भगवत्तत्त्व
पराकृतनमद्बन्धं परं ब्रह्म नराकृति।
सौन्दर्यसारसर्वस्वं वन्दे नन्दात्मजं मह:॥
परमात्माका वास्तविक तत्त्व समझनेके लिये न तो कोई दृष्टान्त ठीक तरहसे लागू होता है और न कोई युक्ति ही। परमात्माका निर्गुण, सगुण, निराकार, साकार आदि रूपोंसे जो वर्णन किया जाता है, उससे उनका वास्तविक स्वरूप तो अलग ही रह जाता है, पूरा वर्णन हो ही नहीं पाता। क्योंकि वाणी, मन, बुद्धि और युक्तियाँ—सभी कुछ मायिक हैं, प्रकृतिके कार्य हैं और जड हैं; अत: वे उस चिन्मय परमात्माको समझनेमें असमर्थ हैं। जितने दृष्टान्त और युक्तियाँ बतलायी जाती हैं, वे सब परमात्माके यथार्थ स्वरूपको समझकर मन-बुद्धि उनकी ओर लग जायँ—इसीलिये कही जाती हैं। परमात्माके स्वरूपके वर्णनमें तो देवताओं और ऋषियोंके भी मन-बुद्धि कुण्ठित हो जाते हैं, फिर वहाँ साधारण मनुष्योंके मन-बुद्धि कैसे पहुँच सकते हैं। गीतामें कहा है—
न मे विदु: सुरगणा: प्रभवं न महर्षय:।
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वश:॥
(१०। २)
‘मेरी उत्पत्तिको अर्थात् लीलासे प्रकट होनेको न देवतालोग जानते हैं और न महर्षिजन ही जानते हैं, क्योंकि मैं सब प्रकारसे देवताओंका और महर्षियोंका भी आदिकारण हूँ।’
जब देवता और महर्षिगण भी उस तत्त्वतक नहीं पहुँच पाते, तब फिर इस मानवी बुद्धिसे उसे समझना-समझाना तो एक बालचपलतामात्र ही है।
यह भगवत्तत्त्वका विषय बहुत ही गूढ़ और रहस्यमय है। इसे अवश्य जानना चाहिये। मनुष्य-जन्म इसीलिये मिला है। इस तत्त्वको जाननेसे ही यह जन्म सार्थक होता है तथा इसे जान लेनेपर मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है; फिर उसे अपने लिये कुछ भी जानना अथवा करना बाकी नहीं रह जाता। ‘यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥’ (गीता ७।२) यह विषय इतना दुर्विज्ञेय होनेपर भी भगवान् और महापुरुषोंकी कृपासे सहज ही जाना जा सकता है। उस कृपाकी प्राप्तिके लिये कुतर्क छोड़कर उनसे सरलतापूर्वक इस तत्त्वको समझनेकी चेष्टा करनी चाहिये तथा उनकी आज्ञाके अनुसार अपने कर्तव्यपालनमें तत्पर हो जाना चाहिये। ऐसा करनेसे ही मनुष्य इस दुर्विज्ञेय तत्त्वको समझकर अपने देवदुर्लभ मानव-जन्मको अनायास ही सफल बना सकता है।
अब नीचे एक यन्त्र लिखा जाता है। इससे अपनी वृत्तियोंको भगवान् की ओर लगाकर इस गूढ़ तत्त्वको कुछ समझा जा सकता है।

वैसे तो परमात्माके स्वरूप अनन्त हैं, पर समझनेके लिये यहाँ तीन रूप बतलाये जाते हैं—(१) निर्गुण-निराकार, (२) सगुण-निराकार और (३) सगुण-साकार। परमात्मा निर्गुण भी हैं, सगुण भी हैं तथा सगुण-निर्गुण भी हैं और वे इन सबसे भिन्न भी हैं।
निर्गुण-निराकार-तत्त्व
परमात्माका निर्गुण-तत्त्व मन-वाणीका अविषय है। वह सत्-असत् से विलक्षण है। भगवान् ने गीतामें कहा है—
ज्ञेयं यत् तत् प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते।
अनादिमत् परं ब्रह्म न सत् तन्नासदुच्यते॥
(१३।१२)
‘जो जाननेयोग्य है तथा जिसको जानकर मनुष्य परमानन्दको प्राप्त होता है, उसको भलीभाँति कहूँगा। वह आदिरहित ब्रह्म न सत् ही कहा जाता है, न असत् ही।’
उस परमात्माको असीम, अपार, अनन्त बतलाया जाता है। पर उसे असीम और आदि-अन्तसे रहित कहना भी देश-कालको स्वीकार करके ही है। किंतु परमात्मा देश-कालसे परिच्छिन्न नहीं है। वास्तवमें वह देश, काल, वस्तुसे सर्वथा अतीत है। वहाँ वाणी नहीं पहुँच सकती। इसलिये इन नामोंसे कहना देश-कालको लेकर केवल संकेत करनामात्र ही है। उसे निर्गुण-निराकार कहा जाता है। वहाँ सत्त्व, रज, तम आदि कोई गुण नहीं है, उसकी कोई आकृति नहीं है, न कोई नाम ही है। वह तो इन गुणोंसे सर्वथा अतीत और नाम-रूपसे रहित ही है। उसका कोई वर्णन नहीं कर सकता। उसे सच्चिदानन्द कहते हैं—यह लक्षण है। ब्रह्म कहते हैं—यह नाम है। निर्गुण-निराकार कहते हैं—यह रूप है। पर यह कैसा रूप है? अरूप ही रूप है। इसका इसी तरह वर्णन किया जाता है। वास्तवमें तो निर्गुण-निराकारका वर्णन हो ही नहीं सकता। जो कुछ भी वर्णन किया जाता है, वह गुणोंको लेकर ही किया जाता है। केवल लक्ष्य निर्गुणका रहता है, क्योंकि वर्णन करनेकी सामग्रियाँ—इन्द्रिय, वाणी, मन, बुद्धि आदि सब मायिक ही हैं। उस परमात्माके तत्त्वको समझानेके लिये शास्त्रकारोंने दो तरहके विशेषण दिये हैं—(१) विधेय और (२) निषेध। विधेय विशेषण उन्हें कहते हैं, जो परमात्माके स्वरूपके साक्षात् द्योतक होते हैं; पर वे भी परमात्मा अनिर्देश्य होनेके कारण तटस्थ ही रह जाते हैं। और निषेध विशेषण उन्हें कहते हैं, जो परमात्मामें आकार, गुण, विनाश, क्रिया, पदार्थ, देश, काल आदिका अभाव बतलाते हैं। परमात्माके सत्, चित्, आनन्द आदि ‘विधेय’ विशेषण कहे जाते हैं और निराकार, निर्गुण, अव्यय, अविनाशी, अक्रिय, अचल, अद्वैत, अप्रमेय, असीम, अपार, अनादि, अनन्त आदि विशेषण ‘निषेध’ कहे जाते हैं। वास्तवमें परमात्माका निर्गुण स्वरूप लक्षण और विशेषणोंसे रहित ही है। यह कहना भी समझनेके लिये ही है तथापि उस निर्गुण परमात्माके यथार्थ तत्त्वको बुद्धिसे पकड़नेके लिये ये विशेषण ही काम दे सकते हैं; इनके सिवा बुद्धिको परमात्माके नजदीक पहुँचानेके लिये अन्य कोई सहारा नहीं है। इसीलिये उनका वर्णन किया जाता है।
सत्-तत्त्व
सत् क्या है—जो हरदम रहे, हर वस्तुमें रहे और हर जगह रहे। भगवान् ने भी कहा है—‘अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराण:’ (गीता २।२०)—‘यह आत्मा अज, नित्य, शाश्वत और पुराण है।’ पर शब्दोंके द्वारा कैसे समझाया जाय। आखिर कोई भी समझायेगा तो हमारी भाषाका आश्रय लेकर ही हमें समझा सकता है। इसी तरह श्रुति भगवती भी देश-कालको लेकर ही उसका लक्ष्य कराती है। श्रुति कहती है—
‘सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्’—
(छा० उ० ६।२।१)
इत्यादि।
‘एकम् एव अद्वितीयम्’—इन शब्दोंसे उस परमात्माको क्रमश: सजातीय, विजातीय और स्वगत भेदोंसे रहित बतलाया है। मनुष्य सब एक होते हुए भी व्यक्तिरूपसे एक-एक अलग हैं—यह सजातीय भेद है। मनुष्य और वृक्ष—इनमें सजातीयता नहीं है, एक-दूसरेसे भिन्न हैं, अत: यह विजातीय भेद है। ‘यह मेरा हाथ है; पैर है’ इस प्रकार अवयवोंका भेद स्वगत भेद है। परमात्मा इन सब भेदोंसे रहित है। ये भेद प्रकृतिमें हैं, परमात्मा प्रकृतिसे अत्यन्त परे है।
जिसमें कोई विकार नहीं, भेद नहीं, जो घटता-बढ़ता नहीं, जिसका कभी क्षरण नहीं होता, जिसका कभी कहीं किञ्चिन्मात्र भी अभाव या परिवर्तन नहीं होता, जो सदा सर्वत्र सर्वथा एकरस, एकरूप और परिपूर्ण रहे और जिसमें कभी तनिक भी विकारकी सम्भावना ही न हो, वह ‘सत्’ है।
उस परमात्माके सिवा जो कुछ भी लौकिक या अलौकिक पदार्थ देखने-सुनने और समझनेमें आते हैं, उन सभीमें विचार करनेपर प्रत्यक्ष यह अनुभव होता है कि एक समयमें ये वस्तुएँ नहीं थीं और किसी समय ये सब नहीं रहेंगी तथा एक देशमें होते हुए भी दूसरे देशमें उन चीजोंका अभाव मालूम होता है एवं वस्तुका भेद तो प्रत्यक्ष है ही। परंतु सत्-स्वरूप परमात्मामें देश, काल, वस्तुका अत्यन्त अभाव होनेके कारण उसके देश-काल-वस्तु-निमित्तक अभावकी कभी सम्भावना भी नहीं हो सकती और स्वरूपसे तो वह परमात्मा सत् यानी नित्य विद्यमान है ही। इसीलिये उसे ‘सत्’ कहते हैं। इस ‘सत्’ तत्त्वका वर्णन गीताके दूसरे अध्यायके १२, १३, १७, २३, २४, २५; ८वें अध्यायके २०; १२वें अध्यायके ३ और १३वेंके २७वें श्लोकमें विशेषरूपसे किया गया है।
चित्-तत्त्व
‘चित्’ से चेतन, बोध, ज्ञान समझना चाहिये। चेतन वह है, जहाँ जडताकी कभी किसी तरह भी जरा भी सम्भावना नहीं है। वह चेतन तो केवल चिन्मय बोधस्वरूप ही है। जडताका अत्यन्त अभाव होनेके कारण उसमें ज्ञातापनका आरोप भी नहीं हो सकता। ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय, द्रष्टा-दर्शन-दृश्य और प्रमाता-प्रमाण-प्रमेय आदि भाव भी जिससे स्वाभाविक ही प्रकाशित होते हैं, ऐसा वह चेतन केवल एक दीप्तिमात्र ही है। साधारण लोग प्राण और चेष्टायुक्त जीवोंको चेतन कहते हैं तथा जिसमें प्राण और क्रिया नहीं होती, उसे जड कहते हैं; पर परमात्मामें क्रिया और प्राणके सम्बन्धसे होनेवाली चेतनता नहीं है, उसमें तो केवल चिति—जाननामात्र ही है। तात्पर्य यह कि वहाँ जडता, अज्ञान, मोह, अन्धकार आदि कुछ भी नहीं है, केवल चेतनमात्र ही है तथा वह भी स्वाभाविक स्वत: ही है।
उस चित्-तत्त्वको समझनेके लिये एक बात कही जाती है। संसारमें दो पदार्थ हैं—(१) दीखनेवाला और (२) देखनेवाला। देखनेवाला चेतन है, दीखनेवाला जड है। देखनेवाला द्रष्टा है, दीखनेवाला दृश्य है। दृश्य दृश्य ही रहता है और द्रष्टा द्रष्टा ही। घट-पट आदि संसारके सम्पूर्ण पदार्थोंको प्रकाश करनेवाले नेत्र हैं। घट-पटादिमें परिवर्तन होता है, उनका परस्पर भेद भी है, कभी उनका प्रकाश होता है तो कभी अप्रकाश। किंतु नेत्रोंमें कोई भेद न रहते हुए भी प्रकाशनशक्ति है। नेत्र भी मनके द्वारा प्रकाश्य हैं। अत: नेत्रोंमें भी अन्धता, मन्दता, पटुता आदि धर्म रहते हैं, उन धर्मोंको मन एकरूपसे देखता है। नेत्रोंका विकार मनमें नहीं आता; क्योंकि नेत्र प्रकाश्य हैं और मन उनका प्रकाशक है। मनसे भी आगे बुद्धितत्त्व है, वह एक रहता हुआ ही मनकी संकल्प-विकल्प आदि अनेक वृत्तियोंको निर्विकाररूपसे प्रकाशित करता है। इसलिये बुद्धि प्रकाशक और मन प्रकाश्य है। इसी तरह बुद्धिमें भी अज्ञता, विज्ञता आदि अनेक धर्म रहते हैं। अत: बुद्धि दृश्य और आत्मा द्रष्टा है, क्योंकि बुद्धि और बुद्धिगत विज्ञता-अज्ञता आदि धर्म निर्विकार आत्मासे ही प्रकाशित होते हैं और आत्मा किसीसे भी प्रकाशित नहीं होता। अर्थात् वह मन, बुद्धि, इन्द्रिय, शरीर आदि किसीका भी विषय नहीं होता। इसलिये वास्तविक द्रष्टा यही है। इसमें भी यह समझनेकी बात है कि आत्माकी द्रष्टा-संज्ञा दृश्यको लेकर ही है। अगर दृश्य नहीं हो तो आत्माकी द्रष्टा-संज्ञा भी नहीं रहती, बल्कि एक चेतनमात्र ही रह जाता है। वह फिर एकदेशीय नहीं रहता; क्योंकि वहाँ दृश्यका—देश, काल, वस्तुका सर्वथा अभाव है। वही परिपूर्ण ‘चित्’ तत्त्व कहा जाता है। इस चित्-तत्त्वका वर्णन गीतामें ५वें अध्यायके २४; ८वें अध्यायके ८, ९; १३वें अध्यायके १७, ३३ और १५वें अध्यायके १५वें श्लोकोंमें मुख्यतासे किया गया है।
आनन्द-तत्त्व
परमात्माका आनन्दस्वरूप भी एक अवर्णनीय तत्त्व है। वह निरतिशय सुखस्वरूप है। वह आनन्द सातिशय नहीं है। जिस सुखकी सीमा (हद) हो जाती है, उसे सातिशय कहते हैं। वह आनन्द असीम है। वह अनुभवमें आनेवाला आनन्द नहीं है, वह तो अनुभवरूप है। आनन्द एक बहुत विशेष सुखको कहते हैं। वह परमात्मा स्वत: सुखरूप सुख है। वह सुख मन-वाणीका विषय नहीं है। वह तो एकमात्र आनन्द ही है—जिसके प्रतिद्वन्द्वी दु:ख, अशान्ति, विक्षेप आदिकी कहीं किञ्चिन्मात्र भी सम्भावना ही नहीं है।
मनुष्यको अपने इष्ट पदार्थोंकी प्राप्ति होनेपर जो मनमें एक प्रकारके आनन्दका अनुभव होता है, उससे अनन्तगुना आनन्द सच्चे वैराग्य, सत्सङ्ग और भजनके अभ्याससे प्राप्त होता है। उसकी अपेक्षा भी परमात्मध्यानजनित आनन्द बहुत ही विलक्षण है। परंतु परमात्माका स्वरूपभूत आनन्द तो फिर भी अलग ही रह जाता है। वह आनन्द किसी तरह भी समझा या समझाया नहीं जा सकता। वह आनन्द-ही-आनन्द है। वह आनन्द अपरिमित, असीम, अपार, अनन्त, एकरस, परिपूर्ण, सम, निर्विकार और घन है—जिस आनन्दमें अन्य किसीकी किसी भी समय किञ्चिन्मात्र भी गुंजाइश नहीं है। वह केवल आनन्द-ही-आनन्द है। यह कहना भी देश, काल, वस्तुको लेकर ही है। वास्तविक आनन्द तो देश, काल, वस्तुसे सर्वथा असम्बद्ध परमात्मस्वरूप ही है। इस ‘आनन्द’ तत्त्वका वर्णन गीतामें ५वें अध्यायके २१, २४; ६ठे अध्यायके २१, २७, २८ और १४वें अध्यायके २७वें श्लोकोंमें मुख्यतासे किया गया है।
सत्-चित्-आनन्दकी एकता
ये सत्, चित्, आनन्द विशेषण परमात्माके द्योतक हैं, वस्तुत: उसके वाचक नहीं और न ये कोई उससे अलग उसके भिन्न-भिन्न विशेषण ही हैं। उसी एक भगवत्तत्त्वको समझानेके लिये ही शास्त्रोंमें ऋषि-महात्माओंने इन विशेषणोंका वर्णन किया है। वह परमात्मतत्त्व हर समय, हर जगह, हर वस्तुमें एकरस अपरिवर्तितरूपसे विद्यमान रहनेके कारण ‘सत्’ कहा जाता है। वह नित्य विद्यमान सत्तत्त्व ही अपने-आपको जानता है, इसलिये उसे ‘चेतन’ कहते हैं। वह सत्तत्त्व ही स्वयंप्रकाश एवं स्वयं ज्ञानस्वरूप है, इसलिये चेतन उसका कोई अलग विशेषण नहीं है। वह स्वयं ही चित्स्वरूप है। उसमें दु:ख, अशान्ति आदिकी कदापि सम्भावना नहीं है और उसमें निरतिशय सुखकी कदापि कमी अथवा अभाव नहीं होता—इसलिये वही ‘आनन्द’ है। इसी तरह ‘चेतन’ तत्त्व ही नित्य विद्यमान रहनेके कारण ‘सत्’ और परम सुखरूप होनेसे ‘आनन्द’ है। तथा ‘आनन्द’ भी एक परिपूर्ण आनन्द है, अत: ‘सत्’ तत्त्व उनसे कोई अलग वस्तु नहीं और वह आनन्द केवल ज्ञानस्वरूप होनेसे ‘चेतन’ तत्त्व भी उससे कोई अलग चीज नहीं; क्योंकि परमात्माका ज्ञान होनेसे परम शान्ति तत्काल हो जाती है (गीता ४।३९) तथा किसी भी विषयको हम जितना ही समझते हैं, उतना ही आनन्द उसे जाननेके साथ भी उत्पन्न हो जाता है। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि जानना और आनन्द—दो चीजें नहीं एक ही हैं। इसी प्रकार सात्त्विक आनन्द बहुत बढ़ जानेसे उस तत्त्वका ज्ञान भी अपने-आप ही हो जाता है (गीता २।६५); क्योंकि वह आनन्द ही ज्ञानस्वरूप है। वहाँ उस ज्ञान-आनन्दकी सत्ता होनेसे वह स्वत:सिद्ध तो है ही। एवं परमात्माकी सत्ताका दृढ़ निश्चय हो जानेपर भय, अशान्ति आदि सब मिटकर साधकको परम आनन्द और परम शान्तिकी प्राप्ति हो जाती है और वह शीघ्र ही परमात्माका यथार्थ तत्त्व जान जाता है। इसीलिये सच्चिदानन्दस्वरूपसे निर्गुण-निराकार परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन किया जाता है।
सगुण-निराकार-तत्त्व
सच्चिदानन्दघन निर्गुण पूर्णब्रह्म परमात्माके किसी एक अंशमें प्रकृति है, उस प्रकृतिसे युक्त होनेसे ही उस पूर्णब्रह्म परमात्माको सगुण चेतन सृष्टिकर्ता ईश्वर कहते हैं, वही आदिपुरुष पुरुषोत्तम, मायाविशिष्ट ईश्वर आदि नामोंसे कहा जाता है। प्रकृतिको लेकर ही उसमें समस्त जीवोंकी स्थिति है। प्रकृति उस परमात्माकी एक अलौकिक दिव्य शक्ति है। उस शक्तिको लेकर ही परमात्मा सम्पूर्ण सृष्टिका सृजन, पालन और संहार किया करते हैं। वे ही मायापति परमात्मा परिपूर्ण सर्वान्तर्यामी सच्चिदानन्दस्वरूप होते हुए भी वस्तुओंमें अस्ति, भाति और प्रियरूपसे प्रतीत होते हैं।
अग्निकी सत्ता सभी जगह सामान्यरूपसे विद्यमान है, परंतु उसमें दाहिका और प्रकाशिका शक्ति विद्यमान रहते हुए भी समय-समयपर ही प्रकट होती है। काठ, दियासलाई आदि सबमें एक सत्ता ही प्रतीत होती है, चन्द्रमामें सत्ता और प्रकाश—दोनों प्रत्यक्ष दीखते हैं और सूर्यमें सत्ता, प्रकाश तथा दाह—तीनों प्रकटरूपसे दीखते हैं। इसी प्रकार भूत, भौतिक, जड, चेतन, स्थावर, जङ्गम—सभीमें परमात्माकी सत्ता तो सामान्यरूपसे प्रतीत हो रही है; पर चितिशक्तिका प्रकाश विशेषतासे प्राणियोंमें ही देखा जाता है, जड चीजोंमें नहीं एवं आनन्दकी प्रतीति तो ज्ञानी महात्माओंमें ही विशेषरूपसे प्रकट है, अन्य जगह वह लुप्त ही है। तमोगुणके कार्य जड पदार्थोंमें भी सत्ता तो प्रकट है, किन्तु तमोगुणकी अधिकता होनेके कारण वहाँ चिदंश और आनन्दांश तिरस्कृत हैं तथा सजीव प्राणियोंमें सत्ता और चेतनता प्रत्यक्ष दीखते हुए भी अज्ञतारूप तमोगुण और चञ्चलतारूप रजोगुणकी अधिकताके कारण वहाँ आनन्दांश तिरस्कृत है। जहाँ साधनके द्वारा रजोगुण-तमोगुण अंश दूर कर दिये गये हैं, वहाँ महात्मापुरुषोंमें सत्, चित्, आनन्द-घन परब्रह्म परमात्माका स्वरूप प्रकटरूपसे विद्यमान है।
अस्ति-तत्त्व
संसारमें जो जड पदार्थोंकी सत्ता दीख रही है, उनका होना सिद्ध हो रहा है, वह उसी परमात्मासे है। उनको द्योतन करनेवाला सत्-तत्त्व ही पदार्थोंके सम्बन्धसे ‘सत्’ की अपेक्षा स्थूल होनेसे अस्तिस्वरूपसे कहा जाता है।
संसारमें जितनी भी जड वस्तुएँ हैं, ये सब उत्पन्न होती हैं, बीचमें सत्तारूपसे दीखती हैं, बढ़ती हैं, परिवर्तित होती हैं, क्षीण होती हैं और नष्ट हो जाती हैं। उन उत्पत्ति-विनाशशील सम्पूर्ण वस्तुओंमें जो एक सत्ता प्रतीत होती है, वही अस्तिरूपसे कही जाती है। यहाँ यह समझनेकी बात है कि किसी एक पदार्थको लेकर उसकी उत्पत्तिके बाद जो उसका अस्तित्व दीखता है, वह तो उस पदार्थके नष्ट होनेपर नष्ट हो जाता है; क्योंकि वह विकार है। पर उन पदार्थोंके अभाव हो जानेपर भी सब वस्तुओंमें सामान्य रीतिसे जो एक होनापना प्रतीत होता है, वह होनापना ही असली अस्तिस्वरूप है। वह अस्तिस्वरूप नित्य विद्यमान रहता है। जैसे ‘यह मनुष्य है,’ ‘यह पक्षी है,’ ‘यह देश है’—इन सबमें ‘है’ अनुस्यूत है। वस्त्रमें धागा सर्वत्र एक है। मिट्टीके बरतनोंमें मिट्टी सबमें एक है। इसी तरह यह अस्ति-तत्त्व सबमें अनुस्यूत है। यह सर्वत्र व्यापक है, परिपूर्ण है। जब घड़ा फूट जाता है तो घड़ेका अभाव होनेपर भी उसके टुकड़े तो रहते ही हैं। ऐसे ही पदार्थोंका अभाव होनेपर भी उनका रूपान्तरमें अस्तिपना वैसे ही वर्तमान रहता है।
इसलिये जो भी उत्पत्ति-विनाशवाली वस्तुएँ हैं, उन सबमें जो सत्ता प्रतीत होती है, वह वस्तुत: उन चीजोंका आधार है, पर दीखनेमें ऐसा प्रतीत होता है कि वह चीज पहले है और बादमें उसकी सत्ता है। यही तो परमात्माकी दिव्य प्रकृतिकी अविद्या—मायाशक्तिका विलक्षण परदा है।
भाति-तत्त्व
जो सम्पूर्ण वस्तुओंकी प्रतीति होती है, वस्तुएँ दीखती हैं, उनका अनुभव होता है—यह भाति है। भूत, भविष्यत्, वर्तमान—सबमें सत्ता प्रतीत हो रही है। एक पदार्थका होना सत्ता है और उसका दीखना, अनुभव होना भाति है। विदेशकी वस्तुएँ यहाँ नहीं दीखतीं; पर ‘वहाँ वह चीज है’ इस प्रकार सामान्य भाव तो बुद्धिमें आता ही है तथा साथ ही उन वस्तुओंका न जाना भी प्रतीत हो ही रहा है। जिससे सम्पूर्ण वस्तुओंकी प्रतीति होती है, वस्तुएँ प्रकाशित होती हैं, उसे भाति-तत्त्व कहते हैं। यह परमात्माका निर्गुण चित्-तत्त्व ही मायाके सम्बन्धसे प्रकाशरूपसे प्रतीत हो रहा है। यह प्रकाश महत्तत्त्वके मिश्रणसे सामान्य ज्ञानस्वरूप है, जिसमें कि घट-पटादि समस्त पदार्थोंका भान हो रहा है। पदार्थोंका ज्ञान-अज्ञान, लौकिक प्रकाश और अन्धकारका ज्ञान, वस्तुओंका भाव-अभाव, जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति—इन अवस्थाओंका ज्ञान-अज्ञान—ये सभी जिस एक बुद्धि-तत्त्वसे प्रकाशित हो रहे हैं, समझनेमें आ रहे हैं। वह निर्गुण परमात्माका चित्-तत्त्व ही महत्तत्त्वको लेकर भातिरूपसे कहा जाता है। वह भाति-तत्त्व महत्तत्त्वका सम्बन्ध होनेके कारण चित्-तत्त्वकी अपेक्षा स्थूल है।
इसमें भी अस्तिकी भाँति वस्तुओंका ज्ञान वस्तुओंके बाद प्रतीत होता है, पर वास्तवमें वस्तुओंके ज्ञान और अज्ञान दोनोंको ही यह भाति-तत्त्व सामान्यरूपसे निरन्तर प्रकाशित कर रहा है। यही सगुण परमात्माका ‘भाति’ रूप है।
प्रिय-तत्त्व
संसारके पदार्थ मनको अच्छे लगते हैं, यह अच्छा लगना ही ‘प्रिय’ है। वस्तुमात्रमें ही एक प्रियता प्रतीत हो रही है; क्योंकि उपयोगी होनेके कारण वह किसी-न-किसीके लिये प्रिय है ही। कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, चाहे वह निकृष्ट-से-निकृष्ट ही क्यों न हो, जो किसी एकको भी प्रिय न हो, पदार्थोंमें जो यह सुन्दरता, प्रियता और आकर्षण है, वह सब वास्तवमें परमात्मासे ही है, परंतु दीखता है पदार्थोंमें। यही माया शक्तिके आवरणकी विलक्षणता है। वस्तुत: पदार्थोंमें सुन्दरता, प्रियता और आकर्षण नहीं है। सारे पदार्थ उस परमात्मामें ही अध्यारोपित हैं और उस परमात्माका आनन्दस्वरूप ही मायाशक्तिके साथ मिला हुआ होनेसे पदार्थमात्रमें प्रियरूपसे अनुभूत होता है।
अस्ति, भाति, प्रियकी एकता
संसारमें यावन्मात्र जो भी वस्तुएँ प्रतीत हो रही हैं, उनमें परस्पर भेद होनेपर भी अस्ति, भाति, प्रियरूपका उनमें एकरूपसे अनुभव हो रहा है। वस्तुगत भेद होनेपर भी अस्ति, भाति, प्रिय-तत्त्वका भेद नहीं है। वस्तुगत अस्तितत्त्व ही प्रतीत हो रहा है और वास्तवमें वही प्रियरूप है और भाति यानि प्रतीतिमात्रमें जो एक आनन्दकी अनुभूति होती है यही प्रियता है, वहाँ भी अस्तित्व तो है ही। जहाँ प्रियता है, वहाँ भी प्रतीति और अस्तित्व मौजूद ही हैं। अत: अस्ति, भाति, प्रिय—ये तीनों कोई अलग-अलग विशेषण या शक्ति-विशेष नहीं हैं, किन्तु वह सच्चिदानन्दघन परमात्मा ही प्रकृतिको लेकर अस्ति-भाति-प्रियरूपसे प्रतीत हो रहा है। इसके अन्तर्गत दीखनेवाले नाम-रूप-आकारवाले संसारकी उपेक्षा करके इसके आधारस्वरूप सच्चिदानन्दघन परमात्माकी उपासना करनेसे साधक कृतकृत्य हो जाता है।
सगुण-साकार-तत्त्व
वे निर्गुण-सगुण सच्चिदानन्दघन सर्वव्यापी पूर्णब्रह्म परमात्मा वास्तवमें जन्म-मृत्युसे सर्वथा रहित होनेपर भी जब आवश्यकता समझते हैं, तब अपनी दिव्य प्रकृतिको लेकर सगुण-साकाररूपसे प्रकट होते हैं (गीता ४।६)। वे परम दयालु भगवान् अपने प्रेमी भक्तोंका उद्धार करने, उनके इच्छानुसार उन्हें दर्शन देकर, उनके साथ लीला करके उन्हें परम आनन्दित करने, अपने दर्शन आदिके द्वारा लोगोंके समस्त पापोंका समूल विनाश करने, अपने दिव्य गुण, प्रभाव, नाम, रूप, लीला, तत्त्व और रहस्यका विस्तार करके उनके श्रवण, मनन, पठन, चिन्तन, कीर्तन आदिके द्वारा सम्पूर्ण लोगोंके लिये आत्मोद्धारका मार्ग खोल देने, दुष्ट-दुराचारी मनुष्योंकी बुरी आदत छुड़ाने और उन्हें दण्ड देकर अथवा मारकर पापोंसे मुक्त करनेके लिये लीला-विग्रह धारण करते हैं। वे वेद-शास्त्रानुकूल आचरणके द्वारा धर्मका महत्त्व दिखलाकर, अपनी अलौकिक अप्रतिम दिव्य प्रभावशालिनी वाणीके द्वारा धर्मके तत्त्वका उपदेश देकर, सम्पूर्ण मनुष्योंके अन्त:करणमें वेद, शास्त्र, धर्म, परलोक, महात्मा और अपनेपर श्रद्धा उत्पन्न कराकर, सदाचार-सद्गुण और सद्भावोंसे विश्वास प्रेम उत्पन्न कराकर तथा लोगोंको उन्हें दृढ़तासे धारण कराकर संसार-सागरसे उनका उद्धार करनेके लिये राम, कृष्ण, नृसिंह आदि स्वरूपोंसे प्रकट होते हैं (गीता ४।८)।
भगवान् का अवतार-विग्रह दिव्य, अलौकिक और अद्भुत होता है। वे परमात्मा मायाके वशमें होकर जन्म नहीं लेते; किंतु अपनी विद्यामयी प्रकृतिको अपने वशीभूत करके योगमायासे प्रकट होते हैं। यह भगवान् का प्रकट होना जीवोंके जन्मकी अपेक्षा बहुत ही विलक्षण और दिव्य है। जगत् के सभी चराचर जीव अपने गुण, कर्म, स्वभावके वशमें हुए प्रारब्धानुसार सुख-दु:खादि भोग भोगनेके लिये जन्म लेते हैं; परंतु परमात्मा किसीके भी वशमें न होकर अपनी इच्छासे केवल जीवोंपर अहैतुकी कृपा करके ही अवतरित होते हैं। इस प्रकार ईश्वरका प्रकट होना उनकी आनन्दमयी लीला है और जीवोंका जन्म लेना दु:खमय है। भगवान् प्रकट होनेमें सर्वथा स्वतन्त्र हैं और जीव जन्म लेनेमें सर्वथा परतन्त्र हैं। ईश्वरके अवतरित होनेमें केवल उनकी अहैतुकी कृपा ही कारण है और जीवोंके जन्ममें हेतु उनके शुभाशुभ कर्म हैं।
विग्रह-तत्त्व
वे सर्वत्र परिपूर्ण सत्स्वरूप परमात्मा ही दिव्य विग्रहरूपमें प्रकट होते हैं। भगवान् का वह दिव्य विग्रह अलौकिक, अद्भुत और विलक्षण है (गीता ४। ९) और वे परमात्मा अपनी पूर्ण शक्तिसे ही प्रकट होते हैं। उनका साकार विग्रह एक देशमें प्रकट दीखनेपर भी वे वास्तवमें न तो दूसरे देशसे हट जाते हैं और न एक देशमें सीमाबद्ध ही हो जाते हैं। वे जीवकी तरह शरीरधारी नहीं होते। उनके विग्रहमें देह-देहीभाव नहीं है, उनका वह विग्रह दिव्य चिन्मयस्वरूप ही है, जिसका यथार्थ अनुभव दिव्य नेत्रवाले भक्तोंको होता है, दूसरोंको नहीं।
चिदानंदमय देह तुम्हारी।
बिगत बिकार जान अधिकारी॥
भगवान् ने भी कहा है—
नाहं प्रकाश: सर्वस्य योगमायासमावृत:।
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्॥
(गीता ७। २५)
‘अपनी योगमायासे छिपा हुआ मैं सबके प्रत्यक्ष नहीं होता, इसलिये यह अज्ञानी जनसमुदाय मुझे जन्मरहित अविनाशी परमात्मा नहीं जानता अर्थात् मुझको जन्मने-मरनेवाला समझता है।’
जीवोंके शरीर तो अनित्य, पापमय, रोगग्रस्त, लौकिक, विकारी, पाञ्चभौतिक और रज-वीर्यसे उत्पन्न होनेवाले होते हैं और परमात्माका वह साकार विग्रह नित्य, पाप-पुण्यसे रहित, अनामय, अप्राकृत, विकाररहित, विशुद्ध, परम दिव्य और प्रेममय होता है; अन्य जीवोंकी अपेक्षा तो देवताओंका शरीर भी दिव्य होता है; परन्तु भगवान् का स्वरूप उससे भी अति दिव्य विलक्षण होता है, जिसका देवतालोग भी दर्शन चाहते रहते हैं। (गीता ११।५२)
भगवान् श्रीराम तथा श्रीकृष्ण जब इस धरातलपर अवतरित हुए, उस समय वे माता कौसल्या और देवकीके गर्भसे उत्पन्न नहीं हुए। पहले उनको अपने शङ्ख, चक्र, गदा, पद्मधारी स्वरूपका दर्शन देकर फिर वे ही माताकी प्रार्थनासे बालरूपमें लीला करने लगे।
श्रीतुलसीदासजी कहते हैं—
भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी॥
लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी।
भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी॥
माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा।
कीजै सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा॥
सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा।
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उपसंहर विश्वात्मन्नदो रूपमलौकिकम्।
शङ्खचक्रगदापद्मश्रिया जुष्टं चतुर्भुजम्॥
(श्रीमद्भा० १०।३।३०)
माता देवकीने कहा—‘विश्वात्मन्! शङ्ख, चक्र, गदा और पद्मकी शोभासे युक्त इस चार भुजाओंवाले अपने अलौकिक—दिव्यरूपको अब छिपा लीजिये।’
जब भगवान् श्रीराम परमधाम पधारने लगे, उस समय वे अन्तर्धान हुए थे। मनुष्य-देहकी भाँति उनका देह यहाँ नहीं रहा, वे इसी शरीरसे वैकुण्ठधाममें चले गये।
पितामहवच: श्रुत्वा विनिश्चित्य महामति:।
विवेश वैष्णवं तेज: सशरीर: सहानुज:॥
(वा० रा० उत्तरकाण्ड ११०।१२)
‘महामति भगवान् ने पितामह ब्रह्माजीके वचन सुनकर और तदनुसार निश्चय कर तीनों भाइयोंसहित अपने उसी शरीरसे वैष्णव-तेजमें प्रवेश किया।’
भगवान् श्रीकृष्णके लिये भी ऐसे ही वचन मिलते हैं।
लोकाभिरामां स्वतनुं धारणाध्यानमङ्गलम्।
योगधारणयाऽऽग्नेय्यादग्ध्वा धामाविशत् स्वकम्॥
(श्रीमद्भा० ११।३१।६)
‘धारणा और ध्यानके लिये अति मङ्गलरूप अपनी लोकाभिरामा मोहिनी मूर्तिको योग-धारणाजनित अग्निके द्वारा भस्म किये बिना ही भगवान् ने अपने धाममें प्रवेश किया।’
भगवान् के सृष्टिके सृजन, पालन, संहार आदि तथा अपने अवतारलीला आदि जितने भी कर्म होते हैं, वे सभी परम दिव्य, उज्ज्वल, प्रकाशमय, आनन्दमय, विशुद्ध एवं अलौकिक होते हैं। भगवान् के समान कर्म साधारण मनुष्य तो कर ही क्या सकता है; ऋषि, मुनि, देवता और महात्मा भी नहीं कर सकते। जीवन्मुक्त और कारक पुरुषोंकी भी क्रियाएँ भगवान् की-जैसी नहीं होतीं। भगवान् के कर्म इन सभीकी अपेक्षा अत्यन्त विलक्षण और अद्भुत होते हैं, वैसे कर्म चाहे कोई कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो नहीं कर सकता। कारण यह है कि अन्य लोगोंमें शक्ति, विद्या, प्रभाव, ऐश्वर्य आदि परिमित होते हैं और वे भी भगवान् के दिये हुए तथा उस सर्वशक्तिस्रोतके अंशमात्रसे ही प्रकाशित होते हैं। अत: उन सवैर्श्वर्यसम्पन्न अमित प्रभावशाली भगवान् के कर्म उन सबकी अपेक्षा सब प्रकारसे विलक्षण, दिव्य और अद्भुत होते हैं।
भगवान् में अज्ञता, जडता, भूल, आलस्य, प्रमाद, असावधानी, भ्रम आदि किसी भी दोषकी तनिक भी सम्भावना न होने तथा ज्ञान, चेतनता, सावधानी और विज्ञता आदिके स्वाभाविक ही अविचलरूपसे नित्य विद्यमान रहनेके कारण उनके कर्म अत्यन्त ही उज्ज्वल होते हैं।
इसलिये उनके लीला-कर्मोंका तथा गीतादि परम रहस्यमय उपदेशोंका संसारमें जितना ही श्रवण, मनन, पठन, कथन, कीर्तन आदिके द्वारा विस्तार किया जाता है, उतना ही प्राणिमात्रके हृदयमें अज्ञान, अन्धकार, जडता आदिका विनाश होकर परम दिव्य प्रकाशमय ज्ञानका साम्राज्य छा जाता है। जब लोगोंके हृदयमें भी उनके लीलाकर्म और उपदेशके श्रवणादिसे इतना दिव्य प्रकाश छा जाता है, तब फिर उनके स्वयं परम दिव्य प्रकाशमय होनेमें तो सन्देह ही क्या है।
वे प्रेममय भगवान् जिनके साथ जो कुछ भी व्यवहार करते हैं, उसमें निष्काम प्रेम और अहैतुकी कृपा भरी रहनेके कारण जिनके साथ व्यवहार किया जाता है, वे प्राणी परम आह्लादित हो जाते हैं। भगवान् जिस तरफ देखते हैं, वह सारी दिशा प्रेम और आनन्दमय बन जाती है। उनकी देखी हुई वस्तुओंमें, उनकी क्रीड़ा की हुई भूमिमें इतना आनन्द और प्रेम भरा हुआ है कि हजारों-लाखों वर्षोंतक उनसे लोगोंको परम लाभ होता रहता है। भावुक प्रेमी भक्त उन लीलास्थलियोंमें निवास करते हैं और जन्म-मरणादि सांसारिक दु:खोंसे सर्वथा मुक्त होकर उस परमानन्दका प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं।
जो भगवान् के अनुकूल होकर प्रेम रखते हुए श्रद्धा-बुद्धिसे उनके दर्शनादि करते हैं, उनके आनन्दलाभमें तो कहना ही क्या है; जो द्वेषभावसे भगवान् से विरोध रखकर विपरीत आचरणोंमें ही लगे रहते हैं, उनको भी भगवान् दयापरवश हो अपने हाथोंसे मारकर अपना परम दिव्य आनन्दमय धाम प्रदान करते हैं। उनकी मारने आदि क्रियाओंमें भी परम कल्याण भरा रहता है, इसलिये उनकी सम्पूर्ण क्रियामात्र ही आनन्दमय है।
लालने ताडने मातुर्नाकारुण्यं यथार्भके।
तद्वदेव महेशस्य नियन्तुर्गुणदोषयो:॥
‘जिस प्रकार माताकी बालकपर उसके पालन करने और ताड़ना देनेमें कहीं अकृपा नहीं होती, उसी प्रकार गुण-दोषोंपर नियन्त्रण करनेवाले परमेश्वरकी कहीं किसीपर अकृपा नहीं होती।’
पूर्णतम पुरुषोत्तम भगवान् के सभी कर्म नि:स्वार्थभावसे होते हैं। उनमें कहीं भी जरा भी स्वार्थ नहीं होता। केवल प्राणियोंपर अकारण करुणा करनेके लिये ही वे नि:स्वार्थभावसे कर्मोंका आचरण किया करते हैं। उनको अपने लिये कुछ भी कर्तव्य अथवा प्राप्तव्य नहीं होता तो भी वे लोकसंग्रहार्थ जगत् के हितके लिये ही कर्मोंमें प्रवृत्त होते हैं। भगवान् गीतामें स्वयं कहते हैं—
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥
(३।२२)
‘हे अर्जुन! मुझे इन तीनों लोकोंमें न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई भी प्राप्त करनेयोग्य वस्तु अप्राप्त है, तो भी मैं कर्ममें ही बर्तता हूँ।’
भगवान् के कर्मोंमें अपना निजी कोई स्वार्थ या कामना नहीं होती। उनके कर्म निर्मल पापरहित होते हैं। उनके उपदेश, भाव और आचरणोंका अनुकरण करनेसे पापी-से-पापी भी परम विशुद्ध तरन-तारन बन जाता है। इसलिये भगवान् के कर्म परम विशुद्ध और निर्विकार होते हैं।
भगवान् के कर्म अलौकिक होते हैं। जहाँ देवताओंकी भी कल्पना नहीं पहुँच पाती और जो बिलकुल असम्भव होते हैं, उन कर्मोंको भी वे सम्भव कर दिखाते हैं। उनकी तो माया ही अघटनघटनापटीयसी है, फिर उन मायाके एकमात्र अधीश्वर परमात्माके कर्म सर्वथा अलौकिक हों, इसमें तो कहना ही क्या है?
जैसे सर्वत्र परिपूर्ण सामान्य अग्नि साधनोंसे साकाररूपमें प्रकट हो जाता है, उसी प्रकार वह सर्वत्र अस्तिरूपसे प्रतीत होनेवाला निर्गुण सत्तत्त्व ही अपनी अहैतुकी कृपा और भक्तोंके प्रेमके वश होकर दिव्य विग्रहरूपमें प्रकट होता है।
प्रकाश-तत्त्व
भगवान् के विग्रहका प्रकाश दिव्य होता है। वह निर्गुण सर्वव्यापी चिन्मयस्वरूप ही स्थूलरूपसे प्रकाशरूपमें आता है। वह प्रकाश प्राकृत नेत्रोंका विषय नहीं होता, दिव्य चक्षुसे ही देखा जा सकता है। भगवान् ने अर्जुनसे कहा है—
न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा।
दिव्यं ददामि ते चक्षु: पश्य मे योगमैश्वरम्॥
(गीता ११।८)
‘परन्तु मुझको तू इन अपने प्राकृत नेत्रोंद्वारा देखनेमें नि:संदेह समर्थ नहीं है; इसीसे मैं तुझे दिव्य अर्थात् अलौकिक चक्षु देता हूँ; उससे तू मेरी ईश्वरीय योग-शक्तिको देख।’
यद्यपि अवतारके समय भगवान् का विग्रह सबके सामने होनेसे सभीको उनके दर्शन होते हैं; परंतु उनको दर्शन होते हैं योगमायासमावृत साधारण मनुष्यरूपके ही, दिव्यरूपके नहीं।
भगवान् का वह दिव्य प्रकाश सूर्य, चन्द्रमा आदिके प्रकाशसे अत्यन्त महान् और विलक्षण होता है। सञ्जयने गीतामें कहा है—
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद् युगपदुत्थिता।
यदि भा: सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मन:॥
(११। १२)
‘आकाशमें हजार सूर्योंके एक साथ उदय होनेसे उत्पन्न जो प्रकाश हो, वह भी उस विश्वरूप परमात्माके प्रकाशके सदृश कदाचित् ही हो।’
जैसे सूर्यका प्रकाश होता है; भगवान् के विग्रहका भी उसी तरह प्रकाश होता है; किंतु उसमें तीक्ष्णता, उष्णता और दुर्निरीक्ष्यता नहीं होती। भगवान् के विग्रहका प्रकाश सूर्यसे भी बहुत अधिक होता है, किंतु सूर्यकी तरह तीक्ष्णता नहीं होती; वह तो चन्द्रमाकी तरह नहीं, चन्द्रमासे भी अत्यन्त विलक्षण, सौम्य, शान्त, शीतल और नेत्राकर्षक होता है। वास्तवमें वह सूर्य-चन्द्रमा-जैसा ही नहीं है और न उसे सूर्य-चन्द्रमा प्रकाशित ही कर सकते हैं, भगवान् का प्रकाश इनसे बहुत विलक्षण होता है। भगवान् कहते हैं—
न तद् भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावक:।
यद् गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥
(गीता १५।६)
‘जिस परमपदको प्राप्त होकर मनुष्य लौटकर संसारमें नहीं आते—उस स्वयंप्रकाश परमपदको न सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चन्द्रमा और न अग्नि ही; वही मेरा परमधाम है (जो कि भगवत्स्वरूप ही है)।’
वास्तवमें सूर्य-चन्द्रमा आदि भी तो भगवान् के प्रकाशसे ही प्रकाशित होते हैं, तब वे उसे कैसे प्रकाशित कर सकते हैं? क्योंकि उनमें वह तेज भी भगवान् का ही तेज है।
यदादित्यगतं तेजो जगद् भासयतेऽखिलम्।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत् तेजो विद्धि मामकम्॥
(गीता १५।१२)
‘सूर्यमें स्थित जो तेज सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चन्द्रमामें है और जो अग्निमें है, उसको तू मेरा ही तेज जान।’
सूर्य, चन्द्रमाका प्रकाश तो पार्थिव पदार्थोंसे आवृत हो जाता है, अत: उससे छाया भी पड़ती है, परन्तु भगवद्विग्रहका प्रकाश, चाहे पहाड़ भी बीचमें क्यों न आ जाय, आवृत नहीं होता और न उससे छाया ही पड़ती है। वह प्रकाश दिव्य चिन्मय होता है और सूर्य-चन्द्रमाका प्रकाश भौतिक होता है।
चितिशक्ति स्वयं आत्मस्वरूप है। वह बुद्धितत्त्वसे जाननेपर ज्ञानरूपसे प्रतीत होती है और वही नेत्ररूपसे दीखनेपर प्रकाशरूपसे प्रकट दीखने लगती है, तत्त्वत: वह चिति, भाति और प्रकाश एक ही वस्तु है।
प्रेम-तत्त्व
वे निर्गुण आनन्दमय सर्वत्र परिपूर्ण परमात्मा ही प्रेमरूपसे साकार विग्रहके रूपमें प्रकट होते हैं। परमात्माका प्रेम बड़ा विलक्षण है। परमात्माका दिव्य विग्रह प्रेममय होता है, जिसके दर्शन करनेसे खर, दूषण, जरासन्ध-जैसे विरोधी जीवोंके भी चित्त उस ओर जबरन् खींचे जाते हैं। उनके उस प्रेममय विग्रहमें विलक्षण आकर्षण होता है। जहाँ भगवान् की कथा होती है, लीला-विग्रह आदिका वर्णन होता है, वहाँ भी प्रेम, आनन्द और शान्तिकी बाढ़-सी आ जाती है, सर्वत्र परम शान्तिमय वातावरण छा जाता है। उस वर्णनको सुनकर श्रद्धालु प्रेमियोंका हृदय प्रेमसे तर हो जाता है। उनके नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बहने लगती है, कण्ठ गद्गद हो जाते हैं, वाणी रुक जाती है और समस्त अङ्ग पुलकित हो उठते हैं। इस प्रकार भक्त प्रेममें मतवाले हो जाते हैं। महात्मा श्रीनन्ददासजी कहते हैं—
कृष्ण नाम जब ते मैं श्रवण सुन्यौ री आली!
भूली री भवन मैं तौ बावरी भई री॥
जब उसकी कथा-वार्ता सुननेसे ही इतना असर पड़ता है, तब वह स्वयं कितना प्रेममय है—इसका अनुभव तो परम प्रेमास्पद भगवान् के दर्शन किये हुए सच्चे प्रेमी भक्त ही कर सकते हैं; पर वे भी उस प्रेमका वर्णन करनेमें अपनेको असमर्थ ही पाते हैं। प्रेमका स्वरूप वर्णन करते हुए श्रीनारदजी कहते हैं—
‘अनिर्वचनीयं प्रेमस्वरूपम्।’ ‘मूकास्वादनवत्।’
‘गुणरहितं कामनारहितं
प्रतिक्षणवर्धमानमविच्छिन्नं सूक्ष्मतरमनुभवरूपम्।’
(नारदभक्तिसूत्र ५१-५२, ५४)
प्रेमका स्वरूप अनिर्वचनीय है। गूँगेके स्वादकी भाँति उसका वर्णन नहीं हो सकता। यह प्रेम गुणरहित है, कामनारहित है, प्रतिक्षण बढ़ता रहता है, विच्छेदरहित है, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर है और अनुभवरूप है।
जो इस प्रेमके तत्त्वको जान जाता है, वह स्वयं प्रेममय बन जाता है। उसे प्रेम-ही-प्रेम दीखता है, प्रेममय भगवान् के सिवा उसे अन्य कोई वस्तु नजर ही नहीं आती।
यह भगवत्प्रेम वाणीका विषय नहीं है। संसारमें स्त्री, पुत्र, धन, शरीर, मान-बड़ाई आदिके प्रति जो प्रेम देखनेमें आता है, वह तो प्रेम ही नहीं है, राग है। राग और प्रेममें महान् अन्तर है। राग रजोगुणी है और प्रेम गुणातीत है, गुणोंके दायरेसे परेकी वस्तु है। रागमें अपने इन्द्रियोंकी तृप्ति और अपना स्वार्थ रहता है, प्रेममें केवल प्रेमास्पदका आनन्द, उसकी प्रसन्नता और अपने स्वार्थका सर्वथा त्याग रहता है। रागके विषय जड भोगरूप पदार्थ होते हैं, परंतु प्रेमके विषय साक्षात् चिन्मय परमात्मा होते हैं, जड पदार्थ नहीं। जीवोंसे जो प्रेम किया जाता है, उसका भी विषय चेतन ही होता है, क्योंकि प्रेम स्वयं चिन्मय है, पर जहाँ केवल जड शरीरकी ओर आकर्षण होकर प्रेम होता है, वह प्रेम नहीं, वह तो राग ही कहलाता है। हाँ, वह भी यदि स्वार्थत्यागपूर्वक केवल उसके हितके लिये ही किया जाता है तो प्रेम ही कहा जाता है। अवश्य ही महापुरुषोंसे जो प्रेम किया जाता है वहाँ यदि शरीरमें आकर्षण होकर प्रेम होता है तो भी, वह शरीर अन्य शरीरोंकी अपेक्षा अत्यन्त विलक्षण होने तथा वहाँ अपना लौकिक स्वार्थ न होनेके कारण, वह प्रेम ही माना जाता है। उसका ध्येय पारमार्थिक सत्य वस्तु है, अत: वह प्रेम शरीरको लेकर होनेपर भी दोषी नहीं है तथा भगवान् में जो कामना-सिद्धिके लिये प्रेम किया जाता है, वह भी यद्यपि जड वस्तुओंकी प्राप्तिके लिये ही है, तो भी भगवान् से सम्बन्ध होनेके कारण वह मुक्तिप्रद ही होता है। भगवान् ने कहा है—‘मद्भक्ता यान्ति मामपि’ (गीता ७। २३)—‘मेरे भक्त मुझे चाहे जिस भावसे भजें, अन्तमें वे मुझे ही प्राप्त होते हैं।’ और उनकी कामना भी पूर्ण हो जाती है अथवा मिट जाती है। मतलब यह है कि महात्माओंका शरीर प्राकृत होनेपर भी उनसे नि:स्वार्थ प्रेम करनेवालेका ध्येय चेतन है तथा भगवान् से सकाम प्रेम करनेवालेका ध्येय जड पदार्थ होनेपर भी भगवान् का विग्रह चेतनस्वरूप है—यहाँ एक अंशमें कमी रहनेपर भी दोनों ही जगह चेतनका सम्बन्ध होनेसे वह प्रेम ही कहा जाता है और उससे नि:संदेह कल्याण हो जाता है। पर असली प्रेम तो वह है जो जडतारहित, ज्ञानपूर्ण, निष्कलङ्क, नि:स्वार्थ, परमशुद्ध और केवल प्रेमके लिये ही होता है। यह प्रेम रागकी समाप्ति होनेके बाद जाग्रत् होता है और वैराग्यकी ऊँची-से-ऊँची स्थिति होनेपर आरम्भ होता है।
वह प्रेम रसमय, आनन्दमय, प्रकाशमय, त्यागरूप, दिव्य और परम शान्तिरूप है। उसमें दु:ख, विक्षेप, जलन, चिन्ता, उद्वेग, भय आदिका लेश भी नहीं है, प्रेम और भगवान् वस्तुत: दो नहीं, एकरूप ही हैं। ऐसा होनेपर भी भगवान् के दर्शन होनेपर प्रेम हो ही जाय, यह सर्वत्र अबाधित नियम नहीं है, पर प्रेम होनेपर तो भगवान् मिल ही जाते हैं। इसलिये प्रेमकी कीमत भगवान् भी नहीं हैं, बल्कि भगवान् की ही कीमत प्रेम है; अत: प्रेम भगवान् से भी बढ़कर है। इसलिये दिव्य प्रेमको प्राप्त किये हुए भगवद्भक्त भगवान् के दर्शनोंकी भी परवा नहीं करते, बल्कि भगवान् ही उन भक्तोंकी चाह किया करते हैं।
प्रेम बड़ी ही अलौकिक वस्तु है। वह द्वैत-अद्वैत, भेद-अभेद, सबसे निराला, विलक्षण अलौकिक तत्त्व है। प्रेम और आनन्द वस्तुत: एक ही वस्तु हैं। क्योंकि प्रेम होनेपर ही आनन्द होता है और जहाँ आनन्द होता है, वहीं प्रेम होता है।
सबकी एकता
सत्-रूप परमात्माका जो होनापना है, जो सामान्यरूपसे सर्वत्र सर्वदा परिपूर्ण है, वही कृपापरवश हो भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये श्रीविग्रहरूपसे प्रकट होता है और जो सामान्य चिन्मय ज्ञानस्वरूप परमात्मा है, वही श्रीविग्रहके प्रकाशरूपसे प्रकट होता है तथा जो निरतिशय आनन्दघन परमात्मा है, वही श्रीविग्रहमें प्रेमरूपसे प्रकट होता है। जैसे सत्, चित्, आनन्द—ये तीनों शब्दत: अलग-अलग होनेपर भी वस्तुत: एक ही हैं और परमात्माके स्वरूप ही हैं, उसके कोई विशेषण या उपाधि नहीं, उसी तरह साकार परमात्मा उसका प्रकाश तथा प्रेम भी कोई भिन्न-भिन्न चीजें नहीं हैं।
प्रेम हरीको रूप है, त्यों हरि प्रेम स्वरूप।
एक होय दोमें लसै, ज्यों सूरज अरु धूप॥
तत्त्व-विवेचन
इस प्रकार परमात्माके सच्चिदानन्दघन निर्गुण-निराकार, अस्ति-भाति-प्रियरूप सगुण-निराकार, दिव्य विग्रह, प्रकाश और प्रेममय सगुण-साकार स्वरूपका तथा उन सबकी एकताका कुछ संकेत कराया गया। अब इनकी एकताके प्रतिपादक गीताके निम्न श्लोककी कुछ व्याख्या की जाती है—
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥
(४। ६)
भगवान् कहते हैं—‘मैं अजन्मा और अविनाशीस्वरूप होते हुए भी तथा समस्त प्राणियोंका ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृतिको अधीन करके अपनी योगमायासे प्रकट होता हूँ।’
इस श्लोकमें भगवान् ने छ: बातें कही हैं—तीन अपने स्वरूपके सम्बन्धमें, दो प्रकृतिके सम्बन्धमें और एक अवतार लेनेके सम्बन्धमें। ये क्रमश: इस प्रकार हैं—
मैं (१) अजन्मा होते हुए भी, (२) अविनाशीस्वरूप होते हुए भी, (३) समस्त प्राणियोंका ईश्वर होते हुए भी, (४) अपनी प्रकृतिको अधीन करके, (५) अपनी योग-मायासे, (६) प्रकट होता हूँ।
इन छहोंमेंसे ‘अजन्मा’ और ‘अविनाशी’ होते हुए भी—ये दो तो निर्गुण-निराकार तथा ‘समस्त प्राणियोंका ईश्वर होते हुए भी’—यह सगुण-निराकारका एवं ‘अपनी प्रकृतिको अधीन करके’—यह भगवान् के श्रीविग्रहके तत्त्वका द्योतक हैं। ‘प्रकट होता हूँ’—इससे अपने साकाररूपसे प्रकट होनेकी बात कही है। ऐसे साकाररूपसे प्रकट होनेपर भी अभक्त उन्हें नहीं जान पाते; क्योंकि भगवान् योगमायासमावृत रहते हैं—यह बात भगवान् ने ‘अपनी योगमायासे’—इस पदके द्वारा व्यक्त की है।
भगवान् अज अर्थात् जन्मरहित रहते हुए ही जन्म लेते हैं अर्थात् प्रकट होते हैं। जन्म लेनेपर भी भगवान् के ‘अज’ पनेमें कभी किञ्चिन्मात्र भी कमी नहीं होती। भगवान् अव्ययात्मा यानी परिवर्तन, क्षय, विनाश आदि विकारोंसे सर्वथा रहित रहते हुए ही लोगोंके सामनेसे अन्तर्धान हो जाते हैं; किंतु अन्तर्धान हो जानेपर भी वे कहीं नष्ट नहीं हो जाते। इसी प्रकार प्राणिमात्रके एकमात्र महान् शासक—ईश्वर रहते हुए ही वे किसी देशविशेषमें माता-पिताकी आज्ञाका पालन करनेवाले नाम-रूपविशिष्ट बालक बन जाते हैं; परंतु बालक बन जानेपर भी उनके शासकत्वमें कोई भी कमी नहीं आती। वे ही भगवान् अपनी प्रकृतिको अधीन करके प्रकट होते हैं; किन्तु इस प्रकार प्रकट होनेपर भी वे प्रकृतिके परतन्त्र नहीं हो जाते, बल्कि प्रकृति तो उनके अनुकूल चलनेवाली उनकी दासी ही रहती है। वे नित्य ज्ञानस्वरूप भगवान् अपने ऊपर योगमायाका परदा रखकर प्रकट होते हैं, पर भगवान् का दिव्य ज्ञान उससे जरा भी आवृत नहीं होता। प्रेमी भक्तोंके लिये भी वह परदा नहीं रहता, वे तो उनके चिन्मय स्वरूपका दर्शन कर ही लेते हैं। इस आवरणसे तो भगवान् की भक्तिसे रहित मूढलोग ही उन्हें नहीं जान पाते।
इस श्लोकमें भगवान् ने अपने निर्गुण-निराकार, सगुण-निराकार एवं सगुण-साकार-स्वरूपकी एकता की है। भगवान् श्रीकृष्ण बतलाते हैं कि वह निर्गुण सच्चिदानन्दघन सर्वव्यापी परमात्मा मैं ही हूँ और मैं ही समय-समयपर साकाररूपमें प्रकट होता हूँ। गीतामें कहा है—
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥
(१४।२७)
‘उस अविनाशी परब्रह्मका और अमृतका तथा नित्य-धर्मका और अखण्ड एकरस आनन्दका आश्रय मैं हूँ।’
यहाँ भगवान् ने अपने जिन-जिन रूपोंका वर्णन किया है, उनमेंसे अगर एक भी रूपके तत्त्वका ज्ञान हो जाय तो मनुष्य जीवन्मुक्त और कृतकृत्य हो जाता है। भगवान् ने गीतामें अपने किसी एक रूपको भी जाननेवालेको असम्मूढ—ज्ञानवान् और न जाननेवालेको मूढ बतलाया है, यह बात नीचे लिखे उद्धरणोंसे स्पष्ट की जाती है।
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्।
असम्मूढ: स मर्त्येषु सर्वपापै: प्रमुच्यते॥
(गीता १०।३)
यहाँ भगवान् ने अपने ‘अज’—जन्मरहित रूपको जाननेवाले—का सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होना बतलाया है तथा उसे सब मनुष्योंमें असम्मूढ—ज्ञानवान् बतलाया है।
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्॥
(गीता ७।२५)
यहाँ ‘अज’ नहीं जाननेवालेको मूढ कहा है।
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिता:।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्॥
(गीता ९।१३)
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वर:॥
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥
(गीता १५।१७, १९)
यहाँ भगवान् ने ‘अव्यय’ स्वरूपके जाननेवालेको असम्मूढ—ज्ञानवान् और सर्ववित् बतलाया है।
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धय:।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्॥
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्॥
(गीता ७।२४-२५)
इन श्लोकोंमें ‘अव्यय’ स्वरूपके न जाननेवालेको बुद्धिहीन और मूढ कहा गया है।
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥
(गीता ५।२९)
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्।
असम्मूढ: स मर्त्येषु सर्वपापै: प्रमुच्यते॥
(गीता १०।३)
यहाँ ‘सर्वलोकमहेश्वर’ रूपके जाननेवालेको शान्तिकी प्राप्ति बतलायी है और उसे असम्मूढ कहा गया है।
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्॥
(गीता ९।११)
यहाँ ‘भूतमहेश्वर’ रूपको न जाननेवालेको मूढ बतलाया है। यहाँ इस चौथे अध्यायके छठे श्लोकमें वर्णित प्रकृति और योगमाया—ये दो अलग-अलग तत्त्व हैं। प्रकृति परमात्माकी एक नित्य दिव्य शक्ति है और उस प्रकृतिके ही एक अविद्यामय अंशको अज्ञान या माया कहते हैं जो कि प्रकृतिके कार्यरूप तीनों गुणोंवाली है। ज्ञानमार्गी इस प्रकृतिको विद्या कहते हैं और इस ब्रह्मविद्या—अध्यात्मविद्या (गीता १०।३२) का अवलम्बन लेकर अविद्याका नाश करके परमात्मतत्त्वका साक्षात्कार करते हैं तथा भक्तजन इसे भगवान् की भक्ति—दैवी सम्पत्ति कहते हैं, जिसका आश्रय लेकर वे भगवान् के दर्शन करते हैं। वही भगवान् की ओर ले जानेवाली भगवान् की दैवी प्रकृति है।
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिता:।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्॥
(गीता ९।१३)
इसमें परमात्माकी दैवी प्रकृतिका आश्रय लेनेवालोंको महात्मा बतलाया है।
दैवी योगमाया तो बन्धनकारक, दुस्तर, मोहित करनेवाली और परमात्माकी ओरसे दूर ले जानेवाली है। इसे ही अविद्या कहते हैं।
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभि: सर्वमिदं जगत्।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्य: परमव्ययम्॥
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥
(गीता ७।१३-१४)
इस मायाका आश्रय लेनेवाले लोग उस अव्यय परमात्माको नहीं जान पाते।
गीतामें खोज करनेपर यह बात सुस्पष्ट हो जाती है कि यह माया गुणमयी है। गुण मायासे उत्पन्न नहीं है। इनको तो भगवान् ने प्रकृतिसे उत्पन्न बतलाया है। यथा—
कार्यते ह्यवश: कर्म सर्व: प्रकृतिजैर्गुणै:॥
(३। ५)
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान्॥
(१३।१९)
पुरुष: प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान् गुणान्।
(१३।२१)
सत्त्वं रजस्तम इति गुणा: प्रकृतिसम्भवा:।
(१४। ५)
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभि: स्यात्त्रिभिर्गुणै:।
(१८।४०)
भगवान् ने मायाको गुणमयी बतलाया है, न कि प्रकृतिको। ‘मयट्’ प्रत्यय विकारार्थमें भी होता है, इसलिये यहाँ मायाको गुणोंका विकार माना है। प्रकृति तो गुणोंसे क्या मायासे भी परेकी वस्तु है। इसीलिये भगवान् प्रकृतिको अधीन करके लीला-विग्रह धारण करते हुए भी मायिक या गुणमय नहीं हो जाते। वे तो सदा सर्वथा दिव्य अमायिक गुणातीत ही स्थित रहते हैं, पर मायाका पर्दा लेकर प्रकट होनेके कारण साधारण जीव उन्हें नहीं जान पाते और भगवान् को साधारण मनुष्य ही मानने लगते हैं। (गीता ७।२४; ९।११)
इस प्रकार माया और प्रकृति—ये दो अलग-अलग तत्त्व हैं और इनमें बड़ा भारी अन्तर है।
यहाँ यह बात समझनेकी है कि सगुण-साकार परमात्मा अज, अव्यय और गुणातीत हैं। भगवान् का दिव्य विग्रह प्रकृतिजन्य तीनों गुणोंके अंदर नहीं है। भगवान् ने कहा है—
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभि: सर्वमिदं जगत्।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्य: परमव्ययम्॥
(७।१३)
‘गुणोंके कार्यरूप सात्त्विक, राजस और तामस—इन तीनों प्रकारके भावोंसे यह सब संसार—प्राणिसमुदाय मोहित हो रहा है, इसीलिये इन तीनों गुणोंसे परे मुझ अविनाशी परमात्माको नहीं जानता।’
सगुण-साकार भगवान् इन तीनों गुणोंसे अत्यन्त परे हैं। जब उनकी उपासना करनेसे ही मनुष्य गुणातीत हो जाता है, तब फिर वे स्वयं तीनों गुणोंसे परे हैं—इसमें तो संदेह ही क्या है। भगवान् कहते हैं—
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।
स गुणान् समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते।
(१४। २६)
‘जो पुरुष अव्यभिचारी भक्तियोगके द्वारा मुझको निरन्तर भजता है, वह इन तीनों गुणोंको भलीभाँति लाँघकर सच्चिदानन्दघन ब्रह्मको प्राप्त होनेके लिये योग्य बन जाता है।’
यदि साकार भगवान् तीनों गुणोंके अंदर होते तो उनकी उपासना करनेसे मनुष्य गुणातीत कैसे हो सकता। अत: भगवान् का दिव्य विग्रह मायिक नहीं है। यदि मायिक होता तो आत्मनिष्ठ ज्ञानीजनोंका उसमें आकर्षण क्योंकर होता। तत्त्वज्ञानी जनकजीका भी मन भगवान् श्रीराम-लक्ष्मणके स्वरूपको देखकर आकर्षित हो जाता है। गोस्वामी तुलसीदासजीने उनकी स्थितिका वर्णन करते हुए कहा है—
मूरति मधुर मनोहर देखी।
भयउ बिदेहु बिदेहु बिसेषी॥
प्रेम मगन मनु जानि नृपु करि बिबेकु धरि धीर।
बोलेउ मुनि पद नाइ सिरु गदगद गिरा गभीर॥
सहज बिरागरूप मनु मोरा।
थकित होत जिमि चंद चकोरा॥
इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा।
बरबस ब्रह्म सुखहि मन त्यागा॥
पुनि पुनि प्रभुहि चितव नरनाहू।
पुलक गात उर अधिक उछाहू॥
एक बार सनकादि ऋषि वैकुण्ठमें जा रहे थे, वहाँ भगवान् के द्वारपाल जय-विजयने उन्हें भीतर जानेसे रोका। तब सनकादिने उनको तीन जन्मोंतक राक्षस होनेका शाप दे दिया। भगवान् अपने अनुचरोंद्वारा श्रेष्ठ पुरुषोंका अपमान हुआ जानकर स्वयं लक्ष्मीसहित वहाँ पधारे। उस समय भगवान् के दर्शनसे उनकी जो दशा हुई, वह बड़ी विलक्षण थी। भागवतकार लिखते हैं—
तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द-
किञ्जल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायु:।
अन्तर्गत: स्वविवरेण चकार तेषां
संक्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वो:॥
(३।१५।४३)
‘प्रणाम करनेपर उन कमलनेत्र भगवान् के चरणकमलकी परागसे मिली हुई तुलसी-मञ्जरीकी हवाने उनके नासिकाछिद्रोंमें प्रवेशकर उन अक्षर परमात्मामें नित्य स्थित रहनेवाले ज्ञानी महात्माओंके भी चित्त और शरीरको क्षुब्ध कर दिया।’
जिनका मन ‘सहज विरागरूप’ था जो अक्षर परमात्मामें नित्य स्थिर रहनेवाले थे, जिन्हें ‘दु:खदोषानुदर्शनम्’ का साधनापूर्वक वैराग्य करना नहीं पड़ता था, उन जनक और सनकादिकोंका चित्त भी भगवान् की ओर खींच जाता है। वे विलक्षण प्रेमार्णव भगवान् मायिक कैसे हो सकते हैं?
इस निर्गुण-सगुण-साकार तत्त्वकी एकता बतलानेवाले श्लोकमें ‘अपि’ और ‘सन्’ पदोंके दो बार देनेका यह स्वारस्य है कि निर्गुण-निराकार, सगुण-निराकार और सगुण-साकार वस्तुत: एक ही तत्त्व हैं। इनमें अनेकता तो साधकोंके दृष्टिभेदके ही कारण दीखती है। परमात्माका जो ध्यान, चिन्तन, धारण, भावना और ज्ञान किया जाता है, वह सब मन-बुद्धिके द्वारा ही किया जाता है और परमात्मा वस्तुत: मन-बुद्धिसे अतीत हैं। अत: वृत्तिके द्वारा जो कुछ भी निश्चित किया जाता है, उससे परमात्मा वास्तवमें परे ही रह जाते हैं। इसलिये मन-बुद्धिसे पकड़ा हुआ परमात्माका कोई भी स्वरूप वास्तविक नहीं, कल्पित ही है। यद्यपि मन-बुद्धि परमात्माके यथार्थ स्वरूपतक नहीं पहुँच पाते, तथापि परमात्मा तो सर्वातीत होते हुए साधककी कल्पनामें भी मौजूद हैं ही; क्योंकि वे देश, काल, वस्तु, भाव और धारणा—सभीमें अविच्छिन्न रूपसे सदा ही विद्यमान हैं। तथा परमात्माकी प्राप्तिके लिये साधन करनेवाले पुरुषका लक्ष्य परमात्मा होनेके कारण उनके परम भावको समझकर सगुण, निर्गुण, साकार, निराकार— किसी भी रूपकी कैसी भी भावना क्यों न की जाय, उसका भी फल परमात्माकी प्राप्ति ही होता है। अत: परमात्माकी प्राप्तिके उद्देश्यसे जो भी कुछ साधन किया जाता है उसका फल वस्तुत: सत्यस्वरूप परमात्माकी प्राप्ति ही होनेके कारण सभी साधन वस्तुत: सत्य ही हैं, कल्पित नहीं।
परमात्मा सर्वत्र सर्वदा विद्यमान है; किंतु लक्ष्य परमात्मा न रहनेके कारण ही मनुष्य शान्तिलाभसे वञ्चित रहता है। यदि उसका लक्ष्य परमात्मा हो जाय तो किसी भी शास्त्रोक्त उपायसे परमशान्तिकी प्राप्ति हो सकती है। किसी भी मार्गसे चला जाय, वास्तविक परमात्माकी प्राप्तिके बाद तो उस पुरुषकी स्थितिमें किञ्चिन्मात्र भी अन्तर नहीं होता; परन्तु साधनकालमें उपायभेदके कारण अन्तर रहता है तथा साधनकी अन्तिम सीमाकी प्राप्तिमें भी भेद रहता है। नीचे इस विषयमें कुछ लिखा जाता है—
दर्शन, ज्ञान, प्रवेशका प्रकरण
सगुण, साकार भगवान् की अनन्य भक्ति करनेवाले भक्तोंको परमात्माके दर्शन, उनका तत्त्वज्ञान और उनके स्वरूपकी प्राप्ति—तीनों होते हैं। भगवान् ने कहा है—
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप॥
(गीता ११।५४)
‘परन्तप अर्जुन! अनन्य भक्तिके द्वारा इस प्रकार चतुर्भुजरूपवाला मैं प्रत्यक्ष देखनेके लिये, तत्त्वसे जाननेके लिये तथा प्रवेश करनेके लिये अर्थात् एकीभावसे प्राप्त होनेके लिये भी शक्य हूँ!’
सगुण-निराकारकी उपासनाकी दो प्रणालियाँ होती हैं—
एक तो परमात्मा सब जगह परिपूर्ण हैं और मैं उनका दास हूँ—इस प्रकारके भेद भावपूर्वक की जाती है। यथा—
सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत।
मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत॥
दूसरी प्रणालीमें अभेदभाव रहता है कि सब परमात्मा ही है, मैं कोई उससे अलग वस्तु नहीं—
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥
(गीता १३। ३०)
इन दोनोंमें भेद-प्रणालीसे चलनेवाला साधन-कालमें भेद मानकर सिद्धिकालमें अपनेसे अभिन्न भी मान सकता है और भिन्न भी। भिन्न माननेवाला तो उपर्युक्त सगुण-साकारकी उपासनाके मार्गसे परमात्माके दर्शन करके तथा तत्त्वसे जानकर उन्हें प्राप्त कर लेता है और सिद्धिकालमें साध्यको अपनेसे अभिन्न माननेवाला परमात्माके स्वरूपको तत्त्वत: जानकर निर्गुण-निराकारको प्राप्त हो जाता है। उसे साकार-विग्रहकी भावना तथा दर्शनकी इच्छा न रहनेके कारण उनके दर्शन नहीं होते।
सगुण-साकारकी उपासनासे नेत्रोंसे दर्शन, बुद्धिसे ज्ञान और आत्मासे प्राप्ति—तीनों होते हैं और सगुण-निराकारकी उपासनासे केवल बुद्धिसे ज्ञान और आत्मासे प्राप्ति—दो ही होते हैं एवं मन, बुद्धिका विषय न होनेसे निर्गुण-निराकारकी तो उपासना ही नहीं बन सकती; वहाँ तो केवल आत्मासे प्राप्ति ही होती है।
अभेद-भेदमार्गका वर्णन
साधनका आरम्भ सगुण-निराकारसे ही होता है। साधनके मुख्य भेद दो ही हैं—निर्गुण और सगुणकी उपासना अथवा यों कहें कि अभेद और भेदमार्ग।
निर्गुण-निराकारका उद्देश्य रखकर अभेदभावसे उपासना करनेमें मुख्य साधन है—एक सच्चिदानन्दघन परमात्मा ही सर्वत्र सदा परिपूर्ण है, उसके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है; सम्पूर्ण पदार्थ, क्रिया, भाव, व्यक्ति—सभी मृगतृष्णाकी अथवा स्वप्नकी सृष्टिकी तरह केवल मायामय ही है—इस प्रकारकी वृत्तिको हर समय अटल बनाये रखना। यह भाव यदि बुद्धिमें अच्छी तरह न बैठे तो वह सच्चिदानन्दघन परमात्मा सर्वत्र सदा परिपूर्ण है—इस प्रकार परमात्माकी सत्ताको ही प्रधान लक्ष्य बनाकर साधन किया जा सकता है।
सगुण-उपासनामें भेदभाव ही मुख्य है और भेदभावमें ऊँची-से-ऊँची स्थिति परमात्माके साकार स्वरूपके साक्षात् दर्शन होना है। इसके लिये निरन्तर साकार इष्टदेवके नामका जप और उनके स्वरूपका चिन्तन करना ही मुख्य साधन है। यदि साकार रूप ध्यानमें न आये, तो भी परम प्रेममय, परम दयालु भगवान् सदा सर्वत्र विराजमान हैं, वे मेरे साथ चलते हैं, मेरे साथ प्रत्येक कार्य करते हैं और मुझे अपने आज्ञानुसार चलते देखकर प्रसन्न होते रहते हैं तथा बड़ी ही कृपादृष्टिसे मुझे देख रहे हैं, मैं इस प्रकार उनकी कृपादृष्टिमें रहकर सदा प्रसन्न रहता हुआ उन्हींके आज्ञानुसार चलता हूँ। इस तरह भगवान् की सत्ताको लक्ष्य बनाकर भी साधन किया जा सकता है।
निर्गुण-सगुण—दोनों ही उपासनाएँ परमात्माकी सत्ताकी प्रधानता रखकर ही होती हैं, अत: ये सगुण-निराकारसे ही आरम्भ होती हैं। निर्गुण उपासनामें तो ज्यों-ज्यों दूसरी विजातीय—प्रकृतिकी सत्ता हटती जाती है और जीव-ब्रह्मका भेद मिटता जाता है तथा वृत्तियाँ सूक्ष्म होती चली जाती हैं, त्यों-ही-त्यों वह उपासना ऊँची—श्रेष्ठ मानी जाती है। सगुण-साकारकी उपासनामें ज्यों-ज्यों भगवान् का विग्रहरूप ध्यानमें आने लगता है अर्थात् वृत्तियाँ विशेषरूपसे भगवदाकार बनती जाती हैं, जितना ही भगवान् का स्वरूप वृत्ति और इन्द्रियोंका विषय होता चला जाता है, उतनी ही वह उपासना ऊँची—श्रेष्ठ मानी जाती है।
निर्गुण-निराकारको लक्ष्य करके उपासना करनेवाले पुरुषकी उपासनाकी पूर्णता होनेपर उसकी दृष्टिमें एक सच्चिदानन्दघन बोध-स्वरूप परमात्मा ही रह जाते हैं। परमात्माके सिवा अन्य किसी भी वस्तुका संकल्प भी नहीं रहता। उसके ज्ञानमें अपनी तथा संसारकी सत्ता परमात्मासे भिन्न नहीं रहती। ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय—सभी कुछ एक परमात्म-स्वरूप ही बन जाते हैं, तब वह कृतकृत्य हो जाता है।
सगुण-साकारकी उपासनाकी पूर्णता होनेपर भक्तको नेत्रोंसे भगवान् के दिव्य स्वरूपका साक्षात् दर्शन होता है, वह उनके विग्रहकी दिव्य गन्धका अनुभव करता है, उसमें भक्तोंके समस्त लक्षण घटने लग जाते हैं, जो कि भगवान् ने स्वयं गीता अध्याय १२में श्लोक १३ से १९ तक कहे हैं। तथा भगवान् के प्रत्यक्ष मिलनके समय जो भी घटनाएँ होती हैं, वे बादमें भी सत्य ही प्रमाणित होती हैं—जैसे ध्रुवजीको शङ्ख छुआनेपर समस्त शास्त्रोंका ज्ञान हो जाना आदि।
श्रीमद्भगवद्गीतामें भी अध्याय ३ श्लोक ३में परमात्माकी प्राप्तिके ये दो स्वतन्त्र मार्ग बतलाये हैं—(१) सांख्यनिष्ठा, (२) योगनिष्ठा। ये दोनों ही मार्ग एक-दूसरेसे पूर्व-पश्चिमकी भाँति अत्यन्त भिन्न हैं; किन्तु ऐसा होनेपर भी दोनोंके द्वारा प्रापणीय वस्तु एक ही है (गीता ५। ४-५)। सांख्ययोगी परमात्मासे अपनी कोई अलग सत्ता नहीं मानता तथा प्रकृतिसे उत्पन्न गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं—यों समझकर मन, इन्द्रिय और शरीरद्वारा होनेवाली समस्त क्रियाओंमें कर्तापनके अभिमानसे सर्वथा रहित होकर एक सच्चिदानन्दघन परमात्मामें ही अभिन्नभावसे नित्य स्थित रहता है। किन्तु कर्मयोगी साधनकालमें कर्म, कर्मफल, परमात्मा और अपनेको भिन्न-भिन्न मानकर फल और आसक्तिका त्याग करके भगवान् की आज्ञाके अनुसार भगवान् के लिये ही समस्त कर्मोंका आचरण करता है। इसलिये ये दोनों मार्ग एक-दूसरेसे सर्वथा भिन्न हैं।
इस प्रकार एक-दूसरेसे सर्वथा भिन्न होनेके कारण एक पुरुष एक समयमें ही दोनोंका अनुष्ठान एक साथ नहीं कर सकता। हाँ, किसीकी रुचि हो तो पहले कर्मयोगका साधन करके फिर सांख्ययोगका साधन कर सकता है; परन्तु सांख्ययोग योगनिष्ठाका अङ्ग नहीं बन सकता, क्योंकि सांख्ययोगमें अभेददृष्टि रहती है। तब वह भेदोपासनारूप योगनिष्ठाका अङ्ग कैसे बन सकता है। यदि किसी सांख्ययोगके साधन करनेवालेकी रुचि और मत बदल जाय और वह उस साधनको छोड़कर योगनिष्ठाका साधन करने लगे तो बात दूसरी है।
उपसंहार
परमात्मा वास्तवमें भेद-अभेद दोनोंसे रहित हैं। परमात्मा निर्गुण भी हैं, सगुण भी हैं; निराकार भी हैं, साकार भी हैं; व्यक्त भी हैं, अव्यक्त भी हैं और इन सबसे रहित तथा विलक्षण भी। जहाँ मन-बुद्धि नहीं पहुँच सकते, परमात्मा वहाँ भी हैं और परमात्माको लक्ष्य बनाकर मन-बुद्धिसे हम जिस किसी भी स्वरूपकी धारणा करते हैं, परमात्मा वहाँ भी हैं ही। इसलिये कोई भी मनुष्य परमात्माके इस तत्त्वको समझकर परमात्माकी प्राप्तिके लिये उनके किसी भी रूपको लक्ष्य बनाकर साधन करता है तो उसे परमात्माकी प्राप्ति अवश्य हो जाती है तथा वह प्राप्ति होनेके बाद ही असली स्वरूपको समझता है। पर वहाँ यह कहना भी नहीं बन सकता; क्योंकि वह स्थिति देश, काल, वस्तुसे अतीत है और वहाँ ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेयकी त्रिपुटी नहीं है। पर कोई यह समझे कि पहले परमात्माके इस तत्त्वको पूर्ण रीतिसे जान लिया जाय और पीछे उपासना की जाय तो यह नहीं हो सकता। क्योंकि पूर्णरूपसे परमात्माका तत्त्व जान लेना तो उनकी प्राप्तिके बाद ही होता है, पहले तो शास्त्रों, महात्माओंके वचनोंपर विश्वास कर मन-बुद्धिके द्वारा वैसा ही मान लेना पड़ता है। इसीको शास्त्रोंमें श्रद्धा कहा है तथा श्रद्धा-विश्वासपूर्वक की गयी उपासना ही साधकको वास्तविक तत्त्व पूर्णत: समझानेमें समर्थ होती है।
इसलिये साधकको भेद, अभेद या यों कहें कि भक्ति, ज्ञान इनमेंसे किसी भी एक मार्गको पकड़कर श्रद्धा और तत्परताके साथ उसे तय करनेमें जल्दी-से-जल्दी लग जाना चाहिये। यह मानव-शरीर बहुत ही दुर्लभ है और इससे ऐसा बड़ा भारी काम सिद्ध हो सकता है, जो कि देवयोनिमें भी सुलभ नहीं है। परंतु यह शरीर है अनित्य; इसलिये जल्दी ही सावधान होकर साधनमें लग जाना चाहिये; क्योंकि पारमार्थिक साधनके बिना केवल स्त्री, पुत्र, धन-जन, जमीन-मकान, भोग-सामग्रीके संग्रह और उपभोगमें ही समय बरबाद हो जाता है—जिससे पूर्वके पुण्य तथा पुण्यसे प्राप्त आयु तो नष्ट होती है, साथ ही आसक्ति और स्वार्थ रहनेके कारण न्याय-अन्यायका कोई खयाल न रहनेसे मनुष्य चौरासी लाख योनियों तथा नरक प्राप्त करानेवाले बड़े भारी पापोंको भी बटोरता रहता है और फलत: सदाके लिये दु:खी बन जाता है। भोगोंके उपभोगसे आयु नष्ट होती है, समय बरबाद होता है, अन्त:करणमें भोगोंके संस्कार जमते हैं, आदत बिगड़ जाती है, धन नष्ट होता है, पुण्य क्षीण होते हैं, शरीर निर्बल और रोगी हो जाता है; भोगोंमें ही रचे-पचे रहनेके कारण धर्मसञ्चय नहीं हो पाता और अन्यायसे भोग भोगनेपर तो पापोंका बोझ भी बढ़ता है। अत: इन असत् भोग-पदार्थोंकी तरफ लक्ष्य न रखकर दु:ख, अशान्ति, बन्धन, अल्पता, भय, उद्वेग, चिन्ता, शोक, जलन, ह्रास आदिका जहाँ अत्यन्त अभाव है, ऐसे ‘सत्’ स्वरूप परमानन्दमय परमात्माकी प्राप्तिके लिये शीघ्रातिशीघ्र अपना सारा बल लगाकर प्रयत्न करना चाहिये; क्योंकि यह शरीर अनित्य है, न जाने कब प्राण चले जायँ और यदि साधन न किया गया तो ऐसा मौका पुन: मिलना बहुत ही कठिन है। यह सुदुर्लभ मानव-शरीर और यह कलियुगका समय प्राप्त करके भी जो मनुष्य सावधान नहीं होता, वह महान् हानि उठाता है। श्रुति कहती है—
इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति
न चेदिहावेदीन्महती विनष्टि:।
भूतेषु भूतेषु विचित्य धीरा:
प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति॥
(केन० २।५)
‘यदि इस मनुष्य-शरीरमें ही उस परमात्म-तत्त्वको जान लिया तो सत्य है यानी उत्तम है; यदि इस जन्ममें उसको नहीं जाना तो महान् हानि है। धीर पुरुष सम्पूर्ण भूतोंमें परमात्माका चिन्तन कर, परमात्माको समझकर इस देहको छोड़ अमृतस्वरूप परमात्माको प्राप्त हो जाते हैं।’
इसलिये मनुष्यको उचित है कि उस परमात्मतत्त्वको जाननेके लिये महापुरुषोंकी शरणमें जाकर, सरल हृदयसे श्रद्धापूर्वक पूछकर उस तत्त्वको समझे और सब संदेहोंका समाधान करके किंकर्तव्य-विमूढ़ताको सर्वथा हटाकर उनके कहनेके अनुसार परमात्माकी प्राप्तिके लिये तत्पर हो जाय। श्रुतिभगवती घोषणा करती है—
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।
(कठ० १।३।१४)
‘उठो, जागो और श्रेष्ठ पुरुषोंको प्राप्तकर इस तत्त्वको जानो।’