भगवान् का सगुण स्वरूप और भक्ति

१. गीतामें समग्र (सगुण) की मुख्यता

श्रीमद्भगवद्‍गीतामें भगवान् कहते हैं—

तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिक:।

कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन॥

(६। ४६)

‘तपस्वियोंसे भी योगी श्रेष्ठ है, ज्ञानियोंसे भी योगी श्रेष्ठ है और कर्मियोंसे भी योगी श्रेष्ठ है—ऐसा मेरा मत है। अत: हे अर्जुन! तू योगी हो जा।’

—इस प्रकार योगकी महिमा बताकर फिर भगवान् कहते हैं—

योगिनामपि सर्वेषां मद्‍गतेनान्तरात्मना।

श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मत:॥

(६।४७)

‘सम्पूर्ण योगियोंमें भी जो श्रद्धावान् भक्त मुझमें तल्लीन हुए मनसे (प्रेमपूर्वक) मेरा भजन करता है, वह मेरे मतमें सर्वश्रेष्ठ योगी है*।’

तात्पर्य है कि कर्मयोगी, ज्ञानयोगी, हठयोगी, लययोगी, राजयोगी, मन्त्रयोगी आदि जितने भी योगी हो सकते हैं, उन सब योगियोंमें मेरा भक्त सर्वश्रेष्ठ है। जैसे भगवान् की बात चले तो भक्त उसीमें मस्त हो जाता है, उसको दूसरी बात सुहाती ही नहीं, ऐसे ही यहाँ भक्तकी बात चली तो भगवान् भी मस्त हो गये, दूसरी सब बातें भूल गये और उनके भीतर भक्तिकी बात कहनेका प्रवाह उमड़ पड़ा। अत: अर्जुनके द्वारा प्रश्न किये बिना ही भगवान् ने अपनी तरफसे सातवाँ अध्याय शुरू कर दिया।

सातवें अध्यायके आरम्भमें भगवान् ने अर्जुनसे कहा कि मैं वह विज्ञानसहित ज्ञान कहूँगा, जिससे तू मेरे ‘समग्र’ रूपको जान जायगा, जिसको जाननेके बाद फिर कुछ भी जानना बाकी नहीं रहेगा। अन्तमें अपने समग्ररूपका वर्णन करते हुए भगवान् ने कहा—

जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये।

ते ब्रह्म तद्विदु: कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्॥

साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदु:।

प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतस:॥

(७।२९-३०)

‘जरा और मरणसे मोक्ष पानेके लिये जो मेरा आश्रय लेकर यत्न करते हैं, वे उस ब्रह्मको, सम्पूर्ण अध्यात्मको और सम्पूर्ण कर्मको भी जान जाते हैं। जो मनुष्य अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञके सहित मुझे जानते हैं, वे युक्तचेता मनुष्य अन्तकालमें भी मुझे ही जानते अर्थात् प्राप्त होते हैं।’

गीतामें भगवान् ने जन्म-मरणकी बात तो कई जगह कही है, पर ‘जरा-मरण’ की बात इन्हीं श्लोकोंमें कही है। तात्पर्य है कि जो भगवान् की भक्ति करता है, वह जरा और मरण दोनोंसे मुक्त हो जाता है अर्थात् उसको शरीरके रहते हुए वृद्धावस्थाका भी दु:ख नहीं होता और गतिके विषयमें भी दु:ख नहीं होता कि मरनेके बाद मेरी क्या गति होगी? वे भगवान् का आश्रय लेकर यत्न करते हैं, इसलिये वे भगवान् के समग्ररूपको जान जाते हैं अर्थात् विज्ञानसहित ज्ञानको जान जाते हैं। ब्रह्म (निर्गुण-निराकार), अध्यात्म (अनन्त जीव) तथा कर्म (सृष्टि-रचनारूप कर्म)*—यह ‘ज्ञान’ (निर्गुण) का विभाग है और अधिभूत (अनन्त ब्रह्माण्ड), अधिदैव (हिरण्यगर्भ ब्रह्मा) तथा अधियज्ञ (अन्तर्यामी विष्णु)— यह ‘विज्ञान’ (सगुण) का विभाग है—इन दोनों विभागोंको वे शरणागत भक्त जान जाते हैं। कारण कि समग्रका ज्ञान विचारसे नहीं होता, प्रत्युत शरणागत होनेपर भगवत्कृपासे होता है।

यहाँ एक बात विशेष ध्यान देनेकी है कि निर्गुण-निराकार ब्रह्मका नाम भगवान् के समग्ररूपके अन्तर्गत आया है। लोगोंमें प्राय: इस बातकी प्रसिद्धि है कि निर्गुण-निराकार ब्रह्मके अन्तर्गत ही सगुण ईश्वर है। ब्रह्म मायारहित है और ईश्वर मायासहित है। अत: ब्रह्मके एक अंशमें ईश्वर है। परन्तु गीतामें भगवान् कह रहे हैं कि मेरे समग्ररूपके एक अंशमें ब्रह्म है! इसलिये भगवान् ने अपनेको ब्रह्मका आधार बताया है—‘ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्’ (गीता १४।२७) ‘मैं ब्रह्मकी प्रतिष्ठा (आश्रय) हूँ’ तथा ‘मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना’ (गीता ९।४) ‘यह सब संसार मेरे अव्यक्त स्वरूपसे व्याप्त है।’ भगवान् के इस कथनका तात्पर्य है कि ब्रह्मका अंश मैं नहीं हूँ, प्रत्युत मेरा अंश ब्रह्म है। अत: निष्पक्ष विचार करनेसे ऐसा दीखता है कि गीतामें केवल ब्रह्मकी मुख्यता नहीं है, प्रत्युत समग्र भगवान् की मुख्यता है। पूर्ण तत्त्व समग्र ही है। समग्रमें सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार सब आ जाते हैं। वास्तवमें देखा जाय तो समग्ररूप सगुणका ही हो सकता है; क्योंकि सगुणके अन्तर्गत तो निर्गुण आ सकता है, पर निर्गुणके अन्तर्गत सगुण नहीं आ सकता। अत: समग्रता सगुणमें ही है, निर्गुणमें नहीं।

निर्गुण-निराकारको माननेवाले जीव और ब्रह्मको स्वरूपसे एक ही मानते हैं१। गीतामें भी जीव और ब्रह्मके समान लक्षणोंका वर्णन हुआ है। भगवान् ने देही (देहवाले जीव) के जो लक्षण कहे हैं, वही लक्षण देहरहित ब्रह्मके भी कहे हैं२। तात्पर्य यह हुआ कि देहसहित होनेसे जो जीव है, वही देहरहित होनेसे ब्रह्म है अर्थात् जीव केवल शरीरकी उपाधिसे अलग है, अन्यथा वह ब्रह्म ही है। इसलिये निर्गुणोपासनामें जो देहसहित है, वह उपासक है और जो देहरहित है, वह ‘उपास्य’ है। देहके साथ माना हुआ सम्बन्ध ही जीव और ब्रह्मकी एकतामें खास बाधक है। इसलिये देहाभिमानीके लिये निर्गुणोपासनाकी सिद्धि कठिनतासे तथा देरीसे होती है—‘अव्यक्ता हि गतिर्दु:खं देहवद्भिरवाप्यते’ (गीता १२।५)। परन्तु सगुणोपासनामें देहका सम्बन्ध बाधक नहीं है, प्रत्युत भगवान् की विमुखता बाधक है। अत: भक्त आरम्भसे ही मैं भगवान् का हूँ और भगवान् मेरे हैं’—ऐसा मानकर भगवान् के सम्मुख हो जाता है। इसलिये सगुणोपासकका भगवान् की कृपासे शीघ्र ही तथा सुगमतासे उद्धार हो जाता है३। कारण कि भक्त साधनके आश्रित न होकर भगवान् के आश्रित होता है। यह सगुणोपासनाकी विलक्षणता है! सगुणोपासनाकी दूसरी विलक्षणता यह है कि इसमें भक्त जगत् को मिथ्या मानकर उसका त्याग करनेपर जोर नहीं देता, क्योंकि उसकी मान्यतामें जड-चेतन, स्थावर-जङ्गम, सत्-असत् सब कुछ भगवान् ही हैं—‘अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन’ (गीता ९।१९)। इसलिये सगुणकी उपासना समग्रकी उपासना है। गीताने सगुणको समग्र माना है और ब्रह्म, जीव, कर्म, जगत्, हिरण्यगर्भ ब्रह्मा तथा अन्तर्यामी विष्णु—इन सबको समग्र भगवान् के ही अंग माना है (७।२९-३०)। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि निर्गुणोपासना (ब्रह्मकी उपासना) समग्र भगवान् के एक अंगकी उपासना है और सगुणोपासना स्वयं समग्र भगवान् की उपासना है४!

निर्गुण-निराकार ब्रह्म और नाशवान् जगत् —दोनों ही समग्र भगवान् के ऐश्वर्य हैं*। भक्त ऐश्वर्यसे प्रेम नहीं करता, प्रत्युत ऐश्वर्यवालेसे प्रेम करता है। इसलिये भगवान् ने समग्रकी उपासना करनेवालेको सर्वश्रेष्ठ बताया है (गीता ६।४७; १२।२) और ‘सब कुछ भगवान् ही हैं’—इसका अर्थात् समग्रका अनुभव करनेवाले महात्माको अत्यन्त दुर्लभ कहा है—‘वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ:’ (गीता ७।१९)।

यदि गहराईसे विचार किया जाय तो सगुणकी मुख्यता ही ठीक जँचती है। केवल निर्गुणकी मुख्यता माननेसे सभी बातोंका ठीक समाधान नहीं होता, जबकि केवल सगुणकी मुख्यता माननेसे कोई सन्देह बाकी नहीं रहता। आजकल सगुणको मायायुक्त मानकर उसका तिरस्कार किया जाता है—यह उचित नहीं है। सगुण मायायुक्त नहीं है, प्रत्युत मायाका अधिपति (मालिक) है*। सनकादिक, शुकदेव, जनक आदि तत्त्वज्ञ महापुरुषोंका सगुणमें स्वाभाविक प्रेम था, जो समय-समयपर प्रकट होता रहता था।

श्रीमद्भागवतमें आया है—

आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे।

कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरि:॥

(१। ७।१०)

‘ज्ञानके द्वारा जिनकी चिज्जडग्रन्थि कट गयी है, ऐसे आत्माराम मुनिगण भी भगवान् की हेतुरहित (निष्काम) भक्ति किया करते हैं, क्योंकि भगवान् के गुण ही ऐसे हैं कि वे प्राणियोंको अपनी ओर खींच लेते हैं।’

२. परमात्मा सम्पूर्ण शक्तियोंके मूल हैं

जिससे सृष्टिमात्रका संचालन होता है, उत्पत्ति-स्थिति-प्रलय होता है, ऐसी एक शक्ति परमात्मामें माननी ही पड़ेगी। यदि परमात्मामें कोई शक्ति स्वीकार न करें तो सृष्टि-रचना आदि कार्य सिद्ध नहीं होंगे! गीताप्रेसके संस्थापक, संचालक तथा संरक्षक श्रीजयदयालजी गोयन्दकाने, जो निर्गुणको मुख्य मानते थे, एक बार मेरेसे एकान्तमें कहा था कि परमात्मामें एक शक्ति माननी ही पड़ेगी, माने बिना काम नहीं चलता।

कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि सबका निषेध होनेपर एक शून्य ही शेष रहता है, अत: शून्यके सिवाय कुछ नहीं है। अगर शून्यके सिवाय कुछ नहीं है—यह बात सच्ची है तो फिर इस बातका ज्ञान किसको हुआ? शून्यका ज्ञाता शून्य नहीं हो सकता। दूसरी बात, अगर शून्यके सिवाय कुछ नहीं है तो फिर यह सृष्टि कैसे पैदा हुई? अभावसे भाव कैसे पैदा हो सकता है—‘कथमसत: सज्जायेतेति’ (छान्दोग्य० ६। २। २)? इसलिये ब्रह्मसूत्रके आरम्भमें ही आया है—अथातो ब्रह्मजिज्ञासा। जन्माद्यस्य यत:। (१।१।१-२)

‘अब यहाँसे ब्रह्मविषयक विचार आरम्भ किया जाता है। इस जगत् के जन्म आदि (उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय) जिससे होते हैं, वह ब्रह्म है।’

सर्वोपेता च तद्दर्शनात्।

(२। १। ३०)

‘वह ब्रह्म समस्त शक्तियोंसे सम्पन्न है, क्योंकि श्रुतियोंमें ऐसा ही देखा जाता है।’

तात्पर्य है कि परमात्मा सम्पूर्ण शक्तियोंका, विद्याओंका, कलाओंका विलक्षण भण्डार है। शक्तियाँ जड प्रकृतिमें नहीं रह सकतीं, प्रत्युत चिन्मय परमात्मतत्त्वमें ही रह सकती हैं। ज्ञानपूर्वक होनेवाली चीज जडमें कैसे रह सकती है? अगर ऐसा मानें कि सब शक्तियाँ प्रकृतिमें ही हैं, तो भी यह मानना पड़ेगा कि उन शक्तियोंका उपयोग (सृष्टि-रचना आदि) करनेकी योग्यता प्रकृतिमें नहीं है। जैसे, कम्प्यूटर जड होते हुए भी अनेक विचित्र कार्य करता है, पर उसका निर्माण और संचालन करनेवाला चेतन (मनुष्य) है। मनुष्यके द्वारा निर्मित, शिक्षित तथा संचालित हुए बिना वह कार्य नहीं कर सकता। कम्प्यूटर स्वत:सिद्ध नहीं है, प्रत्युत बनावटी (बनाया हुआ) है, जबकि परमात्मा स्वत:सिद्ध हैं। संसारमें तरह-तरहके आविष्कार होते हैं, पर आविष्कार करनेवाला चेतन ही होता है। अत: संसारमें जो भी विशेषता, विलक्षणता देखी जाती है, वह सब परमात्मासे ही आती है—

यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।

तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्॥

(गीता १०। ४१)

‘जो-जो ऐश्वर्ययुक्त, शोभायुक्त और बलयुक्त वस्तु है, उस-उसको तुम मेरे ही तेज (योग) के अंशसे उत्पन्न हुई समझो।’

यदि परमात्मामें शक्ति न होती तो वह संसारमें कैसे आती? जो शक्ति बीजमें होती है, वही वृक्षमें आती है। जो शक्ति बीजमें नहीं है, वह वृक्षमें कैसे आयेगी? उसी परमात्माकी वक्तृत्व-शक्ति वक्तामें आती है, उसीकी लेखन-शक्ति लेखकमें आती है, उसीकी दातृत्व-शक्ति दातामें आती है, उसीकी कवित्व-शक्ति कविमें आती है। मुक्ति, ज्ञान, प्रेम आदि सब उस परमात्माका ही दिया हुआ है। यह प्रकृतिका कार्य नहीं है। अगर ‘मैं मुक्तस्वरूप हूँ’—यह बात सच्ची है तो फिर बन्धन कहाँसे आया? अगर ‘मैं ज्ञानस्वरूप हूँ’—यह बात सच्ची है तो फिर अज्ञान कहाँसे आया? कैसे आया? क्यों आया? कब आया? सूर्यमें अमावसकी रात कैसे आ सकती है? वास्तवमें ज्ञान है तो परमात्माका, पर मान लिया अपना, तभी अज्ञान आया है*। मैं ज्ञानस्वरूप हूँ; ज्ञान मेरा है’—यह ‘मैं’ और ‘मेरा’ (अहंता-ममता) ही अज्ञान है। जिससे मुक्ति, ज्ञान, प्रेम आदि मिले हैं, उसकी तरफ दृष्टि न रहनेसे ही ऐसा दीखता है कि मुक्ति मेरी है, ज्ञान मेरा है, प्रेम मेरा है। यह तो देनेवाले (परमात्मा) की विलक्षणता है कि लेनेवालेको वह चीज अपनी ही मालूम देती है! मनुष्यसे यह बहुत बड़ी भूल होती है कि वह मिली हुई वस्तुको तो अपनी मान लेता है, पर जहाँसे वह मिली है, उस तरफ उसकी दृष्टि जाती ही नहीं! वह मिली हुई वस्तुको तो देखता है, पर देनेवालाको देखता ही नहीं! कार्यको तो देखता है, पर जिसकी शक्तिसे कार्य हुआ, उस कारणको देखता ही नहीं! वास्तवमें वस्तु अपनी नहीं है, प्रत्युत देनेवाला अपना है।

प्रह्लादजी कहते हैं—

शास्ता विष्णुरशेषस्य जगतो यो हृदि स्थित:।

तमृते परमात्मानं तात क: केन शास्यते॥

(विष्णुपुराण १।१७।२०)

‘हृदयमें स्थित भगवान् विष्णु ही तो सम्पूर्ण जगत् के उपदेशक हैं। हे तात! उन परमात्माको छोड़कर और कौन किसको कुछ सिखा सकता है? नहीं सिखा सकता।’

ध्रुवजी कहते हैं—

योऽन्त: प्रविश्य मम वाचमिमां प्रसुप्तां

संजीवयत्यखिलशक्तिधर: स्वधाम्ना।

अन्यांश्च हस्तचरणश्रवणत्वगादीन्

प्राणान्नमो भगवते पुरुषाय तुभ्यम्॥

(श्रीमद्भा० ४।९।६)

‘प्रभो! आप सर्वशक्तिसम्पन्न हैं। आप ही मेरे अन्त:करणमें प्रवेश करके अपने तेजसे मेरी इस सोयी हुई वाणीको सजीव करते हैं तथा हाथ, पैर, कान, त्वचा आदि अन्यान्य इन्द्रियों एवं प्राणोंको भी चेतनता देते हैं। मैं आप अन्तर्यामी भगवान् को प्रणाम करता हूँ।

केनोपनिषद् में आता है—

ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये तस्य ह ब्रह्मणो विजये देवा अमहीयन्त त ऐक्षन्तास्माकमेवायं विजयोऽस्माकमेवायं महिमेति। (३।१)

‘परब्रह्म परमेश्वरने ही देवताओंके लिये (उनको निमित्त बनाकर) असुरोंपर विजय प्राप्त की। परन्तु उस परब्रह्म परमेश्वरकी विजयमें इन्द्रादि देवताओंने अपनेमें महत्त्वका अभिमान कर लिया। वे ऐसा समझने लगे कि यह हमारी ही विजय है और यह हमारी ही महिमा है।’

देवताओंके इस अभिमानको नष्ट करनेके लिये परब्रह्म परमात्मा उनके सामने यक्षरूपसे प्रकट हो गये। उसको देखकर देवतालोग आश्चर्यचकित होकर विचार करने लगे कि यह यक्ष कौन है? उसका परिचय जाननेके लिये देवताओंने अग्निदेवको उसके पास भेजा। यक्षके पूछनेपर अग्निदेवने कहा कि मैं जातवेदाके नामसे प्रसिद्ध अग्निदेवता हूँ और मैं चाहूँ तो पृथ्वीमें जो कुछ है, उस सबको जलाकर भस्म कर सकता हूँ। तब यक्षने उसके सामने एक तिनका रख दिया और कहा कि तुम इस तिनकेको जला दो। अग्निदेव अपनी पूरी शक्ति लगाकर भी उस तिनकेको नहीं जला सका और लज्जित होकर देवताओंके पास लौट आया एवं बोला कि वह यक्ष कौन है—यह मैं नहीं जान सका। तब देवताओंने वायुदेवको यक्षके पास भेजा। यक्षके पूछनेपर वायुदेवने कहा कि मैं मातरिश्वाके नामसे प्रसिद्ध वायुदेवता हूँ और मैं चाहूँ तो पृथ्वीमें जो कुछ है, उस सबको उड़ा सकता हूँ। तब यक्षने उसके सामने भी एक तिनका रख दिया और कहा कि तुम इस तिनकेको उड़ा दो। वायुदेव अपनी पूरी शक्ति लगाकर भी उस तिनकेको नहीं उड़ा सका और लज्जित होकर लौट आया एवं देवताओंसे बोला कि वह यक्ष कौन है—यह मैं नहीं जान सका। तब देवताओंने इन्द्रको उस यक्षका परिचय जाननेके लिये भेजा। परन्तु इन्द्रके वहाँ पहुँचते ही यक्ष अन्तर्धान हो गया और उस जगह हिमाचलकुमारी उमादेवी प्रकट हो गयीं। इन्द्रके पूछनेपर उमादेवीने कहा कि परब्रह्म परमात्मा ही तुमलोगोंका अभिमान दूर करनेके लिये यक्षरूपसे प्रकट हुए थे। तात्पर्य है कि परमात्मा ही सम्पूर्ण शक्तियोंके मूल हैं। उपनिषदोंमें आया है—

परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च॥ (श्वेताश्वतर० ६।८)

‘इस परमेश्वरकी ज्ञान, बल और क्रियारूप स्वाभाविक दिव्य शक्ति नाना प्रकारकी ही सुनी जाती है।’

एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनि: सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम्॥ (माण्डूक्य० ६)

यह सबका ईश्वर है, यह सर्वज्ञ है, यह सबका अन्तर्यामी है, यह सम्पूर्ण जगत् का कारण है, क्योंकि समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका स्थान यही है।’

यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति। यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति। तद्विजिज्ञासस्व। तद् ब्रह्मेति।

(तैत्तिरीय० ३। १)

‘ये सब प्रत्यक्ष दीखनेवाले प्राणी जिससे उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जिसके सहारे जीवित रहते हैं तथा अन्तमें इस लोकसे प्रयाण करते हुए जिसमें प्रवेश करते हैं, उसको तत्त्वसे जाननेकी इच्छा कर, वही ब्रह्म है।’

तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाश: सम्भूत:। आकाशाद्वायु:। वायोरग्नि:। अग्नेराप:। अद्‍भ्यः पृथिवी। पृथिव्या ओषधय:। ओषधीभ्योऽन्नम्। अन्नात्पुरुष:।

(तैत्तिरीय० २।१)

‘निश्चय ही उस परमात्मासे पहले-पहल आकाश-तत्त्व उत्पन्न हुआ। आकाशसे वायु, वायुसे अग्नि, अग्निसे जल और जल-तत्त्वसे पृथ्वी उत्पन्न हुई। पृथ्वीसे समस्त ओषधियाँ उत्पन्न हुईं, ओषधियोंसे अन्न उत्पन्न हुआ और अन्नसे यह मनुष्य-शरीर उत्पन्न हुआ।’

स विश्वकृद् विश्वविदात्मयोनिर्ज्ञ: कालकालो गुणी सर्वविद् य:।

(श्वेताश्वतर० ६। १६)

‘वह ज्ञानस्वरूप परमात्मा सम्पूर्ण जगत् का रचयिता, सर्वज्ञ, स्वयं ही अपने प्राकटॺका हेतु, कालका भी महाकाल, सम्पूर्ण दिव्य गुणोंसे सम्पन्न और सबको जाननेवाला है।’

य: सर्वज्ञ: सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तप:।

तस्मादेतद्‍ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते॥

(मुण्डक० १।१।९)

‘जो सर्वज्ञ तथा सबको जाननेवाला है, जिसका ज्ञानमय तप है, उसी परमेश्वरसे यह विराट्‍रूप जगत् तथा नाम, रूप और अन्न उत्पन्न होते हैं।’

एतस्माज्जायते प्राणो मन: सर्वेन्द्रियाणि च।

खं वायुर्ज्योतिराप: पृथिवी विश्वस्य धारिणी॥

(मुण्डक० २।१।३)

‘इसी परमेश्वरसे प्राण, मन (अन्त:करण), समस्त इन्द्रियाँ आकाश, वायु, तेज, जल और सम्पूर्ण प्राणियोंको धारण करनेवाली पृथ्वी उत्पन्न होती है।’

उपनिषदोंमें आयी उपर्युक्त बातें सगुण परमात्माकी हैं, निर्गुण आत्माकी नहीं। गीतामें भी सगुण परमात्मासे ही सृष्टिकी उत्पत्ति आदि बतायी गयी है—

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्।

कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्॥

प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुन: पुन:।

भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्॥

(९।७-८)

‘हे कुन्तीनन्दन! कल्पोंका क्षय होनेपर सम्पूर्ण प्राणी मेरी प्रकृतिको प्राप्त होते हैं और कल्पोंके आदिमें मैं फिर उनकी रचना करता हूँ। प्रकृतिके वशमें होनेसे परतन्त्र हुए इस प्राणिसमुदायको मैं (कल्पोंके आदिमें) अपनी प्रकृतिको वशमें करके बार-बार रचता हूँ।’

मयाध्यक्षेण प्रकृति: सूयते सचराचरम्।

(९।१०)

‘प्रकृति मेरी अध्यक्षतामें सम्पूर्ण चराचर जगत् को रचती है।’

अहं कृत्स्नस्य जगत: प्रभव: प्रलयस्तथा।

(७।६)

‘मैं सम्पूर्ण जगत् का प्रभव तथा प्रलय हूँ।’

३. सबके शासक परमात्मा हैं

हम जिस संसारमें बैठे हैं, उसका शासक, स्वामी सगुण ईश्वर ही है। जैसे राज्यमें राजाकी मुख्यता होती है, ऐसे ही संसारमें सगुण ईश्वरकी मुख्यता है। जैसे प्रत्येक समुदायका एक शासक होता है, ऐसे ही सृष्टिका भी कोई शासक होना चाहिये। शासक निर्गुण-निराकार नहीं हो सकता, क्योंकि निर्गुण-निराकारमें कोई स्फुरणा पैदा होती ही नहीं। अत: शासक सगुण-साकार ही हो सकता है। उपनिषदोंमें भी परमात्माको सबका शासक, स्वामी बताया गया है—

क्षरं प्रधानममृताक्षरं हर: क्षरात्मानावीशते देव एक:।

(श्वेताश्वतर० १।१०)

‘प्रकृति तो विनाशशील है और इसको भोगनेवाला जीवात्मा अमृतस्वरूप अविनाशी है। इन दोनों (क्षर और अक्षर) को एक ईश्वर अपने शासनमें रखता है।’

क्षरं त्वविद्या ह्यमृतं तु विद्या विद्याविद्ये ईशते यस्तु सोऽन्य:॥

(श्वेताश्वतर० ५।१)

‘विनाशशील जडवर्ग तो अविद्या नामसे कहा गया है और अविनाशी जीवात्मा विद्या नामसे कहा गया है। जो इन विद्या और अविद्या दोनोंपर शासन करता है, वह परमेश्वर इन दोनोंसे भिन्न-सर्वथा विलक्षण है।’

एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठत एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि द्यावापृथिव्यौ विधृते तिष्ठत.....। (बृहदारण्यक० ३।८।९)

‘हे गार्गि! इस अक्षरके ही प्रशासनमें सूर्य और चन्द्रमा विशेषरूपसे धारण किये हुए स्थित रहते हैं। हे गार्गि! इस अक्षरके ही प्रशासनमें द्युलोक और पृथ्वी विशेषरूपसे धारण किये हुए स्थित रहते हैं........।’

भयादस्याग्निस्तपति भयात् तपति सूर्य:।

भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चम:॥

(कठ० २।३।३)

‘इसीके भयसे अग्नि तपता है, इसीके भयसे सूर्य तपता है तथा इसीके भयसे भयभीत होकर इन्द्र, वायु और पाँचवें मृत्यु देवता अपने-अपने काममें प्रवृत्त हो रहे हैं।’

गीतामें आया है—

द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।

क्षर: सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥

उत्तम: पुरुषस्त्वन्य: परमात्मेत्युदाहृत:।

यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वर:॥

(१५।१६-१७)

इस संसारमें क्षर (नाशवान्) और अक्षर (अविनाशी)—ये दो प्रकारके पुरुष हैं। सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीर नाशवान् और कूटस्थ (जीवात्मा) अविनाशी कहा जाता है। उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो परमात्मा नामसे कहा गया है। वही अविनाशी ईश्वर तीनों लोकोंमें प्रविष्ट होकर सबका भरण-पोषण करता है।’

४. परमात्माके सगुण स्वरूपकी मुख्यता

गीतामें भगवान् ने प्रकृतिको अनादि कहा है—

प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्धॺनादी उभावपि।

(१३।१९)

यदि निर्गुणको सर्वोपरि मानें तो उनकी शक्ति प्रकृति अनादि कैसे होगी? अत: वास्तवमें सगुण ही सर्वोपरि है। इसलिये गीतामें सगुण-साकार भगवान् श्रीकृष्णको ‘ब्रह्म’ नामसे कहा गया है, जैसे—

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति य:।

(५।१०)

परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्।

(१०।१२)

गीतामें ब्रह्मके तीन नाम बताये गये हैं—‘ॐ’, ‘तत्’ और ‘सत्’ (१७।२३)। नाम-नामीका सम्बन्ध होनेसे यह भी सगुण ही हुआ। वैष्णवलोग भी सगुण-साकार भगवान् के उत्सवको ‘ब्रह्मोत्सव’ नामसे कहते हैं। श्रीमद्भागवतमें भी ब्रह्म (निर्गुण-निराकार), परमात्मा (सगुण-निराकार) और भगवान् (सगुण-साकार)—तीनोंको एक बताया है—

वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्।

ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते॥

(१। २। ११)

‘तत्त्वज्ञ महापुरुष उस ज्ञानस्वरूप एवं अद्वितीय तत्त्वको ही ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्—इन तीन नामोंसे कहते हैं।’

निर्गुण-निराकारके अनन्य उपासक मधुसूदनाचार्यजीको भी कहना पड़ा—

अद्वैतवीथीपथिकैरुपास्या:

स्वाराज्यसिंहासनलब्धदीक्षा:।

शठेन केनापि वयं हठेन

दासीकृता गोपवधूविटेन॥

‘अद्वैतमार्गके अनुयायियोंद्वारा पूज्य तथा स्वाराज्यरूपी सिंहासनपर प्रतिष्ठित होनेका अधिकार प्राप्त किये हुए हमें गोपियोंके पीछे-पीछे फिरनेवाले किसी धूर्तने हठपूर्वक अपने चरणोंका गुलाम बना लिया!’

इसलिये उन्होंने साफ-साफ कह दिया कि भगवान् श्रीकृष्ण (सगुण-साकार)से परे कोई भी तत्त्व नहीं है—

वंशीविभूषितकरान्नवनीरदाभात्

पीताम्बरादरुणविम्बफलाधरोष्ठात्।

पूर्णेन्दुसुन्दरमुखादरविन्दनेत्रात्

कृष्णात् परं किमपि तत्त्वमहं न जाने॥

उद्धवजी निर्गुण-निराकार ब्रह्मको सबसे ऊँचा मानते थे, पर गोपियोंकी सगुण-भक्ति (श्रीकृष्णके प्रति प्रेम)के सामने उनका अभिमान गल गया! पद्मपुराणमें आया है कि भगवान् श्रीकृष्णके ही नखकी एक किरण ‘ब्रह्म’ है—

यन्नखेन्दुरुचिर्ब्रह्म ध्येयं ब्रह्मादिभि: सुरै:।

गुणत्रयमतीतं तं वन्दे वृन्दावनेश्वरम्॥

(पाताल० ७७।६०)

‘(भगवान् शंकर कहते हैं—) जिनके नखचन्द्रकी कान्तिरूप ब्रह्मका देवतागण ध्यान करते हैं, उन त्रिगुणातीत वृन्दावनेश्वर भगवान् श्रीकृष्णकी मैं वन्दना करता हूँ।’

हनुमन्नाटकमें एक श्लोक आया है—

यं शैवा: समुपासते शिव इति ब्रह्मेति वेदान्तिनो

बौद्धा बुद्ध इति प्रमाणपटव: कर्तेति नैयायिका:।

अर्हन्नित्यथ जैनशासनरता: कर्मेति मीमांसका:

सोऽयं नो विदधातु वाञ्छितफलं त्रैलोक्यनाथो हरि:॥

(१।३)

‘शैव शिवरूपसे, वेदान्ती ब्रह्मरूपसे, बौद्ध बुद्धरूपसे, प्रमाणकुशल नैयायिक कर्तारूपसे, जैन अर्हन् रूपसे और मीमांसक कर्मरूपसे जिनकी उपासना करते हैं, वे त्रैलोक्याधिपति श्रीहरि हमें वाञ्छित फल प्रदान करें।’

—इस श्लोकमें भी ब्रह्मको सगुण (श्रीहरि)का ही एक रूप बताया गया है। अत: भगवान् का सगुण रूप सर्वोपरि है।

‘सगुण’ का अर्थ सत्त्व-रज-तम गुणोंसे युक्त नहीं है, प्रत्युत जिसमें ऐश्वर्य, माधुर्य, सौन्दर्य, औदार्य आदि दिव्य गुण नित्य विद्यमान रहते हैं, उसका नाम ‘सगुण’ है। श्रीरामानुजाचार्यजी महाराज अपने गीताभाष्यमें लिखते हैं—

‘स्वाभाविकानवधिकातिशयज्ञानबलैश्वर्यवीर्यशक्तितेज: प्रभृत्यसंख्येयकल्याणगुणगणमहोदधि:’

‘जो स्वाभाविक असीम अतिशय ज्ञान, बल, ऐश्वर्य, वीर्य, शक्ति और तेज प्रभृति असंख्य कल्याणमय गुण-समूहोंके महान् समुद्र हैं।’

‘अपारकारुण्यसौशील्यवात्सल्यौदार्यमहोदधि:’

‘जो अपार कारुण्य, सौशील्य, वात्सल्य और औदार्यके महान् समुद्र हैं।’ ये गुण चेतनके ही हो सकते हैं, माया (जड)के नहीं।

श्रीमद्भागवतमें सगुणकी उपासना (भक्ति)को निर्गुण अर्थात् सत्त्व, रज और तम—तीनों गुणोंसे अतीत बताया गया है, जैसे—‘मन्निकेतं तु निर्गुणाम्’ (११। २५। २५), ‘मत्सेवायां तु निर्गुणा’ (११। २५। २७) आदि। गीतामें भी आया है, कि सगुणकी उपासना करनेवाला तीनों गुणोंसे अतीत हो जाता है—

मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।

स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते॥

(१४।२६)

ब्रह्मसूत्रमें भी ‘जन्माद्यस्य यत:’ (१। १। २)—इस सूत्रके द्वारा सगुण ब्रह्मको ही मुख्य माना गया है। कारण कि सृष्टिका रचयिता सगुण ही हो सकता है, निर्गुण नहीं। ब्रह्मसूत्रके द्वितीय अध्याय, प्रथम पादमें भी ब्रह्मको विभिन्न युक्तियोंसे सृष्टिका कर्ता सिद्ध किया है और उसको समस्त शक्तियोंसे सम्पन्न बताया है—‘सर्वोपेता च तद्दर्शनात्’ (२।१।३०)। आदि शंकराचार्यजी महाराजने भी गीता-भाष्यमें ‘पुरुषोत्तम’ को ब्रह्म माना है (१५।१८)। ‘प्रबोध-सुधाकर’ में वे कहते हैं—

भूतेष्वन्तर्यामी ज्ञानमय: सच्चिदानन्द:।

प्रकृते: पर: परात्मा यदुकुलतिलक: स एवायम्॥ १९५॥

‘जो ज्ञानस्वरूप, सच्चिदानन्द, प्रकृतिसे परे परमात्मा सब भूतोंमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं, ये यदुकुलतिलक श्रीकृष्ण वही हैं।’

उपनिषदोंमें भी ऐसे कई मन्त्र मिलते हैं, जिनसे सगुणकी मुख्यता सिद्ध होती है, जैसे—

एतज्ज्ञेयं नित्यमेवात्मसंस्थं

नात: परं वेदितव्यं हि किञ्चित्।

भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा

सर्वं प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममेतत्॥

(श्वेताश्वतर० १।१२)

‘अपने ही भीतर स्थित इस ब्रह्मको ही सर्वदा जानना चाहिये, क्योंकि इससे बढ़कर जाननेयोग्य तत्त्व दूसरा कुछ भी नहीं है। भोक्ता (जीवात्मा), भोग्य (जडवर्ग) और उनके प्रेरक परमेश्वरको जानकर मनुष्य सब कुछ जान लेता है। इस प्रकार यह तीन भेदोंमें बताया हुआ ही ब्रह्म है अर्थात् जीवात्मा, प्रकृति और परमात्मा—तीनों समग्र ब्रह्मके ही रूप हैं।’*

मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्।

(श्वेताश्वतर० ४। १०)

‘माया तो प्रकृतिको समझना चाहिये और मायापति महेश्वरको समझना चाहिये।’

यदा पश्य: पश्यते रुक्मवर्णं

कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्।

तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय

निरञ्जन: परमं साम्यमुपैति॥

(मुण्डक० ३।१।३)

‘जब यह द्रष्टा (जीवात्मा) सबके शासक, ब्रह्माके भी आदि कारण, सम्पूर्ण जगत् के रचयिता, दिव्य प्रकाशस्वरूप परमपुरुषको प्रत्यक्ष कर लेता है, तब पुण्य-पाप दोनोंको भलीभाँति हटाकर निर्मल हुआ वह ज्ञानी महापुरुष सर्वोत्तम समताको प्राप्त कर लेता है।’

मनोमय: प्राणशरीरो भारूप: सत्यसंकल्प आकाशात्मा सर्वकर्मा सर्वकाम: सर्वगन्ध: सर्वरस: सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादर:। (छान्दोग्य० ३।१४।२)

‘वह ब्रह्म मनोमय, प्राणशरीर, प्रकाशस्वरूप, सत्यसङ्कल्प, आकाशस्वरूप, सर्वकर्मा, सर्वकाम, सर्वगन्ध, सर्वरस, इस समस्त जगत् को सब ओरसे व्याप्त करनेवाला, वाक्-रहित और सम्भ्रमशून्य है।’

ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन्

देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्।

य: कारणानि निखिलानि तानि

कलात्मयुक्तान्यधितिष्ठत्येक:॥

(श्वेताश्वतर० १।३)

‘उन महर्षियोंने ध्यानयोगमें स्थित होकर अपने गुणोंसे ढकी हुई उन परमात्मदेवकी स्वरूपभूत शक्तिका साक्षात्कार किया, जो परमात्मदेव अकेला ही उन कालसे लेकर आत्मातक सम्पूर्ण कारणोंपर शासन करता है।’

सगुण या निर्गुण, सभी उपासनाएँ सगुण-निराकारसे ही आरम्भ होती हैं। परमात्मा हैं—यह मान्यता भी सगुण-निराकारको लेकर ही है, क्योंकि प्रकृतिका कार्य होनेसे बुद्धि प्रकृतिसे अतीत निर्गुण-तत्त्वको पकड़ नहीं सकती। इसलिये निर्गुणके उपासकका लक्ष्य तो निर्गुण-निराकारका होता है, पर बुद्धिसे वह सगुण-निराकारका ही चिन्तन करता है।

५. ज्ञानमार्ग और भक्तिमार्ग

भक्ति और ज्ञानमें, द्वैत और अद्वैतमें परस्पर किञ्चिन्मात्र भी विरोध नहीं है। भक्तिमें ज्ञान बाधक नहीं है, प्रत्युत भक्तिका आग्रह बाधक है और ज्ञानमें भक्ति बाधक नहीं है, प्रत्युत ज्ञानका आग्रह बाधक है। पुस्तकीय ज्ञान अथवा वाचिक (बातूनी) ज्ञान होनेसे ही उसमें भक्ति (द्वैतभावना) बाधक दीखती है। पुस्तकीय या वाचिक ज्ञानके विषयमें गोस्वामीजी महाराज लिखते हैं—

ब्रह्म ग्यान बिनु नारि नर कहहिं न दूसरि बात।

कौड़ी लागि लोभ बस करहिं बिप्र गुर घात॥

(मानस, उत्तर० ९९ क)

ज्ञानका अनुभव होनेपर उसमें भक्तिसे बाधा नहीं लगती। भगवान् शंकर, सनकादिक, नारदजी, वेदव्यासजी, शुकदेवजी आदि पूर्ण ज्ञानी होते हुए भी भगवान् की लीला-कथाएँ गाते और सुनते हैं। वास्तवमें बाधक है—संसारकी आसक्ति। अत: ज्ञानमें द्वैतबुद्धि बाधक नहीं है, प्रत्युत संसारकी आसक्ति बाधक है। भक्तिमें तो प्रेम होता है, आसक्ति नहीं होती। प्रेम आसक्तिको मिटा देता है। अत: ज्ञानमें भक्ति बाधक नहीं है।

जब साधक पहले ही अपनी धारणा बना लेता है कि परमात्मा निर्गुण ही हैं या परमात्मा सगुण ही हैं, द्वैत ही ठीक है या अद्वैत ही ठीक है, तो फिर उसको वैसा ही दीखने लग जाता है। वास्तवमें इस तरह एक धारणा (आग्रह) बना लेनेसे तत्त्वबोधमें बाधा लगती है। विभिन्न सम्प्रदायोंमें हाँ-में-हाँ मिलानेवाले लोग तो अधिक होते हैं, पर अनुभव करनेवाले बहुत कम होते हैं। जो अपने सम्प्रदायकी बात मानते हुए भी ‘वास्तविक तत्त्व क्या है?’ ऐसी सच्ची जिज्ञासा रखता है और अपने मतका आग्रह नहीं रखता, उसीको सुगमतापूर्वक तत्त्वबोध हो सकता है। वास्तवमें ज्ञान और भक्तिमें कोई फर्क नहीं है। ज्ञानके बिना प्रेम आसक्ति है और प्रेमके बिना ज्ञान शून्य है। परन्तु ज्ञानमार्गी भक्तिमार्गीका तिरस्कार (उपेक्षा, निन्दा या खण्डन) करता है तो ज्ञानकी सिद्धिमें बाधा लग जायगी और भक्तिमार्गी ज्ञानमार्गीका तिरस्कार करता है तो भक्तिकी सिद्धिमें बाधा लग जायगी। वास्तवमें अभेदवादी भेदवादियोंकी जैसी निन्दा करते हैं, वैसी निन्दा भेदवादी अभेदवादियोंकी नहीं करते। भेदवादी केवल यह कहते हैं कि अभेदवादी मायावादी हैं, क्योंकि वे संसारको माया मानते हैं। परन्तु वास्तवमें अभेदवादी मायावादी नहीं है, प्रत्युत ब्रह्मवादी हैं।

वेदान्त पढ़नेवाले कोई-कोई अभेदवादी व्यक्ति भक्तिको पराधीन (छोटा) बताते हैं। वास्तवमें भक्ति परम स्वतन्त्र है—‘भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी’ (मानस, उत्तर० ४५। ३)। यदि परमात्माको ‘पर’, मानेंगे तो अद्वैत सिद्धान्त भी सिद्ध नहीं होगा, क्योंकि परमात्माको ‘पर’ माननेसे जीव और ब्रह्मकी एकता कैसे होगी? अत: परमात्मा ‘पर’ नहीं हैं, प्रत्युत ‘स्व’ हैं। ‘स्व’ के दो अर्थ होते हैं—स्वयं (स्वरूप) और स्वकीय। परमात्मा स्वकीय (अपने) हैं। स्वकीयकी अधीनता परम स्वाधीनता है, शिरोमणि स्वाधीनता है। इसलिये भक्तिमें महान् स्वाधीनता, प्रभुता, ऐश्वर्य, विलक्षणता आदि है।

अभेदवादी कहते हैं कि भक्तिमें भगवान् और भक्त—ये दो होते हैं और दूसरेसे भय होता है—‘द्वितीयाद्वै भयं भवति’ (बृहदारण्यक० १। ४। २)। भय दूसरेसे तो होता है, पर आत्मीय (अपने)से भय नहीं होता। भगवान् दूसरे नहीं हैं, प्रत्युत आत्मीय हैं। बालकके लिये माँ द्वितीय नहीं होती, प्रत्युत आत्मीय होती है। इसलिये बालकको माँसे भय नहीं होता। जैसे माँकी गोदमें जानेसे बालक अभय हो जाता है, ऐसे ही भगवान् की शरणमें जानेसे मनुष्य सदाके लिये अभय हो जाता है।

असत् (संसार)की तरफ खिंचाव ही असाधन है, जो पतन करनेवाला है और सत् (परमात्मा) की तरफ खिंचाव ही साधन है, जो उन्नति करनेवाला है। ‘ज्ञान’ से बातें तो समझमें आ जाती हैं, पर संसारका खिंचाव नहीं मिटता। संसारका खिंचाव तो ‘प्रेम’ से ही मिटता है*। तत्त्वज्ञान होनेपर भी परमात्मामें खिंचाव (प्रेम) हुए बिना संसारका खिंचाव सर्वथा नहीं मिटता। अत: प्रेम ज्ञानसे भी श्रेष्ठ है। वह प्रेम प्रकट होता है—भगवान् को अपना माननेसे और संसारको अपना न माननेसे। इसलिये सगुणकी भक्ति मुख्य है।

कर्मयोगीमें त्यागका बल है और ज्ञानयोगीमें विवेकका बल है, पर भक्तियोगीमें भगवान् के विश्वासका बल है। भगवान् के विश्वासका बल होनेसे भक्त बहुत जल्दी विकारोंसे मुक्त हो जाता है। ज्ञानमार्गके साधकोंका भी यह अनुभव है कि विकारोंके कारण चित्तमें हलचल होनेके समय भगवान् के शरण होकर उनको पुकारनेसे जैसा लाभ होता है, वैसा केवल विचार करनेसे नहीं होता। इसलिये भगवान् ने ज्ञानमार्गके साधकके लिये भी अपने परायण होनेकी बात कही है—

मन: संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्पर:॥

(गीता ६।१४)

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्पर:॥

(गीता २।६१)

यह भक्तिकी विशेषता है!

६. भक्तिकी मुख्यता

परमात्मप्राप्तिके सभी साधनोंमें भक्ति मुख्य है। ज्ञानमार्गी ऐसा कहते हैं कि किसी भी मार्गसे चलो, अन्तमें ज्ञानमें ही आना पड़ेगा, परन्तु यह बात ठीक जँचती नहीं। वास्तवमें भक्ति ही अन्तमें है। ज्ञानमें तो अखण्ड, स्थिर रस है, पर भक्तिमें अनन्त, प्रतिक्षण वर्धमान रस है। भक्ति इतनी व्यापक है कि वह प्रत्येक साधनके आदिमें भी है और अन्तमें भी है। भक्ति प्रत्येक साधनके आरम्भमें पारमार्थिक आकर्षणके रूपमें रहती है, क्योंकि परमात्मामें आकर्षण हुए बिना कोई मनुष्य साधनमें लग ही नहीं सकता। साधनके अन्तमें प्रतिक्षण वर्धमान प्रेमके रूपमें भक्ति रहती है—‘मद्भक्तिं लभते पराम्’ (गीता १८। ५४), क्योंकि इसकी प्राप्तिमें ही साधनकी पूर्णता है। इसलिये ब्रह्मसूत्रमें अन्य सब धर्मोंकी अपेक्षा भगवद्भक्ति-विषयक धर्मको श्रेष्ठ बताया गया है—‘अतस्त्वितरज्यायो लिङ्गाच्च’ (३।४।३९)।

गीतामें भी अर्जुनने भगवान् से प्रश्न किया कि सगुण और निर्गुण—दोनों उपासकोंमें कौन श्रेष्ठ है तो भगवान् ने उत्तरमें सगुण उपासकोंको ही श्रेष्ठ बताया—

मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।

श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मता:॥

(१२।२)

‘मेरेमें मनको लगाकर नित्य-निरन्तर मेरेमें लगे हुए जो भक्त परम श्रद्धासे युक्त होकर मेरी उपासना करते हैं, वे मेरे मतमें सर्वश्रेष्ठ योगी हैं।’

प्रत्येक साधकको अन्तमें भक्तिमार्गमें आना ही पड़ेगा, क्योंकि वास्तविक अद्वैत भक्तिमें ही है। गीतामें आया है—

अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्।

विमुच्य निर्मम: शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥

ब्रह्मभूत: प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।

सम: सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥

भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वत:।

ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥

(१८। ५३—५५)

‘अहङ्कार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रहका त्याग करके एवं निर्मम तथा शान्त होकर साधक ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है।’

‘वह ब्रह्मभूत-अवस्थाको प्राप्त प्रसन्न मनवाला साधक न तो किसीके लिये शोक करता है और न किसीकी इच्छा करता है। ऐसा सम्पूर्ण प्राणियोंमें समभाववाला साधक मेरी पराभक्तिको प्राप्त हो जाता है।’

‘उस पराभक्तिसे मेरेको, मैं जितना हूँ और जो हूँ— इसको तत्त्वसे जान लेता है तथा मेरेको तत्त्वसे जानकर फिर तत्काल मेरेमें प्रविष्ट हो जाता है।’

‘मैं जितना हूँ और जो हूँ’ (यावान् यश्चास्मि)—यह बात सगुणकी ही है, क्योंकि यावान्-तावान् निर्गुणमें हो सकता ही नहीं, प्रत्युत सगुणमें ही हो सकता है१। इससे सगुणकी विशेषता तथा मुख्यता सिद्ध होती है। ज्ञानमार्गमें तो तत्त्वसे जानना (ज्ञात्वा) और प्रविष्ट होना (विशते)—ये दो ही होते हैं, पर भक्तिमार्गमें भगवान् ने तत्त्वसे जानना (ज्ञातुम्) और प्रविष्ट होना (प्रवेष्टुम्) के सिवाय अपने दर्शन (द्रष्टुम्) की बात भी कही है२। भगवान् इन्द्रियोंका विषय न होनेपर भी इन्द्रियोंका विषय बन जाते हैं—यह भगवान् की विलक्षण कृपा है! यह विलक्षणता भक्तिमें ही है, ज्ञानमें नहीं।

ज्ञानकी प्रधानता होनेपर साधक भगवान् के निर्गुण रूपको ही जानता है, पर भक्तिकी प्रधानता होनेपर साधक भगवान् के समग्र रूपको जानता है। जैसे बछड़ा गायके एक स्तनका पान करता है तो गायके चारों स्तनोंसे दूध टपकने लगता है, ऐसे ही भक्तका भगवान् की तरफ आकर्षण (प्रेम) होता है तो भगवान् कृपा करके अपने समग्ररूपको प्रकट कर देते हैं। भगवान् उसके अज्ञानान्धकारको दूर कर देते हैं१ उसका उद्धार भी भगवान् कर देते हैं२। तात्पर्य है कि अनन्य भक्तको अपने उद्धारके लिये कुछ करना नहीं पड़ता। उसको ज्ञान करानेकी, उसका उद्धार करनेकी जिम्मेवारी भगवान् पर होती है। भक्त सब क्रियाएँ करते हुए भी सदा भगवान् में ही बरतता है, भगवान् में ही स्थित रहता है३। इतना ही नहीं, भक्त योगभ्रष्ट भी नहीं होता, क्योंकि वह अपने साधनका आश्रय न रखकर भगवान् का ही आश्रय रखता है। इसलिये भगवान् कहते हैं—

सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्‍व्यपाश्रय:।

मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥

(गीता १८। ५६)

‘मेरा आश्रय लेनेवाला भक्त सदा सब कर्म करता हुआ भी मेरी कृपासे शाश्वत अविनाशी पदको प्राप्त हो जाता है।’

मच्चित्त: सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।

(गीता १८। ५८)

‘मेरेमें चित्तवाला होकर तू मेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्नोंको तर जायगा।’

तात्पर्य है कि भगवान् भक्तपर विशेष कृपा करके उसके साधनकी सम्पूर्ण विघ्न-बाधाओंको भी दूर कर देते हैं और अपनी प्राप्ति भी करा देते हैं। इसलिये ब्रह्म-सूत्रमें आया है—‘विशेषानुग्रहश्च’ (३। ४। ३८) ‘भगवान् की भक्तिका अनुष्ठान करनेसे भगवान् का विशेष अनुग्रह होता है।’

जहाँ भक्ति होती है, वहाँ ज्ञान और वैराग्य अपने-आप आ जाते हैं। अत: भक्तको ज्ञान और वैराग्यकी प्राप्तिके लिये परिश्रम नहीं करना पड़ता। श्रीमद्भागवत-माहात्म्यमें ज्ञान और वैराग्यको भक्तिके बेटे बताया है—

अहं भक्तिरिति ख्याता इमौ मे तनयौ मतौ।

ज्ञानवैराग्यनामानौ कालयोगेन जर्जरौ॥

(१।४५)

जहाँ माँ जायगी, वहाँ बेटे भी जायँगे ही! इसलिये ‘बोधसार’ में आया है—

यद्यन्यत् साधनं नास्ति भक्तिरस्ति महेश्वरे।

तदा क्रमेण सिध्यन्ति विरक्तिज्ञानमुक्तय:॥

(बोधसार, भक्ति० ५)

‘यदि अपनेमें परमेश्वरकी भक्ति विद्यमान है तो फिर अन्य साधन न होनेपर भी क्रमश: वैराग्य, ज्ञान तथा मोक्ष—तीनोंकी सिद्धि हो जाती है।’

जब शुद्ध भक्तिका वर्णन होता है, तब वह निर्गुण (गुणोंसे अतीत) होता है, जैसे—‘मत्सेवायां तु निर्गुणा’ (श्रीमद्भा० ११।२५।२७) आदि। परन्तु ज्ञानमार्गपर चलनेवाले, ज्ञानके संस्कारवाले जब भक्तिका वर्णन करते हैं, तब उसमें सत्त्वगुणकी प्रधानता रहती है। इसलिये ज्ञानीलोग भक्ति (प्रेम) का जो वर्णन करते हैं, वह असली (शुद्ध) भक्तिका वर्णन नहीं होता, प्रत्युत ज्ञानमिश्रित भक्तिका वर्णन होता है, जो कि विक्षेप-दोषको दूर करनेवाली होनेसे ज्ञानका साधन है, प्रेमाभक्ति नहीं। प्रेमाभक्ति तो तत्त्वज्ञानसे भी आगेकी चीज है। ज्ञानमार्गवाले प्रेमको अन्त:करणकी एक वृत्ति (सात्त्विक भाव) मानते हैं, जबकि प्रेम अन्त:करणकी वृत्ति है ही नहीं। प्रेम तो स्वयंसे होता है। प्रेममें गुण (जड़ता) है ही नहीं*। मीराबाईमें शुद्ध प्रेम था, इसलिये उनका शरीर भी चिन्मय होकर भगवान् के श्रीविग्रहमें लीन हो गया, क्योंकि भक्तिमें जड वस्तु रहती ही नहीं, प्रत्युत सब कुछ चिन्मय हो जाता है। गोपियोंको भी सब जगह कृष्ण-ही-कृष्ण दीखते थे। उनके शरीर भी चिन्मय होकर एक तालाबमें लीन हो गये थे, जो ‘गोपीतलाई’ (द्वारका) नामसे प्रसिद्ध है। उस तालाबकी मिट्टी ही ‘गोपीचन्दन’ कहलाती है।

ज्ञानमार्गमें तो संसारकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है, पर भक्तिमार्गमें स्वतन्त्र तत्त्व ही नहीं है, प्रत्युत सब कुछ भगवान् ही हैं—‘वासुदेव: सर्वम्।’ ज्ञानमार्गवाले मुक्तिको सबसे ऊँची चीज मानते हैं, फिर वे मुक्तिसे भी आगेकी चीज प्रेम (प्रेमाभक्ति या पराभक्ति) को कैसे समझें? मुक्तिमें तो अखण्ड रस है, पर प्रेममें अनन्त रस है। प्रेम मुक्ति, तत्त्वज्ञान, स्वरूप-बोध, आत्मसाक्षात्कार, कैवल्यसे भी आगेकी चीज है। ‘बोधसार’ में आया है—

द्वैतं मोहाय बोधात्प्राग्जाते बोधे मनीषया।

भक्त्यर्थं कल्पितं द्वैतमद्वैतादपि सुन्दरम्॥

(बोधसार, भक्ति० ४२)

‘बोधसे पहलेका द्वैत मोहमें डालता है, परन्तु बोध हो जानेपर भक्तिके लिये कल्पित द्वैत अद्वैतसे भी अधिक सुन्दर होता है।’

प्रेमाभक्ति तत्त्वज्ञान होनेके बाद भी हो सकती है और सीधे भी हो सकती है। भक्तका भगवान् में गाढ़ अपनापन (आत्मीयता) होनेसे तत्त्वज्ञान हुए बिना भी सीधे प्रेमाभक्ति प्राप्त हो सकती है। प्रेमाभक्ति प्राप्त होनेके बाद भगवत्कृपासे अपने-आप तत्त्वज्ञान हो जाता है—

मम दरसन फल परम अनूपा।

जीव पाव निज सहज सरूपा॥

(मानस, अरण्य० ३६।५)

भगवान् कहते हैं—

तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।

ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥

तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तम:।

नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥

(गीता १०।१०-११)

‘उन नित्य-निरन्तर मेरेमें लगे हुए और प्रेमपूर्वक मेरा भजन करनेवाले भक्तोंको मैं वह बुद्धियोग देता हूँ, जिससे उनको मेरी प्राप्ति हो जाती है। उन भक्तोंपर कृपा करनेके लिये ही उनके स्वरूपमें रहनेवाला मैं उनके अज्ञानजन्य अन्धकारको देदीप्यमान ज्ञानरूप दीपकके द्वारा सर्वथा नष्ट कर देता हूँ।’

गुरुजनोंसे मिलनेवाले ज्ञानकी अपेक्षा जगद्‍गुरु भगवान् से मिलनेवाला ज्ञान अत्यन्त विलक्षण होता है!

ज्ञानीमें तो अखण्ड आनन्द रहता है, पर प्रेमी भक्तमें प्रतिक्षण वर्धमान आनन्द रहता है। इसलिये भक्त ज्ञानीकी तरह शान्त, एकरस नहीं रहता, प्रत्युत उसमें विभिन्न विलक्षण भावोंका उछाल आता रहता है—

वाग्गद्‍गदा द्रवते यस्य चित्तं

रुदत्यभीक्ष्णं हसति क्वचिच्च।

विलज्ज उद्‍गायति नृत्यते च

मद्भक्तियुक्तो भुवनं पुनाति॥

(श्रीमद्भा० ११।१४।२४)

‘जिसकी वाणी मेरे नाम, गुण और लीलाका वर्णन करते-करते गद्‍गद हो जाती है, जिसका चित्त मेरे रूप, गुण, प्रभाव और लीलाओंका चिन्तन करते-करते द्रवित हो जाता है, जो बारंबार रोता रहता है, कभी हँसने लग जाता है, कभी लज्जा छोड़कर ऊँचे स्वरसे गाने लगता है और कभी नाचने लग जाता है, ऐसा मेरा भक्त सारे संसारको पवित्र कर देता है।’