भगवत्प्राप्तिसे ही मानव-जीवनकी सार्थकता

मानव-शरीर परमात्माकी प्राप्तिके लिये ही मिला है। परमात्माकी प्राप्तिको ही जीवन्मुक्ति, तत्त्वज्ञान, मोक्षप्राप्ति, प्रेमप्राप्ति, पूर्णताप्राप्ति और कृतकृत्यता आदि नामोंसे अभिहित किया जाता है। स्थूलरूपसे मानव और मानवेतर प्राणियोंमें कोई अन्तर नहीं है। सभीके शरीर पाञ्चभौतिक हैं। उनमें शरीरधारी जीवमात्र एक परमेश्वरके ही अंश हैं, चिन्मय हैं—‘ममैवांशो जीवलोके।’ (गीता १५। ७) योनियाँ दो प्रकारकी होती हैं—१-भोगयोनि, २-कर्मयोनि। मानव-योनि कर्मयोनि (साधनयोनि) है। इसी योनिको श्रीगोस्वामीजी महाराजने ‘नरक स्वर्ग अपबर्ग निसेनी’ बताया है। मानव-योनिकी यह महत्ता है कि इसी योनिमें किये गये कर्मोंके अनुसार मुक्ति अथवा देवयोनि, स्थावरयोनि, पशु-पक्षी-कीट-पतंगादि योनियाँ प्राप्त होती हैं। मनुष्ययोनिमें किये हुए कर्मोंके अनुसार ही भोगोंका विधान होता है। मानवयोनिमें कर्म करनेकी पूर्ण स्वतन्त्रता है। अन्य योनियोंमें जीव अपने पूर्वकृत शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार प्राप्त हुए सुख-दु:खादि भोगोंको भोगता हुआ संसार-चक्रमें घूमता रहता है—

आकर चारि लच्छ चौरासी।

जोनि भ्रमत यह जिव अबिनासी॥

अन्य योनियोंमें जीवको कर्म करनेकी स्वतन्त्रता न होनेसे वहाँ उसकी मुक्तिके मार्ग अवरुद्ध रहते हैं। जीवमात्रपर अकारण स्नेह रखनेवाले भगवान् सर्वेश्वर कभी कृपा करके जीवको सदाके लिये दु:ख-परम्परासे छुटकारा पानेके हेतु प्रयत्न करनेका अवसर देनेके लिये मनुष्ययोनि प्रदान करते हैं—

कबहुँक करि करुना नर देही।

देत ईस बिनु हेतु सनेही॥

कुछ लोगोंका कहना है कि मानवको अपने जीवनका एक ध्येय बनाना चाहिये। ध्येय बनानेसे तदनुसार चेष्टा होगी—क्रिया होगी। उनका यह कथन ठीक ही है, परन्तु विचार करनेसे ज्ञात होता है कि भगवान् ने पहलेसे ही मानव-जीवनका ध्येय निश्चित कर दिया है। भगवान् पहले जीवके लिये ध्येय निश्चित करते हैं, तदनन्तर उक्त ध्येयकी सिद्धिके निमित्त उस जीवको मानव-शरीरकी प्राप्ति कराते हैं। अत: मानवको कोई नूतन ध्येय बनानेकी आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता है पूर्वनिश्चित ध्येय या लक्ष्यको पहचाननेकी। भगवान् ने इसी उद्देश्यसे मानव-जन्म दिया है। उन्होंने यह विचार करके कि ‘यह जीव अपना कल्याण-साधन करे’ उसे मनुष्ययोनिमें भेजा है तथा उसके लिये मुक्ति या उद्धारके समस्त साधन इस योनिमें जुटा दिये हैं—ऐसे साधन जो अत्यन्त सुलभ, सरल और सर्वथा महत्त्वपूर्ण हैं। इसीलिये गोस्वामीजी महाराजने मानवयोनिको ‘साधन-धाम’, ‘मोक्षका द्वार’ तथा ‘भवसागरका बेड़ा’ कहा है—

साधन धाम मोच्छ कर द्वारा।

...........................................॥

नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो।

सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो॥

अब यहाँ प्रश्न उठता है कि ‘जब मनुष्य एक निश्चित ध्येय लेकर उत्पन्न होता है, तब वह उक्त ध्येयको न पकड़कर अन्य दिशाओंमें क्यों भटकने लगता है? जब वह परमात्माकी प्राप्तिके पुनीत लक्ष्यको लेकर आता है, तब उस लक्ष्यकी प्राप्तिके साधनोंमें ही क्यों नहीं लगता? उस ध्येयके विरुद्ध क्रिया उसके द्वारा क्यों सम्पादित होने लगती है?’ इन प्रश्नोंका एकमात्र उत्तर यह है कि वह अपने ध्येयको—अपने पूर्वनिर्धारित लक्ष्यको भूल बैठता है, उसे उसकी विस्मृति हो जाती है। इस विषयको अर्जुनका उदाहरण सामने रखकर समझा जा सकता है। जब भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनसे पूछा—‘अर्जुन! क्या तुमने गीताका उपदेश एकाग्र होकर सुना? क्या तुम्हारा अज्ञान-जनित मोह नष्ट हो गया?’ तब अर्जुनने हर्ष-विस्फारित नेत्रोंसे भगवान् की ओर देखकर इस प्रकार उत्तर दिया—‘भगवन्! मेरा मोह नष्ट हो गया। मुझे स्मृति प्राप्त हो गयी। यह सब आपके प्रसादसे हुआ है। अब मैं अपनी पूर्व-स्थितिमें आ गया हूँ।’ यहाँ स्मृतिका अर्थ न तो ‘अनुभव’ है और न ‘नूतन ज्ञान’ ही। पहले कभी कोई अनुभूति हुई थी, कोई ज्ञान हुआ था; पर वह मोहके आवरणसे आच्छादित होकर विस्मृत हो गया था। भगवान् के ज्ञानोपदेशसे वह मोहका आवरण नष्ट हो गया और पूर्व-चेतना पुन: प्रकाशित हो उठी—भूली हुई बात याद आ गयी। वैशेषिकोंने भी ‘स्मृति’ का लक्षण ऐसा ही किया है—

‘संस्कारमात्रजन्यं ज्ञानं स्मृति:।’ (तर्कसंग्रह)

इसी प्रकार योगदर्शनके रचयिता महर्षि पतञ्जलिने भी ‘अनुभूतविषयासम्प्रमोष: स्मृति:*’ लिखकर पूर्वानुभूत विषयके साथ ही स्मृतिका तादात्म्य बताया है। अर्जुनका ‘स्मृतिर्लब्धा’ (गीता१८।७३)—यह वचन भी इसी अभिप्रायका पोषक है। इससे ज्ञात होता है कि अर्जुन निश्चितरूपसे लक्ष्यको भूल गया था। उस लक्ष्यकी विस्मृतिमें प्रधान कारण था ‘मोह’, जिसके लिये ही भगवान् ने ‘कच्चिदज्ञानसम्मोह: प्रनष्टस्ते धनञ्जय।’ (गीता १८। ७२) कहकर प्रश्न किया था। ‘मोह’ शब्दका प्रयोग तो और भी स्पष्टरूपसे उपर्युक्त भावकी पुष्टि करता है। व्याकरणके अनुसार ‘मोह’ शब्द ‘मुह वैचित्त्ये’ धातुसे बना है। ‘वैचित्त्ये’ पदपर ध्यान देनेसे यह पता चलता है कि ‘विचेतनता—विगतचेतनता’ का नाम ही ‘वैचित्त्य’ है, अत: यह सिद्ध होता है कि पहले अर्जुनको चेत रहा है और बादमें वह मोहसे ग्रस्त होता है। मोह छूटनेका अर्थ है—पूर्व-चेतनाकी प्राप्ति। जबतक उसकी बुद्धि मोहके कलिलसे व्यतितीर्ण नहीं हुई, तबतक वह भगवदाज्ञापालनके लिये प्रवृत्त नहीं होता। गीता अध्याय २, श्लोक ५२ में भगवान् ने ‘यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति’ कहकर इसी ओर अर्जुनको संकेत किया है। पूर्णत: मोह निवृत्त होनेपर ही सम्यक् रूपेण चेतनाकी प्राप्ति होती है। तब वह खुलकर कहता है—

स्थितोऽस्मि गतसंदेह: करिष्ये वचनं तव॥

(गीता १८।७३)

उपर्युक्त विवेचनसे पता चलता है कि जीवनका लक्ष्य, उद्देश्य अथवा ध्येय तो पहलेसे बना-बनाया है, उसको बनाना नहीं है। केवल उसे पहचाननेकी आवश्यकता है। पहचाननेपर उसकी प्राप्तिका साधन सरल हो जाता है। कठिनाई तो पहचान करनेतक ही है। मोहकी ऐसी प्रबल महिमा है कि मानव-जीवन प्राप्त करनेके अनन्तर सचेत रहकर मुक्तिके लिये प्रयत्न करनेवाले मनुष्यको भी कभी असावधान पाकर वह धर दबाता है। उदाहरणत: महाभारतमें हम देखते हैं कि समरकी सारी तैयारी पूर्ण करनेमें अर्जुनका पूरा हाथ रहता है। कुरुक्षेत्रकी धर्मभूमिमें कौरव और पाण्डव-सेनाएँ व्यूहाकार खड़ी होकर शङ्खध्वनिके तुमुल नादसे युद्धकी सूचना देती हैं, तब अर्जुन भी अपने देवदत्त शङ्खका नाद करता है। शस्त्रसम्पातका प्रारम्भ होनेवाला ही है। अर्जुन पूर्ण सचेत है तथा कर्तव्यपरायण क्षत्रियकी तरह भगवान् श्रीकृष्णको आदेश देता है—‘सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत।’ (गीता १। २१) ‘भगवन्! मेरे रथको दोनों सेनाओंके बीचमें खड़ा करिये। मैं देखूँ कि इस युद्धमें मुझे किन-किन लोगोंसे लोहा लेना है?’ इन जोशभरे वीरोचित शब्दोंको सुनकर भगवान् भी रथको तत्क्षण दोनों सेनाओंके बीचमें खड़ा करके अर्जुनको कुरुवंशियोंकी ओर देखनेकी आज्ञा देते हैं। अर्जुन ज्यों ही दोनों सेनाओंमें अपने कुटुम्बियों, स्नेहियों, गुरुजनों तथा स्वजनोंको ही युद्धके लिये सज्जित देखता है, त्यों ही उसके मनमें विषाद छा जाता है। युद्धका परिणाम युद्धसे भी भयंकर और दारुण प्रतीत होता है। इस कुलक्षयसे उसे सुखकी कल्पना न होकर सर्वनाशकी परम्परा खुलती दिखायी देती है। उसके लिये अपने जीवनका कोई मूल्य नहीं रह जाता और इस कुटुम्ब-ग्रासकी अपेक्षा अपने लिये मृत्युकी आकांक्षा श्रेयस्कर प्रतीत होने लगती है। उसे कर्तव्यमें अकर्तव्य, श्रेयमें अश्रेय तथा अर्थमें अनर्थके दर्शन होते हैं। ममता और आत्मीयताके कारण ऐसे युद्धसे विरत होना ही वह श्रेष्ठतम कर्तव्य समझ बैठता है। भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनके इस दुर्धर्ष मोहकी ‘क्लैब्य’, ‘कश्मल’ आदि शब्दोंसे तथा ‘अनार्यजुष्टम्’, ‘अस्वर्ग्यम्’, ‘अकीर्तिकरम्’ आदि पदोंसे उसके भयंकर परिणामोंको दिखाकर निन्दा की। किंतु अर्जुनपर मोहका ऐसा गहरा रंग चढ़ा था कि उसने अपने भावोंको ही श्रेष्ठ माना और पुन: कुछ बोलकर उन्हींका पिष्टपेषण किया। पुष्ट प्रमाणोंसे अपने वचनोंपर जोर देते हुए कहा— ‘पूजाके योग्य पितामह भीष्म और आचार्य द्रोणको बाणोंसे कैसे मारा जा सकता है? मारनेपर गुरुजन-हिंसाके जघन्य अपराधके बाद हमें उनके रक्तसे सने हुए केवल अर्थ-काममय भोग ही तो प्राप्त होंगे। धर्म अथवा मुक्ति तो मिल नहीं जायगी? अत: मेरे विचारसे युद्धका कोई औचित्य नहीं है। इस प्रकार अर्जुनपर मोहने ऐसा अधिकार जमा लिया कि वह कर्त्तव्यविमुख हो गया। अनन्त भगवान् ने गीता-ज्ञानका महान् उपदेश देकर उसके मोहको निवृत्त किया। अत: गीता प्रत्येक मोहग्रस्त मानवके मोह-निवारणका अमोघ औषध है।

मानव जबतक अपने लिये सुनिश्चित ध्येयकी पूर्तिकी ओर अग्रसर नहीं होता, तबतक वह अन्य सामान्य जीव-योनियोंसे विशिष्ट कोटिमें नहीं पहुँचता। अत: मनुष्यको अपने उद्धार या कल्याणकी दृष्टिसे अपनी विस्मृत चेतनाकी पुन: प्राप्तिके लिये प्रयत्नरत होनेमें ही मानवताकी सार्थकता समझनी चाहिये। जिस कार्यके लिये यह दुर्लभ मनुष्य-शरीर प्राप्त हुआ है, उसका साधन न करके मानव-शरीर, इन्द्रिय और प्राणोंकी मुख्यता माननेके कारण कुटुम्ब एवं भोग-सामग्रियोंमें आसक्त होकर उसे भूल गया है। जनसाधारणकी ऐसी ही स्थिति प्राय: देखनेमें आती है। वस्तुत: ध्यानसे देखा जाय तो ज्ञात होगा कि मनुष्यकी जितनी क्रियाशीलता इस विरोधी दिशामें है, उतनी ही विवेकपूर्ण क्रियाशीलतासे मुक्ति अथवा उद्धारका मार्ग भी प्रशस्त हो सकता है। पर हो क्या रहा है? मानव अपने लिये कभी स्वर्गकी, कभी अर्थकी, कभी भोगकी और कभी यशकी प्राप्तिके लिये नाना प्रकारकी योजनाएँ बनानेमें मस्त है। वह समझता है कि जीवनका मूल्य इतना ही है। इस प्रकार पुन: अपने-आपको आवागमनचक्रमें डालनेका कुचक्र वह स्वयं ही रच लेता है। भगवान् ने गीतामें बताया है—

उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।

आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन:॥

(६। ५)

अर्थात् मनुष्य स्वयं ही अपना उद्धार करे, अपने-आपको अवनतिके गर्तमें न गिरने दे। वह स्वयं ही अपना बन्धु तथा स्वयं ही अपना शत्रु है।

आजका मानव आत्माके उद्धारके लिये यत्न न करके स्वयं ही अपने प्रति शत्रुता कर रहा है। कहाँतक उल्लेख किया जाय, आज जिसको भौतिक सम्मान प्राप्त है, वह और अधिक सम्मानकी खोजमें है। धनिक और अधिक धनकी तलाशमें है। ग्रन्थकार मृत्युके बाद अमर कीर्तिकी अभिलाषामें डूबा है। बड़े-बड़े भवनोंका निर्माता अपनी भौतिक कीर्तिको चिरस्थायी बनानेके स्वप्न देखता है और धर्मोपदेष्टा अपनी प्रसिद्धिका वातावरण बनानेमें संलग्न है—आदि-आदि। इस प्रकार मानवका सारा प्रयत्न ध्येयकी प्राप्तिके लिये न होकर उससे उलटी दिशाकी ओर जानेके लिये हो रहा है। परिणाम यह है कि इस दिशामें जितनी ही विशेषताकी उत्कट आकांक्षा की जाती है, मानवताके वास्तविक लक्ष्यसे उतनी ही अधिक दूरी होती जा रही है; क्योंकि ये सारी बातें व्यक्तित्वको दृढ़ करनेमें सहायक हैं। होना यह चाहिये कि मनुष्य व्यक्तित्वको हटाकर वहाँ अपने स्वरूपकी प्रतिष्ठा करे। उसका सारा प्रयत्न चिन्मयताकी प्राप्तिके लिये होना उचित है।

जैसे कोई मनुष्य तीर्थ-स्नानको जाता है, वहाँ मेलेसे दूर किसी धर्मशालामें ठहरता है और धर्मशालाके स्थानको अपने लिये उपयोगी बनाने, रसोईका सुन्दर प्रबन्ध करने तथा अन्यान्य सुखोपभोगके सामान जुटाने आदिमें इतना तन्मय हो जाता है कि तीर्थ-स्नान, देव-दर्शन, तीर्थ-दर्शन, मेला-महोत्सव और साधु-समागम आदि कोई कार्य नहीं कर पाता। ऐसे मनुष्यको तो हम उपहासास्पद ही बतायेंगे। इसी प्रकार मनुष्य आया तो है भगवत्प्राप्तिके लिये, किन्तु लग गया संग्रह और भोग भोगने आदिमें—

आये थे हरि भजनको, ओटन लगे कपास।

भोगोंकी प्राप्ति हमारा लक्ष्य नहीं है, पर प्रयत्न उसीके लिये होता है। भगवान् की प्राप्ति ही मानव-जीवनका मुख्य लक्ष्य है, किन्तु उसके लिये कोई प्रयत्न नहीं हो रहा है। शरीर, इन्द्रिय, प्राण, मन, बुद्धि, धन, वैभव, भोग आदि पदार्थ साधनमात्र हैं; किंतु उन्हें साध्य बना लिया गया है और जो वास्तविक साध्य है, उसकी सर्वथा उपेक्षा कर दी गयी है।

भगवान् ने जीवके कल्याणके लिये चार पुरुषार्थ निश्चित किये हैं—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इन चारों पुरुषार्थोंके विस्तारके क्षेत्र हैं—चारों वर्ण तथा चारों आश्रम। उन्हींके द्वारा इनका अनुष्ठान होता है। चार पुरुषार्थ ही चार इच्छाएँ हैं तथा इनकी प्राप्तिके दो साधन माने जा सकते हैं। काम और अर्थकी प्राप्तिमें प्रारब्धकी प्रधानता रहती है तथा धर्म और मोक्षकी प्राप्तिमें उद्योगकी। अर्थको काम-प्रवण बना दिया जाय—कामकी पूर्तिके प्रति उन्मुख कर दिया जाय तो अर्थका नाश हो जाता है। धर्मको कामसे संयुक्त कर दिया जाय तो धर्मका नाश हो जाता है। इसके विपरीत यदि अर्थको धर्ममें लगा दिया जाय तो वह धर्मके रूपमें परिणत हो जायगा। धर्मको अर्थमें लगा देनेसे वह अर्थका रूप धारण कर लेगा। इस प्रकार धर्म और अर्थ एक-दूसरेके पूरक और उत्पादक हैं। पर उन्हींको जब क्रोधसे जोड़नेका प्रयत्न किया जायगा, तब दोनोंका विनाश हो जायगा तथा कामनाका अभाव करके किया गया धर्म और अर्थ—दोनोंका अनुष्ठान मुक्तिमें सहायक हो जायगा। निष्कामभावसे ‘काम’ का आचरण (विषय-सेवन) भी मुक्तिका मार्ग प्रशस्त करेगा। अत: मानवको चाहिये कि वह निष्कामभावसे आसक्तिका त्याग करके धर्मपूर्वक अर्थ-कामका आचरण करे। अर्थका सद्‍वयय करे और अनासक्तभावसे धर्मानुकूल काम-सेवनमें प्रवृत्त हो। ऐसी प्रगति ही सच्ची मानवताकी दिशामें प्रगति है।

इसी प्रकार चारों वर्ण अपने लिये गीतामें उपदिष्ट वर्ण-धर्मका पालन करके सच्ची मुक्ति अथवा सिद्धिको प्राप्त कर सकते हैं। जिसको आत्माके कल्याणका साधन करना है, वह इस द्वन्द्वात्मक जगत् के झंझावातोंसे प्रभावित न होकर अपने लिये निश्चित कर्तव्य-मार्गपर चलता रहता है तथा सिद्धिको प्राप्त करके ही दम लेता है। भगवान् श्रीकृष्णने गीतामें बताया है—

स्वे स्वे कर्मण्यभिरत: संसिद्धिं लभते नर:।

(१८।४५)

‘अपने-अपने कर्ममें अनासक्तभावसे लगा रहनेवाला मानव सिद्धिको प्राप्त कर लेता है।’ ठीक ऐसे ही चारों आश्रम भी मानवके ध्येयकी पूर्तिमें पूर्ण सहायक होते हैं। आश्रमोंमें दो आश्रम मुख्य हैं—गृहस्थाश्रम और संन्यासाश्रम। ब्रह्मचर्याश्रममें गृहस्थाश्रमकी तैयारी की जाती है और वानप्रस्थाश्रममें संन्यासाश्रमकी। ब्रह्मचर्याश्रम प्रथम आश्रम है। इसमें प्रविष्ट होकर विद्योपार्जन और धर्मानुष्ठान करके यदि यहीं अर्थ-कामकी इच्छाके प्रति निर्वेद उत्पन्न हो जाय तो सीधे नैष्ठिक ब्रह्मचर्यका व्रत लेकर मानव एक इसी आश्रममें अपना कल्याण-साधन कर सकता है। यदि अर्थ-कामकी इच्छाको विवेक-विचारद्वारा इस आश्रममें नहीं मिटाया जा सका तो उस उपकुर्वाण ब्रह्मचारीके लिये गृहस्थाश्रम रखा गया है। इस आश्रममें रहकर मानव भोगोंके तत्त्वका ज्ञान करनेके लिये धर्मानुकूल अर्थ-कामका आचरण करे। यह भी साध्यकी दिशामें ही प्रवर्तन है, जिससे—

धर्म ते बिरति जोग ते ग्याना।

ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना॥

—वाली बात सम्भव होती है, क्योंकि धर्मानुसार गृहस्थाश्रमका अनुष्ठान करनेसे वैराग्य होना अनिवार्य है। सीमित भोगका अर्थ ही गृहस्थाश्रम है। असीमित भोगोंके प्रतीकरूपमें सीमित भोग गृहस्थको इसलिये प्राप्त होते हैं कि लक्ष्यको याद रखते हुए, भोगोंका तत्त्व जाननेके लिये विधि-विधानसे सीमित भोग भोगकर गृहस्थ पुरुष उनका तत्त्व जाननेके पश्चात् उन भोगोंसे उपरत हो जाय और परमात्माकी प्राप्तिके साधनमें तत्परतासे लग जाय। उन प्राप्त भोग-पदार्थोंके द्वारा निष्कामभावसे जनता-जनार्दनकी सेवामें प्रवृत्त होकर उस सेवारूप साधनसे भी गृहस्थ परमात्माको प्राप्त कर सकता है। जनता-जनार्दनकी सेवा करते समय सेवाकी सामग्री (धनादि उपकरण) तथा सेवाके साधन (अन्त:करण, इन्द्रियाँ आदि) को भी उन्हींका (सेव्यका ही) समझना चाहिये। यह सेवा-सामग्री जिनकी है, उन्हींकी सेवामें इसे लगा रहा हूँ—यह भाव दृढ़ हो जानेपर उन उपकरणोंसे अपना सम्बन्ध-विच्छेद हो जायगा। ‘त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये’ के अनुसार वे सेव्यके समर्पित हो जायँगे। ऐसी भावना बननेपर ज्ञात होगा कि अपने पास जो कुछ भी भोग-सामग्री और उनका संग्रह है, वह केवल सेवाके उद्देश्यकी पूर्तिके ही लिये है। फिर उनके प्रति अपनी ममताका सर्वथा अभाव हो जायगा। इससे जीवकी जडता जड संसारमें मिल जायगी और उससे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जानेसे चेतन-स्वरूपमें स्वत: स्थिति हो जायगी।

इस तत्त्वको और अधिक बोधगम्य बनानेकी दृष्टिसे यहाँ यह जान लेना चाहिये कि इन्द्रियोंका उपभोग तीन प्रकारका होता है—(१) भोगोंका तत्त्व जाननेके लिये, (२) उनके द्वारा दूसरोंकी सेवा करनेके लिये तथा (३) परमात्माकी प्राप्तिके निमित्त शरीर-निर्वाह-क्रियाके सम्पादनके लिये। अब उनका अलग-अलग विश्लेषण किया जाता है।

भोगोंका तत्त्वज्ञान—यहाँ तत्त्व जाननेका अर्थ यह है कि भोगोंमें सीमित सुख है। भोगोंमें सीमित सुखकी मात्रा क्या है—इसके अनुभवके लिये भी हमें उस भोगके अभावके दु:खका अनुभव करना पड़ेगा; क्योंकि भोगके अभावका दु:ख जितना अधिक होगा, भोग उतना ही सुख प्रदान करेगा। अत: अभावकी भी आवश्यकता पड़ेगी। अभाव नहीं होगा तो सुख भी नहीं होगा। साथ ही भोग भोगते समय भोगशक्तिका नाश होता है और भोगेच्छा उत्तरोत्तर वृद्धिको प्राप्त होती है। भोग्य पदार्थ अनित्य होनेसे नाशशील हैं, प्रतिक्षण नष्ट होते रहते हैं। भोग्य पदार्थोंके नष्ट हो जानेपर उनके भोगनेके संस्कारोंकी स्मृति कष्टकारक होती है। भोगोंके तत्त्वका यह ज्ञान भोगोंके भोगनेसे उपलब्ध हो जाता है।

दूसरोंकी सेवाका तत्त्व—जबतक मानवको अनुकूल और प्रतिकूल पदार्थोंका ज्ञान नहीं होगा, तबतक वह प्रतिकूल पदार्थों और क्रियाओंके त्यागपूर्वक अनुकूल पदार्थ और क्रियाओंद्वारा दूसरोंकी सेवा नहीं कर सकता। सेवा करते समय सेवाकी वस्तुएँ जिनकी हम सेवा करते हैं उनकी समझनी चाहिये। इससे वह उनके प्रति ममता और आसक्तिके बन्धनसे मुक्त हो जायगा। जबतक ममता और आसक्ति है, तबतक अनुकूलता-प्रतिकूलताका द्वन्द्व बना रहता है।

शरीर-निर्वाह-क्रियाका—अर्थ है राग-द्वेषरहित होकर विषयोंका सेवन करना। भगवान् ने गीतामें बताया है—

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्।

आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥

(२।६४)

‘अपने वशमें की हुई राग-द्वेषरहित इन्द्रियोंद्वारा विषय-सेवन करनेवाला जितात्मा पुरुष प्रसाद (अन्त:करणकी प्रसन्नता) को प्राप्त होता है।’

विषयोंका राग-द्वेषपूर्वक चिन्तन करनेसे मनुष्यका पतन होता है; क्योंकि विषयोंका ध्यान उनके प्रति मानव-हृदयमें आसक्तिका अंकुर उत्पन्न कर देता है और आसक्ति सब अनर्थोंकी जड़ है। यहाँतक कि आसक्तिसे मानवकी बुद्धि नष्ट होकर उसका पतन हो जाता है—

बुद्धिनाशात् प्रणश्यति।

(गीता २।६३)

किन्तु राग-द्वेषरहित होकर विषयोंका सेवन भी प्रसादकी प्राप्ति कराता है। यह विषय-सेवन राग-द्वेषके त्याग और संयमपूर्वक केवल शरीर-निर्वाहमात्रके लिये ही होना उचित है, न कि भोगबुद्धिसे। तभी वह मुक्तिका कारण होता है। अस्तु, गृहस्थाश्रमी गृहस्थ-धर्मका पालन करके भी परमात्माकी प्राप्ति कर सकता है—यह ऊपर बताया गया। अथवा वह वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश करे और वहाँ तितिक्षा तथा संयमकी उत्कट साधनामें रत होकर परमात्माको प्राप्त करे। अथवा संन्यासकी योग्यता प्राप्त करके संन्यास-आश्रममें चला जाय। वहाँ बाहर-भीतरसे त्यागी होकर निरन्तर ब्रह्मचिन्तन करते हुए परमात्माको प्राप्त करे।

जड-चेतनकी ग्रन्थिका नाम ही जीव है; इसलिये मानवमें जड अंशको लेकर सुख-भोग तथा संग्रहकी इच्छा होती है और चेतन अंशको लेकर मुमुक्षा अर्थात् भगवान् की प्राप्तिकी इच्छा होती है। मुक्ति और भुक्तिकी इच्छाओंमें भोगोंकी इच्छा चाहे कितनी ही प्रबल हो जाय, वह परमात्माकी प्राप्तिकी इच्छाको मिटा नहीं सकती। जडता चेतनतापर कुछ कालके लिये भले ही छा जाय, पर उसका अस्तित्व मिटा नहीं सकती। बल्कि परमात्माकी प्राप्तिकी इच्छा प्रबल और उत्कट हो जानेपर भोगेच्छाका अस्तित्व मिट जाता है; क्योंकि भोग और उनकी इच्छा दोनों ही अनित्य हैं। परमात्मा और उनका प्रेम दोनों नित्य हैं। परमात्माकी प्राप्तिकी इच्छा ही भगवान् के प्रेमका स्वरूप बन जाती है। प्रेम और भगवान् दोनों एक हैं। जबतक भोगोंकी यत्किञ्चित् इच्छा है, तभीतक साधनावस्था है। जब परमात्माकी प्राप्तिकी इच्छा, मोक्षकी इच्छा, प्रेम-पिपासा मुख्य इच्छा बन जाती है, तब भोगेच्छा मिट जाती है। उसके मिटते ही नित्यप्राप्त परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है। इस प्रकार मानव सहज ही अपने लक्ष्यको प्राप्त कर लेता है। वह कृतकृत्य, प्राप्त-प्राप्तव्य और ज्ञात-ज्ञातव्य हो जाता है। अर्थात् उसने करनेयोग्य सब कुछ कर लिया, प्राप्त करनेयोग्य सम्पूर्ण लक्ष्य प्राप्त कर लिया और जाननेयोग्य सब कुछ जान लिया। इसीमें मानव-जीवनकी सार्थकता है।