भगवान् विष्णु

परब्रह्म परमात्मा एक ही हैं। उनसे बढ़कर दूसरा कोई व्यापक, निर्विकार, सदा रहनेवाला तत्त्व नहीं है। गीतामें उस तत्त्वका ‘ज्ञेय’ नामसे वर्णन किया गया है (१३।१२-१७)। जिसको जान सकते हैं, जो जाननेयोग्य है तथा जिसको अवश्य जानना चाहिये, उसको ‘ज्ञेय’ कहते हैं। उसको जान लेनेपर मनुष्य ज्ञातज्ञातव्य होकर सदाके लिये जन्म-मरणसे रहित हो जाता है। उस अनादि और परब्रह्म परमात्मतत्त्वको सत् भी नहीं कह सकते और असत् भी नहीं कह सकते अर्थात् उसमें सत्-असत् शब्दोंकी पहुँच नहीं होती; क्योंकि वह शब्दातीत है।

जैसे स्याहीमें सब जगह सब तरहकी लिपियाँ विद्यमान रहती हैं और सोनेमें सब जगह सब तरहके गहने, मूर्तियाँ और उनके अवयव विद्यमान रहते हैं, ऐसे ही उस परमात्मतत्त्वमें सब जगह अनन्त वस्तुएँ, व्यक्ति और उनके अवयव विद्यमान रहते हैं। इसलिये वे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डोंको अपने एक अंशसे व्याप्त करके स्थित हैं—‘विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्’ (गीता १०।४२)।

वे परमात्मा सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे रहित होनेपर भी इन्द्रियोंके विषयोंको ग्रहण करते हैं, आसक्तिरहित होनेपर भी सम्पूर्ण संसारका भरण-पोषण करते हैं और निर्गुण होनेपर भी गुणोंके भोक्ता बनते हैं। वे सम्पूर्ण प्राणियोंके बाहर-भीतर परिपूर्ण हैं और उन प्राणियोंके रूपमें भी वे ही हैं—‘वासुदेव: सर्वम्’ (गीता ७।१९)। देश, काल और वस्तु—तीनों ही दृष्टियोंसे वे परमात्मा दूर-से-दूर भी हैं और नजदीक-से-नजदीक भी हैं।* अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे वे इन्द्रियों और अन्त:करणकी पकड़में नहीं आते।

वे परमात्मा स्वयं विभागरहित होनेपर भी अलग-अलग प्राणियोंमें विभक्तकी तरह प्रतीत होते हैं। वे सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करते हैं, पर उनको कोई प्रकाशित नहीं कर सकता। वे ज्ञानस्वरूप, प्रकाशस्वरूप परमात्मा सबके हृदयमें नित्य-निरन्तर विद्यमान हैं। ऐसे वे जाननेयोग्य एक परमात्मा ही रजोगुणकी प्रधानता स्वीकार करके ब्रह्मारूपसे सबको उत्पन्न करते हैं, सत्त्वगुणकी प्रधानता स्वीकार करके विष्णुरूपसे सबका भरण-पोषण करते हैं और तमोगुणकी प्रधानता स्वीकार करके शिवरूपसे सबका संहार करते हैं—‘भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च’ (गीता १३।१६)*। ऐसा करनेपर भी वे सम्पूर्ण गुणोंसे रहित और निर्लिप्त रहते हैं।

वे परब्रह्म परमात्मा ही सगुणरूपमें ‘महाविष्णु’ नामसे कहे जाते हैं। अनन्त ब्रह्माण्डोंकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करनेवाले ब्रह्मा, विष्णु और महेश अनन्त हैं, पर महाविष्णु एक ही है। उस महाविष्णुसे ही अलग-अलग ब्रह्माण्डोंके अलग-अलग ब्रह्मा, विष्णु और महेश प्रकट होते हैं—

संभु बिरंचि बिष्नु भगवाना।

उपजहिं जासु अंस तें नाना॥

(मानस १।१४४।३)

ब्रह्मवैवर्तपुराणमें उस परब्रह्म परमात्माको ही द्विभुज कृष्ण और चतुर्भुज विष्णुरूपसे बताया गया है—

त्वमेव भगवानाद्यो निर्गुण: प्रकृते: पर:।

अर्द्धाङ्गो द्विभुज: कृष्णोऽप्यर्द्धाङ्गेन चतुर्भुज:॥

(प्रकृति० १२।१५)

‘आप सबके आदि, निर्गुण और प्रकृतिसे अतीत भगवान् ही अपने आधे अंगसे द्विभुज कृष्ण और आधे अंगसे चतुर्भुज विष्णुके रूपमें प्रकट हुए हैं।’

द्विभुजो राधिकाकान्तो लक्ष्मीकान्तश्चतुर्भुज:।

गोलोके द्विभुजस्तस्थौ गोपैर्गोपीभिरावृत:॥

चतुर्भुजश्च वैकुण्ठं प्रययौ पद्मया सह।

सर्वांशेन समौ तौ द्वौ कृष्णनारायणौ परौ॥

(प्रकृति० ३५।१४-१५)

‘द्विभुज कृष्ण राधिकापति हैं और चतुर्भुज विष्णु लक्ष्मीपति हैं। कृष्ण गोप-गोपियोंसे आवृत होकर गोलोकमें और विष्णु वैकुण्ठमें स्थित हैं। वे कृष्ण और विष्णु—दोनों सब प्रकारसे समान ही हैं।’

जब भगवान् के अत्युग्र विराट्‍रूप (सहस्रभुजरूप) को देखकर अर्जुन भयभीत हो गये, तब उनको आश्वासन देनेके लिये भगवान् पहले चतुर्भुजरूपसे और फिर द्विभुजरूपसे अर्जुनके सामने प्रकट हुए—

इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूय:।

आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुन: सौम्यवपुर्महात्मा॥

(गीता ११।५०)

‘वासुदेव भगवान् ने अर्जुनसे ऐसा कहकर फिर उसी प्रकारसे अपना देवरूप (चतुर्भुजरूप) दिखाया और महात्मा श्रीकृष्णने पुन: सौम्यरूप (द्विभुजरूप) होकर भयभीत अर्जुनको आश्वासन दिया*।’

तात्पर्य है कि एक ही परब्रह्म परमात्मा द्विभुज, चतुर्भुज, सहस्रभुज आदि अनेक रूपोंमें प्रकट होते हैं। उपासकोंकी प्रकृति, श्रद्धा-विश्वास, रुचि आदिको लेकर वे एक ही परमात्मा विष्णु, सूर्य, शिव, गणेश और शक्ति—इन पाँच रूपोंको धारण करते हैं—

सौराश्च शैवा गाणेशा वैष्णवा: शक्तिपूजका:।

मामेव प्राप्नुवन्तीह वर्षाप: सागरं यथा॥

एकोऽहं पञ्चधा जात: क्रीडया नामभि: किल।

देवदत्तो यथा कश्चित् पुत्राद्याह्वाननामभि:॥

(पद्मपुराण, उत्तर० ९०।६३-६४)

‘जैसे वर्षाका जल सब ओरसे समुद्रमें ही जाता है, ऐसे ही विष्णु, सूर्य, शिव, गणेश और शक्तिके उपासक मेरेको ही प्राप्त होते हैं। जैसे एक ही देवदत्त नामक व्यक्ति पुत्र, पिता आदि अनेक नामोंसे पुकारा जाता है, ऐसे ही लीलाके लिये मैं एक ही पाँच रूपोंमें प्रकट होकर अनेक नामोंसे पुकारा जाता हूँ।’

भगवान् के इन पाँचों रूपोंको लेकर पाँच सम्प्रदाय चले हैं—वैष्णव, सौर, शैव, गाणपत और शाक्त। साधक किसी भी सम्प्रदायका हो, उसका ऐसा दृढ़ निश्चय रहना चाहिये कि भगवान् के जितने भी रूप हैं, वे सब तत्त्वसे एक ही हैं। रूप दूसरा है, पर तत्त्व दूसरा नहीं है। अगर वह ऐसा दृढ़ निश्चय न कर सके तो वह अपने इष्ट रूपको सर्वोपरि मानकर दूसरे रूपोंको उसका अनुयायी माने। जैसे, उसका इष्ट विष्णु है तो वह ऐसा माने कि सूर्य, शिव आदि सभी देवता विष्णुके उपासक हैं, अनुयायी हैं। ऐसा भी निश्चय न बैठे तो सम्पूर्ण देश, काल, क्रिया, वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति, अवस्था आदिमें एक ही परमात्मतत्त्व सत्ता-रूपसे विद्यमान है—ऐसा मानकर बाहर-भीतरसे चुप (चिन्तनरहित) हो जाय।

अगर विष्णुका ध्यान करते समय शिव, गणेश आदि याद आ जायँ तो ‘मेरे इष्ट ही अपनी मरजीसे शिव आदिके रूपमें आये हैं’—ऐसा मानकर साधकको प्रसन्न होना चाहिये। अगर संसार याद आ जाय तो भी साधक उसको भगवान् का ही रूप समझे*।

सम्प्रदायोंमें परस्पर जो राग-द्वेष, खटपट देखी जाती है, उसका कारण बेसमझी है। एक अनुयायी होता है और एक पक्षपाती (जय बोलनेवाला) होता है। अनुयायी तो अपने सम्प्रदायके सिद्धान्तोंका पालन करता है, पर पक्षपाती सिद्धान्तोंके पालनका खयाल नहीं करता। खटपट पक्षपातीके द्वारा ही होती है, अनुयायीके द्वारा नहीं।

जबतक ‘अहम्’ रहता है, तभीतक दार्शनिक भेद तथा अपने-अपने सम्प्रदायका पक्षपात रहता है। ‘अहम्’ का सर्वथा अभाव होनेपर दार्शनिक और साम्प्रदायिक भेद नहीं रहता, प्रत्युत एक तत्त्व रहता है। जहाँ तत्त्व है, वहाँ भेद नहीं है और जहाँ भेद है, वहाँ तत्त्व नहीं है। ऐसा वह तत्त्व ही महाविष्णु, सदाशिव, महाशक्ति, परात्पर परब्रह्म राम तथा कृष्ण आदि नामोंसे कहा जाता है और वही समस्त साधकोंका साध्य-तत्त्व है।