अखण्ड साधन
बात बड़ी सुन्दर पूछी है। ये जो दो प्रश्न आये हैं—एक तो अखण्ड साधन कैसे हो; दूसरा यह कि साधन, साध्य और साधकका क्या स्वरूप है, इनकी एकता कैसे हो? ये दोनों मिलकर एक ही प्रश्न है। एक प्रश्न आया कि मैं भगवान् का हूँ, भगवान् मेरे हैं—यह बात एक नयी-सी मालूम देती है, यह कैसे समझमें आये? ये दोनों ही प्रश्न एक ही ढंगके हैं और इनका एक ही उत्तर है।
वास्तवमें साधकको जो यह बात समझमें नहीं आ रही है कि ‘मैं भगवान् का हूँ’, भगवान् मेरे हैं’—इसका खास कारण है शरीरके साथ अपनी एकताका भाव दृढ़ है। यह एकताका भाव दृढ़ हो जानेसे ही यह समझमें नहीं आता कि ‘मैं भगवान् का हूँ, भगवान् मेरे हैं।’ वास्तवमें शरीरके साथ इसका सम्बन्ध है नहीं, यह केवल माना हुआ है—‘अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।’ मान्यता इतनी दृढ़ हो गयी कि सच्ची प्रतीत होने लगी। ठीक सच्ची प्रतीत होती है शरीरके साथ एकताका दृढ़ निश्चय हो जानेसे। किंतु जब ऐसी दृढ़ भावना हो जाय कि ‘मैं भगवान् का हूँ, भगवान् मेरे हैं’ तब वह बात नहीं ठहरती। वास्तवमें शरीरके साथ इसकी एकता है नहीं। और थोड़ा-सा विचार करें तो यह प्रत्यक्ष बात हरेकके अनुभवमें आ सकती है कि पहले हमारा इस शरीर और शरीरके सम्बन्धियोंके साथ सम्बन्ध नहीं था। आजसे ९० वर्ष पहले, १०० वर्ष पहले, इतने जो अपने बैठे हैं, इनमेंसे किसीका भी वर्तमान शरीरके साथ सम्बन्ध नहीं था, फिर इस शरीरके सम्बन्धियोंके साथ कब रहा? तथा आजसे १०० वर्ष बाद इन शरीरोंके साथ सम्बन्ध नहीं रहेगा, तब फिर शरीरके सम्बन्धियोंके साथ कैसे रहेगा? इस विचारसे हरेक भाई-बहनकी समझमें यह बात आ सकती है। दृढ़तासे समझ लें—‘आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा।’ सिद्धान्त है—जो आदि-अन्तमें नहीं रहता है, वह वर्तमानमें भी नहीं है और वर्तमानमें भी वही है जो आदि-अन्तमें था। इस शरीर और शरीरके सम्बन्धियोंके साथ सम्बन्ध पहले नहीं था और अन्तमें नहीं रहेगा, अत: अब भी नहीं है। जब शरीरके साथ हमारा सम्बन्ध नहीं है तो किसके साथ सम्बन्ध है? हमारा सम्बन्ध प्रभुके साथ है। वास्तवमें है ही भगवान् के साथ सच्चा सम्बन्ध। शरीर और कुटुम्बियोंके साथ तो सम्बन्ध माना हुआ है, किंतु प्रभुके साथ सम्बन्ध स्वत:सिद्ध है।
जो मान्यता होती है। उसमें मूल कारण होता है अनजानपना, और अनजानपना आता नहीं है, अनादि सिद्ध है यानी इसका आना नहीं होता, जाना तो हो सकता है। अभी कोई किसी भाईसे पूछे कि ‘तुम्हें फ्रेंच भाषा आती है?’ वह कहेगा—‘नहीं आती।’ फिर पूछे—कबसे? तो यह प्रश्न ही नहीं हो सकता। अनजानपना कबसे है यह प्रश्न नहीं बनता। इसलिये वेदान्तमें अज्ञानको अनादि माना है। अत: अज्ञान—अनजानपना अनादि है। फिर भी आप यह प्रश्न करें कि हम तो इसे जानना ही चाहते हैं—यह अनजानपना आया कहाँसे? इसका असली उत्तर तो हो गया, पर फिर भी पूछें तो यह उत्तर है कि ‘यह अनजानपना तभीसे आया, जबसे आपने, जो अपना नहीं है, उसको अपना माना।’ इसपर प्रश्न होता है कि जो अपना नहीं है उसको अपना क्यों माना? इसका एक तो कारण अज्ञान है, अत: यह मान्यता अज्ञानका कार्य है। दूसरी बात यह है कि ‘हमने माना तो था इसके तत्त्वको जाननेके लिये, पर उसे तो हम भूल गये और उसको अपना मानकर बैठ गये।’
जैसे भारतीय संस्कृतिके अनुसार द्विजातियोंके लिये यह विधान है कि पहले ब्रह्मचर्याश्रमका पालन करो, फिर गृहस्थ बनो। ब्रह्मचारी दो तरहके होते हैं—१-नैष्ठिक-ब्रह्मचारी, २-उपकुर्वाण। जो ब्रह्मचर्याश्रमसे ब्रह्मचर्याश्रममें ही रहें अथवा सीधे संन्यासाश्रममें चले जायँ—सदाके लिये अखण्ड ब्रह्मचारी बनें, वे नैष्ठिक-ब्रह्मचारी कहलाते हैं और जो ब्रह्मचर्याश्रमका यथावत् पालन करके उसकी समाप्ति-स्नान करके गृहस्थाश्रममें प्रविष्ट हों; फिर क्रमसे वानप्रस्थाश्रम और संन्यासाश्रममें जायँ, वे कहलाते हैं— उपकुर्वाण ब्रह्मचारी। ये दो भेद क्यों हुए? ये दो भेद इसलिये हुए कि मानव-शरीर मिला है परमात्माकी प्राप्तिके लिये और जो परमात्माकी प्राप्ति चाहता है, उसको संसारका त्याग करना पड़ता है। संसार-त्यागकी बात सुनकर हम डर जाते हैं। पर संसारके त्यागका अर्थ यह नहीं है कि हम यहाँसे भागकर चले जायँ। जंगलमें ही चले गये, तो क्या जंगल संसार नहीं है? और जिस शरीरको लेकर जाते हैं वह शरीर क्या संसार नहीं है? संसारके त्यागका मतलब है शरीर, इन्द्रियाँ, अन्त:करण, मन, बुद्धि, प्राण आदि पदार्थोंमें अहंता-ममताका त्याग। यही संसारका त्याग है। परमात्माकी प्राप्ति चाहते हो तो संसारका त्याग करना पड़ेगा अर्थात् सांसारिक वस्तुओंके साथ अहंता-ममता नहीं रख सकोगे। अहंता-ममता रखोगे तो परमात्माकी प्राप्ति नहीं होगी—यह निश्चित बात है। जब हम त्याग करते हैं तब हमारे मार्गमें बाधा देनेवाली है भोगोंकी रागवृत्ति, संग्रह और सुखकी आसक्ति। सांसारिक सुख लेने, भोगोंका सुख लेने, संग्रहका सुख लेनेकी आसक्ति ही त्यागमें बाधक होती है। ब्रह्मचर्याश्रममें ऐसा विचार किया जाय कि इसका त्याग करके परमात्माकी ओर चलना है तो विचारद्वारा, विवेकद्वारा, शास्त्रद्वारा, उपदेशद्वारा हम इनको छोड़ना चाहते हैं, पर कैसी जबरदस्ती हो रही है कि छूटती नहीं है, किसी तरह छोड़ सकते ही नहीं। तब कहा कि ‘तुम अब गृहस्थाश्रममें जाओ, इसे देखो—पदार्थ क्या हैं और कैसे हैं? किन्तु जब हम विचारके द्वारा इनको छोड़नेमें समर्थ हो जाते हैं तब कहते हैं—‘तुम नैष्ठिक-ब्रह्मचारी बन जाओ।’ तो ये दो पथ वहाँसे इसलिये हुए कि अधिकारी दो तरहके हैं। गृहस्थाश्रमका धारण करना किसलिये हुआ? विचारद्वारा जिस भोगासक्तिका हम नाश न कर सके, उसका ज्ञान करके, उसे जानकर, समझकर, भोगकर उसका तत्त्व समझमें आ जाय तब उसका त्याग कर दें इसलिये। निष्कर्ष यह कि गृहस्थाश्रमको धारण करना त्यागके लिये होता था, न कि रागके लिये—सदा फँसनेके लिये। यह राग करना हमारी संस्कृति ही नहीं है।
जैसे यह सिद्ध हो गया कि गृहस्थाश्रममें हम क्यों प्रविष्ट हुए? त्यागके लिये, वैसे ही अज्ञानसे हमने यह सम्बन्ध क्यों जोड़ा? त्यागके लिये। इसीलिये इसे अपना माना। त्याग पहले क्यों नहीं हुआ? त्याग कर नहीं सके। अत: गृहस्थाश्रमको अपनाया। गृहस्थाश्रमको अपनाकर क्या करें? गृहस्थाश्रमको अपनाकर शास्त्रीय रीतिके अनुसार उसका पालन करें। शास्त्रीय रीति साथमें लाते ही भोगोंमें सीमितपना आ जायगा। देश-काल-वस्तु सब सीमित हो जायगी और सीमित होकर उसके नियम भी हो जायँगे कि ऐसे-ऐसे भोगो। अत: सीमित पदार्थोंके साथ सम्बन्ध और नियमपूर्वक भोगनेका सम्बन्ध—ये दो बातें रहेंगी। इसीको धर्म कहते हैं यानी धर्मके अनुसार गृहस्थाश्रमका पालन करो। फिर क्या होगा? उच्छृङ्खल भोग नहीं भोग सकते। इससे एक तो हमारा जीवन नियमित हो जायगा और दूसरी उसमें एक विलक्षण बात और हो जायगी कि हमारा उद्देश्य त्यागका रहेगा। ये दो चीजें साथ होनेसे वैराग्य अवश्य होगा ही—
धर्म ते बिरति जोग ते ग्याना।
ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना॥
धर्म ते बिरति—‘एक स्त्रीके साथ विवाह करो’ तो सीमित हुआ न? एक गृहस्थमें रहो, एक परिवारमें रहो, एक घरमें रहो, यह तुम्हारा और यह तुम्हारा नहीं। तो यह तुम्हारा भी अपना कैसे है? जब सारा संसार एक है तो एक घर आपका कैसे? एक परिवार आपका कैसे? उतने ही रुपये आपके कैसे? यह समष्टि पदार्थोंमेंसे नमूना आपको दे दिया गया कि इस नमूनेके साथ न्याययुक्त बर्ताव करते हुए, सबका पालन-पोषण करते हुए आप इनके सुखोंको लें और भोगें। भोगकर देखें इसका नमूना। किसलिये? त्यागके लिये। तो स्वत: आपके त्याग होगा। धर्मका अनुष्ठान करनेसे वैराग्य होता ही है, होता ही है। भागवतमें लिखा है—
धर्म: स्वानुष्ठित: पुंसां विष्वक्सेनकथासु य:।
नोत्पादयेद् यदि रतिं श्रम एव हि केवलम्॥
धर्मका अच्छी तरह अनुष्ठान किया जाय और भगवान् के चरणोंमें यदि प्रीति उत्पन्न नहीं हुई तो धर्मका अनुष्ठान नहीं हुआ, केवल परिश्रम हुआ, परिश्रम—‘श्रम एवं हि केवलम्।’ यह नियम है कि धर्मपूर्वक विषयोंका सेवन करनेसे वैराग्य होता है। सोचिये, धर्मपूर्वक सेवन करता है किस उद्देश्यसे? रागको मिटानेके उद्देश्यसे। जब रागकी प्रबलता होती है तब मनुष्य धर्म-कर्म नहीं देखता; फिर तो रागपूर्वक विषय-सेवन करता है। उस विषय-सेवनसे तो विषयका राग बढ़ेगा ही, वैराग्य नहीं होगा। आज बूढ़े हो जानेपर भी वैराग्य नहीं होता। कारण क्या है? भोग भोगनेके लिये भोग भोगते हैं। रागपूर्वक भोग भोगते हैं। सुख लेनेके लिये भोग भोगते हैं। इससे वैराग्य ब्रह्माजीकी आयु समाप्त हो जायगी तब भी नहीं होगा। और उद्देश्य यदि इनके तत्त्वको जानकर त्यागका है तो नियमपूर्वक विषयोंको भोगनेसे अरुचि हो जाती है। अत: हम देख लें। संतोंने कहा है—
गुल सोर बबूला आग हवा सब कीचड़ पानी मिट्टी है।
हम देख चुके इस दुनियाको सब धोखेकी-सी टट्टी है॥
तथा—
चाख चाख सब छाँड़िया माया रस खारा हो।
नाम सुधा रस पीजिए छिन बारंबारा हो॥
लगे हमें राम पियारा हो॥
अत: ‘चाख चाख सब छाँड़िया माया रस खारा हो’—जब यह कड़वा लगेगा तब स्वत: छूटेगा।
हमने जो शरीरके साथ सम्बन्ध जोड़ा था, वह जैसे गृहस्थाश्रमी पुरुष अपनी एक पत्नीके साथ सम्बन्ध जोड़ते हैं, वैसे ही जोड़ा था त्यागके लिये। किंतु उसको भूल गये। इसका नाम है अज्ञान—मूर्खता।
अतएव अब इसे याद कर लें कि ‘हमने इसके साथ सम्बन्ध जोड़ा है केवल त्याग करनेके लिये।’ त्याग करनेके लिये ही परीक्षा करना है और देखकर छोड़ देना है जिससे आगे चलकर हमारा मन कभी न चले। शरीरके साथ अपनापन माना हुआ है। यदि इसको हमने नहीं छोड़ा, यह हमसे नहीं छूटा तो इसके तत्त्वको जान लें। जब आप इसके तत्त्वको जान लेंगे तब इसके साथ सम्बन्ध रहेगा नहीं।
इसीलिये भगवान् ने कृपा करके संसारकी ऐसी सुन्दर रचना की है कि कोई वस्तु कभी भी एकरूप नहीं रहती। यह भगवान् क्रियात्मक उपदेश दे रहे हैं जीवोंको कि जिसके साथ तुम सम्बन्ध जोड़ोगे वह उस रूपमें नहीं रहेगा। यह एक बात विनोदसे कह देते हैं कि भगवान् के और जीवके बीचमें एक हठ हो गया है। जीव तो कहता है—मैं सम्बन्ध जोड़ूँगा। भगवान् कहते हैं—बच्चू! मैं सम्बन्ध तोड़ूँगा। जीव कहता है—मैं बच्चा हूँ। भगवान् कहते हैं—बचपनको नहीं रहने दूँगा। वह कहता है—मैं जवान हूँ। भगवान् कहते हैं—इसे भी नहीं रहने दूँगा। जीव कहता है—यह इतना मेरा परिवार है। भगवान् कहते हैं—इसे भी नहीं रहने दूँगा। जीव कहता है—इतना धन मेरे पास है। भगवान् कहते हैं—यह भी नहीं रहने दूँगा। वह कहता है—मैं बड़ा स्वस्थ हूँ। वे कहते हैं—नहीं रहने दूँगा। वह कहता है—मैं बीमार हूँ। वे कहते हैं—इसे भी नहीं रहने दूँगा। भगवान् कहते हैं—‘जिनके साथ तू सम्बन्ध जोड़ेगा, मैं उन सबका सम्बन्ध-विच्छेद करता रहूँगा। तू जोड़ता जायगा तो मैं तोड़ता जाऊँगा।’
यहाँ सम्बन्ध तोड़नेका अर्थ क्या है—आगे नया सम्बन्ध न जोड़ना, तब पुराना सम्बन्ध अपने-आप टूट जायगा, क्योंकि वह तो छूटनेहीवाला है—
अंतहु तोहिं तजैंगे पामर! तू न तजै अबही ते॥
मन पछितैहै अवसर बीते।
अत: इसका तत्त्व जाननेके लिये ही सम्बन्ध जोड़ा है, न कि सम्बन्ध रखनेके लिये।
और तो क्या कहें; आप जिनको संत, महात्मा, विरक्त, त्यागी, अच्छे पुरुष मानते हैं, उनके साथ भी सम्बन्ध जोड़ना वास्तवमें सम्बन्ध तोड़नेके लिये है। यह बात कड़वी लगती है, पर बात यही है। गृहस्थाश्रम छोड़कर साधु बन गये और गुरुजीके साथ सम्बन्ध जोड़ा। गुरुजीके साथ सम्बन्ध रखनेके लिये थोड़े ही जोड़ा है। गुरुजी बता देंगे कि ‘भाई! तुम्हारा सम्बन्ध सदा रहनेवाले असली स्वरूपके साथ है। इन सबके साथ सम्बन्ध रहनेवाला नहीं है। अत: सबसे सम्बन्ध तोड़नेके लिये ही इनसे सम्बन्ध जोड़ना है, न कि इनके साथ ही मर मिटना है। इस जोड़े हुए सम्बन्धको नित्य मान लेते हैं, यही गलती है। हमने जो शरीरके साथ सम्बन्ध मान लिया, इसीसे यह गलती हुई है। तो अब हम क्या करें?
‘शरीर मैं हूँ’—यह भाव होनेसे ही ‘मैं भगवान् का हूँ, भगवान् मेरे हैं’ यह बात समझमें नहीं आती। समझमें न आनेमें कारण शरीरके साथ तादात्म्य सम्बन्ध रहता है।
जीव वास्तवमें परमात्माका है और परमात्मा जीवके हैं—यह इसका असली सम्बन्ध है। इसलिये जो अच्छे संत-महात्मा होते हैं, वे यही उद्देश्य रखते हैं, यही उपदेश देते हैं कि ‘तुम परमात्माके हो और परमात्मा तुम्हारे हैं। तुम यह शरीर नहीं हो।’
जबतक शरीरके साथ ‘मैं’ पन बना हुआ है, तबतक साधन अखण्ड नहीं होगा। यह प्रश्न था कि ‘अखण्ड साधन कैसे हो?’ जबतक आपका इस शरीरमें मैंपन और मेरापन है, तबतक साधन अखण्ड नहीं होगा। जरा ध्यान दें, अखण्ड क्या होता है और खण्ड क्या होता है? जो मैंपन है, वह अखण्ड होता है। आपको कभी भी पूछा जाय, यही उत्तर होगा—मैं हूँ। इसको आप चाहे याद रखें, या बिलकुल गाढ़ नींद आ जाय, चाहे व्यवहारमें बिलकुल भूल जायँ, परन्तु मैं अमुक वर्णका, अमुक आश्रमका हूँ, यह आपको बिना याद किये भी याद है, बिना स्मृतिके भी यह स्मरण है। आपको याद ही नहीं, होश ही नहीं कि किस काममें लगे हैं, पर जहाँ जरा सावधान हुए, वहाँ ‘मैं हूँ’ यह भाव है। फिर वही नाम, वही गाँव, वही वर्ण, वही आश्रम और अपनी वैसी-की-वैसी स्थिति दिखलायी पड़ेगी, स्वप्नमें भी। इसलिये ‘मैं’-के साथ जोड़ा हुआ सम्बन्ध अखण्ड होता है। ‘मैं’-का सम्बन्ध भगवान् के साथ न जोड़कर संसारके साथ जोड़े रखते हैं और भजन करना चाहते हैं अखण्ड। असम्भव बात है। चाहे इस कान सुनें, चाहे उस कान। आप मानें या न मानें। प्रमाण मिले चाहे न मिले। हमें तो भाई! संदेह है नहीं। आपको संदेह हो तो आप भले ही न मानें। आपसे हमारा कोई आग्रह नहीं।
वर्षोंतक सत्सङ्ग-भजन करते हुए भी निरन्तर भजन नहीं होता—इसके अनेक कारणोंमें बहुत मुख्य और बड़ा कारण है कि आपने अहंताके साथ साधनका सम्बन्ध नहीं जोड़ा है। साधन तो करते हैं और संसारका चिन्तन होता है। जो होता है वह असली है और जो करते हैं वह होता है नकली। असली होगा वही अखण्ड होगा। नकली अखण्ड कैसे होगा? नकल करेंगे, छूट जायगी; फिर होगी, फिर छूट जायगी। तो हम क्या करें! यदि अखण्ड साधन करना चाहते हैं तो ‘मैं भगवान् का हूँ’ इस बातको समझें, चाहे मान लें। प्रभुके साथ सम्बन्ध जुड़नेसे आपपर जिम्मेवारी आ जाती है कि अब और करना ही क्या है, साधन ही करना है। मैंने उस दिन कहा था न कि ‘साधन ही करना है, साधन भी करना है, यह नहीं।’ हमारे भाई-बहन साधन भी करते हैं। यह भी कर लो, घंटा-दो-घंटा समय लगा दो, बारह महीनेमें दो-चार महीने लगा दो, यह भी कर लो और घरका काम तो करना ही है। वह तो ‘ही’ है और यह ‘भी’ है। यह मिटेगी नहीं, इस तरह जबतक आप संसारके साथ सम्बन्ध मानते हैं; तबतक वह सम्बन्ध संसारसे ही रहेगा।
विचार करके देखें तो संसारका सम्बन्ध था नहीं और रहेगा नहीं। मैंने जो संसारका सम्बन्ध बतलाया, यह तो मैं स्थूल रीतिसे कहता हूँ। सूक्ष्म रीतिसे देखें तो बिलकुल सम्बन्ध है ही नहीं, एक क्षण भी सम्बन्ध नहीं है। जैसे गङ्गाजीका यह जल बहता हुआ एक क्षण भी स्थिर नहीं है, परंतु स्थूल दृष्टिसे देखें तो कहते हैं, कलसे इसी सीढ़ीपर जल चल रहा है, जैसा कल था वैसा ही आज है, उतनेहीपर चल रहा है, वही है और सूक्ष्म रीतिसे एक क्षण भी वह जल वहाँ नहीं है, जहाँ कल था या एक क्षण पूर्व था। यदि एक क्षणके बाद उसी जगह वह स्थिर रहे तो सदाके लिये ही स्थिर रहना चाहिये; किंतु एक क्षण भी स्थिर कहाँ? इसी प्रकार ये शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण एक क्षण भी स्थिर नहीं हैं। क्योंकि—
क्षणपरिणामिनो भावा ऋते चितिशक्ते:
उस चेतनशक्तिके सिवा सब क्षणपरिणामी हैं। क्षणपरिणामीके साथ आपने अपना अपनापन कर लिया, इसीसे अपना अपनापन आपको दिखलायी नहीं देता है। तब यह कैसे समझमें आये कि ‘मैं भगवान् का हूँ, भगवान् मेरे हैं।’ वस्तुत: हैं ही भगवान् अपने और अपना कोई है ही नहीं। गहराईमें उतरकर देखें, कोई अपना नहीं है। अरे! शरीर ही अपना नहीं, तो दूसरा अपना कैसे रहेगा? और शरीरसे सम्बन्ध जोड़नेसे ही वह अपना कैसे?
इसपर यदि कहते हैं—अब क्या करें? अपनापन दृढ़तासे दिखलायी दे रहा है इसे कैसे हटायें, तो इसके लिये एक बड़ी ही सरल और बहुत बढ़िया युक्ति है। इसे बहन-भाई, छोटा-बड़ा, पढ़-अनपढ़ हरेक कर सकता है। वह क्या है? साधकका एक जीवन है। इस जीवनके दो विभाग (बँटवारा) कर लेने चाहिये। एक तो असली, दूसरा नकली। यह मान लेना चाहिये कि एक असली है, एक नकली है। जैसे स्वाँग खेलनेवाला जिस स्वाँगको पहनता है उसको नकली मानता है, असली नहीं मानता। और स्वयं जो मैंपन होता है उसको असली मानता है, नकली नहीं। इसी तरह हमलोगोंने जो शरीर धारण किये हैं—यह हमारा स्वरूप असली नहीं है। यह स्वाँग है और हम स्वाँग धारण करनेवाले हैं—इनके साथ मैं-मेरापन करनेवाले हैं। अत: हम तो हुए भगवान् के और स्वाँग लिया संसारका। आज बात उलटी हो रही है—हम हैं संसारके और स्वाँग करते हैं भगवद्भजनका। अत: स्वाँग करके जो भजन करते हैं वह भजन दृढ़—अखण्ड कभी होगा ही नहीं, होगा ही नहीं, होगा ही नहीं। स्वाँग अखण्ड कैसे होगा? स्वाँग तो खेलके समय रहेगा, बादमें नहीं रहेगा। तो इसका हमें परिवर्तन करना होगा, इसे बदलना होगा कि ‘मैं भगवान् का हूँ, भगवान् मेरे हैं।’ इस शरीरसे पहले भी मैं शरीर नहीं था और शरीर मेरा नहीं था एवं इसके बाद भी यह मैं-मेरा नहीं रहेगा, किंतु यह स्वयं रहेगा। इसलिये इसको भगवान् का मानो तो भगवान् का है। भगवान् का न मानो तो अपना-आप है।
आप जो बालक बने थे वही आज बूढ़े बने हैं। आपका शरीर वह नहीं, संग वह नहीं, गिरोह वह नहीं, वेष वह नहीं, समय वह नहीं, अवस्था और वर्ष भी वह नहीं, फिर भी आप कहें कि मैं वही हूँ—बड़े भारी आश्चर्यकी बात है! सबका अनुभव है, परंतु कोई ध्यान नहीं देता। वस्तुत: यह मैं नहीं हूँ, मैं तो मैं हूँ, वह अखण्ड हूँ, क्योंकि मैं जो बालकपनमें था वही आज हूँ। कोई पूछे—सामग्री आपकी कौन-सी वही है? बुद्धि, विचार, लक्ष्य, उद्देश्य, कोई-सा भी वह नहीं है, किंतु आप वही हैं। शरीर वह नहीं, परिस्थिति वह नहीं, देशकाल वह नहीं, गिरोह वह नहीं, वस्तुएँ वे नहीं, अवस्था वह नहीं, आपका ध्येय वह नहीं, विद्या-विचार वह नहीं। जब ये सब बदल गये तो आपका सम्बन्ध इनसे कैसे?
यह तो सब स्वाँग है। आप इन सबको जाननेवाले अलग हैं। वह जो जाननेवाले आप हैं, वही भगवान् के हैं। यह सब तो संसारकी चीजें हैं। स्वाँग खेलनेवालेको स्वाँग कम्पनीसे मिलता है, पोशाक कम्पनीसे मिलती है और वहाँ जो स्टेज—रंगमंच होता है, वह भी कम्पनीका ही होता है। उसीके स्वाँगसे उसीके रंगमंचपर उसीकी प्रसन्नताके लिये और दर्शकोंकी प्रसन्नताके लिये स्वाँग खेलते हैं। दर्शकोंकी प्रसन्नता भी मालिककी प्रसन्नताके लिये ही होती है। दर्शक प्रसन्न न हों तो मालिकसे इनाम न मिले। इसी तरह आपने जो स्वाँग धारण किये हैं, उन स्वाँगोंके अनुसार बढ़िया-से-बढ़िया काम करना है, पर स्वाँग मानकर करना है। इसीका नाम है धर्मका अनुष्ठान।
स्वाँगके अनुसार खेलनेके लिये एक पुस्तक होती है, पुस्तकोंसे यह सिखाया जाता है कि इतने शब्द आप बोलें, इतने वे बोलें। वैसे ही हमारी पुस्तकोंमें लिखा है कि गृहस्थको यह करना चाहिये, पुरुषको ऐसा करना चाहिये, स्त्रीको ऐसा करना चाहिये, पुत्रको ऐसा करना चाहिये। और यह सब स्वाँग करना है केवल जनताकी प्रसन्नताके लिये। सब लोग कहें—‘गृहस्थाश्रम बड़ा उपयोगी है। वाह, वाह, वाह,’—इस प्रकार ठीक तरहसे उसे करना है, पर वाह-वाह लेनेकी भावनासे नहीं करना है। केवल अपनी आसक्ति मिटानेके लिये, स्वाँगके अनुसार प्रभुकी आज्ञाका पालन करनेके लिये; किंतु इसे सच्चा न माने। इसका नाम कर्मयोग है।
इस तरहसे किया जाय तो स्वत: आसक्ति मिटती है और स्वाभाविक ही राग मिटता है। इसीलिये कहा गया है—‘धर्म ते बिरति’ धर्मका अनुष्ठान करनेसे वैराग्य होता ही है। धर्मको छोड़कर आसक्तिसे विषयोंका सेवन करेंगे तो विषय-सेवनसे कभी वैराग्य हो सकता ही नहीं, सम्भव ही नहीं। अत: उद्देश्य वैराग्यका हो और नियम भी वही रहे। स्वाँगके अनुसार कार्य बढ़िया-से-बढ़िया करना है, पर मानना है उसे स्वाँग। स्वाँगमें कमी आ जाय तो गड़बड़ी और स्वाँगको सच्चा माने तो गड़बड़ी। इसलिये पालन करनेमें कमी आवे नहीं और सच्चा माने नहीं। इससे क्या होगा? जैसे स्वाँग पहनकर पैसे कमाये जायँगे, वे भी जायँगे आपके घरमें और स्वाँगरहित हो आप काम करेंगे वे पैसे भी जायँगे आपके घरमें। ये दोनों पैसे ही आपके घरमें जायँगे। वैसे ही आप एकान्तमें बैठकर भजन-ध्यान कर रहे हैं तो अब स्वाँग नहीं, अब तो अपने भगवान् की उपासना कर रहे हैं और गृहस्थ बनकर काम कर रहे हैं तो यह संसारमें स्वाँग खेल रहे हैं। पर दोनोंका मतलब भजनसे होगा। इससे भगवान् के यहाँ ही दोनोंकी भर्ती होगी और भजन अखण्ड होगा। यदि भजन-ध्यान, कीर्तन-सत्सङ्ग तो हुआ भगवान् का भजन, उधर और व्यवहार—व्यापार हुआ हमारा काम इधर तो यह अखण्ड भजन नहीं होगा। सब काम भगवान् का हो।
तदर्थं कर्म कौन्तेय..........................॥
(गीता ३। ९)
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिमवाप्स्यसि॥
(गीता १२।१०)
भगवान् के लिये कर्म करते हैं, प्रभुका ही काम करते हैं तो भजन होगा सभी ओर तथा जहाँ काम छूटेगा, भगवान् में मन लगेगा। जैसे रुपयोंके लिये व्यापार करता है तो जहाँ दूकान बंद किया कि चट रुपयोंका चिन्तन होता है, रुपयोंका विचार होता है, रुपयोंकी गिनती होती है। दूकान बंद हो जाती है, बाजार बंद हो जाता है, फिर भी दीपक जलाकर बैठे हैं। क्या करते हैं? रोकड़ जोड़ते हैं। अब रोकड़ क्यों जोड़ते हो? तो कहता है—व्यापार किसलिये किया था? जिसके लिये किया था उसीमें वृत्ति लगती है। इसी प्रकार गृहस्थका काम किसलिये किया? प्रभु-प्राप्तिके लिये। तो जहाँ काम छूटा कि मन प्रभुमें लग जायगा, चट लग जायगा। व्यापार-कार्य आरम्भ करो तो रुपये कैसे पैदा हों—यह ध्यान रहेगा, चाहे रुपयोंकी याद रहे या न रहे, पर रुपयोंके लिये काम है। अत: रुपयोंकी अखण्ड स्मृति, रुपयोंका ध्येय अखण्ड रहेगा। वैसे ही यदि प्रभुके लिये ही भजन-ध्यान है और प्रभुके लिये ही गृहस्थाश्रमका काम है तो सब कार्योंमें अखण्डपना है। जो यह अखण्डपना पकड़नेवाला है वह ‘साधक’ होता है, अखण्डपना रखना ‘साधन’ होता है और उससे जो अखण्डकी प्राप्ति है वह ‘साध्य’ होती है। फिर आपसे-आप ये सब हो जायँगे।
इस प्रकार ‘हम भगवान् के हैं’ यह कैसे समझें और ‘अखण्ड भजन कैसे हो’—इन दोनों प्रश्नोंका उत्तर हो गया!