भक्तिकी श्रेष्ठता
ज्ञान और भक्ति—दोनों ही संसारका दु:ख दूर करनेमें समान हैं; परन्तु दोनोंमें ज्ञानकी अपेक्षा भक्तिकी महिमा अधिक है। ज्ञानमें तो अखण्ड रस है, पर भक्तिमें अनन्त रस है। अनन्त रसमें लहरोंवाला, उछालवाला एक बहुत विलक्षण आनन्द है। जैसे संसारमें किसी वस्तुका ज्ञान होता है कि ये रुपये हैं, यह घड़ी आदि है तो यह ज्ञान अज्ञान (अनजानपने) को मिटाता है, ऐसे ही तत्त्वका ज्ञान अज्ञानको मिटाता है। अज्ञान मिटनेसे दु:ख, भय, जन्म-मरणरूप बन्धन—ये सब मिट जाते हैं। ये दु:ख, भय आदि सब अज्ञानसे ही उत्पन्न होते हैं। जैसे रातके अँधेरेमें मनुष्य पहचानवाली जगहपर भी धीरे-धीरे चलता है कि कहीं ठोकर न लग जाय। परन्तु प्रकाश होनेपर उसको ठोकर लगनेका भय नहीं होता और वह दौड़कर भी चला जाता है। ऐसे ही अज्ञानान्धकारमें दु:ख, भय, सन्ताप आदि होते हैं और ज्ञान होते ही वे मिट जाते हैं। परन्तु प्रेम ज्ञानसे भी विलक्षण है। जैसे ‘यह घड़ी है’—ऐसा ज्ञान हो गया तो अनजानपना मिट गया। परन्तु घड़ी पानेकी लालसा हो जाय तो घड़ी मिलनेपर एक विशेष रस आता है। ‘ये रुपये हैं’—ऐसा ज्ञान हो गया, पर उनको पानेका लोभ हो जाय कि ‘और मिले, और मिले’ तो उसमें एक विशेष रस आता है। ऐसे ही भक्तिमें एक विशेष रस आता है कि और अधिक कीर्तन हो, और अधिक पदगान हो, और अधिक भगवच्चर्चा हो। जैसे रुपयोंमें लोभ होता है—‘जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई’, ऐसे ही भगवान् में प्रेम होता है—‘दिने दिने नवं नवं नमामि नन्दसम्भवम्’। लोभ (संसारमें आकर्षण) और प्रेम (भगवान् में आकर्षण)—दोनोंमें बड़ा अन्तर है। लोभमें दु:ख बढ़ता है और प्रेममें आनन्द बढ़ता है। लोभमें कामना, आसक्ति बढ़ती है और प्रेममें त्याग, उपरति बढ़ती है। संसारमें आकर्षण तो दोषोंके कारण होता है, पर भगवान् में आकर्षण निर्दोषताके कारण होता है।
ज्ञान कोई निरर्थक या मामूली चीज नहीं है—‘न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते’ (गीता ४।३८) ‘इस मनुष्यलोकमें ज्ञानके समान पवित्र करनेवाला दूसरा कोई साधन नहीं है।’ ज्ञान अज्ञानको मिटा देता है, शान्ति देता है, मुक्ति देता है। परन्तु ज्ञानमें शान्त, अखण्ड रस रहता है, जबकि भक्तिमें प्रतिक्षण वर्धमान, अनन्त रस रहता है। वह रस कभी समाप्त नहीं होता, निरन्तर बढ़ता ही रहता है। कारण कि प्रेम होनेपर भी उसमें एक विलक्षण कमी रहती है, जिसको ‘नित्यवियोग’ कहते हैं। उस नित्यवियोगसे प्रेम प्रतिक्षण वर्धमान होता है। जैसे कीर्तनमें जब रस आने लगता है, तब और रस लें, और रस लें’—ऐसा भाव होता है। पहलेवाला रस कम होता है, तभी ‘और रस लें’ यह भाव होता है। अत: पहलेवाले रसका वियोग है और आगेवाले रसका योग है। प्रेममें यह वियोग और योग नित्य चलते रहते हैं, इसलिये इसको नित्यवियोग और नित्ययोग कहते हैं।
ज्ञान होनेपर फिर ज्ञानकी आवश्यकता नहीं रहती, पर प्रेम होनेपर भी प्रेमकी आवश्यकता रहती है। कारण कि ज्ञानमें तो तृप्ति हो जाती है—‘आत्मतृप्तश्च मानव:’ (गीता ३। १७), पर प्रेममें तृप्ति नहीं होती। रामायणमें आया है—
राम चरित जे सुनत अघाहीं।
रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं॥
(मानस, उत्तर० ५३।१)
जो भगवान् की लीला सुनकर तृप्त हो जाते हैं, उनको सुननेमें रस तो आता है, पर उन्होंने विशेष रस नहीं जाना है। विशेष रस जाननेसे क्या होता है?
जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना।
कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना॥
भरहिं निरंतर होहिं न पूरे।
तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह रूरे॥
(मानस, अयोध्या० १२८।२-३)
अर्जुन भगवान् से कहते हैं कि आपके अमृतमय वचन सुनते-सुनते मेरी तृप्ति नहीं हो रही है—‘भूय: कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्’ (गीता १०। १८)। महाराज पृथु भगवान् से वर माँगते हैं कि आप मेरेको दस हजार कान दे दीजिये, जिनसे मैं आपकी लीलाओंको सुनता रहूँ— ‘विधत्स्व कर्णायुतमेष मे वर:’ (श्रीमद्भा० ४।२०।२४)। सुननेपर भी तृप्ति नहीं होती—यह ‘नित्यवियोग’ है और सुननेमें रस आता है—यह ‘नित्ययोग’ है।
प्रेमका एक ऐसा रस है, जिसमें विलक्षण, विचित्रता आती ही रहती है। कहाँतक आती है—इसका कोई अन्त ही नहीं है! ज्ञानमें तो अपने स्वरूपका बोध होता है, पर प्रेममें निरन्तर भगवान् की तरफ खिंचाव होता है, भगवान् प्यारे लगते हैं, मीठे लगते हैं। हर समय भगवान् की कथा सुनते ही रहें, उनकी चर्चा होती ही रहे, उनका चिन्तन होता ही रहे, उनके पद गाते ही रहें—यह प्रेमका विशेष रस है। जैसे लोभीके भीतर धनकी लालसा रहती है, ऐसे ही प्रेमीके भीतर प्रेमकी लालसा रहती है।
ज्ञानमें प्रकृतिके सिवाय कुछ नहीं है१ और भक्तिमें भगवान् के सिवाय कुछ नहीं है२। ज्ञानमार्गमें तो प्रकृति त्याज्य होती है, पर भक्तिमार्गमें त्याज्य वस्तु कोई है ही नहीं! ज्ञान (विवेक) में सत् और असत्, जड और चेतन, नित्य और अनित्य, सार और असार आदि दो वस्तुएँ रहती हैं; परन्तु भक्तिमें एक भगवान् ही रहते हैं। इसलिये भगवान् ने ‘सब कुछ वासुदेव ही हैं’—इसका अनुभव करनेवाले महात्माको अत्यन्त दुर्लभ बताया है—‘वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ:’ (गीता ७।१९), जबकि ज्ञानीको भगवान् ने दुर्लभ नहीं बताया है।
ज्ञानकी दृष्टिसे भगवान् कहते हैं—‘न सत्तन्नासदुच्यते’ (गीता १३। १२) ‘उस परमात्मतत्त्वको न सत् कहा जा सकता है और न असत् कहा जा सकता है।’ भक्तिकी दृष्टिसे भगवान् कहते हैं—‘सदसच्चाहमर्जुन’ (गीता ९।१९) ‘हे अर्जुन! सत् और असत् भी मैं ही हूँ।’ इसलिये भक्त सब जगह भगवान् को ही देखता है—
सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत।
मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत॥
(मानस, किष्किन्धा० ३)
सब भगवान् ही हैं—ऐसा भाव होते-होते फिर मैं-पन भी मिट जाता है और एक परमात्मा-ही-परमात्मा रह जाते हैं।
तू तू करता तू भया, मुझमें रही न हूँ।
वारी फेरी बलि गई, जित देखूँ तित तू॥
मैं-तू-यह-वह कुछ नहीं रहता, केवल भगवान् ही रहते हैं। ज्ञानमें भी मैं-तू-यह-वह कुछ नहीं रहता, एक सच्चिदानन्दघन ब्रह्म रह जाता है। परन्तु ज्ञानका आनन्द शान्त, अखण्ड, एकरस रहता है। भक्तिका आनन्द बढ़ता रहता है। प्रेमका स्वभाव ही बढ़ना है। जैसे उबलते हुए दूधमें उछाल आता है, ऐसे ही भक्तिके आनन्दमें उछाल आता रहता है। भगवान् रामको देखकर तत्त्वज्ञानी राजा जनक कहते हैं—
इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा।
बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा॥
(मानस, बाल० २१६।३)
‘ब्रह्मसुख’ में अखण्ड रस है और ‘अति अनुराग’ में अनन्त रस है। तात्पर्य है कि तत्त्वज्ञान, मुक्ति होनेपर भी स्वयंकी भूखका अत्यन्त अभाव नहीं होता, प्रत्युत स्वयंमें अनन्त रसकी भूख रहती है।
मुक्ति तो कर्मयोगीकी भी हो जाती है। जो ईश्वरको नहीं मानते, उनकी भी मुक्ति हो जाती है। जैन-सम्प्रदायमें भी मोक्षशिलाकी मान्यता है, जहाँ मुक्त पुरुष जाते हैं। अत: ईश्वरको न माननेपर भी मुक्ति अथवा ज्ञान तो हो सकता है, पर प्रेम होना असम्भव ही है। प्रेम बहुत विलक्षण है। भगवान् भी प्रेमीके वशमें होते हैं—‘अहं भक्तपराधीन:’, ज्ञानीके वशमें नहीं होते। भगवान् ने तो सबको विवेकज्ञान दिया हुआ है, जिससे वे मुक्त होकर, जडतासे ऊँचे उठकर मेरे प्रेमी बन जायँ। भगवान् ज्ञानस्वरूप और नित्य परिपूर्ण हैं; अत: उनमें ज्ञानकी भूख (जिज्ञासा) नहीं है, पर प्रेमकी भूख (प्रेम-पिपासा) अवश्य है! इसलिये भगवान् कहते हैं—
‘मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्त: स मे प्रिय:’
(गीता १२।१४)
‘मेरेमें अर्पित मन-बुद्धिवाला जो मेरा भक्त है, वह मेरेको प्रिय है।’
‘प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रिय:’
(गीता ७।१७)
‘ज्ञानी (प्रेमी) भक्तको मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह भी मेरेको अत्यन्त प्रिय है।’
‘मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु’
(गीता ९।३४; १८।६५)
‘तू मेरा भक्त हो जा, मेरेमें मनवाला हो जा, मेरा पूजन करनेवाला हो जा और मेरेको नमस्कार कर।’
‘सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज’
(गीता १८। ६६)
‘सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय छोड़कर तू केवल मेरी शरणमें आ जा।’
तत्त्वज्ञान देकर भगवान् भी तृप्त हो जाते हैं और ज्ञानी भी तृप्त हो जाता है। परन्तु प्रेम देकर न भगवान् तृप्त होते हैं, न भक्त! प्रेमी भक्तके लिये कुछ भी कर्तव्य, ज्ञातव्य और प्राप्तव्य बाकी न रहनेपर भी उसमें प्रेम निरन्तर बढ़ता रहता है, मिलनकी लालसा नित्य रहती है, ऐसे ही भगवान् में भी प्रेम निरन्तर बढ़ता रहता है, तभी वे बार-बार अवतार लेकर तरह-तरहकी लीलाएँ करते हैं। तात्पर्य है कि भक्त और भगवान्—दोनोंमें ही प्रेमकी भूख रहती है। नारदजी कहते हैं—‘तस्मिंस्तज्जने भेदाभावात्’ (भक्ति-सूत्र ४१) ‘भगवान् में और उनके भक्तमें भेद नहीं है।’
भगवान् की माया दुनियाको मोहित करती है, पर भक्तकी माया भगवान् को भी मोहित कर देती है! जैसे, बालकका मोह माँको वशमें कर लेता है; क्योंकि वह और किसीका न होकर माँका होता है। ऐसे ही भक्त भगवान् का होकर उनको अपने वशमें कर लेता है। भगवान् कहते हैं—
सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा।
भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा॥
करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी।
जिमि बालक राखइ महतारी॥
गह सिसु बच्छ अनल अहि धाई।
तहँ राखइ जननी अरगाई॥
प्रौढ़ भएँ तेहि सुत पर माता।
प्रीति करइ नहिं पाछिलि बाता॥
मोरे प्रौढ़ तनय सम ग्यानी।
बालक सुत सम दास अमानी॥
जनहि मोर बल निज बल ताही।
दुहु कहँ काम क्रोध रिपु आही॥
यह बिचारि पंडित मोहि भजहीं।
पाएहुँ ग्यान भगति नहिं तजहीं॥
(मानस, अरण्य० ४३।२—५)
भगवान् के छोटे बालक भक्त हैं और बड़े बालक ज्ञानी। जैसे माँको छोटे-बड़े सभी बालक प्रिय लगते हैं, पर वह सँभाल छोटेकी ही करती है, बड़ेकी नहीं; क्योंकि छोटा बालक सर्वथा माँके ही आश्रित रहता है। ऐसे ही भगवान् अपने आश्रित भक्तकी पूरी सँभाल करते हैं। भगवान् स्वयं अपने भक्तके योग (अप्राप्तकी प्राप्ति) और क्षेम (प्राप्तकी रक्षा) का वहन करते हैं*। परन्तु ज्ञानीके योग और क्षेमका वहन कौन करे? इसलिये ज्ञानी तो योगभ्रष्ट हो सकता है, पर भक्त योगभ्रष्ट नहीं हो सकता। ज्ञानीका तो ज्ञानमें कमी रहनेसे पतन हो सकता है, पर भक्तका पतन नहीं हो सकता—‘न मे भक्त: प्रणश्यति’ (गीता९।३१)।
‘न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते क्वचित्’
(महा० अनु० १४९।१३१)
‘भगवान् के भक्तोंका कहीं कभी भी अशुभ नहीं होता।’
सीम कि चाँपि सकइ कोउ तासू।
बड़ रखवार रमापति जासू॥
(मानस, बाल० १२६।४)
इसलिये भगवान् गीतामें कहते हैं—
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥
(७। १४)
‘मेरी यह गुणमयी दैवी माया बड़ी दुरत्यय है अर्थात् इससे पार पाना बड़ा कठिन है। परन्तु जो केवल मेरी ही शरण होते हैं; वे इस मायाको तर जाते हैं।’
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्॥
(१२।७)
‘हे पार्थ! मेरेमें आविष्ट चित्तवाले उन भक्तोंका मैं मृत्युरूप संसार-समुद्रसे शीघ्र ही उद्धार करनेवाला बन जाता हूँ।’
मच्चित्त: सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
(१८।५८)
‘मेरेमें चित्तवाला होकर तू मेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्नोंको तर जायगा।’
ब्रह्मादि देवता भगवान् से कहते हैं—
येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिन-
स्त्वय्यस्तभावादविशुद्धबुद्धय:।
आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं तत:
पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रय: ॥
(श्रीमद्भा० १०।२।३२)
‘हे कमलनयन! जो लोग आपके चरणोंकी शरण नहीं लेते और आपकी भक्तिसे रहित होनेके कारण जिनकी बुद्धि भी शुद्ध नहीं है, वे अपनेको मुक्त तो मानते हैं, पर वास्तवमें वे बद्ध ही हैं। वे यदि कष्टपूर्वक साधन करके ऊँचे-से-ऊँचे पदपर भी पहुँच जायँ तो भी वहाँसे नीचे गिर जाते हैं।’
तथा न ते माधव तावका: क्वचिद्
भ्रश्यन्ति मार्गात्त्वयि बद्धसौहृदा:।
त्वयाभिगुप्ता विचरन्ति निर्भया
विनायकानीकपमूर्धसु प्रभो॥
(श्रीमद्भा० १०।२।३३)
‘परन्तु भगवन्! जो आपके भक्त हैं, जिन्होंने आपके चरणोंमें अपनी सच्ची प्रीति जोड़ रखी है, वे कभी उन ज्ञानाभिमानियोंकी तरह अपने साधनसे गिरते नहीं। प्रभो! वे बड़े-बड़े विघ्न डालनेवाली सेनाके सरदारोंके सिरपर पैर रखकर निर्भय होकर विचरते हैं, कोई भी विघ्न उनके मार्गमें रुकावट नहीं डाल सकता।’
भगवान् की स्तुति करते हुए वेद कहते हैं—
जे ग्यान मान बिमत्त तव भव हरनि भक्ति न आदरी।
ते पाइ सुर दुर्लभ पदादपि परत हम देखत हरी॥
बिस्वास करि सब आस परिहरि दास तव जे होइ रहे।
जपि नाम तव बिनु श्रम तरहिं भव नाथ सो समरामहे॥
(मानस, उत्तर० १३।३)
इसलिये भगवान् कहते हैं—
बाध्यमानोऽपि मद्भक्तो विषयैरजितेन्द्रिय:।
प्राय: प्रगल्भया भक्त्या विषयैर्नाभिभूयते॥
(श्रीमद्भा० ११।१४।१८)
‘उद्धवजी! मेरा जो भक्त अभी जितेन्द्रिय नहीं हो सका है और संसारके विषय बार-बार उसे बाधा पहुँचाते रहते हैं, अपनी ओर खींचते रहते हैं, वह भी प्रतिक्षण बढ़नेवाली मेरी भक्तिके प्रभावसे प्राय: विषयोंसे पराजित नहीं होता।’
भक्त जितेन्द्रिय न हो सके तो भी भगवान् उसका पतन नहीं होने देते। परन्तु ज्ञानी जितेन्द्रिय न हो तो उसका पतन हो जाता है; क्योंकि उसकी रक्षा करनेवाला कोई है नहीं—
यस्त्वसंयतषड् वर्ग: प्रचण्डेन्द्रियसारथि:।
ज्ञानवैराग्यरहितस्त्रिदण्डमुपजीवति॥
सुरानात्मानमात्मस्थं निह्नुते मां च धर्महा।
अविपक्वकषायोऽस्मादमुष्माच्च विहीयते॥
(श्रीमद्भा० ११।१८।४०-४१)
‘जिसने पाँच इन्द्रियाँ और मन—इन छहोंपर विजय नहीं प्राप्त की है, जिसके इन्द्रियरूपी घोड़े और बुद्धिरूपी सारथि बिगड़े हुए हैं और जिसके हृदयमें न ज्ञान है, न वैराग्य है, वह यदि त्रिदण्डी संन्यासीका वेष धारण करके पेट पालता है तो वह संन्यास-धर्मका सत्यानाश ही कर रहा है और अपने पूज्य देवताओंको, अपने-आपको और अपने हृदयमें स्थित मुझको ठगनेकी चेष्टा करता है। अभी उस वेषमात्रके संन्यासीकी वासनाएँ क्षीण नहीं हुई हैं, इसलिये वह इस लोक और परलोक दोनोंसे हाथ धो बैठता है।’
तात्पर्य है कि भगवान् का अनादर और अपना अभिमान होनेके कारण ज्ञानमार्गीका पतन हो जाता है। यद्यपि अभिमानके कारण भक्तिमार्गीका भी पतन हो सकता है, तथापि भगवन्निष्ठ होनेके कारण भगवान् उसको सँभाल लेते हैं। कारण कि भक्तमें तो भगवान् का बल (आश्रय) रहता है, पर ज्ञानीमें अपना बल रहता है—‘जनहि मोर बल निज बल ताही’ (मानस, अरण्य० ४३। ५)। अत: भक्तकी रक्षा तो भगवान् कर देते हैं, पर ज्ञानीकी रक्षा कौन करे? इसलिये ब्रह्माजी भगवान् से कहते हैं—
श्रेय:स्रुतिं भक्तिमुदस्य ते विभो
क्लिश्यन्ति ये केवलबोधलब्धये।
तेषामसौ क्लेशल एव शिष्यते
नान्यद् यथा स्थूलतुषावघातिनाम्॥
(श्रीमद्भा० १०।१४।४)
‘भगवन्! जैसे थोथी भूसी कूटनेवालेको श्रमके सिवाय और कुछ हाथ नहीं लगता, ऐसे ही जो मनुष्य कल्याणके मार्गरूप आपकी भक्तिको छोड़कर केवल ज्ञान-प्राप्तिके लिये क्लेश उठाते हैं, उनको क्लेशके सिवाय और कुछ हाथ नहीं लगता!’
ज्ञानमार्गमें ‘विवेक’ मुख्य है और भक्तिमार्गमें ‘विश्वास’ मुख्य है। विवेकमें अपनी बुद्धिकी प्रधानता है, पर विश्वासमें भगवान् के आश्रयकी प्रधानता है। विवेकमें तो सत् और असत्, आत्मा और अनात्मा दो हैं, पर विश्वासमें दो नहीं हैं। भक्तिमार्गमें एक भगवान् के सिवाय दूसरेका विश्वास ही नहीं है। एक व्रजवासी भक्तसे किसी साधुने कहा कि हम तो कन्हैयाके अनन्य भक्त हैं, तुम क्या हो? वह भक्त बोला कि हम तो कन्हैयाके फनन्य भक्त हैं। साधुने पूछा कि फनन्य भक्त क्या होता है भाई? वह बोला कि पहले आप बताओ कि अनन्य भक्त क्या होता है? साधुने कहा कि जो सूर्य, शक्ति, गणेश, शिव, ब्रह्म आदि किसीको भी नहीं मानता, केवल कन्हैयाको ही मानता है वह अनन्य भक्त होता है। भक्तने कहा कि बाबाजी, हम तो इन सुसुरोंका नाम भी नहीं जानते कि ये कौन होते हैं, इसलिये हम फनन्य भक्त हो गये!
अपरा (जगत्) और परा (जीव)—दोनों प्रकृतियाँ परमात्माकी हैं*। प्रकृति तो परमात्माकी है, पर परमात्मा प्रकृतिके नहीं हैं। जैसे, दियासलाईमें अग्नि तो रहती है, पर उसकी प्रकाशिका और दाहिका शक्ति नहीं रहती; अत: शक्तिके बिना अग्नि रह सकती है, पर अग्निके बिना शक्ति नहीं रह सकती। ऐसे ही प्रकृति (परा-अपरा)के बिना परमात्मा रह सकते हैं, पर परमात्माके बिना प्रकृति नहीं रह सकती। शक्तिमान् शक्तिके अधीन नहीं है, जबकि शक्ति शक्तिमान् के अधीन है। अत: जीव और जगत्—दोनों परमात्माके अधीन हैं—
क्षरं प्रधानममृताक्षरं हर: क्षरात्मानावीशते देव एक:।
(श्वेताश्वतर० १।१०)
क्षरं त्वविद्या ह्यमृतं तु विद्या विद्याविद्ये ईशते यस्तु सोऽन्य:।
(श्वेताश्वतर० ५।१)
तात्पर्य है कि आत्मा मुख्य नहीं है, प्रत्युत परमात्मा मुख्य हैं। विवेकसे अत्माका बोध (आत्मज्ञान) होता है और विश्वाससे परमात्माका बोध (परमात्मज्ञान) होता है। इसलिये विवेकसे भी विश्वास तेज है।
मनुष्यमें तीन शक्तियाँ हैं—करनेकी शक्ति, जाननेकी शक्ति और माननेकी शक्ति। प्राप्त करनेकी शक्ति मनुष्यमें नहीं है। प्राप्ति परमात्माकी ही होती है। करने और जाननेकी शक्तिसे प्राप्ति नहीं होती, प्रत्युत संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद और स्वरूपका बोध होता है। परन्तु माननेकी शक्तिसे परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है। इसलिये माननेकी शक्ति अर्थात् विश्वास क्रियाशक्ति और विवेकशक्तिसे भी तेज है।
विश्वास वास्तवमें वही है, जो अविनाशी, अपरिवर्तनशील वस्तुपर हो। नाशवान्, परिवर्तनशील वस्तुपर विश्वास करना विश्वासका महान् दुरुपयोग है। नाशवान् वस्तुपर विश्वास करके ही जीव जन्म-मरणरूप बन्धनमें पड़ा है। अत: नाशवान् वस्तुपर विश्वास महान् घातक है। विश्वास-मार्ग (भक्ति)में नाशवान् की आसक्ति मिटानेके लिये विवेक बहुत सहायक है। नाशवान् का विश्वास विवेक-विरुद्ध है। विवेक-विरुद्ध विश्वास रद्दी हो जाता है। अत: विश्वास विवेक-विरुद्ध नहीं होना चाहिये।
ज्ञानमें स्वरूप मुख्य है और भक्तिमें भगवान् मुख्य हैं। इसलिये ज्ञानी स्वरूपमें स्थित होता है—‘समदु:खसुख: स्वस्थ:’ (गीता १४।२४) और भक्त भगवान् में स्थित होता है—‘निवसिष्यसि मय्येव’ (गीता १२। ८)। स्वरूपमें स्थित होनेमें अखण्ड रस है और परमात्मामें स्थित होनेमें प्रतिक्षण वर्धमान अनन्त रस है।
ज्ञानीको भक्ति प्राप्त हो जाय, यह नियम नहीं है, पर भक्तको ज्ञानकी प्राप्ति भी हो जाती है, यह नियम है। यद्यपि भक्तको ज्ञानकी आवश्यकता नहीं है और वह भगवान् के चिन्तनमें, प्रेममें मस्त रहता है—‘तुष्यन्ति च रमन्ति च’ (गीता १०।९), तथापि उसमें किसी प्रकारकी कमी न रहे, इसलिये भगवान् अपनी तरफसे उसको ज्ञान प्रदान करते हैं*।
रामायणमें आया है—
मम दरसन फल परम अनूपा।
जीव पाव निज सहज स्वरूपा॥
(मानस, अरण्य० ३६।५)
राम भजत सोइ मुकुति गोसाईं।
अनइच्छित आवइ बरिआईं॥
(मानस, उत्तर० ११९।२)
जैसे भक्तिमार्गमें प्रेम बढ़ता है, ऐसे ही ज्ञानमार्गमें ज्ञानकी भूमिका बढ़ती रहती है। इसलिये चतुर्थ भूमिकामें ज्ञानप्राप्ति होनेपर भी आगे पाँचवीं, छठी और सातवीं भूमिका होती है। वास्तवमें देखा जाय तो ज्ञान नहीं बढ़ता, प्रत्युत अज्ञान मिटता है। अत: भूमिकाएँ ज्ञानकी नहीं होतीं, प्रत्युत अज्ञानकी होती हैं। ज्यों-ज्यों जडता मिटती है, त्यों-त्यों भूमिका बढ़ती जाती है। परन्तु प्रेमका बढ़ना और तरहका है। ज्ञानमें तो संसारसे उपरति मुख्य है, पर भक्तिमें भगवान् की ओर आकर्षण मुख्य है। ज्ञानमें तो असत् का त्याग करनेपर भी असत् की मानी हुई सूक्ष्म सत्ता (अहम्) साथ रहती है, पर भक्तिमें प्रेम बढ़नेपर असत् स्वत: छूट जाता है—संसारकी याद ही नहीं रहती अर्थात् ज्ञानकी छठी भूमिका ‘पदार्थाभावना’ स्वत:सिद्ध हो जाती है।
विवेकमें सत् और असत् —दोनों रहते हैं, इसलिये ज्ञानमार्गमें अहम् दूरतक साथ रहता है, जिससे चतुर्थ भूमिकामें तत्त्वज्ञान होनेपर भी पाँचवीं, छठी और सातवीं भूमिका होती है। सूक्ष्म अहम् रहनेके कारण ही दर्शन और दार्शनिकोंमें भेद रहता है; क्योंकि अहं भेदका जनक है। ज्ञानमार्गमें असत् का निषेध करते हैं, जिससे असत् की सत्ता आती है; क्योंकि असत् की सत्ता स्वीकार की है, तभी तो निषेध करते हैं! इसलिये विवेकमार्ग (ज्ञान) में तो द्वैत है, पर विश्वासमार्ग (भक्ति) में अद्वैत है। असत् से सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद अर्थात् अहम् का सर्वथा अभाव प्रेम प्राप्त होनेपर ही होता है। गोस्वामीजी कहते हैं—
प्रेम भगति जल बिनु रघुराई।
अभिअंतर मल कबहुँ न जाई॥
(मानस, उत्तर० ४९।३)
अहम् का सर्वथा अभाव होनेपर दर्शन और दार्शनिकोंमें भेद नहीं रहता, प्रत्युत ‘वासुदेव: सर्वम्’ रहता है।
अध्यास या भ्रम दो प्रकारका होता है—उपाधि-सहित और उपाधि-रहित। जैसे, दर्पणमें मुखका भ्रम उपाधि-सहित है; क्योंकि ‘दर्पणमें मुख नहीं है’—इस तरह भ्रमकी निवृत्ति होनेपर भी दर्पणरूपी उपाधि होनेसे दर्पणमें मुख दीखता है। परन्तु रज्जुमें सर्पका भ्रम उपाधि-रहित है; क्योंकि ‘यह सर्प नहीं है’—इस तरह भ्रमकी निवृत्ति होनेपर फिर सर्प नहीं दीखता, प्रत्युत रज्जु ही दीखती है। ज्ञानमें ‘उपाधि-सहित भ्रम’ मिटता है; अत: संसार तो दीखता है, पर उसमें आकर्षण नहीं होता। परन्तु भक्तिमें ‘उपाधि-रहित भ्रम’ मिटता है; अत: संसार नहीं दीखता, प्रत्युत केवल भगवान् ही दीखते हैं—‘वासुदेव: सर्वम्।’ इसलिये भगवान् ने ज्ञानियोंकी अपेक्षा भक्तोंको श्रेष्ठ बताया है।
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मता:॥
(गीता १२। २)
‘मेरेमें मनको लगाकर नित्य-निरन्तर मेरेमें लगे हुए जो भक्त परम श्रद्धासे युक्त होकर मेरी उपासना करते हैं, वे मेरे मतमें सर्वश्रेष्ठ योगी हैं।’