अपनी पराजय चाहे। ईमानदार पिताको यह इच्छा रखनी चाहिये कि मेरा पुत्र मेरेसे तेज हो जाय। ऐसे ही ईमानदार गुरुको यह इच्छा रखनी चाहिये कि मेरा शिष्य मेरेसे तेज हो जाय। परन्तु ऐसी इच्छा रखनेसे वह तेज नहीं हो जाता। हाँ, अगर वह (पुत्र या शिष्य) खुद चाहे तो वैसा हो सकता है, एकदम पक्की बात है। खेड़ापामें श्रीरामदासजी महाराज हुए। उनके शिष्य श्रीदयालजी महाराज हुए। खेड़ापाके बहुत-से ऐसे साधु हैं, जो श्रीदयालजी महाराजको जितना याद करते हैं, उतना श्रीरामदासजी महाराजको याद नहीं करते। खेड़ापाके ही नहीं और जगहके भी साधु श्रीदयालजी महाराजके ‘करुणासागर’ का पाठ करते हैं। आप जरा विचार करें, कितनी विलक्षण बात है! अगर आप अपने अवगुण देखकर उनको दूर करते जाओ तो आप अपने गुरुसे भी तेज हो जाओगे, इसमें किञ्चिन्मात्र भी सन्देह नहीं है। गुरुजनोंके मनमें यही बात रहती है कि हमारा शिष्य हमारेसे भी श्रेष्ठ बन जाय। जो अच्छे-अच्छे उपदेष्टा हुए हैं, अच्छे-अच्छे व्याख्यानदाता हुए हैं, सच्चे हृदयसे गुरु हुए हैं, उनकी भावना यही रहती है कि हमारा शिष्य सबसे श्रेष्ठ हो जाय। हमने ऐसे गुरुजन देखे हैं। हमारे विद्यागुरुजी महाराज थे। उनका हम सबके प्रति यह भाव रहता था कि ये श्रेष्ठ हो जायँ। हम लड़के लोग रात्रिमें दीपकके पास बैठकर पढ़ते थे। कभी नींद आने लगती तो वे खिड़कीमेंसे देख लेते और बोलते—‘‘अरे! यों क्या करते हो?’ हमें हरदम भय रहता कि महाराज देखते होंगे। वे चुपके-से आकर देखते और फिर बादमें पूछा करते कि ‘वहाँ कैसे खड़ा था? ऐसे कैसे करता था वहाँ?’ उनमें विद्यार्थियोंको पढ़ानेकी, तैयार करनेकी बड़ी लगन थी। मेरेको उन्होंने कई बार कहा कि मैं यह चाहता हूँ कि ‘कहीं कोई पंचायती पड़े, कोई शास्त्रीय उलझन पड़े तो उसमें हमारा शुकदेव निर्णायक बने। सभी इससे पूछें और यह निर्णय दे—ऐसा मैं देखना चाहता हूँ।’ यह भी कहा कि ‘मैं जैसा चाहता हूँ, वैसा बना नहीं सका।’ अत: जो अच्छे गुरुजन होते हैं, वे ऐसे ही होते हैं। माँ-बाप भी ऐसे ही होते हैं। वे चाहते हैं कि हमारा शिष्य, हमारा पुत्र हमारेसे भी तेज हो, पर वे बना नहीं सकते। शिष्य या पुत्र अगर चाहे तो उनसे तेज बन सकता है, इसमें बिलकुल सन्देह नहीं है। इसलिये गीतामें कहा गया है—

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।

आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन:॥

(६।५)

अर्थात् अपने-आपसे अपना उद्धार करना चाहिये। अपने-आपसे अपना पतन नहीं करना चाहिये। आप ही अपना बन्धु है और आप ही अपना शत्रु है। अत: आप अपनी जगह ठीक हो जाओ तो आप श्रेष्ठ बन जाओगे— इसमें संदेह नहीं है। लोग मेरेको अच्छा कहें—यह आशा मत रखो। कोई मेरेको बुरा न कह दे—यह भय बहुत ही पतन करनेवाला है। यह भय करोगे तो कभी ऊँचा नहीं उठ सकोगे। जो दूसरोंके सर्टिफिकेटपर निर्णय करता है, वह ऊँचा कैसे उठेगा? दूसरे सब-के-सब श्रेष्ठ कह दें—यह हाथकी बात नहीं है। जो अवगुण आपमें नहीं है, वह अवगुण लोग आपमें बतायेंगे—‘अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिता:’ (२।३६)। लोग तो न कहनेलायक बात भी कहेंगे। वे मनमें जानते हैं कि यह ऐसा नहीं है, फिर भी आपको चिढ़ानेके लिये, दु:खी करनेके लिये वैसी बात कहेंगे। आजकल जो वोट लेनेके लिये खड़े होते हैं, वे मनमें जानते हैं कि हमारे विपक्षमें जो आदमी खड़ा है, वह हमारेसे अच्छा है, पर ऐसा जानते हुए भी वे उसकी निन्दा ही करेंगे कि यह खराब है, हम अच्छे हैं। इसलिये आप अच्छे बनो, पर लोगोंसे यह आशा मत रखो कि वे आपको अच्छा कहें। वे आपको अच्छा जानते हुए भी अच्छा नहीं कहेंगे, बुरा कहेंगे। आपको अच्छा कहनेकी उनमें ताकत नहीं है। आप प्रतीक्षा करो कि लोग हमें अच्छा कहें—यह कितनी बड़ी भूल है! अच्छा कहलानेकी इच्छा छोड़ दो। अच्छा कहलाओ मत; अच्छे बनो।