भक्तियोग (आस्तिक साधना)
गीतामें भक्ति और उसके अधिकारी
श्रीमद्भगवद्गीताकी महिमा अपार है। यह श्रीभगवान् की दिव्य वाणी है, इसके रचयिता स्वयं भगवान् वेदव्यास हैं। सर्वविघ्न-विनाशक श्रीगणेशजी इसके लेखक हैं। सभी सम्प्रदायोंके प्रमुख आचार्योंने इसपर भाष्य लिखे हैं। इस ग्रन्थरत्नपर टीका लिखनेवाले अच्छे-अच्छे त्यागी तथा बहुत-से महात्मा पुरुष हो चुके हैं। अच्छे-अच्छे दिग्विजयी पण्डितोंने भी उसपर अपने भाव व्यक्त किये हैं। इतना ही नहीं, हिंदूधर्मको न माननेवाले विदेशी सज्जनोंने भी इसपर बहुत कुछ लिखा है। संसारमें श्रीमद्भगवद्गीतापर जितने भाष्य, टीकाएँ, लेख, समालोचनाएँ, प्रश्नोत्तर और विचार किये गये हैं, उतनी टीकाएँ और उतने विवेचन पृथ्वीमण्डलके अन्य किसी भी ग्रन्थपर नहीं हुए हैं। हाँ, बाइबलपर बहुत-से अनुवाद मिलते हैं और अब भी होते जा रहे हैं; परंतु उसके इतने विस्तारका प्रधान कारण राजसत्ता तथा धनकी अधिकता ही है। श्रीमद्भगवद्गीताके विषयमें यह बात नहीं है। यह जड राज्य और ऐश्वर्यकी सहायताकी अपेक्षा नहीं रखती। इसमें तो ऐसी अलौकिक तथा विलक्षण शक्ति संनिहित है, जिससे यह जिस विचारशील विद्वान् के हाथों पड़ी, वही इसपर लिखनेके लिये बाध्य हो गया अर्थात् उसने बड़े प्रेम और आदरसे इसपर कुछ लिखकर अपनेको धन्य समझा और अपनी लेखनीको पवित्र किया।
ऐसे अलौकिक ग्रन्थपर मेरे-जैसे एक साधारण व्यक्तिका कुछ कहना अथवा लिखना दुस्साहसमात्र है; परंतु इसी बहाने पतितपावन भगवान् के पवित्रतम वाक्योंके यत्किञ्चित् मनन तथा अनुशीलनका अवसर मिल जाय, इस उद्देश्यसे यह बालचपलता की जाती है। विज्ञजन मेरी इस धृष्टताको क्षमा करें।
श्रीमद्भगवद्गीतामें कर्म, भक्ति और ज्ञानकी त्रिवेणी लहरा रही है, इसके पद-पदमें अलौकिक अर्थ भरे हैं, जो पुरुष इस भगवन्मय ग्रन्थरत्नको जिस दृष्टिसे देखता है, उसको यह वैसा ही दृष्टिगोचर होता है। यथा—
जिन्ह की रही भावना जैसी।
प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी॥
भगवद्विग्रहकी भाँति भगवद्वाणीकी भी यही बात है। कर्मप्रधान साधनवाले मनुष्योंको यह ग्रन्थ कर्मप्रधान ही प्रतीत होता है। इसमें आदिसे अन्ततक केवल कर्तव्य-कर्म करनेपर ही जोर दिया मालूम देता है। यदि कहीं भक्ति और ज्ञानका वर्णन है, तो यह गौण और कर्मोंका पोषक ही है। और यह बात युक्तिसंगत भी दीखती है। यहाँ युद्धस्थलमें कर्मशील अर्जुन तथा श्रीकृष्णचन्द्रजी महाराजके द्वारा कर्मका विवेचन होना ही प्रासङ्गिक जान पड़ता है।
भक्तिके पूज्यतम आचार्योंका कहना है कि भगवद्गीतामें केवल भक्तिका ही वर्णन है। कर्म और ज्ञान—दोनों इस भक्तिके ही सहायक हैं। ग्रन्थके आदि और अन्तपर विचार करनेसे इसी बातकी पुष्टि होती है। दूसरे अध्यायके सातवें श्लोकमें अर्जुन जब शिष्यभावसे भगवान् के प्रपन्न (शरणागत) होकर उनसे श्रेयके लिये प्रार्थना करते हैं, तब भगवान् उनकी शङ्काओंका समाधान करके अन्तमें सर्वगुह्यतम उपदेश देते हुए कहते हैं कि ‘तू एकमात्र मेरी शरणमें आ जा। मैं सब पापोंसे तुझे मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर’ (१८। ६६)। इससे यह ग्रन्थ भगवद्भक्तिप्रधान ही सिद्ध होता है।
इसी प्रकार अद्वैत-सिद्धान्तके आदरणीय आचार्य-चरणोंका कथन है कि इसमें सिद्धान्तरूपसे केवल ज्ञानका ही विवेचन किया गया है। कर्म और भक्तिका वर्णन तो मल और विक्षेपरूप अन्त:करणके दोषोंको दूरकर ज्ञानका अधिकारी बनानेके लिये ही हुआ है। यह भी युक्तिसंगत और शास्त्रसम्मत है। भगवान् ने उपदेशका आरम्भ भी ज्ञानसे ही किया है (गीता २।११)। ज्ञानकी महिमा ही विशेषतासे कही है—‘न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते’ (गीता ४।३८)।
ऐसी सर्वतोभद्र अलौकिक श्रीमद्भगवद्गीताका वास्तविक आशय एकमात्र भगवान् ही जानते हैं। एक मनुष्य जो माप और तौलमें आ जाता है, उसके भी भावोंका अन्त पाना कठिन हो जाता है; फिर भगवान् तो अनन्त, अपार और असीम हैं। अत: उनके भावोंका थाह कोई कैसे पा सकता है। तथापि—‘सब जानत प्रभु प्रभुता सोई। तदपि कहे बिनु रहा न कोई॥’ इस उक्तिके अनुसार कुछ निवेदन किया जाता है। गीताका निष्पक्षभावसे विचार करनेपर ऐसा प्रतीत होता है कि इसमें कर्म, भक्ति और ज्ञानका पूर्णरूपेण विशद वर्णन किया गया है; कोई भी विषय अधूरा नहीं रहा है।
श्रीगीताका अध्ययन करनेवाले जिज्ञासु या तत्त्वालोचक विद्वान् के लिये इस बातपर ध्यान देनेकी विशेष आवश्यकता प्रतीत होती है कि वह अपनेको किसी मतमें ढालकर उसी दृष्टिसे गीताको न देखे—गीताका अर्थ अपने मतके अनुसार लगानेकी चेष्टा न करे, अपितु अपनेको गीताका अनुवर्ती बनानेके लिये उसके मूल श्लोकों तथा भावोंका मनन करे। गीतामें जैसा लिखा है, उसके अनुसार साधनात्मक विचार करते हुए परमात्माकी ओर अग्रसर होनेकी चेष्टा करनी चाहिये। उसके भावोंको समझनेके लिये भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रजी महाराजके अनन्यशरण होकर ऐसा विश्वास निरन्तर बढ़ाता रहे कि अपने दिव्य वाणीका यथार्थ भाव भगवान् मुझे अवश्य समझायेंगे तो वह अपने लिये परमोपयोगी भावोंको समझ सकेगा।
युद्धारम्भके समय अपने स्वजन-बान्धवोंके नाशकी आशङ्कासे व्याकुल हुए अर्जुन भगवान् की शरणमें जाते हैं और उनसे प्रेय—लौकिक उन्नति नहीं, अपितु अपने निश्चित श्रेय—कल्याणकी ही बात पूछते हैं—‘यच्छ्रेय: स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे’ (२। ७); ‘तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्’ (३। २); ‘यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्’ (५।१) तब भगवान् सम्पूर्ण वेद और उपनिषद् आदिमें बताये हुए समस्त कल्याणमय साधनोंका सार श्रीगीताके रूपमें कहते हैं। सच्ची बात तो यह है कि जो भगवान् कहते हैं, वही सबका सार है। वेद-शास्त्रोंको आदर देनेके लिये ही भगवान् ने वेद, शास्त्रों तथा उपनिषदोंका प्रमाण दिया है (१३।४)। श्रीभगवान् ने उन शास्त्रोक्त साधनोंमें जो कुछ कमी दीखती थी, उसे पूरा किया, उनमें जो परस्पर विरोध प्रतीत होता था, उसका निराकरण किया और उन सिद्धान्तोंका परिमार्जन करके थोड़े शब्दोंमें उन्हें विस्तारपूर्वक बार-बार समझाया। एक ही बातको अनेक युक्तियोंसे समझानेपर भी विशेषता यह है कि पुनरुक्तिका दोष नहीं आया और थोड़े शब्दोंमें कहनेपर भी कमी नहीं रही। कहीं-कहीं श्लोकार्धोंकी पुनरुक्ति अवश्य आती है, किंतु वह सहेतुक है। विचार करनेपर वहाँ बड़ी विलक्षणता जान पड़ती है।
कल्याणकारी शास्त्रों तथा सम्प्रदायाचार्योंके सिद्धान्तोंमें अनेक मतभेद हैं—अद्वैत, द्वैत, द्वैताद्वैत, विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैत आदि। इन सबका अन्तर्भाव अद्वैत और द्वैतमें ही किया जा सकता है। इन दो का ही वर्णन भगवान् ने सांख्य और योगनिष्ठाके नामसे किया है। इन दोनोंको अभेद और भेदमार्ग भी कह सकते हैं। सांख्यनिष्ठामें आत्मा और परमात्माका अभेद मानकर साधन किया जाता है। वह इस लेखका विषय न होनेसे उसे छोड़कर योगनिष्ठाका ही वर्णन किया जाता है; क्योंकि भक्ति योगनिष्ठाके ही अन्तर्गत है। भगवदाज्ञानुसार फल और आसक्तिको त्यागकर अपने कर्तव्यकर्मोंका पालन करना योगनिष्ठा है। योगनिष्ठा तीन प्रकारकी होती है—
(१) कर्मप्रधान, (२) भक्तिमिश्रित तथा (३) भक्तिप्रधान।
इन तीनोंमें भगवान् ने भक्तिप्रधान कर्मनिष्ठाकी ही अधिक प्रशंसा की है और स्पष्ट शब्दोंमें यह घोषित किया कि सब प्रकारके योगियोंमें मद्गतचित्त होकर श्रद्धापूर्वक मेरा भजन करनेवाला सर्वश्रेष्ठ—युक्ततम है (६।४७)।
श्रीमद्भगवद्गीतामें भगवान् ने व्यवहारमें परमार्थ-सिद्धिरूप विलक्षण कला दिखलायी है, जिससे हर एक वर्ण और हर एक आश्रमका मनुष्य भगवान् के शरण होकर शीघ्रातिशीघ्र सुगमतापूर्वक उन्हें प्राप्त कर सकता है। उस शरणागतिका ही भगवान् ने भगवद्भक्ति, भगवदाश्रय आदि शब्दोंसे वर्णन किया है। कहीं शरणागति कहकर आगे ‘भक्ति’ शब्द दे दिया है (९।३२—३४); कहीं भक्ति कहकर उसे शरणागति कह दिया है (११।५४-५५)। इससे मालूम होता है कि शरणागति और भक्तिमें अन्तर नहीं है।
सम्पूर्ण गीताको छ:-छ: अध्यायोंके तीन षट्कोंमें विभक्त किया जा सकता है, जिनमें पहलेसे छठे अध्यायतक कर्मका, सातवेंसे बारहवें अध्यायतक उपासनाका और तेरहवेंसे अठारहवें अध्यायतक ज्ञानका वर्णन किया गया है। पहले षट्कमें जितने विस्तारके साथ कर्मकाण्डका वर्णन है, उतना दूसरे और तीसरे षट्कोंमें नहीं है। दूसरे षट्कमें जितना उपासनाका वर्णन किया गया है, उतना प्रथम और तृतीय षट्कमें नहीं और तीसरे षट्कमें ज्ञानका जितना विस्तृत वर्णन देखा जाता है, उतना प्रथम और द्वितीय षट्कमें नहीं। इसलिये पहले षट्कको कर्म-काण्डपरक, दूसरेको उपासना-काण्डपरक तथा तीसरेको ज्ञान-काण्डपरक कहा जा सकता है; परंतु दूसरे षट्कमें अर्थात् सातवेंसे बारहवें अध्यायतक भगवान् ने ऐसी विलक्षणताके साथ भक्तिका वर्णन किया है, जिससे ज्ञान और कर्मका उतना सम्मिश्रण नहीं होने पाया है, जितना कि पहले षट्कमें कर्मका निरूपण करते हुए भी ज्ञान और भक्तिका हो गया है। तीसरे षट्कमें तो ज्ञानका वर्णन करते हुए पहले षट्ककी अपेक्षा भी कर्म और भक्तिका अधिक मिश्रण हुआ है। जैसे तेरहवें और चौदहवेंमें ज्ञानका तथा पंद्रहवें अध्यायमें भक्तिका वर्णन करके सोलहवेंमें दैवी सम्पत्ति और आसुरी सम्पत्तिका अर्थात् भक्तिके अधिकारी और अनधिकारियोंका वर्णन करते हुए १७वें अध्यायमें तीन प्रकारकी श्रद्धाका विवेचन किया गया है, जो श्रद्धा कर्म, ज्ञान और भक्ति तीनोंमें ही आवश्यक होती है। अठारहवें अध्यायमें कर्म, भक्ति और ज्ञान—तीनोंका विशुद्ध विवेचन है और अन्तमें भक्तिसे ही ग्रन्थका उपसंहार किया गया है। उपदेशका आरम्भ भी अर्जुनके शरणागत होनेपर ही हुआ है। इसलिये आदि और अन्तमें भी भक्तिकी ही पावन मन्दाकिनी प्रवाहित होती दिखायी देती है।
ऐसे ही भगवद्गीताके मध्यमें भी सारभूत होनेसे भक्तिका वर्णन है, मध्यम भाग नवाँ और दसवाँ अध्याय होता है, इसलिये भगवान् ने उसमें अत्यन्त गोपनीय रहस्यका वर्णन करनेके कारण ही नवें अध्यायका ‘राजविद्याराजगुह्ययोग’ और दसवेंका ‘विभूतियोग’ नाम दिया है। भगवद्गीतामें जहाँ कहीं भी गुह्य, गुह्यतर, गुह्यतम, राजगुह्य, सर्वगुह्यतम और रहस्य आदि शब्द आये हैं, वहाँ भगवान् ने सगुणतत्त्वकी ओर ही निर्देश किया है; क्योंकि स्वयं भगवान् होते हुए अपनेको छिपाकर मनुष्यके रूपमें लीला कर रहे हैं, यह गुप्त रहस्यकी बात है।
दसवें अध्यायमें भगवान् ने अपनी दिव्य विभूतियोंका वर्णन किया है। इसलिये उसका नाम ‘विभूतियोग’ है। वे विभूतियाँ सगुणतत्त्वकी ही हो सकती हैं। उक्त दोनों अध्यायोंमें जो नवेंका अन्तिम और दसवेंका आदि भाग है, यही गीताके मध्यमें पड़ता है। इसलिये इसको गीताका ‘हृदय’ कह सकते हैं। नवें अध्यायके आदिमें भगवान् विज्ञानसहित ज्ञान कहनेकी प्रतिज्ञा करके चौथे, पाँचवें, छठे श्लोकोंमें उदाहरणसहित राजविद्याका वर्णन करते हैं। उसके बाद अपनेसे संसारकी उत्पत्ति-प्रलयका प्रकरण बतलाकर अपनेको साधारण मनुष्य मानकर अवज्ञा करनेवालोंकी निन्दा करते हैं (९।११) और कहते हैं कि जो महात्मा हमें सम्पूर्ण भूतोंका अविनाशी कारण मानकर अनन्यभावसे भजन करते हैं (९।१३) ऐसे भक्तोंका योगक्षेम मैं स्वयं ही वहन करता हूँ (९।२२)। यद्यपि अन्य देवता भी भगवान् के अतिरिक्त कुछ भी न होनेके कारण अन्य देवताओंकी भक्ति भी प्रकारान्तरसे भगवान् की ही भक्ति मानी जा सकती है, परंतु उनको भगवत्स्वरूप न समझनेके कारण वह विधिपूर्वक यथार्थ भक्ति नहीं है। शास्त्रोंमें जिन-जिन देवताओंकी पूजाके लिये पूजा-पद्धति, मन्त्र, सामग्री आदिका जो-जो विधान है, उसके अनुसार यथार्थ रीतिसे पूजा करनेपर बड़े-से-बड़ा फल उन देवताओंके लोकोंकी प्राप्ति ही है, भगवान् की प्राप्ति नहीं। किंतु यथार्थ भक्तिसे तो भगवान् भी सुलभ हो जाते हैं (८।१४)। भगवान् के पूजनमें उतनी विधि, मन्त्र और सामग्रीकी आवश्यकता नहीं है; वहाँ तो एकमात्र भावकी ही प्रधानता है। कितनी सुगमता है! भगवान् कहते हैं—
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मन:॥
(९। २६)
‘जो कोई भक्त मेरे लिये प्रेमसे पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है, उस शुद्धबुद्धि निष्काम प्रेमी भक्तका प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र-पुष्पादि मैं सगुणरूपसे प्रकट होकर प्रीतिसहित खाता हूँ।’
इस श्लोकमें भगवान् ने पत्र-पुष्पादिका नाम लेकर ‘भक्ति’ शब्दका दो बार प्रयोग किया है। इसके द्वारा भगवान् यह व्यक्त करते हैं कि मुझे विविध सामग्रियोंकी आवश्यकता नहीं है। अनायास ही जो कुछ भी भक्तको मिल जाय, वही भक्तिपूर्वक सच्चे हृदयसे अर्पण कर देनेसे मैं संतुष्ट हो जाता हूँ। जैसे द्रौपदीके दिये हुए शाक-पत्रसे भगवान् प्रसन्न हो गये। गजेन्द्रके अर्पण किये हुए पुष्पको लेनेके लिये वैकुण्ठसे दौड़े हुए आये। शबरीके प्रेमपूर्वक परोसे हुए फलोंके समान मधुरताका अनुभव भगवान् ने और कहीं किया ही नहीं तथा महाराज रन्तिदेवके जलमात्रसे तृप्त होकर उनका कल्याण कर दिया। इन पत्र, पुष्प, फल तथा जलको स्वीकार करनेमें भक्तोंके सच्चे हृदयकी विकलता और अनन्य प्रेम ही प्रधान कारण थे। भगवान् इसी प्रेमके वशीभूत होकर पत्र-पुष्पको भी (जो खानेकी चीज नहीं है) खाते हैं। वे स्वयं कहते हैं—‘अश्नामि’ अर्थात् मैं खाता हूँ। प्रिय भक्तवर अर्जुनके लिये तो पत्र-पुष्पादि सामग्रीकी भी आवश्यकता न रखते हुए वे कहते हैं—‘भैया कुन्ती-नन्दन! तुम स्वाभाविक ही जो कुछ करते हो, जो कुछ खाते हो, जो होम करते हो, जो दान देते हो और जो तप करते हो, वह सब मुझे समर्पण कर दो’ (९। २७)। इस प्रकार समर्पण कर देनेसे शुभाशुभ दोनों प्रकारके फलोंसे मुक्त होकर मुझे प्राप्त कर लोगे (९।२८)।
यहाँ यह शङ्का होती है कि भगवान् में विषमता है क्या? जो वे सर्वस्व समर्पण करनेवालेका ही उद्धार करते हैं, अन्यका नहीं? इसका समाधान स्वयं भगवान् ही करते हैं—
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रिय:।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥
(९।२९)
अर्थात् ‘मैं सब भूतोंमें समभावसे व्यापक हूँ, न कोई मेरा अप्रिय है और न प्रिय है। परंतु जो भक्त मुझको प्रेमसे भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें प्रत्यक्ष प्रकट हूँ।’
इस श्लोकमें भगवान् ने प्राणिमात्रमें अपनी समताका निर्देश किया है। ‘मैं प्राणिमात्रमें सम हूँ।’ अर्थात् समान रूपसे व्यापक, सबका परम सुहृद् और पक्षपातरहित हूँ। कोई भी प्राणी मेरा प्रिय अथवा अप्रिय नहीं है। इस भूतसमुदायमेंसे जो कोई भी जीव प्रेमपूर्वक मेरा भजन करते हैं, वे मुझमें हैं और मैं उनमें हूँ। अर्थात् वे मेरे प्रियतम हैं, मैं उनका प्रियतम हूँ। वे मुझे सर्वस्व समर्पण कर देते हैं और मैं भी अपना सर्वस्व तथा अपने-आपको भी उनपर निछावर कर देता हूँ। मेरी-उनकी इतनी घनिष्ठता है कि मैं और वे दोनों ही एक हो जाते हैं।
‘तस्मिंस्तज्जने भेदाभावात्।’ ‘यतस्तदीया:।’
(नारदभक्तिसूत्र ४१। ७३)
‘वे मुझे स्वामी समझते हैं, उन्हें मैं सेवक समझता हूँ। वे मुझे पिता समझते हैं तो मैं उन्हें पुत्र समझता हूँ। पुत्र माननेवालोंको पिता, मित्र समझनेवालोंको मित्र और प्रियतम समझनेवालेको प्रियतम समझता हूँ। जो मेरे लिये व्याकुल होते हैं, उनके लिये मैं भी अधीर हो उठता हूँ। जो मेरे बिना नहीं रह सकते, उनके बिना मैं भी नहीं रह सकता। जो जिस भावसे मुझे भजते हैं, मैं भी उसी भावसे उनको भजता हूँ।’
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
(४।११)
भाव ही नहीं, क्रियामें भी जो मेरी ओर तेजीसे दौड़ते हैं, मैं भी उनकी ओर तीव्र गतिसे दौड़ता हूँ। यहाँ यह बात ध्यान देनेयोग्य है कि अल्पशक्तिमान् जीवकी क्रिया अपनी शक्तिके अनुसार होगी और अनन्त शक्तिसम्पन्न परमात्माकी उनकी शक्तिके अनुसार। अर्थात् अल्पशक्ति रखनेवाला जीव यदि अपनी पूरी शक्ति लगाकर कुछ भी आगे बढ़ा तो भगवान् भी अपनी पूरी शक्ति लगा शीघ्र ही उससे आ मिलेंगे। भगवान् को पूरी शक्तिसे अपनी ओर आकर्षित करनेका सरल उपाय है—उनकी ओर अपनी पूरी शक्तिसे अग्रसर होना। भक्तोंका ऐसा विलक्षणभाव है कि वे चेष्टारहित परमात्मासे भी चेष्टा करवा देते हैं। सर्वदेशी व्यापक और निराकार परमेश्वरको एक देशमें प्रकट करके देख लेते हैं। निर्गुणको सगुणरूपमें प्रकट होनेके लिये बाध्य कर देते हैं। जो सबसे सर्वथा उदासीन हैं, उन परमात्माको भी वे अपनी ओर आकृष्ट कर लेते हैं। वे प्रभुके प्यारे भक्त जिस समय जैसे रूपमें उन्हें देखना चाहते हैं, उस समय भगवान् को उसी रूपमें दर्शन देना पड़ता है, कैमरेका काँच जैसे सामने दीखनेवाले रूपको खींच लेता है। उससे अत्यन्त अधिक विलक्षणताके साथ भगवान् को खींचनेका आकर्षण भगवद्भक्तके प्रेममें होता है। कैमरा तो सामनेकी जड वस्तुकी उस आकृतिमात्रको ही खींचता है, परंतु भगवद्भक्तका प्रेम चिन्मय परमात्माको अपने मनचाहे रूपमें खींच लेता है। इसलिये भगवान् कहते हैं—
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्।
श्रीमद्भागवतमें भगवान् कहते हैं—
साधवो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयं त्वहम्।
मदन्यत् ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपि॥
(९।४।६८)
‘साधुओंका मैं हृदय हूँ और संतलोग मेरे हृदय हैं। वे मेरे सिवा और किसीको नहीं जानते और मैं उनके सिवा किसीको कुछ भी नहीं जानता।’
भगवान् को अपने भक्त जितने प्यारे हैं, उतनी अर्धाङ्गिनी लक्ष्मी, गरुड आदि पार्षद और अपना शरीर भी प्रिय नहीं है। भागवतमें भगवान् उद्धवसे कहते हैं—भक्तोंके सिवा मेरा कोई प्यारा नहीं है। एक स्थलपर भगवान् कहते हैं—यदि भक्तोंके प्रतिकूल मेरी भुजा भी उठे तो उसे काटकर फेंक दूँ—
छिन्द्यां स्वबाहुमपि व: प्रतिकूलवृत्तिम्।
भक्त नीच घरका हो तो भी भगवान् उसके यहाँ पधारते हैं।
यहाँ एक शङ्का होती है कि जब भजनेवालेको ही भगवान् भजते हैं—जो जिस भावसे भजता है, उसे उसी भावसे वे भी भजते हैं—तब जो भगवान् की आज्ञाके सर्वथा विरुद्ध चलनेवाला, भगवान् का विरोध करनेवाला, भगवान् के द्वारा निषेध किये हुए कर्मोंको आसक्तिपूर्वक करनेवाला अर्थात् भगवान् का सर्वथा विरोधी हो, वह यदि भजन करे तो क्या भगवान् उसे भी अपनाते हैं? इसका उत्तर है— ‘अवश्य’।
अपि चेत् सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्य: सम्यग्व्यवसितो हि स:॥
(९।३०)
अर्थात् ‘यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभावसे मेरा भक्त हुआ मुझे निरन्तर भजता है तो वह साधु ही माननेयोग्य है; क्योंकि वह यथार्थ निश्चयवाला है अर्थात् उसने भली प्रकार निश्चय कर लिया है कि परमेश्वरके भजनके समान अन्य कुछ भी नहीं है।’
यहाँ भगवान् स्पष्ट कहते हैं कि चाहे दुराचारी-से-दुराचारी भी हो, परंतु जो अनन्यभावसे मेरा भक्त होकर भजन करता है, उसे साधु ही मानना चाहिये; क्योंकि उसने उत्तम निश्चय कर लिया है। दुराचारी चाहे इस जन्मका हो चाहे पूर्वजन्मका, भक्तके उस पाप और दुराचारको भगवान् नष्ट कर देते हैं। भगवान् रामायणमें कहते हैं—
कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू।
आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥
करोड़ों ब्राह्मणोंकी हत्या करनेवाला भी यदि शरणमें आ जाय तो भगवान् उसके पापको नष्ट कर देते हैं। एक जन्मके नहीं, अनेकों जन्मोंके पापका भी नाश कर देते हैं।
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं।
जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥
जीव जभी मेरे सम्मुख होता है, तभी उसके अनन्त जन्मोंके पाप नष्ट हो जाते हैं। इतना ही नहीं, शरणमें आ जानेपर उसे साधु ही मानना चाहिये। यहाँ यह प्रश्न होता है कि गीता ७।१५ में भगवान् कहते हैं, नराधम (दुष्कृत पुरुष) मेरे शरण नहीं होते और रामायणमें भी कहा है—
पापवंत कर सहज सुभाऊ।
भजनु मोर तेहि भाव न काऊ॥
तब अत्यन्त पापी भगवान् की ओर लगेगा ही कैसे? तभी तो भगवान् ने ‘चेत्’ शब्द कहा है। भगवान् के कानूनमें एक विलक्षणता है, वह समझनेकी है। भगवान् कहते हैं— ‘यदि वह भक्तिमें लग जाय तो मेरी ओरसे बाधा नहीं है, नीच-से-नीचके लिये उत्थानका दरवाजा खुला है। परंतु भक्तका पतन नहीं हो सकता’—‘न मे भक्त: प्रणश्यति’ (९।३१)। भगवान् के पथमें चलनेके लिये किसी भी प्राणीको रोक-टोक नहीं है। उनके यहाँ उन्नतिके लिये कोई बाधा नहीं है। फिर प्रश्न होता है कि पापी मनुष्य भगवान् का अनन्य भावसे किस कारण भजन करेगा? उसमें कई कारण हो सकते हैं। यथा—
(१) पूर्व जन्मकी भक्तिके संस्कारसे।
(२) भगवद्भक्तिमय वायुमण्डलके प्रभावसे।
(३) भगवद्भक्तोंके अलौकिक अनुग्रहसे।
(४) भगवान् की अचिन्त्य अहैतुकी कृपासे। या
(५) किसी आपत्तिमें पड़ जानेपर उस आपत्तिको दूर करनेमें अपनेको सर्वथा असमर्थ समझनेके कारण भगवान् के प्रति भक्तिका उदय हो जानेसे।
इस तरह और भी किसी कारणविशेषसे वह अनन्यभाक् होकर भजन कर सकता है। ‘अनन्यभाक्’ का अर्थ यहाँ तैलधारावत् निरन्तर चिन्तन नहीं समझना चाहिये, क्योंकि अधिकारीकी तरह भी तो देखना होगा। तैलधारावत् चिन्तनमें तो बहुत समयसे साधन करनेवाले साधकोंको भी कठिनाई प्रतीत होती है, फिर सुदुराचारियोंके द्वारा वह ऐसा क्योंकर सम्भव है। अत: अनन्यभाक् का अर्थ यहाँ एक भगवान् का ही हो जाना है ‘न अन्यं भजतीति अनन्यभाक्।’ उसके इष्ट, प्रापणीय एकमात्र भगवान् ही हो जायँ, वह भगवान् के ही शरणागत हो जाय—यही अनन्यभाक् का तात्पर्य है। वह भगवान् के सिवा और किसीका आश्रय नहीं लेता। एकके आश्रित हो जाना, एकको ही सर्वोपरि समझना सुदुराचारीके द्वारा ही सम्भव हो सकता है। जो ऐसा हो जाता है, उसको भगवान् परमप्रिय मानते हैं—
एक बानि करुनानिधान की।
सो प्रिय जाकें गति न आन की॥
यहाँ ‘गति न आन की’ इन पदोंके द्वारा अनन्यभाक् की ही व्याख्या हुई। दूसरेका आश्रय छोड़कर भगवान् का भजन करनेवालेको ही लक्ष्य किया गया है। ऐसे पुरुषको साधु ही मानना चाहिये; क्योंकि—
रहति न प्रभु चित चूक किए की।
करत सुरति सय बार हिए की॥
उसने अब एकमात्र यही निश्चय कर लिया है कि ‘मैं जो कुछ और जैसा भी हूँ, आपका हूँ।’ वह समझता है कि मेरा उद्धार मेरे साधन और भजनके बलसे नहीं हो सकता; अपितु अशरण-शरण दीनबन्धु भगवान् की अहैतुकी कृपासे ही सम्भव है। मुझ-जैसा पामर एक साधारण जीव भगवान् के अनुकूल साधन क्या कर सकता है। यत्किञ्चित् भगवान् के अनुकूल जो साधन बन जाता है वह भी भगवान् की कृपाका ही फल है। जो कुछ बनेगा वह प्रभुकी ही दयासे। ऐसा उसका अटल निश्चय है। इसीसे तो एक भक्त कहता है—
भगत बछल ब्रत समुझिके रज्जब दीन्हों रोय।
पतिताँ पावन जब सुने, रह्यो नचीतो सोय॥
इसी कारण भगवान् कहते हैं—वह बहुत शीघ्र धर्मात्मा बन जाता है। तात्पर्य यह कि जब वह भगवान् की ओर ही चलनेका दृढ़ निश्चय कर लेता है, तब उसके आचरण और भाव बहुत जल्दी सुधर जाते हैं। जब उसके ध्येय एकमात्र परमात्मा हो गये, तब वह दुर्गुणका आश्रय कैसे ले सकता है, भगवत्प्रतिकूल आचरण कैसे कर सकता है। ज्यों-ज्यों भगवान् के अनन्य आश्रित होता जाता है, त्यों-त्यों उसमें सद्गुण-सदाचारकी स्वाभाविक वृद्धि होती जाती है। जब सब प्रकारसे वह प्रभुके आश्रित हो जाता है, तब उसी क्षण धर्मात्मा बन जाता है। केवल धर्मात्मा ही नहीं होता, उसे अविचल शान्ति भी प्राप्त हो जाती है। अर्थात् जिस सुख-शान्तिमें क्षय आदि विकार और दोष नहीं आते, उसी शान्तिको वह प्राप्त हो जाता है।
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्त: प्रणश्यति॥
(गीता ९।३१)
‘इसलिये वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहनेवाली परम शान्तिको प्राप्त होता है। हे अर्जुन! तू निश्चयपूर्वक सत्य जान कि मेरा भक्त नष्ट नहीं होता।’
निरन्तर रहनेवाली शान्ति क्या है? जिसे गीतामें परमपद, ब्रह्मनिर्वाण, निर्वाण, परम शान्ति, आत्यन्तिक सुख आदि नामोंसे कहा गया है, उसीको ‘शश्वच्छान्ति’ कहते हैं। यही सब साधनोंका अन्तिम फल है। इसे ही शास्त्रकारोंने मुक्ति कहा है। यह सर्वोपरि स्थिति है। इसीके लिये भगवान् कहते हैं—
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं तत:।
यस्मिन् स्थितो न दु:खेन गुरुणापि विचाल्यते॥
(गीता ६।२२)
‘जिसे पा जानेपर उससे बढ़कर दूसरा कोई लाभ नहीं जान पड़ता तथा जिस स्थितिमें स्थित हो जानेपर मनुष्यको कोई भारी दु:ख कभी विचलित नहीं कर सकता।’ तात्पर्य यह कि जिसमें दु:ख, अल्पज्ञता, अशान्ति, असहिष्णुता आदि कोई भी दोष नहीं है, ऐसी परम शान्तिमयी अवस्थाको वह प्राप्त हो जाता है।
अहा! भगवान् की कितनी अलौकिक कृपा है—
‘बिनु सेवा जो द्रवहिं दीन पर राम सरिस कोउ नाहीं।’
‘दुराचारी भी यदि भगवान् का भजन करने लगे तो वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है।’ भगवान् ने दुराचारीकी बात तो कही; अब जो पूर्वजन्मके अनुचित आचरणके कारण नीच योनिमें जन्म लेते हैं, वे भी भक्तिके अधिकारी हैं, यह बात भी भगवान् कहते हैं—
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्यु: पापयोनय:।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥
(गीता ९।३२)
‘पापयोनिवाले जीव भी मेरा आश्रय लेकर परमपदको प्राप्त होते हैं; स्त्री, वैश्य और शूद्र भी परमपदको जाते हैं।’ जो जाति-बहिष्कृत है, जिसको स्पर्श करनेमें भी लोगोंको हिचक होती है, ऐसे पुरुषको भी यदि वह भक्त है तो भगवान् परमप्रिय मानते हैं। रामावतारमें भगवान् श्रीरामचन्द्रजी गुहको हृदयसे लगाकर भेंटते हैं और पूज्य वसिष्ठजी भी रामभक्त समझकर उसे हृदयसे लगाते हैं। भरतजी भी लक्ष्मणकी तरह उसे भेंटते हैं। भक्त तो त्रिभुवनको पवित्र करनेवाला होता है।
शास्त्रपरम्परासे अहिंसादि सामान्य धर्मोंकी भाँति भक्तिमें भी चाण्डालादि सभी योनिके मनुष्योंका अधिकार है।
‘आनिन्द्ययोन्यधिक्रियते पारम्पर्यात् सामान्यवत्।’
(शाण्डिल्यभक्ति-सूत्र ७८)
भगवद्भक्तिके अधिकारी नीच-से-नीच व्यक्ति भी हैं। यहाँ ‘पापयोनि’ शब्द इतना व्यापक है कि आभीर, यवन, कङ्क, खशादि जातिके मनुष्य भी इसीके अन्तर्गत लिये जा सकते हैं। चारों वर्णोंके सिवा जितनी योनियाँ हैं, सब पापयोनि ही हैं।
‘बड़ सेयाँ बड़ होत है’ उक्तिके अनुसार बड़ोंका आश्रय पाकर प्राय: सभी बड़े हो जाते हैं। छोटा-सा जन्तु भी यदि सज्जन पुरुषोंका सङ्ग करे तो वह कष्टसाध्य कार्य भी सुगमतासे ही सिद्ध कर लेता है। जब सज्जनोंके सङ्गियोंका सङ्ग करनेसे ऐसा फल मिलता है, तब साक्षात् भगवान् का साथ होनेपर मनुष्य श्रेष्ठ बन जाय—इसमें कौन-सी आश्चर्यकी बात है। ‘मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य०’ (९।३२)—इस श्लोकमें जो ‘पापयोनय:’ पद है, वह स्वतन्त्र है; स्त्री, वैश्य और शूद्रका विशेषण नहीं। क्योंकि वैश्यका वेदोंमें अधिकार है। ‘स्त्री’ शब्दसे ब्राह्मण-क्षत्रियोंकी स्त्रियोंका भी ग्रहण हो जाता है। वे अपने-अपने पतिके साथ यज्ञमें बैठ सकती हैं। ब्राह्मणी समस्त जातिकी पूजनीया है, इसलिये यह पापयोनि नहीं कही जा सकती। ‘येऽपि स्यु: पापयोनय:’ में ‘स्यु:’ क्रियाका साक्षात् सम्बन्ध ‘पापयोनय:’ से ही है। ‘स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रा:’—इसमें ‘तथा’ शब्द स्त्री, वैश्य और शूद्रको ‘पापयोनय:’ से अलग कर रहा है। इन सबका अन्वय एक साथ ‘यान्ति’ क्रियामें होता है—‘तेऽपि यान्ति परां गतिम्’ वे भी परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं। यद्यपि स्त्रियाँ भी सम्पूर्ण मन्त्रों और वेदोंकी अधिकारिणी नहीं हैं, तथापि भगवान् की प्राप्तिमें उनका भी अधिकार है ही—
‘नास्ति तेषु जातिविद्यारूपकुलधनक्रियादिभेद:।’
(नारदभक्ति-सूत्र ७२)
‘भक्तोंमें जाति, विद्या, रूप, कुल, धन और क्रियादिसे होनेवाला भेद नहीं है।’
शबरीमें स्त्रीत्व होनेपर भी शूद्रत्व और पापयोनित्व भी है। वह कहती है—
अधम ते अधम अधम अति नारी।
तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी॥
अधम अर्थात् ब्राह्मणकी अपेक्षा नीचा क्षत्रिय, उससे अधम वैश्य, उससे अधम शूद्र और उससे अति अधम शबर जाति तथा शबर जातिकी स्त्रियोंमें फिर मन्दमति मैं। शबरीकी ऐसी अभिमानशून्य वाणी सुनकर श्रीरघुनाथजी कहते हैं—
जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई।
धन बल परिजन गुन चतुराई॥
भगति हीन नर सोहइ कैसा।
बिनु जल बारिद देखिअ जैसा॥
कह रघुपति सुनु भामिनि बाता।
मानउँ एक भगति कर नाता॥
भगवान् तो केवल भक्तिका नाता मानते हैं।
‘भक्त्या तुष्यति केवलं न च गुणैर्भक्तिप्रियो माधव:।’
भगवान् तो केवल भक्तिसे संतुष्ट होते हैं, गुणोंसे नहीं। वे तो भावग्राही हैं। भगवान् के आगे पण्डिताईका जोर नहीं चलता—
मन्दो वदति विष्णाय धीरो वदति विष्णवे।
उभयोश्च फलं तुल्यं भावग्राही जनार्दन:॥
किस भावसे कौन क्या कर रहा है, इसे भगवान् जानते हैं। जो कोई प्रेमसे भगवान् की ओर दौड़ता है, उसकी ओर भगवान् भी दौड़ पड़ते हैं।
यहाँतक भगवान् ने आचरणों और जातिसे नीचके उद्धारकी बात बतायी तथा मध्य श्रेणीके स्त्री, वैश्य और शूद्रोंकी सद्गतिका भी वर्णन किया। अब भगवान् यह बता रहे हैं कि जब पापयोनिवाले एवं स्त्री, वैश्य और शूद्र भी भक्तिसे परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं, तब जो आचरण और जाति दोनोंसे ही पवित्र हैं, उनका भक्तिसे उद्धार होना कौन बड़ी बात है?
किं पुनर्ब्राह्मणा: पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्॥
(गीता ९।३३)
इसमें ‘कैमुतिक’ न्याय है। अर्थात् जब स्त्री, वैश्य और शूद्र तथा दुराचारी और पतित जातिवालोंका भी उद्धार हो जाता है, तब पवित्र आचरणवाले ब्राह्मण और क्षत्रिय यदि भगवान् के भक्त हों तो उनके उद्धारके विषयमें तो कहना ही क्या है। यदि कोई जातिसे ब्राह्मण और क्षत्रिय हों, पवित्र आचरणवाले भी हों, परंतु भक्त न हों, तो उनके उद्धारकी गारंटी भगवान् नहीं लेते। इस श्लोकमें भगवान् ने आचरण और जाति दोनोंसे ही उत्तम पुरुषोंको भक्तिका अधिकारी बतलाया है; क्योंकि पहले कहा है कि जो आचरण अथवा जाति दोनोंसे ही नीच हों, वे भी मेरे भक्त बन सकते हैं तथा जो दोनोंसे ऊँचे हों, उनकी तो बात ही क्या है। इस प्रकरणमें भक्तिके सात अधिकारी बताये गये हैं। इनमें कोई कम नहीं है।
(१) आचरणोंसे नीच, (२) जातिसे नीच, (३) स्त्री, (४) वैश्य, (५) शूद्र, (६) पवित्र ब्राह्मण और (७) राजर्षि—इन सात अधिकारियोंके ही अन्तर्गत सभी मनुष्य आ जाते हैं। इससे स्पष्ट है कि भगवान् की भक्तिके सब अधिकारी हैं।
भगवान् ने भक्तिके अधिकारी बतलाकर ३३वेंके उत्तरार्द्धमें कहा है—
‘अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्॥’
अर्थात् ‘नाशवान् एवं सुखरहित मानव-शरीरको प्राप्त करके मेरा भजन कर।’ इसको अनित्य तथा क्षणभङ्गुर इसलिये कहा कि इसका कोई भरोसा नहीं है! पता नहीं कब नष्ट हो जाय। इसलिये भगवान् चेतावनी देते हैं कि इस शरीरके रहते-रहते मुझे प्राप्त कर लेना चाहिये। भागवतमें भी कहा है—
लब्ध्वा सुदुर्लभमिदं बहुसम्भवान्ते
मानुष्यमर्थदमनित्यमपीह धीर:।
तूर्णं यतेत न पतेदनुमृत्यु यावन्नि:श्रेयसाय विषय: खलु सर्वत: स्यात्॥
(११।९।२९)
अर्थात् ‘बहुत-से जन्मोंके अन्तमें बहुत-से प्रयोजन सिद्ध करनेवाले इस अत्यन्त दुर्लभ किंतु अनित्य मानव-शरीरको पाकर जबतक मृत्यु न आये, उससे पहले जल्दी-से-जल्दी आत्म-कल्याणके लिये यत्न करना चाहिये; क्योंकि विषय तो निश्चय ही सर्वत्र मिल सकते हैं, परंतु भगवान् नहीं।’ गीताके आठवें अध्यायमें तो इसे भगवान् ‘दु:खालयमशाश्वतम्’ कहते हैं, फिर दु:खालयमें सुख कहाँ? जिस प्रकार पुस्तकालयमें ओषधि और औषधालयमें कपड़े नहीं मिल सकते, ठीक उसी प्रकार इस दु:खमय संसारमें सुख नहीं मिल सकता। सुख है ही नहीं। मनुष्यको जबतक किसी बातकी उत्कट इच्छा नहीं होती, तबतक किसी पदार्थमें ऐसी शक्ति नहीं जो उसे सुख दे सके। इसलिये पदार्थोंके सुखके लिये पदार्थविषयक उत्कट इच्छा और इच्छाके लिये अभावका अनुभव परम आवश्यक है और अभावकी अनुभूतिमें सुखका नाम-निशान नहीं, दु:ख-ही-दु:ख है। एक ही अवस्थामें दो पुरुष एक ही साथ जा रहे हैं। दोनोंकी वेष-भूषा एक ही है। दोनोंके पास जूता नहीं, छाता नहीं। दोनोंके पास फटे कपड़े हैं। दोनों एक-से हैं, पर उनमेंसे एक विरक्त है, एक अभावग्रस्त है। विरक्त पुरुषके भीतर दु:खका नाम नहीं है और अभावग्रस्त पुरुषके पास सुखका नाम-निशान नहीं है, वह वस्तुओंके अभावकी अनुभूतिसे निरन्तर व्यथित रहता है। उसीको ही क्षणभङ्गुर पदार्थ क्षणिक सुख दे सकते हैं, विरक्तको नहीं; क्योंकि विरक्तको पदार्थोंका सर्वथा अभाव होनेपर भी अभावकी अनुभूति नहीं है। अर्थात् विरक्त किसी वस्तुकी आवश्यकता ही नहीं समझता, ऐसी स्थितिमें किसी पदार्थमें ऐसी शक्ति नहीं है जो उसे सुख दे सके। तात्पर्य यह कि अभावकी अनुभूति न होनेपर विषय सुख नहीं दे सकेगा। जिसे रुपयेकी चाहना नहीं, उसे रुपया सुख नहीं दे सकता। जिसे स्त्रीकी इच्छा नहीं, उसे स्त्री सुख नहीं दे सकती। सुख लेनेवालेको अपने लिये अभावकी अनुभूति आवश्यक है। इससे सिद्ध हुआ कि पदार्थकी अनुपस्थितिमें भी पदार्थ दु:ख देते हैं। मिलनेपर उनके नाशकी शङ्का हरदम बनी रहती है। न्यूनता खटकती रहती है, वही पदार्थ दूसरोंके पास अधिक मात्रामें अपनी अपेक्षा अधिक सुन्दर देखकर जलन होती है। पदार्थ नष्ट हो जानेपर भी दु:ख ही देते हैं। लड़केके न रहनेपर दु:ख होता है। पैदा होनेपर उसके रोगादिसे दु:ख होता है। लड़केकी मृत्यु हो जानेपर उसकी स्मृति किस प्रकार कलेजेमें कसक पैदा करती है, यह अनुभवी पुरुषोंसे छिपा नहीं है। मनुष्य उसके वियोगमें जो रोता-कलपता है, उस दु:खकी क्या बात कही जाय। सांसारिक सुख भी दु:खके ही कारण हैं।
एक मनुष्य ऐसा है, जिसका सुख छिन गया है; दूसरा ऐसा है, जिसको आरम्भसे वह सुख नहीं मिला। वर्तमान समयमें दोनोंकी एक-सी अवस्था है; किंतु पहलेको जैसा दु:ख होता है, वैसा दूसरेको नहीं। इसका कारण यह है कि वह वस्तु उसके पास पहलेसे नहीं है; जिसके लिये वह दु:ख करता है। इसलिये पदार्थ रहें, तब भी दु:ख होता है, न रहें, तब भी दु:ख होता है और रहकर चले जायँ, तब भी दु:ख उठाना पड़ता है। इसीसे भगवान् इस संसारको असुख, नश्वर और दु:खालय कहते हैं। अत: इस मानव-शरीरका फल भगवद्भजन ही है, विषय-सेवन नहीं—
एहि तन कर फल बिषय न भाई।
स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई॥
नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं।
पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं॥
ताहि कबहुँ भल कहइ न कोई।
गुंजा ग्रहइ परस मनि खोई॥
देह धरे कर यह फलु भाई।
भजिअ राम सब काम बिहाई॥
—गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी
इसीलिये भगवान् कहते हैं—इस शरीरको प्राप्त होकर मेरा भजन कर। यहाँतक भगवान् ने भक्तिके अधिकारियोंका वर्णन कर चेतावनी देते हुए अर्जुनको भगवद्भक्ति करनेकी आज्ञा दी। तात्पर्य यह है कि भगवान् ने भक्तिकी सब युक्तियोंसे पुष्टि की तथा उसे परमावश्यक बतलाते हुए भक्ति करनेका आदेश दिया—‘मां भजस्व’ (९।३३)।
अब यह जाननेकी आवश्यकता है कि भक्तिका क्या स्वरूप है। इसके लिये भगवान् स्वयं कहते हैं—
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायण:॥
(गीता ९।३४)
अर्थात् ‘मुझमें मनवाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करनेवाला हो, मुझको प्रणाम कर। इस प्रकार आत्माको मुझमें नियुक्त करके मेरे परायण होकर तू मुझको ही प्राप्त होगा।’
इस श्लोकमें भगवान् ने भक्तिकी चार बातें बतायी हैं—
(१) ‘मन्मना भव’—मुझमें मन लगानेवाला हो।
(२) ‘मद्भक्तो भव’—मेरा भक्त बन जा।
(३) ‘मद्याजी भव’—मेरा पूजन करनेवाला हो।
(४) ‘मां नमस्कुरु’—मुझे नमस्कार कर।
इसमें ‘मन्मना भव’ का अनुष्ठान करनेके लिये भगवान् के स्वरूपका नामसहित चिन्तन करनेकी चेष्टा करनी चाहिये। यह सब शास्त्रोंका सार है। संत-महात्मा भी इसीपर जोर देते हैं। कहा भी है—
आलोडॺ सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुन: पुन:।
इदमेव सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायण: सदा॥
‘सब शास्त्रोंका आलोडन तथा बार-बार विचार करनेसे यही बात सिद्ध हुई है कि सदा भगवान् का ध्यान करना चाहिये।’
भगवान् के चिन्तनमात्रसे भगवत्प्राप्ति हो जाती है। आठवें अध्यायके चौदहवें श्लोकमें भगवान् ने निरन्तर अनन्य-चिन्तन करनेवालेके लिये ही अपने-आपको सुलभ बताया है—
अनन्यचेता: सततं यो मां स्मरति नित्यश:।
तस्याहं सुलभ: पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिन:॥
(गीता ८।१४)
समूची गीतामें ‘सुलभ’ शब्दका प्रयोग केवल इसी श्लोकमें हुआ है। भगवान् के निरन्तर चिन्तनमें दो बातें सहायक हैं—
(१) भगवान् के नामका जप।
(२) सत्सङ्ग।
भगवन्नाम-जपसे भगवान् की बारम्बार स्मृति होती है। जैसे बिगुल बजनेसे सैनिक सजग हो जाता है, वैसे ही जपसे मनरूपी सैनिक सावधान होता है। इसी प्रकार सत्सङ्ग करनेसे, साधुओंके दर्शनसे भगवान् याद आ जाते हैं, जिस प्रकार सिपाहीके देखनेसे राजा याद आ जाता है और जब भजन-चर्चा चलती है, तब ‘खूब गुजरेगी, मिल बैठेंगे दीवाने दो’ वाली कहावत चरितार्थ होती है। अर्थात् भगवान् का निरन्तर चिन्तन होने लगता है। भगवच्चर्चा चलती है तो मन उसमें रम जाता है। कण्ठ गद्गद हो जाता है, नेत्रोंमें आँसू आने लगते हैं। गोस्वामीजी कहते हैं—
हिय फाटउ फूटहुँ नयन जरउ सो तन केहि काम।
द्रवै स्रवै पुलकै नहीं तुलसी सुमिरत राम॥
भागवतमें भी कहा है—
तदश्मसारं हृदयं वतेदं यद् गृह्यमाणैर्हरिनामधेयै:।
न विक्रियेताथ यदा विकारो नेत्रे जलं गात्ररुहेषु हर्ष:॥
(२।३।२४)
कबीरदासजी भी कहते हैं—
सुमिरन सों सुधि लाइए, ज्यों सुरभी सुत माहिं।
कह कबीर चारो चरत छिनहूँ बिसरत नाहिं॥
ऐसा नित्य-निरन्तर चिन्तन करनेके लिये भगवान् कहते हैं। यह बात हुई।
दूसरी बात है—‘मद्भक्तो भव’—इसका तात्पर्य यह है कि मेरी आज्ञाका प्रेमपूर्वक पालन कर।
अग्या सम न सुसाहिब सेवा।
भगवान् का आज्ञापालन ही सेवा है। आदरपूर्वक भगवान् की एक आज्ञापालन करनेसे ही भगवान् प्रसन्न हो जाते हैं।
श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—
सो सेवक प्रियतम मम सोई।
मम अनुसासन मानइ जोई॥
भगवान् की प्रसन्नता प्राप्त होनेपर फिर क्या बाकी रह सकता है। एक पिताके कई लड़के हैं। उनमें पिताको अत्यन्त प्यारा वह होगा, जो पिताकी आज्ञाका पालन करेगा। गुरुसे वही शिष्य विशेष लाभ उठायेगा, जो गुरु-आज्ञामें तत्पर होगा। आज्ञापालनसे पूज्यकी सारी शक्ति आज्ञा-पालकमें उतर आती है। इस विषयमें यह बात विशेष समझनेकी है कि श्रद्धेय पुरुष जिस क्षण किसी बातके लिये आज्ञा दें, उसी क्षण उसका पालन करना चाहिये। इससे विशेष लाभ होता है। असली आज्ञा वही है, जो मालिकके अनुकूल हो, हमारे लिये भले ही प्रतिकूल हो। इसी तरह भगवदाज्ञापालन करनेवाला ही भगवद्भक्त है।
यहाँ प्रश्न होता है कि भगवान् तो प्रत्यक्ष नहीं; फिर उनकी आज्ञाका पता कैसे लगे? तो इसका उत्तर यह है कि भगवदाज्ञाका पता लगानेके लिये चार उपाय हैं। एक तो सत्-शास्त्र—वेद, पुराण, ऋषिप्रणीत ग्रन्थ। इनमें जिनके लिये जो कर्तव्य बताया गया है, वही करना चाहिये। ऋषि-मुनियोंने सत्-शास्त्र भगवान् का आशय समझकर ही लिखे हैं। इसलिये भगवान् भी कहते हैं—
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥
(गीता १६।२४)
‘इससे तेरे लिये कर्तव्य और अकर्तव्यकी व्यवस्थामें शास्त्र ही प्रमाण है, यों जानकर तू शास्त्रविधिसे नियत किये हुए कर्मको ही करनेयोग्य है।’
और भगवद्गीता-जैसे ग्रन्थ तो, जो साक्षात् भगवान् के ही श्रीमुखसे निकले हुए हैं, भगवदाज्ञा हैं ही। इसलिये ऐसे ग्रन्थोंके अनुसार अपना जीवन बना लेना ही भगवदाज्ञाका पालन करना है।
दूसरा उपाय, भगवत्प्राप्त महापुरुष जो कहते हैं, उसे भगवदाज्ञा मानकर करना; क्योंकि जिस अन्त:करणमें राग-द्वेष, स्वार्थ, ममता, अहङ्कार और पक्षपात नहीं, उस अन्त:करणसे जो कुछ निकलेगा, वह भगवदाज्ञा ही होगी। भगवान् सब जगह परिपूर्ण हैं, पर जहाँ अन्त:करण विशेष शुद्ध है, वहीं वे प्रकट होते हैं। इसलिये महात्माओंके वचन सम्पूर्ण जगत् के हितके लिये होते हैं।
महात्मा जैसा आचरण करते हैं वह भी साधकके लिये भगवदाज्ञा माननेयोग्य है। भगवान् स्वयं कहते हैं—
यद् यदाचरति श्रेष्ठस्तत् तदेवेतरो जन:।
स यत् प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥
(३।२१)
अर्थात् ‘श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, दूसरे मनुष्य भी वैसा ही करते हैं, वह पुरुष जो कुछ आदर्श स्थापित करता है, लोग भी उसके अनुसार बर्तते हैं।’
तीसरा उपाय है—पक्षपातरहित अपने अन्त:करणमें जो वास्तविक सिद्धान्तके अनुकूल राग-द्वेषरहित बात स्फुरित होती है, उसे भी भगवदाज्ञा मानकर काममें लाना, क्योंकि अन्तर्यामी परमात्मा सबके हृदयमें विराजमान हैं।
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो
मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो-
वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्॥
(१५।१५)
अर्थात् ‘मैं ही सब प्राणियोंके हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित हूँ तथा मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन होता है और सब वेदोंद्वारा मैं ही जाननेके योग्य हूँ तथा वेदान्तका कर्ता और वेदोंको जाननेवाला भी मैं ही हूँ।’
चौथा उपाय है—जिन कामोंके करनेसे हमारा और लोगोंका अभी और परिणाममें भी परम हित होता दीखता हो, उन्हें भगवदाज्ञा मानकर करना—उसमें भी हमारी अपेक्षा दूसरोंका हित तथा वर्तमानकी अपेक्षा भावीका हित मुख्य है। भगवान् कैसी आज्ञा देंगे, यह उनके स्वभावसे ही समझना चाहिये। जो भगवान् प्राणिमात्रके परम सुहृद् हैं, हेतुरहित दयालु हैं, सबके परम पिता हैं, उन परमात्माका स्वभाव प्राणिमात्रका हित करना ही है। अत: वे आज्ञा भी अपने स्वभावके अनुकूल ही देंगे।
इन चारों प्रकारोंमेंसे किसी तरहसे भी प्राप्त हुई भगवदाज्ञाको साक्षात् भगवान् की दी हुई आज्ञा समझकर परम श्रद्धा और प्रेमके साथ अपना सौभाग्य समझते हुए पालन करना चाहिये। प्रभुकी कृपा और प्रेमका आभारी होना चाहिये। इसीके लिये प्रभु कहते हैं—‘मद्भक्तो भव’ (९।३४)।
(३) ‘मद्याजी (भव)’—मेरा ही पूजन कर। यहाँ भगवान् के श्रीविग्रहका तथा सब जीवोंको भगवान् का स्वरूप समझकर उनकी जो सेवा करनी है, वही भगवान् की पूजा है। भगवान् कहते हैं—
यत: प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव:॥
(१८।४६)
‘जिस परमेश्वरसे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत् व्याप्त है, उस परमेश्वरकी अपने स्वाभाविक कर्मोंद्वारा पूजा करके मनुष्य परम सिद्धिको प्राप्त करता है।’
ऐसी पूजा तथा अपना सब कुछ भगवान् के समर्पण कर देना ही ‘मद्याजी’ का तात्पर्य है। भगवान् ने कहा—‘तू सर्वस्व मेरे ही समर्पण कर दे। अर्थात् अपने मनसे कल्पना की हुई ममता उठा ले।’ संसारकी सभी वस्तुएँ परमात्माकी ही हैं। किसी भी वस्तुको न तो हम साथमें लाये हैं, न ले जायँगे तथा इन वस्तुओंको रखनेमें भी हम स्वतन्त्र नहीं हैं। मनकी इच्छाके अनुसार रख नहीं सकते। फिर हमारा क्या है, केवल भूलसे ही वस्तुओंपर अपनापन। उसको उठा लेना ही भगवदर्पण करना है। यह तीसरी बात हुई।
(४) चौथी है—‘मां नमस्कुरु।’ इसका तात्पर्य है
आत्मसमर्पण अर्थात् भगवान् के विधानमें संतोष। जब अपराधी जिसका अपराध किया है, उसके चरणोंमें गिरकर कहता है—‘सरकार! जो इच्छा हो करें, तब उस अपराधीका कोई अधिकार नहीं रह जाता। इसी प्रकार नमस्कार करनेवाला भगवान् के सामने अपना कोई अधिकार नहीं समझता। उनकी मर्जी हो, वैसे रखें। वैसे हमने एक यन्त्र किसीको दे दिया। अब वह उसे चाहे जैसे बरत सकता है। उसका उसपर पूर्ण अधिकार है। हमें आपत्ति क्यों हो। इस प्रकार भगवान् का भक्त भगवान् को अर्पित हो जाता है। उसपर भगवान् सुख या दु:ख—जो भेज दें, वह सबमें प्रसन्न ही रहता है। वह सुखकी अपेक्षा दु:ख पानेपर और प्रसन्न होता है; क्योंकि वह समझता है कि भगवान् मुझपर बड़े प्रसन्न हैं, तभी तो सब क्रियाएँ निस्संकोच करते हैं। हमारी इन्द्रिय-मन-बुद्धिपर ध्यान न देकर अपने मनकी करते हैं। भगवान् हमारे लिये वही करते हैं, जिसमें हमारा परम हित है। हमें वह भले ही विपरीत दिखायी दे, पर भगवान् के कामोंमें कहीं भी भूलकी गुंजाइश नहीं है। भगवान् हमपर दु:ख भेजते हैं, इसमें हमारे कई लाभ हैं। एक तो हम पापोंसे सावधान होते हैं; क्योंकि भगवान् पापोंके फलरूपमें पापोंके नाशके लिये दु:ख देते हैं। दु:खको पापोंका फल समझकर हम फिर पाप करनेसे डरेंगे। भगवान् की कितनी दया है! दूसरा लाभ यह है कि प्रभु हमें अपनानेके लिये परम पवित्र बना रहे हैं। जैसे सुनार जिस सोनेको अपनाना चाहता है, उसे तपाकर और अधिक शुद्ध करता है अथवा जैसे माता अपने बच्चेके मैलको धोती है, साफ करती है; क्योंकि उसको अपने हृदयसे लगाना है, गोदमें लेना है। इस प्रकार कृपालु भगवान् भी अपने भक्तको कष्ट देकर उसे पवित्र करते हैं।’
यही भगवान् के शरण होना है। भगवान् कहते हैं कि तू इस प्रकार मेरे शरण होकर मुझे ही प्राप्त कर लेगा। यही शरणागति है और ‘मत्परायण’ कहकर इसीका वर्णन किया गया है।