असत् का त्याग तथा सत् की खोज

जिसको हम असत् जानते हैं, उसका त्याग करनेसे स्वत:सिद्ध तत्त्वका अनुभव हो जाता है। वास्तवमें असत् की सत्ता विद्यमान है ही नहीं—‘नासतो विद्यते भाव:’। असत् का अत्यन्त अभाव है। मैं, तू, यह और वह—इन चारोंकी सत्ता ही नहीं है। जो कुछ भी देखने, सुनने, मानने, चिन्तन करनेमें आता है, वह वास्तवमें है ही नहीं। इन्द्रियाँ, अन्त:करण और अहंकार—ये तीनों ही नहीं हैं।

हम जानते हैं कि संसार निरन्तर बदलता है। यह जैसा पहले था, वैसा अब नहीं है और जैसा अब है, वैसा आगे नहीं रहेगा। परंतु ऐसा जानते हुए भी हम संसारकी सत्ता मानते हैं—यह जाने हुए असत् की सत्ताको स्वीकार करना है। जाने हुए असत् की सत्ताको स्वीकार करना तथा उसको महत्त्व देना ही बन्धनका मूल कारण है।

मनुष्यमात्रमें असत् का त्याग करनेकी सामर्थ्य भी है और स्वतन्त्रता भी! असत् का त्याग करनेमें कोई भी असमर्थ और पराधीन नहीं है। अब विचार इस बातपर करना है कि असत् को असत्-रूपसे जानते हुए भी उसका आकर्षण क्यों हो रहा है? उसका त्याग क्यों नहीं हो रहा है?

जब हम अपनेमें असत् की सत्ता स्वीकार कर लेते हैं और सत्ता स्वीकार करके उसको महत्ता दे देते हैं, तब असत् का आकर्षण होता है। संयोगजन्य सुखकी इच्छा करना ही अपनेमें असत् की सत्ता और महत्ताको स्वीकार करना है। हम विचारके समय तो संसारको असत् मानते हैं, पर अन्य समय असत् के संगका सुख भोगते हैं, इसीलिये (सुखासक्तिके कारण) असत् का त्याग करनेमें कठिनता मालूम दे रही है।

संयोगजन्य सुखके पहले उसके अभावका दु:ख है, अन्तमें उसके वियोगका दु:ख है तथा बीचमें भी उसका प्रतिक्षण अभाव हो रहा है—यह ज्ञान होनेपर सुखकी इच्छा मिट जाती है। कारण कि अभाव ही शेष रहता है और अभावमें सुख हो नहीं सकता। गीतामें आया है—

ये हि संस्पर्शजा भोगा दु:खयोनय एव ते।

आद्यन्तवन्त: कौन्तेय न तेषु रमते बुध:॥

(५। २२)

‘हे कुन्तीनन्दन! जो इन्द्रियों और विषयोंके संयोगसे पैदा होनेवाले भोग हैं, वे आदि-अन्तवाले और दु:खके ही कारण हैं। अत: विवेकी मनुष्य उनमें रमण नहीं करता।’

विवेकका अनादर करनेके कारण मनुष्य आरम्भको देखता है, परिणामको नहीं। सुखभोगके परिणाममें दु:ख आयेगा ही—यह नियम है। कारण कि सुखभोगके परिणाममें अपनी शक्तिका ह्रास और भोग्य वस्तुका नाश होता ही है—यह नियम है। यदि मनुष्य सुखभोगके परिणामपर विचार करे, उसके परिणामको महत्त्व दे तो सुखभोगकी रुचि मिट जायगी; क्योंकि दु:ख और अभावको कोई भी नहीं चाहता। दु:ख और अभाव स्वाभाविक अरुचिकर होता है। इसलिये गीता कहती है—

विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्।

परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्॥

(१८। ३८)

‘जो सुख इन्द्रियों और विषयोंके संयोगसे आरम्भमें अमृतकी तरह और परिणाममें विषकी तरह होता है, वह सुख राजस कहा गया है*।’

तात्पर्य है कि आरम्भमें भोग्य-पदार्थ बड़े अच्छे लगते हैं और उनमें बड़ा सुख मालूम देता है। परंतु उनको भोगते-भोगते जब परिणाममें वह सुख नीरसतामें परिणत हो जाता है और उससे सर्वथा अरुचि हो जाती है, तब वही सुख विषकी तरह मालूम देता है। वास्तवमें सुखकी रुचि बनावटी है और अरुचि स्वाभाविक है।

केवल दूसरोंको सुख देनेका स्वभाव बन जाय तो सुखासक्ति सुगमतापूर्वक मिट जाती है। कारण कि असत् से सुख लेनेके कारण ही अपनेमें असत् के त्यागकी असामर्थ्य तथा असत् की पराधीनता प्रतीत होती है। इसलिये साधकको यह दृढ़ निश्चय कर लेना चाहिये कि मेरेको असत् से सुख लेना ही नहीं है।

एक मार्मिक बात है कि ढीली प्रकृतिवाला अर्थात् शिथिल स्वभाववाला मनुष्य असत् का जल्दी त्याग नहीं कर सकता। एक विचार किया और उसको छोड़ दिया। फिर दूसरा विचार किया और उसको छोड़ दिया—इस प्रकार बार-बार विचार करने और उसको छोड़ते रहनेसे आदत बिगड़ जाती है। इस बिगड़ी हुई आदतके कारण ही वह असत् के त्यागकी बातें तो सीख जाता है, पर असत् का त्याग नहीं कर पाता। अगर असत् का त्याग कर भी देता है तो स्वभावकी ढिलाईसे फिर उसको सत्ता दे देता है। स्वभावकी यह शिथिलता स्वयं साधककी बनायी हुई है। अत: साधकके लिये यह बहुत आवश्यक है कि वह अपना स्वभाव दृढ़ रहनेका बना ले। एक बार वह जो विचार कर ले, फिर उसपर वह दृढ़ रहे—‘भजन्ते मां दृढव्रता:’ (गीता ७।२८)। छोटी-सी-छोटी बातमें भी वह दृढ़ (पक्का) रहे तो उसमें असत् का त्याग करनेकी शक्ति आ जायगी।

साधकमें एक तो असत् की रुचि (भोगेच्छा) है और एक सत् की भूख (जिज्ञासा) है। यह सिद्धान्त है कि असत् की रुचि असत् में नहीं होती और सत् की भूख सत् में नहीं होती। जिसमें असत् की रुचि और सत् की भूख है, वह जीव है। रुचि ‘कामना’ है और भूख ‘आवश्यकता’ है। कामना कभी पूरी नहीं होती, प्रत्युत उसकी निवृत्ति ही होती है। परंतु आवश्यकता पूरी होनेवाली ही होती है। मनुष्यमें केवल कामना तो नहीं रह सकती, पर केवल आवश्यकता रह सकती है। केवल आवश्यकता रहते ही उसकी पूर्ति हो जाती है। जैसे जबतक लकड़ी रहती है, तबतक आग रहती है। लकड़ी समाप्त होते ही आग शान्त हो जाती है। ऐसे ही जबतक कामना (भोगेच्छा) है, तबतक आवश्यकता (जिज्ञासा) है। कामनाके कारण ही आवश्यकता है। इसलिये कामना मिटते ही आवश्यकता पूरी हो जाती है। अत: साधकको चाहिये कि वह आवश्यकतामें कामनाको मिला दे अर्थात् उसके जीवनमें कामना न रहे, प्रत्युत एक आवश्यकता ही रहे। असत् की रुचि न रहे, प्रत्युत सत् की ही रुचि रहे और सत् की ही भूख रहे। सत् की भूख ही जिज्ञासा कहलाती है। जिज्ञासा और जिज्ञास्य-तत्त्वमें कोई भेद नहीं है। परंतु जबतक जिज्ञासु रहता है अर्थात् अहम् रहता है, तबतक जिज्ञासा और जिज्ञास्य-तत्त्वकी एकता स्पष्ट नहीं होती। अहम् के मिटनेपर जिज्ञासु नहीं रहता, प्रत्युत जिज्ञासामात्र रह जाती है। जिज्ञासामात्र रहते ही जिज्ञासा जिज्ञास्य-तत्त्वसे एक हो जाती है अर्थात् आवश्यकताकी पूर्ति हो जाती है।

असत् नित्यनिवृत्त है, इसलिये उसका त्याग होता है और सत् नित्यप्राप्त है, इसलिये उसकी खोज होती है। निर्माण और खोज—दोनोंमें बहुत अन्तर है। निर्माण उस वस्तुका होता है, जिसका पहलेसे अभाव होता है और खोज उस वस्तुकी होती है, जो पहलेसे ही विद्यमान होती है। सत् का अभाव विद्यमान है ही नहीं—‘नाभावो विद्यते सत:’; अत: सत् की खोज होती है, निर्माण नहीं होता। जब साधक सत् की सत्ताको स्वीकार करता है, तब खोज होती है। खोजके दो प्रकार हैं—एक तो कण्ठी कहीं रखकर भूल जायँ तो हम उसको जगह-जगह ढूँढ़ते हैं और दूसरा, कण्ठी गलेमें ही हो तथा वहम हो जाय कि कण्ठी खो गयी तो हम उसको जगह-जगह ढूँढ़ते हैं। परमात्मतत्त्वकी खोज गलेमें पड़ी कण्ठीकी खोजके समान है। तात्पर्य है कि जिस परमात्मतत्त्वको हम चाहते हैं और जिसकी हम खोज करते हैं, वह परमात्मतत्त्व अपनेमें ही है! परंतु संसार अपनेमें नहीं है। जो अपनेमें है, उसकी खोज करनेसे परिणाममें वह मिल जाता है। परंतु जो अपनेमें नहीं है, उसकी खोज करनेसे परिणाममें वह मिलता नहीं; क्योंकि उसकी सत्ता ही नहीं है।

परमात्मतत्त्व कभी अप्राप्त है ही नहीं। उसकी विस्मृति हुई है, अप्राप्ति नहीं हुई है। यह विस्मृति अनादि और सान्त (अन्त होनेवाली) है। जैसे दो व्यक्ति आपसमें एक-दूसरेको पहचानते नहीं तो यह अपरिचय कबसे है—इसको कोई बता नहीं सकता। हम संस्कृत भाषा नहीं जानते तो यह न जानना कबसे है—इसको हम बता नहीं सकते। तात्पर्य है कि व्यक्तियोंकी सत्ता, हमारी सत्ता, संस्कृत भाषाकी सत्ता तो पहलेसे ही है, पर उनका परिचय पहलेसे नहीं है। ऐसे ही विस्मृतिके समय भी परमात्मतत्त्वकी सत्ता ज्यों-की-त्यों है। परमात्मतत्त्व तो नित्यप्राप्त है, पर उसकी विस्मृति है अर्थात् उधर दृष्टि नहीं है, उससे विमुखता है, उससे अपरिचय है, उसकी अप्राप्तिका वहम है। परमात्मतत्त्वकी खोज करनेपर यह विस्मृति मिट जाती है और स्मृति प्राप्त हो जाती है—‘नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा’ (गीता १८। ७३)।

परमात्मतत्त्वकी खोजमें अभ्यास नहीं है। अभ्यास करनेसे हम तत्त्वसे अलग हो जाते हैं। ज्यों अभ्यास करते हैं, त्यों तत्त्वसे अलग होते हैं। इसलिये कहा है—

श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई।

छूट न अधिक अधिक अरुझाई॥

(मानस ७। ११६। ६)

अगर साधकको अभ्यास करना ही हो तो इतना ही अभ्यास करे कि ‘मुझे कुछ नहीं करना है!’ हमारा स्वरूप चिन्मय सत्तामात्र है। सत्तामात्रमें कभी किञ्चिन्मात्र भी कोई कमी नहीं आती। कारण कि भावका अभाव हो ही कैसे सकता है! इसलिये अपने लिये कभी किञ्चिन्मात्र भी किसी चीजकी जरूरत हुई नहीं, है नहीं, होगी नहीं और हो सकती नहीं। अत: अपने लिये अपनेको कुछ नहीं करना है। करने तथा न करनेका आग्रह होनेसे अहंकार आता है और करने तथा न करनेका आग्रह न होनेसे अहंकार छूट जाता है। असत् के संगके बिना स्वरूप कुछ कर सकता ही नहीं; क्योंकि स्वरूपमें कर्तृत्व है ही नहीं। समाधिमें भी असत् का संग रहता है, जिसके कारण समाधि और व्युत्थान—ये दो अवस्थाएँ होती हैं। परंतु कुछ न करनेमें असत् का संग नहीं है। पहले भी कुछ नहीं था, पीछे भी कुछ नहीं रहेगा; अत: अभी भी कुछ नहीं है—‘आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा’ (माण्डूक्यकारिका ४। ३१)। कुछ नहीं रहना निरन्तर है। घोर-से-घोर प्रवृत्तिमें भी निवृत्ति निरन्तर है। इस निवृत्तिको अर्थात् कुछ नहीं करनेको ही ‘परम विश्राम’ कहा गया है—‘पायो परम बिश्रामु’ (मानस ७। १३०। छं० ३)। श्रमका तो आदि और अन्त होता है, पर विश्रामका आदि और अन्त नहीं होता। विश्राम निरन्तर रहता है। श्रमके समय भी विश्राम ज्यों-का-त्यों रहता है। परंतु हमारी दृष्टि श्रमपर ही रहती है, विश्रामकी तरफ नहीं जाती। असत् का सर्वथा त्याग होनेपर नित्यप्राप्त विश्रामकी प्राप्ति हो जाती है।

वास्तवमें असत् के त्यागमें ही सत् की खोज निहित है। ज्ञान भी असत् का ही होता है, सत् का नहीं। असत् को असत्-रूपसे जानना ही ज्ञान है। ज्ञानसे असत् की निवृत्ति हो जाती है और सत् ज्यों-का-त्यों शेष रह जाता है; क्योंकि सत् नित्यप्राप्त है। असत् की मानी हुई सत्ता और महत्ता ही नित्यप्राप्त सत् के अनुभवमें बाधक है। अत: सत् की प्राप्ति तो स्वत:सिद्ध है, कमी असत् के त्यागकी ही है। सत् की प्राप्ति नहीं होती, प्रत्युत असत् की निवृत्ति होती है। असत् की सत्ता कल्पित है, उसका कोई मूल आधार नहीं है। अत: असत् का त्याग स्वत: है, सुगम है और श्रेष्ठ है! इसमें एक मार्मिक बात है कि वास्तवमें असत् का त्याग नहीं करना है, प्रत्युत असत् के अभावका अनुभव करना है—‘नासतो विद्यते भाव:’ (गीता २।१६) ‘असत् की सत्ता विद्यमान नहीं है।’ कारण कि त्याग करनेसे अहम् (त्यागी) शेष रहेगा, जब कि अभावको स्वीकार करनेसे अहम् शेष नहीं रहेगा। जबतक अहंरूपी अणु है, तबतक असत् का संग है। असत् का वास्तविक त्याग अहंरूपी अणुके टूटनेपर ही होता है।

स्वरूपमें अहम् नहीं है। अहंरहित स्वरूपका बोध ही वास्तविक बोध है। अहंरहित स्वरूपका बोध होनेके लिये दो युक्तियाँ बहुत कामकी हैं—

(१) सुषुप्तिमें अहम् नहीं रहता, पर स्वरूप रहता है। अत: सभीको सुषुप्तिके समय अहम् के अभावका और स्वयंके भावका अनुभव होता है, जिसका स्पष्ट बोध जगनेपर होता है। जैसे, जगनेके बाद हम कहते हैं कि ‘मैं ऐसे सुखसे सोया कि कुछ पता नहीं था’; परंतु ‘कुछ पता नहीं था’—इसका तो पता था ही। अत: ‘कुछ पता नहीं था’—यह अहम् का अभाव है और इसका ज्ञान जिसको है, वह अहंरहित स्वरूप है।

(२) जीव अनेक योनियोंमें जाता है तो योनियाँ बदलती हैं, शरीर बदलते हैं, पर स्वयं वही रहता है। अलग-अलग योनियोंमें अहम् भी अलग-अलग रहता है, पर स्वयंकी सत्ता सभी योनियोंमें एक ही रहती है।

‘मैं हूँ’—यह अहंसहित सत्ता है और ‘है’—यह अहंरहित सत्ता है। साधकको चाहिये कि वह ‘मैं हूँ’ को न देखकर ‘है’ में ही रहे। ‘मैं’ (अहम्) तो ‘तू’, ‘यह’ और ‘वह’ हो जाता है, पर ‘है’ सदा ‘है’ ही रहता है। तात्पर्य है कि ‘मैं’ तो बदलता है, पर ‘है’ नित्य ज्यों-का-त्यों रहता है। परंतु जबतक ‘मैं’ रहता है, तबतक ‘है’ का अनुभव नहीं होता, प्रत्युत ‘हूँ’ का ही अनुभव होता है। ‘हूँ’ में ‘मैं’ (असत्)का अंश भी है और ‘है’ (सत्) का अंश भी है। परंतु ‘मैं’ की मुख्यता रहनेके कारण ‘है’ गौण हो जाता है। तात्पर्य है कि ‘मैं’ का संस्कार मुख्य होनेसे अन्त:करणमें ‘मैं’ ही छाया रहता है, जिससे ‘है’ का अनुभव नहीं होता। इतना ही नहीं, ‘मैं’ की मुख्यता होनेसे ‘है’ भी ‘मैं’ के आश्रित दीखता है, जो कि वास्तवमें है नहीं। जब साधक यह अनुभव कर लेता है कि ‘मैं’ एकदेशीय, दृश्य (दीखनेवाला) और ज्ञेय (जाननेमें आनेवाला) है, तब आकाशमें तारेकी तरह ‘मैं’ अल्प हो जाता है अर्थात् ‘मैं’ की मुख्यता मिट जाती है। मुख्यता मिटनेपर ‘मैं’ गौण हो जाता है और ‘है’ मुख्य हो जाता है। ‘है’ की मुख्यता होनेपर ‘मैं’ की कृत्रिम सत्ता लुप्त हो जाती है; क्योंकि जो अल्प होता है, वह मर्त्य होता है—‘यदल्पं तन्मर्त्यम्’ (छान्दोग्य० ७।२४।१)। ‘मैं’ के मिटनेपर ‘हूँ’ ‘है’ में परिणत हो जाता है, जो कि पहलेसे ही है—

तेरा साहिब है घट मांही, बाहर नैना क्यों खोले।

कहत कबीर सुनो भाई साधो, साहिब पाया तृण-ओले॥

‘मैं’ ही तृण है, जिसकी ओटमें ‘है’ छिपा हुआ है! इस प्रकार अहंरहित स्वरूपके साक्षात्कारको ही उपनिषद्‍में कहा है—

आत्मानं चेद् विजानीयात् अयमस्मीति पूरुष:।

(बृहदा० ४। ४। १२)

इस अहंरहित चिन्मय सत्तामें न देश है, न काल है, न वस्तु है’ न क्रिया है, न व्यक्ति है, न घटना है, न परिस्थिति है, न अवस्था है। न जड है, न चेतन है, न स्थावर है, न जंगम है, न लोक है, न परलोक है, कुछ नहीं है, केवल चिन्मय सत्तामात्र है। इस चिन्मय सत्तामें सबकी स्वत:स्वाभाविक स्थिति है। सत्तामें स्वत:स्वाभाविक स्थितिको ही परम विश्राम, सहज समाधि, सहजावस्था* आदि नामोंसे कहा गया है। सहजावस्था स्वत:सिद्ध है। उसमें न प्रयत्न है, न अप्रयत्न है; न करना है, न नहीं करना है; न संयोग है, न वियोग है; न भाव है, न अभाव है; न स्थिरता है, न चञ्चलता है; न आना है, न जाना है। यह सहजावस्था कभी बनती-बिगड़ती नहीं। चाहे महाप्रलय हो जाय, चाहे महासर्ग हो जाय, चाहे करोड़ों ब्रह्माजी बीत जायँ, पर सहजावस्था ज्यों-की-त्यों रहती है—

इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागता:।

सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च॥

(गीता १४। २)

‘इस ज्ञानका आश्रय लेकर जो मनुष्य मेरी सधर्मताको प्राप्त हो गये हैं, वे महासर्गमें भी उत्पन्न नहीं होते और महाप्रलयमें भी व्यथित नहीं होते।’

भगवान् ने बहुत ही मार्मिक बात कही है—

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:।

(गीता २।१६)

‘असत् की सत्ता विद्यमान नहीं है अर्थात् असत् नित्य-निरन्तर निवृत्त है और सत् का अभाव विद्यमान नहीं है अर्थात् सत् नित्य-निरन्तर प्राप्त है।’

सत्ता एकमात्र सत्-तत्त्वकी ही है। असत् की सत्ता है ही नहीं। सत्-ही-सत् है, असत् है ही नहीं। जो निरन्तर बदल रहा है तथा नाशकी तरफ जा रहा है, उस असत् की सत्ता हो ही कैसे सकती है? जो भी सत्ता और महत्ता दीखनेमें आती है, वह सब सत् के कारण ही है। एक मार्मिक बात है कि सत् ही असत् को सत्ता देता है। कारण कि सत् असत् का विरोधी नहीं है, प्रत्युत सत् की जिज्ञासा असत् की विरोधी है। इसलिये ज्ञानी महापुरुष अज्ञानीसे द्वेष नहीं करते, प्रत्युत उनका भी आदर करते हैं। ब्रह्माजी भगवान् से कहते हैं—

तस्मादिदं जगदशेषमसत्स्वरूपं

स्वप्नाभमस्तधिषणं पुरुदु:खदु:खम्।

त्वय्येव नित्यसुखबोधतनावनन्ते

मायात उद्यदपि यत् सदिवावभाति॥

(श्रीमद्भा० १०। १४। २२)

‘यह सम्पूर्ण जगत् स्वप्नकी तरह असत्य, अज्ञानरूप तथा दु:ख-पर-दु:ख देनेवाला है। आप परमानन्द, ज्ञानस्वरूप तथा अनन्त हैं। यह मायासे उत्पन्न एवं मायामें विलीन होनेपर भी आपमें आपकी सत्तासे सत्यके समान प्रतीत होता है।’

यदि असत् (सृष्टि) की सत्ताको मानें तो भी उसका सनातन तथा अव्यय बीज* सत् ही है—

बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्।

(गीता ७। १०)

प्रभव: प्रलय: स्थानं निधानं बीजमव्ययम्।

(गीता ९। १८)

यदि असत् की सत्ता न मानें तो उसका बीज भी नहीं है, प्रत्युत केवल सत्-ही-सत् है—‘वासुदेव: सर्वम्’।

सत्-तत्त्वमें न आकर्षण है, न विकर्षण; न उपरति है, न आसक्ति; न सकामभाव है, न निष्कामभाव; न पूर्णता है, न अपूर्णता; केवल सत्-ही-सत् है। आकर्षण-विकर्षण, उपरति-आसक्ति आदि सब सापेक्ष हैं, पर तत्त्व निरपेक्ष है। अत: साधककी दृष्टि सत् की तरफ ही रहनी चाहिये। जिसकी सत्ता ही नहीं है, उसकी तरफ क्या देखें?

जब सत् के सिवाय कुछ है ही नहीं, तो फिर इसमें क्या अभ्यास करें? क्या चिन्तन करें? इसमें न कुछ करना है, न कुछ सोचना है, न कुछ निश्चय करना है, न कुछ प्राप्त करना है और न कुछ निवृत्त करना है। अत: असत् की निवृत्ति करनी ही नहीं है; क्योंकि असत् नित्यनिवृत्त है और सत् की प्राप्ति करनी ही नहीं है, क्योंकि सत् नित्य-निरन्तर प्राप्त है—ऐसा विचार करके चुप हो जायँ, कुछ भी चिन्तन न करें। न संसारका चिन्तन करें, न परमात्माका चिन्तन करें; क्योंकि चिन्तन करनेसे हम संसारके साथ जुड़ते हैं और परमात्मासे दूर होते हैं। अत: चिन्तन नहीं करना है, प्रत्युत चिन्तन करनेकी शक्ति जिससे प्रकाशित होती है, उसमें स्वत:सिद्ध स्थितिका अनुभव करना है। जिस ज्ञानके अन्तर्गत वृत्तियाँ दीखती हैं, उस ज्ञानमें स्वत:सिद्ध स्थितिका अनुभव करना है। अपने-आप कोई चिन्तन, स्फुरणा आ जाय तो उसकी तरफ खयाल न करके उसकी उपेक्षा कर दें। जैसे जलके स्थिर (शान्त) होनेपर उसमें मिली हुई मिट्टी अपने-आप नीचे बैठ जाती है, ऐसे ही चुप होनेपर सब विकार अपने-आप शान्त हो जाते हैं, अहम् गल जाता है और वास्तविक तत्त्व (अहंरहित सत्ता) का अनुभव हो जाता है।

सहजनिवृत्ति और स्वत:प्राप्ति

जिसको साधक करना चाहता है, वह स्वत: ही हो रहा है! जैसे, वह संसारकी निवृत्ति करना चाहता है तो संसारकी सहज-निवृत्ति निरन्तर हो रही है और वह परमात्माको प्राप्त करना चाहता है तो परमात्मा स्वत:प्राप्त हैं।

एक विभाग जड प्रकृति (शरीर तथा संसार) का है और एक विभाग चेतन तत्त्व (जीवात्मा तथा परमात्मा)का है। प्रकृतिकी सहज-निवृत्ति है और तत्त्वकी स्वत:प्राप्ति है।

प्रकृतिमें निरन्तर परिवर्तनरूप क्रिया हो रही है। वह किसी भी अवस्थामें अक्रिय नहीं रहती। प्रवृत्ति और निवृत्ति अथवा सर्ग-महासर्ग और प्रलय-महाप्रलय—दोनों ही अवस्थाओंमें प्रकृतिकी क्रियाशीलता (सहजनिवृत्ति) ज्यों-की-त्यों रहती है। अत: उसकी प्रतीति तो होती है, पर प्राप्ति नहीं होती। तात्पर्य है कि अपना शरीर तथा स्त्री, पुत्र, धन, जमीन, मकान आदि पहले भी हमारे साथ नहीं थे, बादमें भी हमारे साथ नहीं रहेंगे तथा अभी भी निरन्तर हमारेसे बिछुड़ रहे हैं। परंतु तत्त्वकी स्वत:प्राप्ति है; क्योंकि वह कभी भी हमारेसे बिछुड़ता नहीं। जैसे यह सबका अनुभव है कि बचपनमें हमारा शरीर जैसा था, वैसा अब नहीं है, सर्वथा बिछुड़ गया और अब भी निरन्तर बिछुड़ रहा है; परंतु हम स्वयं वही हैं, जो कि बचपनमें थे। अत: जो निरन्तर बिछुड़ रहा है, वह असत् है तथा उसकी सहजनिवृत्ति है और जो वही है, कभी बिछुड़ता नहीं, वह सत् है तथा उसकी स्वत:प्राप्ति है।

असत् की सहज निवृत्ति है अर्थात् उसकी निवृत्ति करनी नहीं पड़ती, प्रत्युत वह स्वत: निरन्तर निवृत्त हो रहा है। यह सहजनिवृत्ति स्वत:सिद्ध है। इस सहजनिवृत्तिका कभी अभाव होता ही नहीं, इसमें कभी बाधा पड़ती ही नहीं, इसमें कभी विश्राम होता ही नहीं।

जैसे पृथ्वी अपनी धुरीपर निरन्तर घूम रही है, ऐसे ही देखने-सुनने-समझनेमें जो संसार आता है, उसकी निरन्तर निवृत्ति हो रही है। संसारमात्र निरन्तर अभावमें जा रहा है। चाहे उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय हो, चाहे जन्म, जीवन और मरण हो, चाहे बालक, जवान और वृद्धावस्था हो, सहजनिवृत्ति ज्यों-की-त्यों है। घोर-से-घोर प्रवृत्तिमें भी सहजनिवृत्ति ज्यों-की-त्यों है, उसका भान चाहे न हो।

सत् की स्वत:प्राप्ति है। सत् कभी अप्राप्त हुआ ही नहीं, अप्राप्त है ही नहीं, अप्राप्त होगा ही नहीं, अप्राप्त होना सम्भव ही नहीं। वह सब देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, अवस्था, परिस्थिति, घटना आदिमें ज्यों-का-त्यों परिपूर्ण है। सत् की प्राप्ति स्वत:सिद्ध है, करनी नहीं पड़ती। पापी-से-पापी, अज्ञानी-से-अज्ञानी मनुष्य हो अथवा पुण्यात्मा, तत्त्वज्ञ, जीवन्मुक्त, भगवत्प्रेमी महापुरुष हो, सत् (स्वत:प्राप्त तत्त्व) किसीको भी अप्राप्त नहीं है। फर्क केवल इतना है कि अज्ञानी उसका अनुभव नहीं करता और ज्ञानी उसका अनुभव करता है। प्राप्तको अप्राप्त और अप्राप्तको प्राप्त मान लिया—इस भूलके कारण ही स्वत:प्राप्तका अनुभव नहीं होता।

जिसकी निरन्तर सहजनिवृत्ति है, उसका सुख लोलुपतापूर्वक आकर्षण ही स्वत:प्राप्तके अनुभवमें खास बाधक है। आकर्षणका कारण है—असत् की सत्ता और महत्ता, जो कि हमारी ही दी हुई है। अगर हम असत् को सत्ता और महत्ता न दें तो उसकी ताकत नहीं है कि वह हमारेको अपनी तरफ आकर्षित कर सके। जैसे, पहले भोगे हुए भोगकी याद आती है तो एक सुखका अनुभव होता है और दु:खकी याद आती है तो दु:खका अनुभव होता है। सुख-दु:खका वह भोग अभी नहीं है, उसका वर्तमानमें सर्वथा अभाव है, फिर भी उसके चिन्तनमात्रसे सुख अथवा दु:ख मिलता है। इससे सिद्ध हुआ कि हमने उसको सत्ता और महत्ता दी है, जो कि अभावरूप है! अगर सत्ता और महत्ता न देते तो जिसका वर्तमानमें अभाव है, उस भूतकालके चिन्तनसे सुख अथवा दु:ख नहीं होता।

जैसे भूतकालकी वस्तु वर्तमानमें अप्राप्त है, ऐसे ही वर्तमानमें मिली हुई वस्तु भी अप्राप्त है! मिली हुई वस्तु निरन्तर बिछुड़ रही है। जैसे भूतकालकी वस्तु याद आयी और भूल गयी, ऐसे ही वर्तमानकी वस्तु मिल गयी और बिछुड़ गयी—दोनोंमें क्या फर्क हुआ? उसकी प्राप्ति सिद्ध नहीं होती, प्रत्युत निवृत्ति ही सिद्ध होती है।

यह नियम है कि जो किसी भी जगह अप्राप्त है, वह सभी जगह अप्राप्त है। जो किसी भी समय अप्राप्त है, वह सदा ही अप्राप्त है। जो किसी भी वस्तुमें अप्राप्त है, वह सभी वस्तुओंमें अप्राप्त है। जो किसी भी मनुष्यको अप्राप्त है, वह सभी मनुष्योंको अप्राप्त है। जो किसी भी अवस्थामें अप्राप्त है, वह सभी अवस्थाओंमें अप्राप्त है। जो किसी भी परिस्थितिमें अप्राप्त है, वह सभी परिस्थितियोंमें अप्राप्त है। तात्पर्य है कि जो किसी भी देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, अवस्था, परिस्थिति आदिमें अप्राप्त है, वह कहीं भी प्राप्त नहीं है; क्योंकि मिला हुआ निरन्तर बिछुड़ रहा है। अत: वास्तवमें संसार कभी प्राप्त हुआ नहीं, प्राप्त है नहीं, प्राप्त होगा नहीं, प्राप्त होना सम्भव ही नहीं। जिसकी निरन्तर सहजनिवृत्ति है, उसकी प्राप्ति हो ही कैसे सकती है?

संसारमें राग होनेके कारण ही सहजनिवृत्तिमें भी प्रवृत्ति दीखती है, अप्राप्त भी प्राप्त दीखता है। जैसे हमारी उम्र प्रतिक्षण नष्ट हो रही है, शरीर प्रतिक्षण मर रहा है; परन्तु असत् में रागके कारण हमें दीखता है कि हम (शरीरसे) जी रहे हैं।

असत् के रागके कारण ही यह कहना पड़ता है कि सहजनिवृत्ति निरन्तर हो रही है। वास्तवमें तो संसार सहज-निवृत्त, स्वत:निवृत्त, नित्यनिवृत्त ही है। भगवान् ने कहा है—

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:।

उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभि:॥

(गीता २। १६)

‘असत् का भाव (सत्ता) विद्यमान नहीं है और सत् का अभाव विद्यमान नहीं है। तत्त्वदर्शी महापुरुषोंने इन दोनोंका ही अन्त (तत्त्व) देखा है।’

जो निवृत्त है, वह ‘असत्’ है और वह कभी प्राप्त नहीं होता। जो प्राप्त है, वह ‘सत्’ है और वह कभी निवृत्त नहीं होता। निवृत्तका नित्यवियोग है और प्राप्तका नित्ययोग है। असत् का केवल अभाव-ही-अभाव है और इस अभावका कभी अभाव (नाश) नहीं होता। सत् का केवल भाव-ही-भाव है और इस भावका कभी अभाव नहीं होता। असत् असत् ही है और सत् सत् ही है। असत् है ही नहीं और सत् है ही! तत्त्वज्ञ महापुरुषोंने सत् और असत्— दोनोंका ही तत्त्व देखा है। तात्पर्य है कि सत् का तत्त्व भी सत् है और असत् का तत्त्व भी सत् है अर्थात् दोनोंका तत्त्व सत् (सत्तामात्र) ही है।

असत् को सत्ता देनेसे ही निवृत्त (सहजनिवृत्त) और प्राप्त (स्वत:प्राप्त)—ये दो विभाग कहे जाते हैं। असत् को सत्ता न दें तो न निवृत्त है, न प्राप्त है, प्रत्युत सत्तामात्र ज्यों-की-त्यों है! दूसरे शब्दोंमें, जबतक असत् की सत्ता है, तबतक विवेक है। असत् की सत्ता मिटनेपर विवेक ही तत्त्वज्ञानमें परिणत हो जाता है; क्योंकि जब असत् की सत्ता है ही नहीं, तो फिर सत् ही शेष रहेगा। इसीको गीताने ‘वासुदेव: सर्वम्’ कहा है।

जैसा है, वैसा जान लेनेका नाम ‘ज्ञान’ है। है और तरहका, जाने और तरहसे—इसका नाम ‘अज्ञान’ है। जैसे, संसारकी निरन्तर सहजनिवृत्ति हो रही है—ऐसा जानना ज्ञान है और संसार प्राप्त है—ऐसा जानना अज्ञान है। परमात्मतत्त्व स्वत:प्राप्त है—ऐसा जानना ज्ञान है और परमात्मतत्त्व अप्राप्त है—ऐसा जानना अज्ञान है। अत: साधकके लिये खास बात यह है कि वह ‘संसारकी निरन्तर सहजनिवृत्ति हो रही है और तत्त्व सभीको स्वत: प्राप्त है’—इस ज्ञान (विवेक) को महत्त्व दे। महत्त्व देनेसे यह ज्ञान ही तत्त्वज्ञानतक पहुँच जायगा और अज्ञान सर्वथा मिट जायगा।

प्रश्न—संसारकी निरन्तर सहजनिवृत्ति हो रही है— यह तो प्रत्यक्ष दीखता है, पर तत्त्व स्वत:प्राप्त है—यह कैसे दीखे?

उत्तर—जिस ज्ञानके अन्तर्गत सहजनिवृत्ति दीखती है, वह ज्ञान निरन्तर स्वत:प्राप्त है। कारण कि निरन्तर मिटनेवालेको मिटनेवाला नहीं देख सकता, प्रत्युत रहनेवाला ही देख सकता है। जानेवालेका अनुभव जानेवालेको नहीं हो सकता, प्रत्युत रहनेवालेको ही हो सकता है। विनाशीका अनुभव विनाशीको नहीं हो सकता, प्रत्युत अविनाशीको ही हो सकता है। बदलनेवालेको बदलनेवाला नहीं जान सकता, प्रत्युत न बदलनेवाला ही जान सकता है। सीमितका ज्ञान सीमितको नहीं हो सकता, प्रत्युत असीमको ही हो सकता है।

जाननेवालेका विभाग अलग है और जाननेमें आनेवालेका विभाग अलग है। जाननेवाला ‘सत्’ है और जाननेमें आनेवाला ‘असत्’ है। न बदलनेवाला ‘सत्’ है और बदलनेवाला ‘असत्’ है। अत: जिससे सहजनिवृत्ति दीखती है, वही स्वत:प्राप्त है और वही हमारा स्वरूप है।

देखनेवाला ‘है’ है और दीखनेवाला ‘नहीं’ है। इसीलिये कहा है—

है सो सुन्दर है सदा, नहिं सो सुन्दर नाहिं।

नहिं सो परगट देखिये, है सो दीखे नाहिं॥

‘नहीं’ को ‘है’ माननेसे दृष्टि ‘नहीं’ में ही अटक जाती है, ‘है’ तक पहुँचती ही नहीं, फिर ‘है’ कैसे दीखे? अत: साधकको चाहिये कि वह जिस ज्ञानके अन्तर्गत ‘नहीं’ दीख रहा है, उस ज्ञानमें स्थिर अर्थात् चुप हो जाय। फिर जो अभी नहीं दीखता है, वह दीखने लग जायगा!

संसारमें तरह-तरहकी क्रियाएँ हो रही हैं, व्यवहार हो रहा है, परिवर्तन हो रहा है, पर वह सब जिसके अन्तर्गत हो रहा है, उस ‘है’ में क्रिया, व्यवहार, परिवर्तन आदि कुछ नहीं है। वह नित्य सत्ता (‘है’) ज्यों-की-त्यों है। कोई जन्म रहा है, कोई मर रहा है; कोई आ रहा है, कोई जा रहा है; कोई हँस रहा है, कोई रो रहा है; कोई सुखी है, कोई दु:खी है; कोई क्रुद्ध है, कोई शान्त है; कोई भोगमें लगा है, कोई योगमें लगा है; कोई बोल रहा है, कोई चुप बैठा है; कोई जाग रहा है, कोई सो रहा है; परन्तु इन सबमें एक ही सत्ता समानरूपसे ज्यों-की-त्यों परिपूर्ण है। उस सत्तामें कभी किञ्चित् भी कोई फर्क नहीं पड़ता। अत: मर्यादापूर्वक सब व्यवहार करते हुए भी साधककी दृष्टि उस समरूप सत्तापर ही रहनी चाहिये। गीतामें आया है—

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।

शुनि चैव श्वपाके च पण्डिता: समदर्शिन:॥

(५। १८)

‘ज्ञानी महापुरुष विद्या-विनययुक्त ब्राह्मणमें और चाण्डालमें तथा गाय, हाथी एवं कुत्तेमें भी समरूप परमात्मतत्त्वको देखनेवाले होते हैं।’

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।

विनश्यत्स्वविनश्यन्तं य: पश्यति स पश्यति॥

(१३। २७)

‘जो नष्ट होते हुए सम्पूर्ण प्राणियोंमें परमात्माको नाशरहित तथा समरूपसे स्थित देखता है, वही वास्तवमें सही देखता है।’

यह नित्य सत्ता ही कर्मयोगकी दृष्टिसे ‘अकर्म’ है, ज्ञानयोगकी दृष्टिसे ‘आत्मा’ है और भक्तियोगकी दृष्टिसे ‘भगवान्’ है। इसलिये कर्मयोगी कर्ममें अकर्मको तथा अकर्ममें कर्मको देखता है—

कर्मण्यकर्म य: पश्येदकर्मणि च कर्म य:।

(गीता ४। १८)

ज्ञानयोगी सम्पूर्ण प्राणियोंमें आत्माको तथा आत्मामें सम्पूर्ण प्राणियोंको देखता है—

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।

(गीता ६।२९)

भक्तियोगी सबमें भगवान् को तथा भगवान् में सबको देखता है—

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।

(गीता ६।३०)

तात्पर्य है कि कर्मयोगी सम्पूर्ण कर्मोंमें एक अकर्म (कर्मोंके साथ सम्बन्धका अभाव अर्थात् निर्लिप्तता) को ही देखता (अनुभव करता) है, ज्ञानयोगी सम्पूर्ण प्राणियोंमें एक आत्माको ही देखता है और भक्तियोगी सबमें एक भगवान् को ही देखता है। कर्मयोगी कर्म और कर्मफलके साथ सम्बन्ध न रखकर केवल दूसरोंके हितके लिये सब कर्म करता है। अत: उसको कर्मोंके साथ सम्बन्धके अभावका अर्थात् निर्लिप्तताका अनुभव हो जाता है। जैसे मनमें कभी हरिद्वारका चिन्तन होता है, कभी कलकत्तेका चिन्तन होता है और मनमें वहाँकी अलग-अलग वस्तुएँ, प्राणी आदि दीखने लगते हैं तो वह सब कुछ मन ही बना हुआ है। मनोराज्यमें एक मनके सिवाय किसी भी प्राणी-पदार्थकी सत्ता नहीं है। ऐसे ही ज्ञानयोगीकी दृष्टिमें एक आत्माके सिवाय और किसीकी भी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती। जैसे ब्रह्माजीने ग्वालबालोंको और बछड़ोंको चुरा लिया तो भगवान् श्रीकृष्ण ही ग्वालबाल, बछड़े आदि अनेक रूपोंमें हो गये। भगवान् की इस लीलाका पता किसीको भी नहीं लगा। एक दिन गायोंका अपने बछड़ोंके प्रति और गोपोंका अपने बालकोंके प्रति अपूर्व स्नेह देखकर बलदेवजीको शंका हुई तो उन्होंने देखा कि एक भगवान् श्रीकृष्ण ही बछड़ों और ग्वालबालोंके रूपमें बने हुए हैं। ऐसे ही भक्तियोगी सब रूपोंमें भगवान् को ही देखता है अर्थात् उसकी दृष्टिमें एक भगवान् के सिवाय और किसीकी भी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती।

चाहे अकर्म कहें, चाहे आत्मा कहें और चाहे भगवान् कहें, तत्त्वसे तीनों एक (बोधस्वरूप सत्तामात्र) ही हैं। उस चिन्मय सत्ता (‘है’) की तरफ दृष्टि, लक्ष्य चला जाय—यही उसकी प्राप्ति है! फिर भी कोई दोष, विकार दीखे तो साधकको घबराना नहीं चाहिये। जैसे साँपको देखकर हम डर गये, पर उसी समय पता लगा कि यह तो रस्सी है। रस्सीका पता लगनेपर भी कुछ देरतक भयका असर रहता है, हाथोंमें कँपकँपी रहती है, हृदय धड़कता रहता है। परंतु यह कँपकँपी, धड़कन अपने-आप शान्त हो जाती है। ऐसे ही साधककी दृष्टि एक ‘है’ पर ही रहे तो सब विकार अपने-आप शान्त हो जायँगे। वह ‘है’ इतना ठोस है कि उसमें कोई दूसरी चीज प्रवेश कर सकती ही नहीं। उसमें किसी शंका आदिके लिये स्थान ही नहीं है। जब हमारी दृष्टि वहाँ नहीं थी, तब भी वह ‘है’ ज्यों-का-त्यों परिपूर्ण था और अब वहाँ दृष्टि जानेपर भी वह ज्यों-का-त्यों परिपूर्ण है—

दौड़ सके तो दौड़ ले, जब लगि तेरी दौड़।

दौड़ थक्या धोखा मिटॺा, वस्तु ठौड़-की-ठौड़॥

इसी बातको अर्जुनने कहा है—‘नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा’ (गीता १८। ७३) ‘मेरा मोह नष्ट हो गया है तथा स्मृति प्राप्त हो गयी है।’

भूल मिटनेका नाम ‘स्मृति’ है। भूल जाने हुएकी ही होती है और जाननेके अन्तर्गत ही प्रकाशित होती है। जिसकी सत्ता विद्यमान नहीं है, उसको विद्यमान मान लिया—यह भूल है। भूलको भूलरूपसे जानते ही भूल मिट जाती है और स्मृति प्राप्त हो जाती है। इस स्मृतिकी फिर कभी विस्मृति नहीं होती ‘यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव।’ (गीता ४।३५) कारण कि स्मृति अर्थात् बोध एक ही बार होता है और सदाके लिये होता है। तात्पर्य है कि बोधकी आवृत्ति नहीं होती। बोध एक बार अनुभवमें, दृष्टिमें आ गया तो सदाके लिये आ ही गया! वास्तवमें बोधका अभाव विद्यमान है ही नहीं अर्थात् बोध स्वत:प्राप्त है और उसको जाननेवाला अन्य कोई नहीं है। जबतक बोधको जाननेवाला अन्य कोई है, तबतक वास्तवमें बोध हुआ ही नहीं। स्वयं बोधस्वरूप है और उसको जाननेवाला भी स्वयं ही है, जैसा कि अर्जुनने भगवान् के लिये कहा है—‘स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम’ (गीता १०। १५) ‘हे पुरुषोत्तम! आप स्वयं ही अपने-आपसे अपने-आपको जानते हैं।’

प्रश्न—बोध स्वत:प्राप्त कैसे है?

उत्तर—यह प्रत्यक्ष अनुभवकी बात है कि नाशवान् हमारे जाननेमें आता है और हम उसको जाननेवाले हैं। अहम् हमारे जाननेमें आता है और हम उसको जाननेवाले हैं। विकार हमारे जाननेमें आते हैं और हम उनको जाननेवाले हैं। देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, अवस्था, परिस्थिति, घटना आदि सबका अभाव हमारे जाननेमें आता है, पर अपना (स्वयंका) अभाव कभी हमारे जाननेमें नहीं आता। जो जाननेमें आता है, वह हमारेसे अलग है और जो जानता है, वह हमारा स्वरूप है। जो जाननेमें आता है, वह असत् है तथा उसकी सत्ता विद्यमान नहीं है और जो जाननेवाला है, वह सत् है तथा उसका अभाव विद्यमान नहीं है। अत: जाननेमें आनेवाला और जाननेवाला—दोनोंका विभाग बिलकुल अलग-अलग है—यह वास्तविक बात हमारे जाननेमें आ गयी, अनुभवमें आ गयी, दृष्टिमें आ गयी, तो फिर इसमें क्या अभ्यास है? हम एक नदीको देख रहे हैं और किसी जानकार आदमीने बताया कि यह गङ्गाजी है, तो अब इसमें क्या अभ्यास है? यह गङ्गाजी है—यह ज्ञान एक ही बार होगा, बार-बार नहीं होगा और सदाके लिये होगा। कारण कि सच्ची बात कभी कच्ची नहीं हो सकती और कच्ची बात कभी सच्ची नहीं हो सकती। सच्ची बातको स्वीकार करनेमें क्या परिश्रम है? अभ्यास तो दृढ़-अदृढ़ होता है, पर सच्ची बातकी स्वीकृति कभी अदृढ़ होती ही नहीं! तात्पर्य यह हुआ कि बोध तो स्वत:प्राप्त है, पर हमारे पुराने संस्कार, पुरानी मान्यताएँ उसमें बाधक हो रही हैं, जो कि असत्-रूप हैं और सत्तारूपसे मानी हुई हैं; जैसे—सब काम धीरे-धीरे, समय पाकर होते हैं, फिर बोध तत्काल कैसे हो जायगा? अनादिकालका अज्ञान इतनी जल्दी कैसे मिट जायगा? आदि-आदि। यह सब हमारा वहम है। एक गुफामें लाखों वर्षोंसे अँधेरा हो और उसमें दीपक जला दिया जाय तो क्या अँधेरा दूर होनेमें भी लाखों वर्ष लगेंगे?

साधकको आज ही यह बात समझकर दृढ़ कर लेनी चाहिये कि असत् का विभाग ही अलग है। स्वयंका असत् से सम्बन्ध कभी हुआ ही नहीं, होगा ही नहीं, है ही नहीं और होना सम्भव ही नहीं। असत् से तादात्म्य (मैं-मेरापन) के कारण ही असत् का आकर्षण स्वयंमें दीखता है। वास्तविक दृष्टिसे देखा जाय तो असत् में ही असत् का आकर्षण है, असत् में ही असत् की सत्ता और महत्ता है, असत् में ही सब दोष हैं, असत् में ही सब विकार हैं, असत् में ही कर्ता और भोक्ता है, असत् में ही उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय है, असत् में ही भूत, भविष्य और वर्तमान है, असत् में ही क्रिया और पदार्थ हैं, असत् में ही जन्म-मरण है, असत् में ही बन्धन है! स्वयं (सत्) तो इन सबको जाननेवाला तथा इनसे अलग है। ये जन्म-मरण आदि सब बातें तो भूतकालकी हैं, उनकी सत्ता ही नहीं है। परन्तु स्वयं सदा वर्तमान है। गीतामें आया है—

सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते।

(१३। २३)

अर्थात् जो सर्वथा वर्तमान है, उसका फिर जन्म नहीं होता। कारण कि जो सदा वर्तमान ही रहता है, वह कैसे मरेगा? और बिना मरे फिर जन्म भी कैसे होगा? वर्तमान तो सदा निर्दोष ही होता है।

प्रश्न—मनुष्य जो भी दोष करता है, वह वर्तमानमें ही करता है, फिर वर्तमान निर्दोष कैसे?

उत्तर—वर्तमानका अर्थ है—स्वयं; क्योंकि स्वयं निरन्तर वर्तमान (विद्यमान) रहता है—‘नाभावो विद्यते सत:।’ स्वयंका वर्तमान होना कालके अधीन नहीं है अर्थात् इसमें भूत, भविष्य और वर्तमानका भेद नहीं है। अत: स्वयंका स्वरूप है—सत्तामात्र। यह सत्ता निरन्तर रहनेवाली और सर्वथा निर्दोष है—‘निर्दोषं हि समं ब्रह्म’ (गीता ५। १९)। इसलिये किसीका भी वर्तमान दोषी नहीं है।

अगर कालकी दृष्टिसे विचार करें तो भी वर्तमानकाल सबका निर्दोष है। कारण कि मनुष्य भूतकालमें किये दोषसे ही अपनेको दोषी मानता है। दोषके समय मनुष्य अपनेको दोषी नहीं मानता; क्योंकि उस समय उसमें बेहोशी, असावधानी रहती है। अत: वर्तमानमें वह है तो निर्दोष ही!

दोषोंकी स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं है। गुणोंकी कमीको ही दोष कह देते हैं। निर्दोषता स्वत:सिद्ध है और कमी अपनी ही बनायी हुई है। असत् को सत्ता और महत्ता देनेसे ही अपनेमें कमी प्रतीत होती है। अत: सम्पूर्ण दोषोंकी प्रतीति असत् को सत्ता और महत्ता देनेसे ही है। अगर असत् को सत्ता और महत्ता न दें तो दोषोंकी प्रतीति है ही कहाँ?

दोषोंका भाव (सत्ता) विद्यमान नहीं है और निर्दोषताका अभाव विद्यमान नहीं है। दोषोंका आदि और अन्त होता है, पर निर्दोषताका आदि और अन्त नहीं होता। इसलिये दोषोंके आदि-अन्तका, आने-जानेका तथा अभावका अनुभव तो सबको होता है, पर अपने (स्वयंके) आदि-अन्तका, आने-जानेका तथा अभावका अनुभव कभी किसीको नहीं होता; क्योंकि स्वयं निरन्तर निर्दोष, निर्विकार रहता है। तात्पर्य है कि दोषोंकी सहजनिवृत्ति है और निर्दोषता स्वत:प्राप्त है।