अहंताका त्याग
जैसे हम सब परमात्माके साक्षात् अंश हैं—‘ममैवांश:,’ ‘ईस्वर अंस जीव अबिनासी’, ऐसे ही ये स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीर सब प्रकृतिके अंश हैं। प्रकृतिमें अपनेको बैठा देना और प्रकृतिको अपनेमें बैठा लेना—यह खास मूल बात है। हम आज शरीरके आरामको सुख क्यों मानते हैं? हमने अपनेको शरीरमें बैठा दिया। अपनेको शरीरमें बैठानेसे ‘अहंता’ पैदा होती है और शरीरको, संसारको अपनेमें बैठानेसे ‘ममता’ पैदा होती है यह खास समझनेकी बात है।
अपनेको शरीरमें बैठानेसे ‘शरीर मैं हूँ’—इस तरह शरीरके साथ अपनी अभिन्नता हो गयी, जो कि मानी हुई है; क्योंकि आप चेतन हैं और शरीर जड है। चेतनकी जड शरीरके साथ अभिन्नता हो ही कैसे सकती है? शरीर अलग है और आप अलग हैं। शरीर जाननेमें आता है और आप उसको जाननेवाले हैं। परन्तु अपनेको शरीरमें बैठानेसे शरीरकी मुख्यता हो गयी और अपनी बिलकुल गौणता हो गयी। अपनी गौणता होनेसे शरीरमें अहंभाव मुख्य हो गया, जडता मुख्य हो गयी। इसलिये पासमें जड चीजोंके होनेसे हम अपनी उन्नति मानते हैं। जिसके पास धन है, उसको बड़ा आदमी मानते हैं। शरीरकी जातिको ही बड़ा मानते हैं। मकान, जमीन, रुपया आदि भौतिक चीजोंकी जितनी अधिकता होती है, उतना ही अपनेको बड़ा मानते हैं। कारण कि मूलमें अपनी स्थिति शरीरमें कर ली। शरीरको अपनेसे बड़ा मान लिया, अपनेको शरीरके आश्रित मान लिया, शरीरके अधीन मान लिया तो इससे अहंता बढ़ेगी। शरीरका मान, आदर, सत्कार, पूजा होनेसे वह बड़ा राजी होता है; क्योंकि उसने शरीरमें ही अपनी स्थिति मान ली। शरीरके आदरको ही अपना आदर, शरीरके सुखको ही अपना सुख, शरीरकी महत्ताको ही अपनी महत्ता मान लेना बड़ी भारी गलती है। कारण कि शरीर तो क्षणभङ्गुर है, नाशवान् है, जड है, उससे हमारी महत्ता कैसे हुई?
वस्तुओंको अपनेमें रखनेसे ममता हो जाती है। शरीर, धन, जमीन, आदमी आदि मेरे हैं; क्योंकि इनको अपनेमें रख लिया। धन कहीं पड़ा हुआ है, पर उसको अपनेमें रख लिया कि मेरा धन है। बुद्धि, विद्या आदिको अपनेमें स्थित कर लिया कि मुझे इतना याद है, इतने शास्त्रोंका ज्ञान है। इतना मेरा कुटुम्ब है तो कुटुम्बमें ममता हो गयी।
इस प्रकार अपनेको जडतामें स्थापन करनेसे ‘अहंता’ और जडताको अपनेमें स्थापन करनेसे ‘ममता’ हो जाती है। दोनोंके घुलने-मिलनेको ‘अन्योन्याध्यास’ कहते हैं। शरीर सत्य दीखता है—यह अर्थाध्यास है और शरीर मैं हूँ—यह ज्ञानाध्यास है। जैसे रस्सीमें साँप दीखता है तो रस्सीमें अर्थाध्यास है और ‘साँप है’—ऐसा जो बोध होता है, यह ज्ञानाध्यास है। और भी कई अध्यास हैं। हम तो सीधी बात बताते हैं कि अपनेको शरीरमें रख दिया और शरीरको अपनेमें रख लिया—यह अन्योन्याध्यास है। अपनेको शरीरमें रखनेसे अहंता (मैं-पन) और शरीरको अपनेमें रखनेसे ममता (मेरापन) पैदा हो गयी।
शरीरमें मैं-पन और मेरा-पनका व्यवहार होता है। इन्द्रियोंमें भी मैं-पन और मेरा-पनका व्यवहार होता है। जैसे, इन्द्रियाँ मेरी हैं, आँख मेरी है, कान मेरा है, नाक मेरी है। आँख ठीक नहीं हो तो मैं काना हो गया, आँख नहीं है तो मैं अन्धा हो गया। अपनेको आँखमें रखनेसे मैं काना, अन्धा हो गया। संसारमें मैं-पनका व्यवहार कम होता है और मेरापनका व्यवहार मुख्य होता है। शरीरमें मैं-पनका व्यवहार मुख्य होता है और मेरा-पनका व्यवहार कम होता है। मन-बुद्धिमें मेरा-पनका भी व्यवहार होता है और मैं-पनका भी। अहंकारमें भी ममता होती है, पर वह ममता गौण दीखती है और अहंता मुख्य दीखती है। अहंकारको अपनेमें स्थापन किया है, इसलिये अहंकार मेरा दीखता है। मेरा अहंकार क्या है? कि अहंकारपर टक्कर लगी तो मेरेपर टक्कर लगी! यह बात बहुत सूक्ष्म है।
कर्मयोग मुख्यरूपसे ममताको मिटाता है और ज्ञानयोग मुख्यरूपसे अहंताको मिटाता है। ममता मिटनेसे अहंता और अहंता मिटनेसे ममता मिट जाती है। दोनों साथ-साथ मिटते हैं।
शरीर, इन्द्रियाँ, अन्त:करण, प्राण, मन, बुद्धि, विद्या, पद, योग्यता, अधिकार—ये सब घुल-मिलकर एक ‘मैं’ है। इस मिले हुए ‘मैं’ को ठीक-ठीक देखे तो ठीक ज्ञान हो जाता है अर्थात् शरीरादि पदार्थ मेरेसे अलग हैं, मेरा स्वरूप नहीं हैं—ऐसा दीखने लग जाता है। घुले-मिले ‘मैं’ को कुछ नहीं दीखता। वह तो बिलकुल अन्धा है!
गीतामें कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—इन तीनोंमें अहंता-ममताके त्यागकी बात आयी है; जैसे, कर्मयोगमें—
‘निर्ममो निरहङ्कार: स शान्तिमधिगच्छति।’
(२।७१)
ज्ञानयोगमें—
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्।
विमुच्य निर्मम: शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥
(१८।५३)
भक्तियोगमें—
‘निर्ममो निरहङ्कार: समदु:खसुख: क्षमी।
(१२।१३)
सन्तोंने इसको मैं-मेरीका त्याग कहा है। मैं-पन और मेरा-पनका त्याग ही वास्तवमें त्याग है। वस्तुओंको, पदार्थोंको छोड़कर चले जाना त्याग नहीं है। यह त्याग तो मरनेपर होता ही है! मरनेपर शरीर, घर आदि याद ही नहीं रहते। पहले जन्मकी कोई भी बात याद नहीं रहती। परन्तु यह त्याग नहीं है। यह तो केवल मैं-पन और मेरा-पनको बदल दिया, यहाँसे वहाँ रख दिया। जैसे,‘मैं गृहस्थ हूँ’—इसको उठाकर ‘मैं साधु हूँ’—इसमें रख दिया उसको। परन्तु बदलनेसे मुक्ति थोड़े ही हो जायगी! मुक्ति तो सम्बन्ध-विच्छेदसे होगी।
‘मैं-पन’ घुले-मिलेका नाम है। इस घुले-मिलेको दूर करनेकी सार बात बताता हूँ। मेरी एक धुन है कि सुगमतासे तत्त्वका बोध हो जाय! मैं-पन प्रकाशित होता है। मैं-पनका भान होता है। मैं-पनसे आप बिलकुल अलग हैं—यह बात सीधी बताता हूँ। वास्तवमें मैं-पन है नहीं। यदि अहङ्कार होता तो मनुष्य निरहङ्कार हो ही नहीं सकता। अत: अहङ्कार है ही नहीं। संसारमें मैं-पनके समान झूठा, असत्य कुछ है ही नहीं! संसारमें यदि कोई फालतू चीज है, महान् अनर्थ करनेवाली चीज है, तो वह है ‘मैं-पन’! अहंता सबसे फालतू, निकम्मी, महान् अनर्थ करनेवाली है। जैसे, व्यवहारमें रुपया सबसे रद्दी है। मैलेसे, पेशाबसे भी रद्दी है। ऐसे ही यह अहंता सबसे रद्दी है; और बिलकुल है ही नहीं। सूर्यमेंसे प्रकाश और उष्णताको कोई निकाल सकता है क्या? अग्निमेंसे गरमी और प्रकाशको कोई निकाल सकता है क्या? नहीं निकाल सकता। निकलती वही चीज है, जो दूसरी होती है। मनुष्य निर्मम और निरहङ्कार हो सकता है, इससे सिद्ध होता है कि वास्तवमें उसमें अहंता-ममता है नहीं। अत: मैं-पन और मेरा-पन केवल कल्पना है।
स्वरूप सच्चिदानन्दघन परमात्मा है और मेरा क्या है? ईश्वर। चेतनमें मैं-पन होगा तो मैं-पन उड़ जायगा और चेतन रह जायगा। ईश्वरमें मेरा-पन होगा तो मेरा-पन उड़ जायगा और ईश्वर रह जायगा। ज्ञानयोगकी दृष्टिसे मैं शुद्ध, बुद्ध, नित्य चेतन हूँ और भक्तियोगकी दृष्टिसे मेरे केवल भगवान् हैं—ऐसा मान ले तो यह अहंता-ममता उड़ानेकी बहुत बढ़िया प्रक्रिया है।
मेरे केवल भगवान् हैं और कोई मेरा नहीं है—‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।’ कुटुम्बी, शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण आदि कोई भी मेरा नहीं है। ‘भगवान् मेरे हैं’—इस बातको तो कई मान लेंगे, पर ‘दूसरा कोई मेरा नहीं है’—इस बातको नहीं मानेंगे। दूसरा कोई मेरा नहीं है—इस बातको नहीं माननेसे अनन्य भक्ति नहीं होती। महिमा जितनी है, वह सब अनन्य भक्तिकी ही है। भगवान् ने कहा है कि अनन्य भक्तोंके लिये मैं सुलभ हूँ—‘तस्याहं सुलभ:’ (गीता ८।१४) और उनका योगक्षेम मैं वहन करता हूँ—‘योगक्षेमं वहाम्यहम्’ (गीता ९।२२)।
मनुष्योंने भगवान् को घरका एक सदस्य मान रखा है। जैसे माँ-बाप हैं, भाई-बन्धु हैं, स्त्री-पुत्र हैं, ऐसे एक भगवान् भी हमारे हैं—इस तरह भगवान् को भी एक सदस्य मान रखा है। आज मनुष्य स्त्री-पुत्र-जितना भी भगवान् को अपना नहीं मानते। अगर परिवार भूल जाय, कोई मर जाय तो दु:ख होता है, पर भगवान् भूल जायँ तो कोई परवाह ही नहीं होती! भगवान् को तो साधारण चीज मान रखा है। कसौटी कसके देखो कि हम भगवान् का कितना आदर करते हैं, तब पता लगेगा। भगवन्नाम भूल गये तो कोई बात नहीं है, पर पाँच रुपये भी कहीं भूल गये तो खटकेगा। भगवान् को याद किये बिना समय बरबाद हो गया—यह खटकता ही नहीं! समय तो जितना मिला है, उससे एक क्षण भी ज्यादा नहीं मिलेगा, पर रुपया तो और भी मिल जायगा। समय तो सब खर्च हो रहा है और खर्च होनेपर मरना पड़ेगा। परन्तु रुपये सब खर्च हो जायँ तो मरना थोड़े ही पड़ेगा! समय आपके जीवनका आधार है, पर आपका इधर खयाल ही नहीं है! बेहोशीमें पड़े हैं। कितनी नीची वृत्ति हो गयी, हद हो गयी।