भक्तशिरोमणि श्रीहनुमान् जी की दास्य-रति

भगवान् की मंगलमयी अपार कृपासे भारतभूमिपर अनन्तकालसे असंख्य ऋषि, सन्त-महात्मा, भक्त होते रहे हैं। उनमें भक्तशिरोमणि श्रीहनुमान् जी महाराजका विशेष स्थान है। वानर-जैसी साधारण योनिमें जन्म लेकर भी अपने भावों, गुणों और आचरणोंके द्वारा हनुमान् जी ने प्राणिमात्रका जो परम हित किया है एवं कर रहे हैं, उससे लोग प्राय: परिचित ही हैं। उनके उपकारसे कोई भी प्राणी कभी उऋण नहीं हो सकता। भगवान् श्रीरामके प्रति उनकी जो दास्य-भक्ति है, उसका पूरा वर्णन करनेकी सामर्थ्य किसीमें भी नहीं है। फिर भी समय सार्थक करनेके लिये उसका किंचित् संकेत करनेकी चेष्टा की जा रही है।

अपने-आपको सर्वथा भगवान् के समर्पित कर देना, उनके मनोभाव, प्रेरणा अथवा आज्ञाके अनुसार उनकी सेवा करना, उनको निरन्तर सुख पहुँचानेका भाव रखना तथा बदलेमें उनसे कभी कुछ न चाहना—यही भक्तिका स्वरूप है। ये सब बातें हनुमान् जी में पूर्णरूपसे पायी जाती हैं। वे अपने शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, बल, योग्यता, समय आदिको एकमात्र भगवान् का ही समझकर उनकी सेवामें लगाये रखते हैं। उनका पूरा जीवन ही भगवान् को सुख पहुँचानेके भावसे ओतप्रोत है।

भगवान् को श्रद्धा-प्रेमपूर्वक सुख पहुँचानेके भावको ‘रति’ कहते हैं। यह रति मुख्यरूपसे चार प्रकारकी मानी गयी है—दास्य, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य। इनमें दास्यसे सख्य, सख्यसे वात्सल्य और वात्सल्यसे माधुर्य रति श्रेष्ठ है। कारण कि इनमें भक्तको क्रमश: भगवान् के ऐश्वर्यकी अधिक विस्मृति होती जाती है और भक्तका संकोच (कि मैं तुच्छ हूँ, भगवान् महान् हैं) मिटता जाता है तथा भगवत्सम्बन्ध (प्रेम) की घनिष्ठता होती जाती है। परन्तु जब इन चारोंमेंसे कोई एक रति भी पूर्णतामें पहुँच जाती है, तब उसमें दूसरी रतियाँ भी आ जाती हैं। जैसे, दास्यरति पूर्णतामें पहुँच जाती है तो उसमें सख्य, वात्सल्य और माधुर्य—तीनों रतियाँ आ जाती हैं। यही बात अन्य रतियोंके विषयमें भी समझनी चाहिये। कारण यह है कि भगवान् पूर्ण हैं, उनका प्रेम भी पूर्ण है और परमात्माका अंश होनेसे जीव स्वयं भी पूर्ण है। अपूर्णता तो केवल संसारके सम्बन्धसे ही आती है; क्योंकि संसार सर्वथा अपूर्ण है। हनुमान् जी में दास्यरतिकी पूर्णता है; अत: उनमें अन्य रतियोंकी कमी नहीं है। उनमें दास्य, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य—चारों रतियाँ पूर्ण रूपसे विद्यमान हैं।

१-दास्य-रति

दास्य-रतिमें भक्तका यह भाव रहता है कि भगवान् मेरे स्वामी हैं और मैं उनका दास (सेवक) हूँ। वे चाहे जो करें, चाहे जैसी परिस्थितिमें मेरेको रखें और मेरेसे चाहे जैसा काम लें, मेरेपर उनका पूरा अधिकार है। इस रतिमें भक्तका शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिमें किंचिन्मात्र भी अपनापन नहीं रहता। उसमें ‘मैं सेवक हूँ’ ऐसा अभिमान भी नहीं रहता। वह तो यही समझता है कि मैं भगवान् की प्रेरणा और शक्तिसे उन्हींकी दी हुई सामग्री उनके ही अर्पण कर रहा हूँ। ऐसे अनन्य सेवाभाववाले भक्तोंको यदि भगवान् सालोक्य, सार्ष्टि, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य—ये पाँच प्रकारकी मुक्तियाँ* भी दे दें तो वे इनको ग्रहण नहीं करते—

सालोक्यसार्ष्टिसामीप्यसारूप्यैकत्वमप्युत।

दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जना:॥

सेव्यने सेवा स्वीकार कर ली—इसी बातसे भक्त अपनेको कृतकृत्य मानता है। इतना ही नहीं, अपने इष्टदेवके भक्तोंकी भी सेवाका अवसर मिल जाय तो वह इसको अपना सौभाग्य समझता है। हनुमान् जी सनकादिकोंसे कहते हैं—

ऐहिकेषु च कार्येषु महापत्सु च सर्वदा॥

नैव योज्यो राममन्त्र: केवलं मोक्षसाधक:।

ऐहिके समनुप्राप्ते मां स्मरेद् रामसेवकम्॥

यो रामं संस्मरेन्नित्यं भक्त्या मनुपरायण:।

तस्याहमिष्टसंसिद्धॺै दीक्षितोऽस्मि मुनीश्वरा:॥

वाञ्छितार्थं प्रदास्यामि भक्तानां राघवस्य तु।

सर्वथा जागरूकोऽस्मि रामकार्यधुरंधर:॥

(रामरहस्योपनिषद् ४। १०—१३)

‘लौकिक कार्योंके लिये तथा बड़ी-से-बड़ी आपत्तियोंमें भी कभी राममन्त्रका उपयोग नहीं करना चाहिये। वह तो केवल मोक्षका साधक है। यदि कोई लौकिक कार्य या संकट आ पड़े तो मुझ राम-सेवकका स्मरण करे। मुनीश्वरो! जो नित्य भक्तिभावसे मन्त्र-जपमें संलग्न होकर भगवान् रामका सम्यक् स्मरण करता है, उसके अभीष्टकी पूर्ण सिद्धिके लिये मैं दीक्षा लिये बैठा हूँ। श्रीरघुनाथजीके भक्तोंको मैं अवश्य मनोवाञ्छित वस्तु प्रदान करूँगा। श्रीरामका कार्यभार मैंने अपने सिरपर उठा रखा है और उसके लिये मैं सर्वथा जागरूक हूँ।’

हनुमान् जी भगवान् रामकी सेवा करनेमें इतने दक्ष हैं कि भगवान् के मनमें संकल्प उठनेसे पहले ही वे उसकी पूर्ति कर देते हैं! सीताजीकी खोजके लिये जाते समय हनुमान् जी को केवल उनका कुशल-समाचार लानेके लिये ही कहा गया था। परन्तु सीताजीकी खोजके साथ-साथ उन्होंने इन बातोंका भी पता लगा लिया कि लंकाके दुर्ग किस विधिसे बने हैं, किस प्रकार लंकापुरीकी रक्षाकी व्यवस्था की गयी है, किस तरह वह सेनाओंसे सुरक्षित है, वहाँ सैनिकों और वाहनोंकी संख्या कितनी है आदि-आदि। जब अशोकवाटिकामें उन्होंने त्रिजटाका स्वप्न सुना—

‘सपनें बानर लंका जारी।

जातुधान सेना सब मारी॥’

(मानस ५। ११। २)

तब इसको हनुमान् जी ने भगवान् की ही प्रेरणा (आज्ञा) समझी। जब उनकी पूँछमें आग लगानेकी बात चली, तब इस बातकी पूरी तरह पुष्टि हो गयी—

बचन सुनत कपि मन मुसुकाना।

भइ सहाय सारद मैं जाना॥

(मानस ५। २५। २)

अत: हनुमान् जी ने भगवान् की लंका-दहनरूप सेवाका कार्य भलीभाँति पूरा कर दिया! इतना ही नहीं, रामजीको लंकापर विजय करनेमें सुगमता पड़े, इसके लिये उन्होंने लंकाको जलानेके साथ-साथ लंकाकी आवश्यक युद्धसामग्रीको भी नष्ट कर दिया, खाइयोंको पाट दिया, परकोटोंको गिरा दिया और विशाल राक्षस-सेनाका एक चौथाई भाग नष्ट कर दिया (वाल्मीकि० युद्ध० ३)। आगे राक्षसोंकी संख्या न बढ़े, इसके लिये उन्होंने भयंकर गर्जना करके राक्षसियोंके गर्भ भी गिरा दिये—

चलत महाधुनि गर्जेसि भारी।

गर्भ स्रवहिं सुनि निसिचर नारी॥

(मानस ५।२८।१)

कारण कि भगवान् का अवतार राक्षसोंका विनाश करनेके लिये हुआ है—‘विनाशाय च दुष्कृताम्’ (गीता ४।८) और हनुमान् जी को भगवान् का कार्य ही करना है—‘राम काज लगि तव अवतारा’ (मानस ४।३०।३)।

२-सख्य-रति

सख्य-रतिमें भक्तका यह भाव रहता है कि भगवान् मेरे सखा हैं और मैं उनका सखा हूँ। वे मेरे प्यारे हैं और मैं उनका प्यारा हूँ। उनका मेरेपर पूरा अधिकार है और मेरा उनपर पूरा अधिकार है। इसलिये मैं उनकी बात मानता हूँ तो उनको भी मेरी बात माननी चाहिये। दास्य-रतिमें तो सेवकको यह संकोच रहता है कि कहीं स्वामी मेरेसे नाराज न हो जायँ अथवा उनके सामने मेरेसे कोई भूल न हो जाय! परन्तु सख्य-रतिमें यह संकोच नहीं रहता; क्योंकि इसमें भगवान् से बराबरीका भाव रहता है।

सख्यभावके कारण भगवान् श्रीराम हनुमान् जी से सलाह लिया करते हैं। जब विभीषण भगवान् श्रीरामकी शरणमें आते हैं, तब भगवान् इस विषयमें हनुमान् आदिसे कहते हैं—

सुहृदामर्थकृच्छ्रेषु युक्तं बुद्धिमता सदा।

समर्थेनोपसंदेष्टुं शाश्वतीं भूतिमिच्छता॥

(वाल्मीकि० युद्ध० १७। ३३)

‘मित्रोंकी स्थायी उन्नति चाहनेवाले बुद्धिमान् एवं समर्थ पुरुषको कर्तव्याकर्तव्यके विषयमें संशय उपस्थित होनेपर सदा ही अपनी सम्मति देनी चाहिये।’

अंगद, जाम्बवान् आदिके द्वारा अपना मत प्रकट करनेके बाद हनुमान् जी कहते हैं—

न वादान्नापि संघर्षान्नाधिक्यान्न च कामत:।

वक्ष्यामि वचनं राजन् यथार्थं राम गौरवात्॥

(वाल्मीकि० युद्ध० १७। ५२)

‘महाराज राम! मैं जो कुछ कहूँगा, वह वाद-विवाद या तर्क, स्पर्धा, अधिक बुद्धिमत्ताके अभिमान अथवा किसी प्रकारकी कामनासे नहीं कहूँगा। मैं तो कार्यकी गुरुतापर दृष्टि रखकर जो यथार्थ समझूँगा, वही बात कहूँगा।’

इसके बाद हनुमान् जी अपनी सम्मति देते हैं कि विभीषणको स्वीकार कर लेना ही मुझे उचित जान पड़ता है। हनुमान् जी के मुखसे अपने मनकी ही बात सुनकर भगवान् प्रसन्न हो जाते हैं और उनकी सलाह मान लेते हैं।

३-वात्सल्य-रति

वात्सल्य-रतिमें भक्तका यह भाव रहता है कि मैं भगवान् की माता हूँ या उनका पिता हूँ अथवा उनका गुरु हूँ और वे मेरे पुत्र हैं अथवा शिष्य हैं। अत: मेरेको उनका पालन-पोषण करना है, उनकी रक्षा करनी है।

हनुमान् जी को भगवान् श्रीरामका पैदल चलना सहन नहीं होता। जैसे माता-पिता अपने बालकको गोदमें लेकर चलते हैं, ऐसे ही रामजीकी कहीं जानेकी इच्छा होते ही हनुमान् जी उनको अपनी पीठपर बैठाकर चल पड़ते हैं—

‘लिए दुऔ जन पीठि चढ़ाई॥’

(मानस ४। ४। ३)

पृष्ठमारोप्य तौ वीरौ जगाम कपिकुञ्जर:॥

(वाल्मीकि० कि० ४। ३४)

४-माधुर्य-रति

माधुर्य-रतिमें भक्तको भगवान् के ऐश्वर्यकी विशेष विस्मृति रहती है; अत: इसमें भक्त भगवान् के साथ अपनी अभिन्नता (घनिष्ठ अपनापन) मानता है।

माधुर्य-भाव स्त्री-पुरुषके सम्बन्धमें ही होता है—यह नियम नहीं है। माधुर्य नाम मधुरता अर्थात् मिठासका है और वह मिठास भगवान् के साथ अभिन्नता होनेसे आती है। यह अभिन्नता जितनी अधिक होगी, उतनी ही मधुरता अधिक होगी। अत: दास्य, सख्य तथा वात्सल्य-भावमेंसे किसी भी भावकी पूर्णता होनेपर उसमें मधुरता कम नहीं होगी। भक्तिके सभी भावोंमें माधुर्य-भाव रहता है।

माधुर्य-रतिके दो भेद हैं—स्वकीया और परकीया। ‘स्वकीया माधुर्य-रति’ में पति-पत्नीके सम्बन्धका भाव रहता है। पतिव्रता स्त्री अपने माता, पिता, भाई, कुल आदि सबका त्याग करके अपने-आपको पतिकी सेवामें अर्पित कर देती है। इतना ही नहीं, वह अपने गोत्रका भी त्याग करके पतिके गोत्रकी बन जाती है१। अपना तन, मन, धन, बल, बुद्धि आदि सब कुछ पतिके ही अर्पण करके सर्वथा पतिके परायण हो जाती है। उसमें दास्य, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य—सभी भाव विद्यमान रहते हैं। वह दासीकी तरह पतिकी सेवा करती है, मित्रकी तरह पतिको उचित सलाह देती है और माताकी तरह भोजन, वस्त्र आदिसे पतिका पालन करती है तथा उसके सुख-आरामका खयाल रखती है२।

‘परकीया माधुर्य-रति’ में अपनी पत्नीसे भिन्न स्त्री (परनारी) के सम्बन्धका और अपने पतिसे भिन्न पुरुष (परपुरुष या उपपति) के सम्बन्धका भाव रहता है। यद्यपि लौकिक दृष्टिसे यह सम्बन्ध व्यभिचार होनेसे महान् पतन करनेवाला है, तथापि पारमार्थिक दृष्टिसे इस सम्बन्धका भाव बहुत उन्नति करनेवाला है। यद्यपि पत्नी अपने पतिकी सेवा करती है, तथापि वह अधिकारपूर्वक पतिसे यह आशा भी रखती है कि वह रोटी, कपड़ा, मकान आदि जीवन-निर्वाहकी वस्तुओंका प्रबन्ध करे और बाल-बच्चोंके पालन-पोषण, विद्याध्ययन, विवाह आदिकी व्यवस्था करे। परन्तु परकीयाभावमें अपने इष्टको सुख पहुँचानेके सिवाय कोई भी कामना या स्वार्थ नहीं रहता। स्वकीया-भावकी अपेक्षा परकीयाभावमें अपने प्रेमास्पदका चिन्तन भी अधिक होता है और उससे मिलनेकी इच्छा भी तीव्र होती है। स्वकीया-भावमें तो हरदम साथमें रहनेसे प्रेमास्पदके आचरणोंको लेकर उसमें दोषदृष्टि भी हो सकती है; परन्तु परकीया-भावमें प्रेमास्पदमें दोषदृष्टि होती ही नहीं। यद्यपि लौकिक परकीया-भावमें अपने सुखकी इच्छा भी रहती है, तथापि पारमार्थिक परकीयाभावमें भक्तके भीतर अपने सुखकी किंचिन्मात्र भी इच्छा नहीं रहती। उसमें केवल एक ही लगन रहती है कि प्रेमास्पद (भगवान्)को अधिक-से-अधिक सुख कैसे पहुँचे! उसका अहंभाव भगवान् में ही लीन हो जाता है।

हनुमान् जी का भाव स्वकीया अथवा परकीया माधुर्य-रतिसे भी श्रेष्ठ है! उन्होंने वानरका शरीर इसीलिये धारण किया है कि उनको अपने प्रेमास्पदसे अथवा दूसरे किसीसे किञ्चिन्मात्र भी कोई वस्तु लेनेकी जरूरत न पड़े। उनको न रोटीकी जरूरत है, न कपड़ेकी जरूरत है, न मकानकी जरूरत है, न बाल-बच्चोंके देखभालकी जरूरत है, न मान-बड़ाई आदिकी जरूरत है! वानर तो जंगलमें फल-फूल-पत्ते खाकर और पेड़ोंपर रहकर ही जीवन-निर्वाह कर लेता है। लौकिक परकीया-भावमें प्रेमीका अपने माता-पिता, भाई-बहन आदिके साथ भी सम्बन्ध रहता है; परन्तु हनुमान् जी का एक भगवान् श्रीरामके सिवाय और किसीसे सम्बन्ध है ही नहीं।

सभी रतियोंकी दो अवस्थाएँ मानी गयी हैं—संयोग (सम्भोग) और वियोग (विप्रलम्भ)। संयोग-रतिमें पत्नी भोजनादिके द्वारा पतिकी सेवा करती है और वियोग-रतिमें (पतिके दूर होनेसे) वह पतिका स्मरण-चिन्तन करती है। वियोग-रतिमें प्रेमास्पदकी निरन्तर मानसिक सेवा होती है। अत: संयोग-रतिकी अपेक्षा वियोग-रतिको श्रेष्ठ माना गया है। चैतन्य महाप्रभुने भी इस वियोग-रतिका विशेष आदर किया है। इसमें भी ‘परकीया माधुर्य-रति’ की वियोगावस्था सबसे ऊँची है, जिसमें प्रेमी और प्रेमास्पदमें नित्ययोग रहता है। प्रेम-रसकी वृद्धिके लिये इस नित्ययोगमें चार अवस्थाएँ होती हैं—

१-नित्ययोगमें योग

२-नित्ययोगमें वियोग

३-वियोगमें नित्ययोग

४-वियोगमें वियोग

प्रेमी और प्रेमास्पदका परस्पर मिलन होना ‘नित्ययोगमें योग’ है। प्रेमास्पदसे मिलन होनेपर भी प्रेमीमें यह भाव आ जाता है कि प्रेमास्पद कहीं चले गये हैं—यह ‘नित्ययोगमें वियोग’ है। प्रेमास्पद सामने नहीं हैं, पर मनसे उन्हींका गाढ़ चिन्तन हो रहा है और वे मनसे प्रत्यक्ष मिलते हुए दीख रहे हैं—यह ‘वियोगमें नित्ययोग’ है। प्रेमास्पद थोड़े समयके लिये सामने नहीं आये, पर मनमें ऐसा भाव है कि उनसे मिले बिना युग बीत गया—यह ‘वियोगमें वियोग’ है। वास्तवमें इन चारों अवस्थाओंमें प्रेमास्पदके साथ नित्ययोग ज्यों-का-त्यों बना रहता है, वियोग कभी होता ही नहीं, हो सकता ही नहीं और होनेकी सम्भावना भी नहीं। प्रेमका आदान-प्रदान करनेके लिये ही प्रेमी और प्रेमास्पदमें संयोग-वियोगकी लीला हुआ करती है।

हनुमान् जी में संयोग-रति और वियोग-रति—दोनों ही विलक्षणरूपसे विद्यमान हैं। संयोगकालमें वे भगवान् की सेवामें ही रत रहते हैं और वियोगकालमें भगवान् के स्मरण-चिन्तनमें डूबे रहते हैं। संयोग-रतिमें प्रेमी खुद भी सुख लेता है; जैसे पतिको सुख देनेके साथ-साथ पत्नी खुद भी सुखका अनुभव करती है। परन्तु हनुमान् जी की संयोग-रतिमें किंचिन्मात्र भी अपना सुख नहीं है। केवल भगवान् के सुखमें ही उनका सुख है—‘तत्सुखे सुखित्वम्’। वे तो भगवान् को सुख पहुँचाने, उनकी सेवा करनेके लिये सदा आतुर रहते हैं, छटपटाते रहते हैं—

राम काज करिबे को आतुर।

(हनुमानचालीसा)

राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥

(मानस ५।१)

एक बार सुबह हनुमान् जी को भूख लग गयी तो वे माता सीताजीके पास गये और बोले कि माँ! मेरेको भूख लगी है, खानेके लिये कुछ दो। सीताजीने कहा कि बेटा! मैंने अभीतक स्नान नहीं किया है। तुम ठहरो, मैं अभी स्नान करके भोजन देती हूँ। सीताजीने स्नान करके शृङ्गार किया। उनकी माँगमें सिन्दूर देखकर सहज सरल हनुमान् जी ने पूछा कि माँ! आपने यह सिन्दूर क्यों लगाया है? सीताजीने कहा कि बेटा! इसको लगानेसे तुम्हारे स्वामीकी आयु बढ़ती है। ऐसा सुनकर हनुमान् जी को विचार आया कि अगर सिन्दूरकी एक रेखा खींचनेसे रामजीकी आयु बढ़ती है, तो फिर पूरे शरीरमें सिन्दूर लगानेसे उनकी आयु कितनी बढ़ जायगी! सीताजी रसोईमें गयीं तो हनुमान् जी शृङ्गार कक्षमें चले गये और उन्होंने सिन्दूरकी डिबियाको नीचे पटक दिया। सब सिन्दूर नीचे बिखर गया और हनुमान् जी ने वह सिन्दूर अपने पूरे शरीरपर लगा लिया! अब मेरे प्रभुकी आयु खूब बढ़ जायगी—ऐसा सोचकर हनुमान् जी बड़े हर्षित हो गये और भूख-प्यासको भूलकर सीधे रामजीके दरबारमें पहुँच गये! उनको इस वेशमें देखकर सभी हँसने लगे। रामजीने पूछा कि हनुमान्! आज तुमने अपने शरीरपर सिन्दूरका लेप कैसे कर लिया? हनुमान् जी बोले कि प्रभो! माँके थोड़ा-सा सिन्दूर लगानेसे आपकी आयु बढ़ती है—ऐसा जानकर मैंने पूरे शरीरपर ही सिन्दूर लगाना शुरू कर दिया है, जिससे आपकी आयु खूब बढ़ जाय! रामजीने कहा कि बहुत अच्छा! अब आगेसे जो भक्त तुम्हारेको तेल और सिन्दूर चढ़ायेगा, उसपर मैं बहुत प्रसन्न होऊँगा!

हनुमान् जी की वियोग-रति भी विचित्र ही है। लौकिक अथवा पारमार्थिक जगत् में कोई भी व्यक्ति अपने इष्टका वियोग नहीं चाहता। परन्तु भगवान् का कार्य करनेके लिये तथा उनका निरन्तर स्मरण करनेके लिये, उनका गुणानुवाद (लीला-कथा) सुननेके लिये हनुमान् जी भगवान् से वियोग-रतिका वरदान माँगते हैं—

यावद् रामकथा वीर चरिष्यति महीतले।

तावच्छरीरे वत्स्यन्तु प्राणा मम न संशय:॥

(वाल्मीकि० उत्तर० ४०। १७)

‘वीर श्रीराम! इस पृथ्वीपर जबतक रामकथा प्रचलित रहे, तबतक नि:सन्देह मेरे प्राण इस शरीरमें ही बसे रहें।’

कोई प्रेमास्पद भी अपने प्रेमीसे वियोग नहीं चाहता। परन्तु भगवान् श्रीराम जब परमधाम पधारने लगे, तब वे भक्तोंकी सहायता, रक्षाके लिये हनुमान् जी को इस पृथ्वीपर ही रहनेकी आज्ञा देते हैं। यह भी एक विशेष बात है!

भगवान् कहते हैं—

जीविते कृतबुद्धिस्त्वं मा प्रतिज्ञां वृथा कृथा:।

मत्कथा: प्रचरिष्यन्ति यावल्लोके हरीश्वर॥

तावद् रमस्व सुप्रीतो मद्वाक्यमनुपालयन्।

एवमुक्तस्तु हनुमान् राघवेण महात्मना॥

वाक्यं विज्ञापयामास परं हर्षमवाप च।

(वाल्मीकि० उत्तर० १०८।३३—३५)

‘हरीश्वर! तुमने दीर्घकालतक जीवित रहनेका निश्चय किया है। अपनी इस प्रतिज्ञाको व्यर्थ न करो। जबतक संसारमें मेरी कथाओंका प्रचार रहे, तबतक तुम भी मेरी आज्ञाका पालन करते हुए प्रसन्नतापूर्वक विचरते रहो। महात्मा श्रीरघुनाथजीके ऐसा कहनेपर हनुमान् जी को बड़ा हर्ष हुआ और वे इस प्रकार बोले—’

यावत् तव कथा लोके विचरिष्यति पावनी।

तावत् स्थास्यामि मेदिन्यां तवाज्ञामनुपालयन्॥

(वाल्मीकि० उत्तर० १०८। ३५-३६)

इसीलिये हनुमान् जी के लिये आया है—‘राम चरित सुनिबे को रसिया।’

एक बार भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न—तीनों भाइयोंने माता सीताजीसे मिलकर विचार किया कि हनुमान् जी हमें रामजीकी सेवा करनेका मौका ही नहीं देते, पूरी सेवा अकेले ही किया करते हैं। अत: अब रामजीकी सेवाका पूरा काम हम ही करेंगे, हनुमान् जी के लिये कोई भी काम नहीं छोड़ेंगे। ऐसा विचार करके उन्होंने सेवाका पूरा काम आपसमें बाँट लिया। जब हनुमान् जी सेवाके लिये सामने आये, तब उनको रोक दिया और कहा कि आजसे प्रभुकी सेवा बाँट दी गयी है, आपके लिये कोई सेवा नहीं है। हनुमान् जी ने देखा कि भगवान् को जम्हाई (जँभाई) आनेपर चुटकी बजानेकी सेवा किसीने भी नहीं ली है। अत: उन्होंने यही सेवा अपने हाथमें ले ली। यह सेवा किसीके खयालमें ही नहीं आयी थी! हनुमान् जी में प्रभुकी सेवा करनेकी लगन थी। जिसमें लगन होती है, उसको कोई-न-कोई सेवा मिल ही जाती है। अब हनुमान् जी दिनभर रामजीके सामने ही बैठे रहे और उनके मुखकी तरफ देखते रहे; क्योंकि रामजीको किस समय जम्हाई आ जाय, इसका क्या पता? जब रात हुई, तब भी हनुमान् जी उसी तरह बैठे रहे। भरतादि सभी भाइयोंने हनुमान् जी से कहा कि रातमें आप यहाँ नहीं बैठ सकते, अब आप चले जायँ। हनुमान् जी बोले कि कैसे चला जाऊँ? रातको न जाने कब रामजीको जम्हाई आ जाय! जब बहुत आग्रह किया, तब हनुमान् जी वहाँसे चले गये और छतपर जाकर बैठ गये। वहाँ बैठकर उन्होंने लगातार चुटकी बजाना शुरू कर दिया; क्योंकि रामजीको न जाने कब जम्हाई आ जाय! यहाँ रामजीको ऐसी जम्हाई आयी कि उनका मुख खुला ही रह गया, बन्द हुआ ही नहीं! यह देखकर सीताजी बड़ी व्याकुल हो गयीं कि न जाने रामजीको क्या हो गया है! भरतादि सभी भाई आ गये। वैद्योंको बुलाया गया तो वे भी कुछ कर नहीं सके। वसिष्ठजी आये तो उनको आश्चर्य हुआ कि ऐसी चिन्ताजनक स्थितिमें हनुमान् जी दिखायी नहीं दे रहे हैं! और सब तो यहाँ हैं, पर हनुमान् जी कहाँ हैं? खोज करनेपर हनुमान् जी छतपर बैठे चुटकी बजाते हुए मिले। उनको बुलाया गया और वे रामजीके पास आये तो चुटकी बजाना बन्द करते ही रामजीका मुख स्वाभाविक स्थितिमें आ गया! अब सबकी समझमें आया कि यह सब लीला हनुमान् जी के चुटकी बजानेके कारण ही थी! भगवान् ने यह लीला इसलिये की थी कि जैसे भूखेको अन्न देना ही चाहिये, ऐसे ही सेवाके लिये आतुर हनुमान् जी को सेवाका अवसर देना ही चाहिये, बन्द नहीं करना चाहिये। फिर भरतादि भाइयोंने ऐसा आग्रह नहीं रखा। तात्पर्य है कि संयोग-रति और वियोग-रति—दोनोंमें ही हनुमान् जी भगवान् की सेवा करनेमें तत्पर रहते हैं।

इस प्रकार हनुमान् जी का दास्य, सख्य, वात्सल्य तथा माधुर्य-भाव बहुत विलक्षण है! इस कारण हनुमान् जी की ऐसी विलक्षण महिमा है कि संसारमें भगवान् से भी अधिक उनका पूजन होता है। जहाँ भगवान् श्रीरामके मन्दिर हैं, वहाँ तो उनके साथ हनुमान् जी विराजमान हैं ही, जहाँ भगवान् श्रीरामके मन्दिर नहीं हैं, वहाँ भी हनुमान् जी के स्वतन्त्र मन्दिर हैं! उनके मन्दिर प्रत्येक गाँव और शहरमें, जगह-जगह मिलते हैं। केवल भारतमें ही नहीं, प्रत्युत विदेशोंमें भी हनुमान् जी के अनेक मन्दिर हैं। इस प्रकार वे रामजीके साथ भी पूजित होते हैं और स्वतन्त्र रूपसे भी पूजित होते हैं। इसीलिये कहा गया है—

मोरें मन प्रभु अस बिस्वासा।

राम ते अधिक राम कर दासा॥

(मानस ७। १२०।८)

भगवान् शंकर कहते हैं—

हनूमान सम नहिं बड़भागी।

नहिं कोउ राम चरन अनुरागी॥

गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई।

बार बार प्रभु निज मुख गाई॥

(मानस ७। ५०। ४-५)

स्वयं भगवान् श्रीराम हनुमान् जी से कहते हैं—

मदङ्गे जीर्णतां यातु यत् त्वयोपकृतं कपे।

नर: प्रत्युपकाराणामापत्स्वायाति पात्रताम्॥

(वाल्मीकि० उत्तर० ४०। २४)

‘कपिश्रेष्ठ! मैं तो यही चाहता हूँ कि तुमने जो-जो उपकार किये हैं, वे सब मेरे शरीरमें ही पच जायँ! उनका बदला चुकानेका मुझे कभी अवसर न मिले; क्योंकि उपकारका बदला पानेका अवसर मनुष्यको आपत्तिकालमें ही मिलता है (मैं नहीं चाहता कि तुम भी संकटमें पड़ो और मैं तुम्हारे उपकारका बदला चुकाऊँ)।’