अनिर्वचनीय प्रेम
जो मनुष्य संसारसे दु:खी होकर ऐसा सोचता है कि कोई तो अपना होता, जो मुझे अपनी शरणमें लेकर, अपने गले लगाकर मेरे दु:ख, सन्ताप, पाप, अभाव, भय, नीरसता आदिको हर लेता, उसको भगवान् अपनी भक्ति प्रदान करते हैं। परन्तु जो मनुष्य केवल संसारके दु:खोंसे मुक्त होना चाहता है, पराधीनतासे छूटकर स्वाधीन होना चाहता है, उसको भगवान् मुक्ति प्रदान करते हैं। मुक्त होनेपर वह ‘स्व’ में स्थित हो जाता है—‘समदु:खसुख: स्वस्थ:’ (गीता १४। २४)। ‘स्व’ में स्थित होनेपर ‘स्व’-पना अर्थात् व्यक्तित्वका सूक्ष्म अहङ्कार रह जाता है, जिसके कारण उसको ‘अखण्ड आनन्द’ का अनुभव होता है। जीव परमात्माका अंश है। अंशका अंशीकी तरफ स्वत: आकर्षण होता है। अत: ‘स्व’ में स्थित अर्थात् मुक्त होनेके बाद जब उसको मुक्तिमें भी सन्तोष नहीं होता, तब ‘स्व’ का ‘स्वकीया’ (परमात्मा) की तरफ स्वत: आकर्षण होता है। कारण कि मुक्त होनेपर जीवके दु:खोंका अन्त और जिज्ञासाकी पूर्ति तो हो जाती है, पर प्रेम-पिपासा शान्त नहीं होती। तात्पर्य है कि प्रेमकी जागृतिके बिना स्वयंकी भूखका अत्यन्त अभाव नहीं होता। स्वकीयकी तरफ आकर्षण होनेसे अर्थात् प्रेम जाग्रत् होनेसे अखण्ड आनन्द ‘अनन्त आनन्द’ में बदल जाता है और व्यक्तित्वका सर्वथा नाश हो जाता है।
मुक्त होनेसे पहले जीव और भगवान् में जो भेद होता है, वह बन्धनमें डालनेवाला होता है, पर मुक्त होनेके बाद जीव (प्रेमी) और भगवान् (प्रेमास्पद)में जो प्रेमके लिये स्वीकृत भेद होता है, वह अनन्त आनन्द देनेवाला होता है—
द्वैतं मोहाय बोधात्प्राग्जाते बोधे मनीषया।
भक्त्यर्थं कल्पितं द्वैतमद्वैतादपि सुन्दरम्॥
(बोधसार, भक्ति० ४२)
‘बोधसे पहलेका द्वैत मोहमें डाल सकता है, पर बोध हो जानेपर भक्तिके कल्पित अर्थात् स्वीकृत द्वैत अद्वैतसे भी अधिक सुन्दर होता है।’
कारण कि बोधसे पहलेका भेद अहम् के कारण होता है और बोधके बादका (प्रेमकी वृद्धिके लिये होनेवाला) भेद अहम् का नाश होनेपर होता है।
जैसे संसारमें किसी वस्तुका ज्ञान होनेपर ज्ञान बढ़ता नहीं, प्रत्युत अज्ञान मिट जाता है, ऐसे ही ज्ञानमार्गमें स्वरूपका ज्ञान होनेपर अज्ञानको मिटाकर ज्ञान खुद भी शान्त हो जाता है और स्व-स्वरूप स्वत: ज्यों-का-त्यों रह जाता है। इसलिये ज्ञानमार्गमें अखण्ड, शान्त, एकरस आनन्द मिलता है। परन्तु जैसे संसारमें किसी वस्तुमें आसक्ति होनेपर फिर आसक्ति बढ़ती ही रहती है—‘जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई’, ऐसे ही भक्तिमार्गमें भगवान् में प्रेम होनेपर फिर वह प्रेम बढ़ता ही रहता है। इसलिये भक्तिमार्गमें अनन्त, प्रतिक्षण वर्धमान आनन्द मिलता है। तात्पर्य यह हुआ कि आकर्षणमें जो आनन्द है, वह ज्ञानमें नहीं है। सांसारिक वस्तुका ज्ञान तो बाँधता है, पर स्वरूपका ज्ञान मुक्त करता है। इसी तरह सांसारिक वस्तुका आकर्षण तो अपार दु:ख देता है, पर भगवान् का आकर्षण अनन्त आनन्द देता है।
अनन्तरसको प्रवाहित करनेवाली प्रेमरूपी नदीके दो तट हैं—नित्यमिलन और नित्यविरह। नित्यमिलनसे प्रेममें चेतना आती है, विशेष विलक्षणता आती है, प्रेमका उछाल आता है और नित्यविरहसे प्रेम प्रतिक्षण वर्धमान होता है अर्थात् अपनेमें प्रेमकी कमी मालूम देनेपर ‘प्रेम और बढ़े, और बढ़े’ यह उत्कण्ठा होती है।
अरबरात मिलिबे को निसिदिन,
मिलेइ रहत मनु कबहुँ मिलै ना।
जैसे धनी आदमीमें तीन चीजें रहती हैं—१. धन २. धनका नशा अर्थात् अभिमान और ३. धन बढ़नेकी इच्छा। ऐसे ही प्रेमीमें तीन चीजें रहती हैं—१. प्रेम २. प्रेमकी मादकता, मस्ती और ३. प्रेम बढ़नेकी इच्छा। धनी आदमीमें जो ‘धन और बढ़े, और बढ़े’—यह इच्छा रहती है, वह लोभरूपी दोषके बढ़नेसे होती है। परन्तु प्रेमीमें जो ‘प्रेम और बढ़े और बढ़े’—यह इच्छा रहती है, वह अहंता-ममतारूपी दोषोंके मिटनेसे होती है।
अहंता-ममतारूपी दोषोंके मिटनेके बाद जहाँ अहंता (मैं-पन) थी, वहाँ ‘नित्यमिलन’ प्रकट होता है और जहाँ ममता (मेरा-पन) थी, वहाँ ‘नित्यविरह’ प्रकट होता है। वास्तवमें नित्यमिलन (नित्ययोग) और नित्यविरह—दोनों जीवमें सदासे विद्यमान हैं, पर भगवान् से विमुख होकर संसारके सम्मुख हो जानेसे ‘नित्यमिलन’ ने अहंताका रूप धारण कर लिया और ‘नित्यविरह’ ने ममताका रूप धारण कर लिया। अहंता और ममताके पैदा होनेसे प्रेम दब गया और संसारकी आसक्ति या मोह उत्पन्न हो गया। तात्पर्य यह हुआ कि दोषोंके रहनेसे संसारकी आसक्ति बढ़ती है और दोषोंके मिटनेसे शान्ति मिलती है एवं शान्तिमें सन्तोष न करनेसे प्रेम बढ़ता है। संसारमें प्रियता काम-क्रोधादि दोषोंसे होती है, पर भगवान् में प्रियता निर्दोषतासे होती है। जबतक अपनेमें थोड़ा भी संसारका आकर्षण है, तबतक प्रेम प्राप्त नहीं हुआ है; क्योंकि प्रेमकी जगह कामने ले ली। प्रेम प्राप्त होनेपर संसारमें किंचिन्मात्र भी आकर्षण नहीं रहता।
प्रेम प्रतिक्षण वर्धमान तभी होता है, जब उसमें पहली अवस्थाका क्षय और दूसरी अवस्थाका उदय होता है। पहली अवस्थाका त्याग ‘नित्यविरह’ और दूसरी अवस्थाकी प्राप्ति ‘नित्यमिलन’ है। वास्तवमें देखा जाय तो प्रेममें क्षय या उदय, त्याग या प्राप्ति है ही नहीं, प्रत्युत प्रेमके नित्य-निरन्तर ज्यों-के-त्यों रहते हुए ही प्रतिक्षण वर्धमान होनेसे उसमें क्षय या उदयकी प्रतीति होती है।
प्रेममें प्रेमीको अपनेमें एक कमीका भान होता है, जिससे उसमें ‘प्रेम और बढ़े, और बढ़े’ यह लालसा (भूख) होती है। अगर सूक्ष्म दृष्टिसे देखा जाय तो ‘और बढ़े, और बढ़े’ इस लालसामें प्रेमकी प्राप्ति भी है और कमी भी! कमी नहीं है, फिर भी कमी दीखती है। इसलिये प्रेमको अनिर्वचनीय कहा गया है—
अनिर्वचनीयं प्रेमस्वरूपम्। मूकास्वादनवत्।
(नारद० ५१।५२)
आनन्द भी आये और कमी भी दीखे—यह प्रेमकी अनिर्वचनीयता है।
जो पूर्णताको प्राप्त हो गये हैं, जिनके लिये कुछ भी करना, जानना और पाना शेष नहीं रहा, ऐसे महापुरुषोंमें भी प्रेमकी भूख रहती है। उनका भगवान् की तरफ स्वत:-स्वाभाविक खिंचाव होता है। इसलिये भगवान् ‘आत्मारामगणाकर्षी’ कहलाते हैं। सनकादि मुनि ‘ब्रह्मानंद सदा लयलीना’ होते हुए भी भगवल्लीला-कथा सुनते रहते हैं—
आसा बसन व्यसन यह तिन्हहीं।
रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं॥
(मानस, उत्तर० ३२।३)
जब वे वैकुण्ठधाममें गये, तब वहाँ भगवान् के चरणकमलोंकी दिव्य गन्धसे उनका स्थिर चित्त भी चंचल हो उठा—
तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द-
किञ्जल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायु:।
अन्तर्गत: स्वविवरेण चकार तेषां
संक्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वो:।
(श्रीमद्भा० ३।१५।४३)
‘प्रणाम करनेपर उन कमलनेत्र भगवान् के चरण-कमलके परागसे मिली हुई तुलसी-मंजरीकी वायुने उनके नासिका-छिद्रोंमें प्रवेश करके उन अक्षर परमात्मामें नित्य स्थित रहनेवाले ज्ञानी महात्माओंके भी चित्त और शरीरको क्षुब्ध कर दिया।’
भगवान् श्रीरामको देखकर तत्त्वज्ञानी जनक भी कह उठे—
सहज बिरागरूप मनु मोरा।
थकित होत जिमि चंद चकोरा॥
इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा।
बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा॥
(मानस, बाल० २१६।२-३)
सर्वथा पूर्ण होते हुए भी भगवान् शंकरके मनमें भगवल्लीला सुनानेकी लालसा होती है और जगज्जननी पार्वतीके मनमें सुननेकी लालसा होती है। भगवान् शंकर कैलासको छोड़कर यशोदाजीके पास आते हैं और प्रार्थना करते हैं कि मैया! एक बार अपने लालाका मुख तो दिखा दे! जब वे सतीजीके साथ कैलास जा रहे थे, तब भी मार्गमें भगवान् श्रीरामका दर्शन करके उनकी विचित्र दशा हो गयी—
सतीं सो दसा संभु कै देखी।
उर उपजा संदेहु बिसेषी॥
संकरु जगतबंद्य जगदीसा।
सुर नर मुनि सब नावत सीसा॥
तिन्ह नृप सुतहि कीन्ह परनामा।
कहि सच्चिदानंद परधामा॥
भए मगन छबि तासु बिलोकी।
अजहुँ प्रीति उर रहति न रोकी॥
इस प्रकार सनकादि, जनक, भगवान् शंकर आदि सभीका स्वाभाविक ही भगवान् की तरफ खिंचाव होता है। इस खिंचावका नाम ही प्रेम है। श्रीमद्भागवतमें आया है—
आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे।
कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरि:॥
(१।७।१०)
‘ज्ञानके द्वारा जिनकी चिज्जडग्रन्थि कट गयी है, ऐसे आत्माराम मुनिगण भी भगवान् की निष्काम भक्ति किया करते हैं; क्योंकि भगवान् के गुण ही ऐसे हैं कि वे प्राणियोंको अपनी ओर खींच लेते हैं।’
कोई कमी भी न हो और प्रेमकी भूख भी हो—यह प्रेमकी अनिर्वचनीयता है। सत्सङ्गमें लगे हुए साधकोंका यह अनुभव भी है कि प्रतिदिन सत्संग सुनते हुए, भगवान् की लीलाएँ सुनते हुए, भजन-कीर्तन करते और सुनते हुए भी न तो उनसे तृप्ति होती है और न उनको छोड़नेका मन ही करता है। उनमें प्रतिदिन नया-नया रस मिलता है, जिसमें भूतकालका रस फीका दीखता है और वर्तमानका रस विलक्षण दीखता है*। इस प्रकार प्रेममें पूर्णता भी है और अभाव भी है—यह प्रेमकी अनिर्वचनीयता है।
ज्ञानमें तो स्वरूपमें स्थिति होती है, जिससे ज्ञानीको सन्तोष हो जाता है—‘आत्मन्येव च सन्तुष्ट:’ (गीता ३।१७); परन्तु प्रेममें न स्थिति होती है और न सन्तोष होता है, प्रत्युत नित्य-निरन्तर वृद्धि होती रहती है।
वास्तवमें प्रेमका निर्वचन (वर्णन) किया ही नहीं जा सकता। अगर उसका निर्वचन कर दें तो फिर वह अनिर्वचनीय कैसे रहेगा?
डूबै सो बोलै नहीं, बोलै सो अनजान।
गहरो प्रेम-समुद्र कोउ डूबै चतुर सुजान॥
भगवान् के ही समग्ररूपका एक अंश अथवा ऐश्वर्य ब्रह्म है—‘ते ब्रह्म तद्विदु:’ (गीता ७। २९), ‘ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्’ (गीता १४।२७)। समग्ररूप (समग्रम्) विशेषण है और भगवान् (माम्) विशेष्य हैं—‘असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु’ (गीता ७।१)। इसी तरह भगवान् ने अधियज्ञ (अन्तर्यामी) को भी अपना स्वरूप बताया है—‘अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे’ (गीता८।४)। अत: ब्रह्म विशेषण है और अन्तर्यामी भगवान् विशेष्य हैं। इसलिये ज्ञानीका सम्बन्ध विशेषणके साथ होता है और भक्तका सम्बन्ध विशेष्यके साथ होता है। दूसरे शब्दोंमें, ज्ञानीका सम्बन्ध ऐश्वर्यके साथ होता है और भक्तका सम्बन्ध ऐश्वर्यवान् के साथ होता है।
ज्ञानीकी तो ब्रह्मसे ‘तात्त्विक एकता’ होती है, पर भक्तकी भगवान् के साथ ‘आत्मीय एकता’ होती है। इसलिये भगवान् कहते हैं—‘ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्’ (गीता ७।१८) ‘ज्ञानी तो मेरी आत्मा ही है—ऐसा मेरा मत है।’ यहाँ ‘ज्ञानी’ शब्द तत्त्वज्ञानीके लिये नहीं आया है, प्रत्युत ‘सब कुछ भगवान् ही हैं’—इसका अनुभव करनेवाले ज्ञानी अर्थात् शरणागत भक्तके लिये आया है—‘वासुदेव: सर्वमिति ज्ञानवान् मां प्रपद्यते’ (गीता ७।१९)। ज्ञानी (तत्त्वज्ञानी)की ‘तात्त्विक एकता’ में तो जीव और ब्रह्ममें अभेद हो जाता है तथा एक तत्त्वके सिवाय कुछ नहीं रहता। परन्तु भक्तकी ‘आत्मीय एकता’ में जीव और भगवान् में अभिन्नता हो जाती है। अभिन्नतामें भक्त और भगवान् एक होते हुए भी प्रेमके लिये दो हो जाते हैं।
यद्यपि भगवान् सर्वथा पूर्ण हैं, उनमें किंचिन्मात्र भी अभाव नहीं है, फिर भी वे प्रेमके भूखे हैं—‘एकाकी न रमते’ (बृहदारण्यक० १। ४। ३)। इसलिये भगवान् प्रेम-लीलाके लिये श्रीजी और कृष्णरूपसे दो हो जाते हैं—
येयं राधा यश्च कृष्णो रसाब्धिर्देहश्चैक: क्रीडनार्थं द्विधाभूत्।
(राधातापनीयोपनिषद्)
वास्तवमें श्रीजी कृष्णसे अलग नहीं होतीं, प्रत्युत कृष्ण ही प्रेमकी वृद्धिके लिये श्रीजीको अलग करते हैं। तात्पर्य है कि प्रेमकी प्राप्ति होनेपर भक्त भगवान् से अलग नहीं होता, प्रत्युत भगवान् ही प्रतिक्षण वर्धमान प्रेमके लिये भक्तको अलग करते हैं। इसलिये प्रेम प्राप्त होनेपर भक्त और भगवान्—दोनोंमें कोई छोटा-बड़ा नहीं होता। दोनों ही एक-दूसरेके भक्त और दोनों ही एक-दूसरेके इष्ट होते हैं। तत्त्वज्ञानसे पहलेका भेद (द्वैत) तो अज्ञानसे होता है, पर तत्त्वज्ञानके बादका प्रेमका भेद भगवान् की इच्छासे होता है।
अभिन्नता दो होते हुए भी हो सकती है; जैसे बालककी माँसे, सेवककी स्वामीसे, पत्नीकी पतिसे अथवा मित्रकी मित्रसे अभिन्नता होती है। इसलिये भक्तिमें आरम्भसे ही भक्तकी भगवान् से अभिन्नता हो जाती है—‘साह ही को गोतु गोतु होत है गुलाम को’ (कवितावली, उत्तर० १०७)। कारण कि भक्त अपना अलग अस्तित्व नहीं मानता। उसमें यह भाव रहता है कि भगवान् ही हैं, मैं हूँ ही नहीं।
प्रेममें माधुर्य है। अत: ‘प्रभु मेरे हैं’ ऐसे अपनापन होनेसे भक्त भगवान् का ऐश्वर्य (प्रभाव) भूल जाता है। जैसे, महारानीका बालक उसको ‘माँ मेरी है’ ऐसे मानता है तो उसका प्रभाव भूल जाता है कि यह महारानी है। एक बाबाजीने गोपियोंसे कहा कि कृष्ण बड़े ऐश्वर्यशाली हैं, उनके पास ऐश्वर्यका बड़ा खजाना है, तो गोपियाँ बोलीं कि महाराज! उस खजानेकी चाबी तो हमारे पास है। कन्हैयाके पास क्या है? उसके पास तो कुछ भी नहीं है! तात्पर्य है कि माधुर्यमें ऐश्वर्यकी विस्मृति हो जाती है। संसारमें तो ऐश्वर्यका ही ज्यादा आदर है, पर भगवान् में माधुर्यका ज्यादा आदर है। जिस समय भगवान् में माधुर्य-शक्ति प्रकट रहती है, उस समय ऐश्वर्यशक्ति दूर भाग जाती है, पासमें नहीं आती। वास्तवमें भक्त भगवान् के ऐश्वर्यको देखता ही नहीं। कारण कि भगवान् को भगवान् समझकर प्रेम करना भगवान् के साथ प्रेम नहीं है, प्रत्युत भगवत्ता (ऐश्वर्य) के साथ प्रेम है। जैसे, धनको देखकर धनवान् के साथ स्नेह करना वास्तवमें धनवत्ताके साथ स्नेह करना है।
प्रेमकी जागृतिमें भगवान् की कृपा ही खास कारण है। प्रेमकी वृद्धिके लिये विरह और मिलन भी भगवान् की कृपासे ही प्राप्त होते हैं। आदरपूर्वक भगवल्लीलाका श्रवण, वर्णन, चिन्तन तथा भगवन्नामका कीर्तन आदि साधनोंके बलसे प्रेमकी प्राप्ति नहीं होती, प्रत्युत समयका सदुपयोग होता है, जिसको वैष्णवाचार्योंने ‘कालक्षेप’ कहा है। भगवान् की कृपा प्राप्त होती है उनकी शरण होनेपर। शरण होनेमें संसारके आश्रयका त्याग मुख्य है।
संसारसे अलग होनेपर संसारका ज्ञान होता है और भगवान् से अभिन्न होनेपर भगवान् का ज्ञान होता है। कारण कि जीव संसारसे अलग है और भगवान् से अभिन्न है—यह वास्तविक, यथार्थ बात है। परन्तु शरीर-संसारसे एकता माननेसे संसारका ज्ञान नहीं होता और संसारका ज्ञान न होनेसे ही संसारकी तरफ खिंचाव होता है। इसी तरह भगवान् से भिन्नता माननेसे भगवान् का ज्ञान नहीं होता है और भगवान् का ज्ञान न होनेसे ही भगवान् की तरफ खिंचाव नहीं होता। संसार अपना नहीं है—इस तरह संसारका ज्ञान होनेसे संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। भगवान् अपने हैं—इस तरह भगवान् का ज्ञान होनेसे भगवान् के साथ अभिन्नता होकर प्रेम हो जाता है।