देशकी वर्तमान दशा तथा उसका परिणाम

स्वराज्य-प्राप्तिके बाद भारतका बहुत ही पतन हुआ है। धर्मकी दृष्टिसे आचरणकी दृष्टिसे, शरीरकी दृष्टिसे, हृदयके भावोंकी दृष्टिसे, चरित्रकी दृष्टिसे, शीलकी दृष्टिसे—सब दृष्टियोंसे बहुत पतन हुआ है। पहले भारतमें कितनी विलक्षण विद्याएँ थीं, कला-कौशल थे, पर अब वे सब नष्ट हो रहे हैं। इतना पतन पहले कभी नहीं हुआ था। देशभक्तोंने कितना बलिदान देकर अँग्रेजोंसे स्वराज्य प्राप्त किया था, पर स्वराज्य पानेके बाद देशकी यह दशा हुई कि लोग अँग्रेजोंके राज्यकी प्रशंसा करने लग गये, यह कहने लग गये कि अँग्रेजोंका राज्य अच्छा था। यह कितनी शर्मकी बात है!

भारतमें अपार प्राकृतिक सम्पत्ति है। परंतु इस प्राकृतिक सम्पत्तिका सदुपयोग करना तो दूर रहा, उलटे इसका विनाश किया जा रहा है। इतना ही नहीं, विनाशको उत्पादन माना जा रहा है! पशुओंके विनाशको ‘मांसका उत्पादन’ कहा जाता है! गर्भपातरूपी महापापको और मनुष्यकी उत्पादक-शक्तिके विनाशको ‘परिवार-कल्याण’ कहा जाता है! स्त्रियोंकी उच्छृङ्खलताको, मर्यादाके नाशको ‘नारी-मुक्ति’ कहा जाता है! पहले स्त्री घरकी स्वामिनी (गृहलक्ष्मी) होती थी, अब घरसे बाहर अनेक पुरुषोंकी दासता (नौकरी) करनेको ‘नारीकी स्वाधीनता’ कहा जाता है! इस प्रकार पराधीनताको स्वाधीनताका लक्षण माना जा रहा है! नैतिक पतनको उन्नतिकी संज्ञा दी जा रही है! पशुताको सभ्यताका चिह्न माना जा रहा है! धार्मिकताको साम्प्रदायिकता और धर्मविरुद्धको धर्म-निरपेक्ष कहा जा रहा है! बुद्धिकी बलिहारी है! ‘विनाशकाले विपरीतबुद्धि:’। गीताने इसको तामसी बुद्धि बताया है—

अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता।

सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धि: सा पार्थ तामसी॥

(गीता १८।३२)

‘हे पार्थ! तमोगुणसे घिरी हुई जो बुद्धि अधर्मको धर्म और सम्पूर्ण चीजोंको उलटा मानती है, वह तामसी है।’

मन्दोदरी रावणसे कहती है—

काल दंड गहि काहु न मारा।

हरइ धर्म बल बुद्धि बिचारा॥

निकट काल जेहि आवत साईं।

तेहि भ्रम होइ तुम्हारिहि नाईं॥

(मानस, लंका० ३७।४)

ईश्वर और प्रकृतिके विधानका तिरस्कार

ईश्वर और प्रकृतिके विधानके अनुसार सृष्टिके आरम्भसे ही जीवोंके जन्म और मरण होते चले आये हैं। जन्म-मरणका कार्य मनुष्यके हाथमें नहीं है, प्रत्युत ईश्वर और प्रकृतिके हाथमें है। जैसे किसी जीवको मार देना मनुष्यका अधिकार नहीं है, प्रत्युत पाप है, ऐसे ही किसी जीवको जन्म लेनेसे रोक देना भी मनुष्यका अधिकार नहीं है, प्रत्युत महापाप है। तात्पर्य है कि ईश्वर और प्रकृतिके विधानसे जन्म और मृत्युका नियन्त्रण अर्थात् जनसंख्याका नियन्त्रण अनादिकालसे स्वत:स्वाभाविक होता आया है। जैसे, कुत्ते, बिल्ली, सूअर आदिके कई बच्चे होते हैं और वे परिवार-नियोजन भी नहीं करते, फिर भी उनसे पृथ्वी भरी हुई नहीं दिखायी देती; क्योंकि उनका नियन्त्रण ईश्वर और प्रकृतिके विधानसे स्वत: होता आया है। उनके विधानमें हस्तक्षेप करना, दखल देना पाप, अन्याय है। हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, यहूदी, पारसी तथा हिन्दूधर्मके अन्तर्गत आनेवाले जैन, सिख, आर्यसमाजी आदि कोई क्यों न हों, जो कृत्रिम उपायोंसे संतति-निरोध करते हैं, वे धर्मविरुद्ध, नीतिविरुद्ध, ईश्वरविरुद्ध, प्रकृतिविरुद्ध कार्य करते हैं, जिसका इस लोकमें और परलोकमें भयंकर दण्ड भोगना पड़ेगा!

एक बड़े दयालु और परहितमें लगे हुए साधु थे। उनको एक बार भगवान् ने दर्शन दिये और वर माँगनेके लिये कहा तो साधुने कहा कि ‘मैं जहाँ जाता हूँ, वहीं लोग कहते हैं कि महाराज, ऐसी कृपा करो कि वर्षा हो जाय। अत: आप ऐसा वर दें कि मैं जहाँ चाहूँ, वहीं वर्षा हो जाय।’ भगवान् ने वर दे दिया। अब बाबाजी जगह-जगह खूब वर्षा करने लगे। अधिक वर्षा होनेसे जहरीले जीव-जन्तु अधिक पैदा हो गये, जिससे खेती नष्ट होने लगी। जहरीले पौधे पैदा हो गये। पशु बीमार हो गये। ज्वर फैलनेसे लोग बीमार होने और मरने लगे। बाबाजीने भगवान् को याद किया। भगवान् ने कहा कि वर्षाके बाद कुछ दिन सूर्य तपनेसे जलवायु शुद्ध हो जाती है; परंतु लगातार वर्षा होती रहनेसे विष फैल जाता है। अत: तुम्हारी मनचाही वर्षा होनेसे ही यह दशा हुई है! बाबाजीने भगवान् से कहा कि अब यह व्यवस्था आप ही सँभालो; क्योंकि कब कहाँ किस चीजकी आवश्यकता है, इसको आप ही पूरा जानते हैं—

मेरी चाही मत करो, मैं मूरख अग्यान।

तेरी चाही में प्रभो, है मेरा कल्यान॥

तात्पर्य है कि भगवान् और प्रकृतिके विधानसे जो होता है, वह ठीक ही होता है; क्योंकि उनकी दीर्घदृष्टि है, जबकि मनुष्यकी अल्पदृष्टि है। जब लोगोंके हितकी दृष्टिसे भी भगवान् और प्रकृतिका काम अपने हाथमें लेनेसे नुकसान हो गया, तो फिर जिनमें परहितका भाव नहीं है, प्रत्युत स्वार्थभाव है, उनके द्वारा भगवान् और प्रकृतिका काम अपने हाथमें लेनेसे कितना नुकसान होगा?

ईश्वर और प्रकृतिके द्वारा प्रदत्त उत्पादक-शक्तिका नाश कर देना महान् विनाशकारक है। सम्पूर्ण योनियोंमें सर्वश्रेष्ठ मनुष्ययोनिकी उत्पादक-शक्तिका ही निषेध करेंगे तो उन्नति कैसे होगी? परिणाममें पतन ही होगा। मनुष्योंमें भी हिन्दू जाति सर्वश्रेष्ठ है। इसमें बड़े विलक्षण-विलक्षण ऋषि-मुनि, संत-महात्मा, दार्शनिक, वैज्ञानिक, विचारक पैदा होते आये हैं। जब इस जातिके मनुष्योंको जन्म ही नहीं लेने देंगे, तो फिर ऐसे श्रेष्ठ, विलक्षण पुरुष कैसे और कहाँ पैदा होंगे?

विचार करें, एक ओर तो हम देशकी उन्नतिके लिये उत्पादन बढ़ाना चाहते हैं, दूसरी ओर हम उत्पादक-शक्तिपर रोक लगा रहे हैं! जब उत्पादक ही नहीं रहेगा, तो फिर उत्पादन कैसे होगा? जैसे भोजनालयमें ज्यादा आदमी आ जायँ तो हमारा काम ज्यादा रसोई बनाना है, न कि आदमियोंको आनेसे रोकना। ऐसे ही जनसंख्या बढ़ती है तो बुद्धिमानी इसी बातमें है कि उत्पादन अधिक बढ़ाया जाय, न कि मनुष्योंको जन्म लेनेसे रोक दिया जाय! आज भी खेतोंमें काम करनेवाले आदमियोंकी कमी हो रही है। जब एक या दो ही संतान होगी तो घरका काम ही पूरा नहीं होगा, फिर कौन खेती करेगा? कौन बूढ़े माँ-बापकी सेवा करेगा? कौन समाजकी सेवा करेगा? कौन सेनामें भरती होगा? कौन कला-कौशल सीखेगा और कौन सिखायेगा? कौन वैज्ञानिक बनेगा? कौन फैक्ट्रयाँ चलायेगा? कौन नया-नया आविष्कार करेगा? कौन शास्त्रोंका पण्डित बनेगा? परिणाममें क्या दशा होगी—इसपर विचार करनेसे रोंगटे खड़े हो जाते हैं!

मृत्युको कोई रोक नहीं सकता। जन्म लेनेके बाद मरना जितना अवश्यम्भावी है, उतना दूसरा कोई भी काम अवश्यम्भावी नहीं है। बालक जन्म लेता है तो वह बड़ा होगा कि नहीं होगा, पढ़ेगा कि नहीं पढ़ेगा; व्यापार, नौकरी आदि करेगा कि नहीं करेगा; डॉक्टर, इंजीनियर आदि बनेगा कि नहीं बनेगा, धनी होगा कि नहीं होगा, विवाह करेगा कि नहीं करेगा, उसकी सन्तान होगी कि नहीं होगी आदि सब बातोंमें सन्देह है, पर वह मरेगा कि नहीं मरेगा—इस बातमें कोई सन्देह नहीं है। वह मरेगा ही। ऐसी अवश्यम्भावी मौत हर समय खुली है। ऐसा कोई वर्ष, महीना, दिन, घण्टा, मिनट अथवा सेकेण्ड नहीं है, जिसमें कोई मनुष्य मरता न हो। बालक भी मरते हैं, जवान भी मरते हैं और बूढ़े भी मरते हैं। रोगी भी मरते हैं और नीरोग भी मरते हैं। मैंने सुना है कि एक गाँवमें किसीके दो लड़के थे। वे दोनों ही मर गये और आज बूढ़े माँ-बापको पानी पिलानेवाला भी कोई नहीं है! एकके छ:-सात लड़के थे, पर उनमें एक ही जीवित रहा, बाकी सब मर गये! विचार करें, जो एक-दो सन्तानके बाद नसबन्दी, ऑपरेशन करवा लेते हैं, उनकी सन्तान अगर प्रारब्धवश जीवित न रहे तो क्या दशा होगी!

शंका—जापान, इजरायल, ब्रिटेन आदि राष्ट्रोंकी जनसंख्या कम है, फिर भी वे बहुत उन्नत हैं और भारतकी जनसंख्या अधिक है, फिर भी यह बेरोजगारी, गरीबी आदिके कारण पिछड़ा हुआ है। अत: भारतके उत्थानके लिये जनसंख्याकी वृद्धिकी आवश्यकता नहीं है, प्रत्युत जनसंख्याको कम करनेकी आवश्यकता है। कारण कि एक सिंह कई बकरियोंसे श्रेष्ठ होता है!

समाधान—मैं न तो जनसंख्या बढ़ानेका पक्षपाती हूँ और न जनसंख्या घटानेका ही पक्षपाती हूँ, प्रत्युत जनताका हित कैसे हो—इसका पक्षपाती हूँ। जनसंख्याको बढ़ानेकी इच्छा करना भी मूर्खता है और घटानेकी इच्छा करना भी महामूर्खता है; क्योंकि यह काम मनुष्यका नहीं है, प्रत्युत ईश्वर अथवा प्रकृतिका है। जनसंख्याका बढ़ना देशके लिये घातक नहीं है, प्रत्युत संतति-निरोधके कृत्रिम उपायोंसे उसको कम करनेकी चेष्टा करना महान् घातक है। कारण कि इन उपायोंके प्रचार-प्रसारसे समाजमें प्रत्यक्ष रूपसे व्यभिचार, भोगपरायणता आदि दोषोंकी वृद्धि हो रही है और चरित्र, शील, संयम, लज्जा आदि गुणोंका ह्रास हो रहा है। जब लोगोंमें चरित्र, शील आदि नहीं रहेंगे, तो फिर देश बलवान् कैसे होगा? अँग्रेजीकी एक कहावत प्रसिद्ध है—

धन गया तो कुछ नहीं गया,

स्वास्थ्य गया तो कुछ गया,

चरित्र गया तो सब कुछ गया!

जापान आदि देशोंमें जो उन्नति देखनेमें आ रही है, वह कम जनसंख्याके कारण नहीं है, प्रत्युत वहाँके लोगोंकी कर्तव्यपरायणता, ईमानदारी, परिश्रम, देशभक्ति आदि गुणोंके कारण है*। हमारे देशके पिछड़ेपन, (बेरोजगारी, गरीबी) का कारण जनसंख्याकी वृद्धि नहीं है, प्रत्युत अकर्मण्यता, चरित्रहीनता, आलस्य, प्रमाद, भ्रष्टाचार आदिकी वृद्धि है। परंतु यहाँ कर्मण्यता, सच्चरित्रता, संयम, त्याग आदिकी तरफ ध्यान न देकर जनसंख्याको कम करनेके उपायोंकी तरफ ही ध्यान दिया जा रहा है, जो कि इन दुर्गुणोंको बढ़ानेवाले हैं। यह देशके लिये बहुत घातक है! उदाहरणके लिये—सिनेमा, वीडियो, पत्र-पत्रिकाओं आदिके द्वारा लोगोंका चरित्र, शील, भ्रष्ट किया जा रहा है, उनको व्यभिचार, हिंसा, चोरी आदिकी शिक्षा दी जा रही है। जगह-जगह शराबकी दूकानें खोलकर, पान-मसाला आदि वस्तुओंका प्रचार करके लोगोंको व्यसनी बनाया जा रहा है और उनका स्वास्थ्य नष्ट किया जा रहा है। विभिन्न रीतियोंसे लोगोंको काम कम करनेकी तथा खर्चा अधिक करनेकी ऐश—आराम करनेकी प्रेरणा की जा रही है; जैसे—सप्ताहमें पाँच दिन काम करो, अमुक समय दूकानें मत खोलो, आदि। कर्मचारी काम कम करें या न करें, पर उनको वेतन पूरा दिया जाता है, फिर वे काम अधिक करनेका परिश्रम क्यों करें? वे ताश खेलने, चाय तथा बीड़ी-सिगरेट पीने आदि व्यर्थके कार्योंमें अपना समय बरबाद करते हैं। सरकारी कार्यालयोंमें प्राय: घूसके बिना कोई कार्य सिद्ध नहीं होता। प्रत्येक क्षेत्रमें भ्रष्टाचार व्याप्त हो रहा है। जो रक्षक हैं, वे भक्षक बन रहे हैं। जिसको जिस पदके अनुसार काम करना आता ही नहीं, उसकी नियुक्ति उस पदपर केवल जातिके आधारपर कर दी जाती है। जो योग्य व्यक्ति हैं, उनको नौकरी नहीं मिलती। स्कूलोंमें बालकोंकी भरतीके लिये हजारों रुपयोंकी घूस ली जाती है और उसको ‘डोनेशन’ (दान) कहा जाता है! अध्यापकलोग स्कूलमें बालकोंको ठीक ढंगसे नहीं पढ़ाते और टॺूशन लगानेके लिये प्रेरणा करते हैं।

देशी बाजरीके एक पौधेमें सौ-डेढ़ सौ सिट्टियाँ निकलती हैं। मैंने एक पौधेमें लगभग तीन सौ सिट्टियाँतक निकालनेकी बात सुनी है। परंतु सरकार किसानोंको देशी बाजरीका बीज न देकर विदेशी बाजरीका बीज देती है, जिसके पौधेमें केवल एक ही सिट्टा निकलता है। यह कैसी बुद्धि है—समझमें नहीं आता।

राज्य वही अच्छा होता है, जिसमें प्रजाके पास खूब धन-धान्य हो और जिसमें कोई वैरी न हो—‘अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यम्’ (गीता २।८)। परन्तु आज अलग-अलग समुदायोंमें एक-दूसरेके प्रति द्वेष पैदा करके उनको आपसमें लड़ाया जाता है। दोनों एक-दूसरेके व्यक्तियोंका तथा उनकी सम्पत्तिका नाश करते हैं। परिणामस्वरूप देशकी जनता और सम्पत्तिका ही नाश होता है। जिस देशकी जनता और सम्पत्तिका नाश होता हो, वह देश सुखी और समृद्ध, धनी कैसे हो सकता है? उस देशमें सुख-शान्ति कैसे पनप सकते हैं?

—इस प्रकार अनेक ऐसे कारण हैं, जिनसे देशकी व्यवस्था बिगड़ रही है। ऐसी स्थितिमें क्या जनसंख्या कम करनेसे बेरोजगारी, गरीबी दूर हो जायगी? दूर नहीं होगी, उलटे देश निर्बल और पराधीन हो जायगा।

जनसंख्या कम होनेसे सब सिंहकी तरह बलवान् नहीं हो जायँगे। सिंहमें तो ब्रह्मचर्यकी शक्ति है, पर संतति-निरोधके उपायोंसे ब्रह्मचर्यका नाश हो रहा है; क्योंकि कृत्रिम संतति-निरोधके पीछे मूल भाव यही है कि भोग तो भोंगे, ब्रह्मचर्यका नाश तो करें, पर संतान पैदा न हो! अगर संतति-निरोध करना ही हो तो ब्रह्मचर्यका पालन करना चाहिये।

यद्यपि जनसंख्या बढ़ाना मेरा उद्देश्य नहीं है, तथापि अगर कोई ऐसा मान ले कि मैं जनसंख्या बढ़ानेकी बात कहता हूँ तो भी यह अनुचित नहीं है; क्योंकि शास्त्रोंमें (ब्रह्माजीकी) जनसंख्या बढ़ानेकी आज्ञा तो आती है, पर घटानेकी आज्ञा कहीं नहीं आती! दूसरी बात, आजकल वोटका जमाना है। सिंह भले ही बकरियोंसे श्रेष्ठ तथा बलवान् हो, पर वोट डाले जायँ तो संख्या कम होनेसे सिंह हार जायगा और बकरियोंका राज्य हो जायगा।

संतति-निरोधके कृत्रिम उपायोंके प्रचारसे स्त्री और पुरुष—दोनों इतने क्रूर, निर्दय, हिंसक हो गये हैं कि गर्भमें स्थित अपनी सन्तानकी भी हत्या (भ्रूणहत्या या गर्भपात) करनेमें हिचकते नहीं, जो कि ब्रह्महत्यासे भी दुगुना पाप है*! अपने गर्भको नष्ट करनेवाली स्त्री सर्पिणीकी तरह है, जो अपनी सन्तानको भी खा जाती है। गाय बहुत सौम्य होती है, पर वह भी किसीको अपने बछड़ेके पास नहीं आने देती। भेड़-बकरियोंका पालन करनेवाले बताते हैं कि किसी-किसी बच्चेको भेड़ त्याग देती है, पर यदि कोई कुत्ता उस त्यक्त बच्चेपर छोड़ा जाय तो भेड़ उस बच्चेको अपना लेती है और उसकी रक्षा करती है। परन्तु आजकलकी स्त्रियाँ गायकी तरह होना तो दूर रहा, सर्वथा मूर्ख (जड) कहलानेवाली भेड़की तरह भी नहीं रहीं और महान् जहरीली सर्पिणीकी तरह हो रही हैं! कहाँ तो कहा गया है कि माँके समान शरीरका पालन-पोषण करनेवाला दूसरा कोई नहीं है—‘मात्रा समं नास्ति शरीरपोषणम्’ और कहाँ आजकलकी स्त्रियोंको अपनी सन्तानका पालन-पोषण कष्टप्रद लग रहा है! यह कितने नैतिक पतनकी बात है।

शंका—विदेशोंमें प्राय: लोगोंका चरित्र गिर रहा है, वहाँ व्यभिचार, हिंसा आदि पाप भी अधिक हो रहे हैं, फिर भी वे देश उन्नत क्यों हैं?

समाधान—वह उन्नति भौतिक है। भौतिक उन्नति वास्तवमें उन्नति है ही नहीं। आध्यात्मिक उन्नति ही वास्तविक उन्नति है। जिनकी आध्यात्मिक दृष्टि नहीं है, प्रत्युत भौतिक दृष्टि है, उनको ही भौतिक उन्नति बड़ी दीखती है। विदेशोंमें भौतिक उन्नति होनेपर भी लोग भीतरसे दु:ख, अशान्ति, संतापसे जल रहे हैं, जिससे वहाँ आत्महत्याएँ बढ़ रही हैं। भौतिक उन्नतिका परिणाम विनाश है। हमारे देशमें पहले राक्षसोंके पास बहुत भौतिक उन्नति थी, पर उन्होंने दूसरोंका भी नाश किया और खुद भी नष्ट हो गये। रावणने बहुत अधिक भौतिक उन्नति की थी, पर परिणाममें उसका, प्रजाका और भौतिक उन्नतिका विनाश ही हुआ। ऐसी दशा हुई कि पीछे रोनेवाला कोई नहीं रहा!

महाभारत (वनपर्व, अध्याय ९७) में एक कथा आती है। महर्षि अगस्त्यकी पत्नी लोपामुद्राने एक बार सुन्दर वस्त्राभूषणोंकी इच्छा प्रकट की। धन प्राप्त करनेके लिये अगस्त्यजी क्रमश: श्रुतर्वा, ब्रघ्नश्व और त्रसदस्यु—तीन राजाओंके पास गये। परन्तु तीनों ही राजाओंके यहाँ उन्होंने आय और व्ययका हिसाब बराबर देखा। इनसे कुछ भी धन लेनेसे प्राणियोंको दु:ख होगा—ऐसा विचार करके अगस्त्यजीने उन राजाओंसे कुछ नहीं लिया। तब उन राजाओंने आपसमें विचार करके कहा कि इल्वल नामक राक्षस सबसे अधिक धनवान् है; अत: धन प्राप्त करनेके लिये उसीके पास जाना चाहिये। फिर वे तीनों राजा महर्षि अगस्त्यके साथ इल्वलके पास गये। वहाँसे उनको बहुत-सा धन प्राप्त हुआ। तात्पर्य है कि आवश्यकतासे अधिक धन यक्ष-राक्षसोंके पास ही होता था, राजाओंके पास नहीं। इसलिये जो केवल धनका संग्रह तथा उसकी रक्षा करता है, वह यक्षवित्त कहलाता है। यक्षवित्तका पतन होता है—‘यक्षवित्त: पतत्यध:’ (श्रीमद्भा० ११।२३।२४)।

मातृशक्तिका तिरस्कार

वर्तमानमें नारी-जातिका महान् तिरस्कार, घोर अपमान किया जा रहा है। नारीके महान् मातृरूपको नष्ट करके उसको मात्र भोग्या स्त्रीका रूप दिया जा रहा है। भोग्या स्त्री तो वेश्या होती है। जितना आदर माता (मातृशक्ति) का है, उतना आदर स्त्री (भोग्या) का नहीं है। परंतु जो स्त्रीकोे भोग्या मानते हैं, स्त्रीके गुलाम हैं, वे भोगी पुरुष इस बातको क्या समझें? समझ ही नहीं सकते। विवाह माता बननेके लिये किया जाता है, भोग्या बननेके लिये नहीं। सन्तान पैदा करनेके लिये ही पिता कन्यादान करता है और संतान पैदा करने (वंशवृद्धि) के लिये ही वरपक्ष कन्यादान स्वीकार करता है। परंतु आज नारीको माँ बननेसे रोका जा रहा है और उसको केवल भोग्या बनाया जा रहा है। यह नारी-जातिका कितना महान् तिरस्कार है!

नारी वास्तवमें मातृशक्ति है। वह स्त्री और पुरुष—दोनोंकी जननी है। वह पत्नी तो केवल पुरुषकी ही बनती है, पर माँ पुरुषकी भी बनती है और स्त्रीकी भी। पुरुष अच्छा होता है तो उसकी केवल अपने ही कुलमें महिमा होती है, पर स्त्री अच्छी होती है तो उसकी पीहर और ससुराल—दोनों कुलोंमें महिमा होती है। राजा जनकजी सीताजीसे कहते हैं—‘पुत्रि पबित्र किए कुल दोऊ’ (मानस, अयोध्या० २८७।१)

आजकल विवाहसे पहले कन्याके स्वभाव, सहिष्णुता, आस्तिकता, धार्मिकता, कार्य-कुशलता आदि गुणोंको न देखकर शारीरिक सुन्दरताको ही देखा जाता है। कन्याकी परीक्षा परिणामकी दृष्टिसे न करके तात्कालिक भोगकी दृष्टिसे की जाती है। यह विचार नहीं करते कि अच्छा स्वभाव तो सदा साथ रहेगा, पर सुन्दरता कितने दिनतक टिकेगी?* भोगी व्यक्तिको संसारकी सब स्त्रियाँ मिल जायँ, तो भी वह सन्तुष्ट नहीं हो सकता—

यत् पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशव: स्त्रिय:।

न दुह्यन्ति मन:प्रीतिं पुंस: कामहतस्य ते॥

(श्रीमद्भा० ९।१९।१३)

‘पृथ्वीपर जितने भी धान्य, स्वर्ण, पशु और स्त्रियाँ हैं, वे सब-के-सब मिलकर भी उस पुरुषके मनको सन्तुष्ट नहीं कर सकते, जो कामनाओंके प्रहारसे जर्जर हो रहा है।’

ऐसे भोगी व्यक्ति ही नसबंदी, गर्भपात आदि महापाप करते हैं। विवाह वंशवृद्धिके लिये किया जाता है। यदि कन्या सद्गुणी-सदाचारी होगी तो विवाहके बाद उसकी सन्तान भी सद्गुणी-सदाचारी होगी; क्योंकि प्राय: माँका ही स्वभाव सन्तानमें आता है। एक मारवाड़ी कहावत है—‘नर नानाणे जाये है’ अर्थात् मनुष्यका स्वभाव उसके ननिहालपर जाता है। ‘माँ पर पूत, पिता पर घोड़ा। बहुत नहीं तो थोड़ा थोड़ा।’

कन्याका दान देनेमें भी उसका आदर है, तिरस्कार नहीं। यह दूसरे दानकी तरह नहीं है। दूसरे दानमें तो दान दी हुई वस्तुपर दाताका अधिकार नहीं रहता, पर कन्यासे संतान पैदा होनेके बाद माता-पिताका कन्यापर अधिकार हो जाता है और वे आवश्यकता पड़नेपर उसके घरका अन्न-जल ले सकते हैं। कारण कि कन्याके पतिने केवल पितृऋणसे मुक्त होनेके लिये ही कन्या स्वीकार की है और उससे संतान पैदा होनेपर वह पितृऋणसे मुक्त हो जाता है। इसलिये गोत्र दूसरा होनेपर भी दौहित्र अपने नाना-नानीका श्राद्ध-तर्पण करता है, जो कि लोकमें और शास्त्रमें प्रसिद्ध है।

हमारे शास्त्रोंमें नारी-जातिको बहुत आदर दिया गया है। स्त्रीकी रक्षा करनेके उद्देश्यसे शास्त्रने उसको पिता, पति अथवा पुत्रके आश्रित रहनेकी आज्ञा दी है, जिससे वह जगह-जगह ठोकरें न खाती फिरे, वेश्या न बन जाय*। स्त्री नौकरी करे तो यह उसका तिरस्कार है। उसकी महिमा तो घरमें रहनेसे ही है। घरमें वह महारानी है, पर घरसे बाहर वह नौकरानी है। घरमें तो वह एक पुरुषके अधीन रहेगी पर बाहर उसको अनेक स्त्री-पुरुषोंके अधीन रहना पड़ेगा, अपनेसे ऊँचे पदवाले अफसरोंकी अधीनता, फटकार, तिरस्कार सहन करना पड़ेगा, जो कि उसके कोमल हृदय, स्वभावके विरुद्ध है। वह आदरके योग्य है, तिरस्कारके योग्य नहीं है। पिता, पति अथवा पुत्रकी अधीनता वास्तवमें स्त्रीको पराधीन बनानेके लिये नहीं है, प्रत्युत महान् स्वाधीन बनानेके लिये हैं। घरमें बूढ़ी ‘माँ’ का सबसे अधिक आदर होता है, बेटे-पोते आदि सब उसका आदर करते हैं, पर घरसे बाहर बूढ़ी ‘स्त्री’ का सब जगह तिरस्कार होता है।

स्त्री बाहरका काम ठीक नहीं कर सकती और पुरुष घरका काम ठीक नहीं कर सकता। स्त्री नौकरी करती है तो वहाँ भी वह स्वेटरें बुनती है—घरका काम करती है! पुरुष शेखी बघारते हैं कि स्त्रियाँ घरमें क्या काम करती हैं, काम तो हम करते हैं, पैसा हम कमाते हैं! अगर पुरुष घरमें एक दिन भी रसोईका काम करे और बच्चेको गोदीमें रखे तो पता लग जायगा कि स्त्रियाँ क्या काम करती हैं! अगर स्त्री मर जाय तो बच्चोंको सास, नानी या बहन-बूआके पास भेज देते हैं; क्योंकि पुरुष उनका पालन नहीं कर सकते। परंतु पति मर जाय तो स्त्री कष्ट सहकर भी बच्चोंका पालन कर लेती है, उनको पढ़ा-लिखाकर योग्य बना देती है। कारण कि स्त्री मातृशक्ति है, उसमें पालन करनेकी योग्यता है। मैंने छोटे लड़के-लड़कियोंको देखा है। लड़कीको कोई चीज मिल जाय तो वह उसको जेबमें रख लेती है कि अपने छोटे बहन-भाइयोंको दूँगी, पर लड़केको कोई चीज मिले तो वह खा लेता है। कोई साधु, दरिद्र, भूखा आदमी बैठा हो तो कई पुरुष पाससे निकल जायँगे, उनके मनमें खिलानेका भाव आयेगा ही नहीं। परंतु स्त्रियाँ पूछ लेंगी कि बाबाजी, कुछ खाओगे? कारण कि स्त्रियोंमें दया है। उनको बालकोंका पालन-पोषण करना है, इसलिये भगवान् ने उनको ऐसा हृदय दिया है।

आजकल स्त्रियोंको पुरुषके समान अधिकार देनेकी बात कही जाती है, पर शास्त्रोंने माताके रूपमें स्त्रीको पुरुषकी अपेक्षा भी विशेष अधिकार दिया है—

सहस्रं तु पितॄन्माता गौरवेणातिरिच्यते॥

(मनु० २।१४५)

‘माताका दर्जा पितासे हजार गुना अधिक माना गया है।’

सर्ववन्द्येन यतिना प्रसूर्वन्द्या प्रयत्नत:॥

(स्कन्दपुराण, काशी० ११।५०)

‘सबके द्वारा वन्दनीय संन्यासीको भी माताकी प्रयत्नपूर्वक वन्दना करनी चाहिये।’

वर्तमानमें गर्भ-परीक्षण किया जाता है और गर्भमें कन्या हो तो गर्भ गिरा दिया जाता है, क्या यह स्त्रीको समान अधिकार दिया जा रहा है?

‘माँ’ शब्द कहनेसे जो भाव पैदा होता है, वैसा भाव ‘स्त्री’ कहनेसे नहीं पैदा होता। इसलिये श्रीशंकराचार्यजी महाराज भगवान् श्रीकृष्णको भी ‘माँ’ कहकर पुकारते हैं—‘मात: कृष्णाभिधाने’ (प्रबोध० २४४)। उपनिषदोंमें ‘मातृदेवो भव, पितृदेवो भव’ कहकर सबसे पहले माँकी सेवा करनेकी आज्ञा दी गयी है। ‘वन्दे मातरम्’ में भी माँकी ही वन्दना की गयी है। हिन्दूधर्ममें मातृशक्तिकी उपासनाका विशेष महत्त्व है। ईश्वरकोटिके पाँच देवताओंमें भी मातृशक्ति (भगवती) का स्थान है। देवीभागवत, दुर्गासप्तशती आदि अनेक ग्रन्थ मातृशक्तिपर ही रचे गये हैं। जगत् की सम्पूर्ण स्त्रियोंको मातृशक्तिका ही रूप माना गया है—

विद्या: समस्तास्तव देवि भेदा:

स्त्रिय: समस्ता: सकला जगत्सु।

(दुर्गासप्तशती ११।६)

परंतु भोगीलोग मातृशक्तिको क्या समझें? समझ ही नहीं सकते। वे तो उसको भोग्या ही समझते हैं।

शास्त्रोंमें स्त्रियोंको पुनर्विवाह न करके विधवाधर्मका पालन करनेके लिये कहा है तो यह उनका आदर है, तिरस्कार नहीं। धर्म-पालनके लिये कष्ट सहना तिरस्कार नहीं है, प्रत्युत तितिक्षा, तपस्या है। तितिक्षु, तपस्वी व्यक्तिका समाजमें बड़ा आदर होता है। पुरुष स्त्रीका तिरस्कार करे, उसको दु:ख दे, उसको तलाक दे, उसको मारे-पीटे—ऐसा शास्त्रोंमें कहीं नहीं कहा गया है। इतना ही नहीं, स्त्रीसे कोई बड़ा अपराध भी हो जाय, तो भी उसको मारने-पीटनेका विधान नहीं है, प्रत्युत वह क्षम्य है।

भीष्मजी कौरव-सेनाकी रक्षा करनेवाले थे—‘अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्’ (गीता १।१०); परंतु दुर्योधन उनकी भी रक्षा करनेके लिये अपनी सेनाको आदेश देता है—‘भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्त: सर्व एव हि’ (गीता १।११)। कारणकी दुर्योधन जानता था कि शिखण्डीके सामने आनेपर भीष्मजी उसपर कभी शस्त्र नहीं चलायेंगे, भले ही अपने प्राण चले जायँ! शिखण्डी पहले स्त्री था, वर्तमानमें नहीं; परन्तु वर्तमानमें पुरुषरूपसे होनेपर भी भीष्मजी उसको स्त्री ही मानते हैं और उसपर शस्त्र नहीं चलाते, प्रत्युत मरना स्वीकार कर लेते हैं—यह स्त्री-जातिका कितना सम्मान है।

थोड़े वर्ष पहलेकी बात है। एक बार जोधपुरके राजा सर उम्मेदसिंहजी और बीकानेरके राजा सर शार्दूल-सिंहजी शिकारके लिये जंगल गये। वहाँ शार्दूलसिंहजीकी गोली पैरमें लगनेसे एक सिंहनी घायल हो गयी। घायल होकर वह गुर्राती हुई उनकी तरफ आयी तो उम्मेदसिंहजीने कहा—‘हीरा! यह क्या किया? यह तो मादा है!’ पता लगनेपर उन्होंने पुन: उसपर गोली नहीं चलायी और खुद चेष्टा करके उससे अपना बचाव किया। यह नारी-जातिका कितना सम्मान है!

शास्त्रोंने पुरुषोंके लिये तो सन्ध्योपासना, अग्निहोत्र, यज्ञ, वेदपाठ आदि कई कर्तव्य-कर्म बताये हैं, पर स्त्रियोंके उन सब कर्तव्य-कर्मोंसे, पितृऋण आदि ऋणोंसे मुक्त रखा है* और उसको पतिके आधे पुण्यका भागीदार बनाया है। परंतु शास्त्रको न जाननेवाले इस विषयको क्या समझें? आज स्त्रियोंको उनके कर्तव्यसे विमुख करके अनेक झंझटोंमें फँसाया जा रहा है। शास्त्रोंने केवल पुरुषको ही यज्ञोपवीत धारण करके सन्ध्योपासना आदि विशेष कर्मोंको करनेकी आज्ञा दी है। परंतु आज स्त्रीको यज्ञोपवीत देकर उसको उलटे आफतमें डाला जा रहा है! क्या यह बुद्धिमानीकी बात है? पत्नी पतिके द्वारा किये गये पुण्यकर्मोंकी भागीदार तो होती है, पर पाप-कर्मोंकी भागीदार नहीं होती। उसको मुफ्तमें आधा पुण्य मिलता है। समाजमें भी देखा जाता है कि अगर डॉक्टर, पण्डित आदिकी पत्नी अनपढ़ हो तो भी डॉक्टरनी, पण्डितानी आदि कहलाती है! वास्तवमें आज अभिमानको मुख्यता दी जा रही है, इसलिये नम्रता बढ़ानेकी बात न कहकर अभिमान बढ़ानेकी बात ही कही और सिखायी जा रही है, जो कि पतनका हेतु है। ‘पुरुष ऐसा करते हैं तो हम क्यों न करें? हम पीछे क्यों रहें?’—यह केवल अभिमान बढ़ानेकी बात है। अभिमान जन्म-मरणका मूल और अनेक प्रकारके क्लेशों तथा समस्त शोकोंको देनेवाला है—

संसृत मूल सूलप्रद नाना।

सकल सोक दायक अभिमाना॥

(मानस, उत्तर० ७४।३)

अभिमानी व्यक्ति शास्त्रोंकी बातोंको क्या समझेगा? समझ ही नहीं सकता।

संसारके हितके लिये मातृशक्तिने बहुत काम किया है। रक्तबीज आदि राक्षसोंका संहार भी मातृशक्तिने ही किया है। मातृशक्तिने ही हमारी हिन्दू-संस्कृतिकी रक्षा की है। आज भी प्रत्यक्ष देखनेमें आता है कि हमारे व्रत-त्योहार, रीति-रिवाज, माता-पिताके श्राद्ध आदिकी जानकारी जितनी स्त्रियोंको रहती है, उनती पुरुषोंको नहीं रहती। पुरुष अपने कुलकी बात भी भूल जाते हैं, पर स्त्रियाँ दूसरे कुलकी होनेपर भी उनको बताती हैं कि अमुक दिन आपकी माता या पिताका श्राद्ध है, आदि। मन्दिरोंमें, कथा-कीर्तनमें, सत्संगमें जितनी स्त्रियाँ जाती हैं, उतने पुरुष नहीं जाते। कार्तिक-स्नान, व्रत, दान, पूजन, रामायण आदिका पाठ जितना स्त्रियाँ करती हैं, उतना पुरुष नहीं करते। तात्पर्य है कि स्त्रियाँ हमारी संस्कृतिकी रक्षा करनेवाली हैं। अगर उनका चरित्र नष्ट हो जायगा तो संस्कृतिकी रक्षा कैसे होगी? एक श्लोक आता है—

असंतुष्टा द्विजा नष्टा: संतुष्टाश्च महीभुज:।

सलज्जा गणिका नष्टा निर्लज्जाश्च कुलाङ्गना:॥

(चाणक्यननीति० ८।१८)

‘संतोषहीन ब्राह्मण नष्ट हो जाता है, संतोषी राजा नष्ट हो जाता है, लज्जावती वेश्या नष्ट हो जाती है और लज्जाहीन कुलवधू नष्ट हो जाती है अर्थात् उसका पतन हो जाता है।’

वर्तमानमें संतति-निरोधके कृत्रिम उपायोंके प्रचार-प्रसारसे स्त्रियोंमें लज्जा, शील, सतीत्व, सच्चरित्रता, सदाचरण आदिका नाश हो रहा है। परिणामस्वरूप स्त्री-जाति केवल भोग्य वस्तु बनती जा रही है। यदि स्त्री-जातिका चरित्र भ्रष्ट हो जायगा तो देशकी क्या दशा होगी? आगे आनेवाली पीढ़ी अपने प्रथम गुरु माँसे क्या शिक्षा लेगी? स्त्री बिगड़ेगी तो उससे पैदा होनेवाले बेटी-बेटा (स्त्री-पुरुष) दोनों बिगड़ेंगे। अगर स्त्री ठीक रहेगी तो पुरुषके बिगड़नेपर भी संतान नहीं बिगड़ेगी। अत: स्त्रियोंके चरित्र, शील, लज्जा आदिकी रक्षा करना और उनको अपमानित, तिरस्कृत न होने देना मनुष्यमात्रका कर्तव्य है।

धर्मका तिरस्कार

धर्मके बिना नीति विधवा है और नीतिके बिना धर्म विधुर है। अत: धर्म और राजनीति दोनों साथ-साथ होने चाहिये, तभी शासन बढ़िया होता है। परंतु आज धर्मका तिरस्कार हो रहा है। इस कारण देशमें तीन पाप तेजीसे बढ़ रहे हैं—व्यभिचार, हिंसा और चोरी। इन तीनोंके बढ़नेसे देशका भयंकर पतन हो रहा है!

(१) व्यभिचारकी वृद्धि—संतति-निरोधके कृत्रिम उपायोंके प्रचार-प्रसारसे महान् व्यभिचार बढ़ रहा है और कुँआरे लड़के, कुँआरी लड़कियाँ और विधवाएँ—सबका भयंकर पतन हो रहा है। कुँआरी लड़कियाँ और विधवाएँ भी गर्भवती हो रही हैं; क्योंकि उनको गर्भ रोकने अथवा गिरानेकी छूट मिल गयी। लोगोंमें सच्चरित्रता, सदाचार, शील, लज्जा आदिका महान् ह्रास हो रहा है।

जिस गतिसे संतति-निरोधके उपायोंका प्रसार हो रहा है, ऐसे होता रहा तो समाजमें बहुत अधिक व्यभिचार फैल जायगा। जिस पुरुषने नसबंदी करवा ली, उसके लिये कोई परस्त्री (विवाहिता, अविवाहिता, विधवा) बाकी नहीं रहेगी और जिस स्त्रीने ऑपरेशन करवा लिया, उसके लिये कोई परपुरुष बाकी नहीं रहेगा। न कोई मर्यादा रहेगी, न कोई भय रहेगा। अभी पुराने धार्मिक संस्कारोंके प्रवाहके कारण उतना पतन देखनेमें नहीं आ रहा है, पर यह प्रवाह कबतक रहेगा? ठेलेको धक्का देनेसे वह कुछ दूरतक अपने-आप चलता रहता है, फिर रुक जाता है। इसी तरह जब धार्मिक संस्कारोंका प्रवाह रुक जायगा, तब स्त्रियों और पुरुषोंमें कोई मर्यादा नहीं रहेगी। माँका पता है, पर बापका पता ही नहीं—ऐसी दशा तो विदेशोंमें अभी सुननेमें आ ही रही है! व्यभिचार फैलनेसे देशकी क्या दशा होगी, कितना अनर्थ होगा—इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता। परिणाम यह होगा कि पशु और मनुष्यमें कोई फर्क नहीं रहेगा। जैसे कुत्ता, गधा, सूअर, ऊँट, चूहा, बिल्ली आदि हैं, ऐसे ही मनुष्य भी हो जायँगे। जैसे कुत्ते, गधे आदिको हम कोई अच्छी बात समझाना चाहें तो नहीं समझा सकते, ऐसे ही उन मनुष्यरूपी पशुओंको भी कोई अच्छी बात नहीं समझा सकेंगे।

संतति-निरोधके मूलमें केवल सुखभोगकी इच्छा विद्यमान है। अपनी संतान इसलिये नहीं सुहाती कि वह हमारे सुखभोगमें बाधक है। ऐसी स्थितिमें अपने माँ-बाप, भाई-बहन कैसे सुहायेंगे? जब चोर चोरी करने जाता है, तब उसको दूसरा कोई आदमी नहीं सुहाता। व्यभिचारीको कोई स्त्री मिलती है, तब वह भी यही चाहता है कि पासमें दूसरा कोई आदमी न रहे*। इसी तरह जब मनुष्योंमें सुखभोगकी इच्छा बढ़ जायगी, तब उनको दूसरा कोई आदमी सुहायेगा नहीं, इतना ही नहीं, उनको त्यागी साधु-संत भी नहीं सुहायेंगे, अच्छी शिक्षा देनेवाले और संयम, मर्यादा, धर्मकी बात कहनेवाले भी नहीं सुहायेंगे; क्योंकि वे सुखभोगसे, व्यभिचारसे रोकते हैं। अपने सुखभोगमें बाधक समझकर भोगीलोग उनको भी मारने लगेंगे। गलती मत मिटाओ, गलती बतानेवालेको मिटाओ—ये प्रस्ताव पारित किये जायँगे! जैसे, बच्चोंकी सभा हो तो वे यही प्रस्ताव पारित करेंगे कि सब स्कूलोंको बंद करो; ये एक तरहके जेलखाने हैं। कारण कि पढ़ाईमें परतन्त्रता होती है, स्वतन्त्रतामें बड़ी बाधा लगती है!

(२) हिंसाकी वृद्धि—देशमें हिंसा बहुत बढ़ रही है। प्राप्त समाचारोंके अनुसार इस समय देशमें तीन हजार छ: सौ कसाईखाने हैं। इनमें दस बड़े यान्त्रिक (मशीनी) कसाईखाने हैं। कई कसाईखानोंमें लगभग ढाई लाख पशु प्रतिदिन कटते हैं। इन पशुओंमें लगभग पचास हजार गायें प्रतिदिन कटती हैं। प्रतिवर्ष हजारों टन मांस निर्यात होता है। इसके सिवाय विभिन्न क्षेत्रोंमें हिंसा बढ़ रही है। मनुष्योंकी हत्याओंमें भी वृद्धि हो रही है। खेतोंमें जहरीली दवाएँ छिड़की जाती हैं, जिससे अनुपयोगी समझे जानेवाले जीवोंके साथ-साथ उपयोगी जीव भी मर जाते हैं। वास्तवमें भगवान् की सृष्टिमें कोई जीव अनुपयोगी है ही नहीं। परंतु लोभसे अन्धे हुए मनुष्यको दूसरे जीवकी उपयोगिता दिखायी देती ही नहीं!

देशमें जिस गतिसे हिंसा बढ़ रही है, ऐसे बढ़ती रही तो एक समय पशुधन नष्ट हो जायगा और मांसाहारी मनुष्य मनुष्योंको ही खाने लगेंगे! ऐसे मनुष्य ही राक्षस होते हैं। रामावतारके समय भी ऐसी दशा हुई थी कि राक्षसोंने मुनियोंको खा-खाकर उनकी हड्डियोंके ढेर लगा दिये थे—

अस्थि समूह देखि रघुराया।

पूछी मुनिन्ह लागि अति दाया॥

जानतहूँ पूछिअ कस स्वामी।

सबदरसी तुम्ह अंतरजामी॥

निसिचर निकर सकल मुनि खाए।

सुनि रघुबीर नयन जल छाए॥

(मानस, अरण्य० ९।३-४)

राक्षसोंने गृहस्थोंको न खाकर मुनियोंको ही क्यों खाया? ऐसा अनुमान होता है कि घास खानेवालेके मांसकी अपेक्षा अन्न खानेवालेका मांस बढ़िया होना चाहिये। सिंहके मुखमें भी मनुष्यका मांस लग जाय तो वह नरभक्षी बन जाता है। मनुष्योंमें भी जो संयमी, ब्रह्मचारी और साधु पुरुष हैं, उनका मांस ज्यादा बढ़िया होना चाहिये; क्योंकि संयमी पुरुषकी हर चीज बढ़िया होती है। आजकल भी हम देखते हैं कि जो बछड़े बैल बना दिये जाते हैं, उनके मांसमें वह शक्ति नहीं होती, जो बैल न बनाये हुए बछड़ोंके मांसमें रहती है। अत: बैल बनाये हुए बछड़ोंका मांस मुस्लिम देशोंमें सस्ता बिकता है और बिना बैल बनाये हुए बछड़ोंका मांस बहुत महँगा बिकता है। इसलिये राक्षसोंने गृहस्थोंको न खाकर संयमी मुनियोंको खाया। जितने भी श्रेष्ठ पुरुष होते हैं, वे संयमी ही होते हैं। संयमी पुरुषोंके नाशसे कितना महान् पतन होगा!

(३) चोरीकी वृद्धि—देशमें चोरी भी बहुत बढ़ रही है। सरकारने बहुत ज्यादा टैक्स लगा दिये और ऐसे कानून बना दिये, जिनसे बचनेके लिये लोगोंने चोरी करनेके तरह-तरहके रास्ते खोज लिये हैं। वकील भी टैक्सकी चोरीके तरीके बताते हैं। सरकारने ज्यादा टैक्स इसलिये लगाये कि धनियोंका धन हमारे हाथमें आ जाय। परंतु धन तो मिला नहीं, उलटे धनीलोगोंको बेईमान बना दिया! धनीलोग भी ऐसे होशियार हैं कि सरकार फिरे डाल-डाल तो ये फिरें पात-पात! सरकार कितने ही कानून बनाये, पर ये कोई-न-कोई उपाय निकाल ही लेते हैं। इस तरह सरकार और जनता—दोनोंमें ही अनैतिकता, अधर्म, अन्याय बढ़ रहा है।

जिस गतिसे चोरी बढ़ रही है, ऐसे बढ़ती रही तो समाजमें लूट-मार शुरू हो जायगी। जैसे बड़ी मछली छोटी मछलीको खा जाती है, ऐसे ही बलवान् लोग निर्बलोंको लूटने लगेंगे। चोर-डाकुओंकी संख्या अधिक होनेसे उनका वोट अधिक होगा, जिससे राज्य भी ऐसे ही लोगोंके हाथमें चला जायगा। अभी भी ऐसी दशा हो रही है कि किरायेदार मकानका मालिक बन बैठता है, खेत बोनेवाला खेतका मालिक बन बैठता है, आदि-आदि। प्राचीन कालमें एक समय महाराज अश्वपतिने कहा था—

न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यप:।

नानाहिताग्निर्नाविद्वान्न स्वैरी स्वैरिणी कुत:॥

(छान्दोग्य० ५।११।५)

‘मेरे राज्यमें न तो कोई चोर है, न कोई कृपण है, न कोई मदिरा पीनेवाला है, न कोई अनाहिताग्नि (अग्निहोत्र न करनेवाला) है, न कोई अविद्वान् है और न कोई परस्त्रीगामी ही है, फिर कुलटा स्त्री (वेश्या) तो होगी ही कैसे?’

परंतु अब इससे उलटी स्थिति हो रही है अर्थात् चोर, कृपण, मदिरा पीनेवाले, अनाहिताग्नि, अविद्वान्, परस्त्रीगामी और वेश्या—इनकी ही मुख्यता हो रही है।

व्यभिचार, हिंसा और चोरी—इन तीनोंके बढ़नेका परिणाम बहुत भयंकर होगा। कितना भयंकर होगा—इसका हम अनुमान नहीं कर सकते। शास्त्रमें आया है—

अपूज्या यत्र पूज्यन्ते पूज्यपूजाव्यतिक्रम:।

त्रीणि तत्र प्रजायन्ते दुर्भिक्षं मरणं भयम्॥

(स्कन्दपुराण, मा० के० ३।४८)

‘जहाँ अपूज्य व्यक्तियोंका पूजन होता है और पूज्य व्यक्तियोंका तिरस्कार होता है, वहाँ तीन बातें अवश्य होती हैं—अकाल, मृत्यु और भय।’

भूमण्डलपर भारत-भूमिका एक विशेष प्रभाव है, जो प्रत्यक्ष देखनेमें नहीं आता। इस भूमिमें ऋषि-मुनियोंकी बहुत शक्ति है। यह देश दुनियामात्रका जीवन है, हित करनेवाला है। अत: भारतके पतनसे भूमण्डलके सब लोगोंका पतन है, अहित है। अभी जो हो रहा है, यह एक भयंकर महाभारतकी, महान् संहारकी तैयारी है। इसके बिना सुधारका, शान्तिका कोई उपाय भी नहीं दीखता! जब लोगोंका भीषण संहार होगा, शक्ति और सम्पत्तिका विनाश होगा, तभी शान्तिकी स्थापना हो सकेगी।