भगवद्भजनका स्वरूप
श्रीभगवान् कहते हैं—
‘अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्।’
—इस भगवद्वचनके अनुसार हमें तुरन्त भगवद्भजनमें लग जाना चाहिये। श्रीभगवान् ने इस श्लोकार्धमें बतलाया कि ‘अनित्यम् असुखम् इमम् लोकम् प्राप्य माम् भजस्व।’ अनित्य कहनेका तात्पर्य यह है कि देर न करो, क्या पता है—
दम आया न आया खबर क्या है?
यदि अभी श्वास बंद हो जाय तो फिर कुछ भी न हो सकेगा। विचारी हुई बातें सब वैसी-की-वैसी ही रह जायँगी। सब गुड़ गोबर हो जायगा, क्योंकि शरीर क्षणभङ्गुर है, यह एक क्षण भी स्थिर नहीं रहता, प्रतिक्षण बड़ी तेजीसे जा रहा है और जा रहा है उस मृत्युकी ओर, जिसको कोई नहीं चाहता। वही मृत्यु प्रतिक्षण समीप आ रही है। प्रतिघंटा ९०० श्वास जा रहे हैं, २४ घंटोंमें २१६०० श्वास चले जाते हैं। जरा इस ओर ध्यान देना चाहिये। खर्च तो यह हो रहा है और कमाई क्या कर रहे हैं? किस बातकी प्रसन्नता है?
छ: सौ सहस इकीस दम जावत हैं दिन रात।
एतो टोटो ताहि घर काहेकी कुसलात॥
दूसरा पद कहा है—‘असुखम्’ यानी यहाँ इस लोकमें सुख नहीं है। यह लोक सुखरहित है। इतनी ही बात नहीं है, भगवान् तो कहते हैं—‘दु:खालयमशाश्वतम्।’ दु:खालय है; किंतु हम तो इसमें ठीक इसके विपरीत सुख ढूँढ़ते हैं, यह कितने आश्चर्यकी बात है। जैसे कोई आदमी विद्यालयमें धोती आदि कपड़े खोजे, औषधालयमें मिठाईका भाव पूछे वैसे ही हम इस दु:खालयमें सुख ढूँढ़ रहे हैं। इस संसारमें सुखकर वस्तुएँ मानी जाती हैं—धन, स्त्री, पुत्र, घर और भोग। इन सबमें विचार करके देखें तो वास्तवमें सुख है ही नहीं, आदि-अन्तमें सर्वत्र दु:ख-ही-दु:ख है।
यहाँ एक बात ध्यान देनेकी है कि हमें वही वस्तु सुख दे सकती है, जिसका हमारे पास अभाव है और हम जिसे चाह रहे हैं। उसके लिये चाहना जितनी ही बलवती होगी, उतना ही उस वस्तुके मिलनेपर सुख अधिक होगा। अभाव रहते हुए भी यदि उसके अभावका अनुभव नहीं है यानी उसके लिये छटपटाहट नहीं है तो वह वस्तु प्राप्त होकर भी हमें सुखी नहीं बना सकती। अत: धन आदि पदार्थोंसे सुख प्राप्त करनेके लिये पहले धनके अभावका दु:ख अत्यावश्यक है। यह तो हुआ वस्तुके होनेसे पहले होनेवाला दु:ख। फिर वे धनादि पदार्थ मनोरथके अनुसार प्राय: मिलते नहीं। यह हुआ दूसरा दु:ख। मिल भी जायँ तो हमसे दूसरेको अधिक मिल जाते हैं तो वह एक नया दु:ख खड़ा हो जाता है, यह हुआ तीसरा दु:ख। और मिलनेपर उसके नाशकी आशङ्का बनी ही रहती है, जो महान् चिन्ताका कारण है। यह हुआ चौथा दु:ख। एवं होकर नष्ट हो जानेपर तो बहुत ही कष्ट भोगना पड़ता है। उस समय जो दु:ख होता है, वह उसके अभावके समय भी नहीं था। यह हुआ पाँचवाँ दु:ख। श्रीपतञ्जलिने कहा है—
परिणामतापसंस्कारदु:खैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दु:खमेव सर्वं विवेकिन:।
‘परिणामदु:ख, तापदु:ख और संस्कारदु:ख—ऐसे तीन प्रकारके दु:ख सबमें विद्यमान रहनेके कारण और तीनों गुणोंकी वृत्तियोंमें परस्पर विरोध होनेके कारण विवेकीके लिये सब-के-सब (कर्मफल) दु:खरूप ही हैं।’
मायाकी मोहनी शक्तिसे ही यह अनुभव होता है कि धनादि पदार्थोंके इतने रूपमें प्राप्त हो जानेपर हम बहुत सुखी हो जायँगे। ऐसी आशा और कथन तो हम सुनते आ रहे हैं; पर अभीतक ऐसा संसारी मनुष्य कोई नहीं मिला, जो यह कह दे कि हम पूर्ण सुखी हो गये हैं। प्रत्युत यह कहते तो प्राय: सभी देखे जाते हैं कि ‘हम तो पहलेसे भी अधिक दु:खी हैं।’ कहा भी है—
एकस्य दु:खस्य न यावदन्तं
गच्छाम्यहं पारमिवार्णवस्य।
तावद् द्वितीयं समुपस्थितं मे
छिद्रेष्वनर्था बहुलीभवन्ति॥
‘जबतक समुद्रको पार करनेकी तरह एक दु:खका अन्त नहीं होता कि उसी बीचमें दूसरा दु:ख आ धमकता है; ठीक ही तो है अभावोंमें तो अनर्थोंकी बहुलता होती ही है।’
एक वस्तुके अभावका अनुभव होनेपर उसकी पूर्तिके लिये चेष्टा करते हैं, किंतु प्राय: उसकी सिद्धि होती नहीं; कहीं दैवसंयोगसे हो भी जाती है तो फिर उसमें कई अन्य नये-नये अभावोंकी सृष्टि होने लगती है, जिनकी कि पहले कभी सम्भावना ही नहीं थी। इसीलिये श्रीभगवान् ने कहा है—
ये हि संस्पर्शजा भोगा दु:खयोनय एव ते।
आद्यन्तवन्त: कौन्तेय न तेषु रमते बुध:॥
‘विषय और इन्द्रियोंके सम्बन्धसे होनेवाले जितने भी सांसारिक सुख हैं, सब-के-सब ही दु:खयोनि यानी दु:खोंकी प्रसवभूमि—दु:खोंको पैदा करनेवाली खानें हैं, एवं उत्पत्ति और विनाशसे संयुक्त हैं। अत: हे अर्जुन! बुद्धिमान्-विवेकी मनुष्य उनमें नहीं रमता।’
विचार करके देखा जाय तो किसी भी सांसारिक प्राणीको अपनी परिस्थितिमें पूर्ण सुख और संतोष नहीं है; क्योंकि वह उससे भी और अधिक सुखके लिये सदा लालायित तथा प्रयत्नशील रहता है। शास्त्रमें बतलाया है—
न सुखं देवराजस्य न सुखं चक्रवर्तिन:।
यत् सुखं वीतरागस्य मुनेरेकान्तशीलिन:॥
किसी राजस्थानी कविने बड़ा ही सुन्दर कहा है—
ना सुख काजी पण्डिताँ ना सुख भूप भयाँ।
सुख सहजाँ ही आवसी तृष्णा-रोग गयाँ॥
तीसरी बात कहते हैं कि ‘इमं लोकं प्राप्य’। यहाँ ‘इमं लोकम्’ इन पदोंसे संकेत है मनुष्य-शरीरकी ओर; भगवान् कहते हैं कि इस मानव-शरीरको प्राप्त करके तो मेरा भजन ही करना चाहिये, क्योंकि—
एहि तन कर फल बिषय न भाई।
स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई॥
नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं।
पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं॥
ताहि कबहुँ भल कहइ न कोई।
गुंजा ग्रहइ परस मनि खोई॥
अतएव इस मानव-देहको प्राप्त करके तो केवल भगवद्भजन ही करना चाहिये; क्योंकि दूसरे-दूसरे काम तो अन्यान्य शरीरोंमें भी हो सकते हैं, पर भजनका अवसर तो केवल इसी शरीरमें है। देवादि शरीरोंमें तो भोगोंकी भरमार है तथा वहाँ अधिकार न होनेसे भी भजन कर नहीं सकते और नरकोंमें केवल पापोंके फलोंका भोग होता है,वहाँ नया कर्म करनेका न अधिकार है और न उनको कर्तव्याकर्तव्यका ज्ञान ही है। इसी प्रकार अन्य चौरासी लाख योनियोंमें भी कर्तव्याकर्तव्यका कुछ भी ज्ञान नहीं रहता तथा साधन-सामग्री नहीं और अधिकार भी नहीं। अधिकार, ज्ञान और सामग्री—ये तीनों केवल इस मानव-शरीरमें ही हैं। कहीं-कहीं पशु-पक्षी आदिकोंमें भी भगवद्भक्ति आदि देखनेमें आती है तो वे अपवादस्वरूप ही हैं।
श्रीतुलसीदासजी कहते हैं—
साधन धाम मोच्छ कर द्वारा।
पाइ न जेहिं परलोक सँवारा॥
सो परत्र दुख पावइ सिर धुनि धुनि पछिताइ।
कालहि कर्महि ईस्वरहि मिथ्या दोस लगाइ॥
इस कथनपर हमें ध्यान देकर विचार करना चाहिये। जो मनुष्य-शरीर पाकर साधन नहीं करते, वे कहते हैं—‘यह कलियुग है। समय बड़ा बुरा है। इस समय चारों ओर पाप-ही-पापका प्रचार हो रहा है; सत्य, अहिंसा आदि धर्मोंका पालन तथा भगवद्भजन हो ही नहीं सकता। यह कलिकाल बड़ा विकराल युग है, सबकी बुद्धि अधर्ममें लग रही है, क्या करें, समयकी बलिहारी है। जब सब-का-सब वायुमण्डल ही बिगड़ा हुआ है, तब एक मनुष्य क्या कर सकता है। यदि हम समयके अनुसार न चलें तो निर्वाह होना कठिन है और उसके अनुसार चलें तो पारमार्थिक साधन नहीं बन पाता।’ किंतु इसपर हमें विचार करना चाहिये, क्या हम सचमुच समयके अनुसार चलते हैं? कभी नहीं। जब शीतकाल आता है, तब गर्म कपड़े बनवाते हैं, आग आदिका यथोचित प्रबन्ध करते हैं, घरमें कमरा बंद करके रहते हैं—क्या यह समयके प्रतिकूल चलना नहीं है? ऐसे ही गर्मीके दिनोंमें ठंडे जल आदिका प्रयोग करते हैं, गर्मीसे बचनेके लिये सतत सावधान रहते हैं और वर्षामें भी यथायोग्य उपायोंसे भी त्राण पानेकी चेष्टा करते ही रहते हैं। अर्थात् सभी समय शरीरकी प्रतिकूलताके निवारण, उससे रक्षा एवं शरीरके अनुकूल सामग्री जुटानेके लिये चेष्टा करते रहते हैं। इसी प्रकार हमें कलिकालसे आध्यात्मिकताको बचानेकी चेष्टा करनी चाहिये। जैसे शरीरकी रक्षा न करनेपर शरीरका नाश हो जाता है, ऐसे ही आध्यात्मिक जीवनकी रक्षा न करनेसे उस लाभसे सर्वथा वञ्चित रहनेके लिये बाध्य होना पड़ेगा।
अत: समयको दोष देना मिथ्या है; क्योंकि आध्यात्मिक उन्नतिके लिये कलियुग बहुत उत्तम माना जाता है। कारण, इसमें भगवद्भजनका मूल्य बहुत मिलता है, बड़े सस्तेमें मुक्ति मिल जाती है, जैसी कि दूसरे युगोंमें सम्भव नहीं थी। श्रीतुलसीदासजी कहते हैं—
कलिजुग सम जुग आन नहिं जौं नर कर बिस्वास।
गाइ राम गुन गन बिमल भव तर बिनहिं प्रयास॥
इसलिये बिना प्रयास ही जिसमें संसारसमुद्रसे पार पहुँचा जा सके, ऐसे कलियुगको दोष देना सरासर भूल है।
इसी प्रकार जिन कर्मोंके फलस्वरूप मुक्तिका साधनरूप मानव-शरीर प्राप्त हुआ है, उन कर्मोंको दोष देना भी मिथ्या है। क्योंकि—
बड़े भाग मानुष तनु पावा।
सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा॥
बड़े भाग पाइब सतसंगा।
बिनहिं प्रयास होहिं भव भंगा॥
ईश्वरने भी बड़ी भारी कृपा कर दी कि जिससे कर्मोंका सब सम्बन्ध जुटाकर यानी इस समय मानव-शरीरके योग्य कर्म न रहनेपर भी मानव-शरीर देकर आत्मोद्धारके लिये सुअवसर दे दिया। एक राजस्थानी कविने कहा है—
करुणाकर कीन्हीं कृपा, दीन्हीं नरवर देह।
ना चीन्हीं कृतहीन नर खल कर दीन्हीं खेह॥
‘करुणानिधि भगवान् ने कृपा करके श्रेष्ठ मनुष्य-शरीर दे दिया, परंतु मूर्ख और कृतघ्न मनुष्यने उस शरीरको पहचाना नहीं; प्रत्युत उसे यों ही मिट्टीमें मिला दिया।’
ऐसे अकारण कृपालुको यह कहकर कि ‘क्या करें, भगवान् ने हमें ऐसा ही बना दिया, उन्होंने हमको संसारी बनाकर घरके काम-धंधोंमें फँसा दिया, कैसे भजन करें, भगवान् की मर्जी ही ऐसी है, वे कराते हैं तभी हम ऐसा करते हैं’—इत्यादि दोष देना मिथ्या है। तात्पर्य यह कि मनुष्य स्वयं तो उद्योग करता नहीं और दोषारोपण करता है दूसरोंपर तथा आप रहना चाहता है निर्दोष। ऐसे काम कबतक चलेगा—‘कैसे निबहै रामजी रुई-लपेटी आग?’
अत: विवेकपूर्वक विचार करके अपनी वास्तविक उन्नतिके लिये कटिबद्ध होकर तत्परतासे खूब उत्साहके साथ लग जाना चाहिये।
भगवान् ने चौथी बात कही है—‘मां भजस्व।’ मुझको भजो। अब विचारना यह है कि भगवान् का स्वरूप क्या है और उसका भजन क्या है। आजतक जैसा देखा, जैसा सुना और पढ़ा तथा उसके अनुसार भगवान् का साकार-निराकार, सगुण-निर्गुण आदि जैसा स्वरूप समझा, वही है भगवान् का स्वरूप और इस प्रकार भगवान् के स्वरूपको सर्वोपरि तथा परम प्रापणीय समझकर एकमात्र उनके शरण हो जाना ही भजन है। अर्थात् जिह्वासे भगवान् के नामका जप, मनसे उनके स्वरूपका चिन्तन और बुद्धिसे उनका निश्चय करना तथा शरीरसे उनकी आज्ञाओंका पालन करना; एवं सब कुछ उन्हींके समर्पण कर देना और उनके प्रत्येक विधानमें परम संतुष्ट रहना—यह है भगवद्भजन।
अब भगवद्भजनरूप शरणागतिके उक्त चारों प्रकारोंका कुछ स्पष्टीकरण किया जाता है।
भगवान् के स्वरूपका चिन्तन करते हुए उनके परम पावन नामका नित्य-निरन्तर निष्कामभावसे परम श्रद्धापूर्वक जप करना और उन्हीं भगवान् के गुण, प्रभाव, लीला आदिका मनन, चिन्तन, श्रवण और कथन करते रहना एवं चलते-बैठते, सोते-जागते, खाते-पीते हर समय भगवान् की स्मृति रखना—यह शरणका पहला प्रकार है।
दूसरा प्रकार है—भगवान् की आज्ञाओंका पालन करना। इसमें केवल इस बातकी ओर ध्यान देना है कि कहीं मन इन्द्रियोंके और शरीरके कहनेमें आकर केवल उनकी अनुकूलतामें ही न लग जाय; बल्कि यह विचार बना रहे कि भगवान् की आज्ञा क्या है—और यही विचारकर काम करता रहे। भगवदाज्ञा क्या है? और वह कैसे प्राप्त हो? इसका उत्तर यह है कि एक तो श्रीमद्भगवद्गीता-जैसे भगवान् के श्रीमुखके वचन हैं ही। दूसरे भगवत्प्राप्त महापुरुषोंके वचन भी भगवदाज्ञा ही हैं; क्योंकि जिस अन्त:करणमें स्वार्थ और अहंकार नहीं रहा, वहाँ केवल भगवान् की आज्ञासे ही स्फुरणा और चेष्टाएँ होती रहती हैं। तीसरे उन महापुरुषोंके आचरण भी हमारे लिये आदर्श हैं; क्योंकि भगवान् ने कहा है—
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥
‘श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्य-समुदाय उसीके अनुसार बर्तने लग जाता है।’
चौथे, साधकके अपने राग-द्वेषरहित अन्त:करणकी स्फुरणा भी भगवदाज्ञा समझी जा सकती है। पाँचवें, कोई भी मनुष्य अपने स्वभावके अनुकूल ही आज्ञा देता है, अत: उन परम दयालु प्रभुके स्वभावको समझना चाहिये। श्रीभगवान् आज्ञा देंगे तो अपने स्वभावके अनुसार ही तो देंगे, और वे हैं सर्वसुहृद्। इससे जिस कार्यमें अपने स्वार्थका त्याग और जीवमात्रका परम कल्याण हो, जिसमें किसीका भी अहित न हो, वह श्रीभगवान् की आज्ञा है। इस प्रकार उनकी आज्ञाका रहस्य समझकर उसके अनुकूल चलनेमें कभी कोई हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिये; बल्कि उसीको अपना परम धर्म समझकर उसीके अनुसार चलनेकी प्राणपर्यन्त चेष्टा करनी चाहिये—‘स्वधर्मे निधनं श्रेय:।’
तीसरा प्रकार है—सर्वस्व प्रभुके समर्पण कर देना। वास्तवमें तो सब कुछ है ही भगवान् का, क्योंकि न तो हम जन्मके समय कुछ साथ लाये और न जाते समय कुछ ले ही जायँगे; तथा न यहाँ रहते हुए भी किसी भी वस्तु तथा शरीरादिकोंको हम अपने मनके अनुसार चला ही सकते हैं। इससे यह बात स्पष्ट समझमें आती है कि हमारा कुछ भी नहीं है, सब कुछ केवल भगवान् का ही है और उन्हींके अधीन है। फिर भी हमने उन सबमें भ्रमसे जो अपनापन बना रखा है, उसे उठा लेना है।
‘त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये।’
चौथा प्रकार है—भगवान् के प्रत्येक विधानमें परम प्रसन्न रहना। उसमें भी अनुकूलतामें तो प्रसन्नता रहती ही है, प्रतिकूलतामें वैसी नहीं रहती। वास्तवमें तो अनुकूलतामें जो प्रसन्नता रहती है, वह भगवद्विधान मानकर होनेवाली प्रसन्नता नहीं है; वह तो मोहके कारण है। भाव यह कि अपने शरीर, इन्द्रियाँ और अन्त:करणकी अनुकूलताको लेकर जो प्रसन्नता होती है, वह मोहजनित है। उसे विवेकके द्वारा हटाकर ‘भगवान् ने ही यह विधान किया है और यह मेरे लिये परम मङ्गलमय है’—इस प्रकार समझनेपर जो प्रसन्नता होगी, वही भगवान् के नाते होगी। फिर प्रतिकूलतामें भी दु:खकी बात नहीं रह जायगी। इस प्रकार भगवान् का विधान मान लेनेपर अनुकूल-प्रतिकूल सभी अवस्थाओंमें भगवान् की स्मृति बढ़ती रहेगी; क्योंकि वह परिस्थिति भगवान् की ही बनायी हुई है, यह प्रत्यक्ष अनुभव होनेपर फिर मनुष्य भगवान् को कैसे भूल सकेगा। ऐसा हो जाय, तभी यह समझा जा सकता है कि हमने सभी अवस्थाओंको भगवान् का विधान समझा है।
विचारकर देखनेसे मन, इन्द्रियाँ और शरीरकी प्रतिकूल घटनामें एक लाभ और है। अनुकूल घटनासे पुण्य क्षीण होते हैं और प्रतिकूल घटनासे पाप नष्ट होते हैं। तथा पापोंका विनाश ही हमारे लिये हित है एवं पुण्योंका विनाश ही हमारे लिये अहितकर है। दूसरी बात यह है कि प्रतिकूलतामें ही मनुष्यका विकास होता है, अनुकूलतामें तो उन्नतिकी रुकावट होती है। अत: प्रभु जितनी ही प्रतिकूलता भेजते हैं, उतना ही वे हमारा परम हित कर रहे हैं। बच्चेके जब मैला लग जाता है और माँ उसे धोती है, तब बालकको उसका स्नान कराना बुरा लगता है। वह रोता है, चिल्लाता है, किंतु माँ उसकी इच्छाकी कोई परवा न करके उसे साफ कर ही देती है। ऐसे ही पापोंका विनाश करनेमें प्रभु हमारी सलाह न लेकर, हमारे रोने और चिल्लानेकी ओर कुछ भी ध्यान न देकर हमें शुद्ध कर ही देते हैं। और जैसे सुनार जिस सोनेको अपनाना चाहता है, उसको अधिक साफ करता है, वैसे ही प्रभु किसी भक्तको पूर्वपापोंके अनुसार अधिक कष्ट देते हैं, उसे यह समझना चाहिये कि अब प्रभु मुझे अपना रहे हैं, क्योंकि वे प्रत्यक्ष ही मेरे पापोंका विनाश कर रहे हैं। भगवान् ने स्वयं कहा है—
यस्याहमनुगृह्णामि हरिष्ये तद्धनं शनै:।
करोमि बन्धुविच्छेदं स तु दु:खेन जीवति॥
‘जिसपर मैं कृपा करता हूँ, धीरे-धीरे उसका समस्त धन हर लेता हूँ तथा उसके बन्धु-बान्धवोंसे वियोग कर देता हूँ, जिससे वह दु:खपूर्वक जीवन धारण करता है।’
एक बात और विचारनेकी है, भगवान् जब हमारे मनकी सुन लेते हैं अर्थात् हमारे अनुकूल परिस्थिति उत्पन्न कर देते हैं, तब हमें संकोच होना चाहिये कि कहीं भगवान् ने हमारा मन रखकर हमारे लिहाजसे तो ऐसा नहीं कर दिया है। यदि हमारा मन रखनेके लिये किया है तो यह ठीक नहीं होगा; क्योंकि मनचाहा करते-करते तो बहुत-से जन्म व्यतीत कर दिये, अब तो ऐसा नहीं होना चाहिये। अब तो वही हो, जो भगवान् चाहते हैं। बस, भक्तकी यही चाह रहती है। अत: वह भगवान् के विधानमात्रमें परम प्रसन्न रहता है, फिर चाहे वह विधान मन, इन्द्रिय और शरीरके प्रतिकूल हो या अनुकूल। क्योंकि केवल प्रभुका विधान मानकर चलनेपर तो अनुकूलता-प्रतिकूलता दोनोंमें परम मङ्गल-ही-मङ्गल भरा है। अत: वह अपना मनोरथ भगवान् से अलग नहीं रखता, भगवान् की चाहमें ही अपनी चाहको मिला देता है।
इस प्रकार भगवान् का चिन्तन, भगवदाज्ञापालन, सब कुछ भगवान् के अर्पण कर देना और भगवद्विधानमें परम प्रसन्न रहना ही भगवद्भजन है।
अतएव हम सबको चाहिये कि बहुत शीघ्र भगवद्भजनके ही परायण हो जायँ। ऐसे परायण हो जायँ कि भगवान् का भजन करते-करते वाणी गद्गद हो जाय, चित्त द्रवित हो जाय, मन भगवान् में ही लग जाय। फिर भजन करना न पड़े, स्वाभाविक ही होने लग जाय, तभी भजन भजन है, नहीं तो भजनकी नकल है, क्योंकि जो भजन किया जाय, वह नकली होता है और जो स्वत: बनने लग जाय, वह असली होता है। न होनेसे तो भजनकी नकल भी बड़ी अच्छी है, नकलसे भी आगे जाकर असली बन सकता है। इसलिये भगवान् ने कहा है—
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्॥
‘सुखरहित और क्षणभङ्गुर इस मनुष्य-शरीरको प्राप्त होकर निरन्तर मेरा ही भजन करना चाहिये।’