अपनी जानकारीको महत्त्व दें
एक बहुत बढ़िया बात है। आप कृपा करके ध्यान दें। जिसको जो परिस्थिति मिली है, उसीको सर्वोपरि मानकर उसका सदुपयोग करे तो कल्याण हो जायगा। जितनी वस्तुएँ मिली हैं, उनसे ज्यादा वस्तुओंकी जरूरत नहीं है। आपके पास जितनी विद्या है, उससे ज्यादा जाननेकी जरूरत नहीं है। आपके पास जो बल है, उससे ज्यादा बलकी जरूरत नहीं है। आपको जो बल, बुद्धि, योग्यता, परिस्थिति आदि मिली है, उसीके सदुपयोगसे परमात्माकी प्राप्ति हो जायगी। यह एकदम सच्ची और सिद्धान्तकी बात है।
आपके पास जानकारीकी कमी नहीं है, प्रत्युत उस जानकारीका आप ठीक उपयोग नहीं करते, उसको महत्त्व नहीं देते—इस बातकी कमी है। अभी जो परिस्थिति हमारे सामने है, वह सदा ऐसी ही नहीं बनी रहेगी—यह ज्ञान आपमें कम नहीं है, पूरा-का-पूरा है। इस ज्ञानका आप सदुपयोग करें तो यह ज्ञान आपके उद्धारके लिये काफी है, किञ्चिन्मात्र भी कम नहीं है। इसका सदुपयोग यह है कि आप प्राप्त परिस्थितिमें फँसें नहीं, उसमें राजी-नाराज न हों।
श्रोता—यह ज्ञान तो हमें है, पर जैसा चाहते हैं, वैसा ज्ञान नहीं है।
स्वामीजी—आपको जिसका ज्ञान है, उसका सदुपयोग आप करते हैं क्या? जिस वस्तुको आप नाशवान् समझते हो, उसको प्राप्त करनेकी इच्छा होती है कि नहीं?
श्रोता—होती है।
स्वामीजी—तो फिर नाशवान् कहाँ समझते हैं, अगर वास्तवमें आप नाशवान् समझते तो फिर उसको पानेकी इच्छा आपमें नहीं होती। जो नाशवान् है, उसके मिलनेसे क्या लाभ होगा? जैसे धनवान् के पास धन होता है, धन नहीं हो तो वह धनवान् नहीं कहलाता, ऐसे ही संसारके पास नाश-ही-नाश है। जो नाशवान् है, वह हमें निहाल कैसे करेगा?
आप स्वयं नाशवान् नहीं हैं, प्रत्युत शरीर नाशवान् है। आपको जो वस्तु मिली हुई है, वह नष्ट होनेवाली है, पर आप स्वयं नष्ट होनेवाले नहीं हो। वस्तु पहले भी नहीं थी और बादमें भी नहीं रहेगी तथा वर्तमानमें भी प्रतिक्षण नाशकी तरफ जा रही है। परन्तु आप पहले भी थे और आगे भी रहोगे। आपकी सत्ता निरन्तर रहती है। हमारे पास प्रश्न आया था कि हम भविष्यमें रहेंगे—इसका ज्ञान वर्तमानमें कैसे हो? इसका उत्तर है कि आप बुरा काम करते हुए डरते हैं और अच्छा काम करते हुए राजी होते हैं; क्योंकि आपका यह भाव रहता है कि बुरा काम करनेसे हम आगे दु:ख पायेंगे और अच्छा काम करनेसे हम आगे सुख पायेंगे। इससे सिद्ध हुआ कि आपने भविष्यमें अपनी सत्ता मान रखी है। अगर भविष्यमें हम अपनी सत्ता न मानें तो फिर स्वर्गमें कौन जायगा? नरकोंमें कौन जायगा? पुनर्जन्म किसका होगा? मुक्ति किसकी होगी? कल्याण होनेपर आनन्द आपको होगा कि दुनियाको होगा? तात्पर्य है कि आप तो रहेंगे और शरीर आदि पदार्थ नहीं रहेंगे।
आप विचार करें कि नाशवान् के द्वारा अविनाशीको सुख कैसे मिल सकता है? नाशवान् कहनेका अर्थ है कि उसके पास नाश-ही-नाश है, नाशके सिवाय कुछ नहीं है।
अंतहु तोहिं तजैंगे पामर! तू न तजै अबही ते॥
जो चीज नष्ट होनेवाली है, उसका उपयोग करो, पर उसका भरोसा मत करो, उसको अपना आधार मत बनाओ कि यह हमें निहाल करेगी। थोड़ा ध्यान दें, जो चीज अभी आपके पास नहीं है, उसके मिलनेसे आप निहाल कैसे हो जायँगे? जो चीज अभी नहीं है, वह बादमें भी नहीं रहेगी, बिछुड़ जायगी, अत: वह आपको सुखी कैसे करेगी? वह मिलेगी कि नहीं मिलेगी—इसका पता नहीं है, और मिल भी जायगी तो रहेगी नहीं, क्योंकि जो नाशवान् है, उसका नाश होगा ही।
शरीर आदि नाशवान् हैं—ऐसा आप जानते तो हैं, पर मानते नहीं अर्थात् जाने हुएको महत्त्व नहीं देते। अगर आप अपनी जानकारीको महत्त्व देते तो आप नाशवान् वस्तुओंपर भरोसा नहीं करते, उनकी आशा नहीं करते, उनके मिलनेपर राजी नहीं होते, उनके न मिलनेपर दु:खी नहीं होते, उनके बने रहनेकी इच्छा नहीं करते, उनके नष्ट होनेकी चिन्ता नहीं करते। हम जैसी परिस्थिति चाहते हैं, वैसी परिस्थिति न मिलनेपर दु:ख होता है तो यह दु:ख केवल मूर्खताका है। मूर्खताके सिवाय और कुछ नहीं है इसमें। जो वस्तु, परिस्थिति रहनेवाली नहीं है, उसको रखना चाहते हैं और उसके नष्ट होनेपर दु:खी होते हैं—यह मूर्खता नहीं तो और क्या है? हमारेपर कोई आफत आ जाय, दु:ख आ जाय तो सोचते हैं कि यह मिटे कैसे? पर वास्तवमें देखा जाय तो वह मिट ही रहा है। चाहे अनुकूलता हो, चाहे प्रतिकूलता हो, वह रहनेवाली है ही नहीं। मिली हुई चीज बिछुड़नेवाली होती है।
सर्वे क्षयान्ता निचया: पतनान्ता: समुच्छ्रया:।
संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम्॥
(वाल्मीकि० २। १०५। १६)
‘समस्त संग्रहोंका अन्त विनाश है, लौकिक उन्नतियोंका अन्त पतन है, संयोगोंका अन्त वियोग है और जीवनका अन्त मरण है।’
जिसका वियोग हो जायगा, उसके संयोगसे सुख कैसे लिया जाय? उसके वियोगसे हम दु:खी क्यों हों? न सुख रहनेवाला है और न दु:ख रहनेवाला है। आप रहनेवाले हैं। रहनेवाला आने-जानेवालेसे सुखी-दु:खी होता है तो उसकी मूर्खता ही है।
जो कभी नष्ट नहीं होता और जो अभी मौजूद है, उस परमात्माकी प्राप्तिसे ही सदा रहनेवाला सुख मिलेगा। उस परमात्माके सिवाय मानमें, सम्मानमें, बड़ाईमें, आराममें, रुपये-पैसेमें, कुटुम्बमें, धनमें कहीं भी आप सन्तोष करेंगे तो आपके साथ विश्वासघात होगा।
मैं वह बात कहता हूँ, जो आपके अनुभवमें है। चाहे कोई धुरंधर विद्वान् हो, चाहे एक अक्षर भी पढ़ा हुआ न हो, उसके भी अनुभवमें जो बात है, वह बात मैं कहता हूँ। मैं किसी वर्णकी, किसी आश्रमकी, किसी जातिकी, किसी सम्प्रदायकी बात नहीं कहता हूँ, प्रत्युत मनुष्यमात्रके अनुभवकी बात कहता हूँ। जिसका संयोग होता है, उसका वियोग होगा ही—यह बात किसकी है, बताओ? यह बात हिन्दुओंकी है या मुसलमानोंकी है या ईसाईयोंकी है? बालकोंकी है या जवानोंकी है या बूढ़ोंकी है? स्त्रियोंकी है या पुरुषोंकी है? साधुओंकी है या गृहस्थोंकी है? किसकी है यह? यह तो सबकी बात है। इस बातको आप महत्त्व दें तो निहाल हो जायँ! महत्त्व देना क्या कि आने-जानेवाली वस्तु, परिस्थितिसे आप सुखी-दु:खी न हों।
जिसका वियोग हो जायगा, उसका सहारा आप क्यों लेते हैं? आपने पहले उसका सहारा लिया और उसका वियोग होनेसे आपको दु:ख भी हुआ, फिर भी आप उसीका सहारा लेते हैं और बार-बार दु:ख पाते हैं! अगर आप उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुसे राजी-नाराज न हों तो आपको अनुत्पन्न परमात्मतत्त्व मिल जायगा। जो उत्पत्ति-विनाशशील है, जिसके आदि और अन्तको आप जानते हैं, उसकी इच्छा करना तथा उसके मिलनेसे राजी होना ही उलझन है। इसके सिवाय आपकी उलझन कोई है ही नहीं। इस उलझनको आप मिटा दो तो आपको परमात्मतत्त्व मिल जायगा। उस परमात्मतत्त्वका कभी नाश (वियोग) नहीं होता। वह सदा ज्यों-का-त्यों रहता है, क्योंकि वह सत् है। सत् का कभी अभाव नहीं होता—‘नाभावो विद्यते सत:’ (गीता २।१६)।
आपका अपमान होता है तो आप बड़े दु:खी हो जाते हैं तो अपमान टिकनेवाला है क्या? आपका सम्मान होता है तो आप राजी हो जाते हैं तो सम्मान टिकनेवाला है क्या? आप तो रहनेवाले हैं। रहनेवाला आने-जानेवालेसे सुखी-दु:खी हो जाता है—यह बड़े आश्चर्यकी बात है। भगवान् ने गीतामें सबसे पहले यह उपदेश दिया—
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपा:।
न चैव न भविष्याम: सर्वे वयमत: परम्॥
(गीता २। १२)
मैं, तू और ये राजा लोग पहले नहीं थे—यह बात भी नहीं है तथा आगे नहीं रहेंगे—यह बात भी नहीं है। ऐसा कहनेका तात्पर्य क्या हुआ? कि अभी जो यह परिस्थिति है, यह नहीं रहेगी। जो वस्तु, परिस्थिति नहीं रहेगी, वह आ गयी तो क्या हो गया? और वह चली गयी तो क्या हो गया? नाशवान् के मिलनेसे क्या राजी होते हो? सम्मान मिल गया तो क्या हो गया? सम्मानसे आपको क्या मिला? केवल धोखा मिला। धोखेके सिवाय कुछ नहीं मिला। आप जान-जानकर धोखा क्यों खाते हो? आपको आजसे ही होश आनी चाहिये कि अब हम सम्मानमें राजी नहीं होंगे और अपमानमें नाराज नहीं होंगे। कारण कि आदर भी ठहरनेवाला नहीं है और निरादर भी ठहरनेवाला नहीं है। सुख भी ठहरनेवाला नहीं है और दु:ख भी ठहरनेवाला नहीं है। यह मिला तो क्या फर्क पड़ा और नहीं मिला तो क्या फर्क पड़ा? जो नाशवान् ही है, वह मिला तो भी नहीं मिला और नहीं मिला तो भी नहीं मिला। वास्तवमें नाशवान् का सदा ही वियोग है, संयोग है ही नहीं। संयोग केवल आपका माना हुआ है। जिसका सदा ही वियोग है, जो आपके साथ रहनेवाला है ही नहीं, उसमें राजी-नाराज क्या हों? यह बात सच्ची है कि नहीं?
श्रोता—बिलकुल सच्ची है।
स्वामीजी—बिलकुल सच्ची है तो आज ही, अभी-अभी मान लो, देरीका काम नहीं है। इसके लिये मिनट-दो-मिनटका भी भविष्य नहीं है। आने-जानेकी वस्तुओंसे राजी-नाराज नहीं होओगे तो अविनाशी वस्तु मिल जायगी। न मिले तो मेरा कान पकड़ लेना।