भगवान् और उनकी दिव्य शक्ति

(१)

जो सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंसे अलग है, वह भगवान् की शुद्ध प्रकृति है। यह शुद्ध प्रकृति भगवान् का स्वकीय सच्चिदानन्दघन-स्वरूप है। इसीको संधिनी-शक्ति, संवित्-शक्ति और आह्लादिनी-शक्ति कहते हैं१। इसीको चिन्मयशक्ति, कृपाशक्ति आदि नामोंसे कहते हैं। श्रीराधाजी२, श्रीसीताजी आदि भी यही हैं। भगवान् को प्राप्त करानेवाली भक्ति और ब्रह्मविद्या भी यही है।

प्रकृति भगवान् की शक्ति है। जैसे, अग्निमें दो शक्तियाँ रहती हैं—प्रकाशिका और दाहिका। प्रकाशिका-शक्ति अन्धकारको दूर करके प्रकाश कर देती है तथा भय भी मिटाती है। दाहिका-शक्ति जला देती है तथा वस्तुको पकाती एवं ठण्डकको भी दूर करती है। ये दोनों शक्तियाँ अग्निसे भिन्न भी नहीं हैं और अभिन्न भी नहीं हैं। भिन्न इसलिये नहीं हैं कि वे अग्निरूप ही हैं अर्थात् उन्हें अग्निसे अलग नहीं किया जा सकता और अभिन्न इसलिये नहीं हैं कि अग्निके रहते हुए भी मन्त्र, औषध आदिसे अग्निकी दाहिका-शक्ति कुण्ठित की जा सकती है। ऐसे ही भगवान् में जो शक्ति रहती है, उसे भगवान् से भिन्न और अभिन्न—दोनों ही नहीं कह सकते।

जैसे दियासलाईमें अग्निकी सत्ता तो सदा रहती है, पर उसकी प्रकाशिका और दाहिका-शक्ति छिपी हुई रहती है, ऐसे ही भगवान् सम्पूर्ण देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदिमें सदा रहते हैं, पर उनकी शक्ति छिपी हुई रहती है। उस शक्तिको अधिष्ठित करके अर्थात् अपने वशमें करके उसके द्वारा भगवान् प्रकट होते हैं—‘प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया’ (गीता ४।६)। जैसे, जबतक अग्नि अपनी प्रकाशिका और दाहिका-शक्तिको लेकर प्रकट नहीं होती, तबतक सदा रहते हुए भी अग्नि नहीं दीखती, ऐसे ही जबतक भगवान् अपनी शक्तिको लेकर प्रकट नहीं होते, तबतक भगवान् सदा सर्वत्र वर्तमान रहते हुए भी नहीं दीखते।

राधाजी, सीताजी, रुक्मिणीजी आदि सब भगवान् की निजी दिव्य शक्तियाँ हैं और भगवत्स्वरूपा हैं। भगवान् सामान्यरूपसे सब जगह रहते हुए भी कोई काम नहीं करते। जब करते हैं, तब अपनी दिव्य शक्तिको लेकर ही करते हैं। उस दिव्य शक्तिके द्वारा भगवान् विचित्र-विचित्र लीलाएँ करते हैं। उनकी लीलाएँ इतनी विचित्र और अलौकिक होती हैं कि उन्हें सुनकर, गाकर और याद करके भी जीव पवित्र होकर अपना उद्धार कर लेते हैं।

निर्गुण-उपासनामें वही शक्ति ‘ब्रह्मविद्या’ हो जाती है और सगुण-उपासनामें वही शक्ति ‘भक्ति’ हो जाती है। जीव भगवान् का ही अंश है। जब वह दूसरोंमें मानी हुई ममता हटाकर एकमात्र भगवान् की स्वत:सिद्ध वास्तविक आत्मीयताको जाग्रत् कर लेता है, तब भगवान् की शक्ति उसमें भक्ति-रूपसे प्रकट हो जाती है। वह भक्ति इतनी विलक्षण है कि निराकार भगवान् को भी साकाररूपसे प्रकट कर देती है, भगवान् को भी खींच लेती है। वह भक्ति भी भगवान् ही देते हैं।

भगवान् की भक्तिरूप शक्तिके दो रूप हैं—विरह और मिलन। भगवान् विरह भी भेजते हैं* और मिलन भी। जब भगवान् विरह भेजते हैं, तब भक्त भगवान् के बिना व्याकुल हो जाता है। व्याकुलताकी अग्निमें संसारकी आसक्ति जल जाती है और भगवान् प्रकट हो जाते हैं। ज्ञानमार्गमें भगवान् की शक्ति पहले उत्कट जिज्ञासाके रूपमें आती है (जिससे तत्त्वको जाने बिना साधकसे रहा नहीं जाता) और फिर ब्रह्मविद्यारूपसे जीवके अज्ञानका नाश करके उसके वास्तविक स्वरूपको प्रकाशित कर देती है। परंतु भगवान् की वह दिव्य शक्ति, जिसे भगवान् विरहरूपसे भेजते हैं, उससे भी बहुत विलक्षण है। ‘भगवान् कहाँ हैं? क्या करूँ? कहाँ जाऊँ?’—इस प्रकार जब भक्त व्याकुल हो जाता है, तब यह व्याकुलता सब पापोंका नाश करके भगवान् को साकाररूपसे प्रकट कर देती है। व्याकुलतासे जितना शीघ्र काम बनता है, उतना विवेक-विचारपूर्वक किये गये साधनसे नहीं।

(२)

भगवान् अपनी प्रकृतिके द्वारा अवतार लेते हैं और तरह-तरहकी अलौकिक लीलाएँ करते हैं। जैसे अग्नि स्वयं कुछ नहीं करती, उसकी प्रकाशिका-शक्ति प्रकाश कर देती है, दाहिका-शक्ति जला देती है, ऐसे ही भगवान् स्वयं कुछ नहीं करते, उनकी दिव्य शक्ति ही सब काम कर देती है। शास्त्रोंमें आता है कि सीताजी कहती हैं—‘रावणको मारना आदि सब काम मैंने किया है, रामजीने कुछ नहीं किया।’

जैसे मनुष्य और उसकी शक्ति (बल) है, ऐसे ही भगवान् और उनकी शक्ति है। उस शक्तिको भगवान् से अलग भी नहीं कह सकते और एक भी नहीं कह सकते। मनुष्यमें जो शक्ति है, उसे वह अपनेसे अलग करके नहीं दिखा सकता, इसलिये वह उससे अलग नहीं है। मनुष्य रहता है, पर उसकी शक्ति घटती-बढ़ती रहती है, इसलिये वह मनुष्यसे एक भी नहीं है। यदि उसकी मनुष्यसे एकता होती तो वह उसके स्वरूपके साथ बराबर रहती, घटती-बढ़ती नहीं। अत: भगवान् और उनकी शक्तिको भिन्न अथवा अभिन्न कुछ भी नहीं कह सकते। दार्शनिकोंने भिन्न भी नहीं कहा और अभिन्न भी नहीं कहा। वह शक्ति अनिर्वचनीय है। भगवान् श्रीकृष्णके उपासक उस शक्तिको श्रीजी-(राधाजी-)के नामसे कहते हैं।

जैसे पुरुष और स्त्री दो होते हैं, ऐसे श्रीकृष्ण और श्रीजी दो नहीं हैं। ज्ञानमें तो द्वैतका अद्वैत होता है अर्थात् दो होकर भी एक हो जाता है और भक्तिमें अद्वैतका द्वैत होता है अर्थात् एक होकर भी दो हो जाता है। जीव और ब्रह्म एक हो जायँ तो ‘ज्ञान’ होता है और एक ही ब्रह्म दो रूप हो जाय तो ‘भक्ति’ होती है। एक ही अद्वैत-तत्त्व प्रेमकी लीला करनेके लिये, प्रेमका आस्वादन अर्थात् आनन्दित करनेके लिये, सम्पूर्ण जीवोंको प्रेमका आनन्द देनेके लिये श्रीकृष्ण और श्रीजी—इन दो रूपोंसे प्रकट होता है*। दो रूप होनेपर भी दोनोंमें कौन बड़ा है और कौन छोटा, कौन प्रेमी है और कौन प्रेमास्पद?—इसका पता ही नहीं चलता। दोनों ही एक-दूसरेसे बढ़कर विलक्षण दीखते हैं, दोनों एक-दूसरेके प्रति आकृष्ट होते हैं। श्रीजीको देखकर भगवान् प्रसन्न होते हैं और भगवान् को देखकर श्रीजी। दोनोंकी परस्पर प्रेम-लीलासे रसकी वृद्धि होती है। इसीको रास कहते हैं।

भगवान् की शक्तियाँ अनन्त हैं, अपार हैं। उनकी दिव्य शक्तियोंमें ऐश्वर्य-शक्ति भी है और माधुर्य-शक्ति भी। ऐश्वर्य-शक्तिसे भगवान् ऐसे विचित्र और महान् कार्य करते हैं, जिन्हें दूसरा कोई कर ही नहीं सकता। ऐश्वर्य-शक्तिके कारण उनमें जो महत्ता, विलक्षणता और अलौकिकता दीखती है, वह उनके सिवा और किसीमें देखने-सुननेमें नहीं आती। माधुर्य-शक्तिमें भगवान् अपने ऐश्वर्यको भूल जाते हैं। भगवान् को भी मोहित करनेवाली माधुर्य-शक्तिमें एक मधुरता, मिठास होती है, जिसके कारण भगवान् बड़े मधुर और प्रिय लगते हैं। जब भगवान् ग्वालबालोंके साथ खेलते हैं, तब माधुर्य-शक्ति प्रकट रहती है। यदि उस समय ऐश्वर्य-शक्ति प्रकट हो जाय तो सारा खेल बिगड़ जाय; ग्वालबाल डर जायँ और भगवान् के साथ खेल भी न सकें। ऐसे ही भगवान् कहीं मित्ररूपसे, कहीं पुत्ररूपसे और कहीं पतिरूपसे प्रकट हो जाते हैं तो उस समय उनकी ऐश्वर्य-शक्ति छिपी रहती है और माधुर्य-शक्ति प्रकट रहती है। तात्पर्य यह कि भगवान् भक्तोंके भावोंके अनुसार उन्हें आनन्द देनेके लिये ही अपनी ऐश्वर्य-शक्तिको छिपाकर माधुर्य-शक्ति प्रकट कर देते हैं।

जिस समय माधुर्य-शक्ति प्रकट रहती है, उस समय ऐश्वर्य-शक्ति प्रकट नहीं होती और जिस समय ऐश्वर्य-शक्ति प्रकट रहती है, उस समय माधुर्य-शक्ति प्रकट नहीं होती। ऐश्वर्य-शक्ति केवल तभी प्रकट होती है, जब माधुर्यभावमें कोई शङ्का पैदा हो जाय। जैसे, माधुर्य-शक्तिके प्रकट रहनेपर भगवान् श्रीकृष्ण बछड़ोंको ढूँढ़ते हैं, परंतु ‘बछड़े कहाँ गये?’ यह शङ्का पैदा होते ही ऐश्वर्य-शक्ति प्रकट हो जाती है और भगवान् तत्काल जान जाते हैं कि बछड़ोंको ब्रह्माजी ले गये हैं।

भगवान् में एक सौन्दर्य-शक्ति भी होती है, जिससे प्रत्येक प्राणी उनमें आकृष्ट हो जाता है। भगवान् श्रीकृष्णके सौन्दर्यको देखकर मथुरापुरवासिनी स्त्रियाँ आपसमें कहती हैं—

गोप्यस्तप: किमचरन् यदमुष्य रूपं

लावण्यसारमसमोर्ध्वमनन्यसिद्धम्।

दृग्भि: पिबन्त्यनुसवाभिनवं दुराप-

मेकान्तधाम यशस: श्रिय ऐश्वरस्य॥

(श्रीमद्भा० १०।४४। १४)

‘इन भगवान् श्रीकृष्णका रूप सम्पूर्ण सौन्दर्यका सार है, सृष्टिमात्रमें किसीका भी रूप इनके रूपके समान नहीं है। इनका रूप किसीके सँवारने-सजाने अथवा गहने-कपड़ोंसे नहीं, प्रत्युत स्वयंसिद्ध है। इस रूपको देखते-देखते तृप्ति भी नहीं होती; क्योंकि यह नित्य नवीन ही रहता है। समग्र यश, सौन्दर्य और ऐश्वर्य इस रूपके आश्रित हैं। इस रूपके दर्शन बहुत ही दुर्लभ हैं। गोपियोंने पता नहीं कौन-सा तप किया था, जो अपने नेत्रोंके दोनोंसे सदा इनकी रूप-माधुरीका पान किया करती हैं!’

शुकदेवजी कहते हैं—

निरीक्ष्य तावुत्तमपूरुषौ जना

मञ्चस्थिता नागरराष्ट्रका नृप।

प्रहर्षवेगोत्कलितेक्षणानना:

पपुर्न तृप्ता नयनैस्तदाननम्॥

पिबन्त इव चक्षुर्भ्यां लिहन्त इव जिह्वया।

जिघ्रन्त इव नासाभ्यां श्लिष्यन्त इव बाहुभि:॥

(श्रीमद्भा० १०। ४३। २०-२१)

‘परीक्षित्! मंचोंपर जितने लोग बैठे थे, वे मथुराके नागरिक और राष्ट्रके जन-समुदाय पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीको देखकर इतने प्रसन्न हुए कि उनके नेत्र और मुखकमल खिल उठे, उत्कण्ठासे भर गये। वे नेत्रोंद्वारा उनकी मुख-माधुरीका पान करते-करते तृप्त ही नहीं होते थे; मानो वे उन्हें नेत्रोंसे पी रहे हों, जिह्वासे चाट रहे हों, नासिकासे सूँघ रहे हों और भुजाओंसे पकड़कर हृदयसे लगा रहे हों!’

भगवान् श्रीरामके सौन्दर्यको देखकर विदेह राजा जनक भी विदेह अर्थात् देहकी सुध-बुधसे रहित हो जाते हैं—

मूरति मधुर मनोहर देखी।

भयउ बिदेहु बिदेहु बिसेषी॥

(मानस १।२१५।४)

और कहते हैं—

सहज बिरागरूप मनु मोरा।

थकित होत जिमि चंद चकोरा॥

(मानस १।२१६।२)

वनमें रहनेवाले कोल-भील भी भगवान् के विग्रहको देखकर मुग्ध हो जाते हैं—

करहिं जोहारु भेंट धरि आगे।

प्रभुहि बिलोकहिं अति अनुरागे॥

चित्र लिखे जनु जहँ तहँ ठाढ़े।

पुलक सरीर नयन जल बाढ़े॥

(मानस २।१३५।३)

प्रेमियोंकी तो बात ही क्या, वैरभाव रखनेवाले राक्षस खर-दूषण भी भगवान् के विग्रहकी सुन्दरताको देखकर चकित हो जाते हैं और कहते हैं—

नाग असुर सुर नर मुनि जेते।

देखे जिते हते हम केते॥

हम भरि जन्म सुनहु सब भाई।

देखी नहिं असि सुंदरताई॥

(मानस ३। १९। २)

तात्पर्य यह कि भगवान् के दिव्य सौन्दर्यकी ओर प्रेमी, विरक्त, ज्ञानी, मूर्ख, वैरी, असुर और राक्षसतक सबका मन आकृष्ट हो जाता है।