भगवत्तत्त्व
(वासुदेव: सर्वम्)
भगवत्तत्त्व अथवा परमात्मतत्त्व वह तत्त्व है, जिसमें कभी किञ्चिन्मात्र भी कोई विकार या परिवर्तन नहीं होता, जो सम्पूर्ण देश, काल, क्रिया, वस्तु, व्यक्ति, अवस्था, परिस्थिति, घटना आदिमें समानरूपसे परिपूर्ण है, जो सत्-चित्-आनन्द-स्वरूप है और जो जीवमात्रका वास्तविक स्वरूप है। वह एक ही तत्त्व निर्गुण-निराकार होनेसे ‘ब्रह्म’, सगुण-निराकार होनेसे ‘परमात्मा’ तथा सगुण-साकार होनेसे ‘भगवान्’ नामसे कहा जाता है—
वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्।
ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते॥
(श्रीमद्भागवत १। २। ११)
वही एक तत्त्व संसारमें अनेक रूपोंसे भास रहा है। जिस प्रकार स्वर्णसे बने गहनोंमें नाम, आकृति, उपयोग, तौल और मूल्य अलग-अलग होते हैं एवं ऊपरसे मीना आदि होनेसे रंग भी अलग-अलग होते हैं, परंतु इतना होनेपर भी स्वर्णतत्त्वमें कोई अन्तर नहीं आता, वह वैसा-का-वैसा ही रहता है। इसी प्रकार जो कुछ भी देखने, सुनने, जाननेमें आता है, उन सबके मूलमें एक ही परमात्मतत्त्व विद्यमान है; इसीके अनुभवको गीतामें ‘वासुदेव: सर्वम्’ कहा है (७। १९)।
इस तत्त्वकी प्राप्तिके लिये संसारमें तीन योग मुख्य माने जाते हैं—कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग। कर्मयोगमें साधक कर्म-बन्धनसे मुक्त होकर भगवत्तत्त्वको प्राप्त हो जाता है—
यज्ञायाचरत: कर्म समग्रं प्रविलीयते॥
(गीता ४। २३)
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति॥
(गीता ५। ६)
ज्ञानयोगमें साधक परमात्माको तत्त्वसे जानकर उनमें प्रविष्ट हो जाता है—
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्।
(गीता १८। ५५)
भक्तियोगमें साधक अनन्यभक्तिसे भगवान् को तत्त्वसे जान लेता है, उनके प्रत्यक्ष दर्शन कर लेता है और उनमें प्रविष्ट हो जाता है। गीतामें भगवान् कहते हैं—
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप॥
(११। ५४)
साधक अपनी रुचि, विश्वास और योग्यताके अनुसार चाहे योगमार्गसे चले, चाहे ज्ञानमार्गसे चले, चाहे भक्तिमार्गसे चले, अन्तमें इन सभी मार्गोंके साधकोंको एक ही तत्त्वकी प्राप्ति होती है। वही एक तत्त्व शास्त्रोंमें अनेक नामोंसे वर्णित हुआ है। उस तत्त्वका अनुभव होनेके बाद फिर कुछ भी करना, जानना और पाना शेष नहीं रहता।
यदि साधककी समझमें यह बात आ जाय, तो उपर्युक्त किसी भी मार्गसे भगवत्तत्त्व अथवा परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति बहुत सुगमतासे हो सकती है*। कारण यह है कि परमात्मा सब देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदिमें ज्यों-के-त्यों विद्यमान हैं। उनका कभी कहीं अभाव नहीं है। इसलिये स्वत:सिद्ध, नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें कठिनताका प्रश्न ही नहीं है। नित्यप्राप्त परमात्माकी प्राप्तिमें कठिनाई प्रतीत होनेका प्रधान कारण है—सांसारिक सुखकी इच्छा। इसी कारण साधक संसारसे अपना सम्बन्ध मान लेता है और परमात्मासे विमुख हो जाता है। संसारसे माने हुए सम्बन्धके कारण ही साधक नित्यप्राप्त भगवत्तत्त्वको अप्राप्त मानकर उसकी प्राप्तिको परिश्रम-साध्य एवं कठिन मान लेता है। वास्तवमें भगवत्तत्त्वकी प्राप्तिमें कठिनता नहीं है, प्रत्युत संसारके त्यागमें कठिनता है, जो कि निरन्तर हमारा त्याग कर रहा है। अतएव भगवत्तत्त्वका सुगमतासे अनुभव करनेके लिये संसारसे माने हुए संयोगका वर्तमानमें ही वियोग अनुभव करना अत्यावश्यक है, जो तभी सम्भव है जब संयोगजन्य सुखकी इच्छाका परित्याग कर दिया जाय।
‘हे महाबाहो! जो मनुष्य न किसीसे द्वेष करता है और न किसीकी आकाङ्क्षा करता है, वह कर्मयोगी सदा संन्यासी समझनेयोग्य है; क्योंकि द्वन्द्वोंसे रहित वह सुखपूर्वक संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है।’
तत्त्व-दृष्टिसे एक परमात्मतत्त्वके सिवा अन्य कुछ है ही नहीं—ऐसा ज्ञान हो जानेपर मनुष्य फिर जन्म-मरणके चक्रमें नहीं पड़ता। भगवान् कहते हैं—
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव।
(गीता ४। ३५)
‘जिसे जानकर फिर तू इस प्रकार मोहको नहीं प्राप्त होगा।’
वह तत्त्व ही संसाररूपसे भास रहा है। परंतु जबतक उधर दृष्टि नहीं जाती, तबतक संसार-ही-संसार दीखता है, तत्त्व नहीं। जैसे, जबतक ‘यह गङ्गाजी हैं’—इस तरफ दृष्टि नहीं जाती, तबतक वह साधारण नदी ही दीखती है। परमात्मतत्त्व तत्त्वदृष्टिसे ही देखा जा सकता है।
तीन प्रकारकी दृष्टियाँ
मनुष्यकी दृष्टियाँ तीन प्रकारकी हैं—(१) इन्द्रियदृष्टि (बहि:करण)१, (२) बुद्धिदृष्टि (अन्त:करण)२ और (३) तत्त्वदृष्टि (स्वरूप)३—ये तीनों दृष्टियाँ क्रमश: एक-एकसे सूक्ष्म एवं श्रेष्ठ हैं।
संसार असत् और अस्थिर होते हुए भी इन्द्रियदृष्टिसे देखनेपर सत् एवं स्थिर प्रतीत होता है, जिससे संसारमें राग हो जाता है। बुद्धिदृष्टिमें वस्तुत: विवेक ही प्रधान है। जब बुद्धिमें भोगों-(इन्द्रियों तथा उनके विषयों-)की प्रधानता नहीं होती, अपितु विवेककी प्रधानता होती है, तब बुद्धिदृष्टिसे संसार परिवर्तनशील और उत्पन्न एवं नष्ट होनेवाला दीखता है, जिससे संसारसे वैराग्य हो जाता है।
जड-चेतन, नित्य-अनित्य, सत्-असत् आदि दो वस्तुओंके अलग-अलग ज्ञानको ‘विवेक’ कहते हैं। यह विवेक प्राणिमात्रमें स्वत: विद्यमान है। पशुपक्षियोंमें शरीर-निर्वाहके योग्य ही (खाद्य-अखाद्यका) विवेक रहता है; परंतु मनुष्यमें यह विवेक विशेषरूपसे जाग्रत् होता है। विवेक अनादि है। भगवान् कहते हैं—
‘प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्धॺनादी उभावपि।’ (गीता १३।१९) ‘प्रकृति और पुरुष—इन दोनोंको ही तू अनादि जान।’
—इस श्लोकार्द्धमें आये ‘उभौ’ (दोनों) पदसे यह सिद्ध होता है कि जैसे प्रकृति और पुरुष दोनों अनादि हैं, वैसे ही इन दोनोंका भेद ज्ञानरूप विवेक भी अनादि है। ‘उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभि:’ (गीता २। १६) ‘तत्त्वदर्शी महापुरुषोंने सत्-असत् दोनोंका ही तत्त्व देखा है’—इस श्लोकार्द्धमें आये ‘उभयो:’ पदसे भी यही बात सिद्ध होती है।
जिस प्रकार प्रकाश बल्बमें नहीं होता, अपितु बल्बमें आता है, उसी प्रकार यह अनादिसिद्ध विवेक भी बुद्धिमें पैदा नहीं होता, अपितु बुद्धिमें आता है। इन्द्रियदृष्टिकी अपेक्षा बुद्धिदृष्टिकी प्रधानता होनेसे विवेक विशेष स्फुरित होता है, जिससे सत् की सत्ता और असत् के अभावका अलग-अलग ज्ञान हो जाता है। विवेकपूर्वक असत् का त्याग कर देनेपर जो शेष रहता है, वही तत्त्व है। तत्त्वदृष्टिसे देखनेपर एक भगवत्तत्त्व अथवा परमात्मतत्त्वके सिवा संसार, शरीर, अन्त:करण, बहि:करण आदि किसीकी भी स्वतन्त्र सत्ता सत्यत्वेन किञ्चिन्मात्र भी नहीं रहती। तब एकमात्र ‘वासुदेव: सर्वम्’—‘सब कुछ वासुदेव ही हैं’—इसका बोध हो जाता है।
इस प्रकार यह संसार बहि:करण-(इन्द्रियों-)से देखनेपर नित्य एवं सुखदायी, अन्त:करण-(बुद्धि-) से देखनेपर अनित्य एवं दु:खदायी तथा तत्त्वसे देखनेपर परमात्मस्वरूप दिखायी देता है।
साधककी विवेकदृष्टि और सिद्धकी तत्त्वदृष्टिमें अन्तर यह है कि विवेकदृष्टिसे सत् और असत् —दोनों अलग-अलग दीखते हैं और सत् का अभाव नहीं एवं असत् का भाव नहीं—ऐसा बोध होता है। इस प्रकार विवेकदृष्टिका परिणाम होता है—असत् के त्यागपूर्वक सत् की प्राप्ति। जहाँ सत् की प्राप्ति होती है वहाँ तत्त्वदृष्टि रहती है। तत्त्वदृष्टिसे संसार कभी सत्यरूपसे प्रतीत नहीं होता। तात्पर्य है कि विवेकदृष्टिमें सत् और असत्—दोनों रहते हैं और तत्त्वदृष्टिमें केवल सत् रहता है।
विवेकको महत्त्व देनेसे इन्द्रियोंका ज्ञान लीन हो जाता है। उस विवेकसे परे जो वास्तविक तत्त्व है, वहाँ विवेक भी लीन हो जाता है।
वास्तविक दृष्टि—वस्तुत: तत्त्वदृष्टि ही वास्तविक दृष्टि है। इन्द्रियदृष्टि और बुद्धिदृष्टि वास्तविक नहीं है; क्योंकि जिस धातुका संसार है, उसी धातुकी ये दृष्टियाँ हैं। अत: ये दृष्टियाँ सांसारिक अथवा पारमार्थिक विषयमें पूर्ण निर्णय नहीं कर सकतीं। तत्त्वदृष्टिमें ये सब दृष्टियाँ लीन हो जाती हैं। जैसे रात्रिमें बल्ब जलानेसे प्रकाश होता है; परंतु वही बल्ब यदि मध्याह्नकालमें (दिनके प्रकाशमें) जलाया जाता है तो उसके प्रकाशका भान तो होता है, पर उस प्रकाशका (सूर्यके प्रकाशके सामने) कोई महत्त्व नहीं रहता; वैसे ही इन्द्रियदृष्टि और बुद्धिदृष्टि अज्ञान (अविद्या) अथवा संसारमें तो काम करती हैं; पर तत्त्वदृष्टि हो जानेपर इन दृष्टियोंका उसके (तत्त्वदृष्टिके) सामने कोई महत्त्व नहीं रह जाता। ये दृष्टियाँ नष्ट तो नहीं होतीं, पर प्रभावहीन हो जाती हैं। केवल सच्चिदानन्दरूपसे एक ज्ञान शेष रह जाता है; उसीको भगवत्तत्त्व या परमात्मतत्त्व कहते हैं। वही वास्तविक तत्त्व है। शेष सब अतत्त्व हैं।
साध्यतत्त्वकी एकरूपता
जैसे नेत्र तथा नेत्रोंसे दीखनेवाला दृश्य—दोनों सूर्यसे प्रकाशित होते हैं, वैसे ही बहि:करण, अन्त:-करण, विवेक आदि सब उसी परम प्रकाशक तत्त्वसे प्रकाशित होते हैं—‘तस्य भासा सर्वमिदं विभाति’ (श्वेताश्वतर० ६।१४)। जो वास्तविक प्रकाश अथवा तत्त्व है, वही सम्पूर्ण दर्शनोंका आधार है। जितने भी दार्शनिक हैं, प्राय: उन सबका तात्पर्य उसी तत्त्वको प्राप्त करनेमें है। दार्शनिकोंकी वर्णन-शैलियाँ तथा साधन-पद्धतियाँ तो अलग-अलग हैं, पर उनका तात्पर्य एक ही है। साधकोंमें रुचि, विश्वास और योग्यताकी भिन्नताके कारण उनके साधनोंमें तो भेद हो जाते हैं, पर उनका साध्यतत्त्व वस्तुत: एक ही होता है।
नारायण अरु नगरके, रज्जब राह अनेक।
भावे आवो किधरसे, आगे अस्थल एक॥
दिशाओंकी भिन्नताके कारण नगरमें जानेके अलग-अलग मार्ग होते हैं। नगरमें कोई पूर्वसे, कोई पश्चिमसे, कोई उत्तरसे और कोई दक्षिणसे आता है; परन्तु अन्तमें सब एक ही स्थानपर पहुँचते हैं। इसी प्रकार साधकोंकी स्थितिकी भिन्नताके कारण साधन-मार्गोंमें भेद होनेपर भी सब साधक अन्तमें एक ही तत्त्वको प्राप्त होते हैं। इसीलिये संतोंने कहा है—
पहुँचे पहुँचे एक मत, अनपहुँचे मत और।
संतदास घड़ी अरठकी, ढुरे एक ही ठौर॥
प्रत्येक मनुष्यकी भोजनकी रुचिमें दूसरेसे भिन्नता रहती है; परंतु ‘भूख’ और ‘तृप्ति’ सबकी समान ही होती है अर्थात् अभाव और भाव सबके समान ही होते हैं। ऐसे ही मनुष्योंकी वेश-भूषा, रहन-सहन, भाषा आदिमें बहुत भेद रहते हैं; परंतु ‘रोना’ और ‘हँसना’ सबके समान ही होते हैं अर्थात् दु:ख और सुख सबको समान ही होते हैं। ऐसा नहीं होता कि यह रोना या हँसना तो मारवाड़ी है, यह गुजराती है, यह बँगाली है आदि! इसी प्रकार साधन-पद्धतियोंमें भिन्नता रहनेपर भी साध्यकी ‘अप्राप्तिका दु:ख’ और ‘प्राप्तिका आनन्द’ सब साधकोंको समान ही होते हैं।
वह परमात्मतत्त्व ही ब्रह्मारूपसे सबको उत्पन्न करता है, विष्णुरूपसे सबका पालन-पोषण करता है और रुद्ररूपसे सबका संहार करता है—‘भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च॥’ (गीता १३। १६)। वही तत्त्व अनेक अवतार लेकर, अनेक रूपोंमें लीला करता है। इस प्रकार अनेक रूपोंसे दीखनेपर भी वह तत्त्व वस्तुत: एक ही रहता है और तत्त्व-दृष्टिसे एक ही दीखता है। इस तत्त्वदृष्टिकी प्राप्तिको ही दार्शनिकोंने मोक्ष, परमात्मप्राप्ति, भगवत्प्राप्ति, तत्त्वज्ञान आदि नामोंसे कहा है।
सहज-निवृत्तिरूप वास्तविक तत्त्व
संसारमें एक तो प्रवृत्ति (करना) होती है और एक निवृत्ति (न करना) होती है। जिसका आदि और अन्त हो, वह क्रिया अथवा अवस्था कहलाती है। प्रवृत्ति और निवृत्ति—दोनों ही क्रियाएँ अथवा अवस्थाएँ हैं। तात्पर्य यह है कि जैसे प्रवृत्ति क्रिया है, वैसे ही निवृत्ति भी क्रिया है। प्रवृत्ति निवृत्तिको और निवृत्ति प्रवृत्तिको जन्म देती है। क्रिया और अवस्थामात्र प्रकृतिकी ही होती है तत्त्वकी नहीं। इस दृष्टिसे प्रवृत्ति और निवृत्ति—दोनों प्रकृतिके राज्यमें ही हैं। निर्विकल्प समाधितक प्रकृतिका राज्य है; क्योंकि निर्विकल्प समाधिसे भी ‘व्युत्थान’ होता है। अतएव जागने, चलने, बोलने, देखने, सुनने आदिके समान सोना, बैठना, मौन होना, मूर्च्छित होना, समाधिस्थ होना आदि भी क्रियाएँ अथवा अवस्थाएँ ही हैं।
अवस्थासे अतीत जो अक्रिय परमात्मतत्त्व है, उसमें प्रवृत्ति और निवृत्ति—दोनों ही नहीं हैं। अवस्थाएँ बदलती हैं, पर वह तत्त्व नहीं बदलता। वह वास्तविक तत्त्व सहज-निवृत्तिरूप है। उस तत्त्वमें मनुष्यमात्रकी (स्वरूपसे) स्वाभाविक स्थिति है। वह परमतत्त्व सम्पूर्ण देश, काल, घटना, परिस्थिति, अवस्था आदिमें स्वाभाविकरूपसे ज्यों-का-त्यों विद्यमान रहता है। अतएव उस सहज-निवृत्तिरूप परमतत्त्वको जो चाहे, जब चाहे, जहाँ चाहे प्राप्त कर सकता है। आवश्यकता केवल प्राकृत-दृष्टियोंके प्रभावसे मुक्त होनेकी है।
‘स्वयम्’ का प्रकृतिसे माना हुआ सम्बन्ध ही ‘अहम्’ कहलाता है। साधक प्रमादवश अपनी वास्तविक सत्ताको (जहाँसे ‘अहम्’ उठता है अथवा जो ‘अहम्’ का आधार है) भूलकर माने हुए ‘अहम्’ को ही (जो उत्पन्न होनेपर सत्तावान् है) अपनी सत्ता या अपना स्वरूप मान लेता है। माना हुआ ‘अहम्’ बदलता रहता है, पर वास्तविक तत्त्व (स्वरूप) कभी नहीं बदलता। इस माने हुए ‘अहम्’ को भगवान् ने इदंतासे कहा है; जैसे—‘अहङ्कार इतीयम्’ (गीता ७।४) और ‘अपरा इयम्’ (गीता ७। ५)। जबतक यह माना हुआ ‘अहम्’ रहता है तबतक साधकका प्रकृति-(प्रवृत्ति-निवृत्तिरूप अवस्था-)से सम्बन्ध बना रहता है, और उसमें साधक निवृत्तिको अधिक महत्त्व देता रहता है। यह ‘अहम्’ प्रवृत्तिमें ‘कार्य’-रूपसे और निवृत्तिमें ‘कारण’-रूपसे रहता है। ‘अहम्’ का नाश होते ही प्रवृत्ति और निवृत्तिसे परे जो वास्तविक तत्त्व है, उसमें अपनी स्वाभाविक स्थितिका अनुभव हो जाता है। फिर तत्त्वज्ञ पुरुषका प्रवृत्ति और निवृत्ति—दोनोंसे कोई सम्बन्ध नहीं रहता। ऐसा होनेपर प्रवृत्ति और निवृत्तिका नाश नहीं होता, अपितु उनका बाह्य चित्रमात्र रहता है। इस प्रकार वास्तविक तत्त्वमें अपनी स्वाभाविक स्थितिके अनुभवको ही दार्शनिकोंने सहज-निवृत्ति, सहजावस्था, सहज-समाधि आदि नामोंसे कहा है।
प्रवृत्ति-निवृत्तिरूप संसारसे माने हुए प्रत्येक संयोगका प्रतिक्षण वियोग हो रहा है। कारण यह है कि संसारसे माना हुआ संयोग अस्वाभाविक और उसका वियोग स्वाभाविक है। विचारपूर्वक देखा जाय तो संयोगकालमें भी वियोग ही है अर्थात् संयोग है ही नहीं। परंतु संसारसे माने हुए संयोगमें सद्भाव (सत्ता-भाव) कर लेनेसे वियोगका अनुभव नहीं हो पाता। तात्त्विक दृष्टिसे देखा जाय तो जिसका वियोग होता है, उस प्रवृत्ति-निवृत्तिरूप संसारकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं। जैसे, बाल्यावस्थासे वियोग हो गया, तो अब उसकी सत्ता कहाँ है? जैसे वर्तमानमें भूतकालकी सत्ता नहीं है, वैसे ही वर्तमान और भविष्यत् कालकी भी सत्ता नहीं है। जहाँ भूतकाल चला गया, वहीं वर्तमान जा रहा है और भविष्यत् काल भी वहीं चला जायगा। इसीलिये भगवान् ने गीतामें कहा है—
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभि:॥
(२। १६)
‘असत् की तो सत्ता विद्यमान नहीं है और सत् का अभाव विद्यमान नहीं है। इन दोनोंका ही तत्त्व तत्त्वज्ञानी महापुरुषोंके द्वारा देखा गया है।’
प्रवृत्ति-निवृत्तिरूप संसारसे वियोगका अनुभव होनेपर सहज-निवृत्तिरूप वास्तविक तत्त्वका ज्ञान हो जाता है और वियुक्त होनेवाले संसारकी स्वतन्त्र सत्ता स्वीकार न करनेसे वह तत्त्वज्ञान दृढ़ हो जाता है।
तत्त्वप्राप्तिका उपाय—तत्त्वको प्राप्त करनेका सर्वोत्तम उपाय है—एकमात्र तत्त्वप्राप्तिका ही उद्देश्य बनाना। वास्तवमें उद्देश्य पहले बना है और उस उद्देश्यकी सिद्धिके लिये मनुष्य-शरीर पीछे मिला है। परंतु मनुष्य भोगोंमें आसक्त होकर अपने उस (तत्त्व-प्राप्तिके) उद्देश्यको भूल जाता है। इसलिये उस उद्देश्यको पहचानकर उसकी सिद्धिका दृढ़ निश्चय करना है। उद्देश्यपूर्तिका निश्चय जितना दृढ़ होता है, उतनी ही तेजीसे साधक तत्त्वप्राप्तिकी ओर अग्रसर होता है। उद्देश्यकी दृढ़ताके लिये सबसे पहले साधक बहि:करण-(इन्द्रियदृष्टि-) को महत्त्व न देकर अन्त:करण-(बुद्धि अथवा विचारदृष्टि-)को महत्त्व दे। विचारदृष्टिसे दिखायी देगा कि जितने भी शरीरादि सांसारिक पदार्थ हैं, वे सब-के-सब उत्पत्तिसे पहले भी नहीं थे और विनाशके बाद भी नहीं रहेंगे एवं वर्तमानमें भी वे निरन्तर बदल रहे हैं। तात्पर्य यह कि सब पदार्थ आदि और अन्तवाले हैं। जो पदार्थ आदि और अन्तवाला होता है, वह वास्तवमें होता ही नहीं; क्योंकि यह सिद्धान्त है कि जो पदार्थ आदि और अन्तमें नहीं होता, वह वर्तमानमें भी नहीं होता—‘आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा’ (माण्डूक्यकारिका)। इस प्रकार विचार-दृष्टिको महत्त्व देनेसे सत् और असत्, प्रकृति और पुरुषके अलग-अलग ज्ञान-(विवेक-)का अनुभव हो जाता है और साधकमें वास्तविक तत्त्व-(सत्-)को प्राप्त करनेकी उत्कट अभिलाषा जाग्रत् हो जाती है। संसारके सुखको तो क्या, साधनजन्य सात्त्विक सुखका भी आश्रय न लेनेसे परम व्याकुलता जाग्रत् हो जाती है। फलत: साधक संसार-(असत् )-से सर्वथा विमुख हो जाता है और उसे तत्त्वदृष्टि प्राप्त हो जाती है, जिसके प्राप्त होनेसे एकमात्र सत्-तत्त्व—भगवत्तत्त्वकी सत्ताका अनुभव हो जाता है।
व्यवहारके विविध रूप
साधारण (विषयी) पुरुष, विवेकी (साधक) पुरुष और तत्त्वज्ञ (सिद्ध) पुरुष—तीनोंके भाव अलग-अलग होते हैं। साधारण पुरुष संसारको सत् मानकर राग-द्वेषपूर्वक प्रवृत्ति या निवृत्तिरूप व्यवहार करते हैं। इसके आगे विचारदृष्टिकी प्रधानतावाले विवेकी पुरुषका व्यवहार राग-द्वेषरहित एवं शास्त्रविधिके अनुसार होता है१। विवेकदृष्टिकी प्रधानता रहनेके कारण—किञ्चित् राग-द्वेष रहनेपर भी उसका (विवेकदृष्टि-प्रधान साधकका) व्यवहार राग-द्वेषपूर्वक नहीं होता अर्थात् वह राग-द्वेषके वशीभूत होकर व्यवहार नहीं करता२। उसमें राग-द्वेष बहुत कम— नहींके बराबर रहते हैं। जितने अंशमें अविवेक रहता है, उतने ही अंशमें राग-द्वेष रहते हैं। जैसे-जैसे विवेक जाग्रत् होता जाता है, वैसे-वैसे राग-द्वेष कम होते चले जाते हैं और वैराग्य बढ़ता चला जाता है। वैराग्य बढ़नेसे बहुत सुख मिलता है; क्योंकि दु:ख तो रागमें ही है३। पूर्ण विवेक जाग्रत् होनेपर राग-द्वेष पूर्णत: मिट जाते हैं। विवेकी पुरुषको संसारकी सत्ता दर्पणमें पड़े हुए प्रतिबिम्बके समान असत् दीखती है। इसके आगे तत्त्वदृष्टि प्राप्त होनेपर तत्त्वज्ञ पुरुष स्वप्नकी स्मृतिके समान संसारको देखता है। इसलिये बाहरसे व्यवहार समान होनेपर भी विवेकी और तत्त्वज्ञ पुरुषके भावोंमें अत्यन्त अन्तर रहता है।
साधारण पुरुषमें इन्द्रियोंकी, साधक पुरुषमें विवेक-विचारकी और सिद्ध पुरुषमें स्वरूपकी प्रधानता रहती है। साधारण पुरुषके राग-द्वेष पत्थरपर पड़ी लकीरके समान (दृढ़) होते हैं। विवेकी पुरुषके राग-द्वेष आरम्भमें बालूपर पड़ी लकीरके समान एवं विवेककी पूर्णता होनेपर जलपर पड़ी लकीरके समान होते हैं। तत्त्वज्ञ पुरुषके राग-द्वेष आकाशमें पड़ी लकीरके समान (जिसमें लकीर खिंचती ही नहीं, केवल अँगुली दीखती है) होते हैं; क्योंकि उसकी दृष्टिमें संसारकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती।
ज्ञानीके व्यवहारकी विशेषता
तत्त्वज्ञान होनेसे पूर्वतक साधक (अन्त:करणको अपना माननेके कारण) तत्त्वमें अन्त:करणसहित अपनी स्थिति मानता है। ऐसी स्थितिमें उसकी वृत्तियाँ व्यवहारसे हटकर तत्त्वोन्मुखी हो जाती हैं, अत: उसके द्वारा संसारके व्यवहारमें भूलें भी हो सकती हैं। अन्त:करण-(जडता-)से सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जानेपर जड-चेतनके सम्बन्धसे होनेवाला सूक्ष्म ‘अहम्’ पूर्णत: नष्ट हो जाता है। फिर तत्त्वज्ञ पुरुषकी स्वरूपमें नित्य-निरन्तर स्वाभाविक स्थिति रहती है। इसलिये साधनावस्थामें अन्त:करणको लेकर तत्त्वमें तल्लीन होनेके कारण जो व्यवहारमें भूलें हो सकती हैं, वे भूलें सिद्धावस्थाको प्राप्त तत्त्वज्ञ पुरुषके द्वारा नहीं होतीं, अपितु उसका व्यवहार स्वत: स्वाभाविक सुचारुरूपसे होता है और दूसरोंके लिये आदर्श होता है*। इसका कारण यह है कि अन्त:करणसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जानेपर तत्त्वज्ञ पुरुषकी स्थिति तो अपने स्वाभाविक स्वरूप अर्थात् तत्त्वमें हो जाती है और अन्त:करणकी स्थिति अपने स्वाभाविक स्थान—शरीर-(जडता-)में हो जाती है। ऐसी स्थितिमें तत्त्व तो रहता है, पर तत्त्वज्ञ (तत्त्वका ज्ञाता) नहीं रहता अर्थात् व्यक्तित्व (अहम्) पूर्णत: मिट जाता है। व्यक्तित्वके मिटनेपर राग-द्वेष कौन करे और किससे करे? उसके अपने कहलानेवाले अन्त:करणमें अन्त:करणसहित संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका अत्यन्त अभाव हो जाता है और परमात्मतत्त्वकी सत्ताका भाव नित्य-निरन्तर जाग्रत् रहता है। अन्त:करणसे अपना कोई सम्बन्ध न रहनेपर उसका अन्त:करण मानो जल जाता है। जैसे गैसकी जली हुई बत्तीसे विशेष प्रकाश होता है, वैसे ही उस जले हुए अन्त:करणसे विशेष ज्ञान प्रकाशित होता है।
जिस प्रकार परमात्माकी सत्ता-स्फूर्तिसे संसारमात्रका व्यवहार चलते रहनेपर भी परमात्मतत्त्व-(ब्रह्म-)में किञ्चित् भी अन्तर नहीं आता, उसी प्रकार तत्त्वज्ञ पुरुषके स्वभाव१, जिज्ञासुओंकी जाननेकी अभिलाषा२ और भगवत्प्रेरणा३— इनके द्वारा तत्त्वज्ञ पुरुषके शरीरसे सुचारुरूपसे व्यवहार होते रहनेपर भी उसके स्वरूपमें किञ्चित् भी अन्तर नहीं आता। उसमें स्वत:सिद्ध निर्लिप्तता रहती है४। जबतक प्रारब्धका वेग रहता है, तबतक उसके अन्त:करण और बहि:करणसे आदर्श व्यवहार होता रहता है।
उपसंहार
उपर्युक्त विवेचनसे यह सिद्ध होता है कि प्रवृत्ति-निवृत्तिरूप संसारसे अतीत एवं प्राकृत दृष्टियोंसे अगोचर जो सर्वत्र परिपूर्ण भगवत्तत्त्व अथवा परमात्मतत्त्व है, वही सम्पूर्ण दर्शनोंका आधार एवं सम्पूर्ण साधनोंका अन्तिम लक्ष्य है। उसका अनुभव करके कृतकृत्य, ज्ञातज्ञातव्य और प्राप्तप्रातव्य हो जानेके लिये ही मनुष्य-शरीर प्राप्त हुआ है। मनुष्य यदि चाहे तो कर्मयोग, ज्ञानयोग अथवा भक्तियोग—किसी भी एक योगमार्गका अनुसरण करके उस तत्त्वको सुगमतापूर्वक प्राप्त कर सकता है। उसे चाहिये कि वह इन्द्रियों और उनके विषयोंको महत्त्व न देकर विवेक-विचारको ही महत्त्व दे और ‘असत्’ से माने हुए सम्बन्धमें सद्भावका त्याग करके ‘सत्’ का अनुभव कर ले।
सत्ता दो प्रकारकी होती है—पारमार्थिक और सांसारिक। पारमार्थिक सत्ता तो स्वत:सिद्ध (अविकारी) है, पर सांसारिक सत्ता उत्पन्न होकर होनेवाली (विकारी) है। साधकसे भूल यह होती है कि वह विकारी सत्ताको स्वत:सिद्ध सत्तामें मिला लेता है, जिससे उसे संसार सत्य प्रतीत होने लगता है अर्थात् वह संसारको सत्य मानने लगता है*। इस कारण वह राग-द्वेषके वशीभूत हो जाता है। इसलिये साधकको चाहिये कि वह विवेकदृष्टिको महत्त्व देकर पारमार्थिक सत्ताकी सत्यता एवं सांसारिक सत्ताकी असत्यताको अलग-अलग पहचान ले। इससे उसके राग-द्वेष बहुत कम हो जाते हैं। विवेकदृष्टिकी पूर्णता होनेपर साधकको तत्त्वदृष्टि प्राप्त हो जाती है, जिससे उसमें राग-द्वेष सर्वथा मिट जाते हैं और उसे भगवत्तत्त्वका अनुभव हो जाता है।
भगवत्तत्त्व सम्पूर्ण देश, काल, वस्तु और व्यक्तिमें परिपूर्ण है। अत: उसकी प्राप्ति किसी क्रिया, बल, योग्यता, अधिकार, परिस्थिति, सामर्थ्य, वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिके आश्रित नहीं है; क्योंकि चेतन-(सत्य-)की प्राप्ति जडता-(असत्य-)के द्वारा नहीं, अपितु जडताके त्यागसे होती है।
मनुष्य यदि अपने ही अनुभवका आदर करे तो उसे सुगमतापूर्वक तत्त्वप्राप्ति हो सकती है। यह प्रत्येक मनुष्यका अनुभव है कि जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, मूर्च्छा और समाधिकी अवस्थाएँ तो परिवर्तनशील तथा अनेक होती हैं, पर इन अवस्थाओंको जाननेवाला अपरिवर्तनशील तथा एक रहता है। यदि अवस्थाओंको जाननेवाला अवस्थाओंसे अतीत न होता, तो अवस्थाओंकी भिन्नता, उनकी गणना, उनके परिवर्तन (आने-जाने), उनकी सन्धि और उनके अभावका ज्ञाता (जाननेवाला) कौन होता? ये अवस्थाएँ ‘अहम्’ (जडसे माने हुए सम्बन्ध-) पर टिकी हुई हैं और ‘अहम्’ सत्यतत्त्वपर टिका हुआ है। तात्पर्य यह है कि एक सत्यतत्त्वके सिवा अन्य किसी भी अवस्था आदिकी और माने हुए ‘अहम्’ की स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। इस प्रकार अवस्थाओंसे तथा ‘अहम्’ से अपने-आप-(स्वरूप-) को अलग अनुभव करनेपर तत्त्वज्ञान हो जाता है। तत्त्वज्ञान प्राप्त हो जानेपर ‘अहम्’ और ‘अहम्’ की अवस्थाओंकी स्वतन्त्र सत्ता सत्यत्वेन किञ्चित् भी नहीं रहती। जिस प्रकार समुद्र और लहरोंमें सत्ता जलकी ही है, समुद्र और लहरोंकी किसी भी कालमें कोई स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं। उसी प्रकार ‘अहम्’ और अवस्थाओंमें एक भगवत्तत्त्वकी सत्ता है अर्थात् सर्वत्र एक भगवत्तत्त्व ही शेष रह जाता है। इसीको गीताने ‘वासुदेव: सर्वम्’ कहा है।