दु:खका कारण—सङ्कल्प

मनुष्यको दु:ख देनेवाला खुदका सङ्कल्प है। ऐसा होना चाहिये और ऐसा नहीं होना चाहिये—यह जो मनकी धारणा है, इसीसे दु:ख होता है। अगर वह यह सङ्कल्प छोड़ दे तो एकदम योग (समता) की प्राप्ति हो जायगी—‘सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी योगारूढस्तदोच्यते’ (गीता ६।४)। अपना ही सङ्कल्प करके आप दु:ख पा रहा है मुफ्तमें! सङ्कल्पोंका कायदा यह है कि जो सङ्कल्प पूरे होनेवाले हैं, वे तो पूरे होंगे ही और जो नहीं पूरे होनेवाले हैं, वे पूरे नहीं होंगे, चाहे आप सङ्कल्प करें अथवा न करें। सब सङ्कल्प किसीके भी पूरे नहीं हुए, और ऐसा कोई आदमी नहीं है, जिसका कोई सङ्कल्प पूरा नहीं हुआ। तात्पर्य है कि कुछ सङ्कल्प पूरे होते हैं और कुछ सङ्कल्प पूरे नहीं होते—यह सबके लिये एक सामान्य विधान है। जैसा हम चाहें, वैसा ही होगा—यह बात है नहीं। जो होना है, वही होगा।

होइहि सोइ जो राम रचि राखा।

को करि तर्क बढ़ावै साखा॥

(मानस १।५२।४)

इसलिये अपना सङ्कल्प रखना दु:खको, पराधीनताको निमन्त्रण देना है। अपना कुछ भी सङ्कल्प न रखें तो होनेवाला सङ्कल्प पूरा हो जायगा। जैसा तुम चाहो, वैसा ही हो जाय—यह हाथकी बात नहीं है। अत: सङ्कल्प करके क्यों अपनी इज्जत खोते हो? कुछ आना-जाना नहीं है! अगर मनुष्य सङ्कल्पोंका त्याग कर दे तो योगारूढ़ हो जाय, तत्त्वकी प्राप्ति हो जाय, मुक्त हो जाय, भक्त हो जाय, जीवन्मुक्त हो जाय; जो कुछ बड़ा-से-बड़ा काम है, वह हो जाय; यह मनुष्यजन्म सफल हो जाय, कुछ भी करना, जानना और पाना बाकी नहीं रहे! अत: अपना सङ्कल्प कुछ नहीं रखो। वह सङ्कल्प चाहे भगवान् के सङ्कल्पपर छोड़ दो, चाहे संसारके सङ्कल्पपर छोड़ दो, चाहे प्रारब्ध (होनहार) पर छोड़ दो और चाहे प्रकृतिपर छोड़ दो*। जो अच्छा लगे, उसीपर छोड़ दो तो दु:ख मिट जायगा। भगवान् पर छोड़ दो तो जैसा भगवान् करेंगे, वैसा हो जायगा। संसारपर छोड़ दो तो संसार (माता-पिता, भाई-बन्धु, कुटुम्ब-परिवार आदि) की जैसी मर्जी होगी, वैसे हो जायगा। अपने प्रारब्धपर छोड़ दो तो प्रारब्धके अनुसार जैसा होना है, वैसा हो जायगा। अपना कोई सङ्कल्प नहीं करना है। अपना सङ्कल्प रखकर बन्धनके सिवाय और कुछ कर नहीं सकते। होगा वही जो भगवान् करेंगे, जो प्रारब्धमें है अथवा जो संसारमें होनेवाला है।

भगवान् ने कहा है—‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ (गीता २।४७) ‘कर्तव्य-कर्म करनेमें ही तेरा अधिकार है, फलोंमें कभी नहीं।’ ऐसा करेंगे और ऐसा नहीं करेंगे, शास्त्रसे विरुद्ध काम नहीं करेंगे—इसमें तो स्वतन्त्रता है, पर दु:खदायी परिस्थिति नहीं आये—इसमें स्वतन्त्रता नहीं है। दु:खदायी और सुखदायी परिस्थिति तो आयेगी ही; आप चाहो तो आयेगी, न चाहो तो आयेगी। करनेमें सावधान रहना है। शास्त्रकी, सन्त-महात्माओंकी आज्ञाके अनुसार काम करना है। इसमें कोई भूल होगी तो वह मिट जायगी। कभी भूलसे कोई विपरीत कार्य हो भी जायगा तो वह ठहरेगा नहीं, टिकेगा नहीं, मिट जायगा। खास बात इतनी करनी है कि अपना सङ्कल्प नहीं रखना है। अपना कोई सङ्कल्प न रहे तो आदमी सुखी हो जाय! ‘यूँ भी वाह-वा है और वूँ भी वाह-वा है’ ऐसा हो जाय तो भी ठीक, वैसा हो जाय तो भी ठीक!

रज्जब रोष न कीजिये, कोई कहे क्यों ही।

हँसकर उत्तर दीजिये, हाँ बाबाजी यों ही॥

चाहे संसारके सङ्कल्पमें अपना सङ्कल्प मिला दो, चाहे प्रभुके सङ्कल्पमें अपना सङ्कल्प मिला दो, चाहे प्रारब्धमें अपना सङ्कल्प मिला दो। जैसा होना है, वैसा हो जायगा; कूदाकूदी क्यों करो! अपने सब सङ्कल्प छोड़ दो तो जीवन महान् पवित्र हो जायगा। जो अपने-आप होता है, उसमें अपवित्रता नहीं आती, वह ठीक ही होता है। संसारके सङ्कल्पसे होगा तो ठीक होगा, भगवान् के सङ्कल्पसे होगा तो ठीक होगा, प्रारब्धसे होगा तो ठीक होगा। बेठीक होगा ही नहीं। बेठीक तो हम कर लेते हैं। अपना सङ्कल्प कर लेते हैं तो बेठीक हो जाता है।

एक स्फुरणा होती है और एक सङ्कल्प होता है। कोई बात याद आती है—यह ‘स्फुरणा’ है और ऐसा होना चाहिये, ऐसा नहीं होना चाहिये—यह ‘सङ्कल्प’ है। संसारकी स्फुरणा होती रहती है और मिटती रहती है। आप जिस स्फुरणाको पकड़ लेते हो, वह सङ्कल्प हो जाता है। सङ्कल्पमें मनुष्य बँध जाता है—‘फले सक्तो निबध्यते’ (गीता ५।१२)। सङ्कल्पसे कामना पैदा हो जाती है—‘सङ्कल्पप्रभवान्कामान्’ (गीता ६।२४), जो सम्पूर्ण पापों और दु:खोंकी जड़ है। जो सब सङ्कल्पोंका त्याग कर देता है, वह योगारूढ़ हो जाता है। कितनी सीधी-सरल बात है! इसमें बेठीक होगा ही नहीं।

आप कितना ही ठीक समझो या बेठीक समझो; जो होना है, वह होगा ही। जो अनुकूल या प्रतिकूल होनेवाला है, वह तो होगा ही। सर्दी आनी है तो आयेगी ही, गर्मी आनी है तो आयेगी ही। आप सुखी-दु:खी हो जाओ तो आपकी मरजी! वह आपके सुख-दु:खके अधीन नहीं है। इस तरह अपने-अपने प्रारब्धका फल आयेगा ही। आप सुखी हो जाओ तो आयेगा, दु:खी हो जाओ तो आयेगा। एकदम सच्ची बात है! जो नहीं होना है, वह नहीं होगा। जो होना है, वह हो जायगा। जो होगा, वह हम अपने-आप देख लेंगे। वह कोई छिपा थोड़े ही रहेगा! अत: चतुर वही है, जो अपना कोई सङ्कल्प नहीं रखता। सीधी-सादी बात है, अपना सङ्कल्प न रखे तो निहाल हो जाय आदमी! क्यों सङ्कल्प रखे और क्यों दु:ख पाये!

अपने अनुकूलमें राजी होना और प्रतिकूलमें नाराज होना—ये दोनों ही व्यथा हैं। भगवान् कहते हैं कि ‘इन्द्रियोंके जो विषय हैं, वे अनुकूलता और प्रतिकूलताके द्वारा सुख-दु:ख देनेवाले हैं। वे आने-जानेवाले और अनित्य हैं। उनको तुम सह लो। सुख-दु:खमें सम रहनेवाले जिस धीर मनुष्यको वे व्यथा नहीं पहुँचाते, हलचल पैदा नहीं करते, वह मुक्तिका पात्र हो जाता है, उसका कल्याण हो जाता है (गीता २।१४-१५)। गुणोंका जो संग है, वृत्तियोंके साथ जो आसक्ति है, बस, यही ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म लेनेका कारण है—‘कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु’ (गीता १३।२१)।

सङ्कल्प मिट जाता है। कभी पूरा होकर मिट जाता है, कभी न पूरा होकर मिट जाता है। पूरा होना है तो पूरा होकर मिट जायगा, पूरा नहीं होना है तो ऐसे ही मिट जायगा। यह तो मिटनेवाली चीज है—‘आगमापायिनोऽनित्या:।’ इसको सह लो, बस—‘तांस्तितिक्षस्व’ (गीता २।१४)। ऐसा हो गया तो वाह-वाह, ऐसा नहीं हुआ तो वाह-वाह! जीवन्मुक्त हो जाओगे! ‘सोऽमृतत्वाय कल्पते’ (गीता २।१५)—परमात्मप्राप्तिकी सामर्थ्य आ जायगी। महान् शान्ति, महान् आनन्द अपने-आप आयेगा। अपने उद्योगसे किया हुआ ठहरता नहीं और अपने-आप आया हुआ जाता नहीं। लोगोंकी दृष्टिमें हम महात्मा, जीवन्मुक्त बन जायँगे और अपनी दृष्टिमें महान् शान्तिको प्राप्त हो जायँगे। लोक और परलोक दोनों सुधर जायँगे। इतनी-सी बात है कि अपना कोई सङ्कल्प न रखें। यही वास्तवमें त्याग है। संसारकी वस्तुओंका त्याग असली त्याग नहीं है। अगर संसारकी वस्तुओंका त्याग ही त्याग हो तो मरनेवाले सब त्यागी ही होते हैं! शरीरको नहीं पूछते, धनको नहीं पूछते, कुटुम्बको नहीं पूछते! न तार है, न चिट्ठी है, न समाचार है! पीछे आकर पूछते ही नहीं कि कौन कैसा है? पूरा त्याग कर दिया तो मुक्ति हो जानी चाहिये? परन्तु वस्तुओंके छूटनेसे मुक्ति नहीं होती, मनका सङ्कल्प छोड़नेसे मुक्ति हो जाती है।

स्फुरणा तो आती-जाती रहती है। जैसे, वायु आयी और चली गयी, ठण्डी आयी और चली गयी, गरमी आयी और चली गयी, वर्षा आयी और चली गयी, आँधी आयी और चली गयी, ऐसे ही स्फुरणा आयी और चली गयी। उसको पकड़ो मत तो वह अपने-आप मिट जायगी। परन्तु उसको पकड़ लोगे तो वह सङ्कल्प हो जायगा और सङ्कल्पसे कामना पैदा हो जायगी। स्फुरणासे कामना पैदा नहीं होती। चलते-चलते रास्तेमें वृक्ष दीख गया, पत्थर दीख गया तो दीख गया, पर जहाँ मनमें आया कि यह पत्थर तो बहुत बढ़िया है, वहाँ मन चिपक जायगा। वह सङ्कल्पका रूप धारण कर लेगा। आप छोड़ना चाहो तो वह छूट जायगा, इसमें परवशता नहीं है।

सङ्कल्पके दो भाग हैं, एक तो आवश्यक सङ्कल्प है और एक अनावश्यक सङ्कल्प है। जैसे, अपने शरीर-निर्वाहके लिये अन्न, जल, वस्त्रकी आवश्यकता मनमें पैदा होती है तो यह आवश्यक सङ्कल्प है; और बैठे-बैठे यों ही मनमें विचार किया कि यह होना चाहिये, यह नहीं होना चाहिये तो यह अनावश्यक सङ्कल्प है। आवश्यकता तो पूरी होगी, पर अनावश्यकता कभी पूरी नहीं होगी। आप सङ्कल्प करो तो आवश्यकता पूरी हो जायगी और सङ्कल्प न करो तो आवश्यकता पूरी हो जायगी। सङ्कल्प करनेपर आवश्यकता पूरी होगी तो अभिमान आ जायगा। परन्तु बिना सङ्कल्प किये आवश्यकता पूरी होगी तो अभिमान नहीं आयेगा।

शुभ काम करनेका सङ्कल्प हो जाय तो उसको जल्दी शुरू कर देना चाहिये—‘शुभस्य शीघ्रम्’। फिर करेंगे—यह नहीं होना चाहिये। समयका पता नहीं है। काल सबको खा जाता है। अच्छा विचार हो तो काल खा जायगा और बुरा विचार हो तो काल खा जायगा। यदि मनमें बुरा विचार आ जाय तो ‘थोड़ा ठहरो, थोड़ा ठहरो’ ऐसा होनेसे फिर वह नहीं रहेगा और अच्छा विचार आ जाय तो ‘फिर करेंगे, फिर करेंगे’ ऐसा होनेसे फिर वह नहीं रहेगा, काल उसको खा जायगा। शुभ अथवा अशुभ काममें देरी करनेसे वैसा भभका नहीं रहता, कमजोर होकर मिट जाता है।

श्रोता—स्वाभाविक शान्ति कैसे बनी रहे?

स्वामीजी—अपना सङ्कल्प छोड़ दो तो अशान्ति रहेगी ही नहीं। अपना कोई सङ्कल्प मत रखो तो शान्तिके सिवाय क्या रहेगा? केवल शान्ति, शुद्ध शान्ति रहेगी। अपना सङ्कल्प ही अपनेको दु:ख देता है, और कोई दु:ख देनेवाला नहीं है। विपरीत-से-विपरीत परिस्थिति आ जाय, बीमारी आ जाय, धन चला जाय, बेटा मर जाय आदि जो होनेवाला है, वह होगा और होकर मिट जायगा। या तो वह मिट जायगा या शरीर मिट जायगा। यह रहेगा नहीं, पक्की बात है। उत्पन्न होनेवाली मात्र वस्तु नष्ट होनेवाली है। इसलिये किसी सङ्कल्पको पकड़े ही नहीं तो शान्तिकी प्राप्ति हो जायगी।