दृढ़ विचारसे लाभ

श्रोता—जबतक हमारे सामने सांसारिक भोग नहीं आते, तबतक तो हमारा दृढ़ भाव रहता है कि हम भोगोंमें फँसेंगे नहीं, परन्तु भोग सामने आनेपर हम कमजोर हो जाते हैं! हम क्या करें?

स्वामीजी—बहुत सुन्दर प्रश्न है! भोगोंमें न फँसनेका जो यह भाव है, यह बहुत ही दुर्लभ चीज है, बड़ी भारी कीमती चीज है। संसारका सम्बन्ध तोड़ना और भगवान् का सम्बन्ध जाग्रत् करना—यह खास मनुष्यता है। वास्तवमें देखा जाय तो संसारके साथ हमारा सम्बन्ध जुड़ता नहीं और भगवान् के साथ हमारा सम्बन्ध टूटता नहीं। हम संसारके साथ एक हो जायँ और भगवान् से अलग हो जायँ—यह बिलकुल असम्भव बात है। हमारेमें यह शक्ति नहीं है कि हम भगवान् से अलग हो जायँ और सर्वसमर्थ होते हुए भी भगवान् में यह शक्ति नहीं है कि वे हमारेसे अलग हो जायँ। वास्तविक बात यह है कि हमारा संसारके साथ सम्बन्ध नहीं है और भगवान् के साथ सम्बन्ध है। जो नहीं है, उसको तोड़ दें और जो है, उसे जाग्रत् कर दें—यह हमारा खास काम है।

जबतक सामने पदार्थ नहीं आते, तबतक यह दृढ़ भाव रहता है कि हम भोगोंमें फँसेंगे नहीं—इतनी बात भी अगर आपकी हो गयी है तो यह बड़े भारी आनन्दकी बात है! भोगोंकी इच्छा न होना बहुत ऊँचे दर्जेकी बात है, मामूली बात नहीं है। संसारको छोड़नेकी और भगवान् को प्राप्त करनेकी थोड़ी भी इच्छा हुई है तो इसका फल नाशवान् नहीं होगा, प्रत्युत अविनाशी फल (कल्याण) ही होगा—‘स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्’ (गीता २।४०)। लाखों, करोड़ों, अरबों रुपये मिल जायँ तो वे भी इसके सामने कुछ नहीं हैं। त्रिलोकीका राज्य मिल जाय तो उसकी केश-जितनी भी इज्जत नहीं है, क्योंकि यह सब नाशवान् है।

सामने पदार्थ आनेपर हम विचलित हो जाते हैं—यह दशा हमारी क्यों है कि हम विचार कर-करके छोड़ देते हैं, ऐसी खराब आदत पड़ी हुई है। सत्सङ्गमें सुनकर, पुस्तकोंमें पढ़कर विचार करते हैं कि अब ऐसा करेंगे, पर फिर उसको छोड़ देते हैं। मामूली बातोंको भी पकड़कर फिर छोड़ देते हैं। यह आदत ही आपको कमजोर करती है। अगर आपकी ऐसी आदत होती कि किसी बातको छोड़ दिया तो छोड़ ही दिया, पकड़ लिया तो पकड़ ही लिया, तो आपकी यह दुर्दशा नहीं होती। क्षमा करना, बुरा न लगे आपको; परन्तु है यह दुर्दशा ही! हरेक कामका विचार करते हैं तो उस विचारपर स्थायी नहीं रहते। पदार्थोंमें, संग्रहमें इतना अवगुण नहीं है, जितना अवगुण हमारी खराब आदतमें है। जबतक आपमें दृढ़ता नहीं है, तबतक आप किसी भी क्षेत्रमें जाओ, आप उन्नति नहीं कर सकते। आदत बिगड़नेसे बड़ा भारी नुकसान हो रहा है। अगर एक बातपर दृढ़ रहनेकी आदत बना लो तो निहाल हो जाओगे। भगवान् मेरे हैं तो चाहे कुछ भी हो जाय, भगवान् ही मेरे हैं। संसार मेरा नहीं है तो मेरा है ही नहीं।

सत्य बोलना है तो पक्का विचार कर लो कि आजसे सत्य ही बोलना है, झूठ बोलना ही नहीं है। इसमें भी ‘हम झूठ नहीं बोलेंगे’—इस बातपर अटल रहो, ‘हम सत्य बोलेंगे’—इस बातपर नहीं। त्यागकी बहुत बड़ी महिमा है। चाहे कुछ भी हो जाय, हम झूठ नहीं बोलेंगे। चाहे प्रतिष्ठा जाती हो, इज्जत जाती हो, पैसा जाता हो, हमारी कुछ भी हानि होती हो, पर हम झूठ नहीं बोलेंगे। अगर सत्य बोलनेका अवसर आनेपर आप कमजोर पड़ जाओ, सत्य बोलनेकी हिम्मत न रहे तो इतनी ढिलाई भले ही रख लो कि झूठ मत बोलो, चुप रह जाओ। सामनेवालेसे कह दो कि सभी बातें सबको बतानेकी नहीं होतीं, इसलिये हम नहीं बतायेंगे। हमारेमें सच्ची बात बतानेकी सामर्थ्य नहीं है; सच्ची बात कहनेका अभी विचार नहीं है; पूरी बात बतानेका हमारा मन नहीं है। वहाँसे उठकर चल दो कि ‘हमें काम है’। काम यही है कि बताना नहीं है। ऐसा करनेसे ‘हम झूठ नहीं बोलेंगे’—यह आपकी प्रतिज्ञा सत्य हो जायगी। यह आपको ऐसा उपाय बताया है, जिसको आप कर सकते हो।

आपने एक बार जो पक्का विचार कर लिया है, उस विचारकी फिर कभी हत्या मत करो। अपने विचारोंकी हत्या बार-बार जन्म-मरण देनेवाली है। अत: अपना विचार पक्का रखो कि पदार्थ भले ही सामने आ जायँ, अब हम विचलित नहीं होंगे, अब हम थूककर नहीं चाटेंगे। अपने विचारपर दृढ़ रहनेसे आपमें एक शक्ति आयेगी, एक बल आयेगा। फिर आपकी यह दशा नहीं रहेगी। लोग भले ही आपको कायर कहें, आपकी निन्दा करें, उसकी परवाह मत करो। हमें तो अपने विचारोंको पक्का करना है।

आप जैसे हो, वैसा आपको सुगम साधन तो मैं बता दूँगा, पर धारण तो आपको ही करना पड़ेगा। आपको बहुत सुगम, बहुत सरल साधन मैं बता दूँगा और आपसे यह बात स्वीकार भी करा लूँगा, इस साधनको हम कर सकते हैं और इससे हमारा भला हो सकता है! आप केवल तैयार हो जाओ, इतनेमें काम बन जायगा। कारण कि मूलमें परमात्माकी प्राप्तिके लिये ही मनुष्य-शरीर मिला है। अब परमात्मा नहीं मिलेंगे तो और क्या मिलेगा? संसार तो मिल ही नहीं सकता। वहम होता है कि रुपये मिल गये, कुटुम्ब मिल गया। सब खत्म हो जायगा मिला कहाँ? संसार मिल नहीं सकता और भगवान् से अलग हो नहीं सकते, बिलकुल सच्ची बात है यह।

हम किसीका भी अहित नहीं करेंगे, किसीको भी दु:ख नहीं देंगे—इसपर आप दृढ़ रहो। यह बात मामूली दीखती है, पर वास्तवमें इसका बहुत बड़ा माहात्म्य है। भजन, ध्यान, जप आदिसे इसका कम माहात्म्य नहीं है। यह बहुत कीमती बात है, पर लोग इसकी तरफ ध्यान नहीं देते, इसको ऐसे ही छोड़ देते हैं! जैसे रोग मिटनेपर भूख लगने लगती है और भोजन करनेपर शरीरमें ताकत आनी शुरू हो जाती है। पाचन ठीक होता है तो रूखा अन्न खानेपर भी शक्ति आने लगती है। इसी तरह आप अपने विचारपर दृढ़ रहो तो आपमें एक शक्ति आ जायगी। अत: अपने विचारपर पक्के रहो कि हम असत्य बोलेंगे ही नहीं, चाहे कुछ भी हो जाय। हम चतुराई नहीं करेंगे। इस बातसे आप मत डरो कि हमारी बेइज्जती हो जायगी। झूठ बोलकर छिपाव करोगे तो इससे बहुत बड़ी बेइज्जती होगी, कम नहीं होगी। बिना छिपावके आपकी बहुत इज्जत होगी। चालाकी करोगे तो अच्छे पुरुषोंके हृदयसे गिर जाओगे कि यह कोई कामका आदमी नहीं है। ठाकुरजीके हृदयसे गिर जाओगे। अत: चतुराई मत करो, सीधी-साफ बात कह दो। साफ बात कहनेसे कोई फाँसी थोड़े ही देता है? ऐसा करना कोई कठिन बात नहीं है। अपने कल्याणका विचार होनेसे यह बात बहुत सुगम हो जायगी। पहले थोड़ा-सा भय लगता है, फिर भय मिट जाता है।

अत: मेरेसे कोई बात पूछें तो मैं बता दूँगा, नहीं तो हजारों आदमियोंके सामने कह दूँगा कि मैं जानता नहीं। सीधी बात कहनेमें हमारेको क्या बाधा लगी? लोग हमारेको अज्ञ, मूर्ख मानेंगे, बेसमझ मानेंगे, और क्या होगा? समझदार मानकर कौन-सी भगवत्प्राप्ति करा देंगे और बेसमझ मानकर कौन-सी भगवत्प्राप्तिमें आड़ लगा देंगे? जो हम जानते हैं, वह बतायेंगे; जो नहीं जानते हैं, वह नहीं बतायेंगे और कई बातें ऐसी हैं, जो हम जानते हैं, पर नहीं बतायेंगे। मेरा ऐसा कहनेका काम पड़ा है कि तुम यह पूछते हो, पर इस बातको बतानेसे तुम्हें फायदा नहीं है, इसलिये नहीं बताऊँगा।

इस बातसे डरो मत कि हमारी पोल निकल जायगी। पोल निकल जायगी तो ठोस रह जायगी! पोल रखकर क्या करोगे? आश्चर्य आता है कि वेदव्यासजी महाराजने अपने जन्मकी बात श्लोकबद्धरूपसे कई बार लिख दी! क्या हृदय है उनका! इसके कारण वे पूजनीय हैं, आदरणीय हैं। सच्ची बात प्रकट करनेसे नुकसान नहीं होता। केवल वहम है कि नुकसान हो जायगा।