भक्त और आदर्श सन्तान कैसे हो?

बहुत-सी माता, बहिनें अपने सरल स्वभावसे यह समझ लेती हैं कि भक्त संतानको जन्म देना हमारे वशकी बात नहीं किन्तु ऐसी धारणा कभी नहीं करनी चाहिये। बहुत-सी ग्रामीण माताएँ यह भी मान लेती हैं कि हम छोटे-छोटे गाँवोंमें रहनेवाली हैं, हम क्या समझने या करने लायक हैं? इन माताओंकी यह सरलता और निरभिमानता बहुत ही सराहनीय है; परंतु निराशा कोई कामकी वस्तु नहीं। आप विश्वास रखें कि आप बहुत बड़ा काम कर सकती हैं। जितने भी स्त्री-पुरुष इस जगत् में हैं, सब-के-सब माँकी गोदमें ही पलकर आये हैं; अत: माँ सबसे प्रथम गुरु मानी जाती है। बालकका ऊँचे-से-ऊँचा और नीचे-से-नीचा काम माँ ही करती है; जैसे दाई, नाई, दर्जी, धोबी, शिक्षक आदिके काम। इसी हेतुसे ऋषि-मुनि भी बालकोंको पढ़ाकर, स्नातक बनाकर उन्हें घर भेजते समय दीक्षान्त-उपदेश देते हुए कहते हैं—

‘‘मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव।’’

‘देखो, बेटा! माँको, पिताको और आचार्यको साक्षात् परमेश्वरका रूप समझो।’

इस मन्त्रोपदेशमें सर्वप्रथम माताका ही स्थान है। अच्छे-अच्छे ऋषि-मुनि, महात्मा-धर्मात्मा, आदर्श और शूरवीर पुरुष माताओंसे ही जन्मे हैं। जो माता-बहिनें ऐसे भगवान् के प्यारे भक्त एवं आदर्श पुरुषोंको पैदा करना चाहें, उनको चाहिये कि वे अपने मनमें दृढ़ सङ्कल्प लेकर उत्तमोत्तम आचरण करें। उनके मनमें यह सदिच्छा होनी चाहिये कि हमारे बालक भगवान् के प्यारे और आदर्श पुरुष हों। नीतिमें भी वचन आते हैं—

गुणिगणगणनारम्भे न पतति कठिनी सुसम्भ्रमाद् यस्य।

तेनाम्बा यदि सुतिनी वद वन्ध्या कीदृशी नाम॥

(हितोपदेश)

‘गुणी जनोंकी गणना आरम्भ होनेपर जिसके लिये अङ्गुली वेगपूर्वक नहीं पड़ती, उस पुत्रसे यदि माता पुत्रवती कही जाय तो बताओ बाँझ कैसी होगी?’

जननी जणै तो संत जण, कै दाता कै सूर।

नहिं तो रहजे बाँझड़ी, मती गमाजे नूर॥

(संत-वाणी)

तिन्ह तें खर, सूकर, स्वान भले,

जड़ता बस ते न कहैं कछु वै।

‘तुलसी’ जेहि रामसों नेहु नहीं,

सो सही पसु पूँछ, बिषान न द्वै॥

जननी कत भार मुई दस मास,

भई किन बाँझ, गई किन च्वै।

जरि जाउ सो जीवनु, जानकीनाथ!

जियै जगमें तुम्हरो बिनु ह्वै॥

(कवितावली)

श्रेष्ठ माताओंका तो यहाँतक स्वाभिमान होता है कि ‘मेरे गर्भमें आकर, मेरा दूध पीकर क्या वह कभी गदही, कुतियाका दूध पीवेगा? वह तो सदाके लिये प्रभुचरण-कमलोंका रसास्वादन करता हुआ जगत् के जीवोंको भी प्रेमामृत प्रदान करता रहेगा।’ जिस माँका पुत्र भगवान् का प्यारा भक्त हो जाता है, वह माँ धन्यवादकी पात्र होती ही है, कृतकृत्य भी हो जाती है। यह माताओंके वशकी बात है, अत: हिम्मत न हारें। भगवत्कृपासे कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं है।

माता-बहिनोंसे यही कहना है कि जब आप मासिक रजोधर्मके बाद शुद्धिका स्नान करें तब प्रभुसे प्रार्थना करें कि ‘हे प्रभो! मुझे ऐसी संतान दें जो संसारका कल्याण करनेवाला, भगवान् का प्यारा भक्त हो।’ सच्चे हृदयसे जो प्रार्थना की जाती है भगवान् उसे पूरी करते हैं।

सच्चे हृदयसे प्रार्थना जो भक्त सच्चा गाय है।

भक्तवत्सल कानमें वह पहुँच झट ही जाय है॥

यह तो बाहरकी सामग्रीका आदर करके हमने अपने-आपको छोटा मान लिया है, कि हममें बुद्धि, योग्यता, विद्या, धन आदि पदार्थोंकी कमी है; पर यह खयाल नहीं करते कि हम परमात्माके हैं। जब हम परमात्माके हैं, तब बुद्धि आदिका मूल्य ही क्या रह जाता है? मनुष्य तुच्छ भावनासे ही अपनेको छोटा बना लेता है। सब-के-सब भाई-बहिन भगवान् के ही तो अंश हैं।

ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:।

(गीता १५।७)

संत तुलसीदासजीने भी यह बात कही है—

ईस्वर अंस जीव अबिनासी।

चेतन अमल सहज सुखरासी॥

हम प्रभुके हैं, अत: प्रभु हमारे हैं। तब प्रभुसे प्रार्थना इस प्रकार करें कि ‘हे प्रभो! कुलको उज्ज्वल करनेवाला एवं जगत् का उद्धार करनेवाला, भगवान् का प्यारा भक्त संतान दो। हे प्रभो! आपकी कृपासे जो भी संतान होगी, वह आपकी प्यारी भक्त संतान ही होगी।’ वृद्धा माताओंसे कहना है कि वे भी इस प्रकारका भाव रखें कि हमारी प्यारी पुत्रवधू एवं पुत्रीके जो भी संतान हो वह संत-भक्त ही जन्मे। इसीके साथ वृद्धा माताओंको उचित है कि अपनी सगर्भा बहू एवं पुत्रियोंका आदर करें, उनका प्यारसे पालन करें, भेदभावका बर्ताव न करें और तिरस्कार भी न करें। उनके रहन-सहन, भोजन एवं आचरणोंमें अशुद्धि भी न आने दें; पवित्र वातावरण रखें। संसारमें भक्त जन्में—इस दृष्टिसे संत-महात्माओंने भी सगर्भा बहिनोंका रक्षण-शिक्षण और पोषण भी किया है। जैसा कि भागवतमें आया है—

एक समय हिरण्यकशिपु तपस्या करनेके लिये वनमें चला गया। उसकी स्त्री कयाधू सगर्भा थी तो इन्द्रको भय लगा कि ‘इस राक्षसकी संतान राक्षस ही होगी, तब हम देवादिकोंको पिता और पुत्र दोनों ही कष्ट देंगे; अत: मैं इस सगर्भा कयाधूको कहीं ले जाकर इसके राक्षस गर्भका नाश क्यों न कर दूँ।’ इसी भावनासे इन्द्र हिरण्यकशिपुकी नगरीका विध्वंस करके कयाधूको ले जा रहा था। मार्गमें ही नारदजी मिल गये। नारदजीने कहा—‘इन्द्र! इस अबलाको क्यों दु:ख दे रहे हो?’ इन्द्रने उत्तर दिया—‘महाराज! इसके राक्षस पुत्र जन्मेगा, तब ये पिता-पुत्र दोनों देवादिकोंको विशेष दु:ख देंगे; इसलिये केवल इसके बालकको नष्ट करनेके लिये ही ले जा रहा हूँ।’ तब नारदजीने कहा—‘डरो मत। इसके गर्भसे तो राक्षस न होकर भगवान् का अनूठा प्यारा भक्त ही पैदा होगा।’ श्रीनारदजीके कहनेसे इन्द्रने कयाधूको छोड़ दिया। श्रीनारदजीने अहैतुकी कृपासे कयाधूको भक्ति, ज्ञान, वैराग्यकी शिक्षा दी; परंतु लक्ष्य रहता था गर्भस्थ बालककी ओर कि गर्भस्थ बालक भगवान् का भक्त बने। कयाधूसे भगवान् के अनन्य भक्त शिरोमणि प्रह्लाद उत्पन्न हुए। प्रह्लादजीने भी गर्भमें सुने हुए नारदजीके उपदेशका प्रसङ्ग अपनी पाठशालाके विद्यार्थियोंको बहुत ही विशदरूपसे सुनाया है; उसे श्रीमद्भागवत सप्तम स्कन्ध, अध्याय ६ में देख सकते हैं।

अत: सभी माताएँ अपनी सगर्भा बहू-पुत्रियोंको ऐसी अवस्थामें भगवान् की अच्छी-अच्छी कथाएँ सुनावें, पढ़ावें और भगवान् के सुन्दर-से-सुन्दर चित्र दिखावें तथा घरकी जैसी शक्ति हो, उसके अनुसार गायका दूध-घी, चावल, गेहूँ, मूँग, चीनी आदि शुद्ध, सात्त्विक वस्तुएँ खिलावें। लाल मिर्च, राई आदि, बाजारकी बनी मिठाइयाँ तथा तीक्ष्ण, कड़वे, रूखे-सूखे पदार्थ न खिलावें; क्योंकि सगर्भा बहिनके किये हुए भोजनका प्रभाव गर्भस्थ बालकपर अवश्य ही पड़ता है। इन पदार्थोंसे गर्भस्थ बालकके जलन होती है और उसके स्वभावमें भी चिड़चिड़ापन आदि कई प्रकारके दोष आ जाते हैं। गर्भावस्थामें माताओंको नाना प्रकारकी वस्तुएँ खानेकी मनमें आती रहती है, जिससे वे दीवालका चूना, पाण्डु, मुल्तानी मिट्टी एवं कोयला आदितक खा लेती हैं। इसलिये वृद्धा माताओंको गर्भवती बहू-बेटियोंका पूरा-पूरा खयाल रखना चाहिये तथा उनकी रुचिके अनुसार यथाशक्ति बढ़िया एवं पवित्र वस्तुएँ खानेको देनी चाहिये। अच्छे-अच्छे शास्त्रोंको तथा अच्छी-अच्छी बातोंको सुनाना चाहिये। ऐसा करनेसे उनके चित्तमें प्रसन्नता होगी। चित्तकी प्रसन्नतासे बालकपर अच्छे संस्कार पड़ेंगे। विशेष बात यह है—बहिनोंको चाहिये कि भगवान् को हर समय याद करें। ‘मेरे हृदयमें भगवान् विराजमान हैं, बालकपर भगवान् की कृपा है तथा भगवान् मस्तकपर हाथ रखे हुए रक्षा कर रहे हैं’—ऐसी भावनाएँ वे निरन्तर करती रहें। भगवान् की कृपादृष्टिको देखती रहें। इससे बालकके भाव तो पवित्र बनते ही हैं, साथ-ही-साथ गर्भस्थ बालककी भगवत्कृपासे रक्षा भी होती रहती है।

श्रीमद्भागवतमें राजा परीक्षित् ने कहा है—

द्रौण्यस्त्रविप्लुष्टमिदं मदङ्गं

सन्तानबीजं कुरुपाण्डवानाम्।

जुगोप कुक्षं गत आत्तचक्रो

मातुश्च मे य: शरणं गताया:॥

(१०।१।६)

‘मेरा यह शरीर अश्वत्थामाके अस्त्रसे नष्ट हो गया था; यही कौरव-पाण्डव-कुलमें संततिका बीज था; मेरी माता उत्तरा भगवान् की शरणमें गयीं और भगवान् ने माँके गर्भमें प्रवेश करके हाथमें चक्र लेकर मेरी रक्षा की।’

यह प्रसङ्ग इस प्रकार है। महाभारत-युद्धमें पाण्डवोंकी विजय कराके अन्तर्यामी श्रीकृष्ण द्वारकाके लिये प्रस्थानकी तैयारी कर रहे थे। इतनेमें ही सगर्भा उत्तरा मानो धधकती ज्वालाकी लपटोंसे झुलसती हुई-सी सहसा श्रीकृष्णके समक्ष रो पड़ी और बोली—

कामं दहतु मां नाथ मा मे गर्भो निपात्यताम्॥

(श्रीमद्भा० १।८।१०)

‘नाथ! यह अस्त्रजनित अग्नि मुझे चाहे जलाकर भस्म कर दे, किंतु मेरे गर्भको न गिरावे।’

तब भगवान् ने अपने अलौकिक प्रभावसे उत्तराके गर्भमें प्रवेश करके गर्भस्थ बालककी रक्षा की। इस प्रसङ्गको माताएँ याद रखें और हर समय यह भावना करती रहें कि मेरे गर्भसे भगवान् का प्यारा भक्त पैदा होगा। यही नहीं, साक्षात् भगवान् ही मेरे गर्भमें पधारे हैं।

‘मीराँ किस दिन बेटा जाया।’—मीराके पुत्र तो नहीं हुआ, पर उसने भगवान् को ही प्रियतम मानकर भगवान् की प्राप्ति कर ली।*

इसी प्रकार सभी माता-बहिनें भगवान् के साथ अपनापन रखें, उनके साथ प्यारे-से-प्यारे स्वत:सिद्ध सम्बन्धको स्वीकार करें। भगवान् को पति मानें, पुत्र मानें, पिता मानें, जो चाहे सो मानें; क्योंकि भगवान् के सिवा और है क्या? भगवान् ही तो सब नाम-रूपोंमें हैं। जैसे, वत्सहरणके समय ब्रह्माजीको भगवान् ने लीला दिखायी थी।

यावद् वत्सपवत्सकाल्पकवपुर्यावत् कराङ्‍घ्ररॺादिकं

यावद् यष्टिविषाणवेणुदलशिग् यावद् विभूषाम्बरम्।

यावच्छीलगुणाभिधाकृतिवयो यावद् विहारादिकं

सर्वं विष्णुमयं गिरोऽङ्गवदज: सर्वस्वरूपो बभौ॥

(श्रीमद्भा० १०।१३।१९)

‘वे बालक और बछड़े संख्यामें जितने थे, जितने छोटे-छोटे उनके शरीर थे, उनके हाथ-पैर जैसे-जैसे थे, उनके पास जितनी और जैसी छड़ियाँ थीं, जितने सींग, बाँसुरी और पत्ते थे, जैसे और जितने वस्त्राभूषण थे, उनके शील, स्वभाव, गुण, नाम, रूप और अवस्थाएँ जैसी थीं, जिस प्रकार वे खाते-पीते और चलते थे, ठीक वैसे ही और उतने ही रूपोंमें सर्वस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण प्रकट हो गये। उस समय ‘यह सम्पूर्ण जगत् विष्णुरूप है’ यह वेदवाणी मानो मूर्तिमती होकर प्रकट हो गयी।’

जनकपुरमें रहनेवाली ब्राह्मणी—भक्तराज परमहंस मामा प्रयागदासजीकी माँ—श्रीसीताजीको अपनी प्यारी पुत्री एवं भगवान् श्रीरामको दामाद मानती थीं। उसी तरह माता-बहिनें भी श्रीभगवान् को दामाद भी मान सकती हैं तथा प्यारे-से-प्यारे मनचाहे सम्बन्धको स्वीकार कर सकती हैं। एक साधारण सिपाही भी राज्यकर्मचारी होनेके नाते अपने-आपको बड़ा समझता है, तब सर्वशक्तिमान्, सर्वव्यापी, सर्वसुहृद् भगवान् का सहारा लेनेवाला कितना बड़ा हो सकता है! संसारका सहारा तथा सम्बन्ध तो अनित्य, झूठा तथा अभिमानको बढ़ानेवाला होता है; किंतु भगवान् का सहारा और सम्बन्ध वास्तविक तथा नित्य है। वह निरभिमानता आदि दिव्य गुणोंको प्रकट करनेवाला है। कोई माने चाहे न माने, भगवान् तो अपने हैं ही।

सभी माता-बहिनें भगवान् के नामका हर समय जप करें, स्वरूपका ध्यान करें, लीलाओंको याद करें। भारतीय माताएँ प्रात:काल उठते ही भगवन्नाम-कीर्तन करती हैं, लीलाएँ गाया करती हैं। चक्की पीसते समय, दधि-मन्थन (बिलौना) करते समय बच्चे माताओंकी गोदमें जाकर लेट जाया करते हैं। बालक भगवान् की लीला-संकीर्तन सुनते हैं, इससे उनपर बहुत अच्छा असर पड़ता है। एक उच्च कोटिके संत कहते थे कि मेरी माँ प्रात:काल सबेरा होनेसे पूर्व चक्की चलाते समय भगवान् की लीलाएँ, भगवद्भक्तोंके चरित्र गाती तथा संकीर्तन करती हुई ही बिलौना करतीं, तब मैं गोदमें जाकर बैठ जाता। वे भगवान् का यश-कीर्तन सुनातीं, इससे मुझपर बहुत अच्छा असर पड़ा।

अत: इन बातोंको माता-बहिनें धारण करें। सत्सङ्गकी बातोंपर सबका—मानवमात्रका समान अधिकार है; जो सुनना चाहे, उसका विशेष अधिकार है।

राम दड़ी चौड़े पड़ी, सब कोइ खेलो आय।

दावा नहिं है संतदास, जीते सो ले जाय॥

ये बातें कठिन नहीं हैं; क्योंकि हम भगवान् के हैं, भगवान् हमारे हैं, अत: हम छोटे नहीं हैं, न दु:खी हैं। बाहरकी वस्तुओंका सहारा लेनेवाले बड़े-से-बड़े भी गरीब ही हैं—

को वा दरिद्रो हि विशालतृष्ण:।

(शंकराचार्यकृत प्रश्नोत्तरी)

बाहरका तो राज्य भी कोई बड़ी वस्तु नहीं है; क्योंकि आँखें मुँद जानके बाद कुछ नहीं रहता।

सम्मीलने नयनयोर्न हि किञ्चिदस्ति।

(भर्तृहरिकृत वैराग्यशतक)

अत: भगवान् का सम्बन्ध ही महान् है और वह सदासे नित्य सिद्ध है—ऐसा उत्तम भाव धारण करें।

जब बालकका जन्म हो जाय तो अभिभावकोंको नाल-छेदनके पूर्व वैदिक-विधानपूर्वक जात-संस्कारके साथ चारों वेदोंका पठन, नान्दीमुखश्राद्ध वर्णाश्रम-विधानके अनुसार अवश्य ही कराना चाहिये तथा भगवन्नाम-ध्वनि, कीर्तन, कथाएँ सुनानी चाहिये।

इसी प्रकार नामकरण-संस्कार आदि भी करावें तथा बालकोंके नाम ज्यौतिष मतानुसार अक्षरोंको आदिमें लेकर भगवत्सम्बन्धी रखें; जैसे गोविन्दलाल, रामचन्द्र, हरिकृष्ण; कन्या हो तो गङ्गा, यमुना, शारदा, सरस्वती, गायत्री आदि।

बड़े दु:खका विषय है कि होनहार भारतीय संतानोंकी माताएँ और अभिभावक गर्भस्थ बालकपर निरे बुरा असर डालनेवाले कुसंस्कारोंसे पूर्ण आचरण करते हैं। वास्तवमें माताओं और अभिभावकोंका ऐसा बुरा लक्ष्य तो नहीं रहता, परन्तु अनभिज्ञता और स्वभाववश सगर्भा बहिनें एवं अभिभावक मनोरञ्जनार्थ झूठे जासूसी उपन्यास पढ़ते हैं एवं ऐसे ही कुत्सित चित्रों तथा सिनेमाको देखते हैं। रात्रिक्लबोंमें तथा अशुद्ध स्थानोंमें जाकर अपवित्र खान-पान भी करते हैं। अनेक नर-नारी असभ्य वेष-भूषामें निर्लज्जतापूर्वक नाच-गान, खेल-कूद भी करते रहते हैं। बच्चोंके जन्मकालमें भी पाश्चात्त्य सभ्यताके अनुसार उत्सव मनाते हुए फालतू एवं पापप्रद खान-पान तथा मनोरञ्जन करते हैं। आजकल लोग बालकोंके नाम भी निकृष्ट ढंगके रखने लगे हैं तथा बालकोंसे भी हीन शब्दोंका उच्चारण कराते हैं; जैसे डेडी, पापा, मम्मी आदि। किंतु ऐसे निकृष्ट शब्दोंका उच्चारण न कराके पिताजी, बापूजी, माताजी, माँ आदि उत्कृष्ट सम्बोधनोंकी ही आदत डालनी चाहिये।

माताएँ, बहिनें और भाई बालकोंको भोला न समझें। ‘यह छोटा है, कुछ दिनों एवं कुछ महीनोंका है, यह अबोध है’—ऐसा समझकर बालकके सामने किसी भी प्रकारका अनुचित आचरण एवं कुचेष्टा न करें। यों तो सारा ही जीवन सभी समय पवित्र आचरणोंसे युक्त ही होना चाहिये, परंतु बालकके सामने तो विशेषतासे पवित्र और सुन्दर आचरण होना आवश्यक है। अत: आदर्श आचरण करें, उनके सामने यह भाव ही न आने दे कि स्त्री-पुरुष क्या हैं? हमलोग बालक थे, तब आपसमें पूछा करते—‘तुम कहाँसे आये?’ उस समय हमलोग परस्पर यही कहते—‘हम तो रामजीकी वर्षासे आये हैं।’ कितने पवित्र संस्कार थे, कितना पवित्र भाव था! छोटा-सा बालक समझता नहीं, परंतु उसपर अदृश्य रूपसे संस्कार अवश्य पड़ते हैं।

स्त्री-पुरुषोंको चाहिये कि बालकोंसे प्यार करते, खेलाते-बहलाते समय भी झूठी बातें न कहें, सच्ची बातें ही प्यारपूर्वक कहें। एक कहानी सुनी हुई है। एक वैश्य जातिका बालक था। वह एक दिन अपने पिताके पास दूकानपर गया। उसके पिता वहाँ रोकड़ गिन रहे थे। वह मुट्ठीमें पाँच रुपयोंका एक नोट दबाकर ले आया। रोकड़ मिलायी गयी, पाँच रुपये कम हो गये। मालिकने सोचा—‘बाहरका कोई व्यक्ति आया नहीं, क्या बात है!’ बालकसे पूछा—‘रुपये तुम्हारे पास हैं क्या?’ उसने कहा—‘बुच्ची ले गयी।’ बालकको धमकाया गया। तब वह बोल उठा—‘मुझे क्यों पीटते हैं? आप उस दिन दो आम लाये थे, तब आमको देखते ही मैंने एक आम ले लिया, दूसरा फिर माँगा तो माताजीने हाथ ऊपरकी ओर करके ‘आम बुच्ची ले गयी’ कहकर आमको अपने कपड़ोंमें छिपा लिया। उसी समय दूध उफनने लगा तो माँ दूधकी ओर दौड़ पड़ी’ आम झटसे माँके कपड़ोंमेंसे गिर गया। यह बुच्चीकी झूठी बात सामने आ गयी। मुझपर यही असर पड़ा कि ऐसे ही रुपये बुच्ची ले जाती है।’ अत: इस कहानीसे यह शिक्षा मिलती है कि बालकोंको अबोध समझकर उनसे झूठी बातें कभी भी न कहें। बालकके मनमें अपवित्र संस्कार न पड़ने पावें इसके लिये उसके समक्ष मुँहसे गाली कभी न निकालें। बच्चे आपकी असली धरोहर हैं, भावी संसार हैं, देशकी आधारशिला हैं। बच्चेके सामने आप जो कुछ भी कहेंगे या करेंगे, उसका संस्कार बच्चेपर अमिट रूपसे पड़ जायगा। जैसे कुम्हार कच्चे घड़ेपर जो भी चित्रण करके घड़ेको आवामें पका लेता है, फिर वह चित्र मिटता नहीं। यह उदाहरण तो गर्भस्थ बालकके लिये है। छोटे बच्चेके लिये उदाहरण है मिट्टीका नया घड़ा, जिसमें पहली बार जल भरकर ऊपर कोयलेसे कुछ लिख दिया जाय तो वह लेख कभी मिटेगा नहीं।

यन्नवे भाजने लग्न: संस्कारो नान्यथा भवेत्।

अभिप्राय यह कि गर्भसे लेकर चार-पाँच वर्षके छोटे बच्चेपर संस्कार स्थायी रूपसे अवश्य पड़ेगा; अत: माता-पिता आदिकोंको उचित है कि वे मर्यादा एवं सभ्यतासे रहें, किसी भी प्रकारका असद् आचरण कभी न करें। आज जो छोटे-छोटे बालकोंमें चरित्रहीनता देखी जाती है इसका कारण क्या है? माँ-बाप, भाई-भौजाईकी असावधानीसे किये उनके असद् आचरणोंका बालकोंपर बहुत बुरा असर पड़ता है।

कुछ वर्षों पूर्व तो आठ-दस वर्षके बच्चे नंगे खेलते, घूमते रहते थे। आज दो-तीन वर्षके बच्चेको भी प्राय: नंगा नहीं रखते। माताएँ थोड़े-से सयाने बालकको खेलाती हुई कहती हैं—‘तुम्हारे बहू लायेंगे, कानी पत्नी लायेंगे।’ इस शब्दमात्रसे ही बालकका बड़ा भारी अहित होता है। बहुत-सी बातें हैं। आप सब गृहस्थ आश्रममें रहनेवाले जानते भी हैं।

अतएव अपने बालक-बालिकाएँ श्रेष्ठ बनें—इस ओर दृष्टि रखें। जब आप अपना चरित्र अच्छा रखेंगे तो बालकोंपर स्वाभाविक ही अच्छा असर पड़ेगा। इसमें मुख्य बात तो है—भगवान् के चरणोंका आश्रय, उनके साथ अपनापन, उनपर विश्वास और भरोसा रखते हुए उनके नामका जप, परोपकार, सेवा-परायणता, निरभिमानता, धैर्य, उत्साह, क्षमा आदि दिव्य गुणोंका धारण और आचरण आपके द्वारा हो तथा यह विश्वास हो कि ‘भगवान् मेरे हैं और मैं भगवान् का हूँ एवं उनकी कृपासे ही मुझमें ऐसे दिव्य गुण, सदाचार आदि आये हैं और अब भी आ रहे हैं।’ मीराकी महिमा क्यों है? उसे दृढ़ विश्वास था—‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।’ अत: भगवान् के श्रीचरणोंमें ही मेरापन हो। विश्वास रखें, भगवान् के सिवा कोई अपना नहीं। सत्संगरूपी गङ्गासे विश्वासरूपी गङ्गाजल ले जायँ। भगवान् पर विश्वास हो गया, क्षणभङ्गुर शरीर और संसारपरसे विश्वास चला गया तो जीवन सफल हो गया। हमलोग भगवान् के विश्वासपात्र हो जायँ तो वे हमलोगोंपर विश्वास कर लेंगे। भगवान् का स्वभाव है—

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।

(गीता ४।११)

‘जो जैसे मुझे भजते हैं, उन्हें वैसे ही मैं भजता हूँ।’ जहाँ विश्वास हुआ वहीं भगवान् प्रकट हो जायँगे। ऐसी जगह कोई है ही नहीं, जहाँ भगवान् नहीं हैं। जिन्होंने विश्वास कर लिया, उन भक्तोंके सामने भगवान् प्रकट हो गये।

सत्यं विधातुं निजभृत्यभाषितं

व्याप्तिं च भूतेष्वखिलेषु चात्मन:।

अदृश्यतात्यद्भुतरूपमुद्वहन्

स्तम्भे सभायां न मृगं न मानुषम्।

(श्रीमद्भा० ७।८।१८)

‘अपने सेवक प्रह्लाद तथा ब्रह्माकी वाणी सत्य करने और सम्पूर्ण पदार्थोंमें अपनी व्यापकता दिखलानेके लिये सभाके भीतर उस खंभेमें बड़ा ही विचित्र रूप धारण करके भगवान् प्रकट हुए। वह रूप न तो पूरा-पूरा सिंहका था और न मनुष्यका ही।

आदि अंत जन अनत के, सारै कारज सोय।

जहँ जिव उर नहचौ धरै, तेहिं ढिग परगट होय॥

अत: सभी माता-बहिनें स्वीकार कर लें कि भगवान् मेरे हैं और मैं भगवान् का ही काम करती हूँ। रसोई बनावें तो भगवान् के लिये ही बनावें, भगवान् के ही भोग लगावें, भगवान् का नाम लेते हुए ही भगवान् का ही प्रसाद पावें। श्रीगोस्वामीजी कहते हैं—

तुम्हहि निबेदित भोजन करहीं।

प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं॥

कोई भी नयी वस्तु काममें लें तो भगवान् की आज्ञा लेकर भगवान् के अर्पण करके प्रसादी रूपसे लें। अन्न वह पवित्र होता है, जो शुद्ध पैसेसे अर्जित हो, जिसमें सामग्री पवित्र हो, जो भगवान् को स्मरण करते हुए बड़ी पवित्रतासे भगवान् के लिये ही बनाया जाय एवं जो सिद्ध होनेपर बलिवैश्वदेवयज्ञ करके प्रभुके भोग लगाकर प्रत्येक ग्रासमें प्रभुको याद करते हुए प्रसादरूपसे पाया जाय। इस प्रकार भोजन करनेवाला मनुष्य अन्नके दोषोंसे दूषित नहीं होता। कहा भी है—

कवले कवले कुर्वन् रामनामानुकीर्तनम्।

य: कश्चित् पुरुषोऽश्नाति सोऽन्नदोषैर्न लिप्यते॥

अन्न पवित्र होनेसे मन पवित्र हो जाता है। जब रसना जीत ली जाती है तो सम्पूर्ण इन्द्रियाँ वशमें हो जाती हैं।

तावज्जितेन्द्रियो न स्याद् विजितान्येन्द्रिय: पुमान्।

न जयेद् रसनं यावज्जितं सर्वं जिते रसे॥

(श्रीमद्भा० ११।८।२१)

‘मनुष्य अन्य सब इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर लेनेपर भी तबतक जितेन्द्रिय नहीं हो सकता, जबतक रसनेन्द्रियको अपने वशमें नहीं कर लेता। और यदि रसनेन्द्रियको वशमें कर लिया, तब तो मानो सभी इन्द्रियाँ वशमें हो गयीं।’

प्रत्येक काम करते समय भगवान् का नाम लेते रहें, खाली समय न जाने दें। जो लोग कहते हैं—‘भगवान् का भजन कब करें?’ वे अपने काम-धंधेके सिवा जो समय निकम्मा जाता है उसमें भी यदि सावधानीपूर्वक भजन करें तो बहुत भजन हो सकता है। और यदि काम धंधेको अपना न समझकर भगवान् का ही मान लें, तब तो स्वाभाविक ही सब समय भजन हो जाता है। अत: ज्यों-त्यों, जिस किसी भी प्रकार भगवान् को याद करें—‘तस्मात् केनाप्युपायेन मन: कृष्णे निवेशयेत्।’ भगवान् स्वयं कहते हैं—‘मामनुस्मर।’ (गीता ८।७)

सन्तोंने भी कितना सुन्दर कहा है—

हाथ काम मुख राम है, हिरदय साँची प्रीत।

जन दरिया गृह साधु की, आ ही उत्तम रीत॥

हल हांके हरि को भजे, श्रद्धा माफिक देय।

इतने में हरि ना मिले, मुजरा हम से लेय॥

उद्यम कर उदर भरे, मुख सूं जापे नाम।

ऐसा मौका ना मिले, तो करोड़ो खरचे दाम॥

एक दिन एक सज्जनने एकान्तमें पूछा—‘महाराजजी! मेरे मनमें आती है कि मैं भगवान् को माँ कह सकता हूँ क्या! माँ मुझे बहुत मीठी लगती है।’ मैंने कहा—‘खूब कह सकते हो यही नहीं, उसकी गोदमें खेलो।’ जगद्वन्द्य श्रीशंकराचार्यजी कहते हैं।

मायाहस्तेऽर्पयित्वा भरणकृतिकृते मोहमूलोद्भवं मां

मात: कृष्णाभिधाने चिरसमयमुदासीनभावं गतासि।

कारुण्यैकाधिवासे सकृदपि वदनं नेक्षसे त्वं मदीयं

तत्सर्वज्ञे न कर्तुं प्रभवति भवती किं नु मूलस्य शान्तिम्॥

(प्रबोधसुधाकर)

‘हे कृष्ण नामवाली मातेश्वरि! मोहरूपी मूलनक्षत्रमें उत्पन्न हुए मुझ पुत्रको भरण-पोषणके लिये मायाके हाथोंमें सौंपकर तू बहुत दिनोंसे मेरी ओरसे उदासीन हो गयी है। अरी करुणामयी माँ! तू एक बार भी मेरा मुख नहीं देखती? हे सर्वज्ञे! क्या तू उस मोहरूपी मूलकी शान्ति करनेमें समर्थ नहीं है?’

बस, आजसे ही भगवान् को माँ मान लें। सच्ची और सदाकी माँ मिल गयी; बस भूल मिट गयी। भगवान् का भजन करें, भगवान् को माँ समझकर पुकारें। माँसे जो चाहें सो कह सकते हैं। भागवतमें आया है—

अकाम: सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधी:।

तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम्॥

(२।३।१०)

‘चाहे निष्काम हो या सम्पूर्ण कामनाओंसे युक्त हो अथवा मोक्षकी कामना हो, बुद्धिमान् पुरुषको तो तीव्र भक्तियोगके द्वारा पुरुषोत्तम भगवान् की ही आराधना करनी चाहिये।’

तात्पर्य यह कि कुछ भी नहीं चाहिये तो भगवान् का भजन करे, सब कुछ चाहिये तो भगवान् का भजन करे और मोक्ष चाहिये तो भगवान् का भजन करे। भजन तो संजीवनी बूटी है, ऐसी उत्तम वस्तु है! इसपर ध्यान न देनेके कारण ही लोग अभाव और दु:ख भोग रहे हैं। भगवान् को छोड़कर संसारसे आशा लगा रखी है कि ये निहाल कर देंगे, वे निहाल कर देंगे आदि। जिनके स्वयंके कमी-ही-कमी है, जो स्वयं नाशवान् और दु:खी हैं, वे क्या निहाल कर देंगे।

भक्त प्रह्लादने असुरबालकोंसे कहा है—

राय: कलत्रं पशव: सुतादयो

गृहा मही कुञ्जरकोशभूतय:।

सर्वेऽर्थकामा: क्षणभङ्गुरायुष:

कुर्वन्ति मर्त्यस्य कियत् प्रियं चला:॥

(श्रीमद्भा० ७।७।३९)

‘अरे भाई! धन, स्त्री, पशु, पुत्र-पुत्री, महल, पृथ्वी, हाथी, खजाना और भाँति-भाँतिकी विभूतियाँ—और तो क्या, संसारका समस्त धन तथा भोग-सामग्रियाँ इस क्षणभङ्गुर मनुष्यको क्या सुख दे सकती हैं; वे स्वयं ही क्षणभङ्गुर हैं।’

श्रीतुलसीदासजी विनयपत्रिकामें कहते हैं—

देव, दनुज, मुनि, नाग, मनुज, सब माया-बिबस बिचारे।

तिनके हाथ दास तुलसी प्रभु, कहा अपनपौ हारे॥

इसलिये इस भावको सुदृढ़ रखें कि मैं तो केवल भगवान् का दास हूँ, मुझे भगवान् की ही सेवा करनी है। पहलेकी भूलको भगवान् नहीं गिनते, अत: उसकी चिन्ता न करें। बच्चा माँका कितना ही कसूर कर दे, जब बच्चा रो देगा तो माँ हृदयसे लगा लेगी। यह माँमें स्नेह कहाँसे आया? प्रभुसे ही तो आया है। बस, रो पड़ो, भगवान् से कह दो—‘ये विचार मेरे हैं, आपको निभाना पड़ेगा।’

‘आया हूँ शरणमें निभाना पड़ेगा।’

भगवान् की कृपादृष्टिसे आप निर्मल हो जायँगे।

गीतामें भगवान् श्रीकृष्णने कहा है—

अपि चेत् सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।

साधुरेव स मन्तव्य: सम्यग्व्यवसितो हि स:॥

(९।३१)

‘यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभावसे मेरा भक्त होकर मुझको भजता है तो वह साधु ही माननेयोग्य है; क्योंकि वह यथार्थ निश्चयवाला है अर्थात् उसने भलीभाँति निश्चय कर लिया है कि परमेश्वरके भजनके समान अन्य कुछ भी नहीं है।’

कैसा सीधा, सरल और सुगम पथ है!

श्रीरामचरितमानसमें भगवान् श्रीराम भी अपनी प्रजाको उपदेश देते हुए कहते हैं—

कहहु भगति पथ कवन प्रयासा।

जोग न मख जप तप उपवासा॥

इसमें न तो योगाभ्यासकी आवश्यकता है और न अन्य कोई कठिनता है। इसमें मुख्य हेतु यही है कि भगवान् को केवल सरल स्वभाव ही बड़ा अच्छा लगता है।

सरल सुभाव न मन कुटिलाई।

जथा लाभ संतोष सदाई॥

अत: प्रभु जो कुछ दे दें, जैसे परिवारमें रखें, जिस परिस्थितिमें रखें, उसीमें भगवान् की कृपा मानें, दूसरी ओर ताकें ही नहीं।

मोर दास कहाइ नर आसा।

करइ तौ कहहु कहा बिस्वासा॥

यदि भगवान् का होकर दूसरोंकी ओर ताकता है तो भगवान् का विश्वास कैसा! अत: प्रभुके चरणोंका आश्रय लेकर निश्चिन्त और निर्भय हो जायँ। प्रभुकी कृपासे प्रभुके प्यारे भक्त जन्मेंगे। हम भी प्रभुकी कृपासे उन्हींके प्यारे हैं। हमें तो उन्हींकी चर्चा सुनना-कहना है। भजन करनेपर हमारी क्या दशा होगी—इसकी चिन्ता हमें है ही नहीं। हम तो उन्हींके हैं, उन्हींके आश्रित!

काहू के बल भजन को, काहू के आचार।

ब्यास भरोसे कुँवरि के, सोवत पाँव पसार॥

एक भरोसो एक बल, एक आस बिस्वास।

एक राम घनश्याम हित, चातक तुलसीदास॥