भक्तिकी सुलभता
विचार करनेसे स्पष्ट ज्ञात होता है कि आजके मनुष्यका जीवन स्वकीय शिक्षा, सभ्यता और संस्कृतिके परित्यागके कारण विलासयुक्त होनेसे अत्यधिक खर्चीला हो गया है। जीवन-निर्वाहकी आवश्यक वस्तुओंका मूल्य अधिक बढ़ गया है। व्यापार तथा नौकरी आदिके द्वारा उपार्जन बहुत कम होता है। इन कारणोंसे मनुष्योंको परमार्थ-साधनके लिये समयका मिलना बहुत ही कठिन हो रहा है और साथ-ही-साथ केवल भौतिक उद्देश्य हो जानेके कारण जीवन भी अनेक चिन्ताओंसे घिरकर दु:खमय हो गया है। ऐसी अवस्थामें कृपालु ऋषि-मुनि एवं संत-महात्माओंद्वारा त्रिताप-संतप्त प्राणियोंको शीतलता तथा शान्तिकी प्राप्ति करानेके लिये ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग, हठयोग, अष्टाङ्गयोग, लययोग, मन्त्रयोग और राजयोग आदि अनेक साधन कहे गये हैं और वे सभी साधन वास्तवमें यथाधिकार मनुष्योंको परमात्माकी प्राप्ति कराकर परम शान्ति प्रदान करनेवाले हैं। परंतु इस समय कलि-मलग्रसित विषय-वारि-मनोमीन प्राणियोंके लिये—जो अल्प आयु, अल्प शक्ति तथा अल्प बुद्धिवाले हैं—परम शान्ति तथा परमानन्दप्राप्तिका अत्यन्त सुलभ तथा महत्त्वपूर्ण साधन एकमात्र भक्ति ही है। उस भक्तिका स्वरूप प्रीतिपूर्वक भगवान् का स्मरण ही है, जैसा कि श्रीमद्भागवतमें भक्तिके लक्षण बतलाते हुए भगवान् श्रीकपिलदेवजी अपनी मातासे कहते हैं—
मद्गुणश्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये।
मनोगतिरविच्छिन्ना यथा गङ्गाम्भसोऽम्बुधौ॥
लक्षणं भक्तियोगस्य निर्गुणस्य ह्युदाहृतम्।
अहैतुक्यव्यवहिता या भक्ति: पुरुषोत्तमे॥
सालोक्यसार्ष्टिसामीप्यसारूप्यैकत्वमप्युत।
दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जना:॥
स एव भक्तियोगाख्य आत्यन्तिक उदाहृत:।
येनातिव्रज्य त्रिगुणं मद्भावायोपपद्यते॥
(३।२९।११—१४)
अर्थात् जिस प्रकार गङ्गाका प्रवाह अखण्डरूपसे समुद्रकी ओर बहता रहता है, उसी प्रकार मेरे गुणोंके श्रवणमात्रसे मनकी गतिका तैलधारावत् अविच्छिन्नरूपसे मुझ सर्वान्तर्यामीके प्रति हो जाना तथा मुझ पुरुषोत्तममें निष्काम और अनन्य प्रेम होना—यह निर्गुण भक्तियोगका लक्षण कहा गया है। ऐसे निष्काम भक्त, दिये जानेपर भी, मेरे भजनको छोड़कर सालोक्य, सार्ष्टि, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य मोक्षतक नहीं लेते। भगवत्सेवाके लिये मुक्तिका भी तिरस्कार करनेवाला यह भक्तियोग ही परम पुरुषार्थ अथवा साध्य कहा गया है। इसके द्वारा पुरुष तीनों गुणोंको लाँघकर मेरे भावको—मेरे प्रेमरूप अप्राकृत स्वरूपको प्राप्त हो जाता है।
इसी प्रकार श्रीमधुसूदनाचार्यने भी भक्तिरसायनमें लिखा है—
द्रुतस्य भगवद्धर्माद्धारावाहिकतां गता।
सर्वेशे मनसो वृत्तिर्भक्तिरित्यभिधीयते॥
अर्थात् भागवत-धर्मोंका सेवन करनेसे द्रवित हुए चित्तकी भगवान् सर्वेश्वरके प्रति जो तैलधारावत् अविच्छिन्न वृत्ति है, उसीको भक्ति कहते हैं।
उपर्युक्त लक्षणोंसे सिद्ध होता है कि अनन्य भावयुक्त भगवत्स्मृति ही भगवद्भक्ति है।
भगवद्वचनामृतस्वरूप परम गोपनीय एवं रहस्यपूर्ण ग्रन्थ श्रीमद्भगवद्गीताके आठवें अध्यायके आरम्भमें अर्जुनद्वारा किये हुए सात प्रश्नोंमेंसे अन्तिम प्रश्न यह है कि ‘हे भगवन्! आप अन्त समयमें जाननेमें कैसे आते हैं? अर्थात् मृत्युकालमें आप प्राणियोंद्वारा कैसे प्राप्त किये जा सकते हैं?’ इसका उत्तर देते हुए उसी अध्यायके पाँचवें श्लोकमें कहा गया है कि ‘अन्तकालमें भी जो केवल मेरा ही स्मरण करता हुआ शरीर छोड़कर जाता है, वह निस्संदेह मुझको ही प्राप्त होता है। अत: हे अर्जुन! तू सभी समयोंमें मेरा ही स्मरण कर तथा युद्ध (कर्तव्य-कर्म) भी कर। इस प्रकार मुझमें मन-बुद्धिको लगाये हुए तू निस्संदेह मुझको ही प्राप्त होगा (गीता ८। ७)।’ ऐसे ही सगुण-निराकार परमात्मस्वरूपकी प्राप्तिके विषयमें भगवान् कहते हैं—
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्॥
(गीता ८। ८)
अर्थात् हे पृथानन्दन! यह नियम है कि परमेश्वरके ध्यानके अभ्यासरूप योगसे युक्त, अन्य ओर न जानेवाले चित्तसे निरन्तर चिन्तन करता हुआ प्राणी परमप्रकाशस्वरूप दिव्य पुरुषको अर्थात् परमेश्वरको ही प्राप्त होता है। फिर आगेके श्लोकमें भगवान् कहते हैं—
कविं पुराणमनुशासितार-
मणोरणीयांसमनुस्मरेद्य:।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप-
मादित्यवर्णं तमस: परस्तात्॥
(गीता ८। ९)
अर्थात् जो पुरुष सर्वज्ञ, अनादि, सबके नियामक, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म, सबके धारण-पोषण करनेवाले, अचिन्त्य-स्वरूप, सूर्यके सदृश नित्य चेतन, प्रकाशस्वरूप एवं अविद्यासे अति परे शुद्ध सच्चिदानन्दघन परमात्माको स्मरण करता है, वह परम पुरुष परमात्माको ही प्राप्त होता है।
इसी अध्यायके ग्यारहवें श्लोकमें निर्गुण-निराकार परमात्मस्वरूपकी प्राप्तिके विषयमें उस परब्रह्मकी प्रशंसा तथा बतलानेकी प्रतिज्ञा करके बारहवें श्लोकमें उस परमात्माकी प्राप्तिकी विधि बतलाते हुए आगेके श्लोकमें कहते हैं—
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन् मामनुस्मरन्।
य: प्रयाति त्यजन् देहं स याति परमां गतिम्॥
(गीता ८।१३)
अर्थात् ‘जो पुरुष ‘ॐ’ इस एक अक्षररूप ब्रह्मका उच्चारण करता हुआ और (उसके अर्थस्वरूप) मेरा चिन्तन करता हुआ शरीरको त्यागकर जाता है, वह पुरुष परम गतिको प्राप्त होता है।’
इसी प्रकार भगवान् ने सगुण-स्वरूप तथा निर्गुण-स्वरूप परमात्माकी प्राप्तिके उपाय बतलाये, परंतु दोनों साधनोंमें योगके अभ्यासकी अपेक्षा होनेके कारण साधनमें कठिनता है, अत: अब आगे अपनी प्राप्तिकी सुलभता बताते हुए भगवान् अपने प्रिय सखा कुन्तीनन्दन अर्जुनके प्रति कहते हैं—
अनन्यचेता: सततं यो मां स्मरति नित्यश:।
तस्याहं सुलभ: पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिन:॥
(गीता ८।१४)
‘हे पृथापुत्र अर्जुन! जो मनुष्य नित्य-निरन्तर अनन्य चित्तसे मुझ परमेश्वरका स्मरण करता है, उस निरन्तर मुझमें लगे हुए योगीके लिये मैं सुलभ हूँ—वह सुगमतापूर्वक मुझे पा सकता है।’
अब आप देखेंगे कि गीताभरमें ‘सुलभ’ पद केवल इसी स्थानपर इसी श्लोकमें आया है। इस सौलभ्यका एकमात्र कारण अनन्य भावसे नित्य-निरन्तर भगवान् का स्मरण ही है। आप कह सकते हैं कि जो प्रभु अपने स्मरणमात्रसे इतने सुलभ हैं, उनका स्मरण बिना उनके स्वरूप-ज्ञानके क्योंकर किया जा सकता है। इसका उत्तर यह है कि आजतक आपने भगवत्स्वरूपके सम्बन्धमें जैसा कुछ शास्त्रोंमें पढ़ा, सुना और समझा है, तदनुरूप ही उस भगवत्स्वरूपमें अटल श्रद्धा रखते हुए भगवान् के शरण होकर उनके महामहिमशाली परमपावन नामके जपमें तथा उनके मङ्गलमय दिव्य स्वरूपके चिन्तनमें आपको तत्परतापूर्वक लग जाना चाहिये और यह दृढ़ विश्वास रखना चाहिये कि उनके स्वरूपविषयक हमारी जानकारीमें जो कुछ भी त्रुटि है, उसे वे करुणामय परमहितैषी प्रभु अवश्य ही अपना सम्यग्ज्ञान देकर पूर्ण कर देंगे, जैसा कि भगवान् ने स्वयं गीताजीमें कहा है—
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तम:।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥
(१०। ११)
‘हे पृथापुत्र! उनके ऊपर अनुकम्पा करनेके लिये उनके अन्त:करणमें स्थित हुआ मैं स्वयं ही उनके अज्ञानजनित अन्धकारको प्रकाशमय तत्त्वज्ञानरूप दीपकके द्वारा नष्ट कर देता हूँ।’
इस प्रकार प्रेमपूर्वक भगवान् का भजन करनेसे वे परमप्रभु हमारे योगक्षेम अर्थात् अप्राप्तकी प्राप्ति तथा प्राप्तकी रक्षा स्वयं करते हैं।
भजन उसीको कहते हैं, जिसमें भगवान् का सेवन हो तथा सेवन भी वही श्रेष्ठ है, जो प्रेमपूर्वक मनसे किया जाय। मनसे प्रभुका सेवन तभी समुचितरूपसे प्रेमपूर्वक होना सम्भव है, जब हमारा उनके साथ घनिष्ठ अपनापन हो और प्रभुसे हमारा अपनापन तभी हो सकता है, जब संसारके अन्य पदार्थोंसे हमारा सम्बन्ध और अपनापन न हो।
वास्तवमें विचार करके देखें तो यहाँ प्रभुके सिवा अन्य कोई अपना है भी नहीं; क्योंकि प्रभुके अतिरिक्त अन्य जितनी भी प्राकृत वस्तुएँ हमारे देखने, सुनने एवं समझनेमें आती हैं, वे सभी निरन्तर हमारा परित्याग करती जा रही हैं अर्थात् नष्ट होती जा रही हैं।
इसीलिये संत कबीरजी महाराज कहते हैं—
दिन दिन छाँडॺा जात है, तासों किसा सनेह।
कह कबीर डहक्या बहुत गुणमय गंदी देह॥
अत: अन्य किसीको भी अपना न समझकर केवल प्रभुका प्रेमपूर्वक अनन्य भावसे स्मरण करना ही उनकी प्राप्तिका महत्त्वपूर्ण तथा सुलभ साधन है।
इस अनन्य भावको प्राप्त करनेके लिये यह समझनेकी परम आवश्यकता है कि यह जीवात्मा परमात्मा और प्रकृतिके मध्यमें है और जबतक इसकी उन्मुखता प्रकृतिके कार्यस्वरूप बुद्धि, मन, इन्द्रिय, प्राण, शरीर तथा तत्सम्बन्धी धन, जन आदिकी ओर रहती है, तबतक यह प्राणी अन्यका आश्रय छोड़कर केवल परमात्माका आश्रय नहीं ले सकता। अत: मेरा कोई नहीं है तथा मैं सेवा करनेके लिये समस्त संसारका होते हुए भी वास्तवमें एक परमात्माके सिवा अन्य किसीका नहीं हूँ—इस प्रकारका दृढ़ निश्चय ही प्राणीको अनन्यचित्तवाला बनानेमें परम समर्थ है। इस प्रकार ‘चेतसा नान्यगामिना’ (८।८); ‘अनन्येनैव योगेन’ (१२। ६), ‘मां च योऽव्यभिचारेण’ (१४।२६); ‘अनन्याश्चिन्तयन्तो माम्’ (९। २२), मच्चित्ता:’ (१०।९), ‘मन्मना भव’ (९।३४); (१८।६५); ‘मच्चित्त: सततं भव’ (१८।५७); ‘मच्चित्त: सर्वदुर्गाणि’ (१८।५८),‘मय्येव मन आधत्स्व’ (१२। ८) तथा ‘मय्यर्पितमनोबुद्धि:’ (८। ७)—आदि-आदि महत्त्वपूर्ण वाक्योंद्वारा परमात्माकी प्राप्तिरूप फल बतलाकर अनन्यभावसे भगवान् के चिन्तन-भजनकी अत्यधिक महिमा गायी गयी है, अस्तु जिसकी धारणामें श्रीभगवान् के सिवा अन्य किसीके प्रति महत्त्वबुद्धि नहीं है, वही अनन्यचित्तवाला अर्थात् अनन्य भावसे स्मरण करनेवाला है। अब रहा ‘सततम्’ पद, सो निरन्तर चिन्तन तो प्रभुके साथ अखण्ड नित्य सम्बन्धका ज्ञान होनेसे ही हो सकता है।
इसपर श्रीकबीरदासजीकी निम्नाङ्कित उक्तिपर ध्यान दें। वे कहते हैं—
जहँ जहँ चालूँ करूँ परिक्रमा, जो कुछ करूँ सो पूजा।
जब सोऊँ तब करूँ दण्डवत, जानूँ देव न दूजा॥
इस प्रकार उस नित्ययुक्त योगीके लिये भगवान् स्वत: ही सुलभ हैं। दुर्लभता तो हमने भगवान् के अतिरिक्त अन्य सदा न रहनेवाली अस्थायी वस्तुओंसे सम्बन्ध जोड़कर पैदा कर ली है। इसके दूर होते ही भगवान् के साथ तो हमारा नित्य-निरन्तर अखण्ड सम्बन्ध स्वत:सिद्ध है ही; अत: हमें अपना सम्बन्ध अन्य किसीसे न जोड़कर नित्य-निरन्तर एकमात्र अपने उन परमहितैषी प्रभुके साथ ही जोड़ना चाहिये, जो प्राणिमात्रके परम सुहृद् एवं अकारण कारुणिक हैं तथा उन्हींसे ममता करनी चाहिये। फिर तो वे दयामय श्रीहरि हमें आप ही अपना लेंगे, जैसा कि उन्होंने अपने परम प्रिय सखा अर्जुनको अपनाते हुए कहा था—
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:॥
(१८।६६)
‘(हे अर्जुन!) सम्पूर्ण धर्मोंको अर्थात् सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मोंको मुझमें त्यागकर तू एक मुझ सर्वशक्तिमान् सर्वाधार परमेश्वरकी ही शरणमें आ जा; मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर।’
यह नियम है कि स्वरचित वस्तु चाहे कैसी ही क्यों न हो, हमको प्रिय लगती ही है। ऐसे ही यह सम्पूर्ण विश्व प्रभुका रचा हुआ तथा अपना होनेके नाते स्वाभाविक ही उन्हें प्रिय है ही। यथा—
अखिल बिस्व यह मोर उपाया।
सब पर मोहि बराबरि दाया॥
फिर उसके लिये तो कहना ही क्या है, जो सब ओरसे मुख मोड़कर एकमात्र उन प्रभुका हो जाता है। वह तो उन्हें परम प्रिय है ही। यथा—
तिन्ह महँ जो परिहरि मद माया।
भजै मोहि मन बच अरु काया॥
पुरुष नपुंसक नारि वा जीव चराचर कोइ।
सर्ब भाव भज कपट तजि मोहि परम प्रिय सोइ॥
इसी प्रकार मानसमें सुतीक्ष्णजी भी कहते हैं—
एक बानि करुनानिधान की।
सो प्रिय जाकें गति न आन की॥
अत: जिसको स्वयं भगवान् अपनी ओरसे प्रिय मानें, उसे भगवान् सुलभ हो जायँ— इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता; जैसा कि श्रीभगवान् ने स्वयं अपने श्रीमुखसे अर्जुनके प्रति कहा है—
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्परा:।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते॥
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।
भवामि नचिरात् पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्॥
(गीता १२। ६-७)
‘जो मेरे ही परायण रहनेवाले भक्तजन सम्पूर्ण कर्मोंको मुझमें अर्पण करके मुझ सगुणरूप परमेश्वरको ही अनन्य भक्तियोगसे निरन्तर चिन्तन करते हुए भजते हैं, हे पार्थ! उन मुझमें चित्त लगानेवाले प्रेमी भक्तोंका मैं शीघ्र ही मृत्युरूप संसार-समुद्रसे उद्धार करनेवाला होता हूँ।’