भगवद्भक्तिका रहस्य
भक्ति भक्त भगवंत गुरु चतुर नाम बपु एक।
इनके पद बंदन किएँ नासत बिघ्न अनेक॥
(१) भक्तिका मार्ग बतानेवाले संत ‘गुरु’, (२) भजनीय ‘भगवान्’, (३) भजन करनेवाला ‘भक्त’ तथा (४) संतोंके उपदेशके अनुसार भक्तकी भगवदाकार वृत्ति ‘भक्ति’ है। नामसे चार हैं, किंतु तत्त्वत: एक ही हैं।
जो साधक दृढ़ता और तत्परताके साथ भगवान् के नामका जप और स्वरूपका ध्यानरूप भक्ति करते हुए तेजीसे चलता है, वही भगवान् को शीघ्र प्राप्त कर लेता है।
जो जिव चाहे मुक्तिको तो सुमरीजे राम।
हरिया गैलै चालताँ जैसे आवे गाम॥
(१) इस भगवद्भक्तिकी प्राप्तिके अनेक साधन बताये गये हैं। उन साधनोंमें मुख्य है—संत-महात्माओंकी कृपा और उनका सङ्ग। रामचरितमानसमें कहा है—
भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी।
बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी॥
भक्ति तात अनुपम सुख मूला।
मिलइ जो संत होइँ अनुकूला॥
उन संतोंका मिलन भगवत्कृपासे ही होता है। श्रीगोस्वामीजी कहते हैं—
संत बिसुद्ध मिलहिं परि तेही।
चितवहिं राम कृपा करि जेही॥
...........................................।
बिनु हरि कृपा मिलहिं नहिं संता॥
...........................................।
सतसंगति संसृति कर अंता॥
असली भगवत्प्रेमका नाम ही भक्ति है। कहा भी है—
पन्नगारि सुनु प्रेम सम भजन न दूसर आन।
अस बिचारि पुनि पुनि मुनि करत राम गुन गान॥
इस प्रकारके प्रेमकी प्राप्ति संतोंके सङ्गसे अनायास ही हो जाती है; क्योंकि संत-महात्माओंके यहाँ परम प्रभु परमेश्वरके गुण, प्रभाव, तत्त्व, रहस्यकी कथाएँ होती रहती हैं। उनके यहाँ यही प्रसङ्ग चलता रहता है। भगवान् की कथा जीवोंके अनेक जन्मोंमें किये हुए अनन्त पापोंकी राशिका नाश करनेवाली एवं हृदय और कानोंको अतीव आनन्द देनेवाली है। जीवको यज्ञ, दान, तप, व्रत, तीर्थ आदि बहुत परिश्रम-साध्य पुण्य-साधनोंके द्वारा भी वह लाभ नहीं प्राप्त होता, जो सत्सङ्गसे अनायास ही हो जाता है; क्योंकि प्रेमी संत-महात्माओंके द्वारा कथित भगवत्कथाके श्रवणसे जीवोंके पापोंका नाश हो जाता है। इससे अन्त:करण अत्यन्त निर्मल होकर भगवान् के चरणकमलोंमें सहज ही श्रद्धा और प्रीति उत्पन्न हो जाती है। भक्तिका मार्ग बतानेवाले संत-महात्मा ही भक्तिमार्गके गुरु हैं। इनके लक्षणोंका वर्णन करते हुए श्रीमद्भागवतमें कहा है—
कृपालुरकृतद्रोहस्तितिक्षु: सर्वदेहिनाम्।
सत्यसारोऽनवद्यात्मा सम: सर्वोपकारक:॥
कामैरहतधीर्दान्तो मृदु: शुचिरकिञ्चन:।
अनीहो मितभुक् शान्त: स्थिरो मच्छरणो मुनि:॥
अप्रमत्तो गभीरात्मा धृतिमाञ्जितषड्गुण:।
अमानी मानद: कल्पो मैत्र: कारुणिक: कवि:॥
(११।११।२९—३१)
‘भगवान् का भक्त कृपालु, सम्पूर्ण प्राणियोंमें वैरभावसे रहित, कष्टोंको प्रसन्नतापूर्वक सहन करनेवाला, सत्यजीवन, पापशून्य, समभाववाला, समस्त जीवोंका सुहृद्, कामनाओंसे कभी आक्रान्त न होनेवाली शुद्ध बुद्धिसे सम्पन्न, संयमी, कोमलस्वभाव, पवित्र, पदार्थोंमें आसक्ति और ममतासे रहित, व्यर्थ और निषिद्ध चेष्टाओंसे शून्य, हित-मित-मेध्य-भोजी, शान्त, स्थिर, भगवत्परायण, मननशील, प्रमादरहित, गम्भीर स्वभाव, धैर्यवान्, काम-क्रोध-लोभ-मोह-मद-मत्सररूप छ: विकारोंको जीता हुआ, मानरहित, सबको मान देनेवाला, भगवान् के ज्ञान-विज्ञानमें निपुण, सबके साथ मैत्रीभाव रखनेवाला, करुणाशील और तत्त्वज्ञ होता है।’
ऐसे भगवद्भक्त ही वास्तवमें भक्तिमार्गके प्रदर्शक हो सकते हैं।
(२) इस जीवको संसारके किसी भी उच्च-से-उच्च पद या पदार्थकी प्राप्ति क्यों न हो जाय, इसकी भूख तबतक नहीं मिटती, जबतक यह अपने परम आत्मीय भगवान् को प्राप्त नहीं कर लेता; क्योंकि भगवान् ही एक ऐसे हैं, जिनसे सब तरहकी पूर्ति हो सकती है। उनके सिवा सभी अपूर्ण हैं। पूर्ण केवल एक वे ही हैं और वे पूर्ण होते हुए भी सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति बिना कारण ही प्रेम और कृपा करनेवाले परम सुहृद् हैं, साथ ही वे सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान् भी हैं। कोई सर्वसुहृद् तो हो पर सब कुछ न जानता हो, वह हमारे दु:खको न जाननेके कारण उसे दूर नहीं कर सकता और यदि सब कुछ जानता हो पर सर्वसमर्थ न हो तो भी असमर्थताके कारण दु:ख दूर नहीं कर सकता। एवं सब कुछ जानता भी हो और समर्थ भी हो, तब भी यदि सुहृद् न हो तो दु:ख देखकर भी उसे दया नहीं आती, जिससे वह हमारा दु:ख दूर नहीं कर सकता। इसी प्रकार सुहृद् भी हो अर्थात् दयालु भी हो और समर्थ भी हो, पर हमारे दु:खको न जानता हो, तो भी काम नहीं होता तथा सुहृद् और सर्वज्ञ हो, पर समर्थ न हो तो वह हमारे दु:खको जानकर भी दु:ख दूर नहीं कर सकेगा; क्योंकि उसकी दु:खनिवारणकी सामर्थ्य ही नहीं। किंतु भगवान् में उपर्युक्त तीनों बातें एक साथ हैं।
(३) उन सर्वसुहृद्, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् भगवान् पर ही निर्भर होकर जो उनकी भक्ति करता है, वही भक्त है। भगवान् की भक्तिके अधिकारी सभी तरहके मनुष्य हो सकते हैं। भगवान् ने गीताके नवें अध्यायके ३०वें, ३२वें और ३३वें श्लोकमें बतलाया है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्त्री, पापयोनि और दुराचारी—ये सातों ही मेरी भक्तिके अधिकारी हैं।
अपि चेत् सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्य: सम्यग्व्यवसितो हि स:॥
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्यु: पापयोनय:।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥
किं पुनर्ब्राह्मणा: पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा।
‘यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभावसे मेरा भक्त होकर मुझको भजता है तो वह साधु ही माननेयोग्य है; क्योंकि वह यथार्थ निश्चयवाला है—अर्थात् उसने भलीभाँति निश्चय कर लिया है कि परमेश्वरके भजनके समान अन्य कुछ भी नहीं है।’
‘हे अर्जुन! स्त्री, वैश्य, शूद्र तथा पापयोनि— चाण्डालादि जो कोई भी हों, वे भी मेरे शरण होकर परम गतिको ही प्राप्त होते हैं।’
‘फिर इसमें तो कहना ही क्या है कि पुण्यशील ब्राह्मण तथा राजर्षि भक्तजन मेरे शरण होकर परम गतिको प्राप्त होते हैं।’
यहाँ भगवान् ने जातिमें सबसे छोटे और आचरणोंमें भी सबसे गिरे हुए—दोनों तरहके मनुष्योंको ही भगवद्भक्तिका अधिकारी बतलाया। यद्यपि विधि-निषेधके अधिकारी मनुष्य ही होते हैं, तो भी ‘पापयोनि’ शब्द तो इतना व्यापक है कि इससे गौणीवृत्तिसे पशु-पक्षी आदि सभी प्राणी लिये जा सकते हैं। अब रहे भावसे होनेवाले अधिकारी। श्रीमद्भागवतमें बतलाया है कि कोई भी कामना न हो या सभी तरहकी कामना हो अथवा केवल मुक्तिकी ही कामना हो, तो भी श्रेष्ठ बुद्धिवाला मनुष्य तीव्र भक्तियोगसे परम पुरुष भगवान् की ही पूजा करे—
अकाम: सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधी:।
तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम्॥
(२।३।१०)
यहाँ ‘अकाम’ से ज्ञानी भक्त, ‘मोक्षकाम’ से जिज्ञासु तथा ‘सर्वकाम’ से अर्थार्थी और आर्त भक्त समझना चाहिये। ज्ञानी भक्त वह है जो भगवान् को तत्त्वत: जानकर स्वाभाविक ही उनका निष्कामभावसे नित्य-निरन्तर भजन करता रहता है। जिज्ञासु भक्त उसका नाम है, जो भगवत्तत्त्वको जाननेकी इच्छासे उनका भजन करता है। अर्थार्थी भक्त वह होता है, जो भगवान् पर भरोसा करके उनसे ही संसारी भोग-पदार्थोंको चाहता है और आर्त भक्त वह है, जो संसारके कष्टोंसे उन्हींके द्वारा त्राण चाहता है।
गीतामें इन्हीं भक्तोंके सकाम और निष्काम भावोंके तारतम्यसे चार प्रकार बतलाये हैं—
चतुर्विधा भजन्ते मां जना: सुकृतिनोऽर्जुन।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥
(७। १६)
‘हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! उत्तम कर्म करनेवाले अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी ऐसे चार प्रकारके भक्तजन मुझको भजते हैं।’
इनमें सबसे निम्नश्रेणीका भक्त अर्थार्थी है, उससे ऊँचा आर्त, आर्तसे ऊँचा जिज्ञासु और जिज्ञासुसे ऊँचा ज्ञानी है। भोग और ऐश्वर्य आदि पदार्थोंकी इच्छाको लेकर जो भगवान् की भक्तिमें प्रवृत्त होता है, उसका लक्ष्य भगवद्भजनकी ओर गौण तथा पदार्थोंकी ओर मुख्य रहता है; क्योंकि वह पदार्थोंके लिये भगवान् का भजन करता है, न कि भगवान् के लिये। वह भगवान् को तो धनोपार्जनका एक साधन समझता है, फिर भी भगवान् पर भरोसा रखकर धनके लिये भजन करता है, इसलिये वह भक्त कहलाता है।
जिसको भगवान् स्वाभाविक ही अच्छे लगते हैं और जो भगवान् के भजनमें स्वाभाविक ही प्रवृत्त होता है, किंतु सम्पत्ति-वैभव आदि जो उसके पास हैं, उनका जब नाश होने लगता है अथवा शारीरिक कष्ट आ पड़ता है; तब उन कष्टोंको दूर करनेके लिये भगवान् को पुकारता है, वह आर्त भक्त अर्थार्थीकी तरह वैभव और भोगोंका संग्रह तो नहीं करना चाहता, परंतु प्राप्त वस्तुओंके नाश और शारीरिक कष्टको नहीं सह सकता, अत: इसमें उसकी अपेक्षा कामना कम है और जिज्ञासु भक्त तो न वैभव चाहता है न योगक्षेमकी ही परवा करता है; वह तो केवल एक भगवत्तत्त्वको ही जाननेके लिये भगवान् पर ही निर्भर होकर उनका भजन करता है।
भगवान् ने यहाँ ज्ञानी, जिज्ञासु, आर्त, अर्थार्थी—ऐसा अथवा अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु, ज्ञानी—ऐसा क्रम न बतलाकर आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी ऐसा कहा है। यहाँ आर्त और अर्थार्थीके बीचमें जिज्ञासुको रखनेमें भगवान् का यह एक विलक्षण तात्पर्य मालूम देता है कि जिज्ञासुमें जन्म-मरणके दु:खसे दु:खी होना और अर्थोंके परम अर्थ परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिकी इच्छा—ये दोनों हैं। इस प्रकार आर्त और अर्थार्थी दोनोंके आंशिक धर्म उसमें आ जाते हैं। इसी तरह आर्त और अर्थार्थी भक्तोंमें आर्तिनाश और पदार्थकामनाके अतिरिक्त मुक्तिकी इच्छा भी रहती है, इसलिये भगवान् से जो कष्ट-निवृत्ति तथा सांसारिक भोगोंकी प्राप्तिकी कामना की गयी, उस कामनारूप दोषको समझनेपर उनके हृदयमें ग्लानि और पश्चात्ताप भी होता है। अत: आर्त और अर्थार्थी—इन दोनोंमेंसे कोई तो जिज्ञासु होकर भगवान् को तत्त्वसे जान लेते हैं और कोई भगवान् के प्रेमके पिपासु होकर भगवत्प्रेमको प्राप्त कर लेते हैं एवं अन्ततोगत्वा वे दोनों सर्वथा आप्तकाम होकर ज्ञानी भक्तकी श्रेणीमें चले जाते हैं। ज्ञानी सर्वथा निष्काम होता है, इस सर्वथा निष्कामभावका द्योतन करनेके लिये ही भगवान् ने ‘च’ शब्दका प्रयोग करके उसे सबसे विलक्षण बतलाया है। ऐसे ज्ञानी भक्तोंकी भगवद्भक्ति सर्वथा निष्काम—अहैतुकी होती है। श्रीमद्भागवतमें भी कहा है—
आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे।
कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरि:॥
(१।७।१०)
‘ज्ञानके द्वारा जिनकी चिज्जड-ग्रन्थि कट गयी है, ऐसे आत्माराम मुनिगण भी भगवान् की हेतुरहित भक्ति किया करते हैं, क्योंकि भगवान् श्रीहरि ऐसे ही अद्भुत दिव्य गुणवाले हैं।’
भगवान् तो उपर्युक्त सभी भक्तोंको ‘उदार’ मानते हैं—‘उदारा: सर्व एवैते’ (गीता ७।१८)। अर्थार्थी और आर्त भक्त उदार कैसे? इसका उत्तर यह है कि अपनेसे माँगनेवालों और दु:खनिवारण चाहनेवालोंको भी उदार कहना तो वस्तुत: भगवान् की ही उदारता है, परंतु भगवान् इस दृष्टिसे भी उन्हें उदार कह सकते हैं कि वे मेरा पूरा विश्वास करके मुझे अपना अमूल्य समय देते हैं। दूसरी बात यह है कि वे फलप्राप्तिको मेरे भरोसे छोड़कर मेरा आश्रय पहले लेते हैं, तब पीछे मैं उन्हें भजता हूँ (गीता ४। ११)। तीसरी बात यह है कि वे देवता आदिका पूजन करके अपना अभीष्ट फल शीघ्र प्राप्त कर सकते थे (गीता ४।१२) और मेरी भक्ति करनेपर तो मैं उनकी कामना पूर्ण करूँ या न भी करूँ, तब भी वे उन देवताओंकी अपेक्षा मुझपर विशेष विश्वास करके मेरा भजन करते हैं। इसलिये वे उदार हैं।
इससे यह सिद्ध हुआ कि चाहे जैसे भी हीन जन्म, आचरण और भाववाला मनुष्य क्यों न हो, वह भी भगवद्भक्तिका अधिकारी हो सकता है।
भगवान् के साथ अपनेपनको लेकर उनपर दृढ़ विश्वासका होना—यह भक्तहृदयका प्रधान चिह्न है। भक्तोंका हृदय सम्पूर्ण जगत् में अव्यक्तरूपसे परिपूर्ण रहनेवाले परमात्माको आकर्षित करके साक्षात् मूर्तरूपमें प्रकट कर लेता है, जैसे भक्त ध्रुव और प्रह्लादके लिये भगवान् साक्षात् प्रकट हो गये थे।
उन सर्वेश्वर प्रभुमें भक्तका हृदय धारावाहिकरूपसे तन्मय हो जाता है। इस प्रकार हृदयकी तल्लीनता तो मारीच, कंस, शिशुपाल आदिकी भाँति भय और द्वेष आदिके कारण भी हो सकती है। किंतु वह तल्लीनता भक्तिमें परिणत नहीं हो सकती; क्योंकि उसे भक्तिरसके आनन्दका अनुभव नहीं होता। जैसे कोई व्यक्ति सर्वलोकपावनी गङ्गाजीमें वैशाखमासमें स्नान करता है तो गङ्गास्नानसे उसके पापोंका नाश होकर अन्त:करण शुद्ध हो जाता है और उसे स्नान करनेमें भी प्रत्यक्ष ही अपूर्व रसानुभूति—आनन्दानुभव होता है, किंतु जो माघमासमें गङ्गास्नान करता है, उसके पापोंका तो अवश्य नाश हो जाता है, पर शीतके कारण उसे स्नान करनेमें आनन्द नहीं आता, प्रत्युत उसका आनन्दांश तिरस्कृत होकर उसे कष्टका अनुभव होता है। इसी तरह भय-द्वेष आदिके कारण भगवदाकार अन्त:करणवालोंका आनन्दांश तिरोहित होकर उनका हृदय दु:खित और चिन्तित रहता है। इसलिये उनके अन्त:करणकी तदाकारता भक्तिमें शामिल नहीं है। अत: भगवान् के प्रति आत्मीयताको लेकर दृढ़ विश्वास और प्रेमपूर्वक जो अन्त:करणका भगवदाकार हो जाना है, वही भक्ति है। किंतु नास्तिकोंकी अपेक्षा तो भय-द्वेष आदिको लेकर भगवान् का चिन्तन करनेवाले भी अच्छे हैं। फिर उनका तो कहना ही क्या है जो भगवान् का श्रद्धा-प्रेमपूर्वक निरन्तर निष्काम अनन्य भजन करते हैं। जिस प्रकार गङ्गाकी चाल स्वाभाविक ही निरन्तर समुद्रकी ओर है, इसमें न तो उसका अपना कोई प्रयोजन है और न वह कहीं ठहरती ही है, इसी प्रकार अनन्य भक्त न तो कुछ चाहते ही हैं और न कहीं भगवत्स्मरणसे विराम ही लेते हैं; वे तो नित्य-निरन्तर निष्कामभावसे भजन ही करते रहते हैं। श्रीनारदजीने भी कहा है—
‘भक्ता एकान्तिनो मुख्या:।’
(सूत्र ६७)
(४) एकमात्र भगवान् को इष्ट मानकर उन्हींकी अनन्य भक्ति करना ही सर्वश्रेष्ठ भक्ति है। इसलिये सम्पूर्ण जगत् को भगवान् का स्वरूप समझकर भी ऐसी भक्तिका साधन किया जा सकता है; क्योंकि स्वयं भगवान् ही जगत् के रूपमें प्रकट हुए हैं, इसीलिये यह सारा ब्रह्माण्ड भगवान् का ही स्वरूप है एवं देवता आदिमें भगवान् की बुद्धि करके भी भक्ति की जा सकती है और इसका फल भी भगवत्प्राप्ति ही है। इस प्रकारकी भगवान् की भक्ति करनेवालेमें दो बातें प्रधान होनी चाहिये—साधकमें हो निष्कामभाव और उपास्यमें हो भगवद्बुद्धि। इससे भगवान् की प्राप्ति निश्चय ही हो जाती है। किंतु समस्त जगत् में भगवद्बुद्धि न होकर भी साधकमें पूर्ण निष्कामभाव हो तो भी उसकी सेवाका फल भगवत्प्राप्ति ही है। भगवान् की भक्ति तो सकामभावसे करनेपर भी ध्रुवकी भाँति भगवत्कृपासे अभीष्ट फलकी सिद्धिपूर्वक भगवान् की प्राप्ति हो जाती है। यदि कोई देवताओंको देवता मानकर भी निष्कामभावसे केवल भगवदाज्ञापालनपूर्वक भगवान् को प्रसन्न करनेके लिये ही उसकी भक्ति करता है तो उसका फल भी भगवत्प्राप्ति ही होता है। फिर जो स्वयं भगवान् की ही निष्कामभावसे नित्य-निरन्तर अनन्य भक्ति करते हैं, उन अनन्य भक्तोंको भगवान् मिलें—इसमें तो बात ही क्या है। भगवान् ने गीतामें कहा है—
अनन्यचेता: सततं यो मां स्मरति नित्यश:।
तस्याहं सुलभ: पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिन:॥
(८।१४)
‘हे अर्जुन! जो पुरुष मुझमें अनन्यचित्त होकर सदा ही निरन्तर मुझ पुरुषोत्तमको स्मरण करता है, उस नित्य-निरन्तर मुझमें युक्त हुए योगीके लिये मैं सुलभ हूँ अर्थात् उसे सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ।’
भक्तिमें प्रधान बात है—भगवान् का होकर नित्य-निरन्तर श्रद्धा-भक्तिपूर्वक निष्कामभावसे उन्हींका स्मरण-चिन्तन करते रहना। स्मरणका बड़ा भारी अद्भुत प्रभाव है। भक्तोंकी कथाओंमें प्राय: यही बात विशेष मिलती है कि जहाँ भी जिस भक्तने भगवान् को अपना समझकर दृढ़ विश्वासपूर्वक प्रेमभावसे विह्वल होकर भगवान् का स्मरण किया, वहीं भगवान् प्रत्यक्ष प्रकट हो गये।
पद्मपुराणके रामाश्वमेधमें श्रीहनुमान् जी की एक बड़ी महत्त्वपूर्ण घटनाका उल्लेख मिलता है। भगवान् श्रीरामचन्द्रजीका अश्वमेध-यज्ञके लिये छोड़ा हुआ घोड़ा अनेक देश-देशान्तरोंमें भ्रमण करता हुआ जब रामभक्त राजा सुरथके कुण्डलनगरमें पहुँचा, तब राजाने भगवान् के दर्शनकी लालसासे उस घोड़ेको पकड़वा लिया। जब अश्वरक्षक शत्रुघ्न आदिको घोड़ेके पकड़े जानेका पता लगा, तब उन्होंने उनसे युद्ध करके अश्वको छुड़ा लानेका विचार किया। इतनेमें ही धर्मात्मा राजा सुरथ और उनके राजकुमार चम्पक भी रणभूमिमें पहुँच गये तथा दोनों ओरके सैनिक आपसमें लड़ने लगे। राजकुमार चम्पकने भरतकुमार पुष्कलको रामास्त्रका प्रयोग करके बाँध लिया। यह देखकर श्रीहनुमान् जी ने चम्पकके सामने जाकर युद्ध किया तथा चम्पकको युद्धभूमिमें गिराकर मूर्च्छित कर दिया और पुष्कलको बन्धनसे छुड़ा लिया।
इसपर राजा सुरथने श्रीहनुमान् जी की रामभक्तिकी बड़ी प्रशंसा की और वे उनसे युद्ध करने लगे। जब राजाके छोड़े हुए ब्रह्मास्त्रको श्रीहनुमान् जी निगल गये, तब राजाने श्रीरघुनाथजीका स्मरण करके रामास्त्रका प्रयोग किया। उस समय श्रीहनुमान् जी बोले—‘राजन्! क्या करूँ, तुमने मेरे स्वामीके अस्त्रसे ही मुझे बाँधा है; अत: मैं इसका आदर करता हूँ। अब तुम मुझे इच्छानुसार अपने नगरमें ले जाओ। मेरे प्रभु दयासागर हैं, वे स्वयं ही आकर मुझे छुड़ायेंगे।’
श्रीहनुमान् जी के बाँधे जानेपर पुष्कलने राजासे युद्ध किया, किंतु वे अन्तमें मूर्च्छित होकर गिर पड़े। तब शत्रुघ्नने राजासे बहुत देरतक युद्ध किया, पर वे भी राजाके बाणके आघातसे मूर्च्छित होकर रथपर गिर पड़े। यह देखकर सुग्रीव उनसे लड़ने गये, पर राजाने उनको भी रामास्त्रका प्रयोग करके बाँध लिया।
तदनन्तर राजा सुरथ उन सबको रथमें डालकर अपने नगरमें ले गये। वहाँ जाकर वे राजसभामें बैठे और बँधे हुए हनुमान् जी से बोले—‘पवनकुमार! अब तुम भक्तोंके रक्षक परम दयालु श्रीरघुनाथजीका स्मरण करो, जिससे संतुष्ट होकर वे तुम्हें तत्काल बन्धनमुक्त कर दें।’ श्रीहनुमान् जी ने अपने सहित सब वीरोंको बँधा देखकर कमलनयन परम कृपालु श्रीरामचन्द्रजीका अनन्यभावसे स्मरण किया। वे मन-ही-मन कहने लगे—
हा नाथ हा नरवरोत्तम हा दयालो
सीतापते रुचिरकुण्डलशोभिवक्त्र॥
भक्तार्तिदाहक मनोहररूपधारिन्।
मां बन्धनात् सपदि मोचय मा विलम्बम्॥
(पद्म०, पाताल० ५३। १४)
‘हा नाथ! हा पुरुषोत्तम! हा सुन्दर कुण्डलसे सुशोभित वदनवाले, भक्तोंके दु:ख दूर करनेवाले तथा मनोहर विग्रह धारण करनेवाले दयालु सीतापते! मुझे इस बन्धनसे शीघ्र मुक्त कीजिये, देर न लगाइये।’
श्रीहनुमान् जी के इस प्रकार प्रार्थना करते ही तुरंत भगवान् श्रीरामचन्द्रजी पुष्पक विमानपर आरूढ़ होकर वहाँ आ पहुँचे। भगवान् को पधारे देख राजा सुरथ प्रेममग्न हो गये और उन्होंने भगवान् को सैकड़ों बार प्रणाम किया। श्रीरामने भी चतुर्भुजरूप धारण करके अपने भक्त सुरथको छातीसे लगा लिया और आनन्दाश्रुओंसे उसका मस्तक अभिषिक्त करते हुए कहा—‘राजन्! तुम धन्य हो, आज तुमने बड़ा पराक्रम दिखाया है।’ फिर भगवान् ने श्रीहनुमान्, सुग्रीव, शत्रुघ्न, पुष्कल आदि सभी योद्धाओंपर दयादृष्टि डालकर उन्हें बन्धन और मूर्च्छासे मुक्त किया। उन्होंने उठकर भगवान् को प्रणाम किया। राजा सुरथने प्रसन्नतापूर्वक अपना राज्य भगवान् रामको समर्पित कर दिया। भगवान् तीन दिन कुण्डलनगरमें रहे, फिर राजा सुरथको ही राज्य सौंपकर उनकी सम्मति ले वहाँसे चले गये। तब राजा सुरथ अपने राजकुमार चम्पकको राज्यभार देकर शत्रुघ्नके साथ अश्वकी रक्षाके लिये चल पड़े।
यहाँ हमें भक्त हनुमान् और राजा सुरथके भक्तिभावपूर्वक किये हुए स्मरणके प्रभावपर ध्यान देना चाहिये। उनकी अनन्य भक्तिसे आकृष्ट होकर भगवान् तुरंत वहाँ पहुँच गये। भगवान् के प्रेमपूर्वक अनन्य स्मरणका बड़ा भारी माहात्म्य है। भक्त सुधन्वाकी कथा देखिये, भगवान् के स्मरणके प्रभावसे अत्यन्त प्रतप्त तेल भी उनके लिये अतिशय शीतल हो गया तथा अर्जुनके साथ युद्ध करते समय भी उनमें जगह-जगह भगवत्स्मरणका प्रभाव दिखायी पड़ता है।
जब अर्जुनने भगवान् का स्मरण करके तीन बाण निकालकर प्रतिज्ञा की कि इन तीन ही बाणोंसे मैं सुधन्वाका मस्तक काट डालूँगा; यदि ऐसा न कर सकूँ तो मेरे पूर्वज पुण्यहीन होकर नरकमें गिर पड़ें तब ठीक इसके विरुद्ध सुधन्वाने भगवान् का स्मरण करके प्रतिज्ञा की कि इन तीनों ही बाणोंको मैं अपने बाणोंसे काट डालूँगा, यदि ऐसा न कर सकूँ तो मुझे घोर गति प्राप्त हो। भगवान् ने इन दोनों ही भक्तोंकी भगवत्स्मरणपूर्वक की गयी प्रतिज्ञाको सच्चा किया। भक्त अर्जुनकी रक्षाके लिये भगवान् ने पहले बाणको अपने गोवर्धनका पुण्य अर्पित करके बाण छोड़नेका अर्जुनको आदेश दिया। अर्जुनने तदनुसार बाण छोड़ा, किंतु सुधन्वाने भगवान् को याद करके अपने बाणसे उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिये, तब भगवान् ने अर्जुनको दूसरा बाण सन्धान करनेकी आज्ञा दी और साथ ही उसे अपने अन्य अनेक पुण्य अर्पण किये। अर्जुनके दूसरा बाण छोड़ते ही सुधन्वाने उसे भी भगवान् का स्मरण करके काट डाला। अब तीसरा बाण रहा, भगवान् ने उसे अपने रामावतारका पुण्य अर्पण कर दिया तथा उसके पिछले भागमें ब्रह्माजी और बीचमें कालको जोड़कर अग्रभागमें स्वयं जा विराजे एवं अर्जुनको बाण चलानेकी आज्ञा दी। जब अर्जुनने तीसरा बाण छोड़ा, तब सुधन्वाने भगवान् से कहा—‘भगवन्! आप स्वयं इस बाणमें विराजमान हैं, यह मैं जान गया हूँ। अब आप मुझे अपने चरणोंमें आश्रय देकर कृतार्थ करें।’ यों कहकर भगवान् का स्मरण करते हुए उन्होंने अपने बाणसे उसके भी दो टुकड़े कर दिये। उन दो टुकड़ोंमेंसे पिछला भाग पृथ्वीपर गिर पड़ा तथा अग्रभागवाला टुकड़ा जिसपर भगवान् श्रीकृष्ण विराजे थे, उछला और उसने सुधन्वाका मस्तक काट डाला। सुधन्वाका सिर कटकर भगवान् के चरणोंमें आ गिरा। अपने सम्मुख भगवान् का दर्शन करते हुए उसके मुखसे एक ज्योति निकलकर भगवान् में प्रवेश कर गयी।
अतएव भगवत्स्मृतिके प्रभावको लक्ष्यमें रखकर हमें भी प्रत्येक क्रिया भगवान् का स्मरण रखते हुए ही करनी चाहिये। सांसारिक कार्य करते हुए भी नित्य-निरन्तर भगवान् का स्मरण होते रहना चाहिये। परंतु जब एकान्तमें भगवान् का भजन, स्मरण, सेवा-पूजा आदि नित्यकर्मके लिये बैठें, उस समय तो संसारका स्मरण किञ्चित् भी न हो—ऐसा विशेष खयाल रखनेकी आवश्यकता है। भगवत्स्मरण नित्य-निरन्तर होनेके लिये भगवान् में अनन्य प्रेम, सत्पुरुषोंका सङ्ग, सच्छास्त्रोंका मननपूर्वक स्वाध्याय, भगवान् के नामका जप, भगवान् की स्तुति-प्रार्थना, भगवत्कृपासे निरन्तर स्मृति बनी रहनेका दृढ़ विश्वास और हर समय सावधानीपूर्वक उस स्मृतिको बनाये रखनेकी चेष्टा—ये सात विशेष सहायक हैं। इन सातोंका अनुष्ठान करते हुए जो एकमात्र भगवान् का ही अनन्य स्मरण करता है, उसकी सम्पूर्ण विघ्न-बाधाओंका नाश हो जाता है और उसे शीघ्र ही भगवत्प्राप्ति हो जाती है। भगवान् के स्मरणका प्रभाव और माहात्म्य क्या बतलाया जाय—
यस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसारबन्धनात्।
विमुच्यते नमस्तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे॥
‘जिसके स्मरणमात्रसे मनुष्य आवागमनरूप बन्धनसे छूट जाता है, सबको उत्पन्न करनेवाले उस परम प्रभु श्रीविष्णुको बार-बार नमस्कार है।’